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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - विदा करें अंधकार

विदा करें अंधकार

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विदा ले रहा वर्तमान। आओ विदा करें पूरे मन से। साल भर बीतने को है।

चंद दिन ही शेष बचे हैं। साल भर हमने जो कुछ किया है उसके उद्यापन के दिन ही तो हैं ये।

हम कोई सा नव वर्ष मनाते हों, कोई से आयेाजन करते हों, हमें चाहिए कि हर अवसर हमारे लिए नई ताजगी और ऊर्जा लेकर आने वाला हो, हर नया आने वाला वर्ष हमारे लिए कुछ न कुछ नया लेकर आए, नयी उपलब्धियां दिखाएं और नया तथा स्वर्णिम इतिहास बनाने वाला साबित हो। 

हम किसी भी मुल्क के हों, भारतीय हों या पाश्चात्य हों, या फिर हों हाईब्रिड़। हम सभी किसी न किसी काम-धंधे और नौकरी से जुड़े हुए हैं ही, जिनके लिए यह कैलेण्डर वर्ष ही आधार रहता आया है।

हम पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष को अभी एक तरफ रख दें, इस बार केवल उन्हीं विषयों के बारे में चिन्तन करें जो कैलेण्डर वर्ष को देखकर ही हमारे लिए बने हैं। जिन पर हमारी आजीविका टिकी हुई है और हमारे जीवन के कई सारे आधार स्थापित हैं।

साल भर हमने जो कुछ किया है उसका भी लेखा-जोखा यह वर्ष लेकर जाएगा। और उन सभी कामों का हिसाब भी हमसे लेकर जाएगा जो हम अपने आलस्य, प्रमाद, निकम्मेपन, विघ्नसंतोषी स्वभाव और नालायकी के कारण नहीं कर पाए हैं, आधे-अधूरे छोड़ रखे हैं या लाभ, भीख या लेन-देन नहीं जम पाने के कारण पूर्ण नहीं कर पाए हैं और अटकाए-लटकाए रखे हैं। या जानबूझकर कुछ नहीं करने की मानसिकता बना रखी है।

जो काम हम कर पाएं हैं वे हमारी उपलब्धियों में शुमार हो गए हैं जिन्हें हमारे जीवन के इतिहास में यह वर्ष अपने आप लिख डालेगा। समस्या तो उन कामों और विचारों को लेकर है जिन्हें हम चाहे या अनचाहे पूर्णता नहीं दे पाए हैं।

ये ही गहन तनाव और दुःखों के वे बीज हैं जिनका भार लेकर हमें अगले वर्ष में जाने की विवशता रहेगी। हम चाहते तो हैं आसमान में उड़ना, और पूरे के पूरे संसार का भार भर रखा है दिमाग और दिल में। ऎसे में हम इतने अधिक भारी हो गए हैं कि हम चाहते हुए भी अपने नाजायज भार के कारण ऊँचाइयों भरे आसमान को छू नहीं पा रहे हैं।

समझदार होने के बाद से लेकर अब तक जाने कितने सारे अनसुलझे और आकार पाने से वंचित विचारों के भार की श्रृंखला हमारे ऊपर बोझ बनी हुई है। हर साल यह बोझ बढ़ता ही चला जा रहा है।

पुरानी परतों के होते हुए हर नए साल में जो भी नई परत बनने लगती है वह पुरानी परतों के संपर्क में आते ही पस्त हो जाती है और नए साल से शुरू होने वाला दिन हमें दो-चार दिन तक की ताजगी दे डालने के बाद फिर पुराने ढर्रे पर लौट पड़ता है।

हमारे जीवन की तमाम समस्याओं, असफलताओं और नैराश्य का एकमात्र कारण यही है जिसकी वजह से हमें कुण्ठाओं और अवसादों में जीवन जीने की विवशता तो है ही, हमारे जीवन का अधिकांश हिस्सा बीमारियों, शोक, विषाद एवं भय में ही गुजरने लगा है।

यही वजह है कि मन-मस्तिष्क में पुराने विचारों, अधूरे कामों और जानबूझकर स्वार्थपूर्ति न होने के कारण लटकाए गए कामों की वजह से हम मानसिक और शारीरिक हर दृष्टि से या तो निःशक्त होते जा रहे हैं अथवा उन्मादी।

हममें से कुछ लोग इसी वजह से आंशिक, आधे या पौने पागल होते जा रहे हैं, और काफी पूर्ण पागल। अब तक जो हो गया, भूल जाएं। अब सप्ताह भर ही बचा है। जो काम नहीं हो पाए हैं उनमें से प्राथमिकताएं तय कर चुन लें और पूरा करने का प्रयास करें।

अगले वर्ष में पुराना बोझ ले जाना मूर्खता ही है। यह समय दोबारा नहीं आएगा। काम अधूरे रह गए तो पूरा जीवन अभिशप्त हो जाएगा। सप्ताह बाद बीत जाने वाला यह वर्ष तो हमें शापित करेगा ही, हमारे कामों से जुड़े लोगों की भी कोई कम बददुआएं नहीं होंगी।

बिन्दास होकर कोसने वालों की कोई गिनती नहीं कर सकता। फिर हम कामटालूओं, काम ढोलूओं और काम लटकाऊओं पर ईश्वर भी नाराज रहा करता है। चारों तरफ से जब मार पड़नी शुरू होगी तब कोई बचाने नहीं आने वाला। न अपने आका आएंगे, न वे लोग जिनसे हम प्राप्ति की उम्मीद लगाए हमेशा बैठे रहते हैं।

अब भी समय बचा है, कुछ करें, काम निपटाएं, अगले वर्ष में बददुआओं की बजाय लोगों की दुआएं लेकर जाएं, तभी नव वर्ष के अभिनंदन का आनंद उठा पाएंगे।

खेल अपने हाथ में है, बाजी जीत कर आगे बढ़ें या हार कर मुँह लटकाए किसी न किसी के पीछे-पीछे शोक मग्न होकर चलते रहें।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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