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पुस्तक समीक्षा : जैसे - कम शब्दों में किया गया विद्रोह


पुस्तक समीक्षा
कम शब्दों में किया गया विद्रोह
कुमार कृष्णन

दोहा में 24—24 मात्राओं से युक्त दो तुकान्त पंक्तियां होती है। प्रत्येक पंक्ति को दल या वाद कहते हैं। लय— सुषमार्थ प्रत्येक पंक्ति के मध्य में तेरह—तेरह मात्राओं पर एक एकैक बार यति(अल्पविराम)होती है,जिससे दोनो पंक्तियों में कुल चार चरण होते हैं। प्रथम एवं तृतीय चरण में 13— 13 और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11—11 मात्राएं होती है। विषम चरणों के अंत में दो—दो वर्ण प्राय: लघु—गुरू और सम चरणों के अंत में दो— दो वर्ण आनिवार्यत: गुरू— लधु होते हैं।
दोहा की मारक क्षमता अति तीक्ष्ण होती है। उदाहरण के तौर पर हम कबीर,रहीम तथा बिहारी जैसे कवियों को ले सकते हैं। दोहा लेखन की परंपरा आजा भी जीवित है और बहुतायत तौर पर दोहे ​लिखे जा रहे हैं,लेकिन पाठक को सम्मोहित और स्वपनविष्ट कर देने की सामथ्र्य भी हर दोहाकार में नहीं होती है। परन्तु दो दशकों में हरेराम समीप द्वारा जो दोहों की रचना की गयी है, वह विरल और स्पृहणीय सिद्धि है, जिसका जादू पाठको के सिर पर चढ़कर बोलता है। इसका मुख्य कारण है कि हरेराम समीप ने अपने दोहों को समकालीन यथार्थ के साथ जोड़कर लेखन किया है। इनके लेखन में जहां एक ओर ग्राम्य जीवन की विवशता है, वहीं दूसरी ओर उत्तर आधुनिकता के शिकंजे से छटपटाता नगर और महानगर है। मिशाल के तौर पर—
तकलीफों की आग से सुलग रहा देहात
महानगर जी मस्त हैं खेलें शह औ' मात
++++++++++++++
कह कर भी आए नहीं, बादल जी श्रीमान्
सूखे खेतों खड़ा, विनती करे किसान
++++++++++++++
रोज सुबह से शाम तक, करता रहूॅ हिसाव
ले डूबेगें एक दिन, मुझको तेरे ख्वाब
++++++++++++++
केवल धन अपना लगें, वांकी सब कुछ गैर
यहां नगर के लोग बस, मांगें अपनी खैर
दरअसल में हरेराम समीप का दोहा अपनी संरचना में सहज अभिव्यक्ति के साथ होता है और उसकी सहजता विचारों की सहजता के साथ विचारों के उध्र्वपातन से जुड़ी होती है। पाठ के अन्तर्गत व्यक्त विचारों को एक सामाजिक पाठ के साथ अभिव्यक्ति के रूप में ग्रहण करना होता है,क्योंकि दोहों में दोहाकार की शास्त्रीय हठधर्मिता के कहीं भी दर्शन नहीं होते हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि दोहाकार के अंदर समकालीन यर्थाय को अभिव्यक्ति देने की रूचि है न कि कागजी पृष्ठों पर खुद को दर्ज कर लेने भर की लालसा। आज हमारा समाज, सम्यता,संस्कृति और राजनीति को बचाए रखने के लिए जूझ रहा है, कोई भी साहित्यकार सामाजिक व्यक्ति होता है, जिसके भीतर यथार्थ निरूपम और अभिव्यक्ति देने की क्षमता होती है। साफ शब्दों में कहा जाय तो कोई भी यथार्यवादी साहित्यकार समाज का मार्गदर्शक होता है। इसी संदर्भ में दोहा संग्रह 'जैसे' में हरेराम समीप कहते हैं—
अपने स्तर पर किए, मैंने बहुत प्रयास
लेकिन जिद्दी वक्त को, कुछ न आया रास
++++++++++++++
इसलिए कहता रहूं, साहस का विनियोग
बुरे वक्त में कर सकूं मैं इसका उपयोग
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज की संत्रस्त और आशंकित भयभीत सम्यता की परेशानियों का सर्वोतम समाधान हरेराम समीप के दोहों में मिलता है। साथ ही भारत के विशाल और वहुविध सांस्कृतिक सामाजिक अनुभवों का एक नया दृष्टिकोण भी उपस्थित होता है।
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समीक्षित कृति— जैसे(दोहा संग्रह)
दोहाकार — हरेराम समीप
मूल्य— 125 रुपये
फोनिम पब्लिशर्स एण्ड डिस्टब्युटर प्रा.लि
चंद्र बिहार,मंडावली फजलपुर, दिल्ली— 110092

























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