सोमवार, 28 दिसंबर 2015

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - धरती पर भार ही हैं खुसर-पुसर करने वाले

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आयोजन कोई सा, चल समारोह हो या स्थिर समारोह, किसी की शादी-ब्याह का प्रोसेशन हो या शवयात्रा का मौका, गोद भराई का अवसर हो या मेहंदी पर्व, कोई सा सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक अनुष्ठान हो या किसी भी प्रकार की बैठक, समारोह या सभा-संगोष्ठी, या फिर किसी भी प्रकार का कोई सा छोटा-बड़ा सामुदायिक या सार्वजनिक आयोजन।

इसमें तीन-चार तरह के लोगों की भूमिका अहम होती है। एक तो आयोजक हैं जो आयोजन के काफी पहले से तनाव झेलते हुए रहते हैं और आयोजन निपट जाने के बाद भी कई दिनों तक भी किसी न किसी प्रकार से समीक्षा और आलोचना से परेशान होते रहते हैं अथवा अपनी तारीफों के पुल बँधते चले जाने से आत्ममुग्धावस्था में रहा करते हैं और जब तक इस बाहरी उत्साह के अतिरेक में रहते हैं तब तक औरों की कुछ नहीं सुनते।

दूसरी प्रजाति उन प्राणियों की है जिनका आयोजन और उसके उद्देश्य से कोई सरोकार नहीं होता बल्कि ये लोग सिर्फ कमियां तलाशने, आयोजन विफल करने या बदनाम करने की नीयत से आते हैं।

इनका एक सूत्री एजेण्डा यही होता है कि किस तरह कोई न कोई कमी तलाशी जाए, और उसे फिर सार्वजनीन कर बदनाम किया जाए। इस प्रजाति के लोग भी अब खूब हो रहे हैं।

तीसरी प्रकार के लोग वे हैं जिन्हें आयोजन से दिली लगाव होता है, चाहे किसी विचार, विचारधारा, सिद्धान्त अथवा अभिरुचि से बंधे हों, या किसी व्यक्ति विशेष के प्रशंसक, भक्त या  अनुयायी हों, ये लोग जहां जाएंगे वहाँ पूरी तल्लीनता से आयोजन में भागीदारी निभाते हैं और श्रोता-दर्शक अथवा रसिक की भूमिका को पूरी तरह जीते हैं। ये लोग अपने से संबंधित हर आयोजन का भरपूर आनंद उठाते हैं।

इन सबसे हटकर मनुष्य की श्रेणी में शामिल प्राणियों की एक मजेदार प्रजाति है जिसे किसी आयोजन से कोई मतलब नहीं होता, केवल दिखावे के लिए आते हैं या टाईमपास के लिए।

इनके लिए ये आयोजन किसी धर्मशाला से कम नहीं होते जहाँ समय काटने के भरपूर अवसर उपलब्ध होते हैं, और अधिकतर बार चाय-नाश्ते या भोजन तक का प्रबन्ध भी राहत दे डालता है।

इन लोगों की न कोई विचारधारा होती है, न विचार या सिद्धान्त। ये केवल भीड़ के तौर पर इस्तेमाल हो सकते हैं और भीड़ से जो भी काम लिए जा सकते हैं उनके लिए ये लोग सर्वाधिक उपयुक्त साबित होते हैं।

कोई सा आयोजन हो, इसमें इस किस्म के लोग कभी भी बिछात या कुर्सियों पर नहीं बैठते बल्कि घेरे में चारों तरफ खड़े रहते हैं अथवा कोने या पीछे वाली कुर्सियों या बिछात पर जमे रहेंगे। चाहे बैठक की व्यवस्था कितनी ही उम्दा क्यों न हो, इन लोगों का मानना है कि बैठ जाने का मतलब है उस आयोजन में दीक्षित हो जाना और अपने आपको भूल जाना या आयोजकों के सामने घुटने टेक देना।

किसी आयोजन के प्रति गंभीर और अनुशासित नहीं रह पाना इन प्राणियों की सर्वोपरि विशेषता है जो इनमें निरन्तर बढ़ती ही रहती है।

अब इसमें एक नई प्रजाति और जुड़ गई है जो चाहे कहीं भी बिराजमान हो, सिर झुकाये मोबाइल पर कोई न कोई सामाजिक, वैश्विक और ब्रह्माण्डस्तरीय नेटवर्किंग अनुष्ठान करते रहेेंगे।

जिन लोगों को बचपन में खिलौनों का साथ नहीं मिल पाया, उन लोगों के लिए बचपन की हसरतें पूरी करने मोबाइल वरदान ही है। अब आयोजनों में दो तरह के लोग ही दूसरों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए रहते हैं। एक तो मोबाइल घूस्सू हैं जिन्होंने एकाग्रता और चूषकीय  क्षमता के मामले में तमाम किस्मों के पिस्सूओं को भी पछाड़ रखा है।

और दूसरे वे हैं जो हर कहीं खुसर-पुसर किए बिना बैठ नहीं पाते। रातों की नींद को छोड़ दिया जाए तो ये लोग हर क्षण कुछ न कुछ बोलते-सुनाते और सुनते ही रहते हैं। पता नहीं इतनी सारी सुनने और बोलने की ऊर्जा ये लोेग कहाँ से ले आए हैं।

खुसर-पुसर करने वाले लोगों की संख्या अब विस्फोटक होती जा रही है। इनकी हरकतों और नॉन स्टाप खुसर-पुसर को देख कर यही लगता है कि शायद इनका जन्म इसी काम के लिए ही हुआ है। ये लोग इतने उद्विग्न होते हैं कि एक जगह टिक कर बैठ भी नहीं सकते, इसलिए रह-रहकर इधर-उधर भागते रहते हैं।

आम तौर पर अब हर आयोजन में ऎसे लोग बतौर समस्या ही पेश आते हैं जिनकी वजह से कार्यक्रमों की गरिमा, अनुशासन, शांति और गांभीर्य प्रभावित होता है और इसका खामियाजा उन धीर-गंभीर लोगों को भुगतना पड़ता है जो कि शालीनता और अनुशासन से इन आयोजनों का हिस्सा होते हैं।

कहीं भी धीर-गंभीर और चुप नहीं रह पाने वाले ये लोग किसी भी जुलूस, प्रोसेशन या शवयात्रा तक में भी चुप नहीं रहते, अपनी बातों और लफ्फाजियों का प्राकट्य करते ही रहते हैं। कोई इलाका ऎसा नहीं बचा है जहाँ ये लोग विद्यमान न हों।

हमारे आस-पास भी ऎसे खूब सारे हैं जिन्हें आयोजनों से कोई मतलब नहीं है, फालतू की भीड़ की तरह जमा हो जाएंगे, और खुसर-पुसर करते ही रहेंगे।  तभी तो इन्हें और इनकी अनुशासनहीन हरकतों को देख कर लोग कहते रहते हैं कि यही वे लोग हैं जो धरती पर भार हैं।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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