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अनंत वडघणे का आलेख - हिंदी सिनेमा और कमलेश्वर

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हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर कमलेश्वर। जिन्होंने साहित्य मीडिया और सिनेमा जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। उसके पहले प्रेमचंद जैसे मेघावी कथाकार सिनेमा जगत में चले तो गये किन्तु वहां की चकाचौंध दुनिया तथा फिल्म निर्माताओं को अपेक्षित कथा लेखन के साथ समझौता नहीं कर सके। क्योंकि उनकी सिनेमा से एक सामाजिक कटिबद्धता की अपेक्षा थी। पर निर्माताओं के द्वारा सिनेमा को केवल व्यवसाय के धरातल पर देखने के कारण वे सिनेमा से वे जुड़़ नहीं सके। यथा-"यहां जो कुछ है, वह सिनेमा के मालिक लोगों के  हाथों में है। लेखक को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता, वह तो पैसा कमाना चाहते हैं।"१ पर कमलेश्वर ने ऐसे दुनिया के साथ सामंजस्य स्थापित किया। एक तरफ वे साहित्यिक आंदोलन को सम्भालते हैं। तो दूसरी ओर मीडिया के क्षेत्र में अपने कर्तृत्व के धरातल पर चंद्रकांता, युग, परिक्रमा के माध्यम से जनकार्य करते हैं। ऐसे समय उनकी लेखनी सिनेमा की ओर भी नजरअंदाज नहीं करती, बल्कि वहां भी समांतर सिनेमा आंदोलन खड़ा कर सिनेमा को भी लोकाभिमुख बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इस संदर्भ में राजीव श्रीवास्तव लिखते हैं कि,"साहित्य की गौरवशाली परम्परा का पोषक बन कर पहली बार जिस हिंदी साहित्यकार ने हिन्दुस्तानी सिनेमा के व्याकरण को समझ कर स्वयं को साहित्य और फिल्मों में समान रुप से प्रासंगिक साबित किया, वे थे कमलेश्वर।"२

     कमलेश्वर ने सिनेमा की कई पटकथाएं लिखी। इसके अलावा उनके उपन्यासों पर भी फिल्में बनी, जिसके  पीछे उनके समन्वय करने वाले व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। उन्होंने 'आधा दिन आधी रात', 'आँधी', 'मौसम','बर्निंग ट्रेन', 'मि. नटवरलाल', 'अमानुष', 'पति, पत्नी और वो', 'राम बलराम', 'सौतन','बदनाम बस्ती', 'डाक बंगला','बरसात की एक रात' आदि। 'बरसात की एक रात' इस फिल्म के कहानी के लिए कमलेश्वर को सर्वोत्तम कहानी का फिल्म फेयर अवार्ड भी दिया गया है। कमलेश्वर ने कई फिल्मों की कहानी तथा संवाद लेखन भी किया। जिसके कारण उन्हें साहित्य जगत, मीडिया जगत के अलावा फिल्म संसार में भी पहचाना जाने लगा। ऐसे समय कई समस्याओं तथा धोखाधड़ियों का भी शिकार उन्हें होना पड़ा। परंतु कमलेश्वर ने उस बात की कभी परवाह नहीं की और सिनेमा जगत के साथ जुड़े रहे। 'आंधी', फिल्म के संदर्भ में उन्हें किस तरह अपने कार्य से बेदखल किया गया। उस बारे में गायत्री कमलेश्वर कहती है कि-"आंधी पिक्चर बहुत चली जो कि कमलेश्वर जी के उपन्यास 'काली आंधी' पर बनी थी। फिल्म पर नाम देते वक्त लिखने का सारा श्रेय गुलजार ने ले लिया। उन्होंने Written और Directed by Gulzar लिखकर सिर्फ स्टोरी पर कमलेश्वर जी ने जे ओमप्रकाश से कहानी तय हो जाने के बाद, भोपाल के  जहाँनुमा होटल और दिल्ली के  अकबर होटल में लिखी थी। कमलेश्वर जी को उसका बहुत दुःख हुआ। एक बार घर पर ही उन्होंने गुलजार से पूछा तो उन्होंने गोलमोल-सा उत्तर दिया-भाई साहब, फिल्म तो सेलोल्योइड पर लिखी जाती है, उसे डायरेक्टर ही लिखता है।"३ इसी के अलावा राजेंद्र यादव की कहानी पर बनी फिल्म 'सारा आकाश' के संदर्भ में भी उन्हें अपने अधिकार से वंचित होना पड़़ा था। यथा-" 'सारा आकाश' से कमलेश्वर ने अपने कलम का जादू सिनेमा में बिखेरा। राजेंद्र यादव की कहानी पर बनी 'सारा आकाश' की पटकथा एवं संवाद कमलेश्वर ने लिखे, मगर फिल्म के क्रेडिट में उन्हें इसका श्रेय नहीं दिया गया।"४ इस तरह कमलेश्वर  को कई कठिनाईयों से होते हुएं गजरना पड़़ा। पर कमलेश्वर ने ऐसे कठिनाईयों का बड़़े सहजता से सामना किया। क्योंकि उन्हें सिनेमा को एक विशिष्ट राह पर ले जाना था। जो मनुष्य को राह दिखाने का कार्य करें। " 'सारा आकाश' फिल्म अच्छी बनी है। बासु चटजी ने फोन किया कि मैं नाराज तो नहीं हूं, क्योंकि पटकथा-लेखक के रुप में उसमें मेरा नाम नहीं दिया गया है...एक क्षण के लिए यह बात खटकी तो थी, पर मुझे कोई खास बुरा नहीं लगा। नयी फिल्मों का यह आंदोलन यदि इन बातों को लेकर बिखर गया, तो दस साल तक फिल्मों का कुछ बननेवाला नहीं है। मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा, ताकि ये लोग काम कर सकें और यह आंदोलन कुछ रुप ले सके।"५ इस प्रकार कमलेश्वर सिनेमा जगत को एक आंदोलन के भांति देखते थे। क्योंकि वे जानते थे कि यही वह माध्यम है। जो समाज के सभी तबकों तक पहुंच सकता है। साथ ही इसी के माध्यम से समाज में नई चेतना लायी जा सकती है।

     कमलेश्वर ने सिनेमा जगत में एक साहित्यकार के रुप में सबसे पहले अपनी पहचान बनाई है। इसलिए 'हिंदी साहित्य और सिनेमा' के संदर्भ में लेखन करे तो कमलेश्वर का नाम सबसे पहले आता है। परंतु कमलेश्वर अपने पुरोधों का आदर करते हैं। उन्हें प्रथम स्थान दे कर उनके आगे नतमस्तक हो जाते हैं। बम्बई में जब फिल्म-सीटी के उद्घाटन प्रमुख श्री.रामगवाले जी ने फोन कर फिल्म सिटी के उद्घाटन के अवसर पर किसी साहित्यिक का लिखा संवाद बोले जाए अगर किया गया। तब 'बरसात की एक रात' जिसकी स्किप्ट और संवाद कमलेश्वर ने लिखे थे। वे अमिताभ बच्चन की आवाज में बोले गये। ऐसे साहित्यकार के सम्मान के अवसर पर कमलेश्वर उस श्रेष्ठ साहित्य सम्राट प्रेमचंद को याद करते हैं। जिन्होंने फिल्म लेखन की शुरुआत एक हिंदी साहित्यकार के नाते की थी। उसी साहित्यकार का आज एक तरह से सम्मान हो रहा था। तब कमलेश्वर प्रेमचंद जहां रहते थे उस जगह जाकर उनके प्रति नतमस्तक होते हैं। यथा-"उस उद्घाटन से पहले वह पता लगाकर दादर की उस बिल्डिंग में गया था, जहाँ अपने फिल्म लेखन के दौरान प्रेमचंद रहे थे। उस जगह को सबसे पहले विनत प्रणाम करके  आया था...शायद वह अपने अग्रजों की अधूरी सार्थकता की टूटी हुई परम्परा को जोड़़ने का विश्वास बटोरने लगा था-वहां! ऐसे तमाम भावनात्मक क्षणों में हमेशा उसने अपने माथे को कहीं-न-कहीं कृतज्ञता से -झुकते पाया है। शायद यही उसकी आन्तरिक शक्ति का स्त्रोत रहा है।"६ कमलेश्वर के व्यक्तित्व की विनम्रता का ऐहसास होता है। साथ ही साहित्यिक जगत के साथ लगाव के भी दशन होते हैं। इस तरह कमलेश्वर ने जबतक सिनेमा जगत से सम्बन्ध बनाये रखे। तबतक साहित्य और सिनेमा में मजबूत पकड़़ बनाये रखने का भरसक प्रयास किया। ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के संदर्भ में रणजीत साहा कहते हैं कि-"हिंदी फिल्मों और टेलिविजन माध्यम से सम्बन्ध रहे साहित्यकारों में भी कमलेश्वर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम है। उनकी कई कहानियों ने फिल्म और टेलीविजन माध्यम और फिल्म व्यवसाय को सामाजिक संवेदना एवं कलात्मक ऐंद्रिकता प्रदान की है। हिंदी फिल्मों में मुंशी का पर्याय रहे  लेखक को, कमलेश्वर ने एक नई पहचान और प्रतिष्ठा दी। फिर भी 'सारा आकाश', 'आंधी', 'अमानुष', और 'मौसम', कलात्मक फिल्मों से व्यावसायिक फिल्मों तक कमलेश्वर ने कुल ९९ किया। वे एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक दायित्व के रुप में व्यावसायिक कला माध्यम से भी गहरे  जुड़़े रहे और इसे एक नया वैचारिक धरातल देने की सफल और सार्थक पहल की।"७ वर्तमान समय में कमलेश्वर के विचारोंवाले लेखकों की फिल्म लेखकों की आवश्यकता है। जो फिल्म के बदलते रुप को एक सही दिशा दे सकें। क्योंकि आज फिल्म नवयुवकों के आकर्षण का केंद्र बिंदु है और यह युवक ही दिशाहीन बन जाये तो देश का भविष्य क्या होगा?। 'कमलेश्वर का सिने-संसार' में पुनः एक कमलेश्वर की जरुरत आज आवश्यक मानते हुए राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि- "साहित्य और सिनेमा को एक सहज सूत्र में पिरो कर कमलेश्वर ने जो उच्च मापदंड स्थापित किए है, उसकी डोर अभी बरकरार है। आज जरुरत है उस शख्स की, जो इस डोर को मजबूती से थाम कर कमलेश्वर की परम्परा का वाहक बन सकें फिल्मों के व्यापक असर को देखते हुए आज स्तरीय साहित्यिक दृष्टि की आवश्यकता और भी गहन हो चुकी है। बस अब इंतजार है, एक कमलेश्वर का।"८

     अतः कह सकते हैं कि कमलेश्वर जिस तरह साहित्यिक क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उसी भांति हिंदी सिनेमा के इतिहास में भी उनका कार्य महत्वपूर्ण रहा हैं। जब जब हिंदी साहित्यकार का फिल्मों में योगदान की बात सामने आ जाएंगी। तब तब कमलेश्वर का नाम सबसे पहले होठों पर होगा। जिन्होंने साहित्य और सिनेमा में समन्वय का महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वे आज भी  साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में अपनी याद ताजा बनाते हैं...

 

संदर्भ

१. प्रेमचंद घर में - शिवरानी देवी प्रेमचंद.पृ.२१४

     २. कमलेश्वरःचंद यादें,चंद मुलाकाते-सं.आचार्य सारथी 'सारथी'.पृ.२२१

     ३. मेरे हमसफर कमलेश्वर- गायत्री कमलेश्वर.पृ.५३

४. विरासत के अलमबरदार कमलेश्वर- सं.प्रदीप मांडव, अजय बिसारिया.पृ.३१५

५. वही.पृ.३१८

६. जलती हुई नदी- कमलेश्वर.पृ.१०६

७. विरासत के अलमबरदार कमलेश्वर- सं.प्रदीप मांडव, अजय बिसारिया.पृ.३८

८. कमलेश्वरःचंद यादें,चंद मुलाकाते-सं.आचार्य सारथी 'सारथी'.पृ.२३२

अनंत वडघणे

                                                                                                                हिंदी विभाग,

                                                                                                    डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा

                                                                                                       विश्वविद्यालय,औरंगाबाद.

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