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सेवकाई (हास्य-व्यंग्य) - प्रदीप कुमार साह


आँगन में जया अपने माँ के हाथों लगातार पीटती और जोर से रुदन करती जा रही थी. रोने-पीटने की आवाज सुनकर बरामदे में चारपाई पर लेटे दादाजी उठकर अपना चश्मा संभालते हुये बैठ गये. वे आँगन में जाकर बीच-बचाव करने के प्रयत्न तो नहीं किये, अपितु अपने जगह पर बैठे-बैठे ही जोर-जोर से खाँसने जरूर लगे. उनके खाँसने का अर्थ था अपनी नाराजगी प्रकट करना कि उन्हें वह सब पसंद नहीं. उनके खाँसने से जया की माँ सहमकर उसे पीटना बंद तो जरूर कर दिये किन्तु आँगन में उसकी झिड़की और जया का रोना अब भी बरकरार था.

उस घर में बच्ची (जया)के रोने-पीटने के वह मामले और वजह कोई नये नहीं थे. उन घटनाओं का प्रतिकृति (दुहराव) इस घर में महीने-पंद्रह दिनों में अवश्यम्भावी था. दादाजी को वह 'सब कुछ' बिलकुल भी पसंद नहीं, किंतु उन पूर्व-प्रत्याशित घटना (प्रतिकृति) पर अब मन मसोस कर चुप रह जाने पड़ते हैं. दादाजी कुछ करें भी तो आखिर क्या? उनके जमाने तो न जाने कब लद गये और वह 'सब कुछ' (प्रतिकृति) बदलते युग और परिवेश के प्रभाव हैं. अभी के समय और परिस्थिति में उनके सारे विचार, उनकी सारी मान्यताएं पुरानी और आउट-डेटेड माने जाते हैं. शायद इसी वजह से उनके विचार नकारे भी जाने लगे हैं, बिलकुल युगों-युगों से चली आ रही 'नकारने' की सनातन परंपरानुरूप.

उनकी मान्यता इस घर में केवल उस बात के लिये हैं कि वह कैलाश के पिता हैं और घर में बुजुर्ग (मतलब सबसे उम्र-दराज व्यक्ति मात्र) हैं. इसलिये नहीं कि वे सबसे ज्यादा तजुर्बेदार हैं, क्योंकि उनके तजुर्बे तो रूढ़वादी, संकीर्ण,पुरानी और आउट-डेटेड विचार मात्र हैं. भला पुरानी और आउट-डेटेड चीजों की जरूरत ही क्या, जो उसका कद्र और सम्मान हों? फिर युग बदलाव और मौसम बदलाव तो क्रमश: सभ्यता और प्रकृति के सनातन चक्र है. इसलिए उनका अपनी असहमति और नाराजगी जताने का एकमात्र साधन खाँसना ही रह गये हैं. वैसे खाँसी बदलते मौसम के परिचायक भी हैं. खैर, उन मुद्दों पर चर्चा से बेहतर मुख्य बिंदु पर समयानुसार विचार करना ही उचित मालूम होता है. मुख्य मुद्दे हैं जया का पीटा जाना, सो उसके पीटने-पिटवाने की वजह है उससे टिके अपेक्षाओं पर उसके खड़ा उतरने हेतु जद्दोजहद करने की प्रेरणा प्रदान करना.

और वह अपेक्षा भी बेशक अकाटनीय ! जया से उसके अभिभावक की अपेक्षा यह है कि वह कबीर दासजी के आउट-डेटेड दोहे 'ढ़ाई आखर प्रेम के'झांसे में ना आए, अपितु वर्तमान परिवेश के अनुरूप उच्च शिक्षा प्राप्त करें. वह शिक्षा जिसका औचित्य और गुणवत्ता ही हैं कि उससे जीवन में महज इतनी मानवीय मूल्यों का समझ, संयम, नम्रता और अनुशासन वगैरह संस्कार आए कि आपाधापी भरे जीवन और परिवेश में किसी चाकरी-सेवकाई ( क्षमा करें केवल नौकरी नहीं,आज के युगानुसार सरकारी नौकरशाही)में अपनी पैठ बनाने में सक्षम हों. युगनुसार कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, पुण्य-अपुण्य, उपदेश और कर्तव्य-बोध की विवेचना और परिभाषाएँ तो स्वतः बदल जाते हैं. फिर वह पुरानी कहावत भी तो हैं क़ि दुनियाँ वैसे ही दिखेगें जैसा आप देखना चाहो. बस जरूरत होती है अपने लिये 'उपयुक्त' चश्में कबूलने की.

शुभ संयोग से वह परंपरा हमारे देश में भी शाश्वत-सनातन कायम है. जिसे देखो बड़ी चतुराई से वही, अपने-अपने मजहब के पुस्तकों-ग्रन्थों, कुरनों-पुराणों से अपने मतलब के जितना उद्धरण कहते-सुनते और स्वहित हेतु उनकी विवेचना करते मिल जाते हैं. खैर आपाधापी के इन परिवेश में आदमियत और अत्मीयत की बातें कौन करे? सबसे बड़ी बात है मलाईदार और आराम तलब से आजीवीकोपार्जन के साधन-नौकरी की. बुढ्ढे-खुँस्ठ दादाजी की नजर में वह बेशक महज चाकरी, सेवा-सेवकाई हों, निकृष्ट धर्म हों. अब जबकि धर्म नाम के चीज का कोई विशेष महत्व न रह गये हों फिर धर्म निरूपक उन आउट-डेटेड दोहों का क्या कि "उत्तम खेती, मद्ध्यम बान(व्यापार)निकृष्ट चाकरी,भीख निदान." आज के परिपेक्ष में तो वह क्रम ही बिल्कुल उल्टे पड़ गये.

फिर चाकरी मिलनी न तो तब आसान रहा होगा न नौकरशाही मिलनी अब. अन्यथा गोस्वामी तुलसीदास जी यह क्यों कहते कि सेवक वही हो सकते जिसमें सेवा भाव हों. आजकल तो सेवा भाव की अनिवार्यता नहीं हैं! पहले नमक हलाली और नमकहरामी जैसे शब्द सेवा की कोई पैमाना हुआ करते थे, आज हर कोई जानता है कि जिधर पैसा उधर सेवा. पहले सेवा बल से 'अपने बश करि रखिहहिं रामु' आदर्श थे, अब सेवा भार (तनख्वाह)ते रोदहिं देवा (जनता-जनार्दन जो नौकरशाहों के वास्तविक सरकार/मालिक हैं) की शंखनाद हैं. पहले आधे कपड़ों में पसिने से लथपथ और नींद से बेहाल किंतु रात भर जागकर पंखे झलने को विवश किसी भोले-मूर्ति 'सेवक अथवा चाकर' समझे जाते थे, अब दफ्तर में पड़े काम से बेफिक्र रहकर पान की गिलौरी चबा-चबाकर आराम से गप्पें लड़ाते महानुभाव ही नौकरशाह हैं जिनके सामने रोजाना सैकड़ों नंगे-भूखे सरकार (निरीह जनता-जनार्दन)गिड़गिड़ाते हैं. खैर सेवक चाहे जैसे हों; युग चाहे कोई हों, सर्वमान्य तथ्य है कि सेवक के बिना काम नहीं चल सकता. इसलिये 'करहिं सदा सेवक सो प्रीती' सर्वत्र समचरित्रार्थ, शाश्वत सत्य और सदैव अनुकरणीय है. इस हेतु युगों-युगों 'सेवकाई' अक्षुण्ण बना रहेगा.

रही बात सेवक के भाव में समर्पण की! पहले बड़े-बड़े सेवा कार्य करते हुये भी हनुमान सरीखे सेवक सदैव अहंकार से मुक्त रहते हुये स्वामी से निवेदन करते थे कि सारा प्रताप उन्हीं के हैं, वह कुछ भी नहीं. हमेशा अपने स्वामी के मुख तकते रहते थे कि सेवा के अवसर उन्हें ही मिले. यदि सेवा से प्रसन्न होकर कभी उन्हें ईनाम स्वरूप मनको की हार प्रदान किये जाते तो उन्हें दू:ख अनुभव होते, लगता था कि उनके सेवा भाव में ही कोई खोट रह गयीं. आज हालात बदल गए हैं.अब बॉस के मुख केवल तभी देखे जाते हैं जब उनसे मन माफिक काम लेने हो अथवा उनका संरक्षण चाहिये हों. सरकारी महकमें में यदि बश चले तो कुछ नौकरशाह अपने बाँस अथवा स्वयंभू सरकार (जनता) के मुख भी देखना ना चाहें. भूले-भटके कोई सरकार (जनता)उनके सामने पड़ जाये तो डॉट-झिड़ककर भगाने की पहली कोशिश हो.कुछ तो अग्रिम इनाम (घुस अथवा रिश्वत कहने की दुस्साहस कतई नहीं कर सकते)के बगैर उनकी बातें सुनना भी अपने नाम-प्रतिष्ठा पर प्रश्न चिह्न समझते हैं और शायद ही उन्हें गवारा हों.

दादाजी भी वह 'सब कुछ' शायद 'एक हद' तक समझते हों और मजबुरी महशुश करते हों तभी तो चुप रह जाते हैं-बिलकुल महाभारत के महायुद्धकालीन भीष्म पितामह के भाँति,जो अतुलनीय तो थे किंतु अभी निरंतर कुरू-सम्राज्य के अवश्यंभावी पतन की आशंका से चिंतित, दुर्योधन के कटु वचन और पांडव के शर -घात सहन करने हेतु विवश और असहाय थे. जिनके एकमात्र अवलंब तो अभी अश्रु ही थे परंतु विवशता इतनी की उसका सहारा भी नहीं ले सकते थे. आज दादाजी भी खाँसते तो हैं, किंतु एक थके,कमजोर और बेहद मन्दे(सधे) स्वर में. पता नहीं उनके खाँसी भी किसी को कब असहनीय हो जाये.



(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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