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महान फि़लिस्तीनी कवि महमूद दरवेश से एक साक्षात्कार

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अपने ढंग का अनूठा, यह साक्षात्कार कई बरस पहले, 1986 में, टेलीविज़न के लिए रिकॉर्ड किया गया था। कुछ तकनीकी कारणों से इसे प्रसारित नहीं किया जा सका। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता फ़राज चौधन ने, इस साक्षात्कार के लिए, कवि महमूद दरवेश की कविताओं के अंशों को, शीर्षकों को और उनके लेख इत्यादि को अपने प्रश्नों का आधार बनाया। कवि दरवेश के लिए इन पर टिप्पणी, सफाई और विश्लेषण एक चुनौती बन गया। यह उनकी रचना और ज़िन्दगी पर एक सम्पूर्ण दस्तावेज़ है। मैं आया हूँएक दूर दराज के, भुला दिए गए गाँव सेबिना नाम की गलियों वाले गाँव सेजहाँ के आदमी काम करते हैंखेतों में, खदानों मेंयह बिल्कुल सच है। मैं एक ऐसे गाँव से ताअल्लुक़ रखता हूँ जो बहुत छोटा है, दूर के एक इलाक़े में बसा हुआ। इसकी गलियों के कोई नाम नहीं हैं। सच तो यह है कि, गाँव का भी कोई नाम नहीं है। यह गैलीली के आसपास है। यहाँ केबाशिन्दे, खेत-खलिहान और खदानों में काम करते हैं। यह कविता ग़ौर करोः मैं एक अरब हूँकोई पच्चीस बरस पहले, 1961 में, लिखी गई थी। मैं इस्रायल के गृह-विभाग में अपने परिचय-पत्र के लिए दरख़्वास्त देने गया था। जब उन्होंने पूछा कि मैं कहाँ से आया…

फ़िलिस्तीनी कविताएँ

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निवेदनफिलिस्तीन एक ऐसे देश का नाम है जिसकी जनता अपने ठौर-ठिकाने के लिये संघर्ष करती रही और कुछ राजनैतिक खेल ऐसे रहे कि फिलिस्तीन को अपने ठौर-ठिकाने से वंचित होना पड़ा। फिलिस्तीनी जनता और यासेर अराफात एक ऐसे पर्याय हैं जिन्होंने देश के लिये कुर्बानियाँ दीं। गाजा पट्टी एक ऐसा मुकाम है जो फिलिस्तीनियों के हक़ से बाहर है और इसी की लड़ाई जनता अपने लिये कर रही है। इजराइल ने अपनी राजनैतिक खेल से फिलिस्तीन को हमेशा शिकस्त दी लेकिन फिलिस्तीन की जनता का हौसला है कि वह निराश हताश नहीं हुई और सतत् अपने वतन के लिये जंग करती रही। प्रस्तुत कविताएं मातृभूमि की रक्षा और जनता के उत्पीड़न के विरोध का आईना हैं। फिलिस्तीनी भाषा के समस्त कवियों ने जो भी रचा वह संघर्ष की गाथा ही रही है। श्री ज्ञानरंजन ने हमें यह सामग्री उपलब्ध कराई जिनके हम हृदय से आभारी हैं। -बृजनारायण शर्मा फि़लिस्तीनी कविताएँ : सृजनशीलता का आह्वानफि़लिस्तीनी साहित्य अपनी समग्रता में तथा साथ ही अपने अरबी और मानव-मात्र दोनों आयामों में व्याप्त सुन्दरतम् रचनाओं के कारण आज एक गौरवशाली शीर्ष पर पहुँचने की दहलीज पर है। यह केवल एक भविष्यवाणी न…

दुम न हिलाएं दूसरों के दम पर

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डॉ. दीपक आचार्यज्यादातर लोगों में आजकल अपना कुछ भी दम-खम नहीं रहा। वे औरों के बलबूते ही अपने आपको जैसे-तैसे जिन्दा रखे हुए हैं। इंसान के लिए सर्वाधिक शर्मनाक बात इससे अधिक और क्या होगी कि वह औरों के सहारे पर जिन्दा होने का भ्रम पाले हुए रहता है। हमारे पूर्वजों ने जिस शौर्य-पराक्रम और सेवा-परोपकार के कर्मों के सहारे अपने वजूद को दिग-दिगन्त तक फैलाया था, उन्हीं के हम कैसे वंशज हैं जो अपनी रगों में बह रहे उस खून को भी भूल गए हैं जो वैश्विक माहौल को अपने इशारे से नचा सकने में समर्थ था और जिसने सदियों का इतिहास रचा है। पता नहीं लोग अपने आपको क्यों भुलाते जा रहे हैं। बहुत से लोग हैं जो समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों, भटक रहे हों या कहीं काम कर रहे हों, पार्क में घूम रहे हों या किसी धर्म स्थल में, अथवा सड़कों पर ही दौड़ क्यों न लगा रहे हों। दिन और रात इन लोगों के तार उन लोगों से अदृश्य रूप से बंधे होते हैं जिनके वे कहे जाते हैं अथवा ये लोग जिनको अपना मानते हैं। यानि की खुद कुछ भी नहीं हैं, औरों के ही कहे जाते हैं। खूब सारे लोगों के बारे में आमतौर पर कहा ही जाता है कि ये उनके बूते नाच…

‘नेट न्यूट्रीलिटी’ का अनसुलझा सवाल

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-मनोज कुमार संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने अपने पंजे फैलाना आरंभ कर दिया और अपनी मनमर्जी से इंटरनेट यूजर्स के लिए दरें तय कर दी। भारत में चूंकि इस तरह का कोई कानून नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार की सख्ती से अभी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। समाज का एक बड़ा वर्ग ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ अर्थात नेट-निरपेक्षता का पक्षधर है अत: बाजार का फिलहाल कब्जा नहीं हो पाया है लेकिन उसने अपने नथुने दिखाना शुरू कर दिया है। ं ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ देश के बहुसंख्यक लोगों के लिए यह शब्द एकदम नया,अबूझ और कुछ विदेशी रंग लिए हुए है।यह मसला पूरी तरह से इंटरनेट की आजादी और बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता पूर्वक इंटरनेट का इस्तेमाल करने देने का मामला है। सामान्य भाषा में कहें तो कोई भी दूरसंचार कम्पनी या सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं कर स…

वीणा सिन्हा की कविताएँ

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वीणा सिन्हा की कविताएँवीणा सिन्हा की इन कविताओं से गुज़रें तो प्रतीत होता है कि वीणा आज की नारी की पीड़ा, उसके दुःख-दर्द-दैन्य और प्रेम-वात्सल्य को इतनी गहरी द्वन्द्वात्मकता के साथ प्रस्तुत करती हैं कि आज के बहाने स्त्री का ऐतिहासिक क्रम-रूप प्रस्तुत हो जाता है, युगों से चली आ रही समाज व्यवस्था में स्त्री की पीड़ा प्रकट हो जाती है। आज जन्म से पूर्व भ्रूण रूप में या जन्म के बाद बालिकाओं के साथ जो बर्ताव है- वीणा ने गहरे अवसाद के साथ, एक चिकित्सक के मानवीय सरोकार के चलते उसकी अभिव्यक्ति की है जिसमें क्रूर स्थितियों के दबाव में असहाय आम आदमी की लाचारगी प्रकट होती है। कविताएँ सीधी सरल हैं- यही इनका शिल्प भी है जिसमें किसी अतिरिक्त शिल्प की निर्मिति का सर्वथा लोप है। आज जिस तरह स्त्री लेखन के नाम पर जो इकहरा जीवन प्रस्तुत किया जा रहा है-वीणा सिन्हा की कविताएँ उनके बरक्स स्त्री की निगाह से लिखी रचनाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं जिनमें न किसी छद्म वैचारिकता का आग्रह है और न किसी ठस वाद का आतंक। है तो सिर्फ़ सीधा सच्चा जीवन जिसमें विचार की यात्रा प्रारंभ होती है।
वीणा सिन्हा चिकित्सक हैं। जय प्र…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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