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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन का आलेख - नक्सलवाद का अंत नहीं?

मूंदहूं आंख कतहु कछु नाहि ......

मेरी वादियों में, मांदर की थाप नहीं, गोलियों की गूंज उठती है, घुंघरू की ताल नहीं राकेट लांचर की स्वर लहरियां बजती हैं, गो‌डी नृत्य के पैरों की चाप की जगह, कभी नक्सलियों के तो कभी पुलिसिया पैरों की ध्वनि सुनाई देती है। जाने कितने सरकारी जतनों के बाद भी, मैं लूला लंगड़ा ही नहीं, बल्कि दिल से भी टूट चुका, लगता हूं। मेरे जैसे के लिए अब यही सच है –

इन दिनों रात दिन, सिर्फ मुर्दे ही ढोता हूं।

शाम उसे उखाड़ देता ,सुबह जिन्हे बोता हूं।

कुछ पाने के लिए रोज, बहुत कुछ खोता हूं।

लोग मुझे गा रहे समझते, चाहे कितना भी रोता हूं।

घर घर गोहराता हूं, बेबसी दोहराता हूं।

अंधेरा नहीं मर सका, दीप कई जलाता हूं।

सामने सागर लहरा रहे, मैं रीता का रीता हूं।

वास्तव में बस्तर की, दुर्गम जंगलों पहाड़ों पर, समस्या ने, पहाड़ का रूप धर, आदिवासियों के घरोंदे पर अंगद की तरह पैर जमा दिया है। छोटी सी दाल – नमक से शुरू हुई समस्या ने , गोली बंदूक का रूप धारण कर लिया है। नमक के नाम पर लूटे गए आदिवासी, आज तक, किस किस के नाम पर नहीं लूटे जा रहे हैं ? किसी भी हाथ से, इनका गला, महफूज नहीं रह गया है ज। अपनी निगहबानी तलाशता आदिवासी, चारों ओर से, पीड़ित, शोषित, बेबस, लाचार होकर , प्राणों की भीख मांगता, अपने आशियाने पर, भयभीत निगाहों से देखता रहता है, हरेक आने जाने वालों को। हरेक आहट हृदय की धड़कन को बढ़ा देता है। न रहने का घर, न पहनने को कपड़े, न खाने को रोटी, न सुरक्षा की गारंटी। एक ओर नक्सली बंदूक, तो दूसरी ओर सरकारी .......। बरसों पहले, प्रकृति की मार झेलता आदिवासियों का पूरा कुनबा समाप्त हो जाता था, पर उफ नहीं निकलता। सरकारी चोटों से बारम्बार आहत हृदय ने, कभी आह नहीं किया। परंतु आज क्यूं इतना व्यग्र हो चला है ? अब तो वह , अपनों की जान लेने से भी नहीं घबराता।

तीस चालीस बरस के नक्सलवाद का यौवन पूरे शबाब पर है आज। इसे खत्म कर देने के सारे विकल्प खुले हैं, फिर भी कामयाबी क्यूं नहीं मिल पा रही है ? एक मरता है दूसरा पैदा होता है, दूसरा मरता है तो तीसरा, इस तरह इनके पैदा होने का अंतहीन सिलसिला चल रहा है। पर आज तक इनकी मां को पहचाना नहीं जा सका , जिसके कोख ने, बिना रूके, बिना थके, बच्चे पैदा करने की मशीन की तरह , अत्याचारी पैदा किया है। और उनके थन ने, उन शिशुओं को अपने जहरीले दूध से पोषित किया है।

त्रेतायुग में रावण पर कितने भी बाण चलाए जा रहे थे, पर सभी निष्प्रभावी साबित हो रहे थे। आखिर कैसे मारा जाएगा रावण ? राम का पूरा खेमा बहुत चिंतित था। आक्रमण की धार और तेज कर दी गयी, वक्त बीतने लगे, एक रावण मरता, तुरंत दूसरा पैदा होता, दूसरा मरा, तो तीसरा.....। रावण आते गए, मरते गए, राम मारते गए, राम थकने लगे, रावण मुंह चिढ़ाते से फिर खड़ा हो जाता। विभीषण जानता था राम की चिंता और इसका उपाय भी। पर वह स्वयं धर्मसंकट में पड़ा था। एक ओर भाई का मोह, दूसरी ओर उसका कर्तव्य। पूरा वंश समाप्त हो चुका था रावण का। आखिरकार कर्तव्य जीत गया और वह राज खुल गया जिसके कारण रावण मरता नहीं था। रावण के प्राण उसके नाभि में है प्रभु, आप सीधे उसके नाभि में प्रहार करिये, तभी वह मरेगा। सचमुच रावण मारा गया। आज नक्सलवाद रूपी रावण के प्राण भ्रस्टाचार के नाभि में है, वही जननी भी है और इसका पोषक भी। इस पर बाण सटीक चल जायेगा, तो कोई कारण नहीं कि इसका पैर न उखड़े, या वह स्वमेव समाप्त न हो जाए।

केवल बजट या पुलिसिया ताकत बढ़ाकर इस वाद का खात्मा सम्भव नहीं है। जनता में खोया विश्वास पुन: जगाना होगा, उन्हे आश्वस्त करना होगा कि उसके साथ गलत न करेंगे , न होने देंगे‌। और इसके लिए आवश्यक यही है कि अपने धर्म का पालन पूरी ईमानदारी और तत्परता से बिना किसी भय, प्रलोभन या पक्षपात के किया जावे।

गांव के भोले भाले जनता, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लाशों के ढेर पर घड़ियाली आंसू बहाने वालों ने आज तलक, नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात, हर रक्तपात के बाद जरूर की। जड़ से समाप्त हो जाने की राजनैतिक रोटी सेंकने वालों से , यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि आखिर इसका जड़ कहां है, कौन इसे पोषित पल्लवित कर रहा है, कौन रोपता है इसे ? इसके जड़ों तक क्यूं नहीं पहुंचा जा सका आज तक ?

आखिर कैसे पैदा हुआ होगा नक्सलवाद ? क्या कारण है कि गांव की निरीह, तिरस्कृत, अपमानित तथा सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं से वंचित, भोली भाली जनता , हथियार लेकर एक पूरी व्यवस्था को न केवल ललकारने लगी है, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने ही बंधु बांधव को ठिकाने लगाकर अपना आक्रोश प्रकट कर रही है ? वास्तव में , छोटी सी बीमारी उचित इलाज के अभाव में नासूर का रूप धर चुकी है। सुरसा के मुंह की तरह विकराल होती, समस्या के कारणों को, नए सिरे से कुरेदने की, जरूरत आन पड़ी है आज। इसका विष्लेषण सही ढ़ंग से, फिर नहीं किया गया, तो केवल, दवा पर खर्च करते रहिए, हासिल कुछ नहीं होगा। सटीक इलाज तो वही है ,जो जड़ तक पहुंचकर, बीमारी का सफाया करे।

कोई व्यक्ति या समाज क्यों खड़ा हो जाता है लामबंद होकर किसी के विरूद्ध ? क्यों असमाजिक संगठन , किसी की भावनाओं से खेलते हुए , किसी को बहलाकर, किसी के खिलाफ,खड़ा करने में कामयाब हो जाता है ? इसी पर विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है आज। भोले भाले गरीब आदिवासियों के सीधेपन का फायदा उठाकर, अपना उल्लू सीधा करने के लिए असमाजिक तत्वों द्वारा पैदा किया गया समस्या ही तो है यह। जब निपट सीधा प्राणी आक्रोश से भर जाता है , तब वह देखना सुनना विचारना बंद कर देता है, और उसका प्रतिफल आप सभी के सामने जाने कितनी बार आ चुका है। पर आक्रोश किसके लिए और किसलिए ? जब वह बिना कारण सताया जा रहा हो, या किसी के अन्याय से पीड़ित हो, दर्द तब हद से गुजर जाता है, तो यही फूट पड़ता है इस रूप में। जहां शासन के अधिपति खुद स्वीकारते हैं कि, हम सौ पैसा भेजते हैं, पर लाभार्थी तक पंद्रह ही पहुंचते हैं, तब बचे हुए पचासी पैसे कहां गए ? कौन इसका हिसाब देगा ? क्या यह भ्रस्टाचार की भेंट चढ़ गया या सौ पैसे भेजने की बात झूठी थी। इसी झूठ और भ्रस्ट आचरण ने पैदा किया है अपने गर्भ से, इस वाद को।

गांव में कोटवार, पटवारी, शिक्षक, ग्राम सेवक, पंचायत सचिव, विकासखंड में बाबू, पंचायत इंस्पेक्टर, उपयंत्री, तहसीलदार, सी. ई. ओ.,जिले में जिलाधिकारी, तथा राज्य स्तर में आला अधिकारी कौन बचा है जो, गंदी नाली में डुबकी लगाने से परहेज करता हो ? कोई कह दे, मैं ऐसा नहीं करता, तो उसे करवा दिया जाता है। इनकी पोल तभी खुलती है जब इनसे काम पड़ता है। वैसे मैं नहीं मानता कि केवल पैसों का लेनदेन ही भ्रस्टाचार है। अपने काम में लापरवाही, या कार्य को विलम्बित करना या जानबूझकर बिगाड़ना भी तो इसी श्रेणी में आता है। कोटवार के पास काम से गया नवयुवक, चाय पान की व्यवस्था की बात सुनता है , तथा मामले को गांव स्तर पर निपटाने तथा पुलिस एवम कोर्ट कचहरी का भय सुन, उसकी कीमत भी दे आता है। नक्शा बनाने के लिए , गांव में बैठा पटवारी, जमीन के हेराफेरी के लिए प्रथम उपयुक्त व्यक्ति होता है। आपकी जमीन का नक्शा बिना बिके, नहीं बनाएगा, बस्तर की तो बात ही अलग है, वहां बस्तरियों के पास जितनी जमीने हैं, उससे कई गुना अधिक जमीनें गैर बस्तरियों की है। इस कारगुजारी में पटवारियो‌ का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। वहां शिक्षक पढ़ाने से अधिक धंधेबाजी में लगा रहता है, स्कूल में कम , आफिस में ज्यादा समय बिताने वाले, अधिकांश शिक्षक के लिए राजनीति का मैदान भी छोटा पड़ जाता है कभी -कभी। ग्राम सेवक सिर्फ गलत सर्वे करता है। जिसको पम्प का लाभ मिलना है, उससे इतना वसूलता है कि, उस कीमत पर सरकारी पम्प से बेहतर पम्प मिल जाए। उपयंत्री प्राक्कलन में इतना प्रावधान कर देता है कि, सारे लोगों की हिस्सेदारी बराबर बंट जाती है। उसके अलावा काम की गुणवत्ता ऐसी, कि कोई भी सरकारी स्कूल या आंगनबाड़ी भवन, बिना रिपेयर पांच बरस टिक नहीं पाता। बाबुओं की अपनी अलग पहचान है। बिना लेनदेन के कोई फाइल हिल भी जाए, क्या मजाल है ? निराश्रित पेंशन और मुफ्त चावल वितरण तक में वसूली होती रही है यहां। अपना पेट भरने के लिए जंगल से लकड़ी लाने वाला मजदूर, बहुत मुश्किल में फंस जाता रहा है, पकड़े जाने पर। पूरा ट्रक सागौन की लकड़ी, शहर में बेचने वाला कभी नहीं फंसा। पुलिस का तो भगवान ही मालिक है, सिर्फ डराना, धमकाना और वसूली करना। एक बार इनके चक्कर में जो पड़ जाता है, उसके जूते क्या, पैर तक घिस जाते हैं, जी मैं भारत के न्याय मंदिरों की ही बात कर रहा हूं। अब न्याय को न्याय के तरीके से प्राप्त करने के लिए इन मंदिरों तक, कोई नहीं जाना चाहता।

बचपन से न केवल जवानी, वरन बुढ़ापा तक झेलता है, भोलाभाला आदिवासी, सरकारी नुमांइदों के इन आचरणों को। यह आतंक, सांस के साथ ही खत्म होती है। जवान बेटा ने, बाप का दुरूह संघर्ष और उनकी तड़पन को, बड़े ही नजदीक से देखा है। बाप की असामयिक मृत्यु, अंदर तक झकझोर देता है उसे। उसके दिलो-दिमाग में घर कर जाता है यह। अब वह सोंचना शुरू करता है - किस किस से काम किस ढंग से पूरा होता है। निष्कर्ष यही पाता है कि उसका कोई भी काम या तो पैसे के बल पर होगा, या ताकत के बल पर। पैसा तो उसके पास है नहीं। भगवान का दिया हुआ, ताकतवार शरीर जरूर है। अनेक असमाजिक तत्व, ऐसे ही मौके की ताक में रहते हैं, तथा इनको मदद करने के बहाने अपना उल्लू सीधा करते हैं , और पकड़ा देते हैं, इन नवजवानों के हाथ बंदूक। यही बंदूक, व्यवस्था के खिलाफ, नक्सलवाद के रूप में खड़ा हो जाता है।

अब सवाल यह कि कौन इन भ्रष्ट लोगों को संरक्षण देता है ? इन्हें भ्रष्ट बनाने के पीछे किस किस का हाथ नहीं होता। पंच,सरपंच, पार्षद, महापौर, विधायक, सांसद, मंत्री, तथा राजनैतिक दलों के प्रतिनिधिगण। इनका समर्थन और पल्लवन इन्हीं महानुभावों के करकमलों का कमाल है। एक राजनैतिक दल का कार्यकर्ता, जिसके पास आय का कोई ज्ञात श्रोत नहीं होता, वह बड़े से बड़े भवन बना लेता है, खेत खलिहान का मालिक बन जाता है तथा विलासिता की सारी चीजें आसानी से खरीद लेता है। कहां से आता है यह पैसा ? निश्चित ही, भ्रष्ट लोगों ने , अपना मुंह बंद करने के एवज में, भेंट किया है। गांव के, सरपंच के पूरे परिवार का, भरण पोषण का माध्यम, केवल उसका पद होता है। क्या सरकार उनको इतना सम्माननिधि प्रदान करती है ? यह तो सिर्फ छोटे नेताओं की बात हुई, जैसे जैसे आप ऊपर बढ़ते जायेंगे, आय का अवैध श्रोत विकसित होता चला जायेगा, तथा ये प्रतिनिधिगण, कार, बंगले, फार्म हाउस, कम्पनी के मालिक होते चले जाते हैं। पकड़ भी लिए गए, तो उनके विरूद्ध गवाही नहीं मिलती। बल्कि ऐसे लोग और भी नाक ऊंची कर घूमते रहे हैं।

इनका अगला संरक्षणकर्ता मीडिया भी है। वह कम दोषी नहीं है। क्या उसे कारगुजारी नहीं मालूम ? क्यों छिप जाता है दोष उजागर होने से ? किस बात का डर सताता है ? क्या किसी दबाव में, या लालच ने इनकी कलम की धार को कुंद कर रखा है ? गांवों – कस्बों तक में दैनिक अखबारों के प्रतिनिधियों को महीना वसूलते देख सकते हैं आप। जो नहीं देगा उसकी कारगुजारियों से, जनता रूबरू हो जाती है।

न्यायतंत्र भी कम नहीं। कुछ भी करिये छूट जाइये, क्योंकि सबूत नहीं मिला। क्यों नहीं मिला , यह जानने की जहमत उठाने की जरूरत नहीं। आरोप लगाने वाले क्यूं मुकर गए, विष्लेषण कभी नहीं हुआ।

यही देखता है गांव का युवक, कि, कैसे कोई गलत कार्यों को अंजाम देकर सर उठाकर घूम रहा है। और वह आज भी घुट घुट कर जीने के लिए मजबूर है। यही आग, तन बदन में लगते लगते दिमाग तक उतर जाता है, तथा आतुर हो उठता है व्यवस्था को चुनौती देने, तब उठा लेता है हथियार , और मिला लेता है हाथ , स्वार्थी तत्वों से, और खड़ा हो जाता है सीना तान, उतारू हो जाता है , मरने मारने के लिए, और बन जाता है नक्सलवाद का हिस्सा।

मैं बस्तर, लूट का शिकार जन्म जन्मांतर से रहा हूं। त्रेतायुग में रावण की सेना ने लूटा, द्वापर में कंस की सेना का अत्याचार सहा। पर कलयुग ने तो हद कर दी, अत्याचारी लुटेरे , कभी व्यापारी के वेष में आते हैं, कभी कर्मचारी अधिकारी के वेष में, कभी खादी पहन कर, कभी नक्सलवादियों के कपड़े में। रहनुमाई करने की फर्जी जुगत लगाने वालों की कमी भी नहीं रही। घड़ियाली आसुंओं से कितनी बार आहत हो चुका हूं मैं। कोई रहनुमा आंख खोलकर नहीं देखना चाहता मेरे वीभत्स हो चुके चेहरे को। मेरे जिस्म के जख्म चीख चीख कर पुकारते हैं, पर मरहम लगाने वाले शख्स को आंख खोलकर देख लेने की न फुरसत है न आवश्यकता, क्योंकि वे जानते और समझते हैं कि “ मूंदहूं आंख कतहु कछु नाहि ........”। आंख खुली तो पूरे ढोल का पोल दिख ही जायेगा, और पोल के लिए जिम्मेदार उनके अपने भी नजर आ जायेंगे। मरहम लगाने वाला तो यह तक नहीं जानता कि जख्म कितना, कैसा, क्या या कहां है ? वह सिर्फ मरहम लेकर आता है, दूर से मरहम फेंक कर, मुआवजे के लाली पाप का राग अलाप जाता है , आश्वासनों का पिटारा छोंड़ जाता है, समस्याओं को जड़ से खत्म कर देंने की हवा - हवाई बातें, फिर से दुहरा जाता है। दूसरे दिन फिर वही समस्या, सुरसा की तरह मुंह फाड़कर लीलने को बेताब खड़ी हो जाती है और हम, हनुमान की तरह छोड़ देने की याचना भी नहीं कर पाते। क्योंकि वह इसके मौके ही नहीं देती। रास्ता छोंड़कर जाने की सोंचते हैं तो मालूम पड़ता है, बगल से गुजरने वाले रास्ते में भी पहले ही कोई और हमें निगलने को तैयार बैठा है। अब तो डर यह लगता है कि, जाने किस वेष में लूट की तैयारी हो रही हो।

मेरा रोम - रोम पसीने से नहीं, अब सिर्फ आंसुओं से भीगता है। मैं इंतजार करता हूं, उस ईमानदारी का, उस कर्तव्यनिष्ठा का, उन खुली आखों के पहरों का, जिसके साये में मेरा पैर पुन: चलने के काबिल हो सके, मेरा हाथ काम करने के लिए फिर मचल उठे , मेरा दिमाग अपने घर परिवार, गांव, चार चिरौंजी को सोचते - सोचते पूरा समाज व देश को सोच सके। मुझे अपाहिज बना देने वालों के संरक्षणकर्ताओं से मेरी अर्जी यही कि पहले मां भ्रष्टाचार को निपटा दीजिए, बेटा नक्सलवाद भूख से तड़प कर मर जायेगा , मेरा सिसकना बंद हो जाएगा, और मैं फिर से नाच गा सकूंगा - खेलू खेलू खेलू खेलू रे गिरोलिया ऐई मोंझी डांडे खेलू .......। प्लीज एक बार ..... बंद आखें खोल लीजिए, मेरा दर्द महसूस न हो सही, तड़पन तो देख लीजिए, मेरा विस्वास है उसी दिन, मेरी समस्याओं के अंत होने का रास्ता खुल जायेगा, और तब यह कभी नहीं दुहराया जायेगा मूंदहूं आंख कतहु कछु नाहि .........

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन, छुरा

मो. 9752877925
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