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दीपक आचार्य का आलेख - बहुत कुछ कहता है यह अंतिम पखवाड़ा

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साल भर तक यों ही गुजार दिया गुलशन में, और अब लो अवसान आ गया।

पता ही नहीं चला कि कब आ गया वर्षावसान का दौर। मुट्ठी से समय की रेत सरक कर उड़ती रही और भान ही न रहा इसका।

हर बात यही सब होता है। हम स्रष्टा भी होते हैं और साक्षी भी। फिर भी  साल-दर-साल वही पुराने ढर्रे पर चलने के आदी हो गए हैं। हर बार जब-जब भी नया कुछ शुरू होता है हम सीना तान कर संकल्पों के साथ आगे बढ़ते हैं, कुछ दिन करते हैं फिर वही ढाक के पात तीन के तीन। 

यही हमारी सालाना नियति है। हम साल भर तक घूम फिर कर वहीं आकर अटक जाते हैं। यह अंग्रेजीदां वर्ष भी अवसान की ओर उन्मुख है।  अब भी कुछ दिन शेष बचे हैं। क्यों न हम याद कर लें उन संकल्पों को, जो हमने इस साल के आरंभ में लिए थे, एक बार याद ताजा कर लें उन सपनों को जिन्हें हमने देखा था।

बहुत कुछ सोचा-समझा और स्वीकारा था, साहस भी बटोरा था कुछ कर गुजरने का। पर हो कुछ न पाया। अब भी समय बचा है, जितना है उसी का उपयोग कर लें। वरना कुछ न कर पाने का मलाल और अफसोस हमेशा हावी रहेगा हम पर।  चेतन और अवचेतन दोनों में भरा रहकर परेशान करता रहेगा।

वर्ष का यह अवसान काल भले  ही हमारी संस्कृति और परंपराओं में शुमार न हो, लेकिन इतना तो तय है ही कि हमें अपने आपको सजाने-सँवारने और निखारने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए होता है, चाहे वह अपना सांस्कृतिक नव वर्ष हो या फिर पाश्चात्यों वाला, अथवा कोई सा दूसरा मौका।

ईयर एण्ड के नाम पर  एंजोय करने वाले सभी लोगों के लिए वर्ष का यह अंतिम पखवाड़ा आत्मचिन्तन का मौका है जिसमें हम सभी को यह सोचना होगा कि जिस ईयर एण्ड के नाम पर हम मनोरंजन करना और घूमना-फिरना चाहते हैं, उस ईयर मेंं हमने ऎसा कौन सा काम किया है कि जो थकान लगी हो, रिलेक्स होने की जरूरत हो।

हम सभी को चाहिए कि स्वस्थ मूल्यांकन करें और अपने इस वर्ष के जो कुछ बचे-खुचे काम हैं, उन्हें निपटाएं और उसके बाद ही मनोरंजन  के बारे में सोचें।

कामों के बोझ के होते हुए मनोरंजन या भ्रमण न आनंद दे सकता है, न आत्मशांति। वर्ष का अंत मौज-शौक से मनाएं लेकिन इसके लिए यह भी देख लें कि हम काम की पूर्णता के बाद का आनंद चाहते हैं या कामों को लंबित रखते हुए आनंद पाना।

पहले कर्मयोग की पूर्णता के लिए प्रयास करें, इसके बाद मनोरंजन और भ्रमण का आनंद पाने का प्रयास करें, इसी में जीवनानंद शामिल है।

इन दिनों पूरी दुनिया में यायावरी परंपराओं का कुंभ उमड़ा हुआ है। लगता है कि जैसे पूरा संसार इधर से उधर भ्रमण को निकला हो। पाश्चात्यों की भेड़चाल परंपरा का निर्वाह करते हुए हम लोग भी ईयर एण्ड का जश्न मनाने और भ्रमण के लिए उतावले हैं। बहुत सारे लोग बची-खुची छुट्टियों का खात्मा कर साल भर के अवकाशों का हिसाब पूरा करने में लगे हैं। तरह-तरह के लोग हैं जो दिसम्बर एण्ड को एंजोय कर रहे हैं।

खूब सारे ऎसे लोग हैं जो साल भर अपने निर्धारित कामों से दूरी बनाए रखते हैं और जैसे ही दिसम्बर आ जाता है वैसे ईयर एण्ड के नाम पर निकल पड़ते हैं। यों देखा जाए तो भारतीय परंपरा में यायावरों के लिए वासन्ती मौसम को सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है जिसमें शीत और ग्रीष्म दोनों का आनंद पाया जा सकता है। यह वह समय होता है कि जब आबोहवा हमारे शरीर के अनुकूल होती है।

कुछ लोग मेहनत की कमाई से परिभ्रमण करते हुए मौज-शौक कर रहे हैं, बहुत सारे लोग दूसरों के खर्च पर मजे कर रहे हैं और खूब ऎसे हैं जिनके लिए वर्ष का आरंभ क्या और अंत क्या। दिसम्बर एण्ड के मामले में अब शौकिया लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है। जैसा विदेशी लोग करते हैं वैसा हम भी आँख मींच कर करने लगते हैं।

हम भारतीयों के लिए यह सब कुछ अनुचरी जैसा हो गया है। हम हर मामले में विदेशियों को अपना लीडर और ग्वाला मानते रहे हैं और यह गुलामी हमारे खून में इतनी अधिक व्याप्त हो गई है कि हमें अच्छे कामों का सर्टीफिकेट भी विदेशियों से पाने की मजबूरी हो गई है।

हम सभी लोग तहेदिल से यह सोचें कि हमें ईयर एण्ड मनाने का हक है क्या। जो लोग निकम्मे, निखट्टू, कामचोर और नालायक हैं, उन लोगों के लिए क्या जरूरत है इसकी। जो काम करते हुए थक जाता है उसे ही विश्राम चाहिए, आलसी, दरिद्री और प्रमादियों के लिए क्या नव वर्ष और क्या वर्ष का अंत। 

पता नहीं यही भेड़चाल कब थमेगी। विदेशियों का अंधानुकरण जरूर करें मगर उनकी अच्छाइयों, मेहनती स्वभाव और समर्पण का भी अनुकरण करें। हमने केवल उनके भोग-विलासी और उन्मुक्त स्वभाव को ही अपना लिया है, बाकी सब हमारे लिए गौण हो गया है।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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