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May 2015
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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मोनी सिंह

सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वही से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैंने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नहीं होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। राम जाने आज क्या होगा?  आज के दिन तो मैंने अपना चेहरा शीशे में नहीं देखा। यही सोचकर मैं कालेज में प्रेक्टिकल देने जा रही थी। मां ने बड़े प्यार से लंच पैक किया था। घर से निकल कर बस स्टाप के लिए रिक्शा लेने को खड़ी थी। काफी देर से कोई रिक्शा वाला तैयार नहीं होता, जो होता पैसे ज्यादा मांगता। प्रेक्टिकल के लिए देरी हो रही थी।

तभी मैंने एक रिक्शे वाले को रूकाया, बस स्टाप चलने को कहा। उसने हां कर दिया। बड़ी खुशी से मैं जैसे बैठी। तभी, मैडम 30 रपए लगेगें।

मेरे तो होश उड़ गए थे। 15 रूपए की जगह 30 रूपए मांग रहा है हलकट कहीं का। जैसे मैं बैठी वैसे ही रिक्शे से नीचे उतर आई।

एक बार दिल मे ख्याल आया चलो पैदल ही चलते हैं। इतनी देर में तो बस स्टाप क्या कॉलेज पहुंच जाते।
मन में एक बात बार-बार मचल रही थी। अपना चेहरा क्यों नहीं देखा। जल्दी-जल्दी में क्यों भूल गई। इतनी देर से यहां खड़ी हूं। 2 मिनट वहां नहीं दे सकती थी।

उदास मन लिए तेजी से पैदल बस स्टाप के लिए चल दिया। समय भी कम था। वहां पहुंचकर बस का इंतजार भी करना था।

मैं पैदल चल रही थी तभी पीछे से गाड़ी का हार्न सुनाई पड़ा। और मेरे बगल में आकर गाड़ी रूक गई। हेलमेट होने की वजह से मैं उसे पहचान न सकी थी।

मैंने अपना कदम और तेजी से बढ़ा दिया। ऐसे लोगों का काम होता है सरे राह अकेली लड़की देखी छेड़ दिया।
तभी उस लड़के की आवाज़ आती है, रानी पहचाना नहीं क्या?

अपना नाम सुनकर मैं थोड़ा हैरान रह गई। पीछे मुडकर देखा तो मेरे भाई का दोस्त था। जो कभी एक या दो बार घर आया था।

वह मेरे पास आया और बोला कहा जा रही हो। पैदल ही। अपनी परेशानी मैंने उसे बताई। रिक्शा नहीं मिल रहा है। आज कॉलेज में प्रैक्टिकल है। देर हो रही थी इसलिए पैदल बस स्टाप जा रही हूं।

 चलो मैं छोड़ देता हूं। उधर ही जा रहा हूं। बस स्टाप पहुंचकर मैंने उसे शुक्रिया कहा। अब बस का इंतजार था। 
इंतजार की घड़ी की फिर से शुरूआत हो चुकी थी। आधे घण्टे बीत चुके थे। अब क्या होगा?  प्रैक्टिकल शुरू होने में सिर्फ 45 मिनट बचे थे। मैं नर्बस होती जा रही थी। ऐसा लग रहा है कि अब तो ये साल गया अगले साल फिर इसी क्लास में गुजारना पड़ेगा। उलझन से इधर से उधर क्या करूं?  भाई भी घर पर नहीं था कि फोन कर लेती।
सिर नीचे किए मैं वही पर बैठी थी। तभी एक नया करिश्मा होना था। कोई आवाज आई तुम अभी तक यहीं हो। पेपर नहीं देना क्या ? कब से पेपर शुरू है? मुझे लग ये आवाज़ भगवान की तो नहीं है। ऊपर चेहरा किया तो आदित्य मेरे भाई का दोस्त था। वहीं से गुजरा।

जिसने मुझे बस स्टाप छोड़ा था। पीठ पर बैट टांगे लगता है कही क्रिकेट खेलने जा रहा है। मैंने कहा पहले रिक्शा अब बस नहीं मिल रही है। चलो कॉलेज छोड़ देता हूं। नहीं आप जहां जा रहे है आप को देर हो जाएगी। कोई बात नहीं पर तुम्हारा पेपर तो छूट जाएगा। मेरे देर से पहुंचने के बाद भी काम चल जाएगा।

मैं उसके साथ गाड़ी पर बैठ गई। टोपी लगाए हुए, लम्बे बाल, सफेद लोवर और टी शर्ट पहने। आदित्य ने कॉलेज के सामने हमें उतारा। और कहा। दो तीन घण्टे मैं वापसी करूंगा। अगर पेपर हो जाए तो साथ चल लेना।  मेरा नम्बर ले लो। बता देना मुझे।

नम्बर को लेकर मैं कॉलेज चली गई। वहां अपनी सहेली रीता से सारी बात बताई। यार आज का दिन तो मेरे लिए तो ख़तरनाक था। रोज मैं अपना चेहरा शीशे में देखकर निकलती थी। आज जल्दबाजी में भूल गई।

न रिक्शा मिल रहा था। न बस वो तो आदित्य मिल गया तो आ गई नहीं तो पेपर नहीं दे पाती। अरे क्या बात है?  बहाना अच्छा है, अपने ब्यायफ्रेंड के साथ घूमने का। अरे नहीं कहां ले जा रही हो बातों को। मेरे भाई का दोस्त है। एक दो बार घर गया है। ओह तो घर भी हो आया है। रानी तेरी तो कहानी शुरू हो गई। अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तो कैसी बात है मेरी जान। हम दोनों हंसने लगते हैं।

तभी घण्टी की आवाज़ सुनाई देती है। प्रैक्टिकल शुरू हो गया था।  दो घण्टे बाद हम बाहर निकले तो सोचा कि फोन कर ले। लेकिन तब तक बस आ गई थी। तो उसी से लौट आए। घर आकर मैंने मम्मी को सारी बात बताई। चलो भला हो उसका जो उसने छोड़ दिया नहीं तो पेपर छूट जाता। मैंने मां से कहा, उसे मैंने पहचाना नहीं था।
उस रात मुझे नींद नहीं आ रही थी। पूरी रात उस घटना के बारे में सोचती रही। सबसे ज्यादा तो रीता की बातों को। और हंसती रही। उसके लम्बे बाल, वो टोपी लगा कर रखना। क्या लग रहा था।  खैर रात बीत गई किसी तरह। दूसरे दिन रीता का फोन आया। हाल-चाल पूछने के बाद उसने कहा तुम्हारे उनका क्या हाल है। मेरी जुबान से न चाहते हुए भी निकल गया। ठीक है। तभी उसने कहा अभी कल कह रही थी कुछ नहीं है और आज कह रही हो ठीक हैं। मैं बातों को बनाने लगी। पर वो एक न मानी।

सच्चाई ये थी कि कुछ नहीं था। लेकिन उसकी बातों को सुनकर कुछ जरूर होने लगा था। फोन कटते ही याद आया कि अरे मैं कितनी अहसान फरामोश हूं। शुक्रिया तक नहीं किया उसका। चलो ये तो एक बहाना था। बात करने का। फोन किया पर कोई जवाब नहीं। गुस्सा आया कोई परवाह ही नहीं। जैसे मैं कोई रोज फोन करती हूं उसे।
दिन में भी ख्याल शुरू हो गए थे। तभी फोन की घण्टी सुनाई देती है। फोन उठाते ही, हैलो कौन, उधर से आवाज़ आई।

मन मे सोचा कल कॉलेज छोड़ा और आज भूल गया। मैंने भी अंजान बन कहा किससे बात करनी है। उसने कहा कि आप का फोन आया था।

कितना अजीब बंदा है नम्बर भी सेव नहीं किया था। फिर मैंने कहा रानी बोल रही हूं। कल आप ने कॉलेज छोड़ा था। याद आया। हा बताओ रानी पेपर कैसा गया। ठीक गया मैंने सोचा शुक्रिया अदा कर दे  आप का। आप न आते तो पेपर छूट गया होता।

फोन कट चुका था। शायद बैलेंस खत्म हो गया था।  बात पूरी नहीं हो सकी थी। दिल में बहुत कुछ था। उस दिन से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं खो चुकी हूं। अब न तो चेहरा देखने की फिकर नहीं थी। दिल में जो आदित्य का चेहरा उतर गया था। अब हर दिन उससे बात करने का मन होता  था। वो नासमझ इससे अंजान था। उसे क्या फर्क उसे क्या पता कि कोई उसके फोन का इंतजार कर रहा है।

काफी दिन हो गए थे मेरी बात उससे नहीं हुई थी। परेशान खोई, मैं कोई बहाना तलाश रही थी।
 पर साला बहाना ढूंढो तो नहीं मिलेगा। आखिर वो दिन आ ही गया। बहाने का दिन। मेरा जन्म दिन था।
मैंने मां पूंछकर आदित्य को बुलाया था।

शाम को मेहमान आने से ज्यादा मैं आदित्य का इंतजार कर रही थी। निक्कमा कहीं का। अभी तक आया नहीं। समय की कोई परवाह नहीं है।

मेहमान आ गए थे। केक भी कटने जा रहा था। तभी पीछे से हैप्पी बर्थ डे की आवाज सुनकर मुड़ी तो देखा आदित्य खड़ा था। खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। केक पर चाकू नहीं चल रहा था वो अब दौडने जा रहा था। केक काटकर मां को खिलाया। और लोगों को खिलाया पर दिल कह रहा था सबसे पहले आदित्य को खिलाऊं पर चाहते हुए भी न कर सकी।

तभी फोटो खींची जा रही थी। मैंने भी मोबाइल में उसकी फोटो खींच ली। किसी को पता न चले और न ही उसको की मैंने फोटो खींची है उसकी।

सब खाना खाकर जा रहे थे। दिल कह रहा था कि आदित्य को रोक लू। थोड़ी देर बाद जाए पर कैसे रोकूं। वो तो तैयार बैठा था घोड़े पर। वो चला गया था। अब उसकी फोटो मेरी पास थी। उसका एक चेहरा मेरे पास था। जिसे देखने के लिए मैं बेचैन रहती थी।

अब क्या था? अपने चेहरे को देखना छोड़ सुबह मोबाइल में उसका चेहरा सामने देखती थी। इस पूरे बात से आदित्य अंजान था। पर उस दिन से मैं उसे बेपनाह चाह रही हूं। अब ऐसा लगता  है कि उसका चेहरा ही सब कुछ है। न देखो तो दिन नहीं जाता सही से। फर्क इतना था कि पहले शीशे में अपना चेहरा देखती थी और आज मोबाइल पर हर रोज आदित्य का।

इस इंतजार में कि उसे इस बात की खबर हो जाए। वो मुझसे बात करना शुरू कर दे। कभी-कभी तो अपने आसुंओं से तकिए को गीला कर देती थी।

चेहरे के साथ मेरी सारी दिन चर्या बदल गई थी।
--
मोनी सिंह
स्वतंत्र लेखिका एंव ब्लागर
रायबरेली, उत्तर प्रदेश
Email-monarbl84@gmail.com

 

मधु संधु

मुझे पिता बनना है

बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह
मन की परतों में  निरंतर बजता है
एक उद्घोष 
कि  मुझे पिता बनाना है-
स्पष्टवादी, साहसी और निर्भीक
कर्त्ता होने का सुख भोगना है
अपना  साम्राज्य फैलाना है ।

माँ बहुत अच्छी है
उसका धैर्य
ज़्यादतियों को झेलने का सहज भाव
उसकी सहनशीलता, लगाव
असहाय मजबूरी में लिपटे त्याग
मेरा आदर्श नहीं बन सकते ।
पिता की गरिमा और आत्मगौरव
संचालन सुख और वीतराग
मुझे किसी विकल्प में नहीं डालते,
मैंने नंगी आँखों से जीवन देखा है
बिना किसी पूर्वाग्रह का चश्मा लगाए
मैं कहती हूँ मुझे पिता बनना है ।

परम्परा या आदर्शों का पालन
स्व अस्तित्व का जनाजा
स्वीकार नहीं मुझे
आरोपित उद्देश्यों और ठहराव की जड़ता घेरती है ।
अशान्त मानसिकता
रिक्तता , अंतहीन शून्य,
खोखलापन
आदर्श और बलिदान के अलौकिक कवच
से छुटकारा पाना है
नए संतुलन खोजने हैं
मुझे पिता बनना है ।

सम्बन्धों की मशीनी जिंदगी में
निरीह और हताश
सबको अपनापा देकर
अपने को भुलाने वाली
सजायाफ्ता औरत मुझे नहीं बनना
मुझे पत्नी नहीं
पति का पति बनाना है
भेड़ बकरी नहीं, सिंह बनना है ।

मुझे नहीं घुट-घुट के जीना
नहीं पालनी अन्तर्मन में गहरी दहशतें
नहीं झेलने सैलाब
मानसिक उलझनें, द्वंद्व
पिता मैं हूँ तुम्हारी आत्मजा
सिर्फ तुम्हारा प्रतिरूप बनना है
मुझे पिता बनना है ।

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सुनील संवेदी

न जाओ...
तुमने-
निश्चित कर ही लिया है
तो, कदम बढ़ा ही दो
दायां या बायां
जो चाहो, पहले।
परंतु-
इतना आगे निकल जाना
कि, चाहकर भी
लौट आना संभव न हो!
आज जब लगता है
कि, किसी भी कोण से निहार लो
ये जगह ठीक नहीं बन पा रही।
ये दीवारें मसलने लगी हैं।
यह छत कुचलने लगी है।
यह दरवाजा
सिर्फ बाहर निकालने भर को खुलता है।
ये बासी सूरतें
असहनीय बदबू फेंकने लगी हैं।
तब लगेगा
कि, सच में
दिशा बदल देने भर से
कोई जगह ठीक नहीं बन जाती
छत, दरवाजा और दीवारों सहित
सूरतें नहीं हो पातीं
ठीक चाहने जैसी।
हृदय के-
एक-एक कोने पर
नाखून गड़ायेगा ही
नितांत... निजी कुछ।
जाने-पहचाने निशान उछल कर
आने लग जायेंगे मुंह से बाहर
जुबान को खरोंचते हुए
आहों और सिसकियों के रूप में।
आहिस्ता से पलट जाना
स्थिर, स्थाई रहकर ही।
ताकते रहना बस्स...
अंगुलियां फड़फड़ाकर
कोण बदल बदलकर नेत्रों के।
राह बिछी ही होगी वैसे ही।
परंतु-
तुम्हें ज्ञात होगा
एकाएक
कुछ सूरतें तब्दील हो रही हैं
परछाई के रूप में।
-
suneelsamvedi@gmail.com
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कुबेर


मो. 9407685557
कविता
अपनी वही तो दुनिया है।
ये सुख फुदकती चिड़िया है।
दुख तो उफनती दरिया है।
इनसे परे भी दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
मजहब की अपनी दुनिया है।
यहाँ धर्म की भी दुनिया है।
इनसे परे जो दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
यहाँ प्यार में तो बंधन है।
नफरत जलन है, उलझन है।
इनसे परे जो दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
इतनी तो उनकी दुनिया है।
और वो तुम्हारी दुनिया है।
दुनिया, जो सबकी दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
---
ऐसा क्यों है?
वह समय का पाबंद है
पल भर इधर न उधर
न वह किसी के लिए रुकता है,
और न ही वह किसी की प्रतीक्षा करता है।
और प्राच्य-क्षितिज के किसी उस सुनहरे गवाक्ष से
नियत समय पर उसके सुनहरे कदमों की आहट आने लगी
उसके खिलखिलाहट की मधुर रश्मि-ध्वनियाँ भी -
क्षितिज में बिखरने लगी
और गूँजने लगी उसकी मनुहार
प्यार और दुलार-भरी पुचकार,
एक आह्वान गीत की तरह।
अपने दोनों पंख फैला दिये,
आसमान की ओर स्वागत में
और समवेत् हर्ष-निनाद किया,
सुषुप्तावस्था त्याग, अभी-अभी उठे,
आँखें मलते, अलसाये, अंकुरित होते बीजों ने।
उसके स्वागत के लिए आतुर दरख्तों ने
झूम-झूमकर जीवन-गीत गाये
चंचल हवाओं ने साथ दिया,
और उन सुंदर गीतों को अपने
सुरभित-मधुर, शीतल-सुकोमल, संगीत से सजाये।
नन्हीं पक्षियों ने भी अपने पंख खोले
और खेलने लगे सुंदर जीवन-नृत्य का खेल
गाने लगे प्रेम के अमर गीत
निःसृत होता है जो
प्रेमियों के अनुराग भरे,
निःश्छल हृदय की, अनंत गहराइयों से;
और फिर उड़ चले वे
आसमान की ऊँचाइयों को नापने
संकल्प और सफलता का संदेश लेकर।
उसने हर्षित होते हुए कहा -
''ठहरो! साथियों, मैं भी आ रहा हूँ
बड़े प्यारे, और -
बहुत सुंदर लगते हो तुम लोग मुझे।
तुम्हीं हो, तुम्हीं तो हो 
जिनके बीच रहने की,
जिनके जीवन का संगीत सुनने की
अनंत अभिलाषा थी मेरी
जो जय-उद्घोष है, जीवन के पूर्णता की।
हाँ! तुम्हीं हो, तुम्हीं हो
जिनके जीवन-नृत्य देखने
कब से तरसती थीं मेरी आँखें
जिसे देख रुकते नहीं हैं मेरे पैर
झूम-झूम उठती है मेरी आत्मा
और तब!
सारी आकुलता और सारी व्याकुलता
हो जाती हैं तिरोहित,
जाने कहाँ, सदा-सदा के लिए।
हाँ! हाँ! तुम्हीं हो वे लोग
जिनके प्रेम-गीत सुनने के लिए
जाने कब से तरसता था मेरा हृदय
जो उतर जाती है,
शीतलता का स्पर्श देते हुए
हृदय की अतल गहराइयों में
अमरता का संदेश लेकर।''
पर जल्द ही वह चौक उठा
उसका उत्साह, उसकी खुशी, जाती रही
जब उसने आस-पास कहीं नहीं देखा, कोई मनुष्य।
उसने अपने दोनों हाथ ऊपर लहराते,
झूमते, मस्ती में गाते,
अंकुरित होते, बीजों से पूछा -
''हे! नन्हे प्यारे साथियों!
मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता?''
नन्हें अंकुरों के खिले चेहरे मुरझा गये
उन्होंने खेत की ओर जाते -
किसी मुरझाये,
उदास-हताश-निराश किसान को देखा
देखा तो उनके पैरों ने थिरकना बंद कर दिया
कंठ ने गीत गाने से इंकार कर दिया
सब ने एक समवेत आह भरी,
और समवेत स्वर में ही उन्होंने कहा - ''मनुष्य?''
उसने भी देखा
उस उदास-हताश-निराश किसान को
उसे यह दृश्य बड़ा अजीब लगा
उसनें अंकुरों से पूछा -
''यह इतना उदास-हताश और निराश क्यों है?''
अंकुरों ने एक दूसरे को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा
और उन्होंने भी समवेत स्वर में प्रश्न किया -
''हाँ! हाँ! भला क्यों है यह
इतना उदास-हताश और निराश?''
उसने दरख्तों के साथ जीवन का गीत गाते
उन गीतों को मधुर संगीत से सजाते, हवाओं से पूछा -
''हे! जीवन-संगीत के सर्जकों
यह तो बताओ, मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता?''
हवाओं ने कुछ दूर किसी कारखाने की
आसमान में काली लकीरें बनाती चिमनियों को देखा
और फिर वहाँ से निकलकर आते,
सड़क पर घसीटते-चलते,
मरियल-मटियल, मजदूरों के दल को देखा
और गहरी साँसे लेते हुए कहा - ''मनुष्य?''
उसने भी देखा
सड़क पर घसीट कर चलते,
मरियल-मटियल, मजदूरों के झुण्ड को
उसे आश्चर्य हुआ, यह दृश्य देखकर
उसने हवाओं से पूछा -
''जीवन-संगीत देने वाले साथियों, बताओगे? -
ये इतने अश्क्त, इतने मरियल, इतने मटियल क्यों है?''
जीवन-संगीत रचने वाले हवाओं ने भी कहा -
''हाँ! हाँ! ये इतने अशक्त,
इतने मरियल, इतने मटियल क्यों है?''
अंत में उसने हताश स्वरों में
जीवन गीत गाते,
मस्ती में झूमते दरख्तों से पूछा -
''जीवन-गीत गाने वाले मित्रों! आखिर बताओगे?
मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता यहाँ?''
दरख्तों ने घाट पर एक दिव्य व्यक्तित्व की ओर देखा
दिव्य मंत्रोच्चार के साथ जो मस्त था, आरती करने में।
स्वर्ण आभूषणों से आभूषित
किसी दिव्य वाहन में सवार एक परिवार की ओर देखा।
और सहमते हुए कहा - ''मनुष्य,
मित्र! मनुष्य आते तो हैं यहाँ, पर कभी-कभी,
सदियों बाद।''
उसने कहा -
''मनुष्य क्या इतने दुर्लभ हो गये हैं?
दरख्तों ने निराश स्वरों में कहा -
''हाँ मित्र! मनुष्य इतने दुर्लभ हो गए हैं।''
नन्हीं-नन्हीं पक्षियाँ भी सुन रही थी,
समझ रही थी ओर गुन भी रही थी
उसके और दरख्तों की बातों को
सबने फुदकना बंद कर दिया
और अचानक सबने एक साथ कहा -
''हाँ, हाँ, मित्र! मनुष्य बड़े दुर्लभ हो गए हैं
सदियों बाद ही दिख पाता है कोई...''
और सबने अपने-अपने पंख खोले
हवा में लहराए,
आश्चर्य में अपने-अपने सिर हिलाए
और आसमान का सीना चीरने लगे
उड़ते हुए सबने फिर एक साथ कहा -
''पर, पता नहीं क्यों?''
कुबेर
मो.- 9407685557
00000000000
     

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा       

छणिकाएँ
घंटियाँ मंदिर में बजती रहीं
1.तेरे आने का अंदेशा था 
जलता रहा दिया रात भर ,
रोशनी के लिए
2.सुना है बारिश हुई रात भर
सुबह हुई तो प्यास
वैसे  ही  बरकरार थी
3.घंटियाँ मंदिर में बजती रहीं
पूजा की थाली  तो
कहीं और सजी थी
4.जुड़े हुए  थे हाथ
प्रार्थना  के लिए
प्रतीक्षा की घड़ियां रुकी रहीं
5.पाया  था उसे
पूजा  के प्रसाद  की तरह
उस प्रसाद में जहर किसने मिलाया 
17/05/2015
डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन  साहिबाबाद  - 201005 ( ऊ . प्र . )
मो. न.09911127277 (arorask1951@yahoo.com )
00000000000000

निशान्त यादव

" बावरे मन लौट आ "

बावरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।                                             
देख लंबा रास्ता , अब मस्तियों के दिन गए ।।

राह पथरीली मिले या फ़ूल की चादर मिले ।
चल समय पर छोड़ दे , पर बावरे मन लौट आ ।।

चुन लिया है फूल को काँटों के संग इस राह में ।
कौन जाने छोड़ दे  ...  एक  साथी वास्ता ।।

राह फूलों की चुने सब , काँटों से किसका वास्ता ।
नींद सुख की सब जियें , दुःख से है किसका वास्ता ।।

आ अंधेरों से लड़े , अब रौशनी की लौ लिए ।
चल जला दें  राह में रौशन किये लाखों दीये ।।

छोड़ दे अब साथ उसका जिसने अँधेरे दिए ।
बावरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।।

रौशनी की एक लौ है काफी ,  मन के अँधेरे तेरे लिए ।
देख फिर भी लाया हूँ मैं , आशा के लाखों दीये ।।

फिर से न बिखरेगा तू , आज ये वादा तो कर ।
देख ले आया हूँ मैं, निशाँ मंजिलों के ढूंढ कर ।।

लौट आ अब देख ले , जिंदगी दरवाजे खड़ी ।
बावरे मन लौट आ , आवारगी के दिन गए ।।
निशान्त यादव
8527556425
000000000000000

सुधा शर्मा


नारी, तुम सदा ठगी जाती!
कैशोर्य उमंग और तरंगें
एक ज्वाला पर सहस्र पतंगे।
तन के उभार और गहराई
नर दृष्टि उधर दौडी आई।।
        लक्ष अहेरियों में फँस जाती।
        नारी तुम ! सदा ठगी जाती।।
अश्लील फब्तियाँ सहे जवानी
तेरी कहानी वही पुरानी ।
देह की ओर बढ़ते हाथ
नीच या नंगी नर की जात।।
        तूफानों में तुम घिर जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
आँखों के जंगल में अकेली,
हर निगाह से नजर बचाए।
किस निगाह पर विश्वास करें,
किस निगाह से नजर मिलाए।।
        हर निगाह तुम्हें भरमाती
        नारी तुम सदा ठगी जाती।।
गर्म सदा माँस का बाजार
तेरा सौदा तेरा व्यापार।
सदा चीर हरण को तैयार,
पापी नर के हाथ हजार।।
        नर का एक खिलौना रह जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
तेरा प्रेम तेरा समर्पण,
मृत मनु को ममता का तर्पण।
अहं स्वार्थ 'मैं' की सत्ता से दूर
प्रेम, प्रेम बस प्रेम में चूर।।
        यद्यपि प्रेम सिंधु ही बन जाती।
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
विश्वास तेरा प्रेम तुम्हारा
अपना कुछ भी नहीं विचारा।
नर एक भँवरा तन का प्यासा,
तुमको उससे प्रेम की आसा?
        झूठे प्रेम में खो जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
हाय! मीठी बातों में आकर ,
चल दी अपना सर्वस्व लुटाकर।
कण-कण बदली बनकर बरसी,
हाय! पर एक बूँद को तरसी।।
         एक मृगतृणा में फँस जाती
         नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
सकल अरण्य में वह एक भँवरा,
फूल का रक्षक वह एक भँवरा।
लूट ले जब वही विश्वास,
रूप तेरा कहाँ फिर सँवरा।।
          जब रक्षक से ही धोखा खाती।
          नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
हर आँख में एक चिंगारी है,
हर कोई यहाँ शिकारी है।
वो भी तुम्हें नोचना चाहता
वह भी तुम्हें लुटना चाहता।।
           जिनके लिए आँचल बनजाती।
           नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
जिस तन जिस मन में तुम रहती
जिसकी आक्राताएँ सहती।
उसकी भावनाएं अनन्त जब
काम विषयों में बहने लगती।।
            जब तुम खुद भोग्या बन जाती।
            नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
                          ।।   इति।।
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मनीष सिंह


जो गीत लिखे थे तुम्हारे लिए
जो गीत लिखे थे तुम्हारे लिए,
जो एहसास पिरोए थे अल्फ़ाज़ों में।
आज दुनिया उसे पढ़ रही है ,
और कहती है क्या खूब लिखा है।
कितना प्यार भरा है इनमें ,
और कितना गहरा दर्द छुपा है।
होगी कितनी वो ख़ुशक़िस्मत ,
जिसके लिए ये तुमने लिखा है।
दिल में टीस सी उठती है ,
और मन में ख्याल ये आता है।
कि अनजान लोग ये समझ गए ,
फिर तुम ही क्यों ये ना समझे।
ज़िन्दगी से ज्यादा अज़ीज़ थी तुम ,
आज भी हो और हमेशा रहोगी।
दिल के हर कोने में झाँको ,
तो उसमें बस तुम ही तुम मिलोगी।
तुम हमेशा कहती थी ये ,
कि तुम्हारे बिन ज़िन्दगी न रुकेगी।
पर जान न सकी कि बाद तुम्हारे ,
खोने को मेरे पास कुछ न बचेगा।
साँसे अब भी लेता हूँ मैं ,
हर चीज अपनी जगह पर है।
एक मुस्कराहट के पीछे न जाने ,
दर्द छुपाकर रखती ये पगली आँखें।
निकला हूँ बेचने को बाज़ार में ,
यादों को तुम्हारी लफ़्ज़ों में लिखकर।
खरीदार भी कई हैं पर न जाने ,
यादें बिकती नहीं और न चैन मिला कहीं।
सन्देश अगर पहुँचे तुम तक ,
और समझ सको जज़्बातों को जो।
बस इतना ही कहना है मुझको।
कि ज़िन्दगी तुम ही थी , ज़िन्दगी तुम ही हो , और ज़िन्दगी तुम ही रहोगी।

मनीष सिंह
ईमेल : immanish4u@gmail.com
मोबाइल नंबर: +91 9986935513
वेबसाइट : http://www.immanish4u.com
वर्तमान पता: 017, प्रिस्टिन पैराडाइस अपार्टमेंट ,
शान्ति निकेतन स्कूल के पास ,
अनुग्रह लेआउट , बिलेकाहल्ली , बैंगलोर ( कर्नाटक ) – 560076

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कविराज आनन्द किरण

उर्फ करनसिंह राजपुरोहित


ताण्डव नृत्य
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
ऊँच नींच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
धर्म के ठेकेदारोँ से ,.,...
वेदोँ से शुद्र के कान सीसा तुमने ही डलवाया था।
धर्म के माथे पर यह कलंक तुमने ही लगवाया है॥
देवालय से दलित का प्रवेश निषेध तुमने ही करवाया था।
परम पिता पर प्रश्न चिन्ह तुमने ही लगवाया है॥
साहित्य से अस्पृश्यता का अध्याय तुमने ही लिखवाया था।
संस्कृती के आँचल पर तुमने ही यह काला धब्बा लगवाया है।
आज मैँ मनु स्मृति को खुले आम जलाऊंगा।
भेदभाव की दुनिया को छोड़ कर सत्य की शरणोँ जाऊँगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
समाज के दलालों से.,.,,
दलित का दुल्ला जब घोडी पर चढ़ता है तो नाक तुम्हारी कैसे कट जाती है।
जब गैरोँ को बहन बेटियाँ ब्याही तब शान भारत की कौन सी बढ जाती है॥
दलित के संग एक चौपाल पर बैठने मर्यादा तुम्हारी कैसे घट जाती है।
गोरोँ को सलामी भरकर भारतमाता के दूध का मान कौन सा बढाया था॥
अछूत के हाथोँ का अन्न जल लेने तुमारा पुण्य कैसे घट जाता है।
अफीम गांजा व भांग पी कर तुम धर्मात्मा कैसे रह सकते हो॥
मनुप्रदत्त की समाज व्यवस्था को मिटाऊँगा।
नूतन समाज व्यवस्था का सर्जन करुंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
शिक्षित दलितोँ से ......
ऊँचा ओहदा पा कर तुम शहरोँ मेँ जा अपना मुकाम बनाने लगे हो।
गाँवोँ मेँ तुम्हारे परिजन नित अवहेलना शिकार होते है॥
शहर मेँ अपने ऐश्वर्योँ की चिन्ता नित तुम लगे हो।
गरीब दलित के रोटी के प्रबंध का भी फर्ज निभाना है॥
शहर मेँ रहकर आधुनिकता मेँ खो जाते हो।
दरिन्दों की क्रुद्ध निगाहों दलित को आजाद करवाने का धर्म निभाओ॥
आज मैँ क्रांति की आवश्यकता गाऊँगा।
एक अखण्ड मानव समाज बनाऊंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
आरक्षण से .,,,.
आरक्षण के रथ अपने परिजनोँ को अधिकारी बनाने लगे हो।
अधिकारहीनोँ खातिर अपने स्वार्थ त्याग कर को सामान्य बन जाओ तुम॥
विधायक, सांसद व मंत्री बनकर भी दलित बने बैठे हो।
अब तुम सवर्ण बनकर मनु की स्मृति को गाड़ दो॥
ब्रह्मा के शीश पर बैठ विप्र अब ललकार दो।
सदविप्र बनकर सबके पूण्य कर्म कराना सिखा दो॥
ता ता धिन ता ता।
धिन धिन ता ता ता॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
0000000000000

कुमार अनिल पारा,

(मोहताज हम रह जायेंगे)
----------------------------
तोड़ दोगे घर जो मेरा ,
हम कहां रह पायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
बिन तेरे अब ये सनम,
हम गीत कैसे गायेंगे,
साथ चलने का बहाना,
हम कहां कर पायेंगे,
बिन तेरे अब ये सनम,
ये घोंसले भी प्‍यार के,
ताकते रह जायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
मुस्‍काराते फूल हमकों,
देख अब मुरझायेंगे,
चहचहाते पक्षियों के,
रूप ना मिल पायेंगे,
जो छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
मज़नुओं के खेत बंजर,
देख सब घबरायेंगे,
देख लैला की कहानी,
पास भी ना आयेंगे,
पतझडों से फूल,
अब नहीं खिल पायेंगें,
पेड़ पत्‍तों के बिना,
फिर अकेले रह जायेंगें,
तोड़ दोगे घर जा मेरा,
हम कहां रह पायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगें,
मोहताज हम रह जायेंगें,
------------------------------
(गीत- बस करो अब ये खुदा)
---------------------------
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास,-2

भूकंप के कंपन से देखो,
दुनिया सारी उदास है,
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है-2

बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
जान जोखिम में पढ़ी है,
अब जिंदगी भी उदास है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है-2

ढेर में मलबे हमको,
जिंदगी की तलाश है,
अब कोई वार करना,
अब हमें विश्‍वास है,
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है,
--------------------------------


धूप की चिंगारियों से ,
हो गये पत्‍थर
धूप की चिंगारियों से ,
हो गये पत्‍थर गरम,
सनसनाहट गुम चुकी,
शीतल हवाओं की यहां,
भोर अच्‍छा लग रहा,
अब शाम की चाहत यहां,




दोस्‍ती के चॉद को दीदार हम करेंगें,
जब भी मुलाकात होगी आपसे,
बहुत प्‍यार हम करेंगें,


(में शराबी हो चुका हूं)
में शराबी हो चुका हूं
बेहोश होने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं
मदहोश होने के लिए,

जी रहा हूं  जिंदगी,
अपने दोष धोने के लिए,
पी रहा में शराब,
खामोश होने के लिए,

अब जी चुका हूं जिंदगी,
मौत मेरे पास है,
पर पी रहा हूं में शराब,
अज्ञान होने के लिए,

में शराबी हो चुका हूं,
नाम खोने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं,
मदहोश होने के लिए,


दूरियां जो बड़ चुकी हूं,
धर्म और ईमान में,
फर्क पैदा हो चुका हूं,
इंसान के सम्‍मान में,
पर जी रहा हूं जिंदगी,
सम्‍मान ढ़ोने के लिए,
में शराबी हो चुका हूं,
अज्ञान होने के लिए,

में शराबी हो चुका हूं,
शैतान होने के लिए,
पर पी रहा हूं में शराब,
अज्ञान होने के लिए,

पी चुका हूं रात को,
इंसान होने के लिए,
पर सुबह भी पी रहा हूं
शैतान होने के लिए,
में शराबी हो चुका हूं,
बेहोश होने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं
मदहोश होने के लिए,
पर पी रहा हूं में शराब ,
अज्ञान होने के लिए,
----------------------


(धारणा तुम छोड़ दो)
---------------------------
इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो
नफरतों के तीर की
अवधारणा तुम छोड़ दो,

ज्ञान और सम्‍मान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो,
आफतों के बोल सी,
अवधारण तुम छोड़ दो,

बांटती जागीर की,
उस भावना को छोड़ दो,
मोह के जंजीर,
अब धारणा को तोड़ दो,
इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो,
नफरतों के तीर की,
अवधारणा तुम छोड़ दो,

गोलियों से भरी,
मीनार,को तुम छोड़ दो,
धार के श्रृंगार की,
तलवार को तुम छोड़ दो,
दीन हीन से गुरूर,
की भावना को छोड़ दो,
आफतों के बोल सी,
अवधारणा तुम छोड़ दो,

इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो
नफरतों के तीर की
अवधारणा तुम छोड़ दो,
-------------------------------
कविता-(मां तेरे नाम को )
मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,
मां तेरे नाम जगत की हर जागीरों को मैं कर दूंगा,
तेरे नाम को दुनिया की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,

तेरा नाम जमीनों की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम हकीमों की उस बस्‍ती को भी कर  दूंगा,
मां तेरे नाम जगत के हर पथ को भी मैं कर दूंगा,
मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,

मां तेरा नाम जगत की हर उस पूजा पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम जगत के सब मैं मंदिर मस्‍जिद कर दूंगा,
बाग,बगीचा, गुरूद्वारे की दीवारों पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,

मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,
मां तेरे नाम जगत की हर जागीरों को मैं कर दूंगा,
तेरे नाम को दूनिया की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,
कुमार अनिल पारा,
anilpara123@gmail.com

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अंजली अग्रवाल


अक्सर लोगों को कहते सुना है,
कि सपने सच होते है.......
पर कितनों के सपने सच्चे होते हैं......
यूँ तो फूल गुलाब का भी होता हैं ...
पर उसे काँटों संग रहना होता है....
अक्सर गमों को तराजू में तौलते देखा........
पर कितनों ने पला खुशी का देखा है....
बैठे रहते हैं लोग एक नयी सुबह के इंतजार में...
पर कितनों ने रात को काली होते देखा हैं....
ये जिन्दगी तो कठपुतलियों का खेल है...
इनको चलाना जिसने जान लिया..
वही सिकंदर होता हैं.....
अकसर लोगों को कहते सुना है...
कि सपने सच्च होते है.......
पर कितनों के सपने सच्चे होते हैं......
जो बैठा लिखने उसके बारे में .............
तो जिन्दगी मुस्कुराने लगी.........
गमों की परछाई दूर भागने लगी......
इतनी खुशी मिली उसके संग ये आज जाना.....
इस खूबसूरत दुनिया को आज पहचाना....
रोता रहा अपने गमों के लेकर.....
एक खुशी तो हमेशा से मेरे पास थी...
जीने के वजह हमेशा से मेरे पास थी...
ढूँढता रहा मैं मेहमानों को.....
गमों को भुलाने की सबब तो मेरे पास ही थी.......
इतना सुकून मिला इस दिल को कि आँखें खोलना ही भूल गया...
खोया कुछ इस कदर उसकी यादों में कि लिखना ही भूल गया।
--
माँ
जब थक कर घर लौटा........
तो नजरों ने सबसे पहले तुझे खोजा.....
बैठा खाना खाने जब........
तो निवाला तेरे हाथ का याद आया.........
करवटें बदलता हूँ रात भर..........
सोया करता था तब, जब जब बालों को तुमने सहलाया.......
सुबह तैयार होकर जब घर से निकलता हूँ......
तो अचानक ही पीछे मुड़कर देखता हूँ......
जैसे आवाज तुमने हो लगाया..........
वो आँसू ही अच्छे थे जिनके कारण तुमने मुझे गले लगाया......
हर पल तुम मेरे साथ ऐसे रहती हो......
जैसे माथे पर हो टीका लगाया.........
जब जब इस दुनिया ने मुझे सताया.....
तब तब होठों पे तेरा नाम आया........
क्यों बड़ा हो गया मैं.....
क्यों तुझसे जुदा हो गया मैं.....
बस यही ख्याल आज मन में आया....
आज तेरी बाहों में.....मैं दौड़ा चला आया......
हैप्पी मदर्स डे...........

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जिन्दगी को संघर्ष का नाम तो देते है हम.....
पर लड़ने से पीछे हटते है हम..........
यूँ तो जिन्दगी एक दौड़ है कहते है हम.....
पर क्या सच में दौड़ते है हम...........
कभी तो जिन्दगी को खुली किताब बताते है हम....
पर क्या इस किताब के कुछ पन्ने भी लिखते हम.....
दुनिया से कहते है कि कोई समझ न पाया हमें....
पर क्या आज तक खुद को समझ पाये हैं हम....
शिकायतों का ढेर हैं हमारी जिन्दगी में....
जिसे कभी साफ नहीं करते हैं हम....
काश लेने से पहले देने का हुनर सीख लेते हम...
काश इस ढेर को साफ का लेते हम......
तो जिन्दगी को जिन्दगी कहते हम....
तो जिन्दगी को जिन्दगी कहते हम....
0000000000000

बालकवि देवेन्द्र सुथार

स्कूल के वे दिन
जब होता था
कंधोँ पर बस्ता
नन्हीँ अंगुलियाँ
उखेरती थी अक्षर
स्कूल न जाने की
जब भी करता जिद
माँ मानती समझाती
स्कूल छोडने आती
घर पर मेरी ही चलती
एक अकेला बेटा था
हर जिद पूरी होती
ये आंखेँ कभी नहीँ रोती
लेकिन आज वो स्कूल
और स्कूल के वे दिन
दोनोँ बन गये है अतीत
समय के आगे हुये चीत
यादोँ के गुलदस्ते मेँ
यादोँ के फूल बनकर रह गये
अब माँ बूढी हो गयी
उनकी लाठी बन गया मैँ
जो कभी मेरी अंगुली
पकडती
आज मैँ उनकी अंगुली
पकडता हूँ
समय बदला लेकिन
दृश्य आज फिर दोहराया
फर्क इतना आ गया
माँ की जगह मैँ और
मेरी जगह माँ आ गयी।

अपने गांव में
अपने गांव में
कुछ भी नकली नहीं बिकता
सिर्फ कभी-कभी
नकलचियों को छोडकर।
सूरज, चांद, पानी, हवा,
सब मिलते है,
हंसते-खिलखिलाते ,
सबसे टकराते हुए।
सिर्फ बनावटियों को छोडकर ,
मां की लोरी, बाबा की डांट,
खेत-खलिहानों की सांधी महक,
गुड रोटी की ताजगी,
बस जाती हूं मन में,
सिर्फ बर्गर-पिज्जा को छोडकर।
गिल्ली-डंडे, कंच्चे-सितांलिया,
दोस्तों की हंसी में
मुस्करा देता हूं
बाहो में बाहें डालकर
सिर्फ छुटटी के पल छोडकर
पाठशाला में मास्टर जी की,
डांट और इमली के पेड  का भूत
भी अच्छे लगते है ,
जब शहर से आने के बाद
आती है गांव की याद
क्योंकि हम अपनापन भूल गये हैं।
सिर्फ स्वार्थ को छोड़कर।

- देवेन्द्र इन्द्रमल सुथार, गांधी चौक, बागरा, जालोर, राजस्थान। 343025 मो-8107177196
devendrasuthar196@gmail.com



- बाल मुकुन्द ओझा
        किन्नरों का देश-भर में अपना साम्राज्य है। वे अपने लिये एक अलग और अनूठी दुनियाँ का सपना देखते हैं और उसी में जीना मरना और रच-बसना चाहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही अपने एक ऐतिहासिक फैसले में किन्नरों को संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी है। किन्नरों को अलग श्रेणी में रखने के सरकार को निर्देश दिये गये हैं। इससे किन्नरों में खुशी की लहर व्याप्त हो गई और उन्होंने यह खुशी सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी की। हाल ही में एक ट्रांसजैंडर के कॉलेज प्रिंसिपल बनने की खबर भी सुर्खियों में आई. प्राचीन समाज में ये स्वीकृत थे, परंतु दुख की बात है कि आधुनिक समाज में स्वीकार्यता के लिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की ओर देखना पड़ रहा है।

       आमतौर पर किन्नरों का अपना अलग से कोई रोजगार या व्यवसाय नहीं है। वे नाच-गा कर और बधाई लेकर अपना जीवन यापन करते हैं। किन्नरों की देश भर में संख्या लाखों में है। परिवार में शादी अथवा बच्चे के पैदा होने पर किन्नर बधाई लेते हैं। यह बधाई कोई छोटी-मोटी नहीं अपितु पाँच अंकों में सामान्य रूप से होती है। किन्नर हठी है, अपनी बात से पीछे नहीं हटते और मांगी गई राशि अपनी हैसियत से कई गुणा अधिक वसूल करते हैं। उनका अपना बनाया कानून है। वे पुलिस अथवा किसी कानून से नहीं डरते और जोर जबरदस्ती से अपनी बधाई वसूल करते हैं। सामने वाले परिवार की कोई हैसियत नहीं हो तब भी वे अपनी बधाई दबंगाई से वसूल करते हैं। कई बार लोग इधर-उधर से उधारी लाकर उन्हें यह नजराना भेंट करते हैं।

बधाई लेने किन्नर कभी अकेले-दुकेले नहीं जाते अपितु समूह में जाते हैं। दो-तीन बड़े टेम्पुओं अथवा बड़े वाहन में जाना पसन्द करते हैं। समूह में 5 से 10 की संख्या में जाने पर उनका रोब-दबाव पड़ता है और फिर घर में जबरदस्ती घुसकर फूहड़ ढंग से अपना नाच-गाना शुरू कर देते हैं। उन्हें किसी की लाज शर्म से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें तो अपनी बधाई या मन माफिक नजराना चाहिये। यदि आपने उनकी पसन्द का नजराना दे दिया तो वे भरपूर आशीष देकर हंसी-खुशी चले जाते हैं अन्यथा भारी गाली गलोज और दुर्व्यवहार पर उतर आते हैं। कई बार मार-पीट भी कर बैठते हैं। पुलिस बुलाने पर वे भी सहयोग नहीं करते और ले-दे कर मामले को सुलझाने की राय देते हैं। यह भी देखा गया है कि किन्नरों के अपने-अपने सुरक्षित इलाके हैं और वे अपने इलाके में दूसरे किन्नरों को घुसने नहीं देते। कई बार नकली किन्नर भी बधाई लेने आ धमकते हैं और फिर असली-नकली में घमासान शुरू हो जाता है। कई स्थानों पर किन्नरों की अच्छी धाक है जहाँ लोग  इन किन्नरों को स्वेच्छा से भी बधाई देते हैं। किन्नर कई बार चुनाव में भी खड़े हो जाते हैं। कहीं-कहीं चुनाव जीतने में भी सफल हो जाते हैं।

        मगर किन्नरों के बारे में लोगों की अच्छी राय नहीं होती इसका एक मुख्य कारण किन्नरों की जोर जबरदस्ती से वसूली है। अब तो किन्नर रहीसाई ठाठ बाट से रहने लगे हैं। हाल ही में एक किन्नर मुन्नी बाई और उसकी शिष्याओं को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया। यह वारदात राजधानी जयपुर के सांगानेर थाना क्षेत्र में हुई। मुन्नी बाई स्वयं को किन्नरों की उस्ताद बताती है।

शहर के अस्पतालों में उनकी निगाह लगी रहती है जहाँ से वे बच्चे के जन्म की सूचना प्राप्त करते हैं। इसी भांति विवाह स्थलों पर भी घूमते रहते हैं। जहाँ से उन्हें विवाह की पूरी जानकारी मिलती है। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर वे धावे मारते हैं और वसूली करते हैं। इनकी मनमानी को रोकने के कोई उपाय नहीं है। किन्नरों पर अनेक पुलिस थानों में मुकदमे दर्ज हैं। शांति भंग से लेकर जबरदस्ती वसूली, मारपीट और हत्या तक के मुकदमों में किन्नर वांछित हैं। केवल पुलिस प्रशासन के भरोसे इनकी वसूली नहीं रोकी जा सकती। जोर-जबरदस्ती की वसूली रोकने के लिए समाज को जागरूक होना पड़ेगा।

- बाल मुकुन्द ओझा (स्वतंत्र पत्रकार)
क्.32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218


 डॉ. दीपक आचार्य

दुनिया की भी अजीब रीत है।  जिन्दा रहते हैं तब तक कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते-झगड़ते रहते हैं। साँप-बिच्छुओं और कैंकड़ों जैसा व्यवहार करते हैं। किसी खूंखार हिंसक जानवर की तरह आचरण करते हैं।  कभी जंगली कुत्तों की तरह फूल वोल्युम में भौंकते और गुर्राते रहते हैं, कभी लपक कर फाड़ डालने को उतावले रहा करते हैं और कभी किसी मारक मिसाईल की तरह उन पर ही टूट पड़ते हैं जो अपने होते हैं।

इंसानी फितरत कब क्या कर गुजर जाए, भगवान भी अंदाजा नहीं लगा सकता। जब तक रिश्ते बने रहते हैं तब तक एक-दूसरे के लिए हैं। और ठन जाए तो फिर एक-दूसरे की बरबादी के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ जाते हैं।

अक्सर हम जमीन-जायदाद, छोटी-छोटी ऎषणाओं, तुच्छ स्वार्थों और अहं की लड़ाई के लिए अपने आपको इतना गिरा देते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। कई मर्तबा अपने आपको ऊँचा उठाने के लिए सारी शर्म त्याग कर गिर जाया करते हैं और कई बार दूसरों को गिराते रहकर आगे बढ़ते रहते हैं। गिरने और गिराने का यह खेल ताज़िन्दगी चलता रहता है।

बात सहोदरों की हो या किसी भी तरह के आत्मीय रिश्तों की, इनमें समन्वय बनाए रखकर एक दूसरे को पारिवारिक माहौल देते हुए आदर्श जीवनयापन का उदाहरण पेश करना अब हर किसी के बूते में नहीं रहा।

अक्सर देखा यह जाता है कि अपने ही लोग एक समय बाद एक दूसरे के धुर विरोधी बन जाते हैं और विरोध भी ऎसा कि पूरा का पूरा परिवार आमने-सामने हो जाता है। परिजनों तक का भी ऎसा ध्रुवीकरण हो जाता है जैसे कि कौरव-पाण्डवों की लड़ाई ही हो। और लड़ाई भी ऎसी कि जिसमें न कोई मर्यादा होती है, न छोटे-बड़े की कोई कद्र या अनुशासन। सब कुछ चलता रहता है फ्रीस्टाईल। जिसकी जो मर्जी हो जाए, वही कर गुजरता है।

यह लड़ाई भले ही दो घरानों की हो, दो कुटुम्बों की हो या दो रिश्तेदारों की, शेष सारे लोगों के लिए यह ऎसा तमाशा हो जाता है जो मुफतिया मनोरंजन से कम नहीं होता।  इस लड़ाई में और किसी को कोई फायदा हो न हो, उन लोगों को जरूर मजे आते हैं जो बर्बरीक की तरह दूर रहकर दोनों पक्षों की कमजोरियों के बारे में सुनते हैं, रिकार्ड करते हैं और नमक-मिर्च या तड़का लगा कर अपनी ही तरह के दूसरे तमाशबीनों में परोसते रहते हैं।

वैयक्तिक, पारिवारिक अथवा सामूहिक किसी भी किस्म की लड़ाई हो, लड़ाई का और कोई परिणाम सामने भले न आ पाए लेकिन किसी भी एक पक्ष में किसी की भी मौत हो जाने के बाद अक्सर लड़ाई विराम पा जाती है। बरसों से लड़ाई चल रही हो, और किसी एक पक्ष में किसी की भी मृत्यु हो जाए, लड़ाई अपने आप समाप्त होकर गम के माहौल में सुलह का नया अध्याय शुरू हो जाता है और फिर पुरानी सारी बातों को धीरे-धीरे भुला दिया जाता है।

जब तक इंसान जीता है तब तक लड़ाई-झगड़ों, अशांति और उद्विग्नताओं में जीता है, कोर्ट-कचहरी और सामाजिक पंचों के चक्कर काटता रहता है, समय, श्रम और पैसों की बर्बादी करता रहता है। और मौत हो जाने के बाद सारे लड़ाई-झगड़े अपने आप समाप्त हो जाते हैं, सभी पक्षों में सुलह हो जाती है और सौहार्द्र के नवीन अध्याय शुरू होने लगते हैं।

अधिकांश मामलों में ऎसा ही होता है। बहुत सारे परिवारों में किसी न किसी मृत्यु नहीं होने तक संघर्ष के दौर चलते ही रहते हैं और मौत के बाद सब कुछ भुलाकर वापस एक हो जाते हैं जैसे कि कभी कुछ हुआ ही नहीं हो।

अपने आपको सामाजिक, ज्ञानवान और विवेकी कहे जाने वाले इंसान की न जाने ऎसी कौनसी मजबूरी है कि सौहार्द और शांति पाने के लिए भी वह मौत की प्रतीक्षा करता है और काल की मध्यस्थता में सुलहनामा लिखने लगता है।

इन स्थितियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट तौर पर इसके लिए अहं ही मुख्य भूमिका में होता है जिसकी वजह से आदमी के जीते जी अहंकारों का टकराव किसी को एक नहीं होने देता। कई बार यह भी देखा गया है कि आदमी अपने ही लोगों से संघर्ष और लड़ाई-झगड़ों से इतना अधिक हार चुका होता है कि समय से काफी पहले मानसिक तनाव और शारीरिक बीमारियां उसे मौत के मुँह में धकेल देती हैं। इसके ठीक उलट आश्चर्य यह कि उसकी असमय मौत के लिए जिम्मेदार रहे सारे के सारे लोग मृत्यु के बाद एक हो जाते हैं, जैसे कि सौहार्द के लिए उसकी मृत्यु के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं बचा हो।

कितना अच्छा हो कि हम सभी लोग अपने-अपने अहंकारों को छोड़ कर मृत्यु को शाश्वत मानकर सारे लड़ाई-झगड़ों को पहले ही भुला दें ताकि हम सभी लोग शांति और सुकून से जी सकें और सौहार्द के लिए किसी को भी अपनी बलि न देनी पड़े।

हम सभी याद रखें कि हममें से कोई इस दुनिया में हमेशा रहने वाला नहीं है लेकिन जितने दिन रहना है, शांति और मस्ती के साथ रहें और प्रेमभाव के साथ जियें और जीने भी दें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

943306077

dr.deepakaacharya@gmail.com


सुशील यादव
फेसबुक के गहरे पानी में सर्फिंग का शानदार समय चल रहा है |

कबाडियों को छोड़, हर किस्म के लोग जुड़ने लगे हैं,उनको अपने कबाड़ जोड़ने के धंधे से फुरसत नहीं |

     जब भी कोई गंभीर ‘पोस्ट’ नथ्थू की नजर से गुजरती ,वो दौड़ा- दौड़ा  तुरंत मेरी ‘राय-मशवरा’ के फील्ड में आ जाता  है |मेरी सहमति –असहमति का उस पर कदाचित अविलंब प्रभाव भी  पड़ता है |वह फेसबुक में वैसी प्रतिक्रिया चिपका देता है |एक दिन वह सप्ताह भर का निचोड़ लेके आ गया |एक लोकल लेखक के प्रति खासा आक्रोश लिए था |मैंने शांत कराते हुए पूछा क्या बात है नत्थू ,वो मुझसे कहने लगा गुरुजी ये जो लेखक है न, अपने आप को टॉप (तोप) समझता है,कहता है फेसबुक पर ‘विचार रखना चाहिए ,कविता गोष्ठी में पढ़ने की चीज है’ |उनको शिकायत रही कि सुबह-सुबह कवि लोग उनके फेसबुक में कविता ठेले रहते हैं|

नत्थू ने कहा ,उतुकतावश हमने उनके साईट को खंगाला, बमुश्किल एक- दो रचनाएँ. वो भी उनके ख़ास परिचित व्  स्तरीय लोगों की पाई गई |वे नाहक चिड़चिडाये रहते हैं|या फेसबुक में छाये रहने,टिप्पणी पाने की जुगाड़ में दीखते हैं |

 हम कहते हैं ,अगर पसंद की बात पोस्ट में न दिखे तो जरूरी नहीं डिटेल में पढ़ा जावे? सुपर्फिसियाली पढ के भी  टाला जा सकता है |वे लाइक वाला कमेन्ट दे मारते हैं ,अगला दूने उत्साह से रचना परोस देता है |भाई तुम ठहरे कामकाजी आदमी ,अपुन माफिक निठ्ठल्ले नही जो अखबार माफिक पेज दर पेज ,विज्ञापन दर विज्ञापन नाप दो  |

कवि-लेखक  को उत्साहित करने का परिणाम जानना चाहिए कि नहीं ? कहीं-कहीं,  उत्साहित करने का जबरदस्त खामियाजा भुगतना पड़ता है|ये बात ,एक बड़े लेखक को  खुद इशारों में, समझना चाहिए की नहीं ?नत्थू हामी भरवाने के लिए मेरी तरफ देखता है |मैं मुस्कुरा देता हूँ|

    गुरुजी एक बार आपके साथ भी तो ये हुआ था ?आपकी व्यंग रचना, जिसे देश के एक प्रतिष्ठित मासिक ने, व्यंग के नाम से छापा था , पर प्रबुद्ध ने टिप्पणी दी थी ‘हास्य’ रचना है ?वैसे वे भी व्यंग लिखते हैं ,मर्म व्यंग और हास्य का तो अच्छे से जानते होंगे ?’मेरे आगे सब बौने’ की मानसिकता से उठो भाई ,बड़े बन जाओगे ......?
    हाँ तो! गुरुजी फेसबुक में पुलिसिया थानेदारी के शौक के बारे में आप क्या कहते हैं ?कौन सी चीज किस रास्ते से गुजरे ये जरुरी है की चंद प्रबुद्ध लोग तय करें |लेखकों में ये ‘गर्वोक्ति’ काफी हाउस से प्राय: निकली होती हैं ,टपोरी होटल में हाफ चाय पी के लिखने वाला कभी इतना क्रुद्ध होते नहीं पाया जाता |आप इस बात से इत्तिफाक रखते हैं या नहीं ?नत्थू की हामी भरवाने वाली नजर फिर उठ जाती है |

    अपनी बात जारी रखते हुए फिर कहता है,फेस बुक सोशल मीडिया,भाव प्रकट करने के लिए एक अच्छा मंच है |आज के विलुप्त होते जा रहे साहित्यिक गतिविधियों को,साहित्यकारों को अगर प्रोतासन पाने का छोटा-मोटा अवसर दिखता है, तो उस पर अपनी बपौती काबिज करना भलमनसाहत नहीं है |वे गाली गलौज लिख नहीं रहे,गलत अगर कुछ पोस्ट कर रहे हो तो आप प्रबुद्ध बन के सुधार सकते हो, तो सुधारों,वरना हिन्दुस्तान में सबको ‘गोली मारो‘ कहने की आजादी स्वमेव मिली  है|

नत्थू ने भर निगाह से मेरी तरफ देखा,एक बारगी मुझे लगा कहीं  ये सब मुझे तो नहीं सूना रहा ,मगर यकबयक याद  आ गया ,अरे मैं कहाँ प्रबुद्ध की श्रेणी  में गिना जाने लगा हूँ ?

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग 
Susyadav7@gmail.com
09408807420                    


 वर्जिनिया बर्टन

 हिंदी अनुवाद -  अरविंद गुप्ता


  माईक के पास भाप के इंजन से चलने वाला एक फावड़ा यानी स्टीम शवल था। शवल सुंदर और लाल रंग का था। उसका नाम मेरी ऍन था। माईक को अपने स्टीम शवल मेरी ऍन पर बड़ा गर्व था। वह हमेशा कहता कि उसका स्टीम शवल एक दिन में जितनी खुदाई करेगा उतनी सौ आदमी एक हफ्ते में भी नहीं कर पाएंगे। क्योंकि माईक की शेखी को कभी परखा नहीं गया था, इसलिए असली सच्चाई किसी को मालूम नहीं थी।

 माईक और मेरी ऍन बरसों से साथ-साथ खुदाई कर रहे थे। माईक ने अपने स्टीम शवल को इतनी अच्छी तरह से रखा था कि मेरी ऍन अभी भी बढ़िया हालत में थी।

  कभी माईक और मेरी ऍन ने मिलकर मीलों लंबी नहरें खोदी थीं।

 इनमें बड़ी-बड़ी नावें तैरा करती थीं।

 माईक और मेरी ऍन ने बड़े ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों को काटा था, जिससे उनकी गुफाओं में से रेलगाड़ियां गुजर सकें।

 माईक और मेरी ऍन ने ऊबड़-खाबड़, ऊंचे-नीचे खड्डों को खोदकर समतल बनाया था।

 फिर उन जगहों पर लंबी-लंबी सड़कें बनीं जिन पर सैकड़ों-हजारों गाड़ियां दौड़ने लगीं।

 माईक और मेरी ऍन ने जमीन की खाइयों को पाटकर उसे एकदम समतल बनाया था, जिससे वहां पर विमानों के उतरने के लिए ऍअरपोर्ट बन सकें।

 माईक और मेरी ऍन ने ही जमीन में गहरी नीवें खोदी थीं जिससे बड़े शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतें बन सकें। जब लोग उनकी खुदाई देखने के लिए दो मिनट के लिए ठहरते उस वक्त माईक और मेरी ऍन कुछ ज्यादा ही तेजी से खुदाई में जुट जाते। जितने ज्यादा लोग उनके काम को निहारने के लिए रुकते वे उतनी अधिक फुर्ती से काम करते। किसी-किसी दिन उनके द्वारा खोदी मिट्टी और पत्थर को ढोने के लिए छत्तीस ट्रकों के काफिले की जरूरत होती थी।

 पर कुछ सालों बाद डीजल और बिजली से चलने वाले नए फावड़े (शवल) बाजार में आ गए। क्योंकि डीजल और बिजली वाले फावड़े ज्यादा ताकतवर थे, इस वजह से भाप वाले फावड़ों का धंधा बंद हो गया।

 लोगों को अब स्टीम शवल नहीं चाहिए!

 धंधा बंद होने से माईक और मेरी ऍन बहुत उदास रहने लगे।

 धीरे-धीरे सारे स्टीम शवल कबाड़ी के हाथों बिकने लगे या फिर किसी पुरानी खदान में जंग लगने के लिए छोड़ दिए गए। माईक को अपने स्टीम शवल मेरी ऍन से गहरा लगाव था। वह उसे इस तरह सड़ने के लिए नहीं छोड़ना चाहता था।

 माईक ने मेरी ऍन की अच्छी देखभाल की थी। माईक अभी भी डींग मारता - मेरी ऍन एक दिन में जितना खोदेगी, उतना सौ आदमी एक हफ्ते में भी नहीं खोद पाएंगे। कम-से-कम माईक तो यही सोचता था। फिर भी इस बात की पुष्टि नहीं की जा सकती थी। माईक और मेरी ऍन जहां भी जाते, वहां डीजल और बिजली के शवलों को काम करते पाते। अब किसी को भी माईक और मेरी ऍन की जरूरत नहीं थी। एक दिन माईक ने अखबार में एक इश्तहार देखा। पास के शहर पोपरविले में नए टॉउन-हाल का निर्माण होना था। ‘हम लोग इस टॉउन-हाल की नींव खोदेंगे,’ माईक ने मेरी ऍन से कहा। इसके बाद वे पोपरविले की ओर चले।

 वे नहरें पार करते, रेल की लंबी पटरियों को लांघते, बड़ी-बड़ी सड़कों पर चलते, कई हवाई-अड्डों को पीछे छोड़ते हुए खेत-खलिहानों को निहारते हुए कई शहरों में से होकर गुजरे - पर वहां के लोगों को अब उनकी कोई जरूरत नहीं थी।

 वे पहाड़ियों पर धीमे-धीमे चढ़ते हुए फिर ढलानों पर आहिस्ता-आहिस्ता उतरते हुए आखिरकार पोपरविले नाम के छोटे शहर में पहुंच ही गए।

 पोपरविले में मीटिंग चल रही थी - यह निर्णय लेने के लिए कि नए टॉउन-हाल की नींव की खुदाई के लिए किसे ठेका दिया जाए। माईक ने उनके एक चयनकर्ता - हेनरी स्वाप से बातचीत की। "मैंने सुना है," माईक ने कहा, "कि आप लोग नए टॉउन-हाल का निर्माण कर रहे हैं। मैं और मेरा स्टीम शवल मेरी ऍन आपके नए टॉउन-हाल की नींव खोदेंगे। और यह काम हम सिर्फ एक दिन में पूरा करेंगे।"

 "बकवास बंद करो!" हेनरी स्वाप ने माईक को डांटते हुए कहा। "तुम कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो। टॉउन-हाल की नींव सिर्फ एक दिन में खोदोगे! नींव खोदने में सौ आदमियों को कम-से-कम एक हफ्ता लगेगा।"

 "वह तो ठीक है। परंतु मैं और मेरी ऍन मिलकर एक दिन उतनी खुदाई करेंगे जितनी सौ आदमी एक हफ्ते में भी नहीं कर पाएंगे।" असल में माईक को भी अपने कथन की सच्चाई मालूम नहीं थी।

 फिर माईक ने कहा, "अगर हम काम एक दिन में पूरा नहीं करें तो आप हमें एक पैसा भी नहीं देना।"

 हेनरी स्वाप मुफ्त में नींव खुदवाने का यह सुनहरा मौका अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। इसलिए वह मन-ही-मन मुस्कुराया और उसने टॉउन-हाल की नींव की खुदाई का ठेका माईक और उसके स्टीम शवल मेरी ऍन को दे दिया।

 अगले दिन एकदम सुबह होते ही माईक और मेरी ऍन खुदाई के काम में जुट गए।

 थोड़ी ही देर में एक छोटा लड़का आया और उसने माईक से पूछा, "क्या तुम वाकई शाम तक खुदाई पूरी कर पाओगे?"

 "बिल्कुल," माईक ने जवाब दिया, "तुम यहीं रुको और देखो हम कितनी फुर्ती से काम करते हैं। जब लोग हमारे काम को देख रहे होते हैं तब हम ज्यादा तेजी और मुस्तैदी से काम करते हैं।"

 यह सुनकर छोटा लड़का खुदाई का काम देखने के लिए रुक गया।

 कुछ देर में श्रीमती मिकगुलीकुडी, हेनरी स्वाप और हवलदार साहब भी वहां घूमने के लिए आए और वे भी खुदाई का काम देखने के लिए रुक गए।

 उन्हें देखकर माईक और मेरी ऍन को जोश आ गया और वे ज्यादा तेजी से खुदाई करने लगे।

 यह देख छोटे लड़के के मन में एक विचार कौंधा। वह झट से दौड़ा और उसने इस खबर को पैदल जा रहे अखबारवाले, साईकिल चलाते पोस्टमैन और घोड़ागाड़ी पर सवार दूधवाले को दी। उसने घर जाते समय यह खबर पोपरविले के डॉक्टर और शहर में आते किसानों को दी। और वे सभी लोग भी माईक और मेरी ऍन द्वारा नींव खुदाई को देखने के लिए रुक गए। इतने दर्शकों को देखकर माईक और मेरी ऍन में गजब की फुर्ती आ गई।

 उन्होंने गडे्ढ का एक कोना अच्छी तरह से खोदा। पर फिर सूरज तेजी से चमकने लगा।

 तभी टन! टन! टन! घंटी बजाती हुई फॉयर ब्रिगेड की गाड़ी वहां आ पहुंची। फॉयर ब्रिगेड वालों को दूर से धुंआ दिखाई दिया। उन्हें लगा शायद वहां आग लगी हो।

 उस छोटे लड़के ने फॉयर ब्रिगेड वालों से वहां रुकने और खुदाई देखने का आग्रह किया। फॉयर ब्रिगेड डिपार्टमेंट के लोग भी माईक और मेरी ऍन द्वारा खुदाई का काम देखने के लिए वहां रुक गए।

 पास के स्कूल के बच्चों ने जैसे ही फॉयर ब्रिगेड का इंजन देखा, उनकी पढ़ाई से रुचि उखड़ गई। टीचर ने उनकी छुटी्ट कर दी और स्कूल के सारे बच्चे भी वहां आ गए। इतने बड़े कारवां को देखकर माईक और मेरी ऍन और तेजी से खुदाई करने लगे।

 उन्होंने फुर्ती से गडे्ढ का दूसरा कोना भी खत्म किया। पर तब तक सूरज सिर के ऊपर आ चुका था।

 अब तक पोपरविले के टेलीफोन आपरेटर के जरिए यह खबर आसपास के शहरों - बंगरविले और बोपरविले में भी फैल चुकी थी। वहां से भी बड़ी तादाद में लोग आए। सभी लोग सिर्फ एक दिन में माईक और उसके स्टीम शवल मेरी ऍन को टॉउन-हाल की नींव खोदते हुए देखना चाहते थे।

 धीरे-धीरे माईक और मेरी ऍन ने तीसरे कोने की खुदाई भी पूरी की।

 माईक और मेरी ऍन की खुदाई देखने के लिए आजतक इतनी ज्यादा भीड़ कभी भी इकट्ठी नहीं हुई थी। शायद इसीलिए आज माईक और मेरी ऍन इतनी अधिक तेजी से अपना काम कर रहे थे। कुछ देर में शाम होने लगी और सूरज ढलने लगा।

 छोटा लड़का जोर से चिल्लाया, "जल्दी करो, माईक! जल्दी करो! सूरज ढलने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है!" चारों तरफ धूल ही धूल थी। स्टीम शवल से निकलने वाली भाप से सभी ओर एक गहरा कोहरा छा गया था। लोगों को बहुत कम दिखाई दे रहा था। पर खुदाई की आवाज जोर से चारों ओर गूंज रही थी।

 धूम! धक्का! धूम! धक्का! और जोर से! और तेजी से!

 फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया। धीरे-धीरे करके धूल हटने लगी और भाप और धुंए का कोहरा छंटने लगा। लोगों को नए टॉउन-हाल की पूरी नींव दिखाई देने लगी।

 चारों कोनों की बेहद उम्दा तरीके से खुदाई हुई थी। ऊपर से नीचे तक चार, सीधी-सपाट दीवारें दिखाई दे रही थीं। नीचे गड े ्ढ में माईक अपने लाल स्टीम शवल मेरी ऍन के साथ खड़ा था। सूरज भी धीमी गति से पहाड़ी के नीचे ढल रहा था।

 "शाबाश! क्या बात है!" सब लोग मिलकर चिल्लाए। "माईक और उसके स्टीम शवल मेरी ऍन को समय पर काम खत्म करने की बहुत-बहुत बधाई! उन्होंने सिर्फ एक ही दिन में नींव खोद डाली!"

 तभी उस छोटे लड़के ने पूछा, "अरे! माईक और उसका स्टीम शवल अब नीचे से ऊपर कैसे आएगा?"

 "यह बात तो बिल्कुल ठीक है," श्रीमती मिकगुलीकुडी ने हेनरी स्वाप से कही। "अरे, अब यह स्टीम शवल इस गहरे गडे्ढ से बाहर कैसे निकलेगा?"

 हेनरी स्वाप के पास इस सवाल का कोई जवाब न था। उसके चेहरे पर बस एक क्रूर मुस्कान थी।

 फिर सारी भीड़ ने एक साथ मिलकर पूछा :

 "यह स्टीम शवल नीचे से ऊपर कैसे आएगा?"

 "माईक यह बताओ, तुम अपने लाल स्टीम शवल को गहरे गडे्ढ से बाहर कैसे लाओगे?"

 माईक ने अपने आसपास चारों दीवारों और चारों कोनों को गौर से देखा। फिर उसने कहा, "हमने फुर्ती और लगन से इतनी तेज खुदाई की कि हम बाहर निकलने के लिए सड़क बनाना ही भूल गए!" माईक और मेरी ऍन ने पूरी जिंदगी में ऐसी भूल पहले कभी नहीं की थी। वे अब क्या करें? यह उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

 ऐसा हादसा पोपरविले में पहले कभी नहीं हुआ था। सभी लोग इस बारे में चर्चा करने लगे। जितने मुंह, उतनी बातें।

 लोग अलग-अलग सुझाव देने लगे।

 सभी लोग अपनी राय को सबसे सही मानने लगे।

 लोगों में जमकर तू-तू, मैं-मैं हुई। खूब वाद-विवाद हुआ। अंत में लोग लड़ाई-झगड़े से पस्त हो गए। पर किसी को भी माईक के स्टीम शवल को गडे ्ढ से बाहर निकालने की जुगाड़ नहीं सूझी।

 अंत में हेनरी स्वाप ने कहा, "क्योंकि माईक और उसका स्टीम शवल अभी भी गडे ्ढ के अंदर है, इसलिए नींव खुदाई का काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है। और क्योंकि अभी काम अधूरा है इसलिए माईक और मेरी ऍन को खुदाई के पैसे नहीं मिलेंगे।" इसके बाद हेनरी स्वाप फिर से एक क्रूर हंसी हंसा।

 वह छोटा लड़का उन सब बातों को ध्यान से सुन रहा था। उसके दिमाग में एक बढ़िया विचार आया। उसने कहा, "हम माईक और उसके लाल स्टीम शवल को इस गहरे गडे्ढ में ही क्यों न रहने दें। इस गडे्ढ में हम टॉउन-हाल को गर्म करने की भटी्ठ लगा सकते हैं। भाप बनाने का काम लाल शवल मेरी ऍन कर सकती है। माईक को हम भाप बनाने का काम सौंप सकते हैं। इस तरह शहरवासियों को नई भटी्ठ लगाने का खर्चा भी नहीं करना पड़ेगा। इस बचत से हम माईक को एक दिन में नींव खोदने के लिए पूरा पैसा भी दे सकते हैं।"

 "क्यों नहीं?" हेनरी स्वाप ने कहा। उसकी हंसी अब पहले से कुछ बेहतर थी।

 "क्यों नहीं?" श्रीमती मिकगुलीकुडी ने कहा। "क्यों नहीं?" पोपरविले के हवलदार ने भी कहा। "क्यों नहीं?" सारे शहरवासियों ने भी कहा। फिर वह एक ऊंची सीढ़ी के जरिए माईक और मेरी ऍन की राय जानने के लिए गहरे गड्ढे में उतरे।

 "क्यों नहीं?" माईक ने उत्तर दिया। अब निर्णय हो चुका था और सभी लोग इस फैसले से खुश थे।

 पोपरविले के लोगों ने माईक और मेरी ऍन वाले गडे्ढ के ठीक ऊपर नया टॉउन-हाल बनाया। पूरा निर्माण काम जाड़े से पहले ही खत्म हो गया।

 अब वह छोटा लड़का रोजाना माईक और मेरी ऍन से मिलने आता है। श्रीमती मिकगुलीकुडी उसके लिए गर्म-गर्म केक लाती हैं। और जहां तक हेनरी स्वाप का सवाल है, वह अब अपना ज्यादातर समय टॉउन-हॉल के गर्म तहखाने में ही गुजारता है और माईक की दिलचस्प कहानियां सुनता है। उसके चेहरे की क्रूर हंसी अब गायब हो गई है। वह अब हर समय मुस्कुराता रहता है।

 अगर आपको कभी पोपरविले जाने का मौका मिले तो आप नए टॉउन-हॉल के तहखाने में जरूर जाएं। वहां आपकी मुलाकात माईक और मेरी ऍन से होगी। माईक शायद अपनी कुर्सी पर बैठा अपने पाईप से तम्बाकू पी रहा हो। लाल रंग की स्टीम शॅवल - मेरी ऍन उसके पास ही होगी। उसके द्वारा बनाई भाप की गर्मी से टॉउन-हॉल में सभी बैठकों में नई रंगत आती है।  


मिट्टी

 लौरी बेकर

 हिंदी अनुवाद – अरविन्द गुप्ता

  लौरी बेकर का जन्म 1917 में बरमिंघम, इंग्लैन्ड में हुआ। 1937 में उन्होंने बरमिंघम स्कूल ऑफ आरकीटेक्चर से स्नातक की डिग्री पाई, और उसके बाद वो आर आई बी ए (रीबा - रायल इंस्टीट्यूट आफ ब्रिटिश आरकीटेक्ट) के सदस्य बने। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वह एक डाक्टरी टोली के साथ चीन गए, जहां उन्होंने कुष्ठरोग के इलाज और रोकथाम का काम किया। इंग्लैन्ड वापस जाते वक्त उन्हें अपने जहाज के इंतजार के लिए बम्बई में तीन महीने रुकना पड़ा तभी उनकी भेंट गांधीजी से हुई। इस भेंट का उन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने भारत लौटकर आने और काम करने का निश्चय किया। 1945-66 के दौरान श्री बेकर स्वतंत्र रूप से भवन डिजायन के साथ-साथ कुष्ठरोग अस्पतालों के प्रमुख आरकीटेक्ट भी रहे। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक पहाड़ी गांव में काम किया। 1966 में श्री बेकर दक्षिण में केरल गये जहां उन्होंने पीरूमेदी आदिवासियों के बीच काम किया। 1970 में वह त्रिवेन्द्रम आए और तब से वह सारे केरल में भवनों के डिजसयन और निमार्ण का काम कर रहे हैं। उन्होंने हुडको के संचालक, योजना आयोग की आवास कमेटी, और राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की कई विशेषज्ञ समितियों के लिए काम किया है। वह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजायन, अहमदाबाद के संचालक मंडल के सदस्य भी रहे हैं। 1981 में नीदरलैन्ड के रॉयल विश्वविद्यालय ने तीसरी दुनिया के देशों में विशिष्ट काम करने के लिए उन्हें सम्मानित किया। 1990 में श्री बेकर को भारत सरकार ने पद्य-श्री से सम्मानित किया।

  प्रस्तावना

 इस पुस्तक को उठा कर और इसके पन्ने उलट कर शायद आपको कुछ अचरज तो जरूर हुआ होगा। भला ‘मिट्टी’ जैसा विषय भी इतना गम्भीरता से लिया जा सकता है कि उस पर एक पूरी किताब लिख डाली जाए। हो सकता है कि आपकी रुचि महज एक सतही उत्सुकता हो। यह भी संभव है कि आप मिट्टी के बारे में कुछ और जानना चाहते हों।

 मिट्टी के बारे में कुछ और लिखने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि मैं मिट्टी को महत्वपूर्ण क्यों समझता हूं। क्योंकि आप इस पुस्तक को पढ़ पा रहे हैं, इसका मतलब है कि आप शिक्षित हैं और एक सामान्य घर में रहते हैं। हो सकता है कि मकान एकदम आपकी रुचि के माफिक न हो। फिर भी घर की छत और दीवारें आपको कुछ-न-कुछ निजी सुरक्षा तो प्रदान करती ही होंगी। आंकड़ों से पता चलता है कि अपने देश में 2-3 करोड़ परिवारों के पास मकान तो दूर कोई झोपड़ी तक नहीं है। काश, न केवल सरकार, परंतु हम सभी लोग इस समस्या के निदान के बारे में सामूहिक रूप से सोचते, और इस कलंक को हटाने के लिए कुछ कदम उठाते। दुख की बात यह है कि आज हम में से बहुत से लोग यह सोचने लगे हैं कि अच्छे और टिकाऊ मकान लोहे की सरिया, सीमेंट-कंक्रीट और पक्की ईंटों के बगैर बन ही नहीं सकते। परंतु लोहे और सीमेंट के उत्पादन में बहुत सारी ऊर्जा खर्च होती है। इसका मतलब यह है कि लोहे और सीमेंट के उत्पादन और ढुलाई में बहुत सारा ईंधन खर्च होता है। सच्चाई यह है कि अपने देश में सबके लिए पक्के मकान बनाने लायक सीमेंट है ही नहीं। काफी सीमेंट कोरिया से आयात करना पड़ता है। देश के बहुत से इलाकों में ईंटों को पकाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल होता है।

 बहुत से लोगों को इस बात का आभास नहीं है कि एक सामान्य, मध्यम वर्ग के मकान में लगी ईंटों को पकाने भर के लिए दो या तीन पेड़ों को ईंधन के लिए काटना पड़ेगा। परंतु यह सभी जानते हैं, और अगर नहीं जानते हैं तो सबको जानना चाहिए, कि पेड़ और जंगल लुप्त हो रहे हैं। हम पेड़ काट अधिक रहे हैं, उगा कम रहे हैं। पश्चिम बंगाल जैसे इलाकों में बाढ़ आने का एक मुख्य कारण पेड़ों का काटना है। एक ओर तो हमें मकान बनाने के लिए विदेशों से मंगाए मंहगे साधन और सामान नहीं इस्तेमाल करने चाहिए। दूसरी ओर हमें ऐसे सामान नहीं उपयोग करने चाहिए जिससे हमारे प्राकृतिक साधन - जैसे पेड़ ईंधन के लिए काटे जाएं। ऐसे सामानों की सूची आजकल प्रचलित और फैशनेबिल समझी जाने वाले सीमेंट, स्टील, कंक्रीट, ईंटों और इमारती लकड़ी तक ही सीमित नहीं है। इस सूची में कांच, अल्युमिनियम, ऍसबेस्टास और जस्ता चढ़ी लोहे की चादरें भी शरीक हैं। इन सभी सवालों और समस्याओं पर यह टिप्पणी स्वाभाविक होगी, ‘तो हम किन साधनों का इस्तेमाल करें?’

 किस इमारती सामान को बनाने में कम ईंधन खर्च होगा?’ इसका एक उत्तर तो यह हो सकता है कि हम मकान बनाने में ज्यादा-से-ज्यादा पत्थर का प्रयोग करें। परंतु कई हिस्सों में इमारती पत्थर लगभग नहीं के बराबर है। दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि मकान बनाने में हम मिट्टी का उपयोग करें। और आप यकीन करें या न करें, परंतु राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश में मिट्टी से बने मकानों की संख्या, अन्य किसी सामान से बने मकानों से ज्यादा है।

 हमने मिट्टी के घर बनाना बंद क्यों कर दिया? दरअसल, हमने मिट्टी का इस्तेमाल बंद नहीं किया है। बहुत से ग्रामीण परिवार और गरीब लोग अभी भी मिट्टी के घर बनाते हैं। परंतु सरकारी आवास योजनाएं और मध्य-वर्ग घर निर्माण में मिट्टी को नहीं छूते। इसके कई कारण हैं - एक तो लोग आजकल चीजों को खुद अपने हाथों से नहीं बनाते। लोग खुद तो नौकरी करते हैं और मजदूरों से अपने घर बनवाते हैं और खेत जुतवाते हैं। क्योंकि बच्चों को आजकल स्कूल का बोझा ढोना होता हैं इसलिए उनसे भी मदद नहीं मिलती। दरअसल, खुद अपने हाथों से घर बनाने के लिए लोगों के पास अब वक्त ही नहीं है। आज से पचास साल पहले जो हुनर गांव में सभी जानते थे, वह आज बहुत कम लोग जानते हैं। इसके अलावा, आजकल हमें अपनी आर्थिक स्थिति का भी अच्छा-खासा भान है। मिट्टी के कच्चे घरों को लोग ‘गरीब’ और ‘गंवारू’ आदिवासी जीवनी से जोड़ने लगे हैं। ‘अगर मैं मिट्टी के घर में रहूंगा तो मेरी बेटी से शादी कौन करेगा?’

 सैकड़ों सालों से मिट्टी के घर बन रहे हैं। यह लम्बा अरसा मिट्टी के लगातार इस्तेमाल के पक्ष में एक ठोस सबूत है, जबकि सीमेंट-कंक्रीट सौ वर्ष पुराना भी नहीं है। मेरे विचार में मिट्टी को हम सफलतापूर्वक अच्छे-से-अच्छे घर बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में कदम रखने से पहले अगर हम चाहते हैं कि हरेक देशवासी के सर पर छत हो, तो हम इस संकल्प को मिट्टी के मकान बनाकर ही पूरा कर पाएंगे। इस पुस्तक में इन्हीं कुछ विचारों का उल्लेख है।

 इस छोटी सी पुस्तक में मैंने मिट्टी का मात्र परिचय भी दिया है। मैंने पुस्तक की भाषा और चित्रों को एकदम सरल बनाने का प्रयास किया है। वैसे मिट्टी के गुणों को समझने का एक वैज्ञानिक नजरिया भी हो सकता है। पर मेरी राय में अधिक महत्व इस बात का है कि हम मिट्टी का इस्तेमाल करें और उसका मजा लें। हम यह बात तो एकदम भूल जाएं कि मिट्टी के घर केवल गांव के गरीबों के लिए हैं।  दुर्भाग्य से मैंने कई चित्रों में मिट्टी के मकानों को गांव के परिवेश में दर्शाया है - जैसे कि घास-फूस की बनी छत, आदि। पर असलियत यह है कि अगर हम ठीक तरह से समझ-बूझ कर इस्तेमाल करें तो नतीजे एकदम अव्वल आएंगे। मैं व्यक्तिगत तौर पर यही चाहता हूं कि जो भी निर्माण का सामान मैं इस्तेमाल करूं वह खुद ही अपनी खासियत को जाहिर करे। मिसाल के तौर पर एक ईंटों के मकान को, मेरी राय में, एक ईंटों का मकान ही दिखना चाहिए, और उसे एक पत्थर के मकान से अलग दिखना चाहिए। आजकल आमतौर पर सभी लोग दीवारों पर पलस्तर कराते हैं या रंग पोतते हैं।

 दीवारों को ढंकने के लिए टाइल्स या कुछ और आवरण लगाते हैं, इसलिए यह एकदम मुमकिन है कि यह लोग मिट्टी के साथ भी ऐसा ही बर्ताव करें। उदाहरण के लिए, आस्ट्रेलिया में बहुत सारे मकान बुनियादी रूप में केवल मिट्टी के बने होते हैं। परंतु उन पर चढ़े आवरण से उनके असली रूप को पहचान पाना कठिन होता है। मेरी बस यही आशा है कि हरेक इंसान चाहें वह गरीब हो या अमीर, इस बात को पहचाने और स्वीकार  करे कि मकान बनाने के लिए मिट्टी एक अच्छा, मजबूत और टिकाऊ माध्यम है। मिट्टी से बनी इमारतें अगर हजारों साल नहीं तो कम-से-कम सैकड़ों साल तो टिकी ही हैं। हरेक निर्माण सामान की अपनी-अपी सीमा होती है। मिट्टी की भी अपनी सीमाएं हैं। इसलिए सबसे पहले मिट्टी की कमियों और दोषों को जानना जरूरी है। हम निर्माण करते समय मिट्टी की सीमाओं को मद्देनजर रखें, और जहां कहीं भी संभव हो उन कमियों को दूर करने की कोशिश करें। मिट्टी को किसी आकार में ढालने से पहले उसे गीला करना पड़ता है। पर मिट्टी की दीवार तभी उठ पाएगी और तभी मजबूत होगी जब उसका पानी सूख जाएगा। सूखी मिट्टी की दीवार का सबसे बड़ा दुश्मन पानी है। इसलिए मिट्टी की दीवार को हमेशा नमी और पानी से बचाना चाहिए। यही मिट्टी की सबसे बड़ी कमी है और हमें इसे कभी नजरंदाज नहीं करना चाहिए। केरल और आसाम की भारी बारिश से मिट्टी को कैसे बचाया जाए, यह इस पुस्तक में बताया गया है। हो सकता है कि मिट्टी बाहरी दीवार के लिए उपयुक्त न हो, फिर भी हम मिट्टी से अंदर की दीवारें तो बना ही सकते हैं। और ऐसा करने से हम निश्चित ही कुछ ऊर्जा और ईंधन की बचत कर सकेंगे।

 मिट्टी के मकान बांधने के हुनर और गुर हजारों सालों के प्रयोग और परीक्षण के बाद विकसित हुए हैं। आज हमें शायद वह अवैज्ञानिक लगें। परंतु सच्चाई यह है कि दुनिया के कई देशों में (जिनमें कई विकसित मुल्क शामिल हैं) बहुत सारे घर मिट्टी से बनते हैं। इनमें बहुत से मकान पचास या सौ वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं।

  मिट्टी की दीवारों की बारिश से सुरक्षा करनी चाहिए

 बहुत कम घर केवल एक तरह के माल से बनते हैं। उदाहरण के लिए, केवल बहुत घने जंगलों में, जहां पेड़ बहुतायत में मिलते हैं, वहीं पर मकानों की नींव, छत, फर्श, दीवारें सभी लकड़ी की बनती हैं। कंक्रीट के घर में अक्सर फ्रेम और छत का स्लैब कंक्रीट के होते हैं, परंतु दीवारें ईंट, लकड़ी या कांच की बनी होती हैं। ईंटों के घर का मतलब है कि उसकी सिर्फ दीवारें ही ईंटों की बनी होती हैं, किन्तु छत और फर्श किसी दूसरे माल का बना है। इसलिए मिट्टी के मकान की कल्पना करते हुए यह न समझिए कि पूरा मकान ही मिट्टी का बना होगा (वैसे यह भी संभव है)। ईंटों को पकाने में बहुत सारा ईंधन लगता है। पत्थर को खोदना, तराशना और आकार देना पड़ता है। कंक्रीट - यानी सीमेंट और स्टील के निर्माण में बहुत सारी ऊर्जा खर्च होती है। कंक्रीट के इस्तेमाल के लिए बहुत कुशल कारीगर चाहिए। परंतु दुनिया के कई हिस्सों में मिट्टी, निर्माण स्थल के एकदम करीब में ही मिल जाती है। केवल कुछ मेहनती हाथों की जरूरत होती है, जो जमीन की मिट्टी को उठाकर एक दीवार बना दे। घर की यही दीवार आपको सहारा और सुरक्षा देगी।

  मिट्टी का मकान कैसा लगता है?

  क्या आपके दिमाग में ऐसी तस्वीर उभरती है?

  ऊपर दिए गए चित्र में जो घर है, क्या वह भी भी मिट्टी का घर है?

 हाँ यह भी मिट्टी का घर है? यह बहु-मंजिला है और इसकी कंक्रीट की छत है!

  अगले पचास वर्षों में ऊर्जा और ईंधन की समस्या बहुत ही गंभीर बन जाएगी। मुश्किल उस हद तक होगी जिस हद तक हम मुफ्त ऊर्जा वाले सामान जैसे मिट्टी को इस्तेमाल कर पाएंगे। भारत जैसे देश में एक प्रमुख काम है, ढाई करोड़ बेघर परिवारों को मकान उपलब्ध कराना। इस समस्या का निदान हम तभी कर पाएंगे जब हम अपनी बीसवीं शताब्दी की वैज्ञानिक जानकारी और तकनीकों को बाबा-आदम के जमाने से जानी-पहचानी मिट्टी पर आजमाएंगे। इस तरह ऊर्जा समस्या को और अधिक जटिल बनाए बगैर ही बेघरों के लिए मकान बना पाएंगे। मिट्टी पुराने फैशन की चीज नहीं है। अगर आप चाहें तो मिट्टी से एकदम फैशनेबिल घर बना सकते हैं।

  देश में सभी जगहों पर किसी-न-किसी प्रकार की मिट्टी अवश्य मिलती है। हो सकता है कि ऊपरी सतह की मिट्टी दीवार बनाने के लिए ठीक न हो, परंतु नीचे की मिट्टी ठीक हो सकती है। हो सकता है कि मिट्टी में कुछ अन्य चीजें  - जिन्हें ‘स्टेबिलाइजर’ कहते हैं, मिला देने से यह काम चलाऊ बन जाए। इस स्थिति की तुलना आप ईंट उद्योग से करिए। देश के कुछ थोड़े से ही हिस्सों में अच्छे किस्म की मिट्टी मिलती है, जिसको पका कर पुख्ता ईंट बनाई जा सकें।

 इसलिए सबसे अच्छा यही होगा कि आप अपने प्लाट के आसपास ही मिट्टी खोजें। अगर यह संभव न हो तो मिट्टी को सबसे कम दूरी से लाएं। हो सकता है कि आपको कोई स्थानीय ‘स्टेबिलाइजर’ मिल जाए जिसे मिला देने से आपकी मिट्टी अच्छी हो जाए।

 250 वर्ग मीटर जमीन के प्लाट पर 25-वर्ग मीटर क्षेत्रफल के बने मकान की दीवारों में करीब 60-घन मीटर मिट्टी लगेगी।

 मकान के निचले क्षेत्रफल को छोड़कर अगर आप पूरे प्लाट के टुकड़े को केवल ण्266-मीटर (यानी साढ़े-दस इंच) गहरा खोदें तो आपको घर बनाने के लिए पर्याप्त मिट्टी मिल जाएगी।

  मिट्टी कहां से आयेगी?

  यह बहुत मुमकिन है कि आपको घर बनाने के लिए अच्छी मिट्टी जमीन की एकदम ऊपरी सतह पर ही मिल जाए। गड्ढा खोदने पर आपको मिट्टी की अलग-अलग तहें दिखेंगी। हो सकता है कि मिट्टी की ऊपरी सतह में बहुत सारे पत्ते, खाद आदि हों। ऐसी तह के नीचे बालू हो और उसके नीचे चिकनी मिट्टी हो। इसलिए अपनी जमीन में दो-चार गड्ढे खोदकर और निचली तहों का मुआयना करके ही आप अपनी मिट्टी के बारे में कोई निर्णय लें। अक्सर दो-तीन दबी हुई तहों को मिलाने से अच्छी मिट्टी की दीवार बनती है।

  ऊपर की मिट्टी को अलग रखें

  ऊपर की मिट्टी को अलग रखें - गड्ढा खोदने पर आपको मिट्टी की अलग-अलग तहें दिखेंगी। ऊपरी तहों में तमाम सड़े पत्ते, खाद आदि होगी। उसमें निचली तहें बालुई और चिकनी मिट्टी की होंगी।

 -सड़े पत्तों वाली ऊपरी मिट्टी मकान बनाने के लिए ठीक नहीं है।

 इसको अलग एक ढेर बना कर रख दें।

 -अब रेतीली और चिकनी मिट्टी को मकान की दीवार बनाने के लिए खोदें। बाद में सड़े पत्तों वाली ऊपरी मिट्टी को प्लाट पर वापिस फैला दें। यह मिट्टी पेड़-पौधे उगाने के लिए एकदम उम्दा होगी।

  अलग-अलग तरह की मिट्टियां

 आमतौर पर पांच अलग-अलग किस्म की मिट्टियां होती हैं।

 रोड़ीः इसमें पत्थर के छोटे टुकड़े होत हैं। यह आकार में मटर के दाने जितने छोटे या अंडे जितने बड़े होते हैं।

 जिसे आप रोड़ी समझ रहे हैं, वह अगर पानी में 24 घंटे भीगने पर अगर घुल जाए तो वह रोड़ी नहीं है।

 मोटी रेतः पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े जिनका साइज एक मटर के दाने से कम होता है, परंतु हरेक दाना अलग नजर आता है।

 बारीक रेतः रेत से कहीं अधिक बारीक। इसके कण इतने छोटे होते हैं कि उन्हें अलग से देख पाना संभव नहीं है।

 चिकनी मिट्टीः ऐसी मिट्टी जो गीली होने पर चिपकती है, परंतु सूखने पर एकदम कड़क हो जाती है। सामान्यतः ऐसी मिट्टियां सूखने पर सिकुड़ती हैं, और गीली होने पर फैलती हैं। पर कुछ अन्य चिकनी मिट्टियों में ऐसा नहीं होता।

 पत्तों वाली ऊपरी मिट्टीः इस मिट्टी का ज्यादातर हिस्सा सड़ी पत्तियों या पेड़ों के बचे अवशेषों का होता है। गीली स्थिति में यह स्पंज जैसी होती हैं। इसमें अक्सर सड़े पत्तों की खुशबू आती है। इसका रंग गहरा होता है और अक्सर यह नमी पकड़े होती है।

 मिश्रणः अक्सर अलग-अलग मिट्टियां एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई पाई जाती हैं। इन मिश्रणों को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं जैसे ‘रेतीली चिकनी मिट्टी’, ‘रोड़ी मिली चिकनी मिट्टी’ आदि। मिश्रण में किस हिस्से की मात्रा ज्यादा है, इसका हमें पूरा ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए ‘रेतीली रोड़ी’ का मतलब है कि उसमें अधिकांश रोड़ी है जिसमें थोड़ी सी रेत मिली है। जबकि ‘रोड़ी वाली रेत’ का मतलब होगा ऐसी रेत जिसमें थोड़ी बहुत रोड़ी भी हो।

  मिट्टियां

 रोड़ी

 मोटी रेत

 बारीक रेत

 चिकनी मिट्टी

 पत्तों वाली मिट्टी

 अलग-अलग मिट्टियों के उपयोगः

 रोड़ीः अपने आप में मिट्टी की दीवार बनाने के लिए बेकार। पत्थर के छोटे टुकड़ों को आपस में बांधे रखने के लिए इसमें कुछ भी नहीं है।

 मोटी रेतः लगभग मिट्टी जैसी ही। अपने आप में इस मोटी रेत से दीवार नहीं उठ सकती। परंतु चिकनी मिट्टी और मोटी रेत का मिश्रण मिट्टी की दीवार बनाने के लिए एमदम उम्दा है।

 बारीक रेतः अपने आप में दीवार बांधने के लिए अनउपयुक्त। रेत की दीवार खड़ी तो रहेगी परंतु मजबूत न होगी। क्योंकि रेत दबेगी नहीं इसलिए उसे दबाकर ब्लॉक्स भी नहीं बनाये जा सकते। रेत में अगर मजबूती के लिए चूना या सीमेंट मिला दिया जाए तो उससे अच्छे और मजबूत ब्लॉक्स बन सकते हैं।

 चिकनी मिट्टीः चिकनी मिट्टी को गूंथा और दबाया जा सकता है, परंतु सूखने के बाद वह सिकुड़ जाती है। बारिश में नमी पकड़कर वह फूल जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं।

 लैटराइटः यह एक लाल रंग की मिट्टी होती है जिसमें लोहा और अल्युमिनियम मिला होता है। इसके ब्लॉक्स को जमीन में से काट-काट कर निकाला जाता है। हवा से सूखकर ये ब्लॉक्स और मजबूत हो जाते हैं। हम लैटराइट को एक किस्म का पत्थर मानते हैं, पर दरअसल यह दीवारों के लिए एक बेहतरीन सामान है। मिट्टी के बारे में स्थानीय मान्यताओं को मानना ही सही है। कुछ तरह की मिट्टियां मकान बनाने के लिए उपयुक्त नहीं पाई गई हैं। स्थानीय लोगों ने इन्हें सैकड़ों बरसों से जांचा-परखा है। धीरे-धीरे उन्होंने इन खराब मिट्टियों का इस्तेमाल बंद कर दिया है।

 पत्तों वाली मिट्टीः दीवार बनाने के लिए यह मिट्टी एकदम बेकार है। एक नियम यह है कि अगर कोई मिट्टी, पेड़-पौधे उगाने के लिए अच्छी है तो वह दीवार बनाने के लिए बेकार होगी।

 मिश्रणः पहले यह देखें कि मिश्रण में कौन-कौन सी अलग-अलग मिट्टियां हैं। इन मिट्टियों का क्या अनुपात है? यही उनकी उपयोगिता तय करेगा।

 अपने इलाके की पुरानी इमारतों को ध्यान से देखें। इससे आपको पता चलेगा कि उनमें किस तरह की मिट्टी उपयोग में लाई गई थी। इस तरह आप उनके टिकाऊपन या उसकी कमियों का अंदाज लगा सकते हैं।

 रोड़ी - बेकार

  अकेली रेत - बेकार

 रेत और चिकनी मिट्टी - अच्छी

 पत्तों वाली मिट्टी - बेकार

 अकेली चिकनी मिट्टी - बेकार

 चिकनी मिट्टी और रेत - अच्छी

  सिगार या लोई टेस्ट

  मिट्टी की एक लोई बनाएं। उसे अपनी मुट्ठी में दबाएं और देखें कि टूटने पर उसकी लम्बाई कितनी है।

 सिगार टेस्टः

 एक मुट्ठी भर मिट्टी से (जिसमें उसके चिपकने भर के लायक पानी मिला हो) लोई का आकार बनाएं। अब अपने अंगूठे और उंगली की मदद से लोई को दबाएं जिससे लगभग चौथाई इंच मोटाई का तार निकलने लगे। अब आप यह देखें कि तार कितना लम्बा होने के बाद टूट कर जमीन पर गिरता है।

 1 अगर लोई को तार का आकार देना मुश्किल है और तार बार-बार टूट कर गिर जाता है, इसका मतलब है कि मिट्टी में रेत की मात्रा बहुत अधिक है, और चिकनी मिट्टी का अंश कम है। इसको इस्तेमाल करने के लिए या तो आपको थोड़ी चिकनी मिट्टी मिलानी पड़गी अथवा कोई ‘स्टेबिलाइजर’।

 2 अगर मुट्ठी दबाने से तार आठ-नौ इंच तक लम्बा बन जाता है, तो इसका मतलब है कि आपकी मिट्टी में रेत और चिकनी मिट्टी का अनुपात लगभग सही है। ऐसी मिट्टी घर बनाने के लिए अच्छी होगी।

 3 अगर मुट्ठी को दबाने से तार आठ-नौ इंच तक लम्बा बन जाता है, तो इसका मतलब है आपकी मुट्ठी में ज्यादा चिकनी मिट्टी है। इसका इस्तेमाल करने से दीवार में सिकुड़न और दरारे आयेंगी। इसे ठीक बनाने के लिए आपको इसमें रेत अथवा अन्य ‘स्टेबिलाइजर’ मिलाने पड़ेगे।

 रोड़ी तो आपस में चिपकेगी ही नहीं, लोई बनाने की बात तो दूर की रही। पत्तों वाली ऊपरी मिट्टी की अगर कोई लोई बन भी जाए तो भी वो घर बनाने के लिए ठीक नहीं होगी। पर यह न भूलिए कि इसी मिट्टी के नीचे ही आपके काम की मिट्टी दबी पड़ी है।

  मिट्टी की सरल जांचः

 वैसे मिट्टी की सही वैज्ञानिक जांच भी की जा सकती है। परंतु आप चाहें तो कुछ सरल से परीक्षण करके खुद अपनी मिट्टी के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं। सबसे अच्छा वैसे यही होगा कि आप अपने इलाके में घूम कर उन लोगों से कुछ जानकारी हासिल करें, जो खुद मिट्टी के घरों में रहते हैं। कई इलाकों में सत्तर-अस्सी बरस पुराने मिट्टी के घर अभी भी बरकरार हैं। उन्होंने मिट्टी की जो जांच की होगी उसका ठोस सबूत प्रत्यक्ष आपके सामने होगा।

  बिस्कुट टेस्ट

 थोड़ी सी नमी लिए मिट्टी से दो इंच व्यास और लगभग चौथाई इंच मोटाई का एक बिस्कुट बनाएं। अब इस बिस्कुट को धूप में अच्छी तरह सुखा लें।

 1 अगर बिस्कुट उठाते वक्त टूट जाता है, या उंगलियों के बीच जल्दी टूट जाता है तो इसका मतलब है कि घर बनाने के लिए यह मिट्टी ठीक नहीं है।

 2 पर अगर उसे तोड़ने में थोड़ा बल लगता है, तो शायद घर बनाने के लिए यह अच्छी मिट्टी होगी। 3 परंतु अगर बिस्कुट ऊपर से कड़क है और उसे तोड़ना भी मुश्किल है, या अगर वह एक झटके में ज्यादा पके, कड़क बिस्कुट जैसा टूट जाता है, तो भी ऐसी मिट्टी बेकार है इसमें रेत या अन्य ‘स्टेबिलाइजर’ मिलाने होंगे।

  बिस्कुट टेस्ट

 बिस्कुट टेस्टः मिट्टी का एक बिस्कुट बनाएं -

 उसे धूप में सुखाएं - और फिर उसे तोड़ कर देखें।

  हाथ-धोकर परखना

 गीली मिट्टी को हाथ में लेकर तब तक खेलें जब तक आपके हाथ एकदम गंदे न हो जाएं। उसके बाद अपने हाथों को पानी से धोएं।

 1 अगर आपके हाथ जल्दी साफ हो जाते हैं, इसका मतलब है कि मिट्टी एकदम रेतीली है, और वो घर बनाने के लिए ठीक नहीं रहेगी।

 2 अगर आपको हाथ साफ करने में थोड़ी देरी लगती है ओर ऐसा अहसास होता है जैसे आप आटे या मैदा में सने हाथ धो रहे हों तो आपके हाथों में एकदम बारीक रेत थी। इसमें कुछ ‘स्टेबिलाइजर’ मिलाने पड़ेंगे।

 3 अगर आपके हाथों को साबुन का अहसास हो रहा हो और वह फिसल रहे हों तो जरूर आपके हाथों में चिकनी मिट्टी है। इसमें रेत मिलाने के बाद ही आप इसका इस्तेमाल कर पायेंगे।

 कई मरतबा मिट्टी परीक्षण में यह सभी चीजें मिली होती हैं। आप रेत के कणों के साथ-साथ फिसलती चिकनी मिट्टी को महसूस कर सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि आपके पास घर बनाने के लिए उम्दा मिट्टी होगी। रंग से परखनाः मिट्टी का रंग ही आपको उसके बारे में काफी कुछ जानकारी दे सकता है। अक्सर मिट्टी के रंग से ही आप जान सकते हैं कि मिट्टी ठीक है या खराब। अगर मिट्टी गहरी पीली, नारंगी या लाल या गहरी भूरी है तो इसका मतलब है कि उसमें लोहे के अंश हैं। ऐसी मिट्टी मकान बनाने के लिए अच्छी होगी।

 चिकनी मिट्टी अक्सर सिलेटी, हल्के भूरे, या गंदे सफेद रंग की होती है। थोड़ा हरापन लिए भूरी मिट्टी में अक्सर सड़ें पत्तों आदि की अधिक मात्रा होती है।

 हाथ धोकर परखनाः अपने हाथों से मिट्टी को मलें। फिर हाथ धोकर देखें कि वे कितनी आसानी या मुश्किल से धुलते हैं।

  ‘स्टेबिलाइजर’

 अगर कोई सामान कमजोर है और खुद अपने वजन से ढह जाता है, तो वह टिकाऊ और स्थाई नहीं होगा। मिसाल के तौर पर केवल रोड़ी, रेत या चिकनी मिट्टी को अकेले इस्तेमाल करके दीवार खड़ी करना मुमकिन नहीं है।

 इसका यह मतलब नहीं है कि इनका कोई उपयोग ही नहीं है। इस कमजोरी को कुछ और माल मिलाकर ठीक किया जा सकता है। अब इस मिश्रण के ब्लाक या दीवार मजबूत बनेगी। इस ‘कुछ और माल’ को ही हम ‘स्टेबिलाइजर’ कहते हैं।

 आज जब लोग मिट्टी को मजबूत बनाने की सोचते हैं तो उनका ध्यान केवल सीमेंट की ओर ही जाता है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सारी दुनिया में हजारों सालों से लम्बी उम्र तक टिकने वाले मिट्टी के मकान बन रहे हैं, जबकि ‘पोर्टलैंड सीमेंट’ का आविष्कार केवल इसी बीसवीं शताब्दी में हुआ है। हमारे पूर्वजों ने काफी जांच-पड़ताल के बाद अनेकों ‘स्टेबिलाइजर’ खोज निकाले थे। सदियों के बाद भी उनमें से सबसे अच्छे आज भी हमारे बीच हैं। इस परम्परागत ज्ञान से कुछ नहीं सीखना बेहद मूर्खता होगी।

  स्टेबिलाइजर की जरूरत

  सीमेंट

 आज के जमाने में, सीमेंट एक आधुनिक ‘स्टेबिलाइजर’ है। परंतु सीमेंट का सब जगह मिल पाना, उसकी कीमत, और उसे बनाने में खर्च अत्याधिक ऊर्जा आदि सवाल भी अहम हैं। खासतौर पर सीमेंट की सही मात्रा और अनुपात का अंदाज लगाना कठिन है। मिसाल के लिए अगर हमें 5 प्रतिशत ‘स्टेबिलाइजर’ चाहिए तो इसका मतलब होगा कि 19-भाग मिट्टी में एक भाग सीमेंट मिलाना होगा। तो अगर आपको 100-घन मीटर मिट्टी की आवश्यकता है, तो उसके लिए आपको 5 घन मीटर सीमेंट चाहिए होगा। पर हो सकता है कि आप आनी मिट्टी की जांच के बाद पाएं कि उसको टिकाऊ बनाने के लिए मात्र 2 प्रतिशत सीमेंट, यानी केवल 2-घन मीटर सीमेंट लगेगा। कहां 125 बोरे, और कहां केवल 50 बोरे सीमेंट में काम चल सकता है। पैसों की काफी बचत हो सकती है। इसलिए शुरू में मिट्टी की जांच-परख बेहद जरूरी है। इस तरह कम-से-कम सीमेंट इस्तेमाल होगा।

 मिट्टी के गुणों के बारे में एकदम सही जानकारी का अभाव है। यह भी एक कारण है कि जिस वजह से इंजीनियर और ठेकेदार, मिट्टी को नहीं अपनाते। अगर आप उनसे कहें कि 5ण्7362 प्रतिशत सीमेंट मिलाओ तो वे बहुत खुश होंगे। परंतु यह कहना कि ‘एक से पांच प्रतिशत के बीच मिलाओ’ उनको एकदम अस्पष्ट सा लगेगा। विज्ञान में एकदम सही आंकड़े चाहिए। अंदाज और जुगाड़ से विज्ञान को चिढ़ है। बहुत रेतीली या बहुत चिकनी मिट्टी को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए 3 से 12-प्रतिशत सीमेंट की जरूरत होती है। परंतु मैं अक्सर सीमेंट से दूर ही रहता हूं। जब कोई और विकल्प न हो मैं तभी सीमेंट इस्तेमाल करता हूं।

  सीमेंट

  चूना

  चूना भी लगभग उन्हीं पदार्थों से बनता है जिनसे सीमेंट बनता है। परंतु चूना हजारों साल पुराना है और उसे कहीं भी आसानी से बनाया जा सकता है। चूना बनाने में सीमेंट की अपेक्षा बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है। मिट्टी को स्थाई और टिकाऊ बनाने के लिए चूना एक उम्दा स्टेबिलाइजर है। वैसे बुझे और अनबुझे दोनों तरह के चूनों से काम चल सकता है, परंतु बुझे चूने से मजदूरों के हाथ और पैरों में कम तकलीफ होती है।

 ‘स्टेबिलाइजर’ की मात्रा मिट्टी की क्वालिटी के ऊपर निर्भर करेगी। अगर मिट्टी में बहुत अधिक रेत या बहुत अधिक चिकनी मिट्टी है, तो इसका मतलब है कि स्टेबिलाइजर भी अधिक लगेगा। चूने को 2 से 6-प्रतिशत के बीच मिलाया जा सकता है। अक्सर 3-प्रतिशत पर्याप्त होता है।

 कई दफा मिट्टी में मजबूती की दृष्टि से सीमेंट या चूना मिलाने की जरूरत नहीं होती। परंतु केवल मिट्टी से बना घर जल्दी ही पानी और नमी सोख लेता है। मिट्टी पानी न सोखे इसलिए कभी-कभी केवल थोड़ा सा स्टेबिलाइजर मिलाने से काम चल जाता है।

 अगर आपको जल्दी में घर बनाना है तो आप जरूर सीमेंट और चूने का उपयोग करें। चूना धीरे-धीरे जमता है और कड़क होता है, परंतु उसमें थोड़ा सा सीमेंट मिला देने से वो जल्दी ही सेट हो जाता है। ऐसे मिश्रण में अक्सर 2-प्रतिशत चूना और 1-प्रतिशत सीमेंट मिलाया जाता है।

  चूना

  चूना सबसे अच्छा और सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जानेवाला स्टेबिलाइजर है। चूना बनाने के लिए सीप, शंख या चूना पत्थर को मिट्टी की भट्टी में जलाया जाता है।

  ग्रामीण ‘स्टेबिलाइजर’

 परम्परागत मकानों में कई प्रकार के ‘स्टेबिलाइजर’ इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। कुछ प्रचलित और आम इस्तेमाल में आने वाले ‘स्टेबिलाइजर’ इस प्रकार हैं :

 पुआलः इस ‘स्टेबिलाइजर’ में कोई रासायनिक गुण नहीं है। पुआल की वजह से मिट्टी में दरारें कम पड़ती हैं। पुआल की वजह से गीले ब्लाकों को अधिक आसानी से उठाया जा सकता है। पुआल की तरह ही लोग भूसे और अन्य रेशों का भी इस्तेमाल करते हैं।

 गोबरः परम्परागत रूप से मिट्टी के लगभग सभी तरह के काम में गोबर उपयोग में लाया जाता है।

 पेशाबः पेशाब भी इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मिली यूरिया, गोंद जैसे जोड़ने का काम करती हे।

 गोंदः पेड़ों से निकलने वाले गोंद / रोजिन भी पकड़ के लिए और पानी से बचाव के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

 शीराः गुड़ बनाते समय निकला शीरा मिट्टी में पकड़ बनाए रखता है। इसमें मिले रेशों से भी लाभ होता है।

 टैनिक अम्लः कुछ ग्रामीण उद्योगों से निकला टैनिक अम्ल भी अच्छे ‘स्टेबिलाइजर’ का काम करता है।

 तेलः केरल में मिट्टी की दीवारों को पानी से बचाने के लिए उन पर बाहरी ओर से नारियल का तेल पोत दिया जाता था। वैसे तो किसी भी तेल का उपयोग किया जा सकता है। परंतु आजकल जले इंजिन-आयल का अधिक प्रचलन है। पानी से बचाव के लिए उसका इस्तेमाल सीमेंट-कंक्रीट और मिट्टी दोनों के लिए उपयुक्त है।

  ग्रामीण स्टेबिलाइजर

  कई तरह की मिट्टियों में उच्च तकनीक भी इनसे अधिक कारगर नहीं।

  भूसा

  पुआल

  गोबर

  पेड़ों का रस

 कई पेड़ों में से सफेद दूध जैसा रस निकलता है - जैसे पोइनसेटिया, कैक्टस, सन (अम्बाडी) आदि। इनको मिलाने से पकड़ तो अच्छी होती ही है, साथ-साथ पानी से भी बचाव होता है।

 पेड़ों से निकले कई तरह के रस में रोजिन होता है और वो वाटर-प्रूफिंग के लिए अच्छा होता है। लेकिन क्योंकि कई बार यह पानी में नहीं घुलता इस वजह से उसे मिट्टी में मिलाना मुश्किल होता है।

 स्थानीय लोग जो चीज इस्तेमाल करें, अक्सर वही सबसे सरल हल होता है।

 कोलतारः कोलतार एक अच्छे ‘स्टेबिलाइजर’ का काम करता है, परंतु ईमानदार आदमी को इसका मिलना बहुत मुश्किल होता है। अगर कहीं आपको कोलतार मिले, तो समझें कि उसे पी डब्लू डी से चुराया गया है।

 अक्सर सबसे आम और कारगर ‘स्टेबिलाइजर’ मिट्टी ही है। अगर मिट्टी बहुत रेतीली है तो उसमें चिकनी मिट्टी मिला दें। अगर आपकी मिट्टी चिकनी है तो उसमें रेत मिला देना ‘स्टेबिलाइजर’ का काम करेगा।

 आधुनिक ‘स्टेबिलाइजर’ जैसे सीमेंट मंहगे होते हैं और उन्हें बनाने में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है। कई परम्परागत और स्थानीय ‘स्टेबिलाइजर’ प्राकृतिक चीजों पर आधारित होते हैं - कई तो फेंकी जाने वाली चीजों से बनते हैं। इसलिए वे सस्ते होते हैं और उनमें लगभग नहीं के बराबर ऊर्जा खर्च होती है।

 भारत के कई हिस्सों में मिट्टी या मिट्टियों के मिश्रण को बगैर किसी ‘स्टेबिलाइजर’ मिलाए सीधा इस्तेमाल किया जा सकता है। केवल प्रयोग करके और परखने के बाद ही आप यह जान पाएंगे कि ‘स्टेबिलाइजर’ की जरूरत है या नहीं।

  पेड़ों के रसों से बने स्टेबिलाइजरः

 सन, कैक्टस आदि।

  अब तक हमने अलग-अलग तरह की मिट्टियों के बारे में कुछ जाना है। हमने देखा है कि मिट्टी को पानी से किस तरह सुरक्षित किया जा सकता है, और उसे मजबूत बनाने के लिए कभी-कभी स्टेबिलाइजर भी मिलाए जा सकते हैं। अब हमें मिट्टी को इस्तेमाल करना सीखना है जिससे कि उसकी पकड़ बनी रहे।

 मिट्टी के मकान बनाने की कई पद्धतियां हैं। अक्सर किसी जिले में दीवार बनाने की एक ही पद्धति प्रचलित होती है। इसका पहला उद्देश्य तो दीवार को कम-से-कम एक इंसान की ऊंचाई तक ऊपर उठाना है। दूसरी ओर दीवार इतनी मजबूत तो जरूर हो कि खुद खड़ी और टिकी रहे और साथ-साथ छत का भार भी झेल सके।

  कौब - ऊंचाई के अलावा यह अन्य सभी कामों के लिए उपयुक्त है। यह तरीका खासतौर पर गोलाई ली हुई दीवारों के लिए अच्छा है। ‘पिसे’ या मिट्टी-ठोकना यह मजबूत है और एक-मंजिल के चौकोर मकानों के लिए आदर्श तरीका है।

  अडोबी या धूप में सूखी ईंटेंः इस तरीके से आसानी से दो-मंजिले मकान बनाए जा सकते हैं।

  मशीन में दबाकर बनाई ईंटें चिकनी और बहुत मजबूत होती हैं। इनसे तीन-मंजिले मकान बनाए जा सकते हैं।

  वाटल और डौब भूकम्प वाले इलाकों के लिए उपयुक्त हैं। बांस और केन वाले इलाकों में इनसे सुंदर मकान बनते हैं।

  तीन-चार कतारें एक-दूसरे पर चढ़ाने के बाद दीवार को समतल और चिकना किया जाता है, जिससे कि सारे छिद्र और दरारें भर जाएं।

  सबसे पहला, पुराना और सरल तरीका ‘कौब’ कहलाता है। इसमें, बहुत थोड़े से पानी में मिट्टी को कड़ा गूंथ कर एक बड़ा लौंदा बनाते हैं - इतना बड़ा, जिससे कि दोनों हाथों से उठ सके। फिर उसे धीरे-धीरे एक अंडे का आकार देते हैं। उसका माप आमतौर पर 12 से 18-इंच (30 से 40-सेमी) लम्बा और इसका व्यास लगभग 6-इंच (15-सेमी) होता है।

  इसके ऊपर मिट्टी के लौंदों की दूसरी कतार रखी जाती है। ऊपरी कतार के लौंदे निचली कतार के लौंदों के बीच गड्ढों में रखे जाते हैं।

  थोड़ी सावधानी और अनुभव से - और शायद एक धारदार चाकूनुमा औजार की मदद से एक सपाट और चिकनी सतह बनाई जा सकती है।

  कौब मिट्टी के इन लौंदो को एक-दूसरे से सटाकर और दबाकर एक कतार में रखते हैं।

  अभी तक मैंने लौंदो को एक-दूसरे पर रखने की बात की है, परंतु असलियत में लौंदे को निशाना लगाकर जोर लगाकर बलपूर्वक फेंका जाता है। इस तरह लौंदो के बीच छेद और दरारें लगभग नहीं के बराबर रह जाती हैं। आप जल्द ही यह सबक सीख जाते हैं कि मिट्टी को कड़क रखना जरूरी है। अगर मिट्टी में अधिक पानी होगा तो जैसे-तैसे दीवार ऊपर उठेगी वह बीच में फूलेगी और फैलेगी। ऐसी भी संभावना है कि दीवार ढह जाए और एक मिट्टी का ढेर बन जाए।

 वैसे दीवार धीरे-धीरे करके ही बनाना अच्छा है। घर के सभी ओर लौंदो की दो या तीन तहें चढ़ाने के बाद थोड़ा ठहरना अच्छा होेगा। पहले की तहों के सूखने के बाद ही अगली दो-तीन तहें चढ़ाएं। लौंदो की दीवार को सीधा और सपाट रखना भी कठिन है। इसके लिए दीवार बनाते वक्त उसके साथ सटकर खड़ा रहना चाहिए।

 अगर दरारों और छेदों को केवल हाथ से भरा गया है तो दीवार की सतह थोड़ी खुरदरी होगी। दीवार के बनने के तुरंत बाद आप उसकी सतह को एक कन्नी या धारदार चाकू से समतल और चिकना कर सकते हैं। एक बार अगर आपको ‘कौब’ तरीके में मिट्टी की सही परख आ गई तो आप पाएंगे कि यह तरीका एकदम सीध ा-सरल है। कोई भी इंसान इसे जल्दी से सीख सकता है। गोल या गोलाकार दीवारें बनाने के लिए यह तरीका एकदम आदर्श है। खिड़कियों और दरवाजों के लिए खाली जगह छोड़ना एक समस्या है। इसके लिए स्थाई लकड़ी के तख्ते इस्तेमाल कर सकते हैं।

 रिक्त स्थानों को भरने के लिए मिट्टी के तेल के पुराने टिन या पीपे भी उपयुक्त हैं।

 मिट्टी के लौंदों से दीवार बनाने के तरीके का सबसे बड़ा फायदा ये है कि कोई भी इंसान इसे बना सकता है। इससे कोई विशेष औजार या सांचे की जरूरत नहीं पड़ती। अगर बच्चों जैसे आप मिट्टी का पेड़ा बना सकते हैं, तो आप कौब - यानी लौंदों की दीवार भी बना सकते हैं।

  ‘कौब’ से बनी दीवारों की मोटाई को एक-समान बनाने के लिए ही ‘पिसे’ या मिट्टी ठोक दीवार विकसित हुई। मिट्टी को ठोकने से दीवार की ताकत और बढ़ जाती है। इसको ‘रैम्ड अर्थ’ यानी मिट्टी ठोक तरीका कहते हैं।

 असल में इसमें दो लकड़ी के तख्ते होते हैं, जो एक-दूसरे के समानान्तर होते हैं। इनके बीच एक-समान दूरी बनाए रखने के लिए लोहे की छड़, क्लिप और नट-बोल्ट इस्तेमाल किए जाते हैं। थोड़ी सख्त मिट्टी को इन दोनों तख्तों के बीच फेंका जाता है, फिर उन्हें लकड़ी या लोह के धुरमुस से कूट कर दबाया जाता है। जब एक हिस्सा पूरा होकर सूख जाता है तब दोनों तख्तों को आगे सिरकाकर अगला हिस्सा बनाया जाता है। इस तरह घर की दीवारों की पहली और निचली तह पूरी की जाती है। इसके बाद तख्तों को ऊपर उठाकर इसी तरह दूसरी तह, पहली के ऊपर ठोकी जाती है। यह सिलसिला पूरी दीवार उठने तक जारी रहता है। ईंटों की चिनाई की तरह ही मिट्टी में भी चिनाई का एक नमूना होता है। इसमें भी एक तह का खड़ा जोड़ दूसरी तह के खड़े जोड़ पर नहीं आना चाहिए। नहीं तो इन खड़े जोड़ों में एक लम्बी दरार पड़ने का खतरा रहेगा। इन तख्तों को मजबूती से अपने बीच की दूरी बनाए रखने के लिए, और उन्हें सरकाने और ऊपर उठाने के लिए काफी जुगाड़ लगती है।

 फिर खिड़की और दरवाजे की खाली जगह पर या दीवार के कोनों के लिए तख्तों को आगे-पीछे करने के लिए एक लचीली व्यवस्था चाहिए। ‘कौब’ तरीक से शायद हरेक कोई दीवार बना लेता। लेकिन ‘मिट्टी-ठोक’ तरीके के इस्तेमाल में थोड़ी कुशलता चाहिए। परंतु कोई भी मजदूर या मिस्त्री इसे जल्दी ही सीख सकता है। जिससे दीवार में दरारें न पड़ें, इसलिए सरल बंधाई की जानकारी भी जरूरी है।

 इसमें कोई शक नहीं है कि ‘मिट्टी-ठोक’ दीवार बहुत मजबूत होती है, और बहत अर्से तक चलती है। यह आराम से दो या तीन मंजिलों का बोझ सह सकती है। दुनिा के कई हिस्सों में इस तरह की सैकड़ों साल पुरानी इमारतें मिलती हैं।

  रैम्ड अर्थ या मिट्टी-ठोक दीवार

  इस तीसरे तरीके को सारी दुनिया में ‘अडोबी’ के नाम से जाना जाता है। भारत में लोग इसे धूप में सुखाई कच्ची ईंटों के नाम से जानते हैं। मिट्टी की दीवारें बनाने का यह सबसे प्रचलित तरीका है। कोई भी मिट्टी की ईंटें या ब्लाक्स बना सकता है और सुखाने के बाद में उन्हें संभाल कर गोदाम में रखा जा सकता है। जब काफी ईंटे इकट्ठी हो जाएं तब घर बनाया जा सकता है।

  अडोबी या धूप में सूखी ईंटें

  इसमें सांचे के लिए एक लकड़ी या धातु का डिब्बा इस्तेमाल होता है। सांचे में थोड़ी सख्त मिट्टी ठोक-कर भरी जाती हैं फिर उस ईंट को निकालकर उसे धूप में हल्के-हल्के सूखने दिया जाता है। इन कच्ची ईंटों को किसी भी साइज में बनाया जा सकता है। वह या तो साधारण पकी ईंटों के नाप की हो सकती है (जैसे 9-इंच, 4 से 5-इंच, 3-इंच) या अगर मोटी दीवार बनाती हो तो इनका साइज बड़ा हो सकता है (जैसे 12-इंच, 6-इंच, 4-इंच)। छोटी ईंटों में दरारें कम पड़ती हैं। अगर ईंटों को सावधानी से हल्के-हल्के करीब एक महीने तक सुखाया जाए, और अगर दीवार को सामान्य ठीक तरीके से बनाया जाए तो काफी मजबूती और बिना दरारों की दीवार बन सकती है। यह दीवारें दो या तीन मंजिले मकानों का बोझ उठा सकती है। हां, दीवार में ईंटों को सामान्य बंधन के नमूने में सजाना चाहिए, और दीवार की हमेशा पानी से हिफाजत करनी चाहिए। मिट्टी की दीवार बहुत अर्से से बनती आ रही हैं। इनमें न तो कोई खतरा है, और न ही इन्हें गंवारू समझना चाहिए। यही एक मात्र हल है करोड़ों बेघर लोगों के लिए घर बांधने का। इसमें कोई ईंधन और ऊर्जा नहीं लगती।

 अगर सांचे की दीवारें समानांतर न होकर हल्के से कोण पर हों तो ईंट सांचे में से आसानी से बाहर निकल आती है।

 मिट्टी के ब्लाक्स के लिए सांचे

 किसी भी साइज में बनाए जा सकते हैं, परंतु बहुत बड़े ब्लाक्स को उठाना मुश्किल होता है।

 आप कई खानों वाला एक बड़ा सांचस बना सकते हैं। इस तरह एक बार में कई ब्लाक्स बन जाएंगे। सामान्य पकी ईंट का साइज अच्छा है। तब राज-मिस्त्रियों को विशेष ट्रेनिंग की जरूरत भी नहीं थी।

  यह चौथी तकनीक मिट्टी की ईंट बनाने जैसी ही है। परंतु इसमें ईंटों को एक सरल सी मशीन में जोर से दबाया जाता है। 1987 में यह मशीन लगभग रुपए 4000-5000 की मिलती थी। इस मशीन से निकले दबे ब्लाक बहुत मजबूत होते हैं। और मिट्टी में थोड़ा स्टेबिलाइजर मिला हो तो इस मशीन से बनी ईंटे लगभग पकी ईंटों जितनी मजबूत होती हैं।

 इस तरह से बने दबे ब्लाक्स को भी धीरे-धीरे सुखाना चाहिए। इनको भी पानी से बचाने की सावधानी बरतनी चाहिए।

 कई लोग इन ईंटों को पसंद करते हैं क्योंकि इनकी सतह एकदम साफ और चिकनी होती है। परंतु इन दबे ब्लाक्स को बनाने में काफी मेहनत और मशक्कत करनी पड़ती है। इन मशीनों के निर्माता इनकी क्षमता को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बखान करते हैं। उनके हिसाब से एक दम्पत्ति के लिए एक दिन में 1,000 से 5,000 ब्लाक्स बनाना संभव है। परंतु अगर कोई दम्पत्ति एक दिन में 1,000 ब्लाक्स बनाएगा  तो अगले दिन उनकी हालत एकदम खस्ता होगी। अगर वह अस्पताल में न हुए तो कम-से-कम खाट पर जरूर पड़े होंगे!

  दबी मिट्टी के ब्लाक्स



 वाटल और डौब

 यह मिट्टी की दीवार बनाने की पांचवी पद्धति है। इसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर जमीन में लकड़ी के खम्बे गाढ़ते हैं। फिर चिरे बांस, केन, या पतली डंठलों का ताना-बाना बुनकर एक चटाई बनाते हैं। अब इस चटाई पर दोनों ओर से मिट्टी का पलस्तर करते हैं। इस तरीके को ‘वाटल और डौब’ कहते हैं। यह पद्धति उन इलाकों में बहुत लोकप्रिय है जहां बांस और केन प्रचुर मात्रा में मिलता है। जैसे आसाम, उत्तर-पूर्व के राज्य, बंगाल और अंडमन द्वीप।

 अक्सर फ्रेम और ढांचा छत का भार ढोता है। कभी जब मूसलाधार बारिश होती है या फिर तूफान आता है, तो छत की सुरक्षा के बावजूद पानी के छपाके साधारण मिट्टी की दीवार को गिरा देते हैं। परंतु ‘वाटल और डौब’ में पानी के छपाकों से केवल दीवार पर लिपी मिट्टी धुल जाती है, परंतु बांस का ताना-बाना और ढांचा बरकरार रहता है। इस फ्रेम पर दुबारा मिट्टी लीपी-पोती जा सकती है।

 जब भूकम्प का झटका आता है तो कभी शायद कोई खम्बा टेढ़ा हो जाएगा, परंतु ढांचा नहीं गिरेगा। फ्रेम की थोड़ी सी मरम्मत के बाद घर दुबारा रहने काबिल हो जाएगा।

  वाटल और डौब

  बहुत से स्थानीय तरीकों में मिट्टी से अन्य चीजें आपस में जोड़ी जाती हैं। मिसाल के तौर पर देश के कई इलाकों में छोटे-छोटे पत्थर पाए जाते हैं। परंतु इनसे थोड़ी भी लम्बी और ऊंची दीवार बना पाना संभव नहीं है। इसलिए इन पत्थरों को अक्सर मिट्टी के लौंदों, मिट्टी-ठोक दीवार या धूप में सूखी ईंटों के बीच भर दिया जाता है। कई पहाड़ी इलाकों में जान-बूझ कर मिट्टी की दीवार के आधार में पत्थरों को इस्तेमाल किया जाता है। यह पत्थर बारिश के छपाकों से दीवार की अच्छी सुरक्षा करते हैं।

 कई एक या दो मंजिले मकानों में ईंटों या पत्थरों की जुड़ाई के लिए भी मिट्टी को आराम से प्रयोग में लाया जा सकता है। अक्सर जुड़ाई के लिए चूना, चूना और सीमेंट, या सीमेंट का मसाला इस्तेमाल किया जाता है। परंतु अगर दीवार, बाहर निकली छत या सनशेड से सुरक्षित हो तो ईंटों या पत्थरों के बीच टीप भरने की आवश्यकता नहीं है।

  मिट्टी की दीवार की पत्थरों की नींव

  मिट्टी के मसाले से पकी ईंटों की जुड़ाई

  यह बहुत जरूरी है कि आप अपना मिट्टी का मकान सही स्थान पर बनाएं। कई बार शायद आपके पास चुनने के लिए कोई विकल्प ही न हो। हो सकता है कि आपका प्लाट ही बहुत छोटा हो, और उसके आसपास कई और मकान हों। तब शायद मकान का सड़क की ओर मुंह करने के अलावा आपके पास अन्य कोई चारा ही न हो। पर अगर आप घर बनाने की जगह को चुन सकते हों तो सबसे पहला नियम है कि आपके प्लाट का सबसे ऊंचाई वाला हिस्सा, शायद मिट्टी का घर बनाने के लिए सबसे उपयुक्त जगह हो। अगर आपका प्लाट ढलान पर हो तो ऊपर की ओर नाली जरूरी बनाएं, जिससे बारिश का पानी घर से दूर बह जाए। किसी भी हालत में घर को किसी गड्ढे या निचले इलाके में न बनाएं। अगर आपके जिले में किसी एक दिशा (संभवतः दक्षिण-पश्चिम) से तेज बारिश आती हो तो घर का खाका चौकोर की बजाए आयताकार बनाएं। आयत की छोटी दीवार को बारिश की दिशा में रखें।

 अगर आपके इलाके में बहुत बारिश होती हो और अगर आपका प्लाट बहुत खुला हो तो शायद बाहर से प्लास्तर करना उचित होगा। या फिर मकान को पकी ईंट, पत्थर या लैटराइट से बनाना ठीक होगा। मकान का हरेक हिस्सा मिट्टी से ही बने यह जरूरी नहीं।

  मिट्टी के घर के लिए स्थान चुनना

  मिट्टी के ब्लाक्स को सुखाना

 मिट्टी की सभी चीजों में तब कम दरारें पड़ेंगी जब उन्हें धीरे-धीरे छांव में और न कि धूप में सुखाया जाए। मिट्टी के ब्लाक्स बनाने के बाद उन्हें इस तरह से चुनना चाहिए कि उनके बीच में झरोखे हों जिनमें से हवा बह सके। ब्लाक्स की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें निर्माण स्थल से थोड़ा दूर बनाना चाहिए।

 पहले ब्लाक्स को गीली बोरी या पत्तों या पुआल से ढंक देना चाहिए। एक-दो हफ्ते बाद ऊपर के गीले बोरे, या पत्ते हटाकर ब्लाक्स को किसी पेड़ या बरामदे की छांव में सूखने देना चाहिए। यहां पर उन्हें दो या तीन हफ्ते सूखने दें। पांच या छह हफ्तों के बाद ब्लाक्स को पूरी तरह धूप में सूखने दें।

 कुछ मजदूर ब्लाक्स बनाने के एक हफ्ते बाद ही घर का निर्माण शुरू कर देते हैं। वैसे इसमें कोई खास बुराई नहीं है। पर गीले ब्लाक्स उठाते-रखते समय टूट सकते हैं।

  ब्लाक्स कैसे सुखाए

  मिट्टी के ब्लाक्स को एक या दो हफ्ते के लिए गीले बोरोें, पुआल या पत्तों से ढंक कर रखें उसके बाद दो हफ्तों के लिए छांव में सुखाएं।

  गारा या मसाला

 गारे या मसाले के लिए वही मिट्टी प्रयोग करें जिसके आपने ब्लाक्स बनाए हैं। इस बात का ध्यान रखें कि मसाले में ज्यादा चिकनी मिट्टी न हो, नहीं तो दरारें पड़ सकती हैं। सूखी मिट्टी को छान लें। इससे रोड़ी और छोटे पत्थर छन जाएंगे। छनी मिट्टी से चिकना और अच्छा गारा बनेगा। अगर मिट्टी के ब्लाक्स बनाने में आपने किसी स्टेबिलाइजर का इस्तेमाल किया है तो गारे में भी आपको स्टेबिलाइजर मिलाना पड़ेगा। मिसाल के लिए अगर ब्लाक्स की मिट्टी में आपने 5 प्रतिशत सीमेंट मिलाया है तो गारे में भी आप 10 प्रतिशत सीमेंट (1:10) मिलायें।  गारा या मसाला

  गारा या मसाला मिट्टी को छानकर उसमें से रोड़ी अलग कर दें।  प्लास्तर

 धूप में सूखी ईंटों, मिट्टी के लौंदों या मिट्टी-ठोक कर बनाई दीवार की सतह अक्सर खुरदुरी होती है। इस पर आप मिट्टी, या स्टेबिलाइजर युक्त मिट्टी जैसे गोबर, चूना या सीमेंट से प्लास्तर कर सकते हैं। प्लास्तर अच्छी तरह पकड़े इसके लिए ईंटों के बीच के मसाले को खुरदुरा ही छोड़िए। मशीन में दबाकर बने मिट्टी के ब्लाक्स बाहर से काफी चिकने होते हैं। और उन पर प्लास्तर करना मुश्किल होता है। इन पर या तो दो-तील तह चूने की पुताई कर सकते हैं या फिर छनी मिट्टी, चूने या सीमेंट के मिश्रण का घोल पोत सकते हैं। इसमें हम चाहें तो शौक से कोई रंग भी मिला सकते हैं। अक्सर मशीन से बने ब्लाक्स के ऊपर प्लास्तर करना मुश्किल होता है। अगर तेज बारिश ब्लाक्स की निचली दीवार को नुकसान पहुंचा रही हो तो ब्लाक्स पर मुर्गी के दबड़े वाली जाली कीलों से ठोक दें। इस जाली पर प्लास्तर आराम से टिकेगा और चटकेगा नहीं। इस तरह से प्लास्तर केवल उस दीवार पर करना आवश्यक है जिस पर बारिश की सीधी बौछार पड़ती हो। घर की सभी दीवारों पर इस तरह का प्लास्तर अनावश्यक है।  मशीन से बने ब्लाक्स पर प्लास्तर

 मुश्किल से टिकता है। प्लास्तर टिके, उसके लिए मुर्गी के दबड़े वाली जाली को दीवार के निचले हिस्से में कीलों से लगाएं।

  मिट्टी तो दीमक का प्राकृतिक घर है। इसलिए दीमक वाले इलाकों में बने घरों में खास सावधानी बरतनी पड़ेगी, जिससे दीमक दीवार पर चढ़कर लकड़ी की चौखट न खा जाए।

 1 मकान की नींव या पूरे आधार पर एक इंच मोटी अच्छे मसाले (एक भाग सीमेंट और तीन भाग रेत) की तह बिछाएं। इससे सीलन और दीमक दोनों से बचाव होगा।

 2 इससे भी अच्छा है कि दीवार के चारों ओर पकी ईंटों या पत्थर (या मिट्टी को ठोक कर) का एक ढलान वाला कवच बनाएं। इस पर अच्छे मसाले से प्लास्तर करें। इस तरह बारिश की छींटों से भी दीवार सुरक्षित रहेगी। 3 किसी भी धातु की चादर को पूरी नींव की दीवार पर इस तरह बिछाएं कि वह तीन इंच बाहर को निकले और झुकी रहे। यह जुगाड़ मंहगी अवश्य है परंतु बहुत कारगर है। 4 बाजार में उपलब्ध कीटनाशकों का भी प्रयोग किया जा सकता है।

  दीमक

  धातु की चादर

  दीमक को दीवार में घुसने से रोकता है।

  नींव या आधार

 अक्सर घर की दीवार तो मिट्टी से आसानी से बन जाती है। परंतु नींव या आधार के लिए कोई कठोर और मजबूत मटेरियल चाहिए। अगर पत्थर आसपास मिलता है तो उसका उपयोग किया जा सकता है। बहुत मरतबा बिल्डर लोग गहरी और चौड़ी खाई खोदते हैं। उसमें कंक्रीट भरने के बाद वे नींव या आधार को ऊपर उठाते हैं। उसके बाद बची हुई खाई को दुबारा मिट्टी से पाटते हैं। छोटे सामान्य घरों के लिए यह सब फिजूलखर्ची बेकार की बात है। एक 18-इंच (45-सेमी) चौड़ी पत्थर की दीवार नींव के आधार के लिए पर्याप्त होती है। ऐसी नींव आसानी से दीवार, छत और ऊपरी मंजिलों का भार सह लेगी। खाई को नींव की दीवार जितना चौड़ा ही खोदना चाहिए, जिससे कि बाद में खाई की पटाई की जरूरत ही न पड़े। इस तरह पानी कम रुकेगा और पानी के रिसनपे से ऊपर की मिट्टी की दीवार को कम नुकसान होगा।

   बारिश

  कई मरतबा मिट्टी की नींव भी पर्याप्त हो सकती है। हो सकता है कि ऊपरी सतही मिट्टी मुलायम हो परंतु निचली मिट्टी इतनी कठोर हो कि आराम से एक-मंजिले मिट्टी के मकान के घर का भार संभाल सके।

 इसके लिए पहले तो आप एक सामान्य खाई खोदें, जैसा कि पत्थर या ईंटों की नींव के लिए खोदते हैं। अब खोदी हुई मिट्टी को थोड़े से पानी में गूंथ कर उसे खाई में 6 से 9-इंच की ऊंचाई तक पाट दें। इस गीली मिट्टी को धुरमुस से खूब ठोकें। फिर थोड़ी गीली मिट्टी डालें और दुबारा ठोकें। यह तब तक करें जब तक पूरी खाई भर न जाए। अगर आपके इलाके में बांस (अच्छा और पका बांस) मिलता हो, तो बांस को चीरकर उसकी लम्बी खपच्ची बना लें। खाई में शुरू की 6-इंच मिट्टी भरने और ठोकने के बाद चिरे बांस को बिछाएं। इसे तब तक दोहराएं जब तक खाई भर न जाए।

  मैंने इस पुस्तक के शुरू में ही कहा था कि मिट्टी की दीवारों का सबसे बड़ा दुश्मन पानी और सीलन है। अपनी दीवार को सूखा रखने के लिए आपको कोई इंजीनियर या आर्कीटेक्ट होना जरूरी नहीं है। इसके लिए आपको सिर्फ सामान्य ज्ञान की जरूरत है। आधुनिक, फैशनेबिल, घनाकार घरों के लिए मिट्टी की दीवारें ठीक नहीं हैं। किसी भी दीवार को बारिश या धूप से बचाने का सबसे अच्छा तरीका है कि छत काफी दूरी तक दीवार के बाहर लटके। सपाट छतों की बजाए ढलान वाली छतें ज्यादा अच्छी होती हैं क्योंकि उनमें दीवार का इतना ऊंचा होना जरूरी नहीं है।

  बारिश से बचाव

  छत को दीवारों के बाहर लटका होना चाहिए।

  अगर आपकी छत दीवारों के काफी बाहर तक निकली है और लटकी भी है, तब भी छत से नीचे गिरने वाला पानी समस्या पैदा कर सकता है। पानी के छींटे दीवार के निचले हिस्से को धीरे-धीरे खा जाएंगे।

 इस तरह के ग्रामीण घर पूरे देश में कहीं भी देखे जा सकते हैं। हम को पानी की छीटों से बचाव के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए।

  अगर आप मिट्टी के घर की निचली दीवारों को पानी की छीटों और बौछार से नहीं बचाएंगे, तो धीरे-धीरे दीवार से मिट्टी कट-कट कर बह जाएगी और दीवारें ऐसी दिखने लगेंगी।

  बारिश के गिरते पानी और छींटों से बचाव का एक रास्ता और भी है। गौर से देखें कि बारिश का पानी कहां पड़ता है, और वहीं पर एक नाली खोद दें। अब बारिश का पानी सीधा नाली में गिरेगा और केवल नाली की दीवारों से टकराएगा। उसके बाद पानी नाली में से होकर कहीं दूर बह जाएगा। इस तरह पानी घर के पास नहीं रिसेगा, और घर की नींव गीली और कमजोर नहीं होगी।

  तेज बारिश से सुरक्षा

  घर के चारों ओर पक्की नालियां बनाएं जिसमें पानी सीधा गिरे और दूर बह जाए।

  तेज बारिश के पानी से बचाव का एक और तरीका है। घर के चारों ओर एक ढलुआ दीवारनुमा कवच बनाएं। आप इसे मिट्टी ठोक कर बना सकते हैं या मिट्टी की ईंटों से बना सकते हैं। ढाल के ऊपर पतले और अच्छे मसाले से प्लास्तर करें। इसके लिए साधारण पकी ईंटों या पत्थर का इस्तेमाल करें। परंतु मिट्टी की तुलना में यह तरीका अधिक मंहगा पड़ेगा।

  तेज बारिश से सुरक्षा

  दीवार के नीचे एक ढलान वाला कवच बनाएं।

  रिसती छत

 ऐसी छतें जिनमें से पानी चू-कर गिरता हो, मिट्टी की दीवारों के लिए बहुत खराब है। चू-कर गिरता पानी मिट्टी की दीवारें सोखती हैं और कमजोर हो जाती हैं। अगर कभी आपको दीवार के ऊपर कोई छोटा भी सीलन का चकत्ता दिखे, तो तुरंत आप छत के ऊपर देखें कि वहां कोई कबेलू खिसक या चटक तो नहीं गया है। या छत की फूस चिड़ियों या कीड़ों ने उखाड़ तो नहीं दी है। जिस भी कारण से पानी चू-कर गिरता हो, उसे रोकना जरूरी है। चिमनी के अंदर से भी पानी घर में आ सकता है। इससे अन्य दीवार भीगकर कमजोर हो सकती है। इसलिए चिमनी के ऊपर छत जरूरी है। दूसरी ओर चिमनी जहां छत से मिलती है वहां से भी बारिश का पानी रिसकर अंदर आ सकता है। उससे भी हिफाजत चाहिए।

 छत की दीवारों और मुख्य दीवार के बीच कुछ वाटर-प्रूफिंग यानी पानी से हिफाजत जरूरी है, नहीं तो रिसकर पानी नीचे आएगा और मुख्य दीवार को कमजोर बनाएगा। छत का पानी बह जाने के लिए नाली में जो पाइप लगे होते हैं वो कई बार बहुत छोटे होते हैं। उनमें से बहता पानी कई बार हवा के झोंको से वापिस दीवार से टकराता है। इससे दीवार गीली और कमजोर होती है।

   खिड़की के छज्जे से भी पानी रिसकर दीवार को गीला कर सकता है। इसके लिए जरूरी है कि छत दीवार से थोड़ा बाहर को निकली हो। खिड़की की चौखट को दीवार की बाहरी सतह के समतल लगाएं। खिड़की का ओटा अधिक बाहर को न निकले क्योंकि वहां से पानी रिसने की गुंजाइश है।

 नमी या सीलन दीवार पर नीचे से चढ़ सकती है, जिससे नुकसान हो सकता है। सीलन से बचाने के लिए नीचे कुछ वाटर-प्रूफिंग करना जरूरी है।

 मिट्टी के मकानों में भी गुसलखाने की दीवारों की सुरक्षा ग्लेज्ड टाइल्स या वाटर-प्रूफ सीमेंट से की जा सकती हे। मिट्टी की दीवार की भी इसी तरह सुरक्षा करना जरूरी है। गुसलखाने के फर्श और थोड़ी ऊंचाई तक दीवारों को भी वाटर-प्रूफ बनाना जरूरी है जिससे पानी रिसकर दीवार की नींव को कमजोर न कर सके।

   नींव या आधार

  भूकम्प के क्षेत्र दो तरह के होते हैं। एक तो वो इलाके जहां समय-समय पर भीषण भूकम्प आते हैं, जो एकदम तबाही लाते हैं। इन ऐतिहासिक दुखद घटनाओं में सभी इमारतों को नुकसान पहुंचता है और सभी मकान चाहें वे पक्के हों या कच्चे गिर जाते हैं। दूसरी ओर अन्य इलाकों में - मिसाल के तौर पर दिल्ली (उत्तर-पश्चिम) और अंडमन द्वीप (दक्षिण-पूर्व) भूकम्प के कम-प्रभाव (5 से कम) के क्षेत्र में आते हैं। इन इलाकों में लोगों को मालूम भी नहीं पड़ता कि भूकम्प कब आया और गया। इन हालातों में अक्सर पक्के मकानों को कच्चे मकानों की अपेक्षा ज्यादा नुकसान पहुंचता है। इसका एक कारण यह भी है कि पक्के प्लास्तर वाले मकानों में दरारें एकदम छिंटकती हैं, और उन्हें ठीक कराने के लिए तुरंत राज-मिस्त्री और पेंटर को बुलाना पड़ता है। जबकि मिट्टी के लौंदो या ‘वाटल और डौब’ या मिट्टी-ठोक कर बने घरों में पड़ी दरारों को घर की औरतें थोड़ी सी मिट्टी और गोबर से लीप देती हैं। थोड़ी सी देर में दरार का कोई निशान भी नहीं रहता! ‘वाटल और डौब’ तकनीक भूकम्प वाले इलाकों के लिए शायद मिट्टी के घरों में सबसे श्रेष्ठ है।

 बाढ़ वाले इलाके

 बाढ़ वाले इलाकों में सिर्फ मिट्टी के मकान बनाना मूर्खतापूर्ण होगा। अगर बाढ़ 20 साल में एक बार भी आती है तो इसका मतलब होगा कि बीसवें साल में अवश्य प्रलय आएगी। पश्चिम बंगाल में बाढ़ के समय मिट्टी के घरों से बने गांव के गांव ध्वस्त हुए दिखाई देते हैं। पर जो मकान ‘वाटल और डौब’ तकनीक से बने हैं उनका ढांचा बरकरार रहता है। उनका सिर्फ मिट्टी का प्लास्तर धुल जाता है।

  भूकम्प

  मिट्टी के घर बनाते वक्त एक और बुनियादी समस्या आड़े आएगी। आपका मिट्टी का घर कौन बनाएगा? अगर आपके पास वक्त हो और आपकी रुचि हो तो आप स्वयं ही मिट्टी का घर बना सकते हैं। नहीं तो आपको उन लोगों को खोजना पड़ेगा जो परम्परागत मिट्टी के घर बनाते हैं। यह समस्या ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में शायद इतनी गंभीर न हो, परंतु बड़े शहरों में यह समस्या काफी विकराल रूप धारण कर सकती है। हो सकता है कि शहरी विकास प्राधिकरण आपको मिट्टी में निर्माण की इजाजत ही न दे।

 आपसे कई लोग यह भी कहेंगे कि शहर में मिट्टी कहां से लाओगे, इसलिए शहर में मिट्टी के मकान बनाने का इरादा छोड़ दो। इन लोगों को यह याद दिलाना पड़ेगा कि शहर में सीमेंट, पक्की ईंट और स्टील भी नहीं बनता है। अगर आप यह सब सामान बाहर से ला सकते हैं तो निश्चित ही मिट्टी भी ला सकते हैं।

 अब देश में ऐसी कई संस्थाएं हैं, जिनमें नौजवान और उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। इन लोगों को निर्माण की तकनीकों की कुछ वास्तविक जानकारी भी है। यह लोग करोड़ों बेघर लोगों को घर उपलब्ध कराने की नियत से वैकल्पिक तकनीकों को खोज रहे हैं। इस पुस्तक के प्रकाशक - ‘कास्टफोर्ड’ या नई दिल्ली में ‘हुडको’ या ‘कपार्ट’ आपको उन संस्थाओं के सम्पर्क सूत्र बता देंगे जो मिट्टी के घर बनाने में आपकी मदद कर सकते हैं।

  कौन बनाएगा आपके लिए मिट्टी का घर?

  मिट्टी की एक बेहद खूबसूरत और अच्छी बात यह है कि अलग-अलग मिट्टियों में बहुत विविध ता है, और हरेक मिट्टी का अपनर कोई खास गुण है।

 सारी मिट्टी भगवान की देन है। और न कि मशीन निर्मित जिस पर क्वालिटी का मानक ठप्पा लगाया जा सके। मिट्टी का भंडार भी अपारए अपरम्पार है। इसलिए कई विशेषज्ञों को, खासकर इंजीनियरों को मिट्टी से प्यार तो दूर, बेहद बौखलाहट है। इसका कारण है कि हरेक को अपनी मिट्टी की पूरी जानकारी होनी चाहिए और उन्हें मिट्टी को इस्तेमाल करना आना चाहिए। हरेक महिला की आंखें सुंदर और बाल आकर्षक होते हैं। हरेक महिला के होंठ खूबसूरत होते हैं। पर आदर्श आदमी की हैसियत से आपको अपनी विशिष्ट महिला के साथ प्यार, मुहब्बत और समझदारी के साथ रहना सीखना होगा।

 मिट्टी के साथ अगर आप अपनी बीबी जैसा बर्ताव करेंगे तो आपके पास सारी जिंदगी के लिए एक खूबसूरत घर होगा।
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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

 

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