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प्रतापनारायण मिश्र का व्यंग्य - उपाधि

यद्यपि जगत में और भी अनेक प्रकार की आधि-व्याधि है पर उपाधि सबसे भारी छूत है । सब आधि-व्याधि यत्न करने तथा ईश्वरेच्छा से टल भी जाती हैं पर यह ऐसी आपदा है कि मरने ही पर छूटती है । सो भी क्या छूटती है, नाम के साथ अवश्य लगी रहती है । हां, यह कहिए सताती नहीं है 1 यदि मरने के पीछे भी आत्मा को कुछ करना-धरना तथा आना-जाना या भोगना पड़ता होगा तो हम जानते हैं उस दशा में भी यह रांड पीछा ना छोड़ती होगी । दूसरी आपदा छूट जाने पर तन और मन प्रसन्न हो जाते हैं, पर यह ऐसा गुड़भरा हंसिया है कि न उगलते बने न निगलते बने । उपाधि लग जाने पर उसका छुड़ाना कठिन है । यदि छूट जाए तो जीवन को दुखमय कर दे । संसार में थुडू-थुडू हो और बनी रहे तो उसका नाम भी उपाधि है ।

हमारे कनौजिया भाइयों में आज विद्या, बल, धन इत्यादि कोई बात बाकी नहीं रही, केवल उपाधि ही मात्र शेष रही है । ककहरा भी नहीं जानते पर द्विवेदी, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, त्रिपाठी आदि उपाधि बनी है । पर इन्हीं के अनुरोध से बहुतेरे उन्नति के कामों से वंचित हो रहे हैं । न विलायत जा सके न एक-दूसरे के साथ खा सके, न छोटा-मोटा काम करके घर का दारिद्रम् मिटा सके । परमेश्वर न करे, यदि इत दीन दशा में कोई कन्या हो गई तो और भी कोढ में खाज हुई । घर में धन न ठहरा, बिना धन बेटी का ब्याह होना कठिन है । उत्तर के ब्याह दें तो नाक कटती है । न व्याहें तो इज्जत, धर्म, पुरुषों के नाम में बट्टा लगने का डर है । यह सब आफतें केवल उपाधि के कारण हैं ।

शास्त्रों में पढ़ाने वाले को उपाध्याय कहते हैं । यह पद बहुत बड़ा है पर उपाधि और उपाध्याय दोनों शब्द बहुत मिलते हैं, इससे हमारी जाति में उपाध्याय एक नीच पदवी (धाकर) मान ली गई है । इस नाम के मेल की बदौलत एक जाति को नीच बनना पड़ा । पर नीच बने भी छुटकारा नहीं है । वे धाकर हैं, उन्हें बेटी ब्याहने में और भी रुपया चाहिए । वरंच बेटा ब्याहने के लिए भी कुछ देना ही पड़ता है । यह दुहरा घाटा केवल उपाधि के नाम का फल है । हमारे बंगाली भाई भी कान! कुल ही के हैं पर उन्होंने मुखोपाध्याय, चट्टोपाध्याय इत्यादि नामों में देखा कि उपाधि लगी है, कौन जाने किसी दिन कोई उपाधि खड़ी कर दे इससे बुद्धिमानी करके नाम ही बदल डालें, मुकर्जी, चटर्जी आदि बन गए । यह बात कुछ कनौजियों ही पर नहीं है, जिसके नाम में उपाधि लगी होगी उसी को सदा उपाधि लगी रहेगी ।

आज आप पंडित जी, बाबू जी, लाला जी, शेख जी आदि कहलाते हैं, बड़े आनंद में हैं । चार जजमानों को आशीर्वाद दे आया कीजिए या छोटा-मोटा धंधा या दस-पांच की नौकरी कर लिया कीजिए, परमात्मा खाने पहिनने को देता रहेगा । खाइए, पहनिए, पांव पसार कर सोइए, न ऊधव के लेने न माधव क देने । पर यदि प्रज्ञा, विद्यासागर, बीए, एम.ए. आदि को उपाधि चाहनी हो तो किसी कालेज में नाम लिखाइए, परदेश जाइए, 'नींद नारि भोजन परिहरही' का नमूना बनिए, पांच-सात बरस में-उपाधि मिल जाएगी । घर में चाहे खाने को न हो पर बाहर बाबू बनके निकलना पड़ेगा । चाहे भूखों मरिए पर धंधा कोई न कर सकिएगा । नौकरी भी जब आप के लायक मिलेगी तभी करना नहीं तो बात गए कुछ हाथ नहीं है ।

एक प्रकार की उपाधि सरकार से मिलती है । यदि उसकी भूख हो तो हाकिमों की खुशामद तथा गौरांगदेव की उपासना में कुछ दिन तक तन, मन, धन से लगे रहिए । कभी आप के नाम में भी सीएसआई. अथवा एबीसी. से किसी अक्षर का पुछल्ला लग जाएगा अथवा राजा, रायबहादुर, खां बहादुर अथवा महामहोपाध्याय की उपाधि लग जाएगी । पर यह न समझिए कि राजा कहलाने के साथ कहीं की गद्दी भी मिल जाएगी अथवा सचमुच के राजा आपको कुछ गनै गूंथैगे । हां, मन में समझे रहिए कि हम भी कुछ हैं, पर उपाधि की रक्षा के लिए कपड़ा-लता, हरा-मुहरा, सवारी-शिकारी, हजूर की खातिरदारी आदि में घर के धान पयार में मिलाने पड़ेंगे ।

अपने धर्म, कर्म, देश, जाति आदि से फिरंट रहना पड़ेगा, क्योंकि अब तो आपके पीछे उपाधि लग गई है! इसी से कहते हैं, उपाधि का नाम बुरा । उपाधि पाना अच्छा है सही पर ऐसा ही अच्छा है जैसा बैकुंठ जाना, पर गधे पर चढ़ के!

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