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आनन्द किरण (करण सिंह) शिवतलाव के आलेख

भारतवर्ष में हिन्दुत्व

आज मैं हिन्दूत्व के संदर्भ में चर्चा करूँगा। हिन्दू शब्द ईरानियों के अशुद्ध उच्चारण का परिणाम है। इसके अनुसार हिन्दू शब्द का अर्थ सिन्धु अफवाह क्षैत्र के निवासी से है। आधुनिक युग में हिन्दू में सनातन, वैदिक, शैव व वैष्णव मत के अनुयायियों से है। हिन्दूत्व को वर्तमान युग में अपने -अपने ढंग से परिभाषित किया गया है। भारत भूभाग में रहने वाले सभी जन को हिन्दूत्व की संज्ञा दी गई है।

भारत भूमि पर आर्य एवं अनार्य के संधर्ष का लम्बा इतिहास है। विजेता आर्यों द्वारा अनार्य की राक्षस, दैत्य एवं दानव प्रजातियों को नर भक्षी पिचाश के रुप में चित्रित किया गया है। इनका वध करना दैविक अधिकार प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है। जिन अनार्यों ने आर्यों की सवोच्चता स्वीकार की विजेता आर्यों ने उनकी जान बख्श कर म्लेछ माना। शूद्रत्व में निम्नतम पर स्तर में स्थापित कर उन से हेय एवं धृणित कार्य करवाएँ। जिन आर्यों ने अनार्यों के साथ सहानुभूति रखी उन्हें भी शुद्र समाज की ओर धकेल दिया।

भारत भूमि पर ब्राह्मण मत के विरूद्ध जैन एवं बौद्ध मत ने आवाज उठाई । दोनों ही मत कर्मकांड को अस्वीकार कर तप के मार्ग के महत्व पर प्रकाश डाला। ब्राह्मणों ने बौद्धों के समाने घुटने टेके तो शंकराचार्य ने बौद्धों फिर से परास्त कर सनातन का ध्वज लहराया। शक, हुण एवं कुषाणों की ताकत सनातन की अधिक क्षति नहीं कर पाए।

हिन्दुत्व पर सबसे मजबूत हमला इस्लाम की ओर से किया गया। इस्लाम ने हिन्दूओं की आस्था एवं संस्कृति पर हमला किया गया। अंग्रेजों के काल ईसाइयों का हमला भी भारत पर भी हुआ। वे अंधविश्वासी भारत को जगाकर ईसाई बनाना चाहते थे। जागृत भारत ने अपने निजत्व की पहचान कर इंसानियत का प्रकाश किया। पराधीनता की बेडियों को तोड़ कर मुक्त गगन में चैन की श्वास ली।

मानव इतिहास में प्रत्येक को अपना स्वाधीन जीवन जीने का प्रथम अवसर है। इससे पूर्व इने गिन लोगों की प्रगति की चमक में शुद्रता व दासत्व के दयनीय वेदना को दबा कर विश्व गुरु का गर्व करना मूर्खता का नशा मात्र है।

लोकतंत्र ने भारत को नासमझ राजनीति के हवाले कर दिया है। राजनीति ने अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक की परिभाषा में खो कर धार्मिक उन्माद में लोकतंत्र को उलझा दिया है। जातिवाद की ताकत देश का भविष्य तय करती है। हिन्दुत्व संकीर्णता एवं उदारता में उलझ कर रह गया हैं। उदारता के नाम पर हिन्दुत्व अल्पसंख्यक समुदाय के समक्ष झुकता गया है। जिसके परिणामस्वरूप बहुसंख्यक समुदाय में संकीर्णता का आविर्भाव हुआ। संकीर्णता व व्यापकता से घिरा धर्म अपनी वास्तविक की पहचान में खड़ा मानवता की राह देख रहा है। मानव धर्म रस, विस्तार,आनन्द एवं विकास के चार स्तंभ पर खड़ा होकर भगवत प्राप्ति इंतजार कर रहा है। यही है भागवत धर्म अर्थात मानव धर्म।

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कृष्ण की पीड़ा ....

रोता बिलखता मेरा 12 वर्षीय भतीज कृष्ण मेरे पास आकर कहने लगा कि मेरे कानों का छेदन करवाओं अन्यथा में अगले जन्म में मुसलमान बन जाऊँगा। मैनें कृष्ण को ढढास बंधवाते कहा कि इस कपोल कल्पित बातों पर तु विश्वास मत कर । उसका रोना फिर से जारी रहा एवं रोते-रोते मुझसे कहा कि भगवान करें आपने कहा वह बात शत प्रतिशत सत्य हो, पर यदि मैं मुसलमान बन गया तो बहुत बड़ा पाप हो जाएगा। मेरे ज्ञान को चुनौती देने वाला प्रश्न एक नौनिहाल के मुख सुन कर में सज्जनों की भाषा में कहा बेटे मुसलमान बनने में क्या हर्ज है। मुसलमान ही सही कम से कम इंसान तो बन जाएंगे । इस पर कृष्ण ने तापाक जबाव दिया - नहीं नहीं और नहीं। मैं कुछ भी बन सकता हूं लेकिन मुसलमान नहीं। मैने बाल मन की पीड़ा जानने का प्रयास किया। मैनें कहा कि मुसलमान बनने में क्या बुराई है ? उसने तुरन्त जबाब दिया कि बुराई तो कुछ नहीं लेकिन एक मुसलमान लाख प्रयास करे तो भी भगवान (अल्लाह) नहीं बन सकता है। एक सच्चा भागवत अपनी कर्म साधना के बल पर परम तत्व को प्राप्त कर सकता है।

मैने कहा नहीं, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं सत्य सर्वत्र व्याप्त है। तुम कुरान ए शरीफ़ एवं मोहम्मद साहब के संदेश को पढ़ चिन्ता मग्न मत हो, सूफी परंपरा में आध्यात्म की गहराइयों का स्मरण है। सूफ़ी अल्लाह तक पहुंच की सच्ची राह है। अंकल में इतनी बड़ी बातें तो नहीं जानता पर आज तक एक भी सूफी इस्लाम अल्लाह के रूप में गण्य हुआ हो बताओ । मेरे पास बाल मन को उदाहरण देने के लिए कोई पात्र नहीं था फिर अचानक मेरा ध्यान साई बाबा की ओर गया मैनें कृष्ण से कहा कि देखो साई बाबा इस्लाम होते हुए भी भगवान बने। कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा साई को ईश्वर हम भागवत धर्मियों बनाया है, यदि वे इस्लाम का दामन ही थामें बैठे होते तो किसी ख्वाजा की तरह दरगाह में दफ़न होकर कयामत की रात की इंतजार करते होते। अपने पुरुषार्थ की बली देने को विवश होना पड़ता। भागवत धर्म ही तो पुरुषार्थ के बल पर परम तत्व तक पहुंचने की बात करता है।

कृष्ण की ज्ञान भरी बातों ने मुझे कीकर्तव्यविमुढ स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। मैंने कृष्ण को ईसा मसीह के कृपावाद, बुद्ध के शून्यवाद, महावीर की जिन धारणा, सनातन के मिथ्यावाद एवं अन्यन की अपूर्णता में उलझाना उचित नहीं समझा। मैनें कृष्ण से वेदों की प्रकृति पूजा पर प्रश्न नहीं किया क्योंकि रहस्यवाद की इस प्रथम खोज में उपस्थित ब्रह्म विज्ञान से ही तो हमें उपनिषदों का दर्शन ज्ञान प्राप्त हुआ है। इसे चरम सत्य मानने की बजाय आध्यात्मिक खोज का क्रमिक विकास मानना ही सत्य के साथ किया गया न्याय है। मैनें कृष्ण को हिन्दूओं के अवतारवाद की ओर ले जाकर प्रश्न किया कि पूर्णत्व तो जन्म लेता, पुरुषार्थ योग तो गीता के उपदेश के ध्वज तलें दब गया है। कृष्ण मेरे प्रश्न का सिधा उत्तर देने की बजाय मेरे से प्रश्न किया कि ब्रह्मा को सृजन का कार्य दिया है, विष्णु को पालन तो महेश को संहार की शक्ति प्रदान है लेकिन हिन्दू अवतारों में राक्षसों के संहारक के रुप में विष्णु को दिखाया गया है महेश को तो राक्षसों के आराध्य के रूप में दिखाया है, जो इनको मन चाह वरदान दे देते हैं । अंकल अवतारवाद तो यही पर घुटने टेक लेता है।

मैनें कृष्ण की आँखों में गीता में पूर्णत्व के आगमन की घोषणा को वैष्णव एवं शैव के भेद से ऊपर विशुद्ध भागवत दर्शन को देखा जो पुरुषार्थ को दफ़न किये बिना पूर्णत्व के साक्षात्कार को स्वीकार करता है। विष्णु या विष्णु का कोई भी अवतार पूर्ण नहीं है क्योंकि विष्णु में ब्रह्मा एवं महेश की शक्ति नहीं समा सकती है। विष्णु में दोनो समेलित करने का प्रयास करे विष्णु अस्तित्वहीन हो जाएगा। हिन्दूओं का देवतावाद भी पूर्णत्व को छु ही नहीं सकता है। पूर्णत्व एवं पुरुषार्थ की इस जंग में धर्म की ग्लानि, अधर्म का उत्थान, साधुओं का परित्राण एवं दुष्टों का विनाश के प्रश्नों पर कृष्ण को घेरना बाल मन के साथ कपटता खेलना है। पूर्णत्व पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है, तो पूर्णत्व का महासम्भुति काल पुरुषार्थ की शिक्षा देने वाला गुरु युग हैं। कृष्ण के प्रश्न भागवत धर्म जो मानव धर्म है को समझने पर बल देता है। भागवत धर्म पंथवाद एवं मतवाद से ऊपर विशुद्ध मानव धर्म है। यही साधना मार्ग आनन्द मार्ग हैं।

 

(यह मूल चिन्तन मेरा है कृष्ण की पीड़ा को शब्दों में पिरोया गया है)

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लुटेरी अर्थव्यवस्था बनाम प्रगतिशील अर्थव्यवस्था

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री भारत को आर्थिक ताकत बनाने के क्रम में अमेरिका एवं जापान का अनुसरण करते हुए पूंजीवाद की ओर कदम बढ़ाये जा रहे है। स्वतंत्र भारत के प्रथमार्द्ध में पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के नाम पर पूंजीवाद मूलक सरकारी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया था। उसके विरुद्ध साम्यवाद एवं समाजवाद के स्वर उठे थे। इन्दिरा गांधी ने राजनीति की माया शक्ति में देश को उलझाते हुए मात्र संविधान में समाजवाद का लक्ष्य निर्धारित कर इनकी ताकत को क्षीण करने का अस्त्र खोज निकाला था। उसके समक्ष यह धूमिल होते हुए हाशिये मे जाकर समा गए। इस रिक्तता का फायदा मोदी के चमत्कारवाद ने ले लिया।

साम्यवाद का बैहाल तो सोवियत के विघटन में देखा गया है। समाजवाद कल्पना के साम्राज्य को छोड़कर बाकी कुछ नहीं है। पूंजीवाद की लुटेरी अर्थव्यवस्था पर लोक कल्याणकारी की लगाम लगाकर पूंजीवादी मनोवैज्ञानिकों ने संभावित विद्रोह को रोकने का प्रयास किया है। अमेरिका एवं जापान की चका चौध ने भारतीय राष्ट्रवादियों को पूंजीवाद की ओर आकृष्ट किया है। यह लोग भारत का विकास इसकी छत्रछाया में देख रहे हैं। अमेरिका एवं जापान का विकास दीपक तृतीय विश्व के शोषण की रक्तधारा से प्रज्वलित हुआ है। नेपाल एवं भूटान जैसे देशों की रक्तिमा पर भारत के विकास का ध्वज लहराया जाता है तो यह भारतीय संस्कृति के साथ किया गया अन्याय है। विकास का प्रतिमान देश के व्यष्टि एवं समष्टिगत संसाधनों का अधिकतम उपयोग से निर्मित हो तो विकास सुखद, गौरव पूर्ण एवं चिरस्थायी होता है। अन्यन देश के सापेक्ष विकास औपनिवेशिक प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा जगाती है या फिर अनैतिक एवं अवैधानिक राह दिखाकर अनुचित कार्य करवाती हैं। किसी देश के संसाधन के आधार पर किया गया विकास भी वितरण एवं संचयन की सुस्पष्ट व्यवस्था के अभाव में प्रगतिशीलता के आयामों को प्राप्त नहीं कर सकता है।

अर्थव्यवस्था को इस सार्वभौमिक सत्य को स्वीकार करना होगा कि मनुष्य की आवश्यकता असीमित है जबकि पृथ्वी पर संसाधन सीमित है। अत: अर्थ शक्ति पर समाज की लगाम होना नितान्त आवश्यक है , साथ ही मनुष्य को अपनी क्षमता का सम्पूर्ण उपयोग करने का अवसर भी प्रदान करना प्रगतिशील अर्थव्यवस्था की पहचान है । साम्यवाद अर्थ पर समाज की लगाम तो लगता है पर क्षमताओं के विकास का अवसर प्रदान नहीं कर पाता। इसके विपरीत पूंजीवाद क्षमताओं के विकास का अवसर तो प्रदान करता है पर धन लोलुपता पर लगाम नहीं लगता। इन दोषों की वजह से पूंजीवाद वर्ग संघर्ष का तो साम्यवाद निष्कर्मयता को जन्म होता है।

प्रउत एक ऐसी अर्थव्यवस्था का नाम है जो सभी की न्यूत्तम आवश्यकता सुनिश्चित करने के साथ गुणीजन का आदर व विवेक पूर्ण वितरण का समर्थन करता है। प्रउत धन संग्रह प्रवृति पर समाज की लगाम लगाने के साथ व्यष्टि व समष्टि की क्षमताओं के अधिकतम उपयोग की वकालत करता है। प्रउत भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक संभावना का सुसंतुलित उपयोग पर बल देने के साथ देश, काल एवं पात्र के अनुसार परिवर्तन की भी बात करता है। प्रउत एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जो वर्ण प्रधान समाज चक्र की व्याख्या करता है तथा किसी भी वर्ग के शोषण की निंदा करता है।

प्रउत अर्थात प्रगतिशील उपयोगी तत्व एक समाजिक अर्थनैतिक सिद्धांत है। यह सन् 1959 में श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं। श्री सरकार ने लोकतंत्र सहित समस्त व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए एक नूतन व्यवस्था का प्रतिपादन किया।

 

(यह मूल चिन्तन मेरा है )

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.लेखक --- -- श्री आनन्द किरण (करण सिंह) शिवतलाव

Cell no. 9982322405,9660918134

Email-- anandkiran1971@gmai.com karansinghshivtalv@gmail.com

Address -- C/o- Raju bhai Genmal , J.D. Complex, Gandhi Chock, Jalore Rajasthan

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