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रणधीर शिंदे का आलेख - प्रबुद्ध कॉमरेड

प्रबुध्द कॉमरेड
डॉ. रणधीर शिंदे
अनुवाद-डॉ. गिरीश काशिद
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    कॉमरेड गोविंद पानसरे के बारे में लिखते समय मन में कई स्मृतियाँ भर आई है। एक ओर मैं निजी रूप में असीम दुःखी हूँ तो दूसरी ओर महाराष्ट्र की प्रगतिशील विचारधारा का आधार गिर पड़ने का एहसास है। 'पानसरे बोल रहा हूँ' ऐसी भेदक आवाज में दिन में एक-दो बार उनका फोन जरूर आता। 'हमें यह करना है' ऐसी आवाज अब इस अंतराल में सुनने को नहीं मिलेगी, इसकी असीम पीड़ा है। स्मशानभूमि में भाई वैद्य ने कहा था, 'पानसरे कोल्हापुर की शान थे और प्रगतिशील महाराष्ट्र का वैभव थे।'' इसमें कोई संदेह नहीं। उनके अंतिम दर्शन के लिए असीम जनसागर उमड़ आया था। जिस बिंदू चौक के दफ्तर और दसरा चौक के शाहू स्मारक सभागार में उन्होंने कई लड़ाइयों का एल्गार किया था वे दोनों स्थान और परिसर को एक तरह की जड़ता आ गई थी। उन्होंने शाहू स्मारक सभागार से व्यवस्था परिवर्तन के वैचारिक संघर्ष का बीजारोपण किया। निरंतर आठ दिन चलनेवाली 'अवि पानसरे व्याख्यानमाला' यह उसीमें से एक थी। इस व्याख्यानमाला के विषय देखे तो उनका राजनीतिक रवैया और विचार की दिशा को समझ सकते हैं। इस व्याख्यानमाला का हर व्याख्यान छः बजे शुरू होता। इस दरमियान वे कहीं भी नहीं जाते थे। वे पाँच बजे ही सभागार में उपस्थित रहते। सफेद हाफ शर्ट, उसके ऊपर लाल मरून रंग का  हाफ स्वेटर पहनकर वे प्रवेशद्वार में खड़े रहकर आनेवाले श्रोताओं का स्वागत करते। बीच में ही पैंट की जेब में हाथ डालते। व्याख्यान के लिए आनेवाली लोगों की भीड़ देखकर और मैं जो कर रहा हूँ उसमें इतने लोग शामिल होते हैं इसकी उन्हें खुशी होती थी। इसका प्रभाव उनकी देहबोली में झलकता। वे परिचित व्यक्ति को हाथ मिलाकर उससे पूछताछ करते। सन् 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पक्ष में दाखिल हुए पानसरे ने अर्धशती से अधिक काल तक इस पक्ष से संबद्ध अनेक लड़ाइयों का नेतृत्त्व किया। महाराष्ट्र के समाज परिवर्तन आंदोलन में उनका सक्रिय योगदान था। इस लेख में पानसरे के सार्वजनिक, राजनीतिक, सामाजिक जीवन के संदर्भ में लिखने के बजाए मैं मुझे पसंद आनेवाले, प्रभावित करनेवाले पानसरे के बारे में लिखने जा रहा हूँं। अर्थात इसका जिक्र करते समय, छोटे-छोटे प्रसंगों से, विवरण से उनकी कार्यपध्दति का ही अप्रत्यक्ष सूचन होनेवाला है।

    मेरा और उनका दीर्घकालीन परिचय था ऐसा नहीं। इसके लिए एक घटना निमित्त बन गई। सन् 2008 में मराठी के ख्यातलब्ध समीक्षक म. द. हातकणंगलेकर का अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में चयन हुआ। इस अवसर पर पानसरे जी ने कोल्हापुर में उनके सम्मान का आयोजन किया था। ऐसे आयोजन में उनकी एक खास शैली होती थी। महराष्ट्र में किसी भी प्रबोधनकार, चिंतक को कोई सम्मान मिलता तो वे कोल्हापुर में उसका गौरव करते। हातकणंगलेकर के सम्मान के अवसर पर सुनीलकुमार लवटे, मंदा कदम और मैंने उनका लंबा साक्षात्कार लिया था। वह साक्षात्कार अच्छा हुआ था। मैं हाल ही में कोल्हापुर विश्वविद्यालय के मराठी विभाग में नियुक्त हुआ था। मैं कोल्हापुरवालों से ज्यादा परिचित भी नहीं था। मंच से नीचे आया तो उन्होंने मुझे पीठ पर हाथ रखकर शाबाशी दी। उसी समय उन्हें गो. मा. पवार सर ने मेरे बारे में बताया। बस इन पाँच-छः सालों की हमारी मुलाकात। आगे चलकर उन्होंने उनके कार्य में मुझे खींच ही लिया। और मैं खुशी से उनके कार्य में शामिल हुआ।

1.
    पानसरे आण्णा का दिनक्रम नियोजित होता था। थकना, रूकना उन्हें मालूम ही नहीं था। रात को घर पहुँचने में चाहे कितनी भी देर हो बावजूद सुबह शिवाजी विश्वविद्यालय के परिसर में वे डेढ़ घंटा टहलने जाते। कभी संख्याशास्त्र विभाग तो कभी परीक्षा भवन के सामने चबूतरे पर मोबाईल, घड़ी और आते समय साथ लाया समाचारपत्र रख देते और वहाँ बीसेक मिनट कसरत करते। घूमने जाते और आते समय निरंतर मोबाईल पर बातचीत करते। उनका फोन मुख्यतः ग्रंथनिर्मिति या कार्यक्रम के आयोजन का होता था। वे पुस्तकों के लेखन के बारे में पूछताछ करते। उनके इस तगादे का कइयों को नैतिक डर लगता । एन. सी. सी. भवन के पासवाले 'देशप्रेमी' ठेले पर वे चाय-नाश्ता लेते। फिर घर लौटते और तैयार होकर दस बजे के आसपास भाकप के कार्यालय में जाते। वहाँ नौकरानी, मजदूर आदि संगठनों की बैठके होती। वहाँ का कामकाज पूरा कर कोर्ट की ओर चल देते। बीच में टोल विरोधी आंदोलन में अगुआ होते थे। शाम को फिर कार्यालय में मजदूरों की वैयक्तिक समस्याएँ, बैठकों के नियोजन में व्यस्त रहते। इतनी ऊर्जा और दिमाग में इतने विषय कैसे होते इसका अचरज होता है। कोई व्यसन नहीं। युवावस्था में सिगारेट पीते थे लेकिन वह भी जल्द ही छोड़ दी। अविश्रांत काम और उसका नियोजन यही उनका व्यसन था।

    उनके मन में अगले सौ साल के संकल्प मँडराते थे। वे अक्सर इसकी चर्चा किया करते। पिछले साल उन्होंने छत्रपति शाहू महाराज के कार्य पर सौ व्याख्यान देने का संकल्प किया था। उसमें से 90 व्याख्यान उन्होंने दिए थे। उन्होंने जून 2015 के बाद महर्षि विठ्ठल रामजी शिंदे के विचारों के प्रबोधन को लेकर सौ व्याख्यान देने का संकल्प किया था। इसके पीछे उनका यह हेतु था कि नये महाराष्ट्र ने प्रबोधनात्मक विचारों का स्मरण कभी भी भूलना नहीं चाहिए।  महाराष्ट्र के प्रगतिवादी समान पक्ष, राजनीतिक संगठन और आंदोलन इकठ्ठा होकर काम करें ऐसा उन्हें अक्सर लगता था। इस दृष्टि से राजनीतिक दलों के इस प्रयत्न में वे अक्सर अगुआ रहे। इतना ही नहीं तो इधर उन्होंने विद्रोही साहित्य-संस्कृति आंदोलन एक होकर काम करें इसके लिए कोशिश की थी। सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करते समय हमें अक्सर शत्रू-मित्र विवेक नीति का अनुसरण करना चाहिए इसका वे बार-बार उल्लेख करते थे

2.
    एक बार गपशप के दौरान वे अपनी युवावस्था के दौरान के अनुभव बयान कर रहे थे....''बिंदू चौक में उस समय उस काल के एक नेता तुलसीदास जाधव की सभा का आयोजन किया था। हम युवक उस सभा को तितर-बितर कर देना चाहते थे। तुलसीदास जाधव उस काल के एक नामचीन वक्ता थे। वे बोलने के लिए खड़े हुए तो हम पाँच-छः युवकों ने शोरगुल शुरू कर दिया। बावजूद जाधव ने बोलना बंद नहीं किया। फिर हमने सभा में एक गधा लाया, फिर भी उन्होंने बोलना जारी रखा। फिर हमने एक तरकीब ढूँढ़ ली। सभा में अचानक राष्ट्रगीत गाना शुरू कर दिया। तुरंत पूरी सभा खड़ी होकर राष्ट्रगीत गाने  लगी। ''  एक बार कोल्हापुर के कॉमर्स कॉलेज में तत्कालीन प्राच्यविद्यापंडित के भाषण का आयोजन किया था। उस सभा में वे समकालीन सामाजिक प्रश्न को लेकर बोले ऐसी युवा पानसरे की इच्छा थी, लेकिन वे आनाकानी कर रहे थे। उस समय पानसरे और उनके मित्रों ने एक मरा हुआ साँप लाया और भीड़ में उनके गले में डाल दिया। उस समय एक ही गड़बड़ी शुरू हो गई। युवावस्था के जोश में उन्होंने ऐसे कारनामे किए लेकिन आगे मात्र वे इस राह से नहीं गए या उसका समर्थन भी नहीं किया। लेकिन यह लड़ाकू आक्रामकता उनमें कायम बनी रही।

    पुराने लड़ाकू सहकर्मियों को मिलने पर उन्हें असीम खुशी होती थी। लोकसभा चुनाव के पहले शिवचरित्र पर व्याख्यान के लिए वे मोहोल (सोलापुर) जा रहे थे। मैं उनके साथ था। सांगोला आने से पहले उन्हें भाई गणपतराव देशमुख की याद आई। पानसरे  ने उन्हें तुरूंत फोन लगाया। उन्होंने कहा रास्ते पर पड़नेवाली कापड़ मिल में ही हूँ। उन्हें भी खुशी हुई। दोपहर के दो बजे थे। गणपतराव देशमुख दस बाय दस के बिल्कुल सामान्य कार्यालय में बैठे थे। पानसरे को देखकर उन्हें अत्यधिक खुशी हुई। चाय-बिस्कुट मँगाया गया। राजनीति पर चर्चा शुरू हुई। पहले राजनीति में होनेवाला लक्ष्य और निष्ठा कैसे लुप्त हो रही है इस पर दोनों अफसोस जता रहे थे। साथ ही महाराष्ट्र के वामपंथी प्रगतिशील राजनीतिक दलों का एका महाराष्ट्र के हित में कितना जरूरी है ऐसे वे लगन से एक-दूसरे को बोल रहे थे। उसी समय उनके पक्ष के एक नेता माणदेश के उस बंजरभूमि पर हेलिकॉप्टर से अपने साथ बड़ा लवाजिमा लेकर उन्हें मिलने आये थे। गणपतराव देशमुख को चुनाव लड़ने के लिए मनाने वे आये थे। पानसरे को बिदा करने के लिए देशमुख बाहर आए। इधर कार्यकताओं का लवाजिमा अंदर जा रहा था। उस समय गणपतराव देशमुख ने उन कार्यकर्ताओं को कहा, ''थोड़ी देर रूक जाओ , मैं पानसरे को छोड़कर आता हूँ  फिर हम अंदर जाते हैं।'' गाड़ी में बैठने पर मैने पानसरे  को एन. डी. पाटील ने गणपतराव देशमुख पर दीपावली अंक में लिखे लेख की याद दिलाई। 'बबूलबन का सोनचाफा' ऐसा उस लेख का शीर्षक था। यह सुनकर उन्हें बहुत खुशी हुई।

    एक बार पुणे-सोलापुर हायवे से जाते समय वरवडे (तहसील-मोहोल) में पुरानी पीढी  के शेकाप के नेता भाई एस.एम. पाटील को मिलने गए। वे उनकी पाठशाला में उनकी राह देख रहे थे। पानसरे वहाँ पहुँचे तो दोनों बडी खुशी से एक दूसरे को मिले। भाई ने कार्यकर्ताओं के जमा किया और खेत पर भुट्टे खाने के लिए ले गए। रात के आठ बजे थे। अंधेरी रात में खेत में अंगिठी जल रही थी। कार्यकर्ता नीचे बैठे थे। पानसरे और एस. एम. पाटील कुर्सी पर बैठे थे। कई दिनों के बाद वे मिल रहे थे। दोनों कह रहे थे मार्क्स, लेनिन, वामपंथ अब नहीं रहा।  इस राज्य  और केंद्र में गरीबों के, मेहनतकशों के हित का विचार नहीं होता। लेकिन हम अपनी भूमिका पर बने रहेंगे, डटकर मुकाबला करेंगे। उसके बाद उनके घर जाकर भोजन किया। काफी दिनों बाद भेंट होने के कारण उन्होंने बेटे को शॉल और साफा लेने को कहा था। कार्यकर्ता साफा बाँधने का आग्रह कर रहे थे। लेकिन पानसेरे ने साफा नहीं बाँधा तो उसका स्वीकार किया।  बेटा अवि पानसरे की मृत्यु के बाद उन्होंने कभी साफा नहीं बाँधा था।

    निजी तौर पर उनके कई लोगों से स्नेहपूर्ण संबंध थे। अधिवेशन, व्याख्यान के लिए पूरे महाराष्ट्र में घूमते समय वे हॉटेल या लॉज पर रहने के बजाए कार्यकर्ता या मित्र के घर में रहना पसंद करते। इन कई कार्यकर्ताओं के वे कॉमरेड थे। आण्णा थे। इन परिवारोें की बहनों के वे पानसरे काका थे। पत्नी उमाताई पर उनका निश्चल प्रेम था। पिछले पाँच-छः सालों में वे बाहर जाते समय गाडी ले जाते और साथ में उमाताई को लेकर जाते। यात्रा में वे काफी बातें उनसे शेयर करते थे। उन्हें मधुमेह की बीमारी थी। यात्रा में  थोड़ी देर बाद उन्हें कुछ न कुछ खाना पड़ता। उमाताई उनके लिए खास कर थैले में केले, फल रख देती। बीच में ही होटल दिखाई देने पर पकौडे, नमकीन लेते। इस लड़ाकू, युध्दरत नेता में कोमल भावुकता भी ओतप्रोत थी। उनके मोबाईल में कुछ पुराने हिंदी गीत थे जो वे यात्रा में सुनते थे। पिछले साल टेंभुर्णी (जिला-सोलापुर) को एक इतिहास परिषद को जाते समय उन्हें कुछ देर हो गई थी। रात दस बजे थे। पंढरपुर में हम नदी पुल पर आये थे। उस समय गाड़ी में पानसरे आगे बैठे थे। उन्होंने अपनी पत्नी को कहा, ''उमा, देखो, चंद्रभागा कैसे कलकल करते हुए बह रही है।'' और एक स्थान पर कार्यकर्ता के घर से बाहर पड़ते समय उनके आंगन में बेला के फूल देखे। उन्होंने उनमें से चार-पाँच फूल लिए और गाडी में आने पर उमाताई को दे दिए।

3.
    पानसरे आण्णा ने सामाजिक लडाई के लिए कई संघर्ष, आंदोलन खड़े किए। लेकिन यह करते समय, इस आंदोलन को बौध्दिक बल मिले इसलिए आवश्यक वैचारिक आधार हेतु ग्रंथ निर्मिति का काफी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। लोकवाड्.मयगृह, श्रमिक प्रतिष्ठान इन संस्थाओं की ओर से इन आंदोलनोें को पोषक विचारों के निर्माण के लिए उन्होंने हेतुतः ग्रंथ और पुस्तकों का प्रकाशन किया। महाराष्ट्र और महाराष्ट्र के बाहर के नामचीन विद्वानों का सहयोग लिया। उन्हें लिखने हेतु प्रेरणा दी। स्वयं के अमृतमहोत्सव के अवसर पर अनावश्यक रूपये खर्च करने की बजाए कार्यकर्ताओं की ओर से जो राशि जमा हुई उससे उन्होंने हेतुतः महाराष्ट्र के वामपंथी आंदोलन के 65 कार्यकर्ताओं के जीवन चरित्र प्रकाशित किए। वह भी किसी भी संस्था के सहयोग के बिना। पानसरे पर हमला हुआ उस समय इस परियोजना का ए. बी. वर्धन का चरित्र छप रहा था। इसके साथ ही  आधुनिक महाराष्ट्र के गठन में कोल्हापुर क्षेत्र के नेता और विद्वानों पर ग्रंथमाला प्रकाशित की। इसमें बीस चरित्र ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। 'रोटी प्यारी है लेकिन और कुछ चाहिए' यह उनकी लगन थी। समाज की नई युगमुद्रा निर्माण करने के लिए वे वैचारिकता की समझ को आवश्यक मानते और इसके लिए विचार प्रसारित करने तथा उसका समर्थन करनेवाली पुस्तकें प्रकाशित करते थे। ग्रंथ निर्मिति से संबंध्द और अन्य वैचारिक कार्यक्रमों के संकल्प अक्सर उनके दिमाग में रहते थे।
एकाध विषय सूझता तो वे तुरंत कहते थे, उत्तम को पूछते हैं, चौससळकर सर को पूछते हैं, सतीश काळसेकर को पूछते हैं। और उनसे चर्चा कर कार्यक्रमों का आयोजन करते। कॉमरेड अण्णा भाऊ साठे साहित्य सम्मेलन का आयोजन उन्हीं की कल्पना थी। महाराष्ट्र के विविध क्षेत्रों में उन्होंने बिना तामझाम के छः सम्मेलनों का आयोजन किया। इसमें निमंत्रितों की तक कोई खास सुविधा नहीं की। उसमें अरूण कमल, गोपाल गुरू ऐसे अथितियों को शामिल कर लिया। वे इस संदर्भ में कहते, ''मैं यह काम अपराधबोध के चलते  कर रहा हूँ।'' इसके पीछे अण्णा भाऊ की सभी तरह से हुई उपेक्षा है। इसे वे कुछ तो उऋण होने की भावना से देखते थे। व्यवस्था परिवर्तन पर उनका अदम्य विश्वास था। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन का गीत गानेवालों का पथक और आगे जिन कलापथकों ने वामपंथी आंदोलन की विचार जाग्रति के रूप में पूरे महाराष्ट्र की यात्रा की वे भी इसमें शामिल थे। शाहीर अमर शेख, अण्णा भाऊ साठे, गवाणकर आदि के प्रति उनके मन में अतीव आदर था। वे बार-बार यह अफसोस जताते कि आज के आंदोलन को गीत नहीं है। शोषणमुक्त समाज रचना पर लिखे गीत सुनते समय उनका शाम वर्ण अधिक प्रकाशमान होता था। उनके चेहरे पर एक चेतना झलकती थी। चेहरे पर अंगार खिलता था। आँखें और देहबोली नाचती थी। यह आश्वस्त  वर्तन कइयों ने नजदीक से देखा है।

4.
     2014 के आम चुनाव और भारतीय राजनीति तथा सामाजिक यथार्थ से  वे काफी अस्वस्थ हो चुके थे। हिंदुत्व और धार्मिक उन्माद के समर्थनार्थ राज्यसंस्था और विद्वानों के मिलनेवाले सहयोग ने उन्हें अस्वस्थ किया था। इस दौर में उन्होंने इस पर लेख भी लिखे। सावरकर, नथुराम इनका होनेवाला पुनरूज्जीवन उनके जैसे प्रागतिक विचारों के लड़ाकू कार्यकर्ता को स्वाभाविकतः अस्वस्थ कर देनेवाला था। तीन-चार वर्ष पहले सावरकर ने सागर में लगाई छलाँग का शताब्दी दिवस बड़े उत्साह से मनाया गया। जनसंचार माध्यमों ने उसे बड़े पैमाने पर प्रसारित किया। इस समय उनके मन में वसंत दादा पाटील ने प्रतिसरकार आंदोलन में जेल तोड़कर साहस के साथ किया पलायन और क्रांतिसिंह नाना पाटील पर ऐतिहासिक जीवन चरित लिखने की इच्छा थी। वे कहते थे कि इसके लिए हम अच्छे जीवनी लेखक खोजेंगे। वे अक्सर अपने भाषणों में गलत इतिहास को लेकर सीधा और आक्रामक रूख अपनाते थे। इन भाषणों को लेकर कुछ संगठनों ने उन पर मुकादमे भी दायर किये थे। उन्होंने हाल ही में 'गांधी हत्या' इस विषय पर पुस्तक लिखने की जिम्मेदारी एक लेखक पर सौंप दी थी।

    पॉच-छः वर्ष पहले महाराष्ट्र की एक प्रकाशन संस्था ने आधुनिक महाराष्ट्र के गठन में जिन्होंने योगदान दिया ऐसे साठ विद्वान और लेखकों की जीवनियाँ प्रकाशित की। इसका विमोचन काल्हापुर के शाहू स्मारक सभागार में आयोजित किया था। प्रकाशन समारोह एक भूतपूर्व कुलपति के करकमलों से होने जा रहा था और पानसरे उस समारोह के अध्यक्ष थे। भूतपूर्व कुलपति ने अपने वक्तव्य में कहा कि ''मैं इस ग्रंथ परियोजना का समन्वयक होता तो इस ग्रंथमाला में हेडगेवार और गोलवलकर गुरूजी की जीवनी का समावेश कर देता।'' यह सुनकर पानसरे अस्वस्थ हो गए और अध्यक्षीय भाषण के आरंभ में ही उन्होने कुलपति महोदय का आदर करते हुए यह स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र के गठन में इनका कोई संबंध नहीं है। इतनी स्पष्टता और विचारों की सुसंगति उनके विचारों में थी। दो मास पहले उन्होंने 'हू किल्ड करकरे' इस पुस्तक के लेखक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी एस. एम. मुश्रीफ का कोल्हापुर में व्याख्यान आयोजित किया था। इस व्याख्यान के दौरान काफी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।  इसमें खास करके युवकों की संख्या अधिक थी। इस व्याख्यान को मिले प्रतिसाद के चलते धार्मिक संगठन अस्वस्थ हो गए थे। इसके पश्चात की उनकी प्रतिक्रियाएँ भी समाचारपत्रों में आ गई थी।

5.
    उनके भाषण का भी एक अजब शास्त्र होता था। उनका संवादशास्त्र कइयों को प्रभावित करता था। उनकी एक खास शैली थी। उनकी संवाद शैली पर अभ्यास शिविर तथा दीर्घकाल तक असंगठित मजदूर, नौकरानी इनकी बैठके-सभा में बोलने की पध्दति का प्रभाव था। उन्हें धीरे-धीरे विषय आसान उदाहरणों से समझाकर उसकी स्पष्ट सुसंगत प्रस्तुति करना खूब भाता था। भाषण में संवादशीलता बड़े पैमाने पर रहती। सुननेवालों को वे उसमें शामिल कर देते थे। यह दोहरा संवादशास्त्र था। वे सभा में कई तरह के उदाहरण देते थे। प्रश्न उपस्थित करते। लोगों को प्रश्न पूछते। वे विचार करने को प्रवृत्त करते, उनको बोलने के लिए और और उत्तर देने को उद्युक्त करते। उदाहरणार्थ, उनका और हमारा धर्म एक ही है क्या? उनकी और हमारी राजनीति एक ही है क्या? ऐसे वाक्य वे बार-बार रिपिट करते और सुननेवाले पर अपनी बात का प्रभाव डालते। भाषा में खास कोल्हापुरी लहजा होता था। सीधे बोली भाषा के शब्दों के प्रयोग के कारण लोगों को उनकी बात सुनने का मन करता। दूसरी ओर अकादमिक स्वरूप का भाषण होता तो वे अत्यंत अधिकार और अध्ययन से उसकी प्रस्तुति गंभीरता के साथ करते। शब्द और भाषा के प्रयोग में वे अत्यंत दक्ष रहते थे। पूँजीपति जीवन के अवशेष होनेवाले शब्द उन्हें रास नहीं आते थे। बिल्कुल अपने नाम के साथ जोड़ा 'राव' शब्द तक उन्हें अखरता था और वे यह बोलते भी थे। बेटी के विवाह के समय प्रयुक्त किये जानेवाले 'कन्यादान' शब्द को लेकर वे काफी गुस्सा होते थे। वे कहते कि दान करने के लिए बेटी क्या वस्तु है।

    छात्रों के सामने तक वे कई तरह के उदाहरण देकर बिल्कुल आसान तरीके से अपने विचार रखते। एकाध घटना की ओर कवि, लेखक किस दृष्टि से देखते हैं इसका उदाहरण देते समय वे अक्सर ताजमहल पर लिखी कविता का उदाहरण देते थे। वे पहले ताजमहल पर लिखी सुंदर कविताओं के उदाहरण देते और अंत में उनकी पसंदीदा साहिर लुधियानवी रचना को दोहराकर बताते-

''ये चमनजार, ये जमना का किनारा, ये महल,
ये मुनक्कश दरो-दीवार, ये महराब, ये ताक।
इक शहनशाह ने दौलत का सहारा लेकर,
हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक।
मेरी महबूब। कही और मिला कर मुझसे।''

     अंतिम दो पंक्तियों का उच्चारण करते समय उनकी देहबोली में एक ऊर्जा का संचार होता था। चिरंतन प्रेम के प्रतीक के बजाए उसमें होनेवाला दुःख, यातना, शोषण का संदर्भ उन्हें महत्त्वपूर्ण लगता।

    पानसरे का समाज परिवर्तन को लेकर जो कार्य था वह 'मेरी कोशिश कि ये सुरत बदलनी चाहिए' इस अखंड लगन से प्रभावित था। उन्हें विश्वास था कि उन्होंने जिस विचारधारा का स्वीकार किया है उसकी स्वप्नपूर्ति का दिवस  जरूर आएगा। कितने भी संकट क्यों न आए निरंतर डटकर खड़ा होना चाहिए यह युध्दरत आशावाद उनमें था। बिल्कुल एक मास पहले उन्होंने कहा था, आम चुनाव के बाद पक्ष में कुछ शिथिलता आ गई है। राज्य अधिवेशन को लेकर कुछ निरूत्साह है। इसलिए उन्होने इस उम्र में कोल्हापुर में अधिवेशन का आयोजन करना तय किया और फुर्ती से उस काम में जुट गए। निमंत्रण पत्र, विषय, बैनर आदि काम में वे दिनभर व्यस्त रहते थे। इसके पीछे उनकी अखंड प्रकाशमान ऊर्जा की आस थी। वे कई कार्यक्रमों में इस ऊर्जा का उच्चार उनकी साहिर लुधियानवी की पसंदीदा कविता के जरिए करते।

संसार के सारे मेहनतकश
खेतों से मिलों से निकलेंगे
बेघर इन्सान सभी
तारीफ दिलों से निकलेंगे
दुनिया और खुशयाली के
फुलों से सजायी जाएगी
वह सुबह हमी से आयेगी इन काली सदियों के सर से
जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे
जब सुख का सागर छलकेगा
जब अंबर झूम के नाचेगा
जब धरती नगमें गायेंगी
वो सुबह कभी तो आयेगी.....
यह विश्वास वे हर काम में रखते थे।

    पानसरे की हत्या की ओर देखे तो महाराष्ट्र मानो एक अराजकता की दहलीज पर खड़ा है। विचारों की लड़ाई का ऐसा हिंसात्मक असहिष्णुतावादी दमन वर्तमान समाज की दृष्टि से काफी चिंताजनक है।  जिस सरस्वती पाठशाला की एक कक्षा में चार साल पहले लगातार आठ दिन 'मार्क्सवाद क्या है?' इस विषय पर महाविद्यालयीन छात्रों के लिए उन्होंने अभ्यास शिविर लिया उसी कक्षा के बाजू के रास्ते पर पानसरे पर हुए हमले में उनकी मृत्यु हो गई। प्रगतिशील महाराष्ट्र ऐसा दांभिकता का अहं रखनेवाले महाराष्ट्र के लिए यह शर्मनाक है। कवि वसंत आबाजी डहाके अपनी एक कविता में कहते है, ''अब किस-किस को लक्ष्य किया जाएगा इसका अंदाज नहीं, हे ईश्वर, प्रश्न न पूछनेवाले, उत्तर न देनेवाले देश में ही मुझे बार-बार जन्म लने होगा? इसका अंत क्या होगा ऐसी भयप्रद स्थिति महाराष्ट्र में है।

    जब तक समाज में परिवर्तन नहीं होता तब तक समाज युध्दभूमि है ऐसा माननेवाले लड़ाकू कॉमरेड को लाल सलाम!
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डॉ. रणधीर शिंदे   
मराठी विभाग,
शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर 416004
मोबाईल-9890913031
ई-मेल- madhurang76@yahoo.co.in
       
                                अनुवादक-
डॉ. गिरीश काशिद
अध्यक्ष,हिंदी विभाग,
एस. बी. झेड. कॉलेज बार्शी,
जिला सोलापुर-413401
मोबाईल-9423281750
ई-मेल gr.kashid@rediffmail.com
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