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दो लघुकथाएँ

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1

अबूझ किताब - सुधीर मौर्य

उसने कहा था एक दिन खुली किताब हूँ मैं। पढ़के जान लो मुझे। एक सर्द शाम में, मैं ये जान पाया था। उस किताब की भाषा मेरे लिए अबूझ थी। और उसी शाम मुझे अनपढ़ कह कर उसने वो किताब किसी पढ़े हुए सेल्फ में रख दी थी। 

और कुछ बरसों बाद उस पढ़े हुए इंसान ने उस सेल्फ को बेच दिया था कबाड़ खाने में उस किताब के साथ।

आज गर्द से सनी वो किताब मेरे सामने है पर आज भी उस किताब की भाषा मेरे लिए अबूझ ही है।

--सुधीर मौर्य

sudheermaurya1979@rediffmail.com

 

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2

स्वाध्यापन (लघुकथा)-प्रदीप कुमार साह

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कौआ के बहुविध तर्क से सृष्टि के सिरमौर मनुष्य का अधमाधम श्रेणी में निरुपण होने से तोता चिंतित हो गया. वह सोचने लगा कि जिस योनि के प्राप्ति हेतु सृष्टि के सभी देहधारी प्रतीक्षारत और लालायित रहते हैं उसके प्राप्ति का फिर क्या लाभ? तोता का मनोभाव समझ कौआ हँसकर बोला,"विविध श्रुति में तो यहाँ तक कहे गये हैं कि सृष्टि से परे सक्रसुतादिक देवता भी अपने मूल गुण-धर्म, विवेकादि खो देने पर अधोगति प्राप्त किये."

"मित्र, मनुष्य विवेकशील प्राणी हैं, फिर उनके आचरण और सत्कर्म निमित्त श्रुति में अनेक साधना और नियम उपदेशित हैं. इसके बावजूद वे अधोगति प्राप्त होते हैं. देवता भी अपने गुण-धर्म से विरक्त होकर अधोगति प्राप्त होते हैं. यह तो बड़े आश्चर्य की बात है. इसके वास्तविक कारण क्या हो सकते हैं?"तोता अधीरता से पूछा.

"इसमें आश्चर्य की बात तो कुछ भी नहीं, विवेक रहित होने से वैसा ही होता है." कौआ जवाब दिया.

"आखिर विवेकवान् प्राणी अविवेकी किस तरह हो जाते हैं?" तोता बड़े आश्चर्य से पूछा.

"जब मनुष्य चिर सुख प्राप्ति,सृष्टि संरक्षण और संवर्धन के उन साधना,उपायों और नियमों का एकाग्रचित्त मनन और पालन नहीं करते तब उनका मन सत्य-बोध नहीं कर पाता. इससे मन उच्छृंखल, अनियंत्रित और भ्रम में पड़ा रहता है. भ्रमित मन सत्य को अस्वीकार करता है और सदैव लोभ-कामादि से घिरा रहता है. इससे मन अत्यधिक अशांत हो जाता है और जीवन से ऊर्जा शक्ति का ह्रास होने लगता है. उसका अंत:करण पुकारता है. किंतु अविवेकी मनुष्य उसका पुकार सुन नहीं पाते. अंततः अंत:करण मंद पड़ जाता है और सारी प्रतिभा मृतप्राय हो जाती है. तब वह विवेकहीन मनुष्य भयावह तरीके से सृष्टि दोहन और विनाश की ओर अग्रसर होता है. वस्तुतः प्रकृति में सभी अन्योश्रित हैं और मनुष्य भी प्रकृति पर आश्रित है. इस तरह मनुष्य जाने-अनजाने स्वयं के नाश के रास्ते पर चल पड़ता है. श्रुति में देवताओं के अधोगति प्राप्ति का वही कारण बताया गया है." कौआ बोला.

"फिर वेद, उपदेश और कथा की क्या उपयोगिता रह जाती है? उसकी क्या आवश्यकता और मूल्य रहता है?" तोता मुँह बनाकर बोला.

"ईश्वर समरस सृष्टि के चराचर में व्याप्त हैं तथा समस्त सृष्टि उनकी संतान हैं. इस हेतु वही समस्त सृष्टि के सच्चे हितैषी और समर्थ गुरू हैं. वे ही प्रकृति स्वरुप हैँ, वही प्रकृति रक्षण और संवर्धन हेतु देव, गुरु इत्यादि रूप में अवतरित होते हैं. प्रणव रूप में वे ही वेद-पुराण हैं. उन रूपों में वे करूणानिधान ही कृपा कर अपने संतानों के हितार्थ ज्ञान प्रदान करते हैं. किंतु जिसके अंत:करण जागृत नहीं हैं अर्थात् जो अज्ञानी हैँ वह ज्ञान ग्रहण करने में किसी भी तरह असमर्थ होते हैँ. यदि किसी भाँति थोड़ा समझ में आ भी जाय तो वह एक-दूसरे से स्वयं के बड़ा ज्ञानी ठहराने हेतु उपदेश केवल कहने में नष्ट कर देते हैं. स्वयं उसका समुचित लाभ ले नहीं पाते."

"समुचित लाभ किस तरह प्राप्त किया जा सकता है?" तोता कौआ से पूछा.

"समुचित लाभ हेतु अंत:करण जागृत करना होता है. अंत:करण तभी जागृत हो सकता है जब स्वाध्यापन का सेवन किया जाय. स्वाध्यापन से विवेक और बुद्धि दृढ़ होता है तथा हृदय निष्कलंक और निष्पक्ष. वैसे हृदय में सत्य-बोध होता है. श्रद्धा,विश्वास और विवेक आता है. तब स्वयं प्रकृति बोध होता है.बोध होता है कि प्राणी पंचतत्व और ऊर्जा शक्ति से बना स्वयं एक लघु सृष्टि है.उसके शरीर के विभिन्न तत्व परस्पर अन्योश्रित, सह-अस्तित्व और सहभागिता में अवस्थित और बंधे हैं. इस तरह वह अपना समुचित स्थान प्राप्त कर सकता है. स्वाध्यापन से तात्पर्य है-चिंतन, मनन और आत्मनिरीक्षण, तत्पश्चात मन को तथ्य से अवगत कराना. यह अप्रत्यक्ष किंतु श्रेष्ठ और प्रभावशाली सत्संग है." इतना बता कर कौआ भ्रमण हेतु चला गया.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

प्रदीप कुमार साह

psah2698@gmail.com

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