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रामनिवास डांगोरिया की कविताएँ

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(कविता)
मां
कितना कष्ट उठाती होगी
जब गर्भ से रहती होगी मां
करती होगी परहेज कितना
जब गर्भ में पलता है लल्ला।क्या है उसे खाना
क्या नहीं खाना
रखती है हरदम
ख्याल अपना।असहनीय दर्द भी
कभी कमर कभी घुटने
कभी उदर पीड़ा को भी
सहती है मां।जब होता है प्रसव तो
पीड़ा कितनी उठाती होगी मां
ये तो वही जाने
जिसने झेली होगी प्रसव पीड़ा।बाद प्रसव के तो
मल-मूत्र में ही
लिपटी सी रहती है मां
आती है गंध कुछ
अजीब सी वहां
जहां प्रसव के बाद
होती है संग लल्ला के मां।सोती है खुद
बिस्तर गीले में
सुलाती है सूखे में
लल्ला को मां।तड़प उठती है
मां की ममता
जब जी तोड़ के
रोता है लल्ला।उठाती है दौड़ के
लगाती है सीने से
काम सारे छोडकर
पिलाती है दूध
आंचल अपने में
छिपाकर मां।हाथों को अपने बनाती है
झूला मां
हिलारती-दुलारती
गाती है लोरिया
दिल के टुकड़े को
सुलाने को मां।ताकि निपटाले काम सारे
घर के तसल्ली से मां।पकड़कर हाथ अपने से
सिखाती है चलना मां
सपने सैकड़ों दिल में
संजोंये रहती है मां।
(कविता)
(कर्मवीर)कर्मवीर बन बढ़ता चल तू
लक्ष्य अपना चुन लेना तू
कठिन विपदाएं भी है आगें
पीछे कभी न हटना तू।।जग जीवन की पीड़ा गहरी
करले दिल से सच्ची करनी
ईश्वर को सब याद है तेरी
पंहुचे इक दिन मंजिल अप…

अशोक गुजराती की 2 लघुकथाएँ - खटका, दुर्योग

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खटका

   शोभा ताई को आज लौटने में देर हो गयी थी. धारावी के अपने झोंपड़-पट्टी इलाक़े में ज्यों ही वह दाख़िल हुई, रोज़ से अलग सुनसान रास्ते देख चौंक गयी. और हां, यहां-वहां पुलिस भी खड़ी दीख रही थी. उसने पास के घर की खिड़की से झांक रही स्त्री से पूछ ही लिया, 'काय झालं बाई ?'
   उसने 'दंगा झाला...' कहते हुए फ़ौरन खिड़की के पट भेड़ लिये.
   डरी-सहमी-सी शोभा ताई आगे बढ़ी. इधर-उधर बिखरे पुलिस वालों ने संभवतः उसके पहराव आदि के कारण उसे उसी मोहल्ले की जान रोका नहीं. तभी सामने से इन्स्पेक्टर और उसके संग चार-पांच बंदूकधारी आते नज़र आये. इन्स्पेक्टर चलते-चलते अचानक थम गया और झोंपड़ियों के पीछे से आ रही खट-खट-सी ध्वनि को सुनने का प्रयास करने लगा. शोभा ताई एक तरफ़ से होकर जाने लगी तो उसने ठहरने का संकेत करते हुए पूछा, 'यह जो मशीनें चलने की आवाज़ें आ रही हैं, क्या बनता है वहां ?'
   शोभा ताई कुछ हिचकी, फिर साहस कर बोली, 'अरे! आपको नहीं पता, वहां गोलियां बनाते हैं... हम भी ख़रीदते हैं उनसे.'
   'क्या ?' इन्स्पेक्टर एकदम सीधा खड़ा हो गया और उसने अपने अधीनस्थों को तुरंत आदेश दिया- &#…

प्रमोद भार्गव का आलेख - असैन्य परमाणु ऊर्जा का रास्ता साफ

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भारत सहित तमाम विश्व  की ऊर्जा संबंधी दीर्घकालीन आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति में में हरित ऊर्जा सहित परमाणु ऊर्जा का भरपूर दोहन की एकमात्र विकल्प होगा.असैन्य परमाणु ऊर्जा का रास्ता साफ
प्रमोद भार्गव    अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत-यात्रा के पहले दिन ही छह साल से अटके असैन्य परमाणु ऊर्जा अनुबंध पर समझौता हो गया। इस करार की बड़ी सफलता यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व कौशल के चलते भारत को झुकना नहीं पड़ा और अमेरिका संतुष्ट हो गया। इस मुद्दे के सिलसिले में दोनों देशों ने चतुराई यह बरती है कि परमाणु ऊर्जा नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम में संशोधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। करार से जुड़ी अमल संबंधी बाधाएं दूर होने के बाद व्यावसायिक सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। पूछा जाए तो अमेरिका और भारत के बीच यह मुद्दा ऐसा केंद्र बिंदु साबित होगा,जो दोनों देशों के बीच विकसित हो रहे रिश्तों की आधारशिला को मजबूती देगा। इससे भारत बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगा और कालांतर में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। इस द्विपक्षीय वार्ता की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि रक्षा क्षेत्र में आधुनिक तकनीक…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - गलत सोच से बढ़ रहे तनाव पर चिंतन जरूरी

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==============================आजकल तनाव हमारे वर्तमान जीवन की परिभाषा बन गयी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में हैरान, परेशान होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़ते रहते हैं और यह पूरी तरह से बिसरा देते हैं कि इसके लिए कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया-आस-पास के लोगों के प्रति अपना स्वयं का दृष्टिकोण भी जिम्मेदार हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों की सलाह मानें तो सबसे पहले हमें अपनी खीज-तनाव के कारण खुद में खोजने चाहिए। आस-पास के लोगों, परिस्थितियों के प्रति अपने नजरिए की छान-बीन करनी चाहिए। ऐसा कर सके तो पता चलेगा कि सारी उद्विग्नता का कारण हमारी मानसिकता का बाहरी वातावरण से संगीत न बैठना है और इसके लिए वातावरण की अपेक्षा हम खुद जिम्मेदार हैं। एलन वाट्स ‘प्रेग्रासिंग आँफ द माइन्ड’ में कहते हैं कि वातावरण जड़ है, सोच-विचार रहित है, जबकि हम स्वयं सचेतन हैं। अपने सोचने-विचारने के तौर-तरीकों में फेर-बदल करना हमारे लिए एक आसान बात है। थोड़े से प्रयास के साथ ही हम वातावरण से समस्वरता स्थापित कर सकते हैं। इसी तरह आस-पास के लोगों…

राजीव आनंद का आलेख - स्मृतिशेष : आर के लक्ष्मण के कार्टून बोलते थे

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(कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण और आम आदमी का कार्टून)
आर के लक्ष्मण का नाम कार्टून का पर्याय बन गया था, सोमवार 26 जनवरी को उनकी कलम हमेशा के लिए रूक गई लेकिन पांच दशकों लंबी फैली उनकी कार्टून स्ट्रिप हमारी बहुमूल्य धरोहर है। आम आदमी के सुख-दुख, सपनों और इच्छाओं को उनके बनाए चरित्र 'कॉमन मैन' ने दुनिया के सामने रखा। लक्ष्मण की खासियत यह थी कि उन्होंने हमेशा ताकतवर पर तंज किया और आम आदमी के साथ खड़े दिखे। लक्ष्मण का 'आम आदमी' राजसता को हर रोज आईना दिखाता रहा। चेक का कॉलरदार जैकेट, धोती व गोल ऐनक पहने सिर पर थोड़े से सफेद बालों वाला बूढ़ा इंसान एक वाक्य में ही सब कुछ कह जाता था, जिसे कहने में अखबार की खबर भी कभी-कभी कम पड़ जाती थी। पांच दशकों से अधिक समय से अपने कार्टून 'कॉन मैन' के जरिए लक्ष्मण ने भारतीय समाज और राजनीति के तमाम पहलुओं को उकेरा। सही मायने में वे आम आदमी के प्रखर प्रवक्ता थे
    अखबारों में विचारों को कार्टून के माघ्यम से एक धारदार हथियार बनाने वाले लक्ष्मण ने किसी को नहीं बख्शा, उनके कार्टून बोलते थे। शब्द कैसे तलवार से भी तेज हो सकते हैं, यह उनके कार्टूनो…

मुकेश कुमार की कविताएँ--- क्यों याद आ रहे हैं गुजरे जमाने

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1. इक जिद थी बड़े होने की लाखों कोशिशों के बाद
जब बड़े होने लगे अहसास हुआ की कुछ पीछे छूट रहा है।
बीते लम्हे याद आने लगे जब देखता हूँ खुद को पीछे मुड़कर इक कहानी नजर आती है। कुछ पलों को बाँटना चाहा कहाँ अब वो साथ ना रहा।
कुछ बिछड़ गए कुछ साथ रहें हमेशा जिन्दा रहेंगे मेरे साथ ,
भूलकर भी भूलना चाहूँ फिर ज्यादा याद आते है
वो बीते लम्हें
वो गुजरा कल
वो याद आता पल
अनजाने सफर के हमजोली मेरे यार मेरे दोस्त
वो जमाना गुजर गया तुम्हें देखें..... 2. चला जाऊँगा इक दिन मैं भी इस दुनिया से
खुद को लेकर अपने, और मैं को इस दुनिया से ख्वाहिशें कुछ ऐसी है मरने के बाद इस दुनिया से
हमारी, आगे हम होंगे , पीछे दुनिया लाखों होंगी। चाहते भी होगी चाहतों का दौर भी होगा पर
हम साथ तुम्हारे नहीं होंगे।
मोहब्बतें भी बेजुबां होंगी पर इंसा हमारे जैसे नहीं होंगे। चलो फिर लौट चलें उन हसीन लम्हों की महफ़िलों को।
अब ठुकरा कर भी क्या चलें ज़िन्दगी को, फिर क्या मुहब्बत करने को ज़िन्दगी ना मिले।। 3. इश्क़ समन्दर की तरह ठहरा है
शांत लहरें भी खामोश है इसलिये
चलती है लहर दर लहर खामोश राहों से
कोई ना कोई भीग जाता है इस आसमाँ के नीचे
प्यार मुहब्बत की ठं…

सुरेन्द्र कुमार पटेल का आलेख - प्राथमिक शिक्षा को रामभरोसे न छोड़ें

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प्राथमिक शिक्षा को रामभरोसे न छोड़ें
कई गंभीर मुददों में से एक हमारे देश की प्राथमिक शिक्षा है प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक इसलिए है क्योंकि इसी के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का जीवन भर विकास होता है। यदि प्राथमिक शिक्षा अधूरी रह जाए तो बच्चे के भीतर प्रतिभा होते हुए भी वह अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाएगा। यदि बहुत बड़ी बात न की जाए , शिक्षा की उपादेयता को बढ़ा-चढ़ाकर न भी कहा जाए तो इतनी जरूरत तो हर किसी को है कि वह कम से कम  किसी एक भाषा में लिखे हुए को समझ के साथ धाराप्रवाह पढ़ सके और अपने विचारों को कम से कम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त कर सके, लिख सके। यदि हम इतनी योग्यता हासिल कर लेते हैं तब हम साक्षर कहलाते हैं।शिक्षा हमारे साथ कम से कम इतनी दूर तक जानी चाहिए कि हम समाज के आदर्शों के मुताबिक रहन-सहन सीख जाएं और समाज में स्थापित आदर्श के साथ अपनी आजीविका का चयन कर सकें।सामान्य तौर पर कक्षा 5वीं तक की शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है। कक्षा-5वीं तक में बच्चे को धाराप्रवाह वाचन के साथ ही अभिव्यक्ति करने की क्षमता, सामाजिक परिवेश की जानकारी और गणित की सभी सामान्य संक्रियाओं की जानकार…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - अच्छा बोल कर बढ़ा सकते हैं आप अपनी अहमियत

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अच्छा बोल कर बढ़ा सकते हैं आप अपनी अहमियत डॉ.चन्द्रकुमार जैन  नए युग में कार्य-व्यापार से लेकर जीवन-व्यवहार और रोजगार के क्षेत्र में भी संवाद कौशल व सम्प्रेषण का महत्व बढ़ता जा रहा है,लेकिन, याद रहे कि कुछ लोग हैं जिनके पास कहने योग्य कुछ भी नही होता पर वो अक्सर कुछ न कुछ कह बैठते हैं. दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पास कहने के लिए पूरा खजाना ही साथ-साथ चलता है पर दुर्भाग्य ही समझिये कि वे चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाते हैं. मौखिक और लिखित संचार और संवाद के साथ किसी संस्थान में समूह के बीच रहकर काम करने तथा संस्था के हितों को प्रगतिगामी बनाने पर ही उसकी सफलता निर्भर करती है। लेकिन, यह अफ़सोस और आश्चर्य की बात भी है कि बोलने की कला और अभिव्यक्ति के तौर तरीकों पर इतना जोर दिए जाने के बावजूद बहुतेरे लोग हैं जिनके लिए यह काम पहाड़ जैसा है। झिझक, संकोच. भय, आशंका, आत्महीनता न जाने कितनी चीजें बोलने वालों की राह में अवरोधक बनकर खड़ी हो जाती हैं. कभी वे चाह कर भी बोल नहीं पाते हैं, कभी उनके भीतर अपनी बात कहने की तत्परता ही नहीं दिखती, पर सच तो यह है कि बोलना अक्सर उनके लिए एक दूभर कार्य हो होता है…

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - खुशखबरी! देश में लकड़बग्घों की संख्या तेज़ी से बढ़ी!

व्यंग्य
खुशखबरी! देश में लकड़बग्घों की संख्या तेज़ी से बढ़ी!
डॉ. रामवृक्ष सिंह

हाल ही में देश में बाघों की गणना की गई। पता चला कि बाघों की संख्या 2010 की तुलना में लगभग 30% बढ़कर 2226 हो गई है। पृथ्वी पर इन्सानों और बनैले जानवरों के अपने-अपने रिहाइशी क्षेत्र बँटे हुए हैं। प्राकृतिक संतुलन के लिए ज़रूरी है कि दोनों अपने-अपने इलाके में फलें-फूलें और चैन से रहें। बाघ हमारे देश के संरक्षित पशु हैं और उनके शिकार पर पाबंदी है। लिहाज़ा बाघों की संख्या में वृद्धि होना प्रसन्नता का विषय है। इसके लिए लड्डू बाँटे जाने चाहिए। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि बाघ जैसे प्यारे राष्ट्रीय पशु के साथ-साथ, अपने देश में लकड़बग्घों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। लकड़बग्घा प्रजाति के इन्सानों और उन्हें चाहने वालों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है, किन्तु शरीफ और निरीह भारतवासियों के लिए यह घोर चिन्ता का विषय है। और दिक्कत यह भी है कि शरीफ आदमी प्रायः निरीह ही होता है, उसका मुँह तो कुत्ता भी चाट जाता है। लकड़बग्घा तो खैर उसे खाकर हजम ही कर डालता है।

लकड़बग्घे आसानी से पहचान में नहीं आते। यानी यदि किसी को लकड़…

अशोक गौतम का व्यंग्य - ये जो पायजामे में हूं मैं

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मैं लालकिले के पास बस का इंतजार करता फटे पोस्टर में से निकलने वाले हीरो के बारे में सोच रहा था कि तभी भीड़ में से अचानक चार जने मेरी ओर लपके।  झक्क कुरते पायजामे में। सच कहूं,  मैंने ऐसे साफ सुथरे लागे कुरते- पायजामों में चुनाव के दिनों को छोड़कर आजतक नहीं देखे। क्या मजाल जो उनके कपड़ों पर एक भी दाग खुर्दबीन तक से दिख जाए।
गौर से देखा तो चुनावी सीजन के मित्र के साथ तीन  में से दो जने जो काफी मोटे तगड़े थे  तथा उन्हें देखकर ऐसा ही लग रहा था मानो मित्र ने उन्हें पाला ही चुनाव के दिनों के लिए हो।  तीसरे सिर पर भारी गांठ थी। जब ध्यान से देखा तो उसमें से कुरते- पायजामें  बाहर निकलने को बेताब!  सोचा, मित्र ने देश सेवा करने के धंधे के बदले कुरते- पायजामे बेचने का धंधा कबसे शुरू कर दिया होगा!
चुनावी मित्र ने  गले मिलने, हाय- हैलो करने के बदले उन दो मुस्टंडा वर्करों को  मेरी ओर नजरें घुमा टेढ़ी नजर से तिल भर इशारा किया कि चेहरे से ध्याड़ी पर लगने वालों  ने मुझे एक पल भी दिए बिना मेरी पैंट खींचनी शुरू कर दी तो मैं न चिल्लाने लायक न हंसने लायक।  चिल्लाऊं तो  किस पर? हंसू तो किस पर? 
बिन कोई पल गवांए इ…

हुसैन के हास्य-व्यंग्य

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हुसैन न केवल चितेरे थे, बल्कि हास्य-व्यंग्य में भी अपनी कूंची चलाया करते थे - अक्सर अपने पत्रों में. प्रस्तुत हैं उनके हास्य-व्यंग्य और हास-परिहास के कुछ नमूने  - बियांड द कैनवास, एन अनफ़िनिश्ड पोर्ट्रैट ऑव एम एफ हुसैन - बाय इला पाल से साभार.

प्रमोद भार्गव का आलेख - बाघों की वृद्धि अच्छी खबर

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बाघों की वृद्धि अच्छी खबर
प्रमोद भार्गव
    देश में लुप्त हो रहे बाघों की संख्या बढ़ रही है,यह अच्छी खबर है,वरना 2006 के आसपास तो हालात ऐसे बन गए थे कि बाघों के किताबों और फिल्मों में ही सिमटकर रह जाने की उम्मीद जताई जाने लगी थी। क्योंकि सारिस्का और पन्ना बाघ आरक्षित क्षेत्रों में एक भी बाघ शेष नहीं रह गया था। प्रत्येक 4 साल में बाघों की गिनती होती है। पिछले दो मर्तबा से यह गणना खुश-खबरी दे रही है। गोया,2006 और 2010 के बीच जो गिनती हुई,उसके अनुसार बाघ 1411 से बढ़कर 1706 हुए और फिर 2010 से 2014 के गिनती के परिणामों ने बाघों की संख्या 2226 तक पहुंचा दी। मसलन बीते 4 सालों में बाघों की वृद्धि में 30 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि यह गिनती भी अभी संपूर्ण और विश्वसनीय नहीं है,क्योंकि एक तो इसमें पूर्वोत्तर के राज्यों और मध्यप्रदेश के सतपुड़ा बाघ आरक्षित वनों की गिनती दर्ज नहीं है। दरअसल यह गिनती अभी की ही नहीं की गई है। दूसरे,नक्सल प्रभावित राज्य ओडीसा और झारखंड की गिनती भरोसे लायक नहीं है,क्योंकि इन क्षेत्रों के बाघ रहवास वाले सभी वन-खंडों में न तो कैमरे लगाए जा सके हैं और …

चंद्रेश कुमार छतलानी का आलेख - गणतांत्रिक शिक्षा

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आज 26 जनवरी 2015, जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति बराक ओबामा हमारी ख़ुशी में शामिल होने आयें है, तो एक यह सोच अवश्यम्भावी होनी ही चाहिये कि हमारे अपने देश में इस ख़ुशी में कौन-कौन और क्या-क्या शरीक है| आज ही का दिन है जब यह विचार करने की आवश्यकता है कि कौन हैं जो देश की गणतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं और क्या ऐसी व्यवस्थाएं हैं, प्रक्रियाएं हैं, सेवाएँ हैं, जिम्मेदारी हैं और अधिकार हैं जो गणतांत्रिक हैं? और जो कुछ गणतांत्रिक नहीं है वो यदि भारत का अंग है तो जीवित कैसे हैं? हमारे देश की आधी आबादी पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती हो, जिसे जीने का हक भी मुश्किल से हासिल हो रहा हो क्‍या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी का कोई अर्थ है ? हम कहते हैं कि देश की जनता राज करती है सारे देश में गणतंत्र है तो फिर ये “रूलिंग पार्टी” क्या बला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले कई वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था राज कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है, उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ …

गणतंत्र दिवस की कविताएँ

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जसबीर चावला
लाल क़ालीन और पड़दादा
'''''''''''''''''''''''''''''''''मैं शर्मिंदा हूँ आज अपने दादा के पड़दादा पर
मैंने नहीं खोजा उनका नाम
उनके निजी कारनामे
दिलचस्पी नहीं किसी पंडे की बही में
सत्रह सौ सत्तावन प्लासी युद्ध के दिन
तब कहाँ थे मेरे दादामीर जाफ़र ही भीतरघाती नहीं था
जगतसेठ भी क़तार में थे
रायदुर्लभ ओम/स्वरूप/मेहताबचंद हैं चंद नाम
अंग्रेज़ों के साथ खड़े थे लाव लश्कर के साथ
जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश भी संभाला
तब कहाँ थे मेरे दादाकहाँ है दर्ज विरोध की आवाज
इतिहास के पन्ने कोरे अधूरे हैं
'राष्ट्रवादी' पडदादे संग संग मूत देते
मुट्ठी भर अंग्रेज़ बह जाते
शर्म आती है उनकी स्वार्थी चुप्पी पर
तब कहाँ थे मेरे दादाआज मैं भी चुप्पा दादा हूँ
नहीं कर रहा दादागिरी
ईस्ट इंडिया कंपनी बन देश व्यापार राज कर रहा
बिछा रहे लाल क़ालीन दिल्ली के दादा
शायद शर्म से ग़ुस्साए पड़पोते पूँछें
तब कहाँ थे मेरे दादा// // 000000000000000000000
राजीव आनंदमेरे पास इसका कोई जवाब नहींमेरे …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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