गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - आरोग्य का आधार चित्त की निर्मलता

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संबंध चित्त से है।  चित्त की निर्मलता जब तक बनी रहती है तब तक बाहरी बीमारियाँ या उनका प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ सकता।

आजकल हमारे आस-पास से लेकर सभी स्थानों पर विभिन्न प्रकार का प्रदूषण हावी है, खान-पान से लेकर हवाओं तक में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। यहां तक कि वनस्पति और फलों को निरापद समझा जाता रहा है लेकिन इनमें भी रासायनिक प्रभाव व्याप्त है। दूध भी शुद्ध नहीं रहा।

इन सभी हालातों में अब हम ऎसे विश्व में खड़े हैं जहाँ किसी भी प्राणी के लिए अब कुछ भी श्रेष्ठ या सेहतप्रद नहीं कहा जा सकता। जमीन से लेकर आसमाँ और नदियों से लेकर समंदर तक सभी कुछ प्रदूषित होते जा रहे हैं।

एक ओर बाहरी प्रदूषणों की मार हम झेल रहे हैं वहीं दूसरी ओर भीतरी प्रदूषण भी खर-दूषण की तरह हमारे पीछे पड़े हुए हैं। अपना शरीर इस कदर बना हुआ है कि यह तमाम प्रकार के बाहरी प्रदूषणों एवं विजातीय द्रव्यों को बर्दाश्त कर सकता है लेकिन यह भीतरी रोग प्रतिरोधक क्षमता तभी तक बनी रह सकती है जब तक कि हमारा चित्त शुद्ध एवं निर्विकारी हो।

जब तक दिल और दिमाग शुद्ध और निर्मल रहते हैं तभी तक हमारे भीतर की दिव्य मौलिक ऊर्जा सुरक्षित एवं संरक्षित रह सकती है। यह भीतरी ऊर्जा बनी रहने पर ही हम बाहरी खतरों से बचाव कर सकते हैं।  बाहरी खतरे कोई से हों, इनसे हम तभी तक सुरक्षित रह सकते हैं जब तक कि हमारे भीतर दिव्यता हो, हमारे मन में निर्मलता हो तथा दिमाग में किसी भी प्रकार की खुराफात न हो।

यह स्थिति तभी तक रह सकती है जब तक हमारे भीतर मनुष्यता हो, हमारे मन-वचन और कर्म में नैष्ठिक पवित्रता हो तथा जीवन के सुस्पष्ट लक्ष्य हमारे सामने हों। हमारी भीतरी शुचिता हमारे लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का काम करती है जहाँ कोई सा बाहरी खतरा हो, अपने आप बचाव हो जाता है तथा कई बार तो हमें अपने पास से होकर निष्फल गुजर गए खतरों के बारे में पता भी नहीं चलता।

सूक्ष्म शरीर यदि शुचितापूर्ण है तब स्थूल शरीर भी सुरक्षित रहेगा। लेकिन जैसे ही सूक्ष्म धरातल पर कहीं कोई दिक्कत आती है तब इसका सीधा प्रभाव स्थूल शरीर पर दिखना आरंभ हो जाता है।  स्थूल शरीर की सारी समस्याओं और बीमारियों के मूल में चित्त ही होता है।

जिसका चित्त जितना अधिक निर्मल होता है उतना वह स्वस्थ, सुखी, शांति और आनंदमय होता है। यह चित्त ही है जिसे हर क्षण दर्पण की तरह साफ-सुथरा रखना जरूरी है। आजकल इंसान कई प्रकार की दुविधाओं में जी रहा है। मन-मस्तिष्क में मलीनता भरी होती है तथा शरीर कई प्रकार की बीमारियों का घर।

जिस अनुपात में चित्त दूषित होगा उस अनुपात में शरीर भी विकारों का डेरा बनता चला जाता है। शरीर को स्वस्थ और फुर्तीला रखना चाहें तो सबसे पहले अपने मन-मस्तिष्क को खाली कर सफाई करें। अक्सर लोग कई प्रकार की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं उसका मूल कारण मन और मस्तिष्क से अधिक काम लेना तो है ही, इनमें विजातीय विचारों और नकारात्मकताओं का प्रभाव भी एक बहुत बड़ा कारण है। यह जरूरी नहीं कि चित्त के विकारों के लिए अकेले हम ही जिम्मेदार हों।

अक्सर परिवेशीय समस्याओं, कुण्ठाओं, सम सामयिक परिस्थितियों और अनचाही आकस्मिक आपदाओं की वजह से भी सूक्ष्म से लेकर स्थूल शरीर पर विकारों का प्रभाव देखा जाता है। कई बार पूर्वजन्मार्जित पापों और प्रारब्ध की वजह से भी साध्य-असाध्य व्याधियां हो सकती हैं। लेकिन अधिकांश मामलों में मानसिक और शारीरिक व्याधियों का मूल कारण चित्त ही है।

बहुत सारे लोग नकारात्मक चिंतन में भरे हुए रहते हैं और दूसरों के लिए हानि पहुंचाने, तनाव देने, दुःख देने तथा प्रतिष्ठा हानि करने के बारे में सोचते रहते हैं। इनके मन में इतनी मलीनता होती है कि इन्हें सीधे-सीधे शब्दों में काले मन और कचरा दिमाग वाला कहा जा सकता है।

ये लोग अपने दिल में औरों के प्रति जहर भरे रखते हैं और रोजाना कहीं न कहीं विषवमन कर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। इनके मन की ही तरह इनका दिमाग भी खुराफातों का डिब्बा होता है। इन लोगों के जीवन का हर क्षण खुराफात में ही गुजरता है।

ये लोग इन्हीं षड़यंत्रों में रमे रहते हैं कि किस तरह औरों का नीचा दिखाकर खुद को बुलंदी पर पहुंचा सकें, किस प्रकार औरों का हर तरह से नुकसान कर सकें, कैसे दूसरों को दुःखी कर सकें, तनाव दे सकें। इनमें भी कुछ फीसदी लोग ब्लेेकमेलर और नरपिशाची किस्म के होते हैं जिनकी जिन्दगी का उद्देश्य हड़प लेने का ही बना रहता है।

दिमाग में कूड़ा-करकट और मैला भरा रखने वाले ये विघ्नसंतोषी लोग गंदी नालियों के कीड़ों जैसे ही होते हैं जिनके लिए सडान्ध ही वह बहुत बड़ी ऊर्जा है जिसका आनंद पाने के लिए ये जिन्दा हैं। इस किस्म के मलीन लोग मानसिक और शारीरिक दोनों ही प्रकार से बीमार होते हैं और जीवन के उत्तराद्र्ध तक जाते-जाते ये गंभीर असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं।

यह बीमारी मानसिक भी हो सकती है, और  शारीरिक भी। जिसके दिमाग मेंं जितना अधिक कचरा जमा होता है उतना अधिक वह मनोरोगी और उन्मादी होता है। आजकल बड़े-बडे ़ और अभिजात्य एवं प्रभावशाली कहे जाने वाले लोग इसी किस्म के होते जा रहे हैं।

बहुत सारे लोग अपने आपको बड़ा मानने लगे हैं, इन लोगों को भी मानसिक रोगी ही माना जा सकता है। अपने आस-पास भी ऎसे खूब सारे लोग हैं जिन्हें यह भ्रम हो गया है उनके मुकाबले का कोई दूसरा है ही नहीं। जो कुछ हो रहा है वह उनके बूते ही, वे न रहेंगे तो शायद दुनिया ही न रहेगी।

तन, मन और मस्तिष्क से सही सलामत रहना चाहें तो अपने चित्त को निर्विकार बनाने पर ध्यान दें, मस्तिष्क से फालतू के गोरखधंधों, नकारात्मक मानसिकता और षड़यंत्रों में रमे रहने की बुरी आदत का परित्याग करें, अपने आपको हैवान की बजाय इंसान के रूप में प्रतिष्ठापित करें और यह प्रयास करें कि हमारा दिल और दिमाग हमेशा साफ-सुथरा रहे। चित्त की निर्मलता ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का मूलाधार है।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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