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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - अभिजात्य निःशक्त

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हम सभी के शरीर को भगवान को इतना सक्षम बनाया है कि हम अपने काम खुद कर सकें और जहां तक हो सके किसी की मदद न लें। सभी अपने-अपने काम स्वतंत्रतापूर्वक एवं पूरी आसानी से करते रहें, तभी सृष्टि अपने आप चलती रह सकती है।

उन लोगों की बात अलग है जो किसी न किसी जन्मजात अशक्तता से ग्रस्त हैं अथवा किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण शक्तिहीन हो चुके हैं अथवा किसी भी वजह से परेशान हैं। पर इनका प्रतिशत नगण्य है। 

कुछ दशक पहले तक हर आदमी अपने काम खुद कर लिया करता था, किसी के भरोसे नहीं रहकर अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी पूरी मस्ती के साथ जीता था, किसी की सेवा लेना  या किसी से अपनी सेवा-सुश्रुषा कराना पसंद नहीं करता था।

यहां तक कि बुजुर्गावस्था में पहुंच जाने के बाद भी इंसान भगवान से यही प्रार्थना किया करता था कि उसे इस तरह उठा लेना कि किसी से सेवा नहीं करानी पड़े। किसी दूसरे से सेवा लेने या कराने तक को पाप समझा जाता था और हर आदमी इससे बचने की हरसंभव कोशिश करता रहता था।

सर्वसमर्थ और शक्तिमान आदमी ने आलस्य, प्रमाद और प्रभुत्व से ग्रसित होकर अपनी क्षमताओं को भुला दिया और अब मामूली से कामों के लिए भी उसे दिन में कई-कई बार दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। इस दृष्टि से हम सभी लोग अब निःशक्तों की श्रेणी में आ गए हैं।

निम्न और आधे मध्यम वर्ग में आने वाले लोगों को छोड़ दिया जाए तो  तकरीबन आधे मध्यम वर्ग और नब्बे फीसदी उच्च वर्ग में तो यह निःशक्तता इतनी घर कर गई है कि इसका कोई पार नहीं।

हाल के वर्षो में अभिजात्य निःशक्तों का एक बहुत बड़ा वर्ग हमारे सामने आकार ले चुका है जिसे देखते ही लगता है कि वाकई इनसे बड़ा निःशक्त कोई नहीं हो सकता। सब कुछ कर पाने का सामथ्र्य और शक्ति होने के बावजूद इन निःशक्तों से वे काम भी नहीं हो पाते जो कि एक सामान्य से सामान्य इंसान आसानी से अकेले कर डालता है।

दिमागी तौर पर अपने आपको सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ, अधिकार सम्पन्न, संप्रभु और सर्वशक्तिमान मानने वाले इन अभिजात्यों का शरीर निःशक्तता से इतना अधिक ग्रस्त होता है कि ये अपने काम भी नहीं कर पाते। खान-पान, रहन-सहन, लोक व्यवहार, परिभ्रमण से लेकर रोजमर्रा के तकरीबन सारे कामों में ये लोग दूसरों के भरोसे ही रहा करते हैं, खुद का कोई सा काम खुद नहीं कर पाते।

मानसिकता रखेंगे शहंशाहों की, बराबरी करेंगे भगवान से,  और काम-काज तथा शरीर संचालन के मामले में निर्बल मजदूर से भी गये बीते हो गए हैं ये अभिजात्य निःशक्त। अटैची पकड़ने, चाय-पानी पिलाने, घर के काम करने, खाना बनाकर खिलाने, गाड़ी का दरवाजा खोलने, सेल्यूट कर स्वागत करने, ऑनर देने, बाय-बाय करने, पानी की बोतल उठाकर रखने, फाईलें बांधने और लाने-ले जाने, जूते पहनाने से लेकर अपने और घर के सारे काम-काज करने के लिए इन्हें कोई न कोई हमेशा चाहिए होता है।

जबकि ये सारे काम ये अपने बूते कर सकते हैं पर हूजूरियत और अभिजात्य मार्के का अहंकार ही ऎसा पड़ा होता है कि बेचारे कुछ भी नहीं कर पाते, सब कुछ दूसरों के भरोसे ही चल पाता है। पता नहीं और कौन-कौन से काम के लिए औरों के भरोसे रहा करते होंगे।

अभिजात्यों के इस संप्रभुत्व के आगे सब कुछ गौण है। इनके घर वाले भी इन्हीं की तरह पराश्रित ही हो जाते हैंंं। इस तरह अभिजात्यों के लिए पूरे घर के लोग निःशक्तता से प्रभावित होकर दूसरों के भरोसे रहा करते हैं।

पता नहीं सभी प्रकार का सामथ्र्य होते हुए भी औरोें को अपना प्रभुत्व दिखाने, जमाने भर में वर्चस्व स्थापित करने और झूठी प्रतिष्ठा के लिए हमें निःशक्त बने रहना क्यों भा गया है।  अभिजात्य वर्ग में घुसपैठ करती जा रही इस शहंशाही किन्तु निकम्मेपन, आलस्य और प्रमाद की मानसिकता के कारण भले ही लोक में उनका मिथ्या वर्चस्व और वैभव स्थापित होता दिखाई दे, असल में ये लोग एक समय बाद शारीरिक के बाद मानसिक निःशक्त भी हो ही जाते हैं।

यही वजह है कि हर अभिजात्य निःशक्त अपनी सेवा निवृत्ति के बाद आईसीयू वार्ड में अक्सर ही देखे जाते हैं अथवा किसी के सहारे अस्पतालों के चक्कर काटते हुए इन्हें सहज ही देखा जा सकता है। दुनिया के अधिकांश गंभीर मरीजों में भी इन्हीं की संख्या सर्वाधिक होती है।

इनमें भी अधिकांश लोग ऎसे हो जाते हैं कि घुटने जवाब दे जाते हैं, न चल-फिर पाते हैं, न बुढ़ापे का सुकून ले पाते हैं। घर की खटिया से लेकर आईसीयू की शैय्याओं तक इनका सफर तब तक चलता रहता है जब तक कि जय सियाराम न हो जाए।

इनका जय सियाराम हो जाना उन सभी लोगों के लिए वरदान सिद्ध होता है जिनकी सेवाएं लेकर ये आयु पूरी करते हैं।  ऎसे लोगों के जाने के बाद सभी लोग शांति और सुकून का अहसास करते हैं और इनका नाम ले लेकर कोसते हैं।

भगवान को भी कोसते हैं कि आखिर ऎसे निखट्टुओं को उसने क्यों पैदा किया होगा जो  अधीनस्थों और दूसरों का शोषण करते हुए आयु पूरी करते हैं और जब ऊपर जाते हैं तब भी समाज और मातृभूमि के लिए कुछ भी सौंप नहीं जाते।

इस किस्म के अभिजात्य निःशक्तजन अब दुनिया में खूब पैदा होते जा रहे हैं। हर क्षेत्र  में इनकी खूब फसलें उग आयी हैं। अपने आस-पास तथा अपने क्षेत्र में भी इस प्रजाति के स्वयंभू व स्वनामधन्य निःशक्तों की कोई कमी नहीं है जिनकी जिन्दगी ही औरों के भरोसे कट रही है और बेचारे दूसरे लोग किसी दबाव, मजबूरी, प्रलोभन या भय के मारे इनकी सेवा-चाकरी करते हुए भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं - हे भगवान ! इन्हें जल्दी उठा ले। जितना जल्दी हो सके कर दे इनका राम नाम सत्य। बाहर वाले भी यही दुआ करते हैं, और घर वाले भी।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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