शनिवार, 26 दिसंबर 2015

हरीश कुमार की ताज़ा कविताएँ

1
अब वो लोग वहां नहीं रहते
जो थे वजह कहीं रहने की
इमारतें अब भी वैसी है
बस अहसास खो गए हैं
गलियों के मोड़ भी ऊंघते हुए
कदमों के निशां मिट गए हैं
अब लोग दिल नहीं चुराते
न अहसास महकाते हैं
खूब रौशनी फैल गयी है
बस हमसाये खो गए हैं
कुछ गीत है पुराने से
और कुछ जज्बात पुराने
शहर की याद है कुछ कुछ
आंखों का पानी हो गए हैं ।
 
2
रंग बदलना और यशोगान करना तो
कोई चैनल संवाद दाताओं से सीखें
गिरगिट रोज सुबह उठकर
इन्हें सबसे पहले
प्रणाम करते होंगे

3
आदरणीय क ख ग नमस्कार
आपकी भेजी हुई रचना प्रकाशित नहीं हो पा रही
कृपया अन्यथा न ले ;
'अन्यथा' शब्द नश्तर का ही लिप्यांतरण है
बस उसकी आवाज का अनुभव शायद
ईश्वर की लाठी जैसा वज्रपात हो
जाने इस वज्रपात में कोई सम्भावना निकले

4
इच्छाएं रंगीन पक्षियों जैसी होती हैं
हौसले के पंख फड़फड़ाये नहीं कि
सारी संवेदनाएं लालायित हो उठती हैं
पूर्णतः बेखबर हर बहेलिये से
कुदरत का यही नियम है
आकर्षण वास्तविक भरम है ।

5
फैले पंखों जैसी उदारता
शांत मन और अभिनय
केवल सहृदयों की बपौती नहीं
बगुले भगतों की भी आदि कथाएं है
उनकी अपनी शाश्वतता है
हरपल पैनी और लुभाती आकृतियाँ लिए
प्रतिबिम्बों के साथ चारों ओर
झपटने को तत्पर
तुम्हारी संवेदनाएं उनका प्रिय खाद्य है
और आसान लक्ष्य भी ।

6
अक्सर सर्दी की धूप में बैठे बैठे
पुराने दोस्तों के चेहरे याद आते हैं
न कोई पता न मुकाम कोई मालूम उनका
काश नेटवर्क की इस दुनिया में
बीते एहसास और लम्हे भी ढूंढ पाता
रोज जीने मरने में कितना मजा आता
यूँ तो चेहरों से अक्सर मुलाकात है रोज
कभी तन्हाई में फिर मुस्कुराता गुनगुनाता
पुराने खत मुड़े कोनों वाले दोबारा पढ़ता
कुछ तस्वीरों में छुपी हंसी सुन पाता
अक्सर सर्दी की धूप में बैठे बैठे........।

7
आराम गाह की तलब में
मिल गयी थी ईंट गाह
क्या कहे तब क्या कहा
जब देखी मजलिस बेवफा
 
8
आँगन में धूप क्या चढ़ आई है
जैसे कोई याद लौट आई है
सर्दी के खुशनुमा खाबों की
एक मासूम सी महक आई है
कई रंग थे फैले मुस्कुराहट के
चुपचाप से अहसास लहराए थे
यादों में फूल अब भी ताज़ा है
साथ अपनी सी कोई परछाई है।

9
खाली होना भी शायद
भर जाने की चरम सीमा है
गहन शोर और ध्वनि के पश्चात्
विचारहीन मौन का आगमन
आलोचक इसे दिवालिया पन कह सकते हैं
या फिर ध्यान जैसा कोई कठिन शब्द
शायद खाली कुछ भी नहीं
सब भरे होने की ही अवस्थाएं है
न गिलास आधा खाली था न आधा भरा
खालीपन में भी बहुत कुछ तैरता है
अकर्म भी जैसे एक कर्म है
नींद के मौन में भी स्वप्न हैं
काम काजी और बेकार दोनों ही
आदमी की परिधि में आते है
आप यकीन मानिये ये सब
एक खाली दिमाग में भरे मौन की
परतों में दबी भरी आवाजें हैं

10
यह कोई नयी बात नहीं है
जो कबीर होने का दम भरते है
उनकी झोपड़ी सदा से ही गल कटियन के पास रहेगी
कबीर होने का मतलब ज्यादा बोलना नहीं
बस थोथे को उड़ाना भर है। 

   --
हरीश कुमार
बरनाला (पंजाब )

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