शनिवार, 5 दिसंबर 2015

लक्ष्मीकांत वैष्णव की कविताएँ

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क्या है ?
बोल मां मैं कौन हूं ,
और सही मेरा नाम क्या है ?
है कहां से जन्म मेरा ,
इस जगत में काम क्या है ?
स्त्रोत क्या मेरे विचार का ,
हमारी चेतना का ,
प्रेम का और विश्व में ,
फैली हुई इस वेदना का ?
बोल उद्गम कौन है ,
प्रकाश के उस पुंज का ,
जिसकी आभा से खिल उठता ,
कमल मेरे कुंज का ,
मां बता मुझको कि ,
मेरा धर्म क्या है ?
क्या मेरा कर्तव्य और ,
कहते जिसे सत्कर्म क्या है ?
दे दिखा अब किरण अपनी ज्योत्सना की ,
दे बता मुझको मरण का भेद क्या है ?

आ के कानों में मेरे चुपके बता ,
उपनिषद क्या है वेद क्या है ?
संत कहते हैं कि हम ,
सोये हैं गहरी नींद में ,
जग नहीं पाते हैं हम ,
इसमें तुम्हारा राज क्या है ?
क्यों नहीं होता कि मानव ,
दूसरों के हित जिये ,
जागरण और स्वप्न के बीच ,
बज रहा यह साज क्या है ?
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गजल
जग की नजरों में जो इक इंसान है ,
मेरी नजरों में वही भगवान है ।
सब के दिल में प्यार हो सब के लिए ,
मेरे मजहब का यही फरमान है ।
काम आए आदमी का आदमी ,
आदमी का बस यही ईमान है ।
इश्क के गम से जो दिल परिचित नहीं ,
इल्म - ए - रूहानी से भी अंजान है ।
मौत की मंजिल तलक है मुश्किलें ,
उसके आगे सारा रास्ता आसान है ।
इश्क – ए - मुर्शिद में रहूं बेसुध सदा ,
मेरे दिल में इक यही अरमान है ।
होश में बेहोशी , बेहोशी में होश ,
सूफियों की भी क्या निराली शान है ।

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मेरे प्यारे नाविक

मेरे प्यारे नाविक
सागर विशाल है , तरंगें उत्ताल है ,
तूफान विकराल है और
भयावह काल है ।
और नाविक !
वायु का बहना , सागर की गर्जना ,
मगरमच्छ का विचरना , व्हेल का सरकना ।
और मार्ग का पता नहीं ,
सागर की थाह नहीं  , पतवार साथ नहीं ,
आशा का नाम नहीं ।
तुम निडर , बेखबर ,
धीर और गम्भीर ,
जैसे कुछ है ही नहीं ।
सब से निर्लिप्त ,
स्वयं में लिप्त ,
तुम्हारे नेत्रों में रहस्य
और मुख पर हास्य ।
प्यारे नाविक !
तुम बढ़े चले जा रहे हो ,
मझधार में , विपत्तियों को चीरते ,
लहरों को काटते ,विचारों में दृढ़ ,
अपने पथ पर , अपने लक्ष्य पर ,
धन्य नाविक ,
प्यारे नाविक ।
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लक्ष्मीकांत वैष्णव , रायपुर ( छ. ग.)

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