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हरदेव कृष्ण का आलेख - घास के जूते

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आलेखः घास के जूते लेखकः हरदेव कृष्ण जानकारी का स्त्रोतः अखबार और प्रदर्शनियां घास के जूते पैरों की हिफाजत के लिए जूते और चप्पलों का अविष्कार किया गया। इनके निर्माण के लिए मुख्यतः पशुचर्म, रबड़ या सूती वस्त्र को उपयोग में लाया जाता है। शुद्धि के लिए साधु लोग काष्ठ को , यानि खड़ाऊं को महत्व देते हैं। लेकिन देवभूमि हिमाचल , विशेषकर कुल्लू अंचल में ‘ घास के जूते या चप्पल’ प्रयोग में लाए जाते हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में “ पूला” कहा जाता है। गांव में चमड़े के जूते घर के अंदर ले जाना अच्छा नहीं समझा जाता, मंदिर के परिसर में भी इनकी मनाही है। कुल्लू के कुछ गांव , जैसे कि तीऊन, जठानी और खोपरी आदि में , सीमा के बाहर ही जूते उतारने आवश्यक हैं। वहां केवल पूला पहन कर जाना पड़ता है। वैसे भी हिमाचल प्रदेश के ऊपरी क्षेत्रों में बर्फ और सर्दी खूब पड़ती है। वहां नंगे पाँव धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना कठिन होता है। पूला चप्पल पहन कर बर्फ में भी चल-फिर सकते हैं। पूला बनाना एक हुनर है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण लेना पड़ता है। इसे बनाने के लिए भांग के रेशों को प्रयोग में लाया जाता है। यहां इन्हें शेःल कहा …

पुस्तक समीक्षा - जीवन का मूल स्वर है दर्द का कारवॉं

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पुस्तक समीक्षा जीवन का मूल स्वर है दर्द का कारवॉं कुमार कृष्णन आम जीवन की बेबाकी से जिक्र करना और इसकी विसंगतियों की सारी परतें खोल देना यह विवेक और चिंता की उंचाईयों का परिणाम होता है। आज जो साहित्य रचा जा रहा है,वह लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चल रहा है। एक तरफ जिन्दगी की जहां गुनगुनाहट है,वहीं दूसरी तरफ जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होने की जिद्द भी है,इन्हीं सब शर्तों की अनेक रंगों को अपनी ग़ज़लों में पिरोने का साहस डॉ. मालिनी गौतम ने किया है। यूं तो डॉ. मालिनी गौतम साहित्य की अनेक विधाओं में लिखती हैं, लेकिन हाल ही में प्रकाशित उनका ग़ज़ल संग्रह 'दर्द का कारवॉं' वीरान जिन्दगी के कब्रिस्तानों पर एक ओर जहां जीवन और मुहब्बत की गीत लिखती है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान जीवन की विसंगतियों से लड़ने की ताकत भी देती है। संग्रह की ग़ज़लों के रंग इन्द्रधनुषी हैं,लेकिन सारी ग़ज़लों का मूल स्वर जीवन है और जीवन में घटनेवाली घटनाओं का चित्रण है। इससे प्रतीत होता है कि डॉ़. मालिनी गौतम ने अपनी ग़ज़लों में जिया ही नहीं है,बल्कि उसे भोगा भी है। इन दो क्रियाओं 'जीना और भोगना',ऐसी का…

तारकेश कुमार ओझा का हास्य व्यंग्य - बुढ़ौती में तीरथ

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​हास्य - व्यंग्य------------------- बुढ़ौती  में तीरथ... . !! ​तारकेश कुमार ओझाकहते हैं कि अंग्रेजों ने जब रेलवे लाइनें बिछा कर उस पर ट्रेनें चलाई तो देश के लोग उसमें चढ़ने से यह सोच कर डरते थे कि मशीनी चीज का क्या भरोसा, कुछ दूर चले और  भहरा कर गिर पड़े। मेरे गांव में ऐसे कई बुजुर्ग थे जिनके बारे में कहा जाता था कि उन्होंने जीवन में कभी ट्रेन में पैर नहीं रखा। नाती - पोते उन्हें यह कर चिढ़ाते थे कि फलां के यहां शादी पड़ी है। इस बार तो आपको ट्रेन में बैठना ही पड़ेगा। इस पर बेचारे बुजुर्ग रोने लगते। दलीलें देते कि अब तक यह गांव - कस्बा ही हमारी दुनिया थी... अब बुढ़ापे में यह फजीहत क्यों करा रहे हो...। हां यह और बात है कि उन बुजुर्गों का जब संसार को अलविदा कहने का समय आया तो उनकी संतानों ने किसी तरह लाद - फांद कर उन्हें कुछेक तीर्थ करा देने की भरसक कोशिश की। अपने देश की प्रतिभाओं का भी यही हाल है। राजनीति , क्रिकेट और फिल्म जगत को छोड़ दें तो दूसरे क्षेत्रों की असाधारण  प्रतिभाएं इसी बुढ़ौती में तीरथ करने की विडंबना से ग्रस्त नजर आती है।  बेचारे की जब तक हुनर सिर पर लेकर चलने की कुवत…

दीपक आचार्य का आलेख - संसार अच्छा न लगे तो छोड़ दें

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संसार अच्छा न लगेतो छोड़ दें- डॉ. दीपक आचार्य9413306077dr.deepakaacharya@gmail.comबहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो हमेशा ही कहते रहे हैं यह दुनिया खराब है। बहुत से लोग ऎसे हैं जो किसी न किसी से हमेशा परेशान रहते हैं और कहते हैं कि लोग खराब हैं। कई लोग ऎसे होते हैं जो अपनी ही समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं और दिन-रात इस बात को लेकर कुढ़ते रहते हैं कि उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए। आम तौर पर  देखा यह जाता है कि दुनिया में कोई भी इंसान अजातशत्रु नहीं हो सकता है। हर किसी का कोई न कोई शत्रु हो ही जाता है। यह जरूरी नहीं कि इसकी कोई वजह हो ही। खूब सारे लोग शत्रुता पैदा होने के लिए ही पैदा हुए हैं और इनके जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम यही है कि वे बेवजह शत्रुता पैदा करते रहें और इसी से इनका वजूद बना रहता है। जब तक रोजाना कोई न कोई नकारात्मक काम न कर लें या किसी से दुश्मनी नहीं निकाल लें तब तक चुप नहीं बैठते। सांसारिक जीवन में हर इंसान के लिए शत्रु और मित्र हमेशा बने रहते हैं और इस कारण से इंसान किसी न किसी उलझन में पड़ा ही रहता है। लोग हमसे किसी कारण या स्वार्थ से कोई शत्रुता…

ज्ञान विज्ञान - हमें अपनी मानवीय जड़ों का कैसे पता चला?

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हमें अपनी मानवीय जड़ों का कैसे पता चला?आइसक एसिमोवहिन्दी अनुवाद : अरविन्द गुप्ता 1. पत्थर युगहमारे पूर्वज कौन थे? बाईबिल के अनुसार पहले मानव ऐडम और ईव थे और वे देखने में बिल्कुल आज के लोगों जैसे लगते थे। बहुत सालों तक यहूदी) इसाई और मुसलमान लोगों का इसमें यकीन था। ऐडम और ईव कब पैदा हुए? बाईबिल में इसका कोई उल्लेख नहीं है परन्तु जिन लोगों ने बाईबिल का गहन अध्ययन किया है उन्होंने इस अनुमान को लगाने की कोशिश की है। उन्हें बाईबिल में घटी कुछ बाद की घटनाओं की तारीखें मालूम थीं। उदाहरण के लिए उन्हें पता था कि बैबिलोनियन्स ने ई पू 586 में येरूशलम पर कब्जा कर वहां के मंदिर को ध्वस्त किया था। इससे शुरू कर वे पीछे गए। उन्होंने बाईबिल में जिक्र किए भिन्न राजाओं के काल का अनुमान लगाया। फिर उन्होंने प्राचीन राजाओं नोआ और पलास की आयु और उनके जन्म के समय उनके पिता की आयु आदि का भी अंदाज लगाया। 163० में आयरिश विद्वान जेम्स उशर ( 1581 - 1656) ने इन सब के आधार पर उत्पत्ति कब हुई इसका अनुमान लगाया। उनके अनुसार उत्पत्ति ई पू 4००4 में हुई। बहुत से लोगों ने इसे सही माना। पर अगर यह सच होता तो पृथ्वी की आयु …

रवि श्रीवास्तव की कविताएँ

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रवि श्रीवास्तव रायबरेली, उ.प्र. 9718895616, 9452500016 लेखक, कवि, व्यंग्यकार, कहानीकार
आख़िर खुदकुशी करते हैं क्यों ?
जिंदगी जीने से डरते हैं क्यों ?
फंदे पर लटककर झूले
जीवन है अनमोल ये भूले।
अपनों को देकर तो आंसू,
छोड़ दिए दुनिया में अकेले।
कभी ट्रेन के आगे आना,
कभी ज़हर को लेकर खाना।
कभी मॉल से छलांग लगा दी,
देते हैं वो खुद को आज़ादी।
इस आज़ादी के ख़ातिर वो,
अपनों को देते तकलीफ़
लोग हंसते ऐसी करतूतों पर,
करते नहीं हैं वो तारीफ़।
पिता के दिल का हाल ना पूछो,
माता पर गुजरी है क्या
इक छोटी सी कठिनाई के ख़ातिर,
क्यों कदम इतना बड़ा लिया उठा।
पुलिस आई है घर पर तेरे,
कर रही सबको परेशान,
ख़ुद चला गया दुनिया से,
अपनों को किया परेशान।
संतुष्टि मिल गई है तुमको
अपनी जान तो देकर के,
हाल बुरा है उनका देखो,
बड़ा किया जिसने पाल-पोसकर के।
जिंदगी की सच्चाई में क्यों?
इतना जल्दी हार गए।
आखिर मज़बूरी है क्या?
दुनिया के उस पार गए।
याद नहीं आई अपनों की,
करते हुए तो ऐसा काम,
क्या बीतेगी सोचते अगर,
नहीं देते इसको अंजाम।
दुख का छाया, क्या है अकेले तुम पर
जो हो गए इतना मजबूर
औरों के दुख को भी देखो,
जख्म बन गए हैं नासूर।
हर समस्या का कभी तो,
समाधा…

समीक्षा - समकालीन स्त्री-विमर्श को डॉ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय

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समीक्षा समकालीन स्त्री-विमर्श को डॉ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय (डॉ. दादू लाल जोशी के शोध प्रब्रंध की समीक्षा) इस शोध प्रबंध की समीक्षा, समालोचना अथवा आलोचना में कुछ लिखने अथवा कहने से पहले हमें ध्यान देना होगा कि इस ग्रंथ की चौदह पृष्ठों की विस्तृत और विद्वतापूर्ण भूमिका के अलावा दोनों फ्लैफ में भी, दो अलग-अलग विद्वानों की अमृत वाणियाँ (मीठे वचन को संत कवियों ने अमृत के समान ही माना है।) दी गई हैं। इस तरह की सामग्रियाँ वस्तुतः प्रस्तुत कृति की समीक्षाएँ ही होती है। फिर भी मान्य समीक्षकों की समीक्षाएँ अलग महत्व रखती हैं और अधिक मूल्यवान होती हैं, अतः समीक्षाओं और आलोचनाओं की और भी निर्झरणियाँ विभिन्न स्रोतों से निकलनी चाहिए, निकलकर बहनी भी चाहिए, यह हमारी साहित्यिक परंपरा के अनुकूल भी है और आवश्यकता भीकहा गया है - ’’सूर, सूर, तुलसी शशि, उड़ुगण केशवदास। बांकी सब खद्योत सम, जँह-तँह करत प्रकाश।’’ सूर्य, चन्द्रमा और तारों की रोशनी के बाद कुछ अहमियत जुगनुओं की भी होती है, पर हमारे अर्थात् मेरे समान प्रकाशहीन और हैसियतहीन व्यक्ति की तो कुछ औकात ही नहीं बनती कि इस पर कुछ कह सकूँ। जो कुछ भी कह…

हर्षद दवे का आलेख - वर्तन परिवर्तन - खुशी या तनाव

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वर्तन परिवर्तन - हर्षद दवे. ख़ुशीयातनाव?‘आप के पास केवल पांच-दस मिनट बैठते हैं तो ‘बैटरी चार्ज’ हो जाती है!’ नरेश शाह और मेरे अन्य मित्र मुझ से कहते हैं,’आप के चेहरे पर हमने कभी टेंशन नहीं देखा. क्या राज है इस का?’ वह मोटिवेशनल स्टोरी मैं हमेशा याद रखता हूँ जिसे आप भी पढ़ना पसंद करेंगे. एक मजदूर हमेशा काम करने जाता था. काम के वक्त उस का बोस उस पर चिल्लाता रहता था. अन्य मजदूर अपना काम उस पर थोप दिया करते थे. कभी चूक के कारण उसे डांट पड़ती थी तो कभी निर्धारित समय में कार्य पूरा करने का टेंशन उसे रहता था. रात को वह अपने एक मित्र के साथ रोज घर जाता था. उस का मित्र देखता कि घर में प्रवेश करने से पहले वह मजदूर आँगन में लगे वृक्ष के पास पल दो पल के लिए खड़ा रहता था. एक दिन वह मित्र उस के साथ उस के घर के अंदर गया. अंदर जाते ही उसने देखा कि वह बिलकुल आराम से, बेफिक्र हो कर बच्चों के साथ खेलता था. पत्नी के साथ हंसकर बातें करता था. माता-पिता के पास इत्मीनान से बैठ कर उन की बातें भी वह गौर से सुनता था. मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ. दूसरे दिन उसने अपने दोस्त से पूछा कि ‘काम करने में इतना टेंशन होते हुए …

पाठकीय : रामजी मिश्र 'मित्र' - कान्हा की मुरली की दर्द भरी आवाज

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सुबह सुबह मेले की ओर चल दिया। शिलापुर गाँव के मेले में बाइक खड़ी की और मेले का लुत्फ़ लेने लगा। मुझे शोर शराबे के बीच बांसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही थी और मैं उसी ओर खिंचा चला जा रहा था। अचानक वह ध्वनि बंद हो गयी मुझे बड़ा खराब लगा। अब उस कलाकार को ढूँढू तो कैसे। आखिर उसने बजाना बंद क्यों कर दिया अब तो न ढूंढ पाउँगा। एक बूढ़ा सा आदमी अचानक मेरे आगे लपककर आ गया मुस्कराकर मेरी राह सी रोकने लगा। मैंने उसकी वेश भूसा देखी गरीब था पर वह क्या चाहता है मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। मैं बड़ा असहज सा था इस विचित्र स्थिति के कारण। उसने मेरी ओर देख के कहा पहचान पाये तो मैंने न में सिर हिला दिया। वह हंस पड़ा, बोला आप इधर आइये मैं सोच रहा था ये कोई अराजक व्यक्ति है मेरा अनुमान और अधिक बलवान हो रहा था। मैंने भी सोच लिया था इसे आज सही रास्ता दिखा ही दूंगा। वह बांसुरी की दूकान पे ले जाकर रुक गया। वह बोला आपने पिछले साल मेरी बहुत सी बांसुरी खरीद ली थीं ये मेरी दुकान है। आपको देखा तो पहचान गया। मुझे भी घटना याद आ गयी यह सत्तर साल का सीतापुर के कजियारे में रहने वाला वहीँ इकबाल है। मुझे उससे मिल के काफ…

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग है घातक

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कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग है घातक
बढ़ती जनसंख्या और घटती उत्पादन क्षमता ने हमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मॉल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की ओर पुनः आकर्षित किया है। सदियों पूर्व मॉल्थस ने जनसंख्या सिद्धांत पर विचार करते हुए लिख दिया था कि हमें प्रकृति के विरूद्ध बढ़ रही जनसंख्या में नियंत्रण करना होगा। मॉल्थस ने स्पष्ट करते हुए कहा था कि जनसंख्या की गति 2, 4, 8, 16...जैसी गति से बढ़ रही है, जबकि खाद्यान्न उत्पादन 1, 2, 3 एवं 4... के अनुपात में आगे बढ़ता है। तब एक समय ऐसा आयेगा जब हम सीमित लोगों को ही भोजन करा पायेंगे, बाकि लोगों को भूखा ही रहना होगा। आज उक्त सिद्धांत सच्चाई की धरातल पर स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी समस्या से निपटने हम प्रकृति के विरूद्ध आचारण करते हुए खाद्यान्न उत्पादन के लिये कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ चढ़कर कर रहे है, जो निश्चित रूप से मानवीय शरीर के लिये दुष्परिणाम बनकर सामने आ रहा ही है। साथ ही जमीन की उर्वरा शक्ति को समाप्त कर कीटनाशकों और अधिक उत्पादन देने वाली खादों पर निर्भर कर रहा है। एक ओर जहां कीटनाशकों का प्रयोग हमारी फसलों की रक्ष्ज्ञा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जहरीले…

दीपक आचार्य का आलेख - बातें छोड़ें, काम करें

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आलेख (30 मार्च 2015 के लिए) बातें छोड़ें, काम करेंआओ राजस्थान बनाएँ- डॉ. दीपक आचार्य9413306077dr.deepakaacharya@gmail.comराजस्थान प्रदेशवासियों के लिए आज उल्लास का पर्व है। सभी ओर राजस्थान दिवस की धूम है और प्रदेशवासी उत्सवी माहौल में रमे हुए हैं।  राजस्थान दिवस का यह मौका हमें भावी विकास और तरक्की के आयामों के बारे में ठोस और पक्की धारणाएं बनाते हुए संकल्प लेने की याद दिला रहा है वहीं बीते समय में हमारे द्वारा राजस्थान विकास के लिए किए गए कार्यों के लिए मूल्यांकनपरक आत्मचिन्तन का भी मौका देता है।  किसी भी राज्य की तरक्की वहाँ के निवासियों की प्रदेश के प्रति समर्पित और आत्मीय भागीदारी पर निर्भर हुआ करती है। मातृभूमि के प्रति लगाव और निरन्तर विकास के लिए पूर्ण सहभागिता ही वह पैमाना है जो उस क्षेत्र विशेष को अग्रणी बनाता हुआ अन्य प्रदेशों के मुकाबले अन्यतम और विलक्षण पहचान दिलाता है। आज का दिन दो तरफा चिन्तन के लिए है। अब तक निभायी गई भागीदारी का मूल्यांकन करें और इसके साथ ही आने वाले समय में और अधिक क्या कर सकते हैं, इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है। साफ तौर पर देखा जाए तो इंसान सामुद…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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