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हिंदी के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों की चुनिंदा हास्य-व्यंग्य कविताएँ


दलबदलूजी
-
डा० बरसानेलाल चतुर्वेदी
सखि मेरो बालम पलटत रंग ।
श्वेत वसन सब पीरे है गये मैं तो रहि गई दंग ।
छोडिके पहिले साथी डोलत, नये यारन के संग ।
जिन लोगन ते. मीठे बोलत, ठानत हैं अब जंग ।
नये साथिन को चाय पिलावत, आ गई मैं तो तंग ।
जिन मुख देखत दुःख उपजत है, विने लगावत अंग ।
नित्य नवीन कला खेलत है नाचन लागे नंग ।
गिरगिट अब शरमावत डोलत, कुऔं परी हैं भंग ।
 
दुराग्रह
मधप पाण्डेय
कितनी ही लड़कियों के
चप्पलों के तलुओं में
उनके चेहरे के
साइड पोज
उतर पड़े हैं
फिर भी
मजनुओं की क्यू में
वे सबसे आगे खड़े हैं ।
 
अध्यापक
सुरेश उपाध्याय

हमारे पास कुछ नहीं है
क्योंकि हम शिक्षक हैं
पीढ़ी-निर्माता हैं
पीढ़ियां बनाते हैं
उनके पास सब कुछ है
क्योंकि वे बीड़ी-निर्माता हैं
बीड़ियाँ बनाते हैं ।
 
आचार्य वचनेश
( 1875-1959)
एक रुपैया की रोजनदारी,
सदा दस पहर की जी - हुजूरी ।
मूंढ़ खपावत बालक मैं यहाँ,
रोटिउ दारि परै नहिं पूरी ।
ढोवत ईंट जो लाला धरे वहीं,
द्वै रुपया में सहे न कसूरी ।.
टीचरी लीचरी में कहा धरा,
कुरसी तज कन्त करो मजदूरी ।
 
अफसर
जगदीशचन्द्र 'जीत'
एक अफसर ने थिंकर बनने को बढ़ाई दाढ़ी
लगता था मानो कहीं रुक गई थी गाड़ी
चलाने को विधिवत्
हुए वे अनुगत
भला कहीं गीदड़ भी बनते शेर, कैसे थे अनाडी ।
एक अफसर टूर पर गये थे कुल्लू
. साथ में ले गये अपना एक उल्लू
सर, 'इसे क्यों यहाँ लाये?'
पूछा दरबान ने मुंह बनाये
ये बोले, 'बीमार था मेरा बेटा गुल्लू ।'
 
बरसानेलाल चतुर्वेदी
(जन्म-1 921)
अफसरों को खिलाते अचार गट्ठा
उनकी मेहरबानी से खोल लिया भट्ठा
इस हाथ दिया
उस हाथ लिया
मालिक मेहरबान तो पहलवान पट्‌ठा ।
 
वासुदेव गोस्वामी
(जन्म-- 914)
चाय जिमि भंग पर, ताल मृदंग पर,
पाउडर अंग पर अमित उदंड है ।
कैंची जिमि केश पर, फैशन ज्यों वेश पर,
भूषण ज्यों देश पर, बीड़ी बरबंड है ।
ऐनक ज्यों कान पर, ग्राहक दुकान पर,
भक्त भगवान पर रहत उमंड है ।
सैण्ट जिमि आइल पै, टैण्ट जिमि टाइल पर,
साहब त्यों फाइल पर राजत अखंड है ।
 
मदन वात्स्यायन
(जन्म-। 922)
अरे मेरे अफसर
ब्रह्मा का लिखा मिट सकता है
कल का अछूत आज मंत्री हो सकता है
पर तुम्हारी लाइन का भार लिए मैं
कहाँ जाऊँ, कहां भागूं
काश्मीर से कन्याकुमारी तक के
किस दफ्तर में जा छिपूँ
तुम सरकारी अफसर हो
तुम्हारा काटा पानी नहीं मांगता
कानून की दरार में से गोली चलाई
और मुझे चुपचाप सुला दिया ।
अपने फाइलों के जंगल में ले जाकर
तुमने मुझे कत्ल कर दिया ।
मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?.
पर यह कुछ इतना बड़ा अपराध है कि
मैं भारतीय तो हूँ
पर तुम्हारे प्रान्त का नहीं हूँ ।
 
आजादी
रामधारीसिंह 'दिनकर'

(19०8-1974)
ऊपर-ऊपर सब स्वांग, कहीं कुछ नहीं सार,
केवल भाषण की लड़ी, तिरंगे का तोरण ।
कुछ से कुछ होने को तो आजादी न मिली,
वह मिली गुलामी की ही नकल बढ़ाने को ।
आजादी खादी के कुरते की एक बटन
आजादी टोपी एक नुकीली तनी हुई ।
फैशनवालों के लिए नया फैशन निकला,
मोटर में बांधी तीन रंगवाला चिथड़ा ।
 
इन्तजार
डा ० बरसानेलाल चतुर्वेदी
दरस बिन दूखन लागे नैन ।
विजिटिंग कार्ड सुबह को भेजो, होने लगी अब रैन ।
मंत्रीजी मीटिंग में बैठे हमें न आवत चैन ।
चपरासी को खुश करिबे को रुपया परै है दैन ।
कोऊ कहते हैं 'लंच' लेन गये, संग ले गये हैन' ।
याद आत है चुनाव दिनन के मीठे-मीठे बैन ।
 
इंतजाम
-कृष्णकुमार शर्मा
दौरे पर
जब वे निकले तो
हेलिकाप्टर में
अपने साथ
फूलों का एक टोकरा भी धर लिया
.पूछने पर बोले-,,
सूखाग्रस्त इलाका है
क्या पता फूल होंगे या नहीं
अत:
अपने स्वागत का इंतजाम
-यहीं से कर लिया ।
 
कजिन
त्रिलोकशिरण 'डंठल'
(जन्म- 1926)
इक रोज मैंने पूछा मिस्टर मदनमुरारी,
कल संग थी तुम्हारे. वह कौन थी तुम्हारी ।
पहले तो जरा चौंके, लेकिन संभल के बोले,
जो संग थी हमारे, वह थी कजिन हमारी ।
क्यों झूठ बोलते हो-- मैंने कहा मुरारी,
क्यों धूल झोंकते हों-तुम आँख में हमारी ।
बतला रहे हो जिसको, अपनी कझिन मुरारी,
बरसों वही रही है मेरी कजिन मुरारी ।
 
कालिज के लड़के
ओम्प्रकाश आदित्य
नेता का चरित्र अभिनेताओं के चित्र देख,
विद्यार्थियों के रथ के तुरंग भड़के ।
एम० ए०, बी० एल० करके जो घर में पड़े हुए हैं,
सोचते हैं हमने क्या कर लिया है पढ़के ।
अनपढ़ थे वे राजनीति में सफल हुए,
बुद्धू बुद्धिमान हुए कुर्सी पे चढ़के ।
इल्म की किताबें लिए प्रोफेसर रो रहे हैं,
फिल्म देखने गए हैं कालिज के लड़के ।
 
काला चश्मा
डा० बरसानेलाल चतुर्वेदी
कारें रंग वारो प्यारी चस्मा हटाई नैकि,
देखों तेरे नैन, नैन अपने मिलाइकै ।
तेरे नैन देखिबे की भौत अभिलाष मोंहि,
. सुनिलै अरज मेरी नेकि चित लाईके ।
कमल-से कि मीन-से कि खंजन-से नैन तेरे,
एक है कि दोनों नैकि देखों निहारके ।
भैम भयो रानी कहूँ नाँहि ऐंचातानी तू,
मोकों दिखाइ नैकि चश्मा हटाइकै ।
 
चन्दा
मैथिलीशरण गुप्त
(19 । 7-1964)
चंदे बिना उनका घड़ी-भर काम कुछ चलता नहीं
पर शोक है! तो भी यहाँ समुचित सुफल मिलता नहीं ।
हैं वीर ऐसे भी बहुत जो देश हित के व्याज से-
अपने लिए हैं प्राप्त करते दान-मान समाज से ।
 
हृषीकेश चतुर्वेदी
( 19०7 - 197०)
प्रकृति ने चंदा 'गोल' करिके दिखायो एक,
तुमने अनेक 'चंदा' रात दिन 'गोल' करे ।
बनि स्वयंसेवक स्वयं की ही करत हो सेवा,
हो तुम दयानिधान, सबहि गुनन भरे ।
''हरे रामा! हरे-रामा न त्यागी तुम्हें लागी धुन,
हरे-नामा हरे-नाम । नामा-नामा हरे-हरे ।



दरदर्शन
'पटाखा'
(जन्म- 1943)
दूल्हे की डिमांड थी :
दहेज में
चाहिए दूरदर्शन
बस तभी से
दुल्हन दे रही है
दूर से दर्शन ।n
 
नामकरण
जैमिनी हरियाणवी

''शिशु के नामकरण सै'
बोले पंडित बदलूदास
कुम्भ राशि में स' पे शिशु का
नाम निकले सै सूर्यप्रकाश ।
पिता शिशु का बोल्या,
पंडितजी अक्ल दौड़ाओ
सूर्यप्रकाश ने छोड़ो
कोई 'माडर्न' नाम बताओ''
पंडित जी कहने लगे :
तो ऐसा कर दो
सूर्यप्रकाश के बदले
'सनलाइट' धर दो । ''
 
नाक
बेधड़क बनारसी

इस प्रतिष्ठा की अनोखी धाक है
ये नहीं तो जिन्दगी फुटपाथ है
कोई पीछे से न इसको काट ले,
इसलिए आँखों से नीचे नाक है

मिश्रीलाल जायसवाल

मास्टर जी ने कक्षा में
एक नेता के लड़के को मारा
नेता ने आकर मास्टर जी को फटकारा
मास्टर जी बोले----मैं आपके लड़के को
अच्छी बातें सिखा रहा था
उसे आदमी बना रहा था''
नेताजी ने कहा--
''मेरा लड़का मेरी तरह नेता बनेगा
वह आदमी बनकर क्या करेगा? ''
 
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
( 1०० 3-- 1954)
नाम के काम बड़ी-बड़ी बातें, बड़े कपटी उन्नत चेता
चौंकत पातन के लटके पग फूँकि धरे पे बने जग नेता
है धँसे जात धरातल माँहि कहावत लोक में ऊरध रेता
जोरत प्रीति अनीति न छोरतनीति न जानत नाम है नेता
 
अकवर इलाहाबादी
( 1846-1
कौम के गम में, डिनर खाते हैं हुक्कामों के साथ,
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ ।
 
अहमद फफँदवी
( 1६९) 5-। ९५७
बिला वजह सौदा नहीं लीडरी का
कि अब कुछ कमाने को जी चाहता है
कौम के लीडर हकीकत में हैं सब बहुरूपिया
रोने वाले सैकड़ों हैं औंख कोई नम नहीं ।
 
चन्द्रमोहन 'हिमकर'
(जन्म- 1923)
मैं अवसरवादी नेता हूं तुम क्या जानो तिकड़म मेरी
मैं कम्यूनिस्ट का कामरेड और सोशलिस्ट का साथी हूँ
मैं महासभा का महारथी और कांग्रेस का हाथी हूँ
पूंजीपतियों का इष्ट मित्र, तिकड़म की बजती रणभेरी
तुम क्या जानो तिकड़म मेरी
 
नागार्जुन
आये दिन बहार के
श्वेत श्याम रतनार
अँखिया निहार के
दिल्ली से लौटे हैं
कल टिक्टमारके
खिले हैं दाँत ज्यों
दाने अनार के
आये दिन बहार के
 
कबीरदास
( 1399-1495)
मूँड़ मुँड़ाये ही- मिले, सब कोई लेय मुंडाय ।
बार-बार के मूँड़ते, भेड़ न बैकुंठ जाय ।।
पाहन पूजे हरि मिलें, तो में पूंजू पहार ।
ताते ये चाकी भली, नीस खाय संसार ।।
काँकर पाथर जोरि के, मसजिद लई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ।।
 
पालतू लोग
माणिक वर्मा
वैसे ही हम तो रात के पाले हुए हैं लोग
सूरज मिला तो और भी काले हुए हैं लोग ।
उनकी सफाई का भी तरीका बताइए
गंगा का नाम लेके जो नाले हुए है लोग ।
सदियों से झाड़ू फेरने वाला नहीं मिला
खँडहर हुए मकान के जाले हुए हैं लोग ।
चोरों का नाम सुनते ही जो टूटने लगें
ऐसे हमारे देश के ताले हुए हैं लोग ।
 
पुलिस
मधुप पाण्डेय
आजकल पुलिस वाले/डाकुओं को पकड़ने के लिए
जासूसी कुत्ते काम में क्यों नहीं लाते हैं?
हाँ, नहीं लाते हैं, ये हरामी सूँघते-सूंघते
सीधे थाने में ही घुसे चले आते हैं ।
थानेदार बुरी तरह झल्लाया/झल्लाकर गुर्राया
और बोला-''क्या तुम्हारे पास दिमाग है.....
हनुमान जी बोले-/हां, दिमाग तो है
थानेदार बोला-/अरे, दिमाग है, दिमाग नहीं होता
तो मैं जरूर तुम्हारे, कुछ काम आता
कम से कम पुलिस विभाग में /नौकरी दिलाता ।
 
प्रौढ़ शिक्षा
श्री घनश्याम अग्रवाल
सरकार बच्चों की शिक्षा के प्रति लापरवाह है
विरोधियों की इस बात को शिक्षामंत्री ने स्वीकारा
बदले में, यह तर्क मारा कि, आप यह नहीं जानते
- कि हमारी नीति में एक छुपा तत्व है.
 
कुंजबिहारी पाण्डेय
कभी दबाया पूंजीपति को और कभी मजदूर दबाये ।
इस प्रकार दोनों के बीच पड़ा हूँ अपनी टाँग अडाये । ।
वह शोषक है और नहीं मैं पोषक उनका किसे बताऊँ ।
करता रहता शक्ति सन्तुलन शोषक शोषित में रस पाऊँ । ।
 
महँगाई
शैल चतुर्वेदी
हाय ये दाम है, ये रेट है, महँगाई है,
खर्च हाथी सा है, खरगोशों सी कमाई है ।
घर में वैसे ही नहीं टोटा मेरे बच्चों का
तिस पे मेहमां मेरी जोरू. का बड़ा भाई है ।
साला अपना है कोई गैर नहीं मान लिया
संग में उसके लुगाई भी चली आई है
अपनी औलाद का ऐ 'शैल' क्या रोना रोएँ
बड़ा दामाद ही बरसों से घरजमाई है ।

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