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शैलेन्द्र सरस्वती की कहानी - बन जा सांप!

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बन जा सांप!

कहानी- शैलेन्द्र सरस्वती

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सदियों-सदियों पहले की बात है। हमारे देश भारत में एक सहस्रपाद नाम के ऋषिकुमार थे। सहस्रपाद में दूसरे ऋषिकुमारों की तरह उत्कृष्ट गुण तो थे लेकिन एक बहुत बड़ा अवगुण भी था। मौके-बे मौके वे अपने रिश्तेदारों,दोस्तों को हंसी-हंसी में चौंका व डरा दिया करते थे। अब आस-पास के लोग उनकी इस आदत से परिचित होने के कारण उनकी मजाकिया हरकतों पर गुस्सा नहीं होते थे..नजरअंदाज कर जाते थे।

सहस्रपाद के आश्रम के समीप ही उनके एक मित्र रहते थे-खगम। खगम एक कठोर तपस्वी तथा परम सत्यवादी युवक थे। अपने सद्चरित्र के कारण वे लोगों में काफी लोकप्रिय थे। खगम यूं तो बड़े साहसी स्वभाव के थे। अब जो सदैव सत्य बोलता हो,उसे भय हो तो किसका?...बस,खगम डरते थे तो मात्र सांपों से। सांप देखा नहीं कि उनकी घिघ्घी बंध जाती।

एक बार खगम हवन कर रहे थें। तभी सहस्रपाद वहां से गुजरे। उन्होंने खगम को हवन करते देखा तो मन में एक शरारत करने की सूझी। उन्होंने तुरंत पास के मैदान की सूखी घास काटी और उससे घास का एक सांप बना लिया। सहस्रपाद चुपके से खगम के पीछे गये और घास का बना सांप खगम के गले में डाल दिया। अचानक गले में घास के सांप के गिरने से खगम बेहद घबरा गये और बेहोश हो गये। खगम को बेहोश होता देख सहस्रपाद एक पात्र में जल ले कर आये और खगम की आंखों पर पानी छिड़क कर उसे होश में लाने का प्रयत्न करने लगे।

थोंड़ी देर बाद जब खगम को होश आया तो उन्होंने सहस्रपाद पर क्रोधित होते हुए उसे श्राप दिया-''मुझे घासपात से बने सांप से डराने वाले,जा तू विषरहित सांप की योनि में जन्म ले!''

इस श्राप को सुन सहस्रपाद की आंखों में आंसू आ गये। अब उन्हें अपनी गलती का पछतावा होने लगा। उन्होंने खगम के चरणों में गिर कर अपनी भूल की माफी मांगी। दयावान खगम मित्र को अपने चरणों में पा कर भावुक हो गये।

-''मित्र! मेरा श्राप अब व्यर्थ नहीं जा सकता। शायद यही ईश्वर की कामना है। फिर भी जब तुम भृगु वंश में जन्मे प्रमति के पुत्र रूरू से मिलोगे तो तुम्हें मेरे श्राप से तत्काल मुक्ति मिल जायेगी'',खगम ने सहस्रपाद से कहा।

खगम के श्राप के फलस्वरूप सहस्रपाद को डुंडुम जाति का सांप होना पड़ा। काफी समय बाद जब रूरू की पत्नी की जब सर्पदंश से मौत हो गयी तो पत्नी की मौत से पगलाये रूरू हाथ में एक मोटा डंडा लिय पृथ्वी के सभी सांपों को मारने घर से निकल पड़े।

एक दिन मार्ग में रूरू की भेंट सांप बने सहस्रपाद से हो गयी। जब रूरू ने अपना मोटा डंडा सहस्रपाद को मारने के लिये उठाया तो सहस्रपाद ने मनुष्य वाणी में उन्हें रोकते हुए कहा-''हे तात्! मुझ विषहीन प्राणी को आप अपने गुस्से का शमन करने के लिये मार रहे हैं,क्या यह पाप नहीं?....सर्प,विद्युत अथवा रोग आदि तो मात्र मृत्यु के कारण हैं। जन्म और मृत्यु ईश्वर की प्रेरणा से ही होते हैं। अतः आप अपने अज्ञान को दूर करें। असली धर्म निरिह प्राणियों को अभय देना अथवा अहिंसा करना है।''

सांप बने सहस्रपाद की बातें सुन रूरू का अज्ञान दूर हो गया। एक अज्ञानी को अपने प्रवचन से सत्पथ पर लाने के कारण सहस्रपाद को तुरंत सर्प की योनि से मुक्ति मिल गयी।

( प्रस्तुत रचना मौलिक,अप्रकाशित तथा अप्रसारित है एवं शिवपुराण की एक कथा पर आधारित है। )

 

शैलेन्द्र सरस्वती

नारायणी निवास

मोबाइल टॉवर के सामने

धरनीधर कॉलोनी

उस्ता बारी के बाहर

बीकानेर- 334005 (राज)

मो- 7877986321

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