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सुधा शर्मा की कविता - माँ

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माँ तेरा आँचल है बरगद की छाँव,
गमों की धूप मुझ तक आने नहीं देता.
माँ वक्षस्थल है तेरा चंदन. का वृक्ष
गमों के सर्पों का विष असर दिखा नहीं पाता
आशीर्वाद में जो हाथ माँ तेरा उठ जाए
जमानेभर की खुशियाँ बादल बनकर छा जाएँ
माँ तेरा दुलार तो है मेरे लिए सुखों का वितान
दुनिया के हर कोने में मेरा परचम लहरा जाए
जो है उदास,खिन्न और लाचार,
क्या उनकी माँ की दुआओं में असर नहीं
असर तो है पर तूने उन्हें पुकारा नहीं
माँ की दुआ पाने के लिए अपने हृदय को निखारा नहीं

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