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उमेश मौर्य का आलेख - सम्मान

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सम्मान किसे नहीं पसन्द ? छोटे बच्चे से लेकर बड़े बुर्जुग तक को। गरीब, अमीर और भिखारी भी इसे पसन्द करते हैं। चोर ईमानदार, डाकू और शैतान भी सम्मान का अधिकार पाना चाहते हैं। लेकिन जहाँ सम्मान देने की बात आती है। हर किसी के सामने एक सवालिया निशान लग जाता है। कि किसे दें और क्यों दें। योग्यता अयोग्यता का निर्णय आ जाता है। छोटे बड़े, उॅच नीच, जॉति-पॉति, मजहब, काला गोरा, स्वदेशी विदेशी, अपना पराया, भाषा या फिर शिक्षा जैसी कितनी दीवारें खड़ी हो जाती है। और सम्मान को इतनी सारी दीवारों को तोड़कर बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

सम्मान व्यक्ति के हृदय से निकली हुई स्व की आवाज है। जो सहज ही किसी के प्रति हो जाती है। जो हमारे हाव भाव में प्रर्दशित होती है। हमारे व्यवहार को प्रभावित करती है। सम्मान न किसी से जबरजस्ती ग्रहण किया जा सकता है। न दिया जा सकता है। सम्मान स्वार्थ रहित है। भूत भविष्य और वर्तमान से परे है। हर एक व्यक्ति अपने वर्तमान, भूत और भविष्य ही क्या, अनन्त काल तक सम्मानित बना रहना चाहता है। सम्मान पारिवारिक रिश्तों का मूलभूत आधार है। जिसके विस्तार में देश और समय की सीमाएं नहीं है। जीव जन्तुओं का इसका अनुभव होता है। अन्यथा आप किसी कुत्ते को डाटिये या पुचकारिये तो उसकी प्रतिक्रिया में बदलाव का अन्तर स्पष्ट देखने को मिलता है।

आजकल सम्मान का रूप जो देखने को मिलता है। वह आन्तरिक स्फुरण न होकर बाहरी अभिव्यक्ति है। एक प्रबंधन या किसी रटे रटाये नियम का प्रतिपादन मात्र है। इसके बड़े-बड़े विद्यालय एवं कार्यशालाएं भी चल रही हैं। जिसमें हमें किसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए किस व्यक्ति के साथ कैसे सम्मान प्रकट करें। हॅस के मिलें, होठों पे थोड़ी मुस्कान लेकर हाथ मिलाए। सामने वाले पर अपनी कमियों को प्रकट न होनें दें। अपनें घर की समस्याओं को घर पर ही छोड़ दें। अपने कार्यक्षेत्र में अपने उच्चाधिकारियों के साथ हमेशा सम्मान का भाव रखें। इसी तरह अनेकानेक नुस्खे दिन ब दिन प्रयोग हो रहे हैं। और सम्मान देनें के नये नये रूप सामने आ रहे हैं।

सम्मान व्यक्ति के व्यक्तित्व से निर्मित होता है। यह तो वैसे ही है जैसे किसी पारदर्शी सीसे से किसी दृश्य को देखना। सीसा जितना साफ होगा दृश्य उतना ही स्पष्ट होगा। हमारा व्यक्तित्व जितना उज्जवल होगा लोगों का सम्मान स्वतः ही प्रकट होगा। यह किसी से आग्रह की वस्तु नहीं है। पूर्णतः आन्तरिक और आत्मिक है। हमारा व्यक्तित्व हमारे कार्य क्षेत्र, व्यक्तिगत जीवन, समाज के प्रतिजागरूकता, और उत्तरदायित्व को निर्वाह करने की उदासीनता एवं गंभीरता के आधार पर तैयार होती है। जिसके परिणाम दूरगामी होते हैं।

पुराने समय के शिक्षकों के बारे में मुझे आज भी सम्मान महसूस होता है। उनके त्याग और समर्पण की भावना से सहज ही सम्मान से सिर झुक जाते थे। विद्यालय को मंदिर और मंदिर में विद्यादान करते हुए ये शिक्षक चंद पैसों में अपना जीवन उत्सर्ग कर देते थे। मॉस, मदिरा, धूम्रपान और सभी व्यसनों से दूर एक त्यागमय जीवन। अपने आप ही बालकों को सादगी का पाठ पढाता था। उन्होंने जो देना चाहा वही जीवन खुद भी जिया। उनके लिए शिक्षा साधना थी न कि साधन। हमारे प्राचीन काल के ऋषि मुनियों ने तो यहॉ तक स्थान प्राप्त कर लिया कि उन्हें ईश्वर तुल्य समझा जानें लगा। ''गुर्रू ब्रह्मा, गुरू विष्णु, गुरू देवो महेश्वरा।'' ''गुरू गोविन्द दोउ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।'' एसे उच्चादर्श से सच्चे सम्मान का उदय होता है।

अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा का भाव हमें दूसरों की निगाह में सम्मानित बनाते हैं। एक अयोग्य और धूर्त व्यक्ति भी हमेशा सम्मान की आशा करता है। जिसे बाहरी रूप से लोग सम्मान तो देते हैं। जो कि उन्हें चाटुकारों की श्रेणी में ले जाकर खड़ा कर देती है। जो कार्य स्वार्थ और मजबूरी की लालसा से ग्रसित होकर किये जाते हैं। इससे सम्मान देने और लेने वाला दोनों ही भ्रम में रहते हैं। एक समझता है कि सामने वाला उसे सच्चा सम्मान दे रहा है। दूसरा समझता है ये हमारे विचारों से प्रभावित है। रिश्तों में विश्वास की रिक्तता हमेशा बनी रहती है।

सम्मान हमारे घर से शुरू होकर विश्व बंन्धुत्व की भावना में फैल जाता है। हमारे माता-पिता, भाई -बहन, का परिवार में एक दूसरे का सम्मान प्रेम के एक सभ्य और व्यवस्थित वातावरण का निर्माण करता है। इससे आगे हमें अपने गुरू, भाषा, समाज, धर्म, संस्कृति-सभ्यता, हमारे देश के लोग, और राष्ट्र का सम्मान करना चाहिए। जो कि राष्ट्र की उन्नति का आधार है। और यदि हम पूर्ण सम्पन्नता से और समृद्धि के साथ संस्कृति और सभ्यता का सम्मान करते हुए आगे बढ़ेंगे तभी हम किसी दूसरे का सम्मान कर सकेंगे। क्योंकि एक सम्मानित व्यक्ति के द्वारा दिया गया सम्मान ही मूल्यवान होता है। जो खुद अपना और अपने से जुड़ी हुई भाषा, धर्म, संस्कृति और देश का सम्मान नहीं कर सकता। उससे सम्मान की अपेक्षा निरर्थक है। हास्यास्पद भी। सम्मानित ही सम्मानित का सम्मान करता है।

- उमेश मौर्य

सराय, भाई, सुलतानपुर,

उत्तर प्रदेश, भारत।

ukumarindia@gmail.com

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