शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

बी.के.गुप्ता’’हिन्द’’ की कविताएँ

सरस्वती - वंदना

हे माँ सरस्वती तू ,ज्ञान की दाता है।
जय माँ सरस्वती तू, ज्ञान की दाता है।।
अज्ञान के सागर में ,तू भाग्य विधाता है।
हे माँ सरस्वती तू, ज्ञान की दाता है।।

हम वंदे है तेरे, तेरी पूजा करते है।
अज्ञान मिटाने को आराधना करते है।।
हे माँ सरस्वती तू ,ही एक उजालो हैं।
हे माँ सरस्वती तू, ज्ञान की दाता है।।

तू श्वेतवर्णी है माँ ,तू कमलधारिणी है।
तेरे हाथ में वीणा, संसार तारणी है।।
हे माँ सरस्वती तू, वीणा वादिनी है।
हे माँ सरस्वती तू, ज्ञान की दाता है।।


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कविता - ’माँ’

करलो पूजा माँ की अपने माँ में चारो - धाम,
माँ के चरणो में मिलता है हर सुख का बरदान।
माँ की ममता का दुनिया करती है गुणगान,
माँ से बड़ा गुरू नहीं माँ है बड़ी महान।।

माँ की आँखों में ममता है माँ के दिल में प्यार,
कोई नहीं लिख सकता है माँ का सारा गुणगान।
माँ देती है बच्चे को जीवन का एक दान,
माँ के दूध में अमृत होता कहता है विज्ञान।।

सच्चा सुख मिलता है केवल माँ की गोदी में,
माँ ने बेटों का नाम रखा राम और रहमान।
माँ से बड़ा इस दुनिया में न कोई भगवान,
रहे सलामत इस दुनिया में हर माँ की मुस्कान।।

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गजल - ’’नजर’’

करके प्यार दिल में छिपाते हो किसलिए।
नजरों से नजर हमसे चुराते हो किसलिए।।

प्यार करने वालों का अंदाज अलग है,
कातिल अदा से बिजली गिराते हो किसलिए।

कट रही तेरे बिन ये तन्हा जिन्दगी,
सपनों में आ के नींदें चुराते हो किसलिए।

अंखियाँ तरस गयीं तेरे दीदार को,
इस चाँद से चेहरे को छिपाते हो किसलिए।

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कविता -  ‘‘बसंत’’

बसंत आगमन पर ,
धरती दुल्हन सी सज रही है।
चारों तरफ हरियाली,
पीली सरसों लुभा रही है।।

फूलों की महक से,
हवायें महक रही हैं।
जैसे किसी से मिलकर,
मदहोशी छा रही है।।

खेतों पर झूम फसलें ,
यूँ लह - लहा रही हैं।
बसंत आगमन पर,
दीवानगी दिखा रही हैं।।

जवान हुई कलियाँ ,
भौरों को लुभा रही हैं।
चिड़ियाँ भी अपनी धुन में,
गीत गुन - गुना रही हैं।।

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गीत - ’’आदमी’’

देख आज कितना बदल गया आदमी।
आदमी को आज खा रहा है आदमी।।

अपने बहन बेटियों से करते हैं गुनाह,
हवस मे इस कदर पागल है आदमी।
बिक रहा है जिस्म और बिक रहा है जाम,
पैसों के लिए आज बिक रहा है आदमी।।

गुप्तनीति बेंच दी दुश्मनों को आज,
सैनिक भर्ती हो गए हैं ऐसे आदमी।
रो रहा है आसमां ,रो रही जमीं,
माँ भारती की आँखों में दिखने लगी नमी।।

अपनी संगिनी को छोड़ बीयर - वार में,
पैसो में जा के प्रीत ढूंढता है आदमी।
खरीदते और बेचते हैं मौत का सामान,
गुनाहों में इस कदर शामिल है आदमी।।

 

गीत - ’’दुनिया का मेला’’

ये दुनिया का मेला है, यहाँ हंसना है रोना है।
कभी खुशियों को मिलना है, कभी गम का रूलाना है।।

यहीं जीना ,यहीं मरना ,यहीं सब छोड़ जाना है।
किसी को याद करना है ,किसी को याद आना है।।

मुझे एक गीत लिखना है, जहाँ की पीर लिखना है।
हमें जुल्मों से लड़ना है, मिलकर साथ चलना है।।

हमें नफरत मिटाना है ,प्यार का दीप जलाना है।
हमें भी प्यार करना है, तुम्हें भी प्यार करना है।।
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कवि नाम - बी.के.गुप्ता’’हिन्द’’

पूरा नाम - बृज किशोर गुप्ता

पिता का नाम - श्री लक्ष्मी प्रसाद गुप्ता

पत्नी का नाम - श्रीमती सीमा गुप्ता

वर्तमान पता - बी.के.गुप्ता

कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स बड़ामलहरा जिला - छतरपुर म.प्र.

पिन - 471311

स्थाई पता - बी.के.गुप्ता

ग्राम़$पोस्ट - चन्दौरा तहसील - अजयग<

़जिला - पन्ना(म.प्र.) पिन - 488220

मोब. - 9755933943

- मेल - bkgupta193@gmail.com

जन्मस्थान - ग्राम़-पोस्ट - चन्दौरा तहसील - अजयगढ़

जिला - पन्ना(म.प्र.)

जन्मतिथि - 1जुलाई सन्1982

शिक्षा - बी.ए.(समाज शास्त्र) एवं कम्प्यूटर पी.जी.डी.सी.ए.

व्यवसाय - कम्प्यूटर शिक्षक

कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स बड़ामलहरा,जिला - छतरपुर म.प्र.

लेखन विधा - कविता,गजल,गीत,मुक्तक,निबंध।

प्रकाशित रचनाएँ - www.kavyasagar.com पर एवं

www.rachanakar.org पर।

सम्मान - www.kavyasagar.com द्वारा अयोजित ‘‘प्रतियोगिता कविता’’ ‘‘बेटी’’ मे उत्कृष्ट रचना प्रमाण - पत्र 26 - 11 - 2015 को आनलाइन जारी।

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