रविवार, 20 दिसंबर 2015

सुशील यादव की ताज़ा ग़ज़लें


२२१    २१२१   १ २२१  २१२

1,

यूँ  आप  नेक-नीयत,  सुलतान  हो गए
सारे हर्फ   किताब के, आसान हो गए

समझे नहीं जिसे हम, गुमनाम लोग वो
हक़ छीन के  हमी से , परेशान  हो गए

कुनबा  नहीं सिखा सकता बैर- दुश्मनी
नाहक ही लोग , हिंदु-मुसलमान हो गए

सहमे  हुए जिसे ,समझा करते  बारहा    
बेशर्म- लोग जाहिल - बदजुबान हो गए

एक हूक सी उठी रहती,सीने में  हरदम
बाजार में  पटक दिए, सामान हो गए 

एक पुल मिला देता हमको, आप  टूटकर
रिश्तों की ओट आप, दरमियान हो गए


@@@
2
२१२२  १२१२ २२  सुशील यादव

तेरी दुनिया नई नई है क्या
रात रोके कभी, रुकी है क्या 

बदलते रहते हो,मिजाज अपने
सुधर जाने  से, दुश्मनी है क्या

जादु-टोना कभी-कभी चलता
सोच हरदम,यों चौकती है क्या

तीरगी , तीर ही  चला लेते
पास कहने को, रौशनी है क्या

सर्द मौसम, अभी-अभी गुजरा
बर्फ दुरुस्त कहीं जमी है क्या
 
सुशील यादव
४.१२.१५

१८४ :4.12,15

१२२ १२२ १२२ १२ सुशील यादव ....

3,
शहर में ये कैसा धुँआ हो गया
कहीं तो बड़ा हादसा हो गया
                        किसी जिद, न जाने, वहां था खड़ा     
                        शिनाख्त,  मेरा चेहरा हो गया                                
हुकुम का गुलाम, जिस की जेब हो   
शह्र  का वही, बादशा हो गया
                        हमारे वजूद की, तलाशी करो 
                        ये खोना भी अब, सिलसिला हो गया
ये चारागरों जानिब  खबर मिली
मर्ज ला इलाज-ऐ- दवा हो गया
                        अदब से  झुका एक, मिला  सर यहाँ       
                        'सलीका' 'सुशील' का   , पता हो गया 

सुशील यादव
4.
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
हंसी  सामने  चेहरा हो गया 
                        दबे पाँव चल के,गया था कहीं
                        शिकारी वही, लापता हो गया
मुझे देख,  'फिर' गई निगाह उनकी   
गुनाह कब ख़ास, इतना  हो गया
                        नही बच सका, आदमी लालची
                        भरे  पाप का  जो, घडा हो गया
छुपा सीने में  राज रखता कई
सयाना वो मुखबिर,  बच्चा हो गया
                            दबंग बन लूटा,सब्र की अस्मत  
                            इजाफा गुरुर, कितना हो गया
कहीं मातमी धुन सुना तो लगा 
अचानक शहर में  दंगा हो गया
 
@@ सुशील यादव @@१२२ १२२ १२२ १२@@९,१२,१५
 

5.
222222222 सुशील यादव
समझौते की कुछ  सूरत देखो
है किसको कितनी जरूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब 
लोगो की  अहम शिकायत देखो

लूटा करते   , वोट गरीबों के
जाकर कुनबो की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी  होती क्या  हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ
एक दिए की कितनी ताकत देखो

6.

२१२२ २१२२ २१२१  २२  सुशील यादव
साथ मेरे  हमसफर वो  साथिया नही है
लुफ्त मरने में नहीं ,जीने का मजा नहीं है

रूठ कर चल दिए तमाम सपने- उम्मीद 
इस  जुदाई जिन्दगी का जायका नहीं है

साथ रहता था बेचारा  बेजुबान सा दिल
ठोकरे, खामोश खा के भी गिना  नहीं है

आ करीब से जान ले, खुदगर्ज हैं नही हम    
फूल से न  रंज, कली हमसे  खपा नहीं है

शौक से लग जो गया,  उनके गले तभी से
लाइलाज ए मरीज  हूँ,  मेरी दवा नही है

7.
२१२२ २१२२ १२१२
साथ मेरे,  हमसफर साथिया नही
लुफ्त जीने का नहीं, कुछ मजा नहीं

जो दिया करती, कई बात झिडकियां
उन खताओं की  कहीं  अब सजा नहीं 

धूप में होते, फैसले हर  विवाद के 
छाँव-समझौते सरीखा  हुआ नहीं

आ मिला करती यहाँ, मोड़ पर कभी 
इस दफा वो , पांव -मुड़ता दिखा नहीं

भूलने की कोशिश- कवायद में हमे 
चाह  कुछ कमजोर होता  लगा  नहीं
  
इन   गुनाहों के कई राज- दार थे
पर किसी को  एक सुराग सा मिला नहीं  
@@@
8.

२१२२  २१२२ २१२
तुम नजर भर ये, अजीयत देखना   
हो सके, मैली-सियासत देखना
                ये भरोसे की, राजनीती ख़ाक सी  
                लूट शामिल की,  हिमाकत देखना
दौर है  कमा लो,  जमाना आप का  
बमुश्किल हो  फिर,  जहानत देखना
                     लोग कायर थे, डरे रहते थे खुद
                    जानते ना थे , अदालत देखना
तोहफे में 'लाख', तुमको बाँट दे
कौम की तुम ही, तबीयत देखना 
                   अजीयत =यातना ,जहानत = समझदारी


१२२ १२२ १२२ १२२ sushiil yaadav
9.

हथेली में सरसों कभी मत उगाना
अगर हो सके तो हमें भूल जाना

सितारों के आगे जहाँ क्या बनाए
बिखरता दिखे है, लुटा सा जमाना

कभी बदलियां हो उधर यूँ समझना   
कुहासे  घिरा है मेरा आशियाना

कवायद ये कैसी, कहानी कहाँ की
हमें खुद शर्म से, पड़ा सर झुकाना  

न चाहत के दम भरते,  रोते कभी भी
शिकायत का लहजा न लगता पुराना
१२.१२.१५
सुशील यादव ....
10.

                    रोने की हर  बात पे कहकहा लगाते हो
                    जख्मो पर जलता ,क्यूँ फाहा लगाते हो
गिर न जाए आकाश, से लौट के पत्थर
अपने मकसद का , निशाना लगाते हो
                        हाथो हाथ बेचा करो ,ईमान- धरम तुम
                        सड़को पे नुमाइश ,तमाशा लगाते हो
फूलो से  रंज तुम्हे ,खुशबू से परहेज
बोलो किन यादों फिर ,बगीचा लगाते हो
                        छन के आती रौशनी ,बस उन झरोखों से 
                        संयम सुशील मन  ,से शीशा लगाते हो
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Sushil Yadav

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