सोमवार, 7 दिसंबर 2015

शोभा श्रीवास्तव के दोहे

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पत्ता - पत्ता सिहर उठा, शाखाएँ हैं बेकल।
जगह - जगह उगने लगे हैं कांक्रीट के जंगल।
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घेरे है इंसान को यूं रिश्तों का भ्रमजाल।
सीधा दिखता जो जितना, उतनी टेढ़ी चाल॥
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कतरा - कतरा खून का देकर सींचा बाग।
तपन भरे इस दौर में झुलस गया अनुराग॥
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बौराईं अमराईयाँ , कोयल गाए गीत।
नयनों में है नेहरस , मन में उपजी प्रीत॥
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रूप बदल आता रहता नित - नित नया झमेला।
रंग - बिरंगी सजी दुकानें, जीवन है इक मेला॥
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आग उगलती वाणी से, झुलसे मन के तार।
संबंधों  की  नींव है  मात्र प्रेम रसधार॥
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अपनों की इस भीड़ में अपनेपन की चाह
भटका सा मन बावरा,  सूझे न कोई राह॥
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अक्षर - अक्षर बिखर गये, ऎसे टूटे शब्द।
आशय्  गुम होने लगे, भाव नहीं उपलब्ध॥
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जबसे झूठे पड़ गये रिश्तों के  अनुबंध।
साज हुए सब बेसुरे,  सिहर उठे फिर छंद॥
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                        डाँ शोभा श्रीवास्तव

             प्राचार्य,  हा. सेके. स्कूल
                      राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़

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