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सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - दबावमुक्त परीक्षा की तैयारी से मिलेगी सफलता

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परीक्षा की तैयारी के लिए विशेष∙∙∙

परीक्षा की तैयारी कैसे करें?

दबावमुक्त परीक्षा की तैयारी से मिलेगी सफलता

0 एक दूसरे को पछाड़ने की भावना का होना जरूर

पर्वों की बिदाई और शीतकालीन छुट्टियों के खत्म होते ही बच्चों के माथें की लकीरें स्पष्ट उभरकर दिखाई पड़ती है। जैसे की नवंबर-दिसंबर के महीनों में बोर्ड परीक्षाओं की समय सारिणी जारी होती है, बच्चों की धड़कनें भी उसी के साथ तेज होने लगती है। यह वह अवसर होता है जब बच्चे अपनी वर्ष भर की कहानी का अच्छा परिणाम प्राप्त करना चाहते है। औसत और कमजोर माने जाने वाले बच्चेे इन दिनों काफी दिक्कत की स्थिति में होते है। कक्षा में प्रथम, द्वितीय या ऐसे ही अग्रिम पंक्तियों में खड़े विद्यार्थी भी आराम तलब की मुद्रा को त्याग दिये होते है। भीड़ में अन्य लोगों से आगे निकलने की भावना गलत नहीं कही जा सकती है, किंतु ऐसे करते हुए स्वयं दबाव में आ जाना खतरनाक हो सकता है। परीक्षा के पास आते ही विभिन्न विषयों की तैयारी योजनापूर्ण ढंग से करना जरूरी समझा जाना चाहिए। विज्ञान संकाय के विद्यार्थी जहां भौतिक शास्त्र और रसायन को कठिन विषय की श्रेणी में रखते है, वहीं वाणिज्य संकाय के विद्यार्थी एकाऊंटेंशी को चुनौती के रूप में लेते हुए देखे जा सकते है। इन विषयों की तैयारी के लिए शांत वातावरण के रूप में सुबह का समय चुना जाना चाहिए। इतना अवश्य ध्यान रखें कि कोई भी विषय हल्के में न लिया जाए, बल्कि रूचि के अनुसार समय का आबंटन किया जाए।

बेहतर तालमेल के साथ करें तैयारी

प्रायः देखा गया है कि बच्चे परीक्षा जैसे शब्द से ही घबरा उठते है, यह उचित नहीं है। माता-पिता एवं बड़े भाई बहनों की सहायता से इसे दूर किया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर वातावरण प्रदान करें। उनकी दिनचर्या में शामिल गतिविधियों को बेहतर तालमेल के साथ एन्’वायमेंट से जोड़ते हुए परीक्षा का भय समाप्त करें। खान-पान, खेलकूद और मनोरंजन के साधनों का उपयोग अलग-अलग समयों के आधार पर निर्धारित करते हुए बच्चे का मनोबल बढ़ाना हर पालक का कर्तव्य होना चाहिए। मसलन सुबह की शुद्ध हवा और शांत वातावरण पढ़ाई के लिए सुनिश्चित कर माता-पिता को बच्चे के साथ स्वयं अपना कुछ काम लेकर बैठने की शुरूआत करनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह काम उतना आसान नहीं है, किंतु ऐसा भी नहीं कि इसे किया ही न जा सके। प्रायः माता-पिता यह चाहते है कि बच्चा अपना स्टडी रूम में पढ़ाई करें और माता-पिता बड़े आराम से टीवी पर अपना मनपसंद कार्यक्रम देखते रहे। यह एक गलत विचारधारा है। होना यह चाहिए कि जब बच्चा अपनी पढ़ाई पर व्यस्त हो तब अन्य पारिवारिक सदस्य भी ऐसे ही किसी काम में अपनी व्यस्तता बनायें रखे। मस्तिष्क को आराम देने के लिए खेलों और पढ़ाई के समय के बीच अंतराल का होना नितांत ही आवश्यक है और इसका निर्धारण बच्चे की रूचि के अनुसार पालकों को करना चाहिए।

अंकों के साथ लक्ष्य का दबाव न डालें

बीते कुछ वर्षों में विषयों का पाठ्यक्रम, पढ़ाई का स्तर, परीक्षा पद्धति तथा मूल्यांकन के तरीकों में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। बावजूद इसके माता-पिता द्वारा बच्चे के स्तर का आंकलन उसी पुराने ढर्रें पर चल रहा है। पड़ोसी का बच्चा कक्षा में प्रथम स्थान पर आता है, तो तुम क्यों नहीं आ सकते? या देखो वह तो अभी पढ़ाई कर रहा है और तुम टीवी देखना चाहते हो! इस प्रकार के तुलना किसी भी रूप में उचित नहीं कही जा सकती है। हर माता-पिता की उम्मीद होती है कि उसके बच्चे अच्छे अंक प्राप्त करें। साथ ही बचपन से ही उस पर लक्ष्य का पिटारा लाद दिया जाता है। अधिकांश परिस्थितियों में लक्ष्य का दबाव बच्चे के स्वाभाविक विकास में बाधक बनकर सामने आता है। प्रायः पालकों द्वारा अपने बच्चों को परीक्षा में प्रतिशत की बाध्यता से भी बांध दिया जाता है। उन्हें कहा जाता है कि तुम्हेें फला प्रतिशत अंक प्राप्त करने है। इसका परिणाम बच्चे के दिमाग पर पड़ने वाले तनाव के रूप में सामने आता है। लक्ष्य के अनुसार अंक प्राप्त न होने पर बच्चा हतोत्साहित होने लगता है। यही वह स्थिति है कि एक अच्छे एवं सुलझे हुए बच्चे को भी अवसाद (डिप्रेशन) की स्थिति में ला खड़ा करती है। एक औसत दर्जे के बच्चे से 80 से 90 प्रतिशत अंक की उम्मीद करते हुए उस पर दबाव डालना उसकी दिमागी हालत को विचलित करने से कम नहीं कही जा सकती। एक बच्चे की कक्षा 10वीं तक की पढ़ाई का स्तर उसकी रूचि का आंकलन करने में उपयोगी हो सकती है। कक्षा 6वीं से 10वीं तक 5 वर्षों में उसकी अंकसूची का गंभीरता पूर्वक अध्ययन आगे की शिक्षा का आधार तय कर सकता है। विज्ञान या गणित में औसत अंकों के साथ सामाजिक विज्ञान अथवा हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी में अ‘छे अंक पाने वाले छात्र की रूचि पालक गणित और विज्ञान में बनाने की उम्मीद रखते है, जो आगे चलकर घातक परिणाम ही देती है।

बच्चों के मार्गदर्शन की जरूरत समझें

विद्यार्थी जीवन में सबसे कठिन समय परीक्षा का दौर ही होता है। यह वह वक्त होता है जब वर्ष भर की पढ़ाई को कसौटी पर तौला जाता है। बच्चे अपनी पढ़ाई के संबंध में चिंतित दिखाई पड़ते है, किंतु मार्गदर्शन के अभाव में वे लक्ष्य से भटक जाते है। उनके दिमाग में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्न कुछ इस तरह के होते हैः-पढ़ाई कैसे करें? किस वक्त पढ़ाई करे? पढ़ाई के बीच में कितना और कैसे अंतराल (ब्रेक) रखे? ध्यान के लिए किस विधि का उपयोग करे? इन सारी उलझनों का समाधान माता-पिता तथा अन्य पारिवारिक सदस्य मार्गदर्शन की भूमिका निभाकर कर सकते है। बच्चों की उलझनों को उन्हीं पर छोड़ देना पालक की सबसे बड़ी लापरवाही मानी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बच्चे का ध्यान एक स्थान से दूसरे स्थान और एक सोच से दूसरी सोच की ओर भटकता रहता है। बच्चों के मन की उड़ान को थामना और उसे सही दिशा देना भी पालकों की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है। बच्चे की पढ़ाई के समय और उसकी पढ़ाई के बाद उसे किस प्रकार से चिंता मुक्त रखें, यह भी माता-पिता को समझना होगा। अपने बच्चों के पढ़ाई का स्थान, टेबल कुर्सी, प्रकाश की व्यवस्था और सुरम्य वातावरण का निर्माण भी एक कुशल प्रबंधक के रूप में माता-पिता ही बेहतर कर सकते है। आजकल बच्चों का मन सेलफोन में ज्यादा उलझा होता है। इसे सुलझाने के लिए सेलफोन से दूरी के अलावा यह देखना होगा कि ऐसा कौन सा वक्त है जब बच्चा पढ़ाई से दूर रहना चाहता है। उस समय उसे कुछ देर के लिए सेलफोन से दोस्ती का अवसर दिया जाना चाहिए। गीत संगीत का साथ भी दिमागी थकावट को दूर करने का अच्छा साधन है। अतः इसके लिए भी एक अ‘छा वातावरण तैयार किया जाना चाहिए।

मुख्य विषयों की तैयारी में हो अधिक ध्यान

बोर्ड परीक्षा की तैयारी विशेष रूप से कक्षा 12वीं के विद्यार्थियों को इस प्रकार करनी चाहिए कि मुख्य विषयों की कठिनाई आसानी से दूर हो सके। गणित और बॉयो संकाय के विद्यार्थी इस मामले में भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, जीव-विज्ञान तथा गणित जैसे विषयों की तैयारी में अधिक ध्यान दें, तो सफलता का मार्ग तय किया जा सकता है। इसी तरह वाणि’य संकाय में अध्ययनरत छात्र एकाऊंटेंसी को हव्वा न माने और दिये गये प्रश्नों को बार-बार हल कर भय के दायरे से बाहर निकले। भौतिक और रसायन शास्त्र के सूत्रों पर आधारित प्रश्नों को कंठस्थ कर कई बार लिखे। इस प्रकार का अभ्यास उत्तर लिखने की तारतम्यता को मजबूती देगा और याद करके लिखा गया उत्तर का अंश छूटने का भय भी समाप्त हो जाएगा। प्रायः देखा गया है कि भौतिक शास्त्र और गणित के प्रश्न पत्रों में कम अंक आने से विद्यार्थी अच्छी श्रेणी पाने से वंचित रह जाता है। वाणिज्य संकाय के विद्यार्थी जहां एकाऊंटेंसी से भय खाते है, वहीं यह भी देखा गया है कि अर्थशास्त्र के प्रश्नों का उत्तर सही ढँग से न लिख पाने के कारण पिछड़ जाते है। अर्थशास्त्र में उत्तरों का स्पष्टीकरण ग्राफ चित्रों द्वारा किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण 3 घंटे की परीक्षा में यह होता है कि सभी प्रश्नों के 2∙50 घंटे में दिये जा सके, और शेष 10 मिनट में उत्तर कापी का अवलोकन बारीकी से किया जाए। विद्यार्थियों को अपने विषय से संबंधित किसी भी प्रकार की कठिनाई को बिना झिझक के अपने शिक्षकों अथवा पालकों से हल कराने पीछे नहीं हटना चाहिए।

(डॉ∙ सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो∙ नंबर 94255-59291

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