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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन का व्यंग्य - नये वर्ष के मन का डर

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चारों ओर जगमग जगमग बिजली के झालर की चमक के बीच सभी लोगों को नाचते- गाते , उछलते- कूदते , खाते - पीते , खुशियाली मनाते देख उसका मन भी प्रफुल्लित हो गया। पहली बार आ रहा था धरती पर वह। इस बीच , उसे जैसे ही पता चला कि उसी के स्वागत सत्कार में यह सब हो रहा है तब तो , उसकी खुशी का ठिकाना ही नही रहा , वह भी खूब उछलने – नाचने - कूदने लगा। नये झकाझक सफेद कपड़े में इत्र की तेज खुशबू के साथ वह धीरे धीरे धरती की ओर कदम रखने लगा। तभी अचानक उसने रोना शुरू कर दिया। डिस्को , पाप म्युजिक के बीच इतनी तेज आवाज में किसी का रोना नही भा रहा था लोगों को। पर रोने वाला दिखे तभी तो चुप कराने वाले या उसके दुख को जानने वाले उसके पास जायेंगे।

फिर भी किसी ने अंधेरे में तीर चलाने की तरह पूछ ही दिया – कौन हो भाई , क्यों हमारी खुशी में बाधा डाल रहे हो ? क्या दुख सता रहा है तुम्हे ? उसने बताया कि , मै नया वर्ष हूं और पुराने वर्ष को देखकर रो रहा हूं। ओह ! अपने सगे सम्बन्धी के साथ बिछुड़ने के गम में रो रहा है बिचारा। चुप हो जा भाई , आने वाले को जाना ही पड़ता है , इस दुनिया की यही रीति है। तुम्हारे स्वागत में हम सभी पलक पांवड़े बिछाकर बैठे हैं , तुम इस तरह रोओगे तो हमें भी अच्छा नहीं लगेगा। वैसे भी जाने वाला वर्ष हम सभी के लिए अच्छा नही था , इसलिए तुम भी उसके जाने का दुख मत मनाओ। नये वर्ष ने , जाने वाले वर्ष के लिए यह सुना तो उसे बहुत बुरा लगा। उसने पूछा - कैसे अच्छा नही था वह ? वह और कुछ कहे उसके पहले किसी ने कहा - तुम सामने तो आओ , तुम्हे सब पता चल जायेगा। मै अभी सामने नही आ सकता , क्योंकि हमारी बिरादरी को ब्रम्हाजी से श्राप मिला है कि एक सदस्य के धरती पर रहते दूसरा यहां प्रकट नहीं हो सकता। पर मेरे बिदा लेने वाले सम्बन्धी को आप लोगों ने कैसे बुरा कहा ? मुझे प्रकट होने के पहले कुछ सवालों का जवाब चाहिए। पूछो , पूछो .... बेशक पूछो , तुम्हारे लिए ही तो आर्टी-पार्टी और ये सभी भव्य आयोजन रखा गया है , आज तुम जो कहोगे उसे पूरा किया जायेगा।

पुराना वर्ष जब आया था तब कैसे दिखता था ? बहुत सुंदर दिखता था। क्या कपड़ा पहना था ? सफेद नया वस्त्र पहना था। तब अभी उसकी सुंदरता कहां गई ? किसने उसके नए सफेद कपड़ों को दागदार बनाया ? कौन उसकी इस हालात के जिम्मेदार है ? कई मिनट बीत गए , कोई जवाब नही आया। वह फिर पूछने लगा – किसने इसकी आंखें फोड़ी ? किसने इसके हाथों को खून से रंगा ? किसने इसके मुंह पर कालिख लगाया ? किसने इसकी मां बहन को अस्पताल में मारा ? कौन इसके पैर तोड़ने पर उतारू था ? किसने इसके बच्चों को स्कूल से स्वर्ग पहुंचाया ? कौन गरीब को सड़क में कुचल कर सांड़ की तरह घूम कर इसके हृदय को छलनी कर रहा है ? कौन इसकी बेटी निर्भया को बलात्कृत कर इसको बेइज्जत कर शान बघार रहा है ? सारे लोग चुप थे। और तो और पहले भी अनेकों ने मेरे पूर्वजों को बदनाम करने के लिए क्या – क्या नहीं किया। किसी ने मेरी गऊ माता का भोजन निगलकर उसकी पेट में लात मारा , किसी ने हमारी बेटी को दहेज में जलाया , किसी ने मोबाइल के स्परेक्टम को चबाकर तो किसी ने कोयला खाकर हमारे मुंह में कालिख पोता। यही सब दाग , बिदाई ले रहे वर्ष के चेहरे पर देखकर , रूलाई आ रही है मुझे।

कुछ जवाब देने के काबिल कोई नहीं बचा था। वह इतना डर गया कि उसने सोंच लिया – इस संसार में नही जाना है , जहां करते खुद हैं और बदनामी किसी और के मत्थे मढ़कर निकल लेते हैं। ब्रम्हाजी को हस्तक्षेप करना पड़ गया। पूरी व्यवस्था का सवाल था। समझाया खूब। वह , ब्रम्हा जी को ही पूछने लगा – कि कर्त्ता कौन है ? फिर बदनामी हमारे सिर क्यों ? हमें हर बार बदनाम किया जाता है कि इस बछर ने हमारा इतना नुकसान कराया। क्या किसी के नुकसान या अवैध कार्यों के लिए हम जिम्मेदार हैं ? समय को देखते हुए भगवान ने सीधे सीधे कहा – जो लोग तुम्हारे स्वागत की खुशी में नाच गा रहे हैं , वही तो दोषी हैं इन सब के लिए। यही लोग आतंकवादी बनकर तुम्हारे बच्चों के खून से तुम्हारे कपड़ों को रंगते हैं। यही लोग मओवादी बन तुम्हारे बच्चों का जीना मुहाल कर देते हैं। यही लोग तुम्हारी मां के हाथों की चूड़ियां उतरवाते हैं। यही लोग उनका गर्भाशय निकालते हैं , उनकी आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। यही लोग तुम्हारी बेटियों का बलात्कार कर शान बघारते हैं। यही लोग तुम्हारे फुटपाथी गरीब बेटों को कुचलने में माहिर हैं। यही लोग तोप , चारा , स्परेक्टम , कोयला .... क्या क्या नही खाते , और तुम्हारे पेट में लात जमाते हैं। तुम्हें बहुत अधिक दिनों तक ऐसे लोगों के बीच नही रहना पड़े , अधिक दुख न सहना पड़े , इसलिए ही तो मैंने तुम्हारी उमर केवल तीन सौ पैंसठ दिन रखा है। नये वर्ष को प्रश्न का जवाब मिल गया। पर डर नहीं गया।

फिर मेरे लिए क्या आज्ञा है प्रभु ? तुम जाओ , इनके बीच मजे से रहो। इनको सुधारने का प्रयास बेमानी है क्योंकि कुत्ते की पूंछ को पाइप लगाकर ही सही , सीधा कर पाने की गुंजाइश होती है , पर ये ऐसी पूंछ हैं जो पाइप को ही टेढ़ा करने की कूबत रखते हैं। डरो मत , बदनाम हो जाना ही तुम्हारी नियति है। करम दंड मान स्वीकार करो और अपना समय पूर्ण हो जाने का इंतजार करो। वह समझ गया। तभी , समय आ गया , पुराना अचानक गायब हो गया , वह झम्म से बाहर आ नाचने लगा।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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