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पद्मा शर्मा की कहानी - फ़ाइल


कहानी
 
 फाइल
 
 
गाड़ी शहर की सड़कों को छोड़ती हुयी गाँव की ओर बढ़ने लगी थी।प्रशासनिक अधिकारी और उनका अमला गड्ढे भरे रास्ते को बड़े ध्यान से देख रहे थे। पहले इस गाँव में आने के लिए रेल की पटरी के बगल वाले गिट्टी के रास्ते से आना पड़ता था। अब गाँव तक पहुँचने के लिये रास्ता बन गया है। गाँव में पहुँचते ही गाँव के अन्य अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। अधिकारी एस डी सिंह ने पहले से आदेश दे रखा था कि सभी लोग गाँव के स्कूल में ही इकट्ठे हों ... तहकीकात वहीं होगी। स्कूल का पता एक दो लागों से पूछा। सरकारी गाड़ी अपनी लय और ताल से फर्राटे भरती हुयी रुकी ... तीन लोग उतरे। अमले में से अधिकारी को जल्द हीे पहचान लिया हैडमास्टर की निगाहों ने। रुआब, दमखम, कपड़ों की सफेदी, चेहरे का तेज, आँखों का क्रोध, कदमों की कसावट इन सबसे हैडमास्टर ने ताड़ ही लिया। वह अपनी अदबकारी साँसें थामे उनकी अगुआई कर रहा था।

स्कूल की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते उन्होंने देखा कि स्कूल में निर्माण कार्य कुछ दिनों पूर्व हुआ है ... नए कमरे भी बन गये हैं। खेल के लिए अलग मैदान है ... फर्श भी पक्का हो गया है। वे देख रहे थे कि लोग उनके पास आने को लालायित हैं। अधिकारी की एक नजर उन पर पड़े तो वे निहाल हो जायें और अधिकारी ने इज्जत से बात कर ली तो फिर कहने ही क्या हैं मानो सारा जहान मिल गया। एस डी सिंह के मन में कसैलापन छा रहा था।
 उन्होंने पीछे आ रहे हैडमास्टर से पूछा- "कितने टीचर हैं यहाँ ?"
 
हैडमास्टर उनके प्रति श्रद्धा में लगभग झुकते से बोले- "जी सर पाँच।"
घनी दाढ़ी के बीच चेहरा पहचानते हुए उन्होंने कहा- "आप यहाँ कबसे हैं ?"
"....जी मुझे लगभग बीस बर्ष हो गये।"
हैडमास्टर साहब उन्हेें अपने कमरे की ओर ले गए। कमरे के बाहर तख्ती लगी थी- अवध नारायण सक्सेना, प्रधानाध्यापक एस डी सिंह ने कमरे का निरीक्षण किया ...छह गद्दीदार कुर्सियाँ  और एक अच्छी टेबल भी रखी थी। छत का पंखा भी अच्छी हालत में दिख रहा था।

कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने कहा - ‘‘अब मुझे पूरा मामला सुनाइये।’’
हैडमास्टर जी ने कोल्डड्रिंक उनके सामने रखकर कहा-" सर पहले ठण्डा पी लीजिए।"
 एस डी सिंह ने बोतल एक तरफ हटा दी। हैडमास्टर ने उनका भाव समझ बताना शुरु कर दिया-‘‘सर यहाँ एक मास्टर है अफजल । वो शहर से स्कूल में पढ़ाने आता है।’’ थोड़ा रुककर गला साफ करते हुए बोले- सरपंचजी ने उस पर आरोप लगाया है कि अफजल ने उनकी बेटी के साथ अभद्र व्यवहार किया है। इसी बात को लेकर गाँव में तनाव है। अफजल को गाँव में ये लोग आने नहीं दे रहे।"

एस डी सिंह ने कहा- घटना कहाँ हुयी ?

अब तो और भी परेशान हो गए हैडमास्टर जी। घबराते हुए बोले- सर यहीं स्कूल में छुट्टी के बाद हुई थी घटना। मै अपने घर चला गया था।" अन्तिम वाक्य कहकर उन्होंने इस घटना से अपना पल्ला झाड़ना चाहा।
....फिर अफजल और वो लड़की यहाँ क्या कर रहे थे?"

"सर अफजल कमजोर बच्चों की अलग से क्लास लेता था। उस दौरान हुआ सब।''

लम्बी साँस खींचकर वे बोले- ...हूँ, तो कोई चश्मदीद गवाह ?

एस डी सिंह ने उनका चेहरा पढ़ना चाहा। उनके चेहरे पर पसीना बह रहा था जैसे लाइट जाने के बाद फ्र्रिज में पानी की बूँदे उग आती हैं।
घबराते हुए बोले-"नहीं सर"
"अफजल कबसे नौकरी कर रहा है ?"
"सर उसे यहाँ आए दो साल हो गए"
हैडमास्टर पसीना पसीना हुए जा रहे थे।

हवा का रुख तय करता है कि चिंगारी से आग जलाना है या आग लगाना। जिला मुख्यालय के अधिकारी चिन्तित थे कि घटना साम्प्रदायिक हिंसा न बन जाये। गाँव का तनाव शहर में न फैल जाए। जरा सी बात बवंडर का रूप अख्तियार कर भीड़ के पास पहुँचती है तो भीड़ विचलित होकर अविवेकी बन जाती है और सत्य तक पहुँचने का सामर्थ्य भी नहीं करती।

गहरी सोच में डूबे सिंह साहब ने कहा-" पहले भी शिक्षकों पर ऐसे आरोप लगे हैं ?"
हैड मास्टर सकपका गये। वह क्या उत्तर दे उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। जी ... जी... नहीं सर।
उन्होंने आदेशात्मक लहजे में कहा- फरियादी को बुलाओ

एस डी सिंह के साथ आये लोग बाहर चले गये। सन्नाटा बहुत कुछ बयाँ करता है। उसकी अपनी भाषा होती है। स्थितियाँ अपने अनुरूप वातावरण का कलेवर तैयार करती हैं। तभी तो तेहरवीं का भोज, भण्डारे का भोज और किसी उत्सव आदि के भोज में वैसा ही माहौल व्याप्त हो जाता है। यहाँ का सन्नाटा भी राख के नीचे दबी चिंगारी की आमद दर्ज करा रहा था।

रामनारायण चैधरी को बुलाया गया। उसके सिर में सफेदी छा रही थी। आँखों पर चश्मा चढ़ा था। कलफ लगे कपड़ों का कड़कपन उनकी चाल में भी दिख रहा था। अपनी ठसक में एक हाथ ऊपर को थोड़ा सा उठाते हुए चौधरी रामनारायण ने नमस्ते की। गर्वीली अपना परिचय देते हुए कहा- मैं सरपंच रामनारायण चौधरी ।
सिंह साहब ने देखा बुढ़ापा सिर चढ़कर बोल रहा था पर अकड़ अभी भी ज्यों की त्यों थी मुर्दे की अकड़ की तरह। रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। मूंछें ऊपर की ओर तलवार की नोंक के समान उठीं हुई थीं। चेहरा और चाल का चरित्र से गहरा नाता होता है। उसने सरपंच शब्द पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया। रसूखदार को समय और सत्ता बदलने से कोई मतलब नहीं होता वह तो हर हाल में अपना प्रभाव जमाए रखना चाहता है।
उन्होंने सरपंच की ओर इशारा करते कहा-हूँ , आप बताइये क्या घटना है ?

सरपंच ने कहना शुरु किया-"... अरे साब ये अफजल मास्टर ने हमारी लड़की के साथ गलत व्यवहार किया है। स्कूल और गाँव की इज्जत की बात थी जो हमने बात गाँव से बाहर नहीं जाने दी। वो पढ़ाता लिखाता कुछ नहीं बस हमारी लड़कियों को गलत नज़रों से देखता है। उस दिन तो हद ही हो गयी साब उसने मेरी लड़की का हाथ पकड़ा  उसके कंधे पर हाथ रखा और ... और साब क्या कहूँ ...कहते हुए शर्म आती है ... हम अपनी बेटी के साथ हुई घटना कैसे बताएँ ...
 
‘तो आप लड़की को बुलवा दीजिए’ एस डी सिंह ने बात काटते हुए कहा।

सरपंच थोड़ा तैश में बोला- अरे साब वो छोटी है और बहुत डरी हुयी है। मैं बता तो रहा हूँ आपको सब कुछ ...।
सिंह साहब ने बीच में टोकते हुए कहा किस कक्षा में है तुम्हारी लड़की ?
"जी कक्षा आठ में"
 
"...हूँ , तो तुम्हारी लड़की इतनी छोटी कक्षा में है ?"
 
"नहीं साब वो मेरे बेटे की बेटी है।... मेरी बेटियाँ तो अपनी अपनी ससुराल हैं।
 
सिंह साहब ने कहा- "आपकी लड़कियाँ भी इसी स्कूल में पढ़ी हैं?"
 
"जी साब"
 
"तो क्या उनके साथ भी कभी किसी ने गलत व्यवहार किया था?"

यह प्रश्न सुनकर सरपंच चौक गया। उसकी बूढ़ी आँखें एस डी सिंह के चेहरे को गहराई से देखने लगीं। उसने झिझकते हुए कहा- नहीं साब।
सिंह साहब ने हैडमास्टर की ओर मुखातिब होते हुए कहा- आप बताइये क्या आपके स्कूल में पहले भी ऐसा कभी हुआ है ?

हैडमास्टरजी घबड़ा गये। वो समझ नहीं पा रहे थे कि क्या कहें। यदि सच कहते हैं तो सरपंच परेशान करेगा। झूठ भी कैसे कहें, यदि सच पता चल गया तो फिर उनकी खैर नहीं। बीता हुए कल में पाप की परछांई व्यक्ति के मन को सदा उद्वेलित करती है। वह बेचैन रहता है कि कहीं सच सबके सामने न आ जाए।

सिह साहब ने हैडमास्टर की ओँखों में आँखें डालकर कहा- मास्टर जी शिक्षक का काम सत्य बोलना होता है। यदि ये काम शिक्षक नहीं करेगा तो समाज किससे उम्मीद रख सकता है। धर्म भी यही कहता है कि सौ गुनहगार छूट जायें पर एक बेगुनाह को सजा न मिलने पाए ।

हैडमास्टर ने माथे पर छलक आए पसीने को पोंछा फिर सरपंच की ओर देखने लगे।
सिंह साहब सब कुछ समझ रहे थे। उन्होंने कहा- मास्टर जी आपने मुझे पहचाना ?
हैडमास्टर उत्सुकतावश उन्हें देख रहे थे और स्मृतिपटल पर जोर डाल रहे थे।
अपना नाम बताते हुए वे बोले -मैं शिवदत्त सिंह।... पहचाना ?

वे आगे बताने लगे, मैं इसी स्कूल में शिक्षक बनकर आया था। मैं उच्च जाति से नहीं था इसलिए पूरा गाँव मेरा विरोध करता था, विशेषकर ये सरपंच जी। मुझे ताने दिए जाते थे - देखो वो मास्साब जा रहे हैं। अब ऐसे लोग आयेेंगे हमारे बच्चों को पढ़ाने।... सरपंच का दबाव था कि मैं उनके घर जाकर उनके बच्चों को पढ़ाऊँ। पर मेरा उत्तर था कि मेरे लिए सब बच्चे बराबर हैं, मैं स्कूल में ही सब बच्चों की एक्स्ट्रा क्लास लेता हूँ , वहीं पढ़ा दूंगा। वे चाहते थे अन्य लोगों की तरह मैं उनके घर जाकर जी हजूरी करुँ, उनकी हवेली पर जाकर माथा टेकूँ। मेरे मना करने पर इन्होंने इसे प्रस्टीज पोइंट बना लिया और मुझ पर आरोप लगा दिया कि मैंने इनकी लड़की के साथ बदसलूकी की है।

सिंह साहब ने उन दोनों के चेहरे पढ़े। फिर बोले अगर पुलिस केस हो जाता तो मेरा भविष्य बर्बाद हो जाता। मैंने समझदारी से काम लिया और लम्बी छुट्टी पर चला गया। मैंने संकल्प लिया कि इस योग्य बनूंगा कि सब मुझे सलाम करें। भाग्य ने मेरा साथ दिया और मेरा पी एस सी से नायब तहसीलदार के लिए चयन हो गया।

वे पानी पीने के लिए रुके। फिर बोले - वो दिन मुझे अच्छी तरह याद है जब मै आखिरी दिन स्कूल आया तो आप सब मुझे बस तक छोड़ने गये थे। सबके व्यवहार में अचानक अन्तर आ गया । सब मेरा सम्मान करने लगे थे। जो सम्मान मुझे शिक्षक बनकर मिलना चाहिए वो सम्मान प्रशासनिक अधिकारी बनकर मिला। है न ताज्जुब की बात ?
 
सरपंच हैरान हो गया। उसकी हालत खराब हो रही थी।
सिंह साहब ने उन दोनों की ओर देखा और कहा- शिक्षक का सम्मान करना सीखो। हम जैसों को अधिकारी बनाने के पीछे शिक्षक का ही हाथ होता है।
हैडमास्टर घिघियाते हुए से बोले- सर आप तो सब जानते हैं , हम पानी में रहकर मगर से बैर कैसे कर सकते हैं ?
सिंह साहब बोले- हैडमास्टर जी शिक्षक सच को सच और झूठ को झूठ नहीं कहेगा तो हम बच्चों को क्या सिखायेंगे?... मैं तो शिक्षक ही बने रहना चाहता था... पर आप सबने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं इस पद को हासिल करुँ, जिसे लोग सलाम ठोकते हैं। सलाम ठोकना और सम्मान करना दोनों में बहुत अन्तर है। अधिकारी जब तक पद पर रहेगा तब तक लोग उसे सलाम ठोकेंगे पर शिक्षक के रिटायर होने के बाद भी लोग उसका सम्मान करेंगे।
 
हैडमास्टर घबड़ाकर पसीना पसीना हुए जा रहे थे। सिंह साहब बोले -ये मैं जानता हूँ अफजल निर्दोष है। जो मेरे साथ हुआ वही उसके साथ हुआ। फर्क बस इतना हुआ वो आपके जाल से बच नहीं पाया। मैने उसके भी बयान दर्ज किए हैं। ...उसे पीटने की कोशिश भी की गयी... बच्चों को उसके खिलाफ भड़काया ...बच्चों ने मना किया तो उन्हें फेल करने की धमकी दी गयी... स्कूल में उसके विरुद्ध जाने क्या क्या लिखा तुम लोगों ने। ....
 
सरपंच की ओर देखते हुए बोले- एक और शिवदत्त सिंह मत बनने दो।... लोगों का विश्वास उठ जायेगा शिक्षक की नौकरी से। अफजल का रिकाॅर्ड देखा है मैंने , वो बहुत इंटेलीजेंट है। उसके ज्ञान का फायदा उठाओ तो वो कई शिवदत्त तैयार कर देगा... इस गाँव की तस्वीर बदल देगा। मैंने स्कूल के बच्चों और उनके अभिभावकों से बात की है वे लोग बहुत पसन्द करते हैं उसे... इस गाँव को जातिगत और स्वार्थगत  मुद्दों से दूर रखो।"
 
 स्वार्थ की पूर्ति के लिए किस तरह लोग अकारण ही घटना और दुर्घटना को कल्पना का जामा पहना देते हैं। सुनने वाले उन पर आँख बंद कर विश्वास कर लेते हैं और कूद पड़ते हैं वे सब हवन कुण्ड में ।ऐसे हवनकुण्ड में जिसका धुँआ वातावरण की शुद्धि नहीं करता बल्कि उसकी तपन न जाने कितनों को जलाकर भस्म कर देती है।
 
उन्हें लगा लोहा गरम है, वे आगे बोले -" देख लो अपनी गलती सुधार लो या फिर मैं झूठा केस लगाने के आरोप में जेल भेज दूँ ?", कहकर वे बाहर निकल गये।

 सरपंच का बुरा हाल था। वह दौड़ते हुए पीछे भागा और पैर छूने लगा कि साहब हमें बख्श दो , हमें माफ कर दो। मैं यह केस वापस लेे लूंगा और आगे से ऐसा कभी नहीं करूंगा।
 
सरपंच ने केस वापस लेने के लिए आवेदन लिखा और साथ में माफीनामा भी। हैडमास्टर ने भी अफजल के पक्ष में अपने बयान लिखकर दिए।

एस डी सिंह ने इन सभी कागजातों को फाइल में रखकर उसे बंद कर दिया, जैसे केस भी बंद हो गया हो। सिंह साहब ने फाइल को सीने में भींचकर कसकर पकड़ लिया जैसे उन्होंने वर्षों पूर्व हुए अपने ही केस पर आज फतह प्राप्त कर ली हो।
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डॉ. पद्मा शर्मा
एफ-1, प्रोफेसर कॉलोनी
शिवपुरी, म. प्र. 473551  
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