रविवार, 20 दिसंबर 2015

पुस्तक समीक्षा - किसी किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है

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पुस्तक समीक्षा

अब ग़ज़ल का बदल रहा है मिजाज

कुमार कृष्णन

ग़ज़ल की भाषा मुहावरा और प्रवाह ग़ज़लकार की साधना के द्योतक हैं। ग़ज़ल का नाम आते ही प्रेम का क्षितिज उद्घाटित होता है और उस क्षितिज पर प्रणय के विपरित समय की ग़ज़लों के माध्यम से शल्यक्रिया की गयी हो,यह आश्चर्य का विषय है। प्रेम की सम्यताओं के बीच परंपराओं का यथार्थ बहुत कुछ मायने रख जाता है। इसी मायने की कसौटी पर अशोक 'मिज़ाज' की ग़ज़लों को कसने की आवश्यकता है। अशोक 'मिज़ाज यूं तो सधे हुए ग़ज़लकार हैं। उर्दू व हिन्दी दोनो सामान्य भाषाओं में वे जाने और पहचाने जाते हैं। हाल में ही उनकी ग़ज़लों का संग्रह ' किसी—किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है' डॉ अनिरूद्ध सिन्हा के संपादन में वाणी प्रकाशन से छपकर आया है। इस पुस्तक में डॉ शिव कुमार मिश्र,प्रो कांति कुमार जैन, राधा वल्लव शास्त्री, त्रिलोचन शास्त्री, अहद प्रकाश, जहीर कुरैशी के विचार अशोक 'मिज़ाज' की ग़ज़लों के संदर्भ में प्रकाशित किए गए हैं। अपने संपादकीय में अनिरूद्ध सिन्हा कहते हैं— यकीनन अशोक म़िजाज की ग़ज़लें खूबसूरती और तग़ज़्जुल से लबरेज हैं। इनकी ग़ज़लों में ग़ज़ल की अपनी ज़मीन,अपनी फ़िक्र, अपना लहजा, अपना रंग और अपनी रवानी तो है पर वो जब दूसरों की जमीन छूते हैं तो उस पर भी अपना रंग आसानी से चढ़ा लेते हैं। मसलन— ग़ालिब की जमीन में वे कहते हैं—

शायद वो मेरी फ़िक्र को पहचान गयी है,

कुछ रोज से आती नहीं, बिटिया मेरे आगे।

और

आज तेरे पास ये अच्छा बुरा जो कुछ भी है,

कुछ तेरे अमाल का है, कुछ तेरी तकदीर का।

अब ये मान्यता समाप्त हो चुकी है कि ग़ज़ल का जन्म प्रेम तथा विरह की कोख से होता है। प्रस्तुत संग्रह की ग़ज़लों को देखने के बाद यह सहज की आभाष हो जाता है कि हिन्दी की ग़ज़लें मानवीय संवेदनाओं को निर्धारित शिल्प में ढ़लकर अभिव्यक्ति देने में सफल है। सच कहा जाय तो अशोक 'मिज़ाज' ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से हिन्दी ग़जलों एक नया संस्कार दिया है।

हर चीज तौलते हैं वो बाज़ार की तरह,

उनकी दुआ सलाम है व्यापार की तरह

*********

खुशियां हमें तो सिर्फ़ ख्याली पुलाव है

मुफलिस के घर में ईद के त्योहार की तरह।

उपरोक्त् दोनों शेरों में आत्मनिष्ठ, व्यैक्तिक भावना जिसे अशोक मिज़ाज ​ह्दय की भाषा तथा आत्मप्रकाश के साथ आत्मसात कर संवेदनात्म​क स्तर पर समाज की निर्धारित समकालीन घटनाओं एवं व्यक्ति निजत्व का आंकलन करने की क्रिया को इमोशनल टच दिया है। सच में बाज़ार का प्रभाव इतना बड़ा हो गया है कि संभोग संबधों से लेकर अभिवादन के स्वरूप भी बाजार के माध्यम से निर्धारित होते हैं।अशोक 'मिज़ाज' की ग़ज़लों के समकालीन होने का इससे बड़ा उदाहरण क्या मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर इस शेर को भी देखा जा सकता है।—

चमन में आ के उनको फूल भी चुनना नहीं आया

वो पाएगें भी क्या जिनको झुकना नहीं आया।

सच में कहा जाय तो ग़जल संग्रह ' किसी किसी पे गज़ल मेहरबान होती है' अपने आप ​में कितने विषय समेटे हुए है, यह संग्रह की तमाम ग़जलों के अवलोकन के बाद ही पता चलेगा, क्योंकि प्रत्येक ग़जल अपना एक अलग सौन्दर्य लिए हुए है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि ' किसी किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है' हिन्दी काव्य में मिल का पत्थर सावित होगी।

 

समीक्षित कृति — किसी किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है

अशोक मिज़ाज

संपादक अनिरूद्ध सिन्हा

मूल्य— 225 रूपये

वाणी प्रकाशन

4695, 21—ए दरियागंज

नई दिल्ली 110002

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