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प्रमोद यादव का हास्य-व्यंग्य - ठीक बा

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ठीक बा / प्रमोद यादव

‘ पापाजी..हर साल की खट-खट..बक-बक..और गाली-गलौज से मैं ऊब गया हूँ..अब जब बोर्ड वाले ठान के ही बैठे हैं कि आपके लाडले को पास नहीं करना है तो भला मैं क्या करूँ ? मैं तो पूरी लगन से पढ़ता हूँ..आपकी आज्ञानुसार तीन-तीन कोचिंग जाता हूँ..फिर भी नतीजा वही का वही रहता है-सिफर का सिफर- यानी फेल.. तो मैं क्या करूँ ? तीन साल से आप ये सब देख-भोग रहे हैं..अब मेरे भविष्य के विषय में सोचना छोड़ दें..और सचमुच ही इतनी चिंता है तो आप अपना ट्रांसफर बिहार करा लीजिये..’ बेटे ने एक सांस में शेविंग करते पापा को सलाह दे डाली.

दाढ़ी बनाते पापा चौंक कर बोले- ‘ क्यों ? मेरे बिहार ट्रांसफर हो जाने से क्या तू पास हो जाएगा ? तेरे पास-फेल का बिहार ट्रांसफर से क्या सम्बन्ध ? ‘

‘ अरे पापा..समझा करें..देश में यही तो एक राज्य है जहां हम जैसे लोगों (फेल्वरों) का भविष्य उज्जवल है..नौवीं फेल..ग्यारवीं फेल लोग भी बिना किसी जद्दोजहद के आराम से मंत्री बन जाते हैं..टी.वी. नहीं देखते क्या ? नए मंत्रिमंडल में कितने सारे मंत्री हमारे ही साथी हैं..हमारे जैसे ही हैं..हमें तो अब बिहार पर ही भरोसा है..आप ट्रांसफर ले लीजिये.. विश्वास दिलाते हैं-आपका नाम जरुर रौशन करेंगे..’

‘ बेटा..वो सब बड़े बाप के बेटे हैं..जन्में तब से लेटे हैं..उनकी बराबरी करने की मत सोच..उनके पास अनाप-शनाप पैसा है..ताकत है..वे न भी पढ़े..निरक्षर रहे तब भी हर क्षेत्र में कामयाब रहेंगे ..याद है न..इसी प्रांत की एक महिला सी. एम...जो दूसरी भी नहीं पढ़ी थी पर कई साल तक राज्य के बड़े-बड़े आई.ए.एस...सेक्रेटरी लेवल के लोगों को पढ़ाती रही..इस राज्य में ही यह संभव है...’

‘ अरे पापा..तभी तो कह रहा हूँ-चलिए..बिहार चलें..आपकी तो नौकरी भी सेन्ट्रल की है..आराम से ट्रांसफर हो जाएगा..आपका भूत-वर्तमान तो बीता ही समझो..अब आपका भविष्य हम ही तो हैं..इसे संवारना है तो अविलम्ब बिहार चलिए..देर करेंगे तो वहां की स्थिति बदल (सुधर) जायेगी..फिर कहीं तीन बार बारवीं फेल आपका ये पुत्र वहां भी फेल न हो जाए..फिर मत कहियेगा कि हमने आगाह नहीं किया..’ बेटे ने विनती भरे स्वरों में कहा.

‘ बेटा..इस प्रांत को मैं बचपन से देख-सुन रहा हूँ..उसके विषय में तुम निश्चिन्त रहो..उसके बदलने की कतई चिंता न करो..वो न कभी बदला है न कभी बदलेगा..’

‘ फिर भी पापा..थोडा जल्दी कीजिये..शुभ काम में देरी क्यों ? वैसे भी मैं तीन साल लेट हो गया हूँ..पहले ये सब मालूम होता तो आज मैं भी झक सफ़ेद कुरते-पाजामे और काले जेकेट के साथ मंत्रालय के किसी कुर्सी में शोभायमान होते रहता..खैर..जब जागे तब सबेरा..’ बेटे ने आह भरते कहा.

‘बेटा मुंगेरीलाल..दिन में सपने देखना छोड़ और मन लगाकर पढ़ाई कर..मुझे लगता है, इस बार तू जरुर पास हो जायेगा...’ पापा ने समझाईश दी.

‘ क्या पापा..घूम-फिरकर फिर वहीँ आ गए जहां से चले थे..मैं आपको बेहतर भविष्य के रास्ते सूझा रहा और आप हैं कि फिर वही पुराना राग अलाप रहे..यहाँ बारवीं पास कर भी लिया तो क्या कर लूंगा ? चपरासी की नौकरी भी नहीं मिलने वाली ...’

‘ देख बेटा..मेरी नौकरी के तीन-चार साल ही बचे हैं..उसे अच्छे से गुजरने दे..प्रामिस करता हूँ-अगले जनम में जरुर बिहार में ही अवतरित होऊंगा..तब तू अपनी इच्छा पूरी कर लेना..इस जनम में रहने दे..यहाँ तू नहीं भी कमाएगा तब भी जैसे-तैसे मैनेज कर लेंगे..’

‘ अरे पापा कैसी बात कर रहे हैं आप ? क्या आपको विश्वास है कि अगली बार आप फिर मनुष्य योनि में ही जनम लेंगे ?..गधे-खच्चर भी तो बन सकते हैं..’

‘ अरे उसकी जिंदगी तो अभी जी रहा हूँ पगले ..और कितने जनम बनूँगा गधा-खच्चर ? तुम्हारी मंशा के अनुरूप मैं वहीँ जनम लूंगा ताकि बिना पढ़े-लिखे ही तुम मंत्री-संत्री बन सको..’

‘ पर पापा..एक बात समझ में नहीं आ रही..चलो माना कि आप वहीँ पैदा हो गए..पर ये जरुरी तो नहीं कि हम भी आपकी गोदी में ही अवतरित हों..’

‘ अरे पागल..जैसे मैं “सपोज” कर करा हूँ...तू भी कर ले..मान ले कि मेरी गोदी में तू ही आएगा..’

‘ चलो मान लिया..पर मम्मी नहीं मानेगी..उसे आप हमेशा डांटते-डपटते और चमकाते रहते हैं..कहीं इस बार वो आपको न चकमा दे दे..’

‘अरे नहीं बिट्टू .. तुम्हारी मम्मी को जितना मैं जानता हूँ..तू नहीं जानता..उसे मालूम है..इन सबके बावजूद भी हम उससे बहुत प्यार करते हैं और वो हमें.. तू ये सब नहीं समझेगा..हमारा “जनम-जनम का साथ है” वाला साथ है.. जा..मम्मी की फिकर मत कर..वो हमारे प्यार में खिंची चली आएगी..’

‘ ठीक है पापा..अब ये भी बता दो कि इस परिवार को वहां शिफ्ट होने में कितना समय लगेगा ? ’

‘ बेटा..मेरे पास कोई टाइम मशीन तो है नहीं..ये तो “ऊपर” जाऊँगा तभी बता पाऊँगा..फिर भी मानकर चल- हजार..दो हजार साल..’

‘ क्या ? हजार दो हजार साल..! ’

सुनते ही बेटा मूर्छित सा होने लगा.. पास के पलंग में लहराकर गिर गया..तभी उसे लगा कि पापा ने दाढ़ी बनाने के लिए मग में रखे पानी को उसके सिर पर उंडेल दिया..वह हडबडा कर उठ बैठा..

आँखें मलते देखा तो सामने मम्मी लोटा लिए मुंह पर पानी के छींटे मारते चिल्ला रही है- ‘ बस..घोड़े बेचकर वक्त-बेवक्त सो और फकत सपने भर देख..पढ़ाई मत कर..ऐसा लगता है-पिछले जनम में तू जरुर कोई महा आलसी और ठेठ लठ्ठ मंत्री-संत्री रहा होगा...अब उठ..ये ठाठ छोड़ और दौड़कर दूध का पैकेट लेकर आ..मालूम नहीं तुझे ?..आज बिहार से तेरे पापा के दोस्त आ रहे.. जा..जल्दी जा..’

बिहार का नाम सुनते ही बिट्टू ताजे-ताजे सपने को याद कर मन ही मन मुस्कुराया..वह हैरान हुआ कि उसके सपनों का बिहार खुद चलकर आ रहा था..उसका सपना सच हो रहा था..

अनायास ही उसके मुंह से निकला- “ठीक बा मम्मी” और वह घर के बाहर दौड़ गया. एकबारगी खुद ही चौंक गया कि बिहार का “बा” कैसे उसके कंठ से निकल गया... सोच में पड गया कि कहीं सचमुच उसका भाग्य तो नहीं फिरने वाला ? कहीं वह “शपथ” तो नहीं लेने वाला ?

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

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