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दीपक आचार्य का आलेख - ये काहे के इंसान जिनसे भय लगे

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एक जमाना था जब जंगली और हिंसक जानवरों से इंसान हमेशा भयभीत रहता था, उनसे डर के मारे दूर रहता था और हमेशा यह प्रयास करता था कि उनके नजदीक जाने का कोई मौका न आए, क्योंकि पता नहीं कब हमला कर लहूलुहान कर दे, कुछ अनर्गल बक दे, मार डाले और पूरा का पूरा कच्चा चबा जाए।

इस वजह से जंगलों से होकर गुजरते समय या रात-बिरात कहीं आवागमन की विवशता पर लोग समूहों में परिभ्रमण करने को विवश थे। उस जमाने में लोग कम थे और हिंसक व क्रूर जानवरों की संख्या ज्यादा थी।

साँप-बिच्छुओं और अजगरों से लेकर तरह-तरह के पशु-पक्षियों का ताण्डव अतीत में रहा है। अब न जंगल रहे, न जंगली जानवर। अब सभ्यता के तथाकथित और छद्म पहरुओं से संसार भरा है जहाँ तरह-तरह की सभ्यता, संस्कृति और नवाचारों का दिग्दर्शन हो रहा है।

समय ने इतना पल्टा खा लिया है कि अब सारे जंगली, हिंसक और क्रूर जानवरों का स्वभाव आदमी में आ गया है। दुनिया में अब सबसे अधिक खूंखार और शैतान कोई है तो वह आदमी से अधिक और कोई नहीं।

यह आदमी ही है जिसकी वजह से दुनिया खा़ैफज़दा है, पता नहीं आदमी कब क्या कर डाले, क्या कर गुजरे। अब आदमी का कोई भरोसा नहीं रहा। आदमी अब सब कुछ कर सकने को स्वतंत्र है, स्वच्छन्द और उन्मुक्त है। उसका विश्वास अपने स्वार्थ और खुदगर्जी पूरी होने में ही सिमटा है।

आदमी को जितना अधिक सामाजिक प्राणी समझा जाता रहा है वह समझ समाप्त हो गई है। साम्राज्यवाद, आतंकवाद, हिंसा, रक्तपात, घोर पाशविकता और अपने लिए जीने की जिस मनोवृत्ति को आधार बना कर आदमी जी रहा है उसने समाज, देश और दुनिया का कबाड़ा कर डाला है।

आज का देशज और वैश्विक माहौल सभ्यता, अहिंसा, संतोष, सद्भाव और शांति की जितनी खिल्ली उड़ा रहा है उसने मानवता के सारे प्रतिमानों को ध्वस्त कर दिया है। सब कुछ ऎसा हो रहा है जैसे कि आदमी जंगलराज की ओर लौट रहा और कबीलाई युग की पुनर्स्थापना में जुटा है।

बात दुनिया के किसी कोने की हो या अपने आस-पास की। सब तरफ कुछेक लोग ऎसे दिखने में आ ही जाते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये बदतमीज लोग दूसरों को भयभीत, दुःखी और तनावग्रस्त करने के लिए ही पैदा हुए हैं।

कुछ लोग ऎसे भी हैं जिन्हें देखकर भय लगता है, कुछ के पास जाने से लोग कतराते हैं और उनसे दूर रहने में ही खैरियत समझते हैं। बहुत से लोग हैं जिनके आगमन की आहट से ही माहौल में भय, तनाव और विषाद फैल जाता है और लोग चाहते हैं कि ऎसे खूंखार इंसानों से जितनी जल्दी हो, मुक्ति पा ली जाए, उतना ठीक।

बहुत सारे लोग अपने आपको सहृदय, सहिष्णु, धीर-गंभीर, सर्वस्पर्शी, संवेदनशील और विनयी बताने में कोई कसर नहीं रखते मगर हकीकत यह है कि यह सब उनकी ओढ़ी हुई चादरें होती हैं। असल में इनसे बड़े क्रूर और हिंसक लोग दूसरे नहीं हो सकते। 

बहुत सारे बड़े-बड़े और महान लोग अपने आपको संप्रभु-सर्वशक्तिमान सिद्ध करने के जतन करते रहते हैं लेकिन इनमें मानवता, सामाजिकता और विनम्रता का लेश मात्र भी अंश नहीं होता। इन लोगों से आस-पास वाले भी भय खाते हैं, साथ रहने वाले भी हमेशा तंग रहते हैं।

इन पाखण्डी दुष्टों के लिए कई सारे नाम प्रचलित हो जाते हैं जैसे कि खडूस, सनकी, गुस्सैल, रावण, जानवर, चिड़िचिड़ा, दुष्ट, नालायक, हिटलर, कुत्ता-कमीना आदि-आदि। आजकल सब जगह ऎसे-ऎसे लोग हैं जिनके बारे में लोगों की पक्की धारणा बनी होती है कि ऎसे लोग इंसान के भेस में जानवर हैं जिनमें हर तरह से वे तमाम लक्षण कूट-कूट कर भरे हुए हैं जो किसी माँसाहारी, क्रूर और हिंसक पशुओं और सरिसृपों में होते हैं।

यही नहीं तो लोग इन्हें ऎसा हाईब्रिड मानते हैं जिनमें घातक जानवरों और राक्षसों दोनों के मिश्रित लक्षण पाए जाते हैं। समुदाय भर में अधिकांश लोगों के संत्रासों और तनावों का मूल कारण कोई समस्या नहीं होती, न ही किसी तरह के अभाव हैं बल्कि इनके तनावों, बीमारियों और दुःखों के महान और असाध्य कारण उस किस्म के लोग हैं जो बदतमीज हैं, जिनमें बोलने का कोई भान नहीं हैं, हमेशा दूसरों पर गुस्सा करते हुए पागल कुत्तों की तरह गुर्राते और भौं-भौं कर काटने दौड़ते हैं, साँप-बिच्छुओं की तरह हमेशा शिकार की तलाश में लगे रहते हैं अथवा आँखें लाल सूर्ख करते हुए पैंथर की तरह किसी पर भी झपट कर ऎसे उतारू रहा करते हैं जैसे कि फाड़ खाने को ही उतावले हों।

बड़े से बड़ा आदमी भी आजकल जानवरों और असुरों की तरह व्यवहार करने से नहीं हिचकता। हर क्षेत्र में बहुत सारे लोग ऎसे हो गए हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन लोगों को न ईश्वर का भय है, न इंसानियत से कोई लेना-देना।

कई तरह से सायास-अनायास शक्ति प्राप्त कर लेने वाले तथा दूसरों के टुकड़ों पर पलने टुच्चे लोगों में यह पैशाचिक स्वभाव कुछ अधिक ही देखा जाने लगा है। अब जंगल रहे नहीं, इसलिए ये हिंसक और जहरीले जीव कहां जाएं। भगवान के घर भी यही संकट है।

बार-बार मरकर इनके उपर आ जाने से परेशान भगवान ने ही लगता है कि इन्हें इंसान के खोल में ढाल कर भेज दिया है ताकि कुछ अर्से तक तो भगवान को इनसे मुक्ति मिले। इन लोगों के स्वभाव और हरकतें देख कर तो यही लगता है कि इन्हीं हिंसक जानवरों का पुनर्जन्म इंसान के रूप में हुआ है।

यकीन न हो तो अपने इलाके के ऎसे दुष्ट लोगों के व्यवहार को बारीकी से देखें, अपने आप पता चल जाएगा कि इनका जिस्म कितने सारे जानवरों से मिलकर बना है। भगवान पशुपतिनाथ को प्रणाम करें और उनसे प्रार्थना करें कि पूरी जिन्दगी ऎसे लोगों से हमारा पाला न पड़े क्योंकि इन लोगों के साथ संभाषण, खान-पान और व्यवहार से भी घोर पाप लगता है और नरक मिलता है।

हम अपने आपको भी देखें, अपने बारे में आत्मचिन्तन करें, कहीं हमारे व्यवहार और स्वभाव पर तो किसी हिंसक जानवर या असुर की छाया नहीं है। कहीं हमें भी तो लोग उनमें नहीं गिनते जिन्हें दुष्ट और पापी मानते हैं।

वरना लोग अपनी शालीनता, भय और दबाव के कारण सामने कुछ न बोल पाएं, मगर उनकी आत्मा में तो सच को स्वीकार करने का अदम्य साहस है।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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