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दीपक आचार्य का नूतनवर्षाभिनंदन प्रेरक आलेख - बोझ त्यागने का वक्त आ गया

(छाया - प्रमोद यादव)

 

वक्त आ ही गया है

बोझ त्यागने का

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@mail.com

आसमाँ की ऊँचाई पाना हममें से हर कोई चाहता है लेकिन उड़ान भरने लायक तैयारी कितने लोग कर पाते हैं, यह सोचने का विषय है।

सभी की तमन्ना रहती ही है कि हर दृष्टि से हमारा कद, पद और प्रतिष्ठा बढ़े, हमारा व्यक्तित्व आसमान की ऊँचाइयां प्राप्त करे, और वह मुकाम पाए कि दुनिया में जहाँ कहीं पर हों, अपेक्षाकृत उच्च से उच्च स्थान पाते रहें और निरन्तर शीर्ष पर रहने का आनंद पाते रहें।

यह शीर्ष बादलों और आसमान की तरह होना चाहिए जहाँ रहकर हम जमाने भर को देख भी सकें, आनंद भी पा सकें और दूसरों को आनंद से सरोबार भी कर सकें।

अपना यह आनंद किसी का मोहताज न रहे, स्वेच्छा और संप्रभुता से हमें सब कुछ प्राप्त होता रहे। हम भी आनंदित होते रहें, औरों को भी  जी भर कर आनंदित करते रहेंं।

सभी को सामूहिक ऊँचाइयों को पाने के अवसर प्राप्त हों, किसी को किसी दूसरे से ईष्र्या या भय न रहे, सभी लोग अपने-अपने हिसाब से आगे बढ़ते रहें, काम करते रहें और दुनिया को वह सब कुछ दे सकें जिसके लिए हमारा अवतरण हुआ है।

हर साल के आखिर में आज के दिन हम सोचते हैं कि आने वाले कल से कुछ नया करेंगे, कर दिखाएंगे और हर साल नया-नया करते हुए अपने आपको भी निखारेेंगे तथा जमाने भर को निखारने के लिए भी कुछ करेंगे ही।

जो आसमान की ऊँचाइयों को पाने के इच्छुक हैं उनके लिए सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त यही है कि हमारे पास ऎसा कोई भारी सामान न हो, जिससे कि उड़ पाने में किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न हो।

जो जितना अधिक हल्का होता है वह उतने अधिक ऊँचे तक उड़ान भर सकता है, सारा जहां एक ही निगाह में देख पा सकता है और दुनिया भर में अपने आपको मुक्त एवं मस्त होकर वह सब कुछ पा सकता है जिसे देख पाने और अनुभव करने के लिए बरसों से तमन्नाएं संजोयी होती हैं। इस मामले में इंसान को पंछियों का स्वभाव अपनाना चाहिए। न कहीं किसी से मोह, न अपेक्षा या उपेक्षा।

आज का इंसान इतना अधिक सामथ्र्यशाली है कि वह कुछ भी कर सकता है, आसमान की उड़ान से लेकर आक्षितिज पसरे नैसर्गिक वैभव को पा सकता है लेकिन यह सब तभी संभव है जबकि उसके मन-मस्तिष्क और तन में भारी तत्वों का बोझ न हो।

आजकल जो इंसान इस बोझ से मुक्त है वही ऊँचाइयों को पा सकता है। लेकिन अधिकांश लोग ऎसा नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वे बिना किसी जरूरी कारकों के बोझ के कारण भारी से भारी हो गए हैं इस कारण उड़ान भर पाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

साल का आज आखिरी दिन है। इस दिन हर इंसान यही प्रण लेता है कि जो हो गया वो हो गया, अब कल से वह सब नहीं होने देगा। लेकिन वह कल कभी नहीं आता है। हम सभी के लिए आज का दिन अंतिम है, इस मायने में कि कल से नया वर्ष आरंभ होगा और इस नए साल में हम कुछ नया करना चाहते हैं, आसमान की ऊँचाई पाना चाहते हैं।

इस दृष्टि से हम सभी को चाहिए कि जीवन में बुराइयों, नीचता, अंधकार, काम, क्रोध, लोभ, मद-मात्सर्य, भाई भतीजावाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता, सिद्धान्तहीनता, दुष्टता, आसुरी भावों, विघ्नसंतोष, नालायकियों और तमाम प्रकार की नकारात्मकताओं का भार लेकर हम ऊँचाइयों को प्राप्त नहीं कर सकते, उड़ान नहीं भर सकते।

क्यों न हम आज के दिन इन सभी प्रकार के भारों से मुक्त होने का प्रयास करें और एक-एक कर सारे बोझ त्यागते चले जाएं ताकि हम अनावश्यक बोझ से मुक्त होकर इतने हल्के हो जाएं कि जीवन में भारीपन और किसी भी प्रकार की बोझिलता रहे ही नहीं, आसमान में उड़ने लायक हल्कापन आ जाए और पूरी दुनिया को अपनी मानकर निहारते चले जाएं।

आज का दिन हमारे इसी संकल्प को पूरा करने के लिए है। आईये हमारे सारे अनावश्यक बोझ के लबादों को उतार फेंके और कल से नई उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाएं।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

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