सोमवार, 7 दिसंबर 2015

ओम प्रकाश शर्मा की कुण्डलियाँ - तीसरा दशक

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तीसरा दशक

(1)

राजनीति में वर्षों से, बना हुआ है राज।

साथी बने विपक्ष का,सबसे ज्यादा प्याज॥

सबसे ज्यादा प्याज,प्रभाव दिखाय निराला।

घर घर करे प्रवेश, जगाए अंतर-ज्वाला॥

‘प्रकाश’ इसकी आसमान,मूल्य स्पर्श की रीति ।

गरमाए हर वर्ष , विपक्ष मध्य राजनीति ॥

(2)

मोबाइल से हो रहे, अब बहुतेरे काम।

मिटने वाला लग रहा, यहाँ टार्च का नाम ।

यहाँ टार्च का नाम, ट्रान्जिस्टर को भगाया।

कंप्यूटर का काम, सरल इस पर है भाया।

कह प्रकाश हैं सभी, हुए अब इसके कायल।

नेट दूरभाष संग , केमरा भी बना मोबाइल॥

3

यदि कर दिया गया यहाँ, इतना पक्का काम,

अधिकारी कमीशन घटे, हो जाए आराम ॥..

हो जाए आराम, खर्च वे कहाँ बताएँ।

महत्व घटे उनका, कौन फिर पूछने आएँ।

वहाँ प्रकाश बहुत से, अभियंता भरे भाई।

समझ रखते सारे, लालच दे अलग कमाई ॥

4

क्षेत्र में बिल्लियाँ बहुत, कैसे होगी बात।

न्याय हो कैसे भला, अब मूषक के साथ ॥

अब मूषक के साथ, आहार ये हैं उसका।

मुंह में लगा स्वाद, पड़ा खाने का चस्का ॥

कह प्रकाश सुझाओ, देख सके न मम नेत्र ।

चूहे सुरक्षित रहें , जिससे तो अपने क्षेत्र॥

5

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मानव की अवहेलना, अन्य जीवो से प्यार।

समझ न आए कुछ हमें, कैसा अब व्यवहार॥

कैसा अब व्यवहार, बंदर कुत्ते को बचाए ।

जनपीड़ा तो न अब, किसी की समझ न पाए।

‘प्रकाश’ सरकार करे, जन सुरक्षा का प्रबंध ।

जिससे वे जी सके, धरा पर सदा निर्द्वंद्व ।

6

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महंत जी के घर मचा, चूहे का आतंक।

कुतर न दे कपड़े कहीं, सदा रहते सशंक॥

सदा रहते सशंक, जल्द बिल्ली ले आए।

करने लगे सेवा, नित्यप्रति दूध पिलाए॥

‘प्रकाश’ उसने किया ,तब सब चूहो का अंत।

है अहिंसा धर्मी ,सच्च ही प्यारे महंत ॥

7

माँ मंदिर आ पंक्ति में, माथा टेकें लोग।

नारियल पैसा चुनरी, और चढ़ाते ;भोग॥

और चढ़ाते भोग, कामना उनकी भारी।

पाप मिटे सम्पूर्ण, इच्छाएँ मिटे सारी॥

कह ‘प्रकाश’ देखो,मिटे लोभ किसका कहाँ ।

सदा अंतर्यामी, सभी कुछ देख रही माँ ॥

8

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माया से करते रहे , निज को जितना दूर।

मरने पश्चात् वे जुड़े, क्या करते मजबूर ॥

क्या करते मजबूर, हर नोट सिक्के पर अब।

हर व्यवसाय उनबिन , निपट न सकता है कब॥

कह ‘प्रकाश’ चित्र तो , गांधी का उन पे आया।

जीवित जब तो हटे, अब खुद ही बने माया॥

9

मर्यादा में रह करें, यदि विरोध की बात।

मुखिया निर्णय हो सही, सबकी सुनकर बात।।

सबकी सुनकर बात, परस्पर बात चलेगी।

बनेगी सहमति तब, आगे की राह खुलेगी।।

कह प्रकाश यदि सभी, बोलते रहेगे ज्यादा।

सुझाएँ सब विद्वतजन, कैसे रहे मर्यादा ।।

10

वचन मधुर है बोलते, हँसकर करते बात।

बिन पूछे कहते रहे, दूँ जीवन भर साथ॥

दूँ जीवन भर साथ, शब्द चापलूस वाले,

सुन करके विश्वास, न निज जी में पालें॥

कहे ‘प्रकाश’ अकसर, रखें वे कपट भरा मन।

दिल के होते साफ, मुख पर कहते कटु वचन॥

 

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