आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

बाल कहानी - गधों पर सवार पुस्तकालय

 

गधों पर

सवार पुस्तकालय

जेनिट विन्टर

अनुवादः अरविन्द गुप्ता

image

कोलम्बिया देश की एक सच्ची कहानी

देमेत्री और कैम्पबैल के लिए

कोलम्बिया के घने जंगलों में एक

आदमी रहता था जिसे किताबों से

बहुत प्यार था।

 

उसका नाम था लुइस।

 

जैसे ही एक किताब खत्म होती

वो झट से दूसरी पुस्तक घर ले

आता। जल्द ही उसका पूरा घर

किताबों से भर गया।

 

उसकी पत्नी डायना उस पर बहुत

गुस्सा करती।

 

‘इतनी किताबों का हम

क्या करेंगे, क्या उन्हें

भात के साथ खायेंगे?’

लुइस बहुत देर तक सोचता रहा।

 

फिर उसके दिमाग में एक विचार आया।

 

‘मैं इन किताबों को पहाड़ियों के उस पार उन लोगों के

लिए ले जाऊंगा जिनके पास कोई किताब नहीं हैं।

 

एक गधे पर मैं किताबें लादूंगा

और दूसरे पर खुद सवार हो जाऊंगा।

फिर लुइस ने दो हट्टे-कट्टे गधे खरीदे।

उनके नाम थे एल्फा और बीटो।

 

उसने उनकी पीठ पर किताबें लादने के

लिए एक क्रेट बनायी।

और उस पर एक साइनबोर्ड पेन्ट किया

- गधों पर सवार पुस्तकालय।

फिर डायना ने क्रेटों में पुस्तकें भरीं।

हर हफ्ते लुइस, एल्फा और बीटा दूर-दराज

पहाड़ियों पर स्थित बियाबान गांवों का दौरा करते।

इस हफ्ते वो इल-टोरमेन्टो नाम के गांव में जायेंगे।

 

जब सूरज की गर्मी बहुत तपती है

तब लुइस और दोनों गधे

किसी नाले के पास सुस्ताते हैं।

वे ठंडा पानी पीते हैं। पर पानी पीने के बाद

बीटो आगे चलने से कतराता है।

लुइस बार-बार उसकी लगाम खींचता है परन्तु

बीटो अपने स्थान से टस-से-मस नहीं होता है।

 

‘देखो, बच्चे हमारा

इंतजार कर रहे होंगे!’

फिर कहीं जाकर बीटो नाले को पार करता है।

पहाड़ी पर चढ़ते वक्त रास्ता एकदम सुनसान हो जाता है।

वहां केवल चिड़ियों की चहचहाहट सुनायी देती है।

 

तभी घुप्प अंधेरे में से एक डाकू कूदता है!

‘कृपा हमें जाने दो,’ लुइस प्रार्थना करता है।

‘बच्चे हमारे इन्तजार कर रहे होंगे।’

किताबें देखकर डाकू का पारा चढ़ जाता है।

वो एक किताब रख लेता है और गुर्राकर कहता है।

 

‘याद रखो, अगली बार मुझे चांदी चाहिए,’

‘मुझे चांदी दो!’

फिर चलता-फिरता पुस्तकालय आगे बढ़ता है

पहाड़ियों को पार करता हुआ, और फिर आखिर में लुइस

को नीचे घर दिखाई देते हैं।

 

इल-टोरमेन्टो के बच्चे लुइस से मिलने के लिए दौड़ते हैं।

किताबें चुनने से पहले लुइस उन्हें एक कहानी सुनाता है।

‘आज मैं तुम्हारे लिए एक अनूठा उपहार लेकर आया हूं,’ वो कहता है।

किताबों के ढेर के पीछे से लुइस मुखौटों का एक बंडल निकालता है।

 

मुखौटे छोटे जानवरों के हैं!

‘तुम अपने-अपने मुखौटे पहनो और फिर मैं तुम्हें जानवरों की एक

कहानी सुनाऊंगा।

कहानी खत्म होने के बाद सब

बच्चे अपनी-अपनी पसन्द की

एक किताब चुनते हैं।

 

लुइस से अलविदा कहते हुए बच्चे किताबों को

अपने कलेजे से चिपका कर रखते हैं।

लुइस, एल्फा और बीटो पहाड़ियां लांघते हुए घर वापस जाते हैं।

घर पहुंचते-पहुंचते वो तमाम जंगल और नाले पार करते हैं।

 

घर पहुंच कर लुइस अपने भूखे गधों को चारा देता है,

और डायना अपने भूखे पति को खाना देती है।

जल्दी सोने की बजाए लुइस एक किताब उठाता है

और उसे देर रात तक पढ़ता है।

 

और कहीं दूर-दराज एक पहाड़ी पर भी रात बहुत देर

तक मोमबत्तियां और लालटेनें जलती हैं।

 

वहां भी बच्चे देर रात तक पुस्तकालय से उधार ली पुस्तकें पढ़ते हैं।

 

यह कहानी लुइस सोरयिआना की सच्ची जीवनी पर

आधारित है। वो कोलम्बिया के एक दूर-दराज कं शहर ला-ग्लोरिया

में रहता है। टीचर रह चुकने के कारण लुइस को पुस्तकों की

परिवर्तनशील ताकत मालूम थी। लुइस अपनी पुस्तकों को दूर-दराज

गांवों में बसे लोगों तक ले जाने को बेताब था। वहां बच्चों के पढ़ने

के लिए किताबों की बहुत किल्लत थी। बहुत से घरों में तो एक

किताब तक नहीं थी।

 

साल 2000 में लुइस ने अपने दो गधों पर किताबें

लादकर दूर बसे गावों में ले जाने की शुरुआत की।

उसने मात्र 70 किताबों से शुरुआत की पर आज

उसके पास 4800 किताबें हैं। अधिकांश पुस्तकें

लोगों ने दान में दी हैं। हर शनिवार-रविवार को लुइस

बियाबान दूर बसे गांवों में जाता है। वहां 300 लोग

किताबें उधार लेने के लिए आतुरता से उसका इंतजार

करते हैं। इससे दुनिया का एक कोना सम्पन्न होता है।

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.