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May, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी - चेहरा

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मोनी सिंह

सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वही से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैंने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नहीं होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। राम जाने आज क्या होगा?  आज के दिन तो मैंने अपना चेहरा शीशे में नहीं देखा। यही सोचकर मैं कालेज में प्रेक्टिकल देने जा रही थी। मां ने बड़े प्यार से लंच पैक किया था। घर से निकल कर बस स्टाप के लिए रिक्शा लेने को खड़ी थी। काफी देर से कोई रिक्शा वाला तैयार नहीं होता, जो होता पैसे ज्यादा मांगता। प्रेक्टिकल के लिए देरी हो रही थी।

तभी मैंने एक रिक्शे वाले को रूकाया, बस स्टाप चलने को कहा। उसने हां कर दिया। बड़ी खुशी से मैं जैसे बैठी। तभी, मैडम 30 रपए लगेगें।

मेरे तो होश उड़ गए थे। 15 रूपए की जगह 30 रूपए मांग रहा है हलकट कहीं का। जैसे मैं बैठी वैसे ही रिक्शे से नीचे उतर आई।

एक बार दिल मे ख्याल आया चलो पैदल ही चलते हैं। इतनी देर में तो बस स्टाप क्या कॉलेज पहुंच जाते।
मन में एक बात बार-बार मचल रही थी। अपना चेहरा क्यों नहीं देखा। जल्दी-जल्दी में क्यों भूल गई…

सप्ताह की कविताएँ - मुझे पिता बनना है

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मधु संधु मुझे पिता बनना है

बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह
मन की परतों में  निरंतर बजता है
एक उद्घोष 
कि  मुझे पिता बनाना है-
स्पष्टवादी, साहसी और निर्भीक
कर्त्ता होने का सुख भोगना है
अपना  साम्राज्य फैलाना है ।

माँ बहुत अच्छी है
उसका धैर्य
ज़्यादतियों को झेलने का सहज भाव
उसकी सहनशीलता, लगाव
असहाय मजबूरी में लिपटे त्याग
मेरा आदर्श नहीं बन सकते ।
पिता की गरिमा और आत्मगौरव
संचालन सुख और वीतराग
मुझे किसी विकल्प में नहीं डालते,
मैंने नंगी आँखों से जीवन देखा है
बिना किसी पूर्वाग्रह का चश्मा लगाए
मैं कहती हूँ मुझे पिता बनना है ।

परम्परा या आदर्शों का पालन
स्व अस्तित्व का जनाजा
स्वीकार नहीं मुझे
आरोपित उद्देश्यों और ठहराव की जड़ता घेरती है ।
अशान्त मानसिकता
रिक्तता , अंतहीन शून्य,
खोखलापन
आदर्श और बलिदान के अलौकिक कवच
से छुटकारा पाना है
नए संतुलन खोजने हैं
मुझे पिता बनना है ।

सम्बन्धों की मशीनी जिंदगी में
निरीह और हताश
सबको अपनापा देकर
अपने को भुलाने वाली
सजायाफ्ता औरत मुझे नहीं बनना
मुझे पत्नी नहीं
पति का पति बनाना है
भेड़ बकरी नहीं, सिंह बनना है ।

मुझे नहीं घुट-घुट के जीना
नहीं पालनी …

किन्नरों का अपना साम्राज्य

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- बाल मुकुन्द ओझा
        किन्नरों का देश-भर में अपना साम्राज्य है। वे अपने लिये एक अलग और अनूठी दुनियाँ का सपना देखते हैं और उसी में जीना मरना और रच-बसना चाहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही अपने एक ऐतिहासिक फैसले में किन्नरों को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी है। किन्नरों को अलग श्रेणी में रखने के सरकार को निर्देश दिये गये हैं। इससे किन्नरों में खुशी की लहर व्याप्त हो गई और उन्होंने यह खुशी सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी की। हाल ही में एक ट्रांसजैंडर के कॉलेज प्रिंसिपल बनने की खबर भी सुर्खियों में आई. प्राचीन समाज में ये स्वीकृत थे, परंतु दुख की बात है कि आधुनिक समाज में स्वीकार्यता के लिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की ओर देखना पड़ रहा है।

       आमतौर पर किन्नरों का अपना अलग से कोई रोजगार या व्यवसाय नहीं है। वे नाच-गा कर और बधाई लेकर अपना जीवन यापन करते हैं। किन्नरों की देश भर में संख्या लाखों में है। परिवार में शादी अथवा बच्चे के पैदा होने पर किन्नर बधाई लेते हैं। यह बधाई कोई छोटी-मोटी नहीं अपितु पाँच अंकों में सामान्य रूप से होती है। किन्नर हठी है, अपनी बात से पीछे नहीं हटते और मा…

मौत का इंतजार क्यों ?

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डॉ. दीपक आचार्य

दुनिया की भी अजीब रीत है।  जिन्दा रहते हैं तब तक कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते रहते हैं। साँप-बिच्छुओं और कैंकड़ों जैसा व्यवहार करते हैं। किसी खूंखार हिंसक जानवर की तरह आचरण करते हैं।  कभी जंगली कुत्तों की तरह फूल वोल्युम में भौंकते और गुर्राते रहते हैं, कभी लपक कर फाड़ डालने को उतावले रहा करते हैं और कभी किसी मारक मिसाईल की तरह उन पर ही टूट पड़ते हैं जो अपने होते हैं।

इंसानी फितरत कब क्या कर गुजर जाए, भगवान भी अंदाजा नहीं लगा सकता। जब तक रिश्ते बने रहते हैं तब तक एक-दूसरे के लिए हैं। और ठन जाए तो फिर एक-दूसरे की बरबादी के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं।

अक्सर हम जमीन-जायदाद, छोटी-छोटी ऎषणाओं, तुच्छ स्वार्थों और अहं की लड़ाई के लिए अपने आपको इतना गिरा देते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। कई मर्तबा अपने आपको ऊँचा उठाने के लिए सारी शर्म त्याग कर गिर जाया करते हैं और कई बार दूसरों को गिराते रहकर आगे बढ़ते रहते हैं। गिरने और गिराने का यह खेल ताज़िन्दगी चलता रहता है।

बात सहोदरों की हो या किसी भी तरह के आत्मीय रिश्तों की, इनमें समन्वय बनाए रखकर एक दूसरे को पारिवारिक माहौल देते हुए आ…

हास्य - व्यंग्य : फ़ेसबुक में गहरे पानी पैठ ....

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सुशील यादव
फेसबुक के गहरे पानी में सर्फिंग का शानदार समय चल रहा है |

कबाडियों को छोड़, हर किस्म के लोग जुड़ने लगे हैं,उनको अपने कबाड़ जोड़ने के धंधे से फुरसत नहीं |

     जब भी कोई गंभीर ‘पोस्ट’ नथ्थू की नजर से गुजरती ,वो दौड़ा- दौड़ा  तुरंत मेरी ‘राय-मशवरा’ के फील्ड में आ जाता  है |मेरी सहमति –असहमति का उस पर कदाचित अविलंब प्रभाव भी  पड़ता है |वह फेसबुक में वैसी प्रतिक्रिया चिपका देता है |एक दिन वह सप्ताह भर का निचोड़ लेके आ गया |एक लोकल लेखक के प्रति खासा आक्रोश लिए था |मैंने शांत कराते हुए पूछा क्या बात है नत्थू ,वो मुझसे कहने लगा गुरुजी ये जो लेखक है न, अपने आप को टॉप (तोप) समझता है,कहता है फेसबुक पर ‘विचार रखना चाहिए ,कविता गोष्ठी में पढ़ने की चीज है’ |उनको शिकायत रही कि सुबह-सुबह कवि लोग उनके फेसबुक में कविता ठेले रहते हैं|

नत्थू ने कहा ,उतुकतावश हमने उनके साईट को खंगाला, बमुश्किल एक- दो रचनाएँ. वो भी उनके ख़ास परिचित व्  स्तरीय लोगों की पाई गई |वे नाहक चिड़चिडाये रहते हैं|या फेसबुक में छाये रहने,टिप्पणी पाने की जुगाड़ में दीखते हैं |

 हम कहते हैं ,अगर पसंद की बात पोस्ट में न दिखे तो जरूर…

बाल कहानी - माईक का भाप के इंजन से चलने वाला एक फावड़ा

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 वर्जिनिया बर्टन

 हिंदी अनुवाद -  अरविंद गुप्ता


  माईक के पास भाप के इंजन से चलने वाला एक फावड़ा यानी स्टीम शवल था। शवल सुंदर और लाल रंग का था। उसका नाम मेरी ऍन था। माईक को अपने स्टीम शवल मेरी ऍन पर बड़ा गर्व था। वह हमेशा कहता कि उसका स्टीम शवल एक दिन में जितनी खुदाई करेगा उतनी सौ आदमी एक हफ्ते में भी नहीं कर पाएंगे। क्योंकि माईक की शेखी को कभी परखा नहीं गया था, इसलिए असली सच्चाई किसी को मालूम नहीं थी।

 माईक और मेरी ऍन बरसों से साथ-साथ खुदाई कर रहे थे। माईक ने अपने स्टीम शवल को इतनी अच्छी तरह से रखा था कि मेरी ऍन अभी भी बढ़िया हालत में थी।

  कभी माईक और मेरी ऍन ने मिलकर मीलों लंबी नहरें खोदी थीं।

 इनमें बड़ी-बड़ी नावें तैरा करती थीं।

 माईक और मेरी ऍन ने बड़े ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों को काटा था, जिससे उनकी गुफाओं में से रेलगाड़ियां गुजर सकें।

 माईक और मेरी ऍन ने ऊबड़-खाबड़, ऊंचे-नीचे खड्डों को खोदकर समतल बनाया था।

 फिर उन जगहों पर लंबी-लंबी सड़कें बनीं जिन पर सैकड़ों-हजारों गाड़ियां दौड़ने लगीं।

 माईक और मेरी ऍन ने जमीन की खाइयों को पाटकर उसे एकदम समतल बनाया था, जिससे वहां पर विमानों के उतरने के लिए ऍअरपोर्…

ज्ञान -विज्ञान : आप अपने आसपास की मिट्टी के बारे में कितना जानते हैं?

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मिट्टी

 लौरी बेकर

 हिंदी अनुवाद – अरविन्द गुप्ता

  लौरी बेकर का जन्म 1917 में बरमिंघम, इंग्लैन्ड में हुआ। 1937 में उन्होंने बरमिंघम स्कूल ऑफ आरकीटेक्चर से स्नातक की डिग्री पाई, और उसके बाद वो आर आई बी ए (रीबा - रायल इंस्टीट्यूट आफ ब्रिटिश आरकीटेक्ट) के सदस्य बने। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वह एक डाक्टरी टोली के साथ चीन गए, जहां उन्होंने कुष्ठरोग के इलाज और रोकथाम का काम किया। इंग्लैन्ड वापस जाते वक्त उन्हें अपने जहाज के इंतजार के लिए बम्बई में तीन महीने रुकना पड़ा तभी उनकी भेंट गांधीजी से हुई। इस भेंट का उन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने भारत लौटकर आने और काम करने का निश्चय किया। 1945-66 के दौरान श्री बेकर स्वतंत्र रूप से भवन डिजायन के साथ-साथ कुष्ठरोग अस्पतालों के प्रमुख आरकीटेक्ट भी रहे। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक पहाड़ी गांव में काम किया। 1966 में श्री बेकर दक्षिण में केरल गये जहां उन्होंने पीरूमेदी आदिवासियों के बीच काम किया। 1970 में वह त्रिवेन्द्रम आए और तब से वह सारे केरल में भवनों के डिजसयन और निमार्ण का काम कर रहे हैं। उन्होंने हुडको के संचालक, योजना आयोग की आवास कमेटी, और…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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