रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

June 2015
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

अपने ढंग का अनूठा, यह साक्षात्कार कई बरस पहले, 1986 में, टेलीविज़न के लिए रिकॉर्ड किया गया था। कुछ तकनीकी कारणों से इसे प्रसारित नहीं किया जा सका। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता फ़राज चौधन ने, इस साक्षात्कार के लिए, कवि महमूद दरवेश की कविताओं के अंशों को, शीर्षकों को और उनके लेख इत्यादि को अपने प्रश्नों का आधार बनाया। कवि दरवेश के लिए इन पर टिप्पणी, सफाई और विश्लेषण एक चुनौती बन गया। यह उनकी रचना और ज़िन्दगी पर एक सम्पूर्ण दस्तावेज़ है।

 

मैं आया हूँ

एक दूर दराज के, भुला दिए गए गाँव से

बिना नाम की गलियों वाले गाँव से

जहाँ के आदमी काम करते हैं

खेतों में, खदानों में

यह बिल्कुल सच है। मैं एक ऐसे गाँव से ताअल्लुक़ रखता हूँ जो बहुत छोटा है, दूर के एक इलाक़े में बसा हुआ। इसकी गलियों के कोई नाम नहीं हैं। सच तो यह है कि, गाँव का भी कोई नाम नहीं है। यह गैलीली के आसपास है। यहाँ केबाशिन्दे, खेत-खलिहान और खदानों में काम करते हैं। यह कविता ग़ौर करोः मैं एक अरब हूँ कोई पच्चीस बरस पहले, 1961 में, लिखी गई थी। मैं इस्रायल के गृह-विभाग में अपने परिचय-पत्र के लिए दरख़्वास्त देने गया था। जब उन्होंने पूछा कि मैं कहाँ से आया हूँ, तो मैंने यही जवाब दिया।

मेरे दादा रहे एक किसान

किसी सम्बोधन, किसी समृद्धि से अनजान

सिखाया मुझे गर्व से माथा ऊँचा करना

पढ़ने-लिखने से भी पहले

मैं किसान परिवार से आया। हमारी रोटी-रोजी ज़मीन पर निर्भर थी। हमारा वजूद और इज़्ज़त इसी से थी। यह भी सही है कि कुरान शरीफ ही हमारी अकेली किताब थी। पर हमारे दादा ने, अपने चलते, हमारे दिलों में इज़्ज़त और गर्व करने का अहसास कूट-कूट कर भर दिया था।

हमारे पुरखों के अंगूर के बाग़,

जोतते रहे जो ज़मीन वे ता-उम्र,

चुरा ली गईं वे सबकी सब

ये लाइनें उसी कविता का हिस्सा हैं। इस बात की ताईद करती हैं कि हमारी ज़मीन, जिससे हमारा वजूद है, हड़प ली गई हैं।

मेरे दादा रहे एक किसान

मेरे दादा ज़मीन के मालिक रहे, ज़मीन उनकी धरोहर रही या यूँ कहूँ कि वे ख़ुद एक ज़मीन थे। मेरे दिल में उनके लिए हमेशा एक ख़ास जगह रही। वे भी मुझे ज़्यादा चाहते थे। उन्होंने ही मेरी पढ़ाई-लिखाई का ज़िम्मा लिया। कहना मुश्किल है कि ज़मीन से उनका कितना लगाव था। वह ज़मीन का ही एक हिस्सा थे। उन्होंने अपनी ज़मीन को अपने जिस्म का एक हिस्सा माना। हमेशा ज़मीन को किसी लबादे की तरह अपने ऊपर डाले रहे। जब उनकी ज़मीन हथिया ली गई और उसके चारों और काँटेदार बाड़ लगा दी गई, तब दादा बाड़ पकड़ कर खड़े रहे। यह सदमा उनकेलिए बहुत बड़ा था। वह बर्दाश्त न कर पाये। वे वहीं पर गिर गए और उसी वक़्त उनका दम निकल गया।

अगर मरना पड़े फाकों से

फिर भी, नहीं कर पाएगा मजबूर कोई भी

ज़मीन बेचने के लिए मुझे

वाक़ई ऐसा ही हुआ। उन्होंने (इस्रायलियों ने) ज़मीन खरीदने की पेशकश की। पर अपनी आत्मा यानी ज़मीन को बेचने के बजाय भिखमंगों की तरह भूखों मरना ज़्यादा पसन्द करते। ग़ौर तलब है, ज़मीन ही उनका दिल, उनकी आत्मा थी। यह बात हर फि़लिस्तीनी पर लागू होती है। यह ज़मीन सिफर्‍ मिट्टी नहीं, हमारी पहचान है। यह ज़मीन हमारी सोच और हमारे हौसले से जुड़ी है। कोई ताअज़्जुब नहीं कि यह बात पूरे फि़लिस्तीनी साहित्य का आधार है और यही बात झगड़े की जड़ में है। मेरी कविता, जिसका ज़िक्र मैंने पहले किया, ग़ौर करोः मैं अरब हूँ, का एक दिलचस्प वाक़या है। जैसा कि मैंने बताया था, मैं अपने परिचय-पत्र के लिए दरख़्वास्त देने गया था। क्लर्क ने, जो एक जिओनिस्ट था, फार्म भरा। क़द, बालों का रंग, चेहरे की ख़ास पहचान वगैरह। जब राष्ट्रीयता वाला कॉलम आया तो मैंने कहा कि ‘‘मैं अरब हूँ।’’ क्लर्क सकते में आ गया। उसने अपनीबात दोहरायी-इस बार उसने हब्रू भाषा में पूछा। मैंने बेझिझक कहा, ‘‘हाँ यह ठीक है, लिख दीजिए मैं एक अरब हूँ।’’ लौटते वक़्त इस वाक़ये की तरफ बार-बार मेरा ध्यान जाता रहा। उस वक़्त मुझे इसका कोई क़यास नहीं था कि यह बात आगे चलकर एक चुनौती और कविता की शक़्ल अख़्तियार कर लेगी।

नाज़रेथ में एक बार एक मुशायरे में कुछ कविताएँ पढ़ीं और आखीर में ग़ौर करोः मैं एक अरब हूँ पढ़ी। एक नज़्म की तरह से नहीं बल्कि एक विरोध प्रकट करने वाले मंत्र की तरह से। जनता ने इसे कई बार सुना। बस तब से, जब भी, जहाँ भी मैं जाता हूँ जनता इसे बार-बार सुनना चाहती है। गोकि इस कविता को मैं एक सामूहिक मत की अभिव्यक्ति मानता हूँ, बजाय अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के। हालाँकि, इस अभिव्यक्ति के सीमित दायरे की वजह से मैं इस कविता के बार-बार पाठ करने के आग्रह से बचने की पुरजोर कोशिश करता हूँ। पर, चूँकि इस बात ने लोगों के दिमाग़ में इस क़दर घर कर लिया है कि मुझे नाकामयाबी ही मिलती है। यह कविता लोगों की जाग़ीर बन गई इसलिए उनकी ज़िद के आगे मुझे झुकना ही पड़ता है।

मैंने पहली बार कविताएँ अपने प्राइमरी स्कूल में पढ़ी थीं।

क्या मैंने वाक़ई ऐसा कहा था? सच तो यह है कि मैं बचपन से ही कविताएँ लिखने लगा था। शायद मेरा मतलब यह रहा हो। पर यह अब बिल्कुल याद नहीं है कि मैं उन्हें कहाँ पढ़ता था।

यह बात आपनेएक आम ग़म की डायरीमें वही है। मिलीटरी गवर्नर के स्वागत समारोह वाले मौक़े पर।

हाँ, ख़ूब यादि दिलाया आपने। मैं प्राइमरी स्कूल में था, वहाँ ‘इस्रायल राज्य’ समारोह मानने की तैयारियाँ हो रही थीं। मिलिटरी गवर्नर को बुलाया गया था। यह बात क़ाबिले ग़ौर है कि यह समारोह मिलिटरी शासन के हुक़्त के तहत ही हो रहा है। मुझसे कविता पढ़ने के लिए कहा गया। मैंने वह कविता पढ़ी जिसमें फि़लिस्तीनी मक़सद और इस्रायली दमन का ज़िक्र था। मैंने पहली बार दबाव महसूस किया। यह आगे आने वाली धमकियों की शुरूआत थी। मुझे ख़ामोशी और कविता के बीच चुनाव करना था। यक़ीनन मैंने दूसरी चीज़ चुनी। वह भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ। बस उसी वक़्त से ख़ामोशी और शांति से किनारा हो गया। मेरे लिए कविता कोई खिलवाड़ नहीं, बल्कि एक महँगा और ख़तरनाक़ जुआ।

क्या यह सही नहीं है कि आपकी कविताओं की वजह से आपके वालिद पर मुसीबतें आयीं। यहाँ तक कि उनकी रोजी भी ख़तरे में पड़ गई?

मैंने जब कविता से दिल लगाया, तब मुझे आने वाले ख़तरों का अहसास था। सिर्फ़ राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा तो वह ख़तरा जो मेरी कविता के प्रति पूर्ण समर्पण से मेरे पूरे भविष्य, अनुभव को प्रभावित करने वाला था। मैं यह तो नहीं कह सकता किमैं इन सबसे उबर कर बहुत ऊँचे पहुँच गया हूँ पर इसकी तसल्ली ज़रूर है कि मैं जुटा हुआ हूँ, अपनी ज़िन्दगी की इस यात्रा में मैं आगे बढ़ते सबके साथ हूँ।

इस्रायली समाजएक ऐसा प्रेतग्रस्तघोड़ा है जो आँख पर पट्टी बाँधे कूदता है और समझता है कि उसे कोई काबू नहीं कर पाएगा। आपका क्या ख़याल है?

बिल्कुल दुरुस्त फरमाया आपने। इस्रायल की सोच एकतरफ़ा है। जिओनिस्ट हौसलों को, उनकी सारी ताक़तों को सिफर्‍ एक ताक़तवर मिलिटरी जामा पहना दिया गया है। यक़ीनन वे ताक़तवर हैं और इस वक़्त मैं इस बहस में कत्तई न पड़ना चाहूँगा कि वे ताक़तवर कैसे बने। हमारा घर चुराने के 38 सालों के बाद भी यहूदी ख़ुश नहीं हैं। दुनियाँ को शक़ की निगाह से देखते हैं। बल्कि वे अपनी इस्रायली पहचान से ीाी बहुत इत्मीनान नहीं रखते। टैंक और बख़्तरबंद गाड़ियों से कभी भी रूहानी या तहज़ीब की कोई समस्या नहीं सुलझी। वे ऐसी लड़ाई में मुब्तिला हैं जिसे वे किसी हालत में बजा करार नहीं दे पा रहे हैं। किसी दूसरे को नेस्तनाबूद कर देने के अकेले इरादे के बल पर कोई कब तक ख़ुद ज़िन्दा रह सकता है? उनकी जीत किसी खास वजह से हुई। वे वजहें बदल भी सकती हैं। फिर क्या होगा? ऐसी सड़क छाप सोच कभी भी जीत में तब्दील नहीं हो सकती। उनके इरादे सफल नहीं होंगे पर इसके लिए अरब लोगों को हालात अपनी तरफ़ करने होंगे।

फि़लिस्तीनी जन्म और मृत्यु

फि़लिस्तीनी आवाज़ें

यह मेरी कविता फि़लिस्तीनी मुहब्बत में हैं जिसे मैंने 1964 में लिखा था। यह कविता इसलिये महत्त्वपूर्ण है कि इसमें पहली बार ‘फि़लिस्तीनी’ शब्द का प्रयोग इतनी शिद्दत के साथ किया जो इस्रायली चंगुल में है। यह शब्द हमारे व्यक्तित्व, हमारे वजूद को दर्शाता है। मेरा अपना ख़याल है कि यह कविता हमारे कभी न मरने वाले व्यक्तित्व और वजूद को वख़ूबी पेश करती है।

क्या नहीं थे हम, जून के पहले,

छोटे-छोटे कबूतरों की तरह

नहीं कम हो पायी थी हमारी मुहब्बत

ज़ंज़ीरों के वज़न से

जून 1967 में लगा घाव, वाक़ई हम अरबों के दिल में इतने गहरे लगा है कि इसे भरने में काफ़ी वक़्त लगेगा। लगता है जैसे हमें झाँसा देकर, किसी ख़ूबसूरत सपने का लालच दिखा कर, नींद में सुला दिया गया हो। जब जागे तो सब कुछ चूर-चूर था। मैं वह रात कभी नहीं भूल सकता। मैं हैफ़ा में था। मेरे यहूदी पड़ोसी दरख़्वास्त कर रहे थे कि हम अरबों से उनकी हिफाज़त करें। दूसरे दिन पाँसा पलट गया। वे जीते, हम हारे। इसीलिये मैं 1967 की हार को उतना ही बड़ा हादसा मानता हूँ जितना कि 1948 वाले हादसे को।

मैंने सीख लिये हैं तमाम शब्द

मैंने कर लिये हैं उनके हिज्जे

मैंने झींट दिये शब्द

फिर से बना लिया सिफर्एक शब्द ‘‘अपना वतन’’ (Home Land)

अगर मेरी कविताओं को ध्यान से परखा जाये तो उसमें एक ही कशिश देखने को मिलेगी और वह है शब्दीं से अपने लिये अपना घर, अपना वतन बनाने की ख्वाहिश। यही मेरी कमज़ोरी भी है और ताक़त भी। मैं चीज़ों को इस रूप से नहीं देखना चाहता था, खैर। मैं उन शब्दों के जाल से बेशक़ निकल सकता हूँ जहाँ कोई नैतिक मूल्य न हों। अक़्सर मैंने शब्दों से एक आध्यात्मिक घर (वतन) बनाना चाहा है ख़ुद के लिये, अपने हमवतनों के लिये। सिर्फ शब्दों से। कविता द्वारा सच्चाई की एक नई शक़्ल उभरती है।

अपना घरया अपना वतनवाक़ई क्या है? किसी और ने इस बात को इतनी गहराई से नहीं उठाया जितना कि आपने।

‘अपने घर’ की बात जब मैं करता हूँ तो मेरा मतलब बिल्कुल सीधा और साफ़ है। यह वह जगह है, जहाँ आदमी पैदा होता है और रहता है। लेकिन हमारे मामले में, यह सीधी और साफ़ सी बात बहुत बहादुरी की दरकार रखती है। तमाम क़त्लेआम जो एक के बाद एक हो रहे हैं उनसे मुक़ाबिला करने की भी बात उठती है। दरअस्ल, हमारे लिये इस सीधी और साफ़ बात तक पहुँचने का मतलब है आग से गुज़रना। कुछ मामलों में, या वतन का मतलब सिर्फर्‍ ज़मीन से नहीं होता। हमारे लिये इसका मतलब सारी रूहानी ताक़त को लगाना है ताकि हम नेस्तनाबूद होने से बच सकें। अपनी पहचान, अपना इतिहास बरक़रार रख सकें। और तब, ‘होमलैण्ड’ का मतलब सिर्फर्‍ ‘ज़मीन’ से ज़्यादा बड़ा हो जाता है। इसका सीधा मतलब ‘आज़ादी’ से है। हम फि़लिस्तीनीयों के लिये, चाहे जहाँ, जैसे भी रह रहे हों, हमारे ज़िन्दा रहने के हक़ से जुड़ जाता है। ज़िन्दा रहने का यह हक़, एक इन्सान की तरह, हमें ‘अपने वतन’ की तरफ आगे बढ़ाता है। ‘अपने वतन’ का अर्थ काफी सीधा सादा हो सकता है पर उस मंज़िल तक पहुँचने के लिये हमें यक़ीनन इम्तिहान से गुज़रना होगा।

हर मुल्क एक आईना है/आईने पत्थर होते हैं/आख़िर हम इस मुश्किल राह पर क्यों चलें?

यह लाइनें ‘होमलैण्ड’ के साधारण अर्थ से बहुत गहराई में जाती हैं। वहाँ तक जहाँ से आईने में अक़्त दिखना बंद हो जाता है। बिना ‘अपने वतन’ के आईने के हम साधारण आईने में अपनी शक़्ल, अपनी आत्मा और अपनी पहचान कभी नहीं देख सकते। दरअस्ल, इस लम्बी जद्दोजहद का मतलब ही ‘अपने वतन’ रूपी आईने को हासिल करना है। अपने इस हाल में हम न तो अपना वजूद साबित कर सकते हैं और न ही औरों के साथ रिश्ते क़ायम कर सकते हैं। या तो हम ‘अपना घर’ बनायें या अपने अंदर ही एक ‘घर’ की तलाश करें।

कहा मेरे अब्बा ने एक दिन

जिसका कोई घर नहीं है इस ज़मीन पर

क़ब्र उसकी होगी भला कहाँ

फि़लिस्तीनी ज़िन्दगी का यह एक बड़ा विरोधाभास है। यह हमारी लम्बी लड़ाई में बार-बार सामने आता है। हमारे सामने हमारा अपना कहने को कोई घर तो है ही नहीं बल्कि दफ़नाने के लिए दो गज ज़मीन के एक टुकड़े को हम अपना क़ब्रिस्तान कह सकें? यह बताता है कि हमारे वजूद की जद्दो ज़हद की क्या सीमा है।

बेरुत है हमारी आँख का तारा

पर मुर्दनी है इसकी सीमाओं पर

दिल पर छा गया है यह

दुनिया में डूबते हुए एक

मृगतृष्ण, एक छलावा जैसा

बेरुत एक कोशिश थी आज़ादी और जम्हूरियत (प्रजातंत्र) की तरफ़। अफ़सोस, कुछ हाथ न लगा। सब कुछ डूब गया। समस्या का अंदाज़ लगाना मुश्किल है।

लिखते हैं हम बेरुत से तुम्हें

सिफर्यह पूछने के लिए

किसने जकड़ रक्खा है किसे?

यह लाइनें मैंने प्रसि( कवि मोईने बिसोसे के साथ लिखीं थीं। यह कविता एक ख़त की शक़्ल में है जो एक इस्रायली सैनिक को और तमाम उन लोगों को सम्बोधित है जिन्होंने बेरुत पर हमला किया। इसमें, उस सैनिक के सामने, उसकी ज़िन्दगी के विरोधाभास को सामने रखने की कोशिश की है। वह एक टैंक में पैदा हुआ, वहीं पढ़ा, वहीं बढ़ा, वहीं शादी हुई और वहीं मरता है। उससे ज़्यादा तो हम ही अपने को आज़ाद कह सकते हैं। कम-से-कम हम एक आस में तो जी रहे हैं। हमारे सामने हमारा एक इतिहास, एक तहज़ीब है। उस बेचारे के पास तो न कोई कल था, न कोई आज है और न कोई कल होगा। उसके पास सिर्फर्‍ एक लोहे की बख़्त बंद गाड़ी है। इस क़ैद के आगे हमें अपनी मंज़िल बहुत बड़ी मालूम होती है।

साबरा का रास्ता।

जाता है मुर्दा जिस्मों के ऊपर से

साबरा हमारे दौर, हमारे वक़्त का

सबसे बड़ा मक़सद है

साबरा हमारे वक़्त के सबसे बड़े क़त्लेआम का नाम है। यह नाम ख़ून का दूसरा नाम बन गया है। साबरा महज़ एक इत्तिफाक़ नहीं था या गलती से इस्रायल और उसके अरबी पिट्ठुओं द्वारा किया गया कोई छोटे-मोटा हादसा था। करके ज़िस्मानी तौर पर भी नेस्तानाबूद करने की एक गहरी साजिश। सबसे ख़ौफ़नाक़ है कि जब जब ऐसे हादसे होते हैं मीडिया इसे इतिहास का छोटा-मोटा हादसा मानकर इसे नज़रअंदाज करने की कोशिश करता है। पर किसी यहूदी के साथ कुछ भी होने पर हायतौबा मचा देते हैं। फि़लिस्तीनीयों द्वारा जितना बर्दाश्त किया गया है साबरा उस लम्बी फेहरिस्त में सिफर्‍ एक नाम है। अंतर्राष्ट्रीय मत, ज़्यादातर ऐसे अक़्सर होने वाले क़त्लेआम पर ख़ामोशी अख़्तियार करना बेहतर समझता है। मेरा अपना मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय समझ जब तक कि फि़लिस्तीनीयों को पूरी आज़ादी और उनको एक मुल्क़ नहीं देते, उनकी ‘बुरा मत देखो-बुरामत सुनो’ की नीति को जानबूझ से ऊपर, जानबूझकर नासमझ बने रहने की कोशिश और सोचे-समझे क़त्लेआम की भी ख़ामोश सहमति माना जाना चाहिये। इसे नासमझी से ऊपर, जानबूझकर नासमझ बने रहने की कोशिश और सोचे-समझे क़त्लेआम की भी ख़ामोश सहमति माना जाना चाहिये। मीडिया का भी फर्ज़ बनता है कि वह ऐसा माहौल अपनी ताक़त से पैदा करे जहाँ हर किसी को अपने मुल्क़ में, अपने घर में रहने का बुनियादी हक़ हासिल हो सके।

मैं फिर रहा हूँ मारा मारा

दरबदर

--

image

निवेदन

फिलिस्तीन एक ऐसे देश का नाम है जिसकी जनता अपने ठौर-ठिकाने के लिये संघर्ष करती रही और कुछ राजनैतिक खेल ऐसे रहे कि फिलिस्तीन को अपने ठौर-ठिकाने से वंचित होना पड़ा। फिलिस्तीनी जनता और यासेर अराफात एक ऐसे पर्याय हैं जिन्होंने देश के लिये कुर्बानियाँ दीं। गाजा पट्टी एक ऐसा मुकाम है जो फिलिस्तीनियों के हक़ से बाहर है और इसी की लड़ाई जनता अपने लिये कर रही है। इजराइल ने अपनी राजनैतिक खेल से फिलिस्तीन को हमेशा शिकस्त दी लेकिन फिलिस्तीन की जनता का हौसला है कि वह निराश हताश नहीं हुई और सतत् अपने वतन के लिये जंग करती रही।

प्रस्तुत कविताएं मातृभूमि की रक्षा और जनता के उत्पीड़न के विरोध का आईना हैं। फिलिस्तीनी भाषा के समस्त कवियों ने जो भी रचा वह संघर्ष की गाथा ही रही है।

श्री ज्ञानरंजन ने हमें यह सामग्री उपलब्ध कराई जिनके हम हृदय से आभारी हैं।

-बृजनारायण शर्मा

फि़लिस्तीनी कविताएँ : सृजनशीलता का आह्वान

फि़लिस्तीनी साहित्य अपनी समग्रता में तथा साथ ही अपने अरबी और मानव-मात्र दोनों आयामों में व्याप्त सुन्दरतम् रचनाओं के कारण आज एक गौरवशाली शीर्ष पर पहुँचने की दहलीज पर है।

यह केवल एक भविष्यवाणी नहीं, अपितु एक ठोस अभिकथन है, क्योंकि फि़लिस्तीन की त्रासदी सभी पुराणैतिहासिक त्रासदियों से कहीं दूर और उससे भी आगे हमारी असम्भाव्यतम कल्पनाओं से बहुत दूर तक जाती है। एक कारण जो इस प्रकार के दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है, वह हृदय विदारक अनुभव है, जिसे फि़लिस्तीनियों ने अपने निजी भूमि से बाहर निकाल फेंकने के सभी प्रयत्नों के विरोध में झेला और जिया है। इस अनुभव ने फि़लिस्तीनियों को अपने दैनंदिन अस्तित्व के बहुमुखी ख़तरों ;पीड़ा, ख़ून-खराबा, दुःख, तनाव और स्वाभिमान सभी को सहने हेतु आवश्यक योगयता और सामर्थ्य से सज्जित कर दिया है।

इस सत्य के बावजूद कि अरबी और विशेषतः फि़लिस्तीनी साहित्य ने फि़लिस्तीन की उस त्रासदी के वास्तविक तत्त्व को जो विगत चालीस वर्षों में लगातार गहराती चली गयी है, कभी सचमुच प्रतिबिम्बित नहीं किया है, तथापि इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि आज फि़लिस्तीनी-अरबी साहित्य ऐसी समृद्ध, बहुमुखी, बहुविध और समग्र सम्भावनाओं के द्वार पर खड़ा है जहाँ से वह अपने गौरव की ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है। वास्तव में साहित्य अभिव्यक्ति/लेखन को तभी सशक्त/उन्नतर बनाया जा सकता है, जब उसके निर्माताओं का जीवन स्वयं उन अनुभवों से भरा हो, जो जितने विविध होते हैं, उतने ही परस्पर विरोधी भी, तथा जब तेजी से चलने वाला घटनाक्रम एक ओर तनाव की धार देता है दूसरी ओर साहित्यिक सृजनशीलता को उसकी सबसे गंभीर व ईमानदार अभिव्यक्ति की ओर से जाता है।

साहित्य भी मनुष्य में गहनतम छिपी हुई संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का एक मार्ग है। जब भी कोई मानवीय अनुभव की किसी सच्चाई को निष्पक्ष रूप से उद्घाटित करता है, तथा भावनाओं एवं संवेदनाओं के संघर्ष को प्रकाश में सामने लाता है, एक नया कलात्मक सृजन जन्म लेता है, जो ज़िन्दगी जितना ही विशाल होती है, और इसी कारण साहित्यिक अभिव्यक्ति के योग्य होती है। परन्तु साहित्यिक कृतियाँ आवश्यक रूप से घटनाओं को उनके वास्तविक देश और काल में प्रतिबिम्बित नहीं करतीं। एक लेखक सामान्यतया, विगत पर चिन्तन के द्वारा, जबकि कोई खतरा उसके मानस और हृदय में स्थायी रूप से लिख गया होता है, यह कार्य सम्पादित करता है। कोई घटना किसी एक प्रतिक्रिया को नहीं बल्कि प्रतिक्रियाओं की एक पूरी शृंखला को उद्वेलित करती है, जिनमें से अधिकांश एक लेखक की आत्मा पर स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं।

आत्मा के अन्तस्तत्व तथा चेतना की धारा के साथ इन डुबकियों और संघर्षों आमना-सामना में होकर ही साहित्य अपने शिखर को प्राप्त करता है और समय किसी चमत्कारिक उत्कर्ष व मौलिक कृति के अस्तित्व में आने के पूर्व, जो कलात्मक सृजन की सुर्खियों में गिनी जा सकें, अनुभवों को पचाने व चिन्तन करने का अवकाश देता है।

फि़लिस्तीनी इन्तिफ़ाध इस प्रकार की सृजनशीलता के एक श्रेष्ठ उदाहरण के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। एक सम्पूर्ण जाति के विद्रोह ने, फि़लिस्तीनी ज़िन्दगी के सभी पक्ष उसका ड्रामा, उसकी दैनिक विजय और उसकी व्यक्तिगत एवं सामूहिक त्रासदियाँ जो किसी हृदय को अछूता नहीं छोड़ती, यह सभी कुछ उद्घाटित कर दिया है।

इन्तिफ़ाध का यह उदाहरण इस सत्य की पुष्टि करता है कि यदि साहित्यिक सृजन को अपनी चोटी पर पहुँचना है, तो उसे निरन्तर वृद्धि के नमूने का अनुकरण करना चाहिए, उसे प्रत्येक क्षण को समय रहते अपने में अन्तर्निष्ठ करना चाहिए और सृजन के दायरे/क्षेत्र/आयाम में विश्लेषण करना चाहिए। त्रासद घटनाओं की इस लम्बी शृंखला के अनुगामी प्रभाव, ख़ून भरे विलगाव तथा वीरता के अतुलनीय कार्य जो विगत पूरे वर्ष अनुभव किए जाते रहे हैं, और जो निश्चय ही भविष्य में भी प्रतिध्वनित/स्पन्दित होते रहेंगे, वे साहित्य निर्माण के लिए एक प्रभावी समय-रेखा का कार्य करेंगे। यह साहित्य को इस अद्वितीय मानवीय अनुभव के बहुविध पक्षों को समझने और इसके अभिप्रायों को एक व्यापक तथा ऐसी प्रबु( कलाकृति के रूप में अभिव्यक्त करने का अवसर देगा, जिसमें मनुष्य जाति के उदात्ततम उद्देश्यों को प्राप्त करने की संभावना रहेगी। इन्तिफ़ाध के अलावा अन्य घटनाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए। फि़लिस्तीनी लोगों को लगभग चालीस वर्ष पूर्व आज की त्रासदी के आरम्भ से लेकर और भी बहुत से बड़े संघर्ष को झेलना पड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं कि साहित्य विगत घटनाओं को लेकर अँधेरे में खोज करते हुए बहुत अधिक लम्बे समय तक उन्हीं की चर्चा करता रहे तथा एक यथार्थवादी और सार्थक कला-औति के निर्माण का अवसर खो जाने दे। इसके विपरीत कोई भी इसे अस्वीकार नहीं कर सकता कि काल के संदर्भ में साहित्य एक आश्चर्यकारी लय के साथ विकसित हो सकता है। वे महिमान्वित साहित्यिक-कृतियाँ जो बहुत सारे लोगों के जीवन में सबसे अधिक दुःसह और अविस्मरणीय क्षणों में से बहकर निकली हैं, इस कथन के सबसे प्रभावी साक्ष्य हैं। वास्तव में उन सब जातियों/लोगों ने जिन्हें आक्रामक कार्यवाहियों, बलपूर्वक उनकी भूमि पर कब्जा अधिकार करने वाली ताक़तों/शक्तियों तथा अनेक दुःखद मामलों/परीक्षाओं/ संकटों/इम्तिहानों से दीर्घ संघर्ष करना पड़ा है, उन सबने अपने में से ही ऐसे लेखकों को उत्पन्न किया है, जो अपने लोगों के दुःख-दर्द की वह आवाज़ ;प्रवक्ताद्ध बन गए, जो आवाज़ उनकी गद्य की महान रचनाओं में प्रतिध्वनित है, जिनमें से कुछ (कृतियाँ) अमर बनी हुई हैं।

मनुष्य की अन्तर्चेतना/आत्मा कलात्मक क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का जो निश्चित (अपरिवर्तनीय) भी हैं और परिवर्तनशील भी, एक ऐसा अनन्त स्रोत है, जो उन्हें एक ऐसी अद्वितीय कलाकृति में एकमेक कर देता है, जो अपने सृजनात्मक विस्फोटों में उस सब कुछ का लेखा-जोखा कर लेता है, जो बहुत काल तक छिपा रहा गया था।

आज फि़लिस्तीनी साहित्य अपने अस्तित्व के महानतम अनुभव की दहलीज पर खड़ा है। काल के लम्बे अन्तराल में निश्चय ही वह अपनी चोटी पर पहुँचेगा, क्योंकि अब वह हमारे लेखकों को, अपना उत्तरदायित्व यदि यही वह शब्द ;शर्तद्ध है तो, दिखा रहा है, कि वे फि़लिस्तीनी लोगों की दैनिक ज़िन्दगी के उन विशेष अनुभवों का, जो कभी-कभी अविश्वसनीयता की सीमा को स्पर्श करते हैं, उनका लेखा-जोखा रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार करें।

किसी ने कुछ समय पहले कहा था, और उसका वह कहना कितना सच/सही था कि इन्तिफ़ाध बिम्बों/छायाओं/और दृश्यों का एक ऐसा विविध भँवर है कि एक लेखक को उसके किनारों का केवल पुनर्संस्कार/पुनर्स्पश करने अन्तर्विरोधों को मिटाने/हटाने और उन्हें कलात्मक-अभिव्यक्ति के उच्चतम रूप व रेखाओं के अनुसार नयी आऔति भर देने की आवश्यकता है और तब इस मौलिक एवं अमूल्य कलात्मक झाँकी को प्रतिम्बित करने वाला कोई उपन्यास, कोई चित्र या कोई कविता उसमें से उत्पन्न होगी। फि़लिस्तीनी लेखकों, कलाकारों की ज़िम्मेदारी आज से दिन कलात्मक-अभिव्यक्ति के लिए उपस्थित अनुभवों, दृश्यों/घटनाओं और बिम्बों/छायाओं के प्रकाश में और भी अधिक भारी हो गई है। क्योंकि वास्तविकता इतने अधिक अवसर प्रदान कर रही है, उनके सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है कि वे अपने हाथ में क़लम उठायें या ब्रश?... यही वह आह्वान है... सृजनशीलता का आह्वान।

-ज़ियाद अब्द अल-फ़तह


फि़लिस्तीनी कविताओं का यह संग्रह आपके हाथ में है। समकालीन फि़लिस्तीनी साहित्य हमारे पाठकों को हिन्दी भाषा में उपलब्ध हो सके, इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए प्रयास किया गया है। ‘पहल’ से सम्पादक और हिन्दी कथा-साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर श्री ज्ञानरंजन ने इस दिशा में पहलक़दमी की है। ‘पहल’ पत्रिका अर्से से विदेशी साहित्य से हमारे पाठकों का परिचय कराती रही है। हमें पूर्ण आशा है कि यह सत्प्रयास उस कमी को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देगा जो इस समय अफ्रीका, एशिया, दक्षिण अमरीका आदि के साहित्य को लेकर हमारे देश में पाई जाती है।

आज की फि़लिस्तीनी कविता और कहानी विश्व साहित्य के इतिहास में एक नया मोड़ ला रही है। जो दर्द, मार्मिकता, जो उत्कट जीवन प्रेम हृदय को उद्वेलित करने वाली तूफानी भावनाएँ आज के फि़लिस्तीनी साहित्य में पायी जाती हैं, वैसी शायद ही किसी अन्य देश के साहित्य में पाई जाती रही होंगी। और उसके पीछे वह विकराल अनुभव है जिसमें से फि़लिस्तीन की जनता पिछले चालीस से अधिक वर्षों से गुज़र रही है। फि़लिस्तीन के बारे में सोचते हुए ‘ट्रेज़ेडी’ शब्द बार-बार मन में उभरता है। समूचे क्षेत्र में फि़लिस्तीनी कलाकार और संस्कृतिकर्मी अद्भुत भूमिका निभा रहे हैं।

यह बहस कितनी पुरानी पड़ चुकी है कि कलाकार को सामाजिक-राजनैतिक मसलों से जुड़ना चाहिए या नहीं। इसका जवाब कोई किसी फि़लिस्तीनी कवि के दिल से माँगे, कि यह सवाल, द्विविधा बनकर कभी उसके मन से उठता है या नहीं। फि़लिस्तीनी कौम की अनेक पीढ़ियाँ उन यातनापूर्ण स्थितियों में और उनसे पैदा होने वाले माहौल में साँस ले चुकी है, जिसमें अपमान है, छल-कपट है, उत्पीड़न है, घोर अन्याय है, पर साथ ही साथ आत्म-सम्मान के साथ ज़िन्दा रह पाने का, अपने हक के लिए लड़ने, संघर्ष करने का जुझारूपन भी है, गहरी आशा और आत्मविश्वास भी है।

यह चार दशाब्दियों का संघर्ष एक गौरवगाथा भी बनती है, वैसी ही जैसी वियतनाम की जुझारू जनता के बारे में सुनने में आती थी। ऐसे माहौल में से वैसी ही कविता फूटकर निकलेगी जिसमें उन सभी भावनाओं का समावेश होगा जो उस माहौल में पाई जाती हैं।

‘‘मेरी कविता वह जलता दिया है जिसे मैं एक द्वार से दूसरे द्वार तक ले जा रहा हूँ।’’

न जाने इस संघर्ष का अंत कब होगा। अभी तो उन लोगों को जो अपने देश की भूमि के लिए, अपने हक़ के लिए जूझ रहे हैं, ‘आतंकवादी’ की संज्ञा दी जा रही है और हर तरह से उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।

इस साहित्य को आप तक पहुँचाने का हमारा अभिप्राय केवल इतना ही है कि आप भी उन लोगों के दिल की धड़कनें सुन सकें, उन भावनाओं को महसूस कर सकें जो इस समय उन फि़लिस्तीनी लेखकों, कलाकारों के दिलों को उद्वेलित कर ही हैं, उस तड़प को महसूस कर सकें जिसमें से उनकी रचनाएँ जन्म ले रही हैं और उस विराट अभियान के साथ भावनात्मक स्तर पर जुड़ सकें जो इस समय फि़लिस्तीनी के संदर्भ में ही नहीं, दुनिया में जगह-जगह सामाजिक न्याय के लिए अन्यायपूर्ण विषमताओं को दूर करने के लिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के आधार पर राष्ट्रों के आपसी रिश्तों को कायम कर पाने के लिए चल रहा है।

हम उन सभी मित्रों के, सहकर्मियों के आभारी हैं जिन्होंने इस प्रयास में योग दिया है। 1987 में अफ्रो-एशियाई लेखक संघ (भारत) के तत्वावधान में अफ्रो-एशियाई युवा लेखकों का एक सिम्पोज़ियम दिल्ली में आयोजित किया गया था। उसके प्रबंध के लिए भारत सरकार की ओर से दी गई धनराशि में से ही इस संग्रह के प्रकाशन की व्यवस्था की गई है। भविष्य में भी ऐसे संकलन जुटा पाने के प्रयास किए जाते रहेंगे।

-भीष्म साहनी

सदस्य : अध्यक्ष समिति

अफ्रो-एशियाई लेखक संघ


जिस ज़मीं पर भी खुला मेरे लहू का परचम

लहलहाता है वहाँ अरज़े1 फि़लिस्तीन का अलाम2

तेरे आदा3 ने किया एक फि़लिस्तीं बर्बाद

मेरे ज़ख़्मों ने किये कितने फि़लिस्तीं आबाद

- फ़ैज़

फै़ज़ ने फि़लिस्तीन का दर्द महसूस करने के बाद ही यह लाइनें लिखी होंगी। शायद ही कोई हो, जो फि़लिस्तीन का इतिहास जानने के बाद, उसके साथ हुई ज़्यादती से विचलित न होता हो। जानबूझ कर आँखें बन्द कर ली जायें तो बात अलग है। इतिहास ने सम्भवतः किसी और क़ौम या मुल्क के साथ इतना क्रूर मज़ाक नहीं किया। फि़लिस्तीन का वजूद एक सच्चाई है।

पिछले वर्ष अफ्रो-एशियाई लेखक संघ द्वारा प्रकाशित फि़लिस्तीनी कहानी संगह ‘सुबह’ में कुछ अनुवाद करने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह अपनी तरह का अलग अनुभव था। फिर कविता संग्रह का अनुवाद करने की इच्छा हुई। भीष्म साहनी ने कृपापूर्वक मेरे आग्रह को स्वीकार किया। ‘सुबह’ का जिस तरह से सर्वत्र स्वागत हुआ, उससे भी उत्साह बढ़ा।

प्रकाशन पूर्व इन अनुवादों का पाठ जबलपुर, भोपाल, दिल्ली एवं वाराणसी में हुआ। सुधी श्रोताओं में डूबकर इन्हें सुना। एक ही प्रतिक्रिया थी- स्तब्धता। हिन्दी में इस तेवर की और इतनी संख्या में एक साथ फि़लिस्तीनी कविताएँ पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। इन कविताओं का अनुवाद करके मुझे गहरी आत्मतुष्टि मिली है।

कविताओं का अंग्रेज़ी पाठ ‘लोटस’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री ज़ियाद-अब्द-अल-फ़तह ने उपलब्ध कराया। अधिकांश कविताएँ ‘द ब्रेथ ऑफ द कन्ट्री’ संग्रह में हैं जो 1990 में अफ्रो-एशियाई लेखक संघ द्वारा प्रकाशित किया गया था। कविताएँ अगर आपको अच्छी लगें तो इनका श्रेय मूल कविता और कवियों को है। यदि कुछ अटपटा लगे तो यह निश्चय ही मेरे अनुवाद की अक्षमता है।

मैं सर्वश्री भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन और दूधनाथ सिंह के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने समय-समय पर अपने सुझावों से मुझे उपकृत किया। अफ्रो-एशियाई लेखक संघ का भी कृतज्ञ हूँ जिसने इसके प्रकाशन का दायित्व लिया।

-राधारमण अग्रवाल


हसन ज़कतान

उनकी ज़िन्दगी

पुराने अपने गाँव को

पिता कहो उसे

पुकारो अपने घर को

पिता कहो उसे

बताओ सब कुछ उन्हें

जो देखते हैं अपनी मृत्यु को

अपने सामने घटित होते

वे कभी नहीं मरते

खेमाइस निम्र* की मौत

कितनी बार

तुम तड़ते होगे

कितनी बार उठ गये होंगे

तुम्हारे नन्हें हाथ

आसमान की तरफ

कितने तारे टूटे पड़े होंगे, शर्म से

तुम्हारे चमकदार बालों के आगे

कितने तारे टूटे पड़े होंगे, शर्म से

तुम्हारे चमकदार बालों के आगे

कितनी बार तुमने की होगी कोशिश

कितनी बार थर्राये होंगे तुम्हारे हाथ

ऊपर चढ़ने में

कितनी बार तड़पे होंगे दर्द से

जब जब उठाये होंगे हाथ

कितनी बार अकड़ गया होगा तुम्हारा बदन

दहशत से, एक डरे हुए फूल सा

सीढ़ियों पर चढ़ते-आसमान की तरफ़

कितना ठंडा हो गया होगा तुम्हारा ज़िस्म

घुटन भरी रात में

घर से दूर, हवा में झूलते

शाम, मग़रिब की नमाज़ के बाद

करते हैं वज़ू जिससे

पुराने तालाब का पानी भी है शर्मसार

मौत की आहट से,

तुम्हारी नन्हीं उँगलियों से

शायद इसलिये भी

कि पा लिये तुमने

अपने आँसू

सिसकियों के बीच


मौत उनके लिए नहीं

अल अरब जाने के रास्ते

मुर्दे उठ खड़े होते हैं रात में

उतरते हैं पहाड़ियों से

सदियों पुरानी पगडंडियों से

घरों के पीछे से

अंगूर के बाग़ीचों से

यादों में

मासूम नींदों में

अज़ान में

धूल से अँटे,

ओढ़े कफ़न मौत का


एक के बाद एक

बढ़ते हैं मुर्दे

ढलानों से उतरते

झाड़ झंखाड़ पार करते

उठाते वह सब कुछ

छोड़ गये जो दरिन्दे

माँ के आँसू,

और, जो उँगलियाँ नहीं पोंछ पाईं

चन्द ओस की बूँदें

उठेंगे मुर्दे बार बार

चलेंगे आहिस्ता, धीरे-धीरे

धरती के बोझ से बोझिल

तालाबों और पुराने रास्ते से

सही रास्ते पर


तालाब की ख़मोशी के बीच

मेहराबों के नीचे, खंडहर में,

बैठेंगे मुर्दे

याद नहीं आयेगा कुछ भी

ज़मीन के नीचे बहता दरिया

सुनाई पड़ती है घोड़ों की हिनहिनाहट

मुर्दे देंगे पहरा रात भर

उनके लिए भला रात क्या


निगाहें टिकी हैं उनकी

मकानों पर

दादी माँ

दादी माँ का घर

सजा है चाँद तारे और आयतों से

देहलीज़ पर

खड़े हैं तीन शख़्स

बिना हिले डुले करते इन्तज़ार

न अन्दर आते हैं

न बाहर जाते हैं

कौन है सबसे ख़ूबसूरत तीनों में?

तुम्हीं बताओ न दादी माँ,

एक लम्बी ज़िन्दगी के बाद आयी

मौत के बाद,

अब, कौन है सबसे ख़ूबसूरत तीनों में?

गुज़र गये सत्तर साल

अकेलापन और शांति

छा गये हैं दादी माँ की आत्मा पर

अगर दिख न रहा हो कुछ भी

तो भी, क्यों बंद कर ली जायें आँखें

चमक रही है आले पर

सुरमे की चमकदार शीशी

रक्खा है वहीं कहीं

एक रंग बिरंगा रूमाल

हिलता, करता है सलाम

जब कि तीनों मुर्दे

पसर गये हैं चौखट के पास नींद में

उखड़ रही है

रात की साँस

खुदापरस्त बंदे कर रहे हैं जल्दी

ख़त्म हो चुकी अज़ान

रात बदल जाती है ठिठुरन में

फिर खड़े हैं वे तीनों

दरवाज़े पर

न आते हैं न जाते हैं

पकड़े हैं कफ़न का पल्लू

रोशनी की एक लकीर में

 

वही है सब कुछ मेरे लिये

रेगिस्तान में

तलाशते कहीं नख़लिस्तान

उतरती है एक फुसफुसाहट

कविता बन, दिल में

देवदूतों की नींद की ख़ातिर

घासों और पत्थर के मेहराबों की ख़ातिर

लहराती, बल खाती घास

करती है प्रार्थना

मेरा वतन की ख़ातिर

मेरा वतन, जो नहीं मारता किसी को यूँ ही

वह ज़मीन

बाँध रक्खा है जिसने मुझे

करती है इशारा

करूँगा देरी अगर, जरा भी मैं

खो जायेगा इशारा

जो बतायेगा रास्ता

और ले जायेगा मुझे

अपने घर तक

अपनी माँ तक

अपने वतन तक

 

1988 का बसंत

एकदम साफ़ दिन

दिख रहा है खिड़कियों के शीशों के पार

और दिख रहा है अंगूरों का बाग़

सरहद पार

दूर दराज़ की पहाड़ियों का बदन

सहला रहा है सूरज

कबूतर के नर्म पंखों से

खिड़की के शीशों

और सरहद के बीच

फैली है ज़मीन, इस पार से उस पार

पगडंडियाँ, फूल

और आईने की तरह साफ चमकदार पानी

लगता है सब कुछ हल्का

चिड़ियों की तरह उड़ता

ऐसी सुबह

ऐसी धूप में

मक्के की बालियाँ हों हमारी गवाह

 

सलाम

तुम नहीं बदले

हो बिल्कुल जैसे के तैसे

हुए नहीं चालीस के भी

उम्र की मार

खड़ी है बेबस देहलीज़ पर

एक बाल सफ़ेद नहीं

वर्दी पर ज़रा सी धूल

घावों पर ज़रा सा कालापन

पिघल रहा है सूरज

तुम्हारे बाजुओं पर

शाम के ठीक चार बजे हैं


तुम नहीं बदले ज़रा भी

पुकारते हैं नौजवान तुम्हें

आसरा है, सिफर्‍ तुम्हारा

आराम नहीं बदा

उसी दम, उसी कपड़े में

निकल आते हो

रख देते हो अपना दिल चौखट पर

ताकि हम आ जा सकें बेख़ौफ़

चुन लेते हैं तुम्हारे ज़ख़्मों से फूल

पिघलता हुआ सूरज

महसूस कर सकते हैं हम अपने अन्दर

पचास बरस

तुम जी रहे हो क्या खूब

हर दिल में

हर घर में

हर निकाह में

...हर ज़ख़्म में


सुनाई पड़ती है तुम्हारी आवाज़

गलियों में

सरहद की निगरानी चौकियों तक

माँयें बताती हैं यह सब

अपने बच्चों को हर रात

हम छुपा लेते हैं तुम्हारा घोड़ा

तमाशबीनों से

कस देते हैं चमकदार काठी

सुबह, फिर से


तुम हो बिल्कुल वैसे के वैसे

हम सबसे हसीन बड़े भाई जैसे

हम पहुँचते हैं तुम्हारे पास

बड़े भाई जैसे

हम पहुँचते हैं तुम्हारे पास

बड़ी आस लिए

तुम थाम लेते हो हाथ

सिर्फ थोड़ी सी धूल

लगी है वर्दी पर

पचास साल!

हम हैं यहीं के यहीं

तुम पहुँच गए कहाँ!


सलाम-2

दुआ है

धरती हो उतनी ही पाक

जितना तुम्हारा दिल

उतनी ही दुआओं से लबरेज़

उतनी ही नर्म


मची है हलचल चारों तरफ़

तुम डटे हो अब भी

पूरे फ़ौज-फाटे के साथ

बढ़ चले

एल कोड की पहाड़ियों की तरफ़

ऐलान कर दिया

तुम्हीं हो बादशाह


ताज नहीं है, तो क्या हुआ

तुम्हारे घुँघराले बाल

क्या कम हैं

किसी ताज से

 

 

मोईन बिसेसो

काल कोठरी की तीन दीवारें

होती है जब सुबह

मैं लड़ूँगा आख़िरी दम तक

दीवार का

कोई न कोई हिस्सा तो ख़ाली होगा

इस्तेमाल कर सकता हूँ जिसे

काग़ज़ की तरह

गलीं नहीं

उँगलियाँ साबुत हैं और भी


आती है आवाज़

दीवार के पार से

गुपचुप सन्देश

धागों जैसी हमारी नसें

हमारी नसों जैसी पत्थरों की नसें

हमारा ख़ून उबलता है

बेजान पत्थरों की नसों में

रह रह आते हैं सन्देश

दीवार के पार से

फिर बन्द हुई एक कोठरी

फिर मार दिया गया कोई कै़दी

फिर खुलती है एक कोठरी

फिर लाया गया कोई कै़दी

 

होती है जब दोपहर

रख दिया जाता है मेरे सामने

एक टुकड़ा काग़ज़

एक क़लम

और एक अदद चाभी मेरे घर की

चाहते हैं वे

करूँ काला जिस काग़ज़ के टुकड़े को

वही करता है ख़बरदार

झुकना मत!

तुम्हें क़सम है

अपने घर के एक-एक ईंट की

करती है चाभी ख़बरदार

झुकना मत!

आती है आवाज़

ठकठका रहा है कोई

दीवार के उस पार

कुचले हाथों से किसी तरह

झुकना मत!

बारिश की एक-एक बूँद

काल कोठरी की छत से टकराती

चीख़ती कानों में, करती ख़बरदार

झुकना मत!


सूरज ढलने के बाद

कोई नहीं है मेरे पास

न कोई देख पाता है

न कोई सुन पाता है

इस आदमी की आवाज़

हर रात जब बंद हो जाती है कालकोठरी

पड़ जाते हैं ताले

वह निकल पड़ता है बाहर

मेरे ज़ख़्मों से, लहूलुहान

चहलक़दमी करता है तंग कोठरी में

वह मैं ही हूँ

वह है बिल्कुल मेरे जैसा

जैसा कि मैं कभी था

मेरे बचपन-सा, मेरी जवानी-सा

दरअसल वह है मेरा अकेला सहारा

मेरा इश्क़

वह है एक ख़त

लिखता हूँ जिसे मैं हर रात

वही है काग़ज़, वही है लिफ़ाफ़ा और वही है टिकट

वही है मेरा जहान

वही है मेरा मुल्क़

आज की रात

मैंने देखा उसे फिर से

ज़ख़्मों से निकलते

उदास सदमे से

थका, परेशान

ख़ामोश नापता कोठरी को

एक भी लफ़्ज़ नहीं

फिर की कह रहा था मानों

नहीं देख पाओगे मुझे

कभी भी

अगर कुछ भी लिख दिया

अगर कुछ भी क़ुबूल कर लिया

 

 

राशिद हुसैन

लानत है

मैं नहीं देता हक़

अपने वतन के जाँबज़ों को

कि वे रौदें,

घास के एक भी टुकड़े को

मैं नहीं देता हक़

अपनी बहनों को

कि वे उठा लें

और चलायें बन्दूक़

मैं नहीं देता हक़

किसी भी बच्चे को

कि वे करें खिलवाड़,

और छुयें, किसी बम के गोले को

मैं छीन सकता हूँ

किसी से उसका कोई भी हक़

पर ग़ायब हो जाते हैं सारे के सारे उसूल

जब जलती हुई निगाहें

थाम लेती हैं

बगल से गुज़रते हुए

ज़ालिमों के घोड़ों की रासें

मैं नहीं चाहता

दस साल का मासूम बच्चा

बन जाए शहीद

मैं नहीं चाहता

कोई पेड़ छुपा ले बारूद अपने तनों में

मैं नहीं चाहता

मेरे बाग़ीचे के पेड़ों की शाखों से

झूलते हों फाँसी के फंदे


मैं नहीं चाहता

मेरे गुलाब की क्यारी

इस्तेमाल की जाये

फ़ायरिंग स्क्वाड के दरिन्दों द्वारा

मैं न चाहूँ तो...


पर मैं

चाह कर भी नहीं चाह पाता

जब मेरा वतन

जल गया हो मेरे दोस्तों के ज़िस्मों के साथ

जब जल गया हो मेरी ज़िन्दगी का,

सबसे बेहतरीन वक़्त उनके साथ

तब,

मैं कैसे रोक सकता हूँ

अपने गीतों को हथियार बनने से

 

आँखों में बसा है- येरूशलम

तुम्हारी आँखों का रंग

रंगत है खजूर के पत्ते की

अंगूर के बेलों की

तुम्हारी आँखों का रंग

रंगत है मेरी मुहब्बत की

लहरा रहा है जो प्यारे येरूशल के लिए

क़ीमती है यह रंगत, बेशक़ीमत

तुम्हारी आँखों की रंगत से झाँकता ज़ख़्म

है मेरी कविता की तरह

प्यार जितना गहरा

देशनिकाले जितना लम्बा

तुम्हारी आँखों का रंग

मिलता है मेरे पिता से

लगाये जिन्होंने बहुत से पेड़

और गाते रहे खुशी से

तुम्हारी आँखों का रंग

है उस सिपहसालार जैसा

खड़ा है जो बिना फौज के

तुम्हारी आँखों का रंग

है अत्याचार जैसा

नाक़ाबिले बर्दाश्त

तुम्हारी आँखों का रंग

रंगत है ताज़ा फ़सल की

नये अनाज के दाने सी

तुम्हारी आँखों का रंग

मिलता है मेरी हिम्मत और धीरज से

बिल्कुल मेरी माँ जैसा

मेरे घावों जैसा

मेरी दूरी खड़ी मंज़िल जैसा

तुम्हारी आँखों का रंग

मिलता है कबूतर से

पर,

दरअसल वह है

मेरे लड़ाकू बाज़ जैसा

 

 

कमाल नासिर

आख़िरी बात

प्रिय,

अपने पहले बच्चे को

गोद में खिलाते हुए

अगर ख़बर सुनना यह,

मेरा इन्तज़ार करते हुए,

मत रोना

क्यों कि लौटना नहीं होगा मेरा फिर से

जीना तकलीफ़ और मुसीबतों के बीच

कुछ भी नहीं

अगर पुकारता हो अपना वतन

प्रिय,

पढ़ो ये ख़बर, अगर

मेरे साथियों की दहशत भरी आँखों में

ख़ुदा के लिए

उन्हें देना तसल्ली

अपनी दिलकश मुस्कराहट से

गोकि तब्दील हो गयी हैं

मेरी बहारें सर्द जाड़ों में

ताकि बरक़रार रहे तुम्हारी बहारें

उन्हीं बहारों के नाम

लिख देता हूँ

साथियों के सपनों को

हाँ, करता हूँ इसकी वसीयत

खुदा को हाज़िर नाज़िर जान

उन खुदाई नेमतों की क़सम

जो सिखाती है मुहब्बत

हर गुज़रते पल के साथ

वही मुहब्बत

जो छा गई है मेरी आत्मा, मेरे ख़ून में

दोस्तों के लिए

हमवतनों के लिए

मैं मर ही नहीं सकता

जिऊँगा ख़्वाबों में

शान से तने सीनों में

पैदा होऊँगा हमेशा

हर नई बात के साथ


प्रिय,

सुनना यह ख़बर, अगर

और काँप जाओ डर से

पीला पड़ जाये चेहरा, अगर

चाँद की म(म रौशनी में

मत बैठना ख़ामोश

इजाज़त मत देना चाँद की रौशनी को

कि समा जाय तुम्हारी आँखों की चमक में

चाँद की रोशनी

कम कर देगी मेरी जलन को


बताना मेरे बच्चे को

मेरी बेपनाह मुहब्बत की बाबत

बताना उसे

मैंने जी है मुहब्बत

मेरा चाक सीना

बाँट रहा था, सिफर्‍ मुहब्बत

नहीं छोड़ जाऊँगा उसके लिए कुछ भी

सिवा अपने गीतों के एक टुकड़े के

और अपनी बाँसुरी

अगर मातम करे कभी वह

भरे दिल से मेरी क़ब्र पर

कहना उससे

शायद लौटूँ एक दिन

एक पके फल की तलाश में

 

 


अब्दुल लतीफ़ अक़्ल

फि़लिस्तीनी मुहब्बत

जब नहीं था मुमकिन

मैं लाया सौग़ातें तुम्हारे लिए

महकता रहा तुम्हारा बदन ख़यालों में

तुम्हारी सूनी आँखों में

पड़े थे कभी मेरे सपने

मुर्दा

मैं चाहता हूँ तुमको अब भी

जब सताती है भूख

सूँघ लेता हूँ तुम्हारी ख़ुशबूदार ज़ुल्फ़े

और पोंछ लेता हूँ आँसू

दर्द और धूल से भरा चेहरा

खिल उठता है

तुम्हारी हथेलियों के बीच आते ही

लगता है मैं

अभी पैदा ही नहीं हुआ

फिर भी बढ़ रहा हूँ उम्र-दर-उम्र

तुम्हारी निगाहों के सामने

सीखता हूँ बहुत कुछ

मेरा वजूद

लेता है शक्ल एक इरादे की

और उड़ जाता है सरहदों के पार

तुम हो मेरा असबाब और नकली पासपोर्ट

हँसता हूँ

बिन पकड़े सरहद पार कर जाने की ख़ुशी में

हँसता हूँ

शान से

क्या पकड़ पायेगी पुलिस कभी हमें?

अगर पकड़ ले

और कुचल डाले मेरी आँखें

फिर भी, न होगा शिकवा या गिला

शर्म धोकर कर देगी मुझे

साफ़ और नर्म

घबराकर, मेरे जुनून और ताक़त से

बंद कर दे मुझे किसी तनहा कोठरी में

लिख दूँगा तुम्हारा नाम

हर काग़ज़ पर

ले जाये अगर

फाँसी के तख़्ते पर

बरसाते कोड़े दनादन

अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़

सोचूँगा फिर भी

हम हैं दो दीवाने

मौत के दरवाज़े पर

तुम्हारा गेहुँआ रंग

है पहले जैसा

मैं और तुम

हैं एक जिस्म, एक जान

कुचल दिया जायेगा जब मेरा सर

ढकेल दिया जायेगा

सीलनन भरे अँधेरे दोज़ख़ में

चाहूँगा तुम्हें भूलना तब

और ज़्यादा चाहते हुए

 

 

मोहम्मद-अल-असद

कभी-कभी

कभी-कभी

गीत सुनते सुनते

लगता है गूँज रही हो

अपनी ही आवाज़


कभी-कभी

पलटता है तख़्ता जब,

किसी सत्ता का,

लगता है निकाले जायेंगे मुल्क से

कभी-कभी

सुनाई पड़ती है

चट्टानों से टकराती लहरों की आवाज़

लगता है

समुन्दर कायम है अब भी धरती पर

पर होता है ऐसा

कभी-कभी

सिफर्‍ कभी कभी

ख़्यालों में अक्सर

सुनाई पड़ता है अपना नाम

रेडियो की ख़बरों में

 

वही निकोसिया/वही कॉफी

पुराने दरवाज़े के पास

खड़े हैं पेड़

और मकान, छोटे गुम्बदों के साथ


टिकाये पीठ पेड़ के तनों से

खड़े हैं कुछ बुजुर्गवार

चुस्कियाँ कॉफी की,

पेड़ों की धनी छाँव तले

वही बेंच

वही बूढ़ा दुकानदार

चिपका टेढ़े किवाड़ों के साथ

वही ख़ामोशी

दुश्वार है समझ पाना इस इत्मीनान को


मैं भी पीना चाहूँगा कॉफ़ी

उन्हीं घने पेड़ों की छाँव तले

चखना चाहूँगा

उसी लाजवाब तुर्की कॉफी का

वक़्त को हराने वाला स्वाद


सफ़ेद पत्थर

बनाते हैं हम

सफ़ेद पत्थर से

घर

औज़ार

और मशालें,

करते हैं हम

शाम की तैयारी

चिड़िया उड़ जाती है

दबाये पत्ती चोंच में

हमारी परछाईं

फैल जाती है

हरियाली की क़ालीन पर

पहाड़ियों के पैरों तले

फिर खिसकने लगती है धीरे धीरे

जब डूबता है हमारा सूरज

सुनसान गलियों में

खाली ढाबों में

ख़ामोशी के साथ

बच्चों के स्कूल के आस पास

समझो, हमारा घर गया

छोड़ देते हैं घर मुँह अँधेरे

बरक़रार रहती है हमारी पाक सफ़ेदी

बच्चे खेलते कापियों, रजिस्टरों से

छोड़ते अपनी नन्हीं उँगलियों के निशान

बच्चे खेलते हैं सुकून से

बारिश में

दोस्त भटक रहे भीड़ में

भीड़ भी चल पड़ेगी अभी

फिर कब देख पायेंगे किसे

शाम उतरती है बच्चों पर

सब कुछ है ख़ामोश

इसका उतरना, इसके रास्ते

मशाल

बना देती है परछाईं

ख़ामोश कर देती है सपनों को

फैल जाती है बच्चों के बिस्तर पर

और तुम्हारा दिल

जीता है अंधेरे में

उतरती है जब रात

देर हो चुकी है बहुत

जाने के लिए

देर हो चुकी है बहुत

रौशनी के लिए

जब दिल गुम हो गया हो

जब पत्थर हो गए हों नर्म

चिड़िया दबा लेती है चोंच में

धूल ओस और आख़िरी पेड़

 

 

अतीफ़ जानम


हत्यारे सपनों के शहर के

ऐ, रौशनी वाले दरवाज़े के पहरेदार

ज़ालिम, भगा दिया था तूने मुझे

बच्चा जान कर

चाहा था घुसना जब बरसों पहले

धमकाया, मत आना फिर कभी

शाही मुहर लगे

इजाज़तनामे के बग़ैर

और भी बतायीं तूने बहुत सी वजहें

मसलन, बंद है शहर

मैं आया क्यूँ नंगे पैर

ऊँची हैं दीवारें

लगे हैं शीशों के टुकड़े

अटके हैं जिनमें तमाम

अनजान राहगीरों के लोथड़े


ऐ, रौशनी वाले दरवाज़े के पहरेदार

देख, आया हूँ मैं, फिर से

लाया हूँ साथ

न सिर्फ‍ इजाज़तनामा

बल्कि सारी की सारी शाही मुहरें भी

आया हूँ अपने ख़ून सा बहता हुआ

ऊँचा किये सर, चम्पे के फूला-सा

हो गया हूँ नर्म और

आईने की तरह साफ़, आँसू जैसा

अपने महबूब की आँखों में

घुल गया हूँ

उसकी आँखों के साथ

कलेजे की आग

नींद में है इस वक़्त

जनाब,

यह शहर है इतना ख़ूबसूरत

चमकता हुआ, बुलाता है दूर से

कलियाँ देखती हैं उचक उचक के

हल्की हवा में, झूमती हैं बार-बार

हवा जो आयी शहर के अन्दर से

छूती है मुझे

ख़ून जो बचा था मेरी धमनियों में

नाचता है बार-बार

जनाब,

पूरी कर दी हैं मैंने सारी शर्तें

और खानापूरी

देखिये, यहाँ मेरे दस्तख़त

किये गये हैं मेरी थकी हुई बरौनियों से

कहाँ हैं मेरे पुरखों की अमानत

इस दरवाज़े की चाभियाँ?

मैं दाखिल होना चाहता हूँ फ़ौरन

दरवाज़े के अन्दर

बहते झरने और जलती आग को

सीने से लगाने

जनाब,

जवाब देने लगे हैं घुटने

दरख़्वास्त है, मुझे इजाज़त दें

जनाब,

लगता है मौत पुकार रही है मुझे

निकला जा रहा है दम

शहर घिर गया है क़यामत से

क़यामत की रात का साया

पड़ गया है पूरे ख़ूबसूरत शहर पर

क़यामत की रात

क़हर ढाती

घसीटती उसे

उमेठती बाँहों को

तहा कर रख लेगी उसका जिस्म

अपने लबादे में

ले जायेगी उसे

चबा जायेगी उसे

दूर, बहुत दूर

 

 

अब्दुर्रहीम महमूद

शहादत

मैं रख लूँगा अपनी रूह

अपनी हथेली पर

और घुमा के फेंक दूँगा उसे

मौत की आरामगाह में


मेरी ज़िन्दगी को

ख़ुश करना चाहिये दोस्तों को

या मिटा देना चाहिये दुश्मनों को?


ख़ुशनसीब जनम लेते हैं दुनिया में

फूलों को, सपनों को हथियाने के लिए


ज़िन्दगी क्या है

क्या है मक़सद इसका

मैं नहीं चाहूँगा जीना एक भी पल

अगर ताक़तवर न समझें मुझे

मेरे वतन की एक नामुमकिन चारदीवारी

सुनते हों सब मेरी बात, ग़ौर से

गूँजती हो मेरी आवाज़ मेरे बाद


क़सम ख़ुदा की,

ज़िम्मेदार होऊँगा अपनी मौत का मैं ख़ुद ही

बढ़ता हूँ इसकी तरफ़

हिम्मत और जल्दी से

मारा गया है हक़, इसलिए

चाहता हूँ अपने वतन को, इसलिए

तलवारों की झनझनाहट

है सबसे मीठी आवाज़

ख़ून नहीं जगाता कोई दहशत

मुर्दा जिस्म पड़ा हो

किसी वीरान, सूखे रेगिस्तान में

परिंदों के नोंच खाने के लिए

बच रहता है फिर भी, एक हिस्सा

ज़मीन और जन्नत के शेरों के लिए

सिंच गई है ज़मीन, शहीद के ख़ून से

ख़ूनी हवा

सहलाती है शहीद का चेहरा धूल से

चलो, एक मुस्कराहट तो आई होठों पर


इस तरह बेज़ार दुनिया से

बोझिल हो जाती हैं पलकें नींद से

सो जाता हूँ, फिर से, उसी सपने की तलाश में


ख़ुदा गवाह है,

यह मौत होगी वाक़ई एक मर्द की मौत

जो चाहते हैं मरना इस तरह

वे मर ही नहीं सकते किसी और तरह

मैं नहीं पैदा हुआ

उन बदज़ातों की सज़ा भुगतने के लिए

कैसे

कोई कर लेता है

इनकी ज़्यादतियाँ बर्दाश्त

डर से?

शर्म से?

पर, क्या मैं नहीं हूँ ऊपर से नीचे तक

शान ही शान?

घुमा के फेंक दूँगा अपना दिल

सीधा, दुश्मन के चेहरे पर

दिल है मेरा फ़ौलादी, आग का गोला

मेरी तलवार की धार

देख रही है पूरे वतन हो


मेरे हमवतन

क़द्र करते हैं

मेरी हिम्मत की

 

 

तौफ़ीक़ ज़ियाद

मेरी आवाज़, मेरी ख़ुशबू, मेरा जिस्म

जहाँ जमी हैं मेरी जड़ें

मैं लौटूँगा वहीं

बस, इन्तज़ार करो मेरा

मैं ज़रूर लौटूँगा


चट्टानों की दरारों में

काँटों में, पत्तियों में

रंगीन तितलियों में

गूँज में, सायों में

जाड़े की सोंधी मिट्टी में

गर्मी की धूल में

मस्त हिरनियों के रास्तों में

चिड़ियों के घोंसलों में


गरजता तूफ़ान दिखायेगा रास्ता

मेरी नसों में धड़कती है

मेरे वतन की अज़ान

पुकारती है हर घड़ी

हाँ, मैं ज़रूर लौटूँगा


फूलो, रखना तब तक बरक़रार

मेरी आवाज़, मेरी ख़ुशबू, मेरा जिस्म


कोई कैसे करे बर्दाश्त

ऐ मेरे वतन

ऐ मेरे घर

ऐ मेरे लुटे ख़ज़ाने

ऐ मेरे ख़ूनी इतिहास


जहाँ दफ़्न हैं मेरे अब्बा

उनके वालिद

उनके भी पुरखे

पहुँच नहीं सकता उन तक

कैसे कर लूँ बर्दाश्त

कैसे कर दूँ माफ़

जकड़ दिया जाऊँ शिकंजे में

फिर भी,

नहीं कर पाऊँगा माफ़


उगलते थे सोना जो खेत

पड़े हैं उजाड़, वीरान आज

पड़ी हैं यहाँ वहाँ

हड्डियाँ पत्थरों के साथ

जूझ रहे हैं अब भी

कुछ मर्दाने

कुछ दीवाने

हौसला है उन दरिन्दों को फाड़ खाने का

ख़ून पी जाने का

कुछ न कहो, कुछ भी नहीं

मक़बरों तक को नहीं बख़्शा

रौंद डाला उन्हें भी बूटों तले


सतह से नीचे

मुझे कुछ भी न बताओ

कुछ भी नहीं


मैं आ गया हूँ उस जगह

जहाँ न पीछे कुछ था

न आगे कुछ होने की गुंजाइश

जहाँ तौला जाता है एक एक लफ़्ज़

साया पीछा करता है साये का

ख़ुदाई हुक्म

बदल जाते हैं सुविधाजनक क़ानून, धर्म में

बंदा नेस्तनाबूद कर देता है ख़ुदा को

बस भी करो,

मुझे कुछ और न बताओ


मैं आया हूँ वहाँ से

जहाँ एक आग सुलगती है सीने में,

तेज़ाब बहता है विद्रोही नसों में,

सड़कें उफनती हैं

बेहिसाब आदमी औरतों से

एक कभी न ख़त्म होने वाला सिलसिला,

जहाँ पेड़ लहरा रहे हैं

वतन के झंडे जैसे

जायेंगे यहाँ से भला कहाँ,

जहाँ हर हादसा

ललकारता है और कुर्बानी के लिए,

जहाँ शिकायत

मानी जाती है कमज़ोरी,

जहाँ के बच्चों, शायरों

और मज़दूरों की आवाज़ें

रौशन करती हैं दिलों को-

जागती हैं आस,

मत बतलाओ मुझे कुछ और


देखी है मैंने ज़िन्दगी भरपूर

जी है मैंने ज़िन्दगी भरपूर


क्या जो दिख रहा है

उसने बनाया बेवकूफ़ मुझे

शायद बूढ़ा हो रहा हूँ

रोओगे तो मरोगे

जल्दी करो

क्योंकि सच यह है

कि जल्दी कुछ भी नहीं बदलता

वक़्त बढ़ता जाता है आगे

धीरे धीरे

हमेशा


अमृत

मर्ज-बिन-उमर के नाम-

तुम्हें मालूम था

कि ये मैं ही था

लौटा बरसों बाद

किसी अजनबी की तरह

यादों के डंक

रोते बिन आँसुओं के

घिसटते कदम

जैसे ढोये हों ग़म की लाश

तुम मुड़ीं मेरी तरफ़

देखा, एक नश्तर सा लगा सीने में

अनमने सलाम किया

कोशिश करने लगीं उठने की

पर सैकड़ों जंजीरों की जकड़न

पकड़े रही तुम्हें, कस कर

तुम्हारी आवाज़ खो गई कहीं

मेरा नाम लेने में

खो गई मेरी भी आवाज़

गूँजती थी जो कभी, झरने सी

कुछ मत कहो

मैंने पी लिया है

दुख का अमृत

मेरी प्यारी, मर्ज-बिन-उमर

 

 

नाज़रेथ की लड़कियाँ

कितनी बार,

कितनी बार गुज़र गई है बग़ल से

काली आँखों वाली

नाज़रेथ की ख़ूबसूरत लड़कियाँ

भले घरों जैसे चाल-ढाल वाली

कुछ उठाये बच्चे गोद में

कुछ कुँवारी लड़कियाँ

मानो फूल तैर रहे हों सड़कों पर

कुछ के बच्चे बँधे हैं पीठ पर

नाज़ुक कमर की पट्टी के सहारे

काँख में दबी हैं गेहूँ की बालियाँ

आ रही हैं आवाज़ें

खेतों से, खलिहानों से


शामें गुज़रती हैं

तालाब के किनारे

गाते गीत बाबा आदम के ज़माने के

तुर्की लड़ाई और भगोड़े सैनिकों के बारे में

अफ़सरों की नाइन्साफ़ी के बारे में

कैसे बेच डाले गये बाज़ूबन्द

हथियारों के लिए

और भी न जाने क्या-क्या


न बताओ मुझे कुछ और

अगर ये दरिन्दे वही हैं

चुरा लिया जिन्होंने हमारे वतन को

यक़ीनन,

तब हमारी हिम्मत

चूमेगी आसमान

 

 

समीह-अल-कासिम

मेरा वजूद

अगर

तुम्हें पाने के बाद भी

न झूम उठूँ ख़ुशी से मैं

तो, इजाज़त दो

कि ख़ुश रहूँ

तुम्हारे दिये दर्द में


तुम्हारी धुँधली होती तस्वीर

और ख़ामोश पड़े ज़िस्म को

चूमता हूँ

और हो जाता हूँ तुम जैसा

दीवानगी की हद तक

तूफ़ान उठा है वहशत की तरह

तूफ़ान में चक्कर खाता

मैं कौन हूँ

इस तरह का अहसास करने वाला?


फिसलता है पैर

मैं भी,

बैंगनी अँधियारा

ख़ुश हो, उड़ाता है हँसी

तार तार हो गयी

इन पागलपन भरी यादों के लिए


इस सुबह से उस सुबह तक

हम हैं अकेले

तुम और फ़रिश्ते

देते हैं सहारा मेरी हिम्मत को

फिर भी, मैं बिल्कुल अकेला

क्या यही है मुहब्बत?


तुम्हारी गर्दन मेरी बाँहें

गर्मी बदन की

और सरकती रेशमी ज़ुल्फ़ें

जगा देती हैं मुझे

चमेली सी महकती साँस

इबादत जैसी

मैं गड़ा देता हूँ चेहरा तुम्हारे बदन में

भर जाता हूँ आँसुओं से

चिड़ियाँ और तितलियाँ

हों गवाह हमारी ज़िन्दगी की

दरवाज़े और खिड़कियाँ

नीबू के दरख़्त और बाग़

जान जाये सारी दुनिया

कि जी रहे हैं हम, बख़ुदा

दिये हाथ में हाथ

करिश्मा कर दिखाया हमने

लोग मुस्कराते हैं

मेरी बड़बड़ाहट और हँसी पे

शायद हों परेशान

इस तनहा इन्सान के लिए

शायद हों ग़मज़दा

जवानी के इस पागलपन पर

हमें माफ़ कर देना चाहिए उन्हें

देख नहीं पाते वे

मेरा तुम्हारे पास होना

माफ़ कर दो उन्हें, तुम भी

एक शाम से दूसरी शाम तक

रहती हैं हर वक़्त मेरे पास

गोलियाँ नींद की

हर तमाशा है मेरे अन्दर

फिर भी हूँ एकदम तनहा

रहती हो हर वक़्त तुम मेरे दिल में

मेरी रूह में है तुम्हारी ही छाप

है ऐसा ही

जैसे हो तुम, हरदम

जैसे हो तुम, कभी नहीं

यही है इश्क़, यही है इश्क़

 

 

ज़करिया मौहम्मद

सिफर्‍ एक बार

सिफर्‍ एक गोली बन्दूक में

ताकि मौत इन्तज़ार कर सके

छुप कर दरवाज़े के पीछे

सिफर्‍ एक फेफड़ा पसलियों के पीछे

ताकि साँस

रौशन कर सके अँधेरे को

सिफर्‍ एक चाभी घर की

ताकि सिवाय भूतों के

कोई दाख़िल न हो सके

सिफर्‍ एक शहर

जागता है दिल में

कसकती है उससे बेदख़ली

सिफर्‍ एक उम्र,

अकेली वही एक उम्र,

दहशत पैदा करती है

वजूद के लिए

 

वाह!

अगर

चारे के लिए कलियाँ और कोंपलें हों,

अगर

खुरों में जड़ी हों चाँदी की नाल,

अगर

हो काठी सोने की

पर,

पर गले के लिए तो होनी ही चाहिये

चमचमाती ख़ूनी लाल लगाम

 

वक़्त, चाबुक और घोड़े

मैं ठीक कर देता हूँ

घंटे वाली सुई

फिर, मिनट और सेकण्ड वाले काँटे

हाथ की बेसब्र चाबुक

चीख़ती है

तेज़, तेज़ और तेज़

घोड़े दौड़ पड़ते हैं सरपट

पागलों की तरह

 

चरागाह

घास का लुभावना,

बहुत ऊँचा होना

नहीं है सच, उतना ही

जितना पानी का बरसना, न बरसना

बादलों का होना, न होना

घास का क्या

हो सकता है पहुँच जाये

तुम्हारी कमर की ऊँचाई तक

पर क्या लुभा लेगी वह

और चरते रहोगे वहीं जीवन भर

मान कर उसे आख़िरी सच

मत चरो, उसी अकेले चरागाह में

दुनिया में और भी बहुत से सच हैं

उस चरागाह के सिवा

 

 

फदवा तूकान

रात दिन की दहशत

-अपनी दोस्त रोज़मैरी के लिये

मुर्दे टहलते हैं

अपनी गलियों में

जिन्न, मिल जाते हैं काली दीवारों के साथ

आर पार दिखते हड्डियों के ढाँचे

बहन,

उढ़ा दो कफ़न मुर्दा जिस्मों को

शर्म,

शर्म करो, बहन है मेरी बिना कपड़ों के

पड़ोसी भी हैं बिना कपड़ों के

कुछ नहीं बचा हमारे पास

ढँक पायें शर्म जिससे, अपनी


नंगे पेड़ हिल रहे पागलों की तरह

उड़ गये हैं चिड़ियों के पर, उन पर से

होती है दस्तक दरवाज़े पर, अचानक

सिपाही हैं शायद

मेरी बहन

चक्कर लगाती इधर से उधर

उधर से इधर, जुनून में

सिपाही, और ज़्यादा सिपाही

मैं भी घूमता हूँ इधर उधर

फिर, घूम पड़ता हूँ पीछे

चारदीवारी के पार से

आती है आवाज़

इश्क़ के मारे आशिक़ की आवाज़

महबूबा हो चुकी किसी ग़ैर की

रह गया मैं, एक नामुराद आशिक़

बोलो, कुछ तो बोलो जानेमन

मैं रहा हूँ क़रीबी तुम्हारा

रौशनी तुम्हारी आँखों की

क़सम ख़ुदा,

तुम्हीं हो मेरी आँख और निगाह

महबूबा, डूब जाने दो मुझे

अपनी आँखों की गहराई में

मत ढकेलो परे


तोड़ देते हैं दरवाज़ा

कम्बख़्त सिपाही

या ख़ुदा, रहम कर

जानेमन, उदास हो?

ले लो मेरे दिल का ख़ूनी लाल गुलाब

रख लो इसे अपने दिल में,

धड़कनों के पास

दरवाज़े पर हैं सिपाही, या रब,

छोड़ दिया है ख़ुदा ने भी मेरा साथ

ढँक लो अपना चेहरा

अपनों ने ही

भोंक दिया ख़ंजर पीठ में

क़हर की रात

दरवाज़ा खोल बदज़ात

दरवाज़ा खोल, हरामी की औलाद

लगता है, दुनिया की हर ज़बान में

गाली दे रहे सिपाही

महबूबा मेरी,

जाग उठा हूँ बिना सपनों वाली नींद से

कॉफी पीने से शायद

हो जाये भारीपन ग़ायब

ख़ामोशी

कभी न ख़त्म होने वाली ख़ामोशी

उदासी और गुज़रे दर्द पर डालता हूँ निगाह

कौन सा रास्ता रह गया है चुनने को

ख़ामोशी, सिफर्‍ ख़ामोशी

या ख़ुदा, आख़िर क्यों

एलकोड के अख़बारों में

रोज़ छपती हैं ख़बरें-


‘‘बेथेलहम! खेरबत बेत सकारिया के इलाक़े में किसानों ने कार आसियों की तरफ़ से बढ़ते बुलडोज़रों को देखा है। बताया जाता है कि इन बुलडोज़रों ने खेतों और फ़सलों का भारी नुक़सान किया है।’’

एक शिकायती ख़त जो किसी इब्राहीम अताउल्ला, बमुक़ाम बेत सकारिया, कार आसियों के मग़रिब में, ज़िला बेथेलहम द्वारा, लड़ाई के महकमे को लिखा गया-

मेरे खेतों को हथिया लेने के बाबत

जनाब, आपको इत्तिला हो कि जिस ज़मीन के बारे में आपको लिखा जा रहा है वो हमारे दाना-पानी का अकेला सहारा है। इससे इक्कीस लोगों की परवरिश होती है। इनकी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से मेरे ऊपर है। परसों, बुलडोज़रों ने पूरी फ़सल तबाह कर दी जिससे हमारा साल भर का गुज़ारा होता। आपसे भूखे बाल बच्चों के नाम पर दरख़्वास्त है कि, बराये मेहरबानी, मेरी ज़मीन लौटवाने में मदद करें। ज़मीन के एवज़ में मुझे कोई पैसा या दूसरी ज़मीन नहीं चाहिये।

-बक़हीम अताउल्ला

बार-बार

वही बासी ख़बरें

कुछ भी नहीं

जो हो क़ाबिले ग़ौर या नया

फँसता मालूम पड़ता है गला

रेशमी कीड़े,

चूस लोगे तुम

मेरे ख़ून की एक एक बूँद

क्या रह पायेगी ज़िन्दगी भला उसके बाद

या ख़ुदा, क्या हो रहा है

टूटती नहीं ख़ामोशी

घुमाता हूँ रेडियो की सुई

क्या हो रहा है दुनिया-जहान में

अँधा जिन्न,

लीले जा रहा है आदमी पर आदमी

बेलफास्ट भी नहीं है अछूता

सुनहरे फूलों का सर

काट दिया गया हो किसी टाइम बम से

यही है हश्र वियतनाम का

उदासी रोज़ जज़्ब होती है

वियतनाम की मिट्टी में

खाद है नेपाम बमों की

नोंच रहे गि( अधमरे ज़िस्मों को

फैल गये ख़ूनी पंजे

दहशत दे रही मौत का पैग़ाम

किसने फैलायी

ये ख़ौफ़नाक़ दहशत

हमारे जहान में?

किसने उढ़ा दिया है

खौफ़ का कफ़न

ऐ ख़ुदा

मुहब्बत है कहीं बाक़ी

या हो गई फ़ना?


टूटती है ख़ामोशी आख़िर

किसी जानवर की दर्दनाक आवाज़ से


दूर जंगल में

ठहाके लगा रहा है ख़ुदा

तूफ़ानी बादलों की ओट से

 


ख़ालिद अबू ख़ालिद


सलीब

1.

तुम आये हवा पे सवार

उस जगह से

जहाँ से होती है हवा की शुरुआत

जहाँ से होती है शुरू हर बरसात

तुम आये हवा पे सवार

इस खंडहर शहर के किनारे

रुक जाओ, जहाँ भी हो तुम


आते ही

तुम फेंक देते हो अपना जाल बेफि़क्री से

बेख़बर हालात से

तैरता है जाल बालू के ढूहों पर

मछलियाँ, सिफर्‍ साये हैं मछलियों के

निगाह जाती है जहाँ तक

सलीब ही सलीब

जन्नत से दोज़ख तक

रुक जाओ, जहाँ भी हो तुम


बरसों तक

सलीबों से भरी टोकरी

ढोयी है मैंने

फिर भी,

रुला देता है हर नया चेहरा

रुक जाओ, जहाँ भी हो तुम

जिधर भी घूमो

बंद कर लो निगाहें

दिखाई पड़ेगी फिर भी

दहशत सिफर्‍ दहशत

हमारा वक़्त रह गया है

कोलतार की

एक झील की मानिन्द

जो उतरा सो डूबा

हम डाल दिये गये हैं

किसी प्रेत द्वारा गहरी खदान में

पीस दिये गये हैं धूल में, धूल जैसे

हमारे दिलों की चिन्गारी

दफ़्न कर दी गई है

उसी गहरी काली खदान में

2.

सलाम,

स्वागत है तुम्हारा दोस्त

मेहमान मेरे

जाने न दूँगा तुम्हें कभी भी

तूफ़ान उठा है तुम्हारी अगवानी में

लपेट लेंगे तुम्हें, हज़ारों हज़ार तूफ़ान

तूफ़ान उठा है

तुम्हारे अनगिनत जालों के समुन्दर से

जिसे तुम फेंकते हो और खींच लेते हो

फिर फेंकते हो, फिर खींच लेते हो

इतने फट गये हैं जाल

मरम्मत होगी नामुमकिन

तुम्हें नहीं मिले मोती

तुम्हें नहीं मिले सीप

सलब पे टँगा मैं

देखता हूँ तुम्हारी एक-एक हरकत

बालू के ढेर पर लगा के तम्बू

तुम दौड़ते इधर-उधर

अपने ख़्वाबों के मोतियों की तलाश में

सोचते हो मिलेंगे यहीं कहीं

अफ़सोस है तुम्हारे लिए

अलकतरे के समुन्दर में

मोती भला कहाँ

लौटते हो जब अपना चिथड़ा जाल लिये

उड़ा ले जाता है रेतीला तूफ़ान तुम्हारे तम्बू

मेरी तरह तुम भी

टँग गये सलीब पर

आँखें टिकी हैं क्षितिज पर

गिड़गिड़ाते, पुकारते हर आदमी को

रुको, जहाँ भी हो तुम

यहाँ रहते हैं वे

जो ख़ून पी जायेंगे तुम्हारा

यह टापू भरा है कीड़ों और ग़द्दारों से

यहाँ रुक गया है वक़्त

अरे, ज़रा मुस्कराना

हमारे नग़मों पर

हमारे दिल की धड़कनों पर

हमारी पलकें झपकती हैं जल्दी जल्दी

हमारी चमकदार आँखों में उतर आया ख़ून

बेपनाह सन्नाटा, हवा और पानी के घर तक

काश,

तुम, तुम होते

सिफर्‍ तुम, तुम होते

क्या सुना तुमने

मेरा और दोस्तों का नग़मा?

और देखा मुझे

उखाड़ते उँगलियों के नाख़ून?

मेरी वहशत देखकर

भागे तुम दहशत से

छोड़कर अपना सलीब

रुको, लादो इसे अपनी पीठ पर

फिर दफ़ा हो यहाँ से

फूँक-फूँक कर रखना कदम

रुको, जहाँ भी हो तुम

3.

इसके पहले

कि तुम अलविदा कहो, मेरे दोस्त

इसके पहले

कि तुम भूल जाओ हमारी भूख, मेरे दोस्त

एक प्यारी पुरवैया की ख़ातिर

कहना चाहूँगा, जाओ सिफर्‍ कल तक के लिए

आह, कल है कितना पास

आठ बजे

नौ बजे

दस बजे

दस बजकर दो सेकण्ड

शायद इन्तज़ार कर रहे थे तुम

कि हम कहें कुछ भी

माफ़ करना दोस्त,

मेरी और मेरे दोस्तों की ख़ोमोशी

पैदा होने को होता है कोई जब

होता है सब कुछ ख़ामोश

फिर भी, बँधाता है उम्मीद

अलविदा मेरे दोस्त, अलविदा

छोड़ गये हो अपने पीछे

मायूस ख़तों के पहाड़

और रोशनाई का

काला, गहरा और ख़ौफ़नाक कुआं

 

 

फय्याज़िद


गुज़रना उसका शीशे के आर-पार

मानों उलट गया हो

तेल का घड़ा

दूर क्षितिज पर

कुछ हरा सा

कुछ नीला सा


देहलीज़ पर खड़ी वो

काँपती ठंड से

पहने सिफर्‍ एक झीना लिबास

बढ़ायी उसने उसकी जैकेट, उसकी तरफ़

वक़्त आ ही गया प्यार करने का

चन्द लम्हों के बाद

मिलती हैं निगाहें दिलरुबा से

फिसलतीं चारों ओर

निगाहें पड़ गईं हैं सर्द

वक़्त गुज़रने के साथ

फिर भी, कस जाती है बाँहें

फलदार बाग़ान घिर गया हो बाँहों में

हाँ, एक उदास फल

हाँ, एक मायूस फल

हाँ, एक नींद से बोझिल फल

चेहरे खो जाते हैं एक-दूसरे में

लिख देती है पछुआ हवा अपना नाम

दमिश्क़, दमिश्क़, दमिश्क़

चौराहे उमड़ रहे

भरे हैं लबालब

पिछली रात के गुलाबों से

अलविदा, प्रिय

अलविदा, प्रिय

क्षितिज पर फैली सुबह

दमिश्क़ बन कौंधती है यादों में


दमिश्क़ की पहली रात

अंगूर के बेलों सी ऐंठती,

चढ़ती मेहराबों पर, कंगूरों पर

मुस्कुराती छोटे-छोटे होंठों में

सहलाती क़दमों को हौले से

आहिस्ता, दरिया के पानी की तरह

दरिया के किनारे वाली ऊँची खिड़कियों से

या उस तरफ़ जाती

घुमावदार ख़ामोश सीढ़ियों से

दोस्तों की भुतही निगाहों के साये में

गुज़र जायेगी वह

शीशे के आर पार

एक ख़ुशनुमा सुबह की तरह


बीस साल की लड़की

चेहरे से जिसके

टपक रही हो गर्मी

होठों में समा गये हों जिसके

गाँव के ख़ुशनुमा मंज़र

शायद आने वाले

सर्द मौसम की तैय्यारी में

भर देती है हामी

गुज़रती हुई बग़ल से

लगता है

उड़ रहीं हों दो चिड़ियाँ

पंख पसारे, दरिया किनारे

गुज़रते हैं हम

उसी खिड़की के नीचे से, उम्मीद लगाये

नहीं,

नहीं पकड़ पाया कोई अब तक

शाहज़ादी के हाथ से उछाला सेब1


वक़्त गुज़रने के साथ

हुए हम उम्रदराज़

खिड़कियों के नीचे भरी आहें

हुईं बिल्कुल बेअसर

आ धमकी लड़ाई सर पर

दिन गुज़रा, शाम गुज़री

सुबह हो गई इश्क़ के रात की

रात, इकट्ठा करती है ओस

एक प्याले में

प्यार की

एक लम्बी चाहत भरी रात की उम्मीद...

प्यार के मारे

जाते हैं इधर से उधर

इधर से उधर

इन्द्रधनुष की तरह

फिर झाँकता है खिड़की से, दमिश्क़

ग़मज़दा शाहज़ादी सा

टूटे हुए फूलदान सा

यही है वह जो गुज़रा अलस्सुबह उधर से

यही है वह दिखाई मुझे जिसने

पहले पहल लिखी नज़्मों के पन्ने

यही है वह मिलना चाहा जिसने, मुझसे

शाम के धुँधलके में

मुँह लटकाये

क्या था भला मेरे पास उसे देने को

खो गई उसके क़दमों की आहट धीरे-धीरे

यही था वह,

मिलती थी शक्ल जिसकी मेरे भाई से

यही है वह, सुबह वाला दीवाना

खड़ा चुपचाप, चौखट पर

 


युसुफ़ अब्दुल अज़ीज़

ज़िद

-कौन हो तुम?

-दीवार में धँसी एक कील

या शायद बहुत पुराना कोई बुत

गिर पडूँगा कल

फैल जायेंगी मेरी लपटें

पूरे रेगिस्तान में

बरस-दर-बरस

चाटते रहना मेरे ख़ून को

चीटियों की क़तार बन

गिरूँगा कल मैं जब

छोड़ जाऊँगा अपना ताज

शिकारी कुत्तों के लिए

अपने गीत भेड़ियों के लिए

और, अपनी पाक़ीज़ा औरतों को

धूल में मिलने के लिए

 

अनिद्रा

नींद हो गई हवा

मेरी आँखों से

गुज़र गये सत्तर साल

खोलता हूँ खिड़की हर रात

फिरती है नज़र गलियों में

ढूँढ़ता हूँ उन चोरों को

जो निगाह लगाये खड़े हैं मेरे घर पे

अब

मेरी तीन बीवियाँ

और बीस बच्चे

इन्तज़ार करते हैं चोर का

मेरे साथ

हर रात

 

सम्भावनाएँ

कवि ताहिर रियाध के नाम

सपनों के मारे

एक भेड़िये की मानिन्द

टिका दूँगा अपनी कोहनिया

लकड़ी की पट्टी पर

रख दूँगा इस पर

दो सिगरेटें और दो जाम

पुकारूँगा सिसिल!

गोल मुँह वाली वह शै

फिर माँगूगा दो देसी बीयर की बोतलें


उफ़,

बला की इस रात में

सो रही दुनिया

धुँये के बिस्तर पर

एक नंगे लिली के फूल की तरह

ख़ामोशी उतर रही

झीना लिबास पहने

दूर वक़्त की सरहदों से आगे

उड़ा ले जाता है हवा का तेज झोंका

अब, इस वीराने में

गाऊँगा अपने गीत

मैख़ाने की महफिल में

पर, तुम्हारी शुरुआत

कर देगी दीवाना

साक़ी

गुज़रती है इधर से उधर फुर्ती से

जुल्फ़ों से झाँकती हँसी

लुभाती उस फल की ख़ुशबू से

जो मना है छूना एकदम

चाहत रह जाती लरज़ती हमारे हाथों में

वह कमबख़्त सिसिल

गुज़री यकायक बग़ल से

ख़ूबसूरत पिंडलियाँ देखते ही

बुत बन गये सबके सब

छींटा सा पड़ गया हो आबे-हयात का

मनाओ ख़ुशियाँ

करिश्मे होते हैं, यक़ीनन


सबकी सब आग उँडेल दो मेरे अन्दर

पाक हैं पीने वाले

मैं तैरता हूँ ख़ुदाई नेमत के तहत

बाँहें हो गईं शहतूत की शाखें

और पत्थर का एक टुकड़ा

या ख़ुदा!

वह है कोई शायर या पैग़म्बर


मेरा साथी

उसकी पतली बाँहें

पकड़ती हैं एक जाम

चेहरा

तक़रीबन तीस साल के आदमी जैसा

धुँए के ग़ुबार में

शाख से झुका हुआ एक फूल

रात में कै़द

सितारे सुनाते कि़स्से मीठे बचपन के

भुला देना चाहा सब कुछ

रूई जैसे बादलों की भूल-भुलैया में

वह हँसा

पर मैं देख सकता था

ठीक उसकी आँखों के बीच

सलीब पर लटके हज़ारों ईसाओं को

और उसकी पसलियों में

एक नन्हा छेद

याद आता है यही सब

लौटा घर

देर रात

घूम गया सिर

एक बार फिर

देख सकता था मैं

पत्थरों से बना घर

फैला था छितराया

बोरे से गिरे कोयले सा

देख सकता था मैं

रौशनी से नहायीं खिड़कियाँ

लग रही थीं एक बड़ा छेद

बियाबान में

और तो और,

दिख रहे थे फूल

लाँघते चारदीवारी

पंखुड़ियाँ उठाये सिर शान से

घने अँधेरे में

किसी अंधे की फैली उँगलियों की तरह

लग रहा था

सारी की सारी दीवारें

मिलकर हो जायेंगी एक

किसी साजिश के तहत

और झुका देंगी अपना सिर

मेरी तरफ़

घबड़ाहट और डर

जैसे हो गया होऊँ पागल दहशत से

जैसे उभार दिया गया होऊँ

ख़ामोश, पत्थरों में आयतों की तरह

जुटायी हिम्मत

दिमाग़ किया ठिकाने

जलायी एक लौ राख के ढेर में

झटक देता हूँ सिर अजीब तरह से

किसी बदहवास कंगारू जैसा

हाँ, यही है घर मेरा

यहीं गुज़ारी ज़िन्दगी मैंने

मशक़्कत करते

यहीं दिल की राख ने

जान डाली मेरे नग़मों में

यहीं खड़ी की मैंने

मीनारें ख़्वाबों की

जिस पर चढ़ कर

कुरेद सकता था बादलों को

तैर सकता था बादलों में


हाँ, यही है घर मेरा

लगता है उड़ जायेंगी छतें इसकी

किसी पंख फैलाये बाज़ की तरह

और झपट्टा मार कर

बैठ जायेंगी मेरे ऊपर

हाँ, यही है घर मेरा

यही है वह चारदीवारी

इसके पत्थर

हो गये हैं खुरदुरे दाँत की तरह

बंद कर देता हूँ दरवाज़ा

नहीं समझ पा रहा कुछ भी

जब, रात की परछाईं

करती है सियापा मुर्दा जिस्म पर

जब, चलती है हवा

मौत की बदबू लिये,

बस एक क़दम और

थम जाते हैं क़दम


या ख़ुदा!

किस वक़्त को चुना तूने

मेरे दिमाग़ को नाकाम करने के लिए

 

कितना अजीब लगता है

दो बैल

गुँथे एक दूसरे में

फैला रहे बदबू हवा में

गोबर की

खण्डहर सा घर

मैं दौड़ा कमरों में

भेड़ें, बकरियाँ और गायें

खेलती, सोतीं, क़ालीनों पर

अलसायी बिल्ली कुर्सी पर

घूँसा सा लगा पसलियों में

पसलियाँ रहीं ख़ामोश

चीख़ उठी नस नस

फटने लगे कान के पर्दे

लेटा बिस्तर पर

जोंक घुस गई हो चमड़ी के अंदर

चीख़ा

ख़ामोशी...

एक मोटा कम्बल पड़ गया बदन पर

घूमती, निगाहें ठहरी आईने पर

मुश्किल थी ख़ुद की पहचान

अगर मिलती थी शक्ल मेरी किसी से

तो वह था एक दाढ़ी वाला बकरा

मितली से बेज़ार

दौड़ पड़ा मैं खिड़की की तरफ़

 

पुराना धुआँ

दो फूल सजे हैं

मेरी मेज़ पर

एक तुम्हारे लिए

दूसरा कौवे के लिए

मैं कभी नहीं रहा

पत्थर किसी बाग़ का

मैं कभी नहीं रहा

तारा आसमान का

मैं कभी नहीं रहा

पंख किसी बादल का

मैं हमेशा रहा

धुएँ जैसी रूह

तमाम ज़िन्दा रूहों से ऊपर

घुस गया तमाम दिलों में, आँखों में

मेरे पास न ज़मीन है न और कुछ

बराबर है

मेरा होना या न होना

मैं रहा हमेशा

बंद फ़व्वारे की चुप्पी सा

एक ढेला

जो टूट जाता है घास के उगते ही

मैं हूँ चश्मदीद गवाह

किसी वीरान, उजड़ी जगह का

छोड़ दो मुझे

बिल्कुल अकेला

बंद कर दो मुझे

किसी किताब की तरह

सजा के रख दिए हैं मैंने

दो फूल मेज़ पर

एक तुम्हारे लिए

दूसरा कौवे के लिए

 

मोहम्मद अल कै़सी

मेरा हत्यारा चलता है साथ-साथ

मैं चलता हूँ

मेरा हत्यारा पीछा करता है मेरा

साये की तरह

हवा लगती है, नहीं भी

अब क्या बचा है

इन गर्मियों में हमारे लिए

अब क्या बचा है

अंगूर की लताओं में हमारे लिए

लौटे हैं हम अधमरे से

अब क्या बचा है

पेड़ों में हमारे लिए


हम रह गए हैं सिफर्‍ अहसास

जुलाई गई, अगस्त करता है इन्तज़ार

क्या मालूम है सितम्बर को इस बाबत कुछ भी?


वीरान, खण्डर जैसे यातना शिविरों में

इरादा करता है फि़लिस्तीनी

हम ज़िन्दा हैं

अब जायेंगे सरहद पार

बदकि़स्मती, दिलासा दो हमें

दुआ करो

हम बने रहें अपने जैसे

बिना खोये अपनी पहचान

मौत,

कुरेद दो हमें अन्दर तक


एक फि़लिस्तीनी शहीद की माँ

लिख देती है वक़्त की दीवार पर

हम नहीं हैं जानवर

हम जानवर नहीं हैं

 

तैय्यारी

कहता हूँ,

शुरू किया है यह सब

तो तुम्हीं ख़त्म भी करो यह सब

कहता हूँ हमवतनों से, बार-बार

नहीं डरता मैं, किसी मैदाने जंग से

कोई जंग नहीं कर पाई नेस्तनाबूद मुझे

दिल ने बना दिया बेताज बादशाह

हमवतनों ने भरोसा किया, इस कदर मुझपे

हिला देती है मैदाने जंग से आती आवाज़

और तब्दील कर देता हूँ रात को दिन में


जद्दोजहद थी लम्बी

तुम्हारे लिए मेरा डर, मेरा लगाव

बन गए मेरी मुहब्बत, मेरी मंज़िल

बीत गए कितने बरस

बढ़ती जाती है मुहब्बत इन पहाड़ियों के लिए

भोगता हूँ, पर बाँध रखते हैं ये लगाव

बावज़ूद ज़ंजीरों के

पड़े रेगिस्तान में

बालू के बिस्तर पर

बजती हैं कान में घंटियाँ, बेहिसाब

दौड़ पड़ता हूँ सबसे आगे

भटकने इन पहाड़ियों में

मेरे क़रीबियों ने ही

बेच डालीं ये पहाड़ियाँ

वो भी, कौड़ियों के मोल

यही वह वक़्त था

जब किया इरादा जाने का


तैय्यार हो, आओ चलें

सपनों तक पहुँचने का रास्ता

लम्बा भी है

दूर भी है

 

सद्र क्या कहते हैं

मैं नहीं लौटा हूँ यहाँ वापस

फिर भी, रहूँगा मौजूद हरदम

परवाह नहीं इस नुक्ताचीं की

परवाह नहीं ख़ंजरों की

या किसी साज़िश की

या किसी बेहूदा बात की

नहीं है परवाह

छुरा भोंके जाने की, ज़ख़्मों की

या किसी से दो-दो हाथ होने की

मैं नहीं लौटा हूँ यहाँ वापस

मेरी निगाहें नहीं तरस रहीं

इस मंज़र को गले लगाने

नहीं झुकता कभी

मजाल किसकी दिखाये राह मुझको

रोता नहीं

हलाक हुए स्कूली बच्चों की ख़ातिर

जाता नहीं कभी कहवाघरों की तरफ़

नहीं भाते खण्डहर

बिदा लेता हूँ जब उनसे

निकलता नहीं बिदाई का एक भी लफ़्ज़

जो कर दे ज़ाहिर मायूसी को

मैं नहीं छोड़ता कोई भी मौक़ा

खैरख़्वाह दिखने का

मैं नहीं बँधा किसी से

उसकी वफ़ादारी के लिए

इस हमेशा रहने वाले सूनेपन में

जो है बिल्कुल अपना

और चुँधिया देता है आँख

इस कदर सख़्त है मेरा जाना

मेरा आराम इस क़दर तक़लीफ़देह

हर समय कुलबुलाता है मेरे अन्दर

छावनी का पागलपन

गूँजती है मेरे अन्दर

अर्रक़ीम की गुफाओं से निकल भागी आवाज़ें

नफ़रत है जिन चीज़ों से मुझे

शायद नहीं खिंच पाऊँगा कभी उनकी तरफ़

नहीं खिंच पाऊँगा उनकी तरफ़ भी कभी

जो सूख जाते हैं वक़्त के थपेड़ों से

एक बार फिर

प्यार का होना या न होना

नहीं बहा पाते दोनों

अपनी रौ में मुझे

नहीं चबाता अपने अल्फाज़ को कभी

बोलता हूँ, पूरे इत्मीनान से

बिना ठहरे, बिना डरे, बिना पछताये


मैं हूँ, हड्डियों के कड़कने

धीमी आवाज़


मेरे पास है, मेरी अपनी

सिफर्‍ एक अदद घड़ी

कह सकते हैं उसे

आगे जाने का एकतरफ़ा रास्ता

जो ले जायेगा मुझे हरियाली की ओर


सुन सकता हूँ हादसों की आहट

फिर भी, इन्कार करता हूँ

नग़मों की छाँव में छुपने से

बेसहारा, जमाता हूँ अपने पैर ज़मीन पर

पीछे-पीछे चलता है मेरा जल्लाद

वाकि़फ़ है मेरे दर्द से

दर्द ही तो है अकेला सहारा

मेरा ख़ून चमकता रहेगा मेरे बाद

सोचो, बन रहा है घर

बाक़ी है सिफर्‍ एक खम्भा, मेरी शक्ल में

मेरे ख़्याल लौटा लाते हैं

और खड़ा कर देते हैं एक बच्चे को मेरे सामने

औरतो! बनाओ कॉफी

कड़क, कड़वी

ले आओ थोड़ा पानी

धुल जाएँ जिससे सारी परेशानियाँ

तैयार हो जाओ मुसीबतो

तैयार हो जाओ परेशानियो

तैयार हो जाओ नाकामियो

कुछ कपड़े, कुछ आहें

छुपा लो अपने अज़ीज आँसुओं को

तैयार कर दो मुझे

इस जुदाई के लिए

फैला दो तमाम पसलियों को राहों में

बस दे दो एक पल की मुहलत

छोड़ दो तनहा

दर-बदर होने के पहले

छोड़ दो मुझे अयूब दरवाज़े के पास

पाँच मिनट, बस सिर्फ पाँच मिनट

शायद धुँधली पड़ जायें यादें

शायद साफ़ हो जायें ज़ेहन से

इन गलियों की तस्वीरें

जो नहीं छोड़तीं पीछा ख़यालों का

शायद तैय्यार कर सकूँ रूह को

मंज़िल के लिए

थोड़े-से असबाब के साथ

कितना लम्बा है रास्ता

मनाओ दिल को

कर सके कूच की तैयारी

तैय्यार करो काग़ज़ात

तैय्यार करो नावें,

अपनी चाहत जितनी लम्बी,

तैय्यार हो लहरो, तैयार हो हवाओ

चन्द लमहों में

समुन्दर कर देगा सीना चाक

चूर कर देगा हमें शीशें की तरह

औरतो, करो तैय्यारी

रास्ते के वास्ते

बुलबुलो, चहको आखिरी बार

सिफर्‍ हमारे लिए

अन्दलूसिया, दिखाना हमें रास्ता

ख़ून से सने हमारे तमग़े

चमकेंगे और रौशन करेंगे रास्तों को

तैय्यार करो बच्चों को

कहीं सो न जायें गफ़लत में

कहीं थका न दें हमें

अन्दलूसिया के रास्ते में

एक भी टुकड़ा नहीं

रोटी का घर में

टिकाए हैं अपना वजूद

चन्द आलुओं से,

दूध के चन्द क़तरों से

देना जरा सहारा

कसना कमरबन्द ठीक से

ऐ मेरे जिस्म के कमज़ोर काठी वाले घोड़े

चलना अन्दलूसिया के रास्ते

सम्भल सम्भल के

 

मुरीद-अल-बरघौठी

दिल में क्या है?

एक ब्रह्माण्ड

अनेक ग्रह

ग्रहों में धरती

धरती पर महाद्वीप

महाद्वीपों में एशिया

एशिया में फि़लिस्तीन

फि़लिस्तीन में नगर

नगर में सड़कें

सड़कों पर प्रदर्शन

प्रदर्शनकारियों में एक नौजवान

नौजवान के सीने में दिल

दिल में धँसी है

एक अदद गोली

 

सफ़ाई

कॉफी हाउस का कोना

शायर कर रहा है सफ़ेद पन्ने सियाह

सोचती है बुढ़िया

चिट्ठी लिख रहा है माँ को

माँ ही बची है चिट्ठी लिखने को?

स्साला, लिखता होगा महबूबा को

ख़याल है नौजवान के

वो तो डलाइंग बना लहा है

तुतलाता है बच्चा

ठेके काग़ज़ात के अलावा

हो ही नहीं सकता

काग़ज़ का कोई भी टुकड़ा

व्यापारी की निगाह में

सैलानी के ज़ेहन में

तैरता है एक ख़ूबसूरत पोस्टकार्ड

नहीं, नहीं, जोड़ रहा है

अब बचा कितना कर्ज़

बेचारा क्लर्क

इन सारे ख़यालों को धता बताकर

बढ़ता है धीरे-धीरे

पुलिस इन्सपेक्टर मेज़ की तरफ़

 

तस्वीर

नीला आकाश

सफ़ेद, मटमैले बादल

लम्बी, ऐंठी, लहाराती सड़कें

सड़कों पर झूमते परचम

लाल नीले पीले हरे और भी बहुतेरे

बेरुत में सुबह हुई

शववाहन रुकता है

सतमंज़िली इमारत के सामने

दो अदद गंदे बुड्ढे

दो अदद गंदी दाढ़ियों समेत

भर रहे खर्राटे शववाहन के अंदर

मज़े से,

कोचवान भरता है लम्बे-लम्बे डग

बेसब्री से

पहली मंज़िल की खिड़की से

झाँकती हैं दो चकाचक वर्दियाँ

उससे ऊपर

पीटे जा रही है लड़की

एक बदरंग फटा क़ालीन

बाँस के टुकड़े से

हर बार ढँक लेती है चेहरा

बाएँ हाथ से

धूल से बचने के लिये

चौथी मंज़िल वाली औरत

सुखा रही है अलगनी पर

बच्चे का सुथन्ना

पाँचवीं मंज़िल वाला बच्चा

उछालता है गेंद छठवीं की तरफ़

कोई नहीं पकड़ता

सातवीं पर औरतें

खड़ी खड़ी बिसूर रही हैं यूँ ही

सहसा पाँचवीं मंज़िल वाला बच्चा

पकड़ लेता है रेलिंग

निगाहें घूमने लगती हैं

गेंद के साथ साथ

गेंद बढ़ती है

शव का इन्तज़ार करते

शववाहन की तरफ़

 

दो औरतें

एक औरत

जाती है अक्सर

पेरिस में

जवाहरात की दूकानों पर

लगा देती है

शिकायतों के पहाड़


एक औरत

जाती है हर जुमेरात

पाँच क़ब्रिस्तानों में

लड़ने की


रोज़मर्रा की ज़िन्दगी

अमरीका की नींव में है

कोका कोला, चेज़ मैनहटन, जनरल मोटर्स

क्रिस्चियन डायर, मैकडोनल्ड, शेल, डायनास्टी,

हिल्टन वग़ैरह वग़ैरह

अरब मुल्क भी नहीं हैं

बिना किसी नींव के

हमारे पास भी है

केन्टकी के लज़ीज़ भुने मुर्ग़े

आँसू गैस, सरकारी गुर्गे

क्लब, और बहुत से क्लब

जासूसी महकमे वग़ैरह वग़ैरह

 

अबू सेलमा

मैंने चाहा तुम्हें, और ज़्यादा

जब भी लड़ा हूँ तुम्हारे लिए

बढ़ी है मुहब्बत मेरे दिल में, तुम्हारे लिए

ज़्यादा, और ज़्यादा

भला कौन सी ज़मीन है

महकती होगी जो

मुश्क और लोहबान की ख़ुशबू से

और कौन सी ज़मीन है

महकती होगी जो

दुनिया के सबसे बेहतरीन इत्र से

लड़ता रहा हूँ मैं अपने वतन के लिए

शाखें, अब भी हरी हैं मेरी

ऐ प्यारे वतन फि़लिस्तीन,

उड़ता हूँ आसमान में

सबसे बुलन्द पहाड़ी से भी ऊँचे

बढ़ी है मुहब्बत मेरे दिल में, तुम्हारे लिए

ज़्यादा और ज़्यादा

ऐ प्यारे वतन फि़लिस्तीन,

तुम्हारा नाम ही काफ़ी है

धड़कनें तेज़ करने को

तुम्हारे बदन का ताँबई रंग

मात करता है ख़ूबसूरती को

देखकर तुमको

गूँजते हैं कानों में

पाक रूहों के कलाम

लहरा उठते हैं मेरी आँखों में

तुम्हारी सरहद, तुम्हारे समुन्दर

क्या फूल उठे हैं नीबू इस बार

हमारे आखिरी आँसुओं से

चीड़ पर बैठी चिड़िया

नहीं उड़ पा रही

फिर से, उसी ऊँचाई तक

न सितारे रह गये पहरेदार

कारमेल की पहाड़ियों के

ख़ाली खेत

मनाते हैं सोग, हमारे न रहने का

ख़ाली हैं बाग़ीचे

लाल पड़ गईं, रोती हैं ज़ार ज़ार

अँगूर की पत्तियाँ, हमारे लिए

ऐ प्यारे वतन फि़लिस्तीन,

रोक रक्खो अपने जाँबाज़ों को

शायद देखना बदा हो कुछ और

देशनिकाले से उठ खड़ा होता है एक पक्का इरादा

ढँक लेती है विद्रोह की आग

हर रूह को

नहीं कर पायेगा आदमी जब तक ख़ुद को आज़ाद

नहीं हो पायेगा कभी, अपना वतन आज़ाद

हर के पास है अपनी ज़मीन, अपना घर

अपने वतन ज़ैसा ख़ूनी इतिहास

लड़खड़ाता हूँ

जिस भी रास्ते पर बढ़ता हूँ मैं

मिलती है धूल ही धूल

करने को बदरंग चेहरा

पर, उतरता है पंख लगाये

जब कभी भी तुम्हारा नाम, कानों में

घुल जाता है शहद सा

तुम्हारे नाम का एक एक हफर्‍

मेरी कविता

बोती है बीज प्यार का

हर शरणार्थी शिविर में

जल उठती है एक मशाल

रौंदी हुई, दरबदर ज़मीन पर

फि़लिस्तीन नहीं होगा

इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत, पाक और क़ीमती

जब भी लड़ा हूँ तुम्हारे लिए

बढ़ी है मुहब्बत मेरे दिल में, तुम्हारे लिए

ज़्यादा, और ज़्यादा

 

हसन-अल-बाउहायरी


वतन की साँस

नींद की आँखों में

लगा देती है रात

अपनी मुहर

गूँजती है हवाओं में

गुपचुप, रहस्य भरे गीतों की कड़ियाँ

दूर, पहाड़ी से भी दूर

क्षितिज से

टकरातीं हैं

इन ख़ामोश गीतों की कड़ियाँ

क़यामत की इस रात

झटकती है निराशा को

मनहूस रात के अँधेरे में

पूछती है बहन से

दुलार से

दीदी,

लिली की महक का राज़ क्या है?


आँख से गिरते आँसू

खो जाते हैं वक़्त के गालों पर

जवाब मौज़ूद है

दूर कहीं ख़यालों की ज़ुबान में

ख़याल लौटते हैं, छूते हैं झाड़ी को

बहना,

लिली की ख़ुशबू ही है

हमारे वतन की साँस

--

(ऊपर का चित्र - सोनम सिकरवार की कलाकृति)

  image

डॉ. दीपक आचार्य

 

ज्यादातर लोगों में आजकल अपना कुछ भी दम-खम नहीं रहा। वे औरों के बलबूते ही अपने आपको जैसे-तैसे जिन्दा रखे हुए हैं। इंसान के लिए सर्वाधिक शर्मनाक बात इससे अधिक और क्या होगी कि वह औरों के सहारे पर जिन्दा होने का भ्रम पाले हुए रहता है।

हमारे पूर्वजों ने जिस शौर्य-पराक्रम और सेवा-परोपकार के कर्मों के सहारे अपने वजूद को दिग-दिगन्त तक फैलाया था, उन्हीं के हम कैसे वंशज हैं जो अपनी रगों में बह रहे उस खून को भी भूल गए हैं जो वैश्विक माहौल को अपने इशारे से नचा सकने में समर्थ था और जिसने सदियों का इतिहास रचा है।

पता नहीं लोग अपने आपको क्यों भुलाते जा रहे हैं। बहुत से लोग हैं जो समाज-जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों, भटक रहे हों या कहीं काम कर रहे हों, पार्क में घूम रहे हों या किसी धर्म स्थल में, अथवा सड़कों पर ही दौड़ क्यों न लगा रहे हों।

दिन और रात इन लोगों के तार उन लोगों से अदृश्य रूप से बंधे होते हैं जिनके वे कहे जाते हैं अथवा ये लोग जिनको अपना मानते हैं। यानि की खुद कुछ भी नहीं हैं, औरों के ही कहे जाते हैं।

खूब सारे लोगों के बारे में आमतौर पर कहा ही जाता है कि ये उनके बूते नाच रहे हैं अथवा उछलकूद कर रहे हैं, उनके दम पर इन्होंने औरों की नाक में दम कर रखा है। वहीं ये लोग खुद भी बड़े ही गर्व के साथ दूसरों के दम पर कूदते हुए अपने आपको धन्य और सौभाग्यशाली मानते हैं।

दूसरों के दम पर कूदना चाहे इन लोगों के लिए प्रतिष्ठा का द्योतक हो लेकिन इंसानियत के लिए यह स्थितियां अच्छी नहीं कही जा सकती। भगवान ने पूर्णता देकर इंसान को धरती पर भेजा हुआ होता है और यहाँ आकर हम लोग दूसरों के सहारे अपनी जिन्दगी की बैलगाड़ी दौड़ाने लगते हैं, यह ईश्वर का सरासर अपमान ही कहा जा सकता है।

हममें से अधिकांश लोग किसी काम-धाम से कहीं जाते हैं अथवा रौब झाड़ने के मौके आते हैं वहाँ दूसरों के दम-खम और उनके नाम का पावन स्मरण कर अपने आपको बहुत कुछ मनवा लिया करते हैं। और जब कहीं किसी कारण से फंस जाते हैं तब भी औरों का नाम ले लेकर रौब झाड़ने लगते हैं।

जीवन में जिस क्षण हम अपनी शक्तियों को भुला कर दूसरों के बलबूते कुछ प्राप्त करने, संरक्षित महसूस करने या कि बचाव करा लेने का प्रयास करते हैं, वह क्षण हमारे स्वाभिमान और इंसानियत के लिए मृत्यु का क्षण ही होता है।

हममें से खूब सारे लोग तो रोजाना औरों के भरोसे जीवनयापन करते हुए समय काटते रहते हैं और जिन्दगी की गाड़ी को दूसरों के धक्कों के सहारे आगे से आगे खिंचते चले जाते हैं।  आज कोई और धक्का दे रहा है, कल कोई और आ जाएगा।

एक बार जब भिखारियों और निर्लज्जों की तरह दूसरों से भीख मांगकर आगे बढ़ते रहने का चलन शुरू हो जाता है तब वह मरते दम तक बना रहता है।  इस स्थिति में औरों के दम पर कूदने वाले लोगों की आत्मा ही मर जाती है और इन लोगों को लगता है कि जिन्दगी मिली ही है तो जैसे-तैसे आगे बढ़ानी ही है, फिर खुद को भुला कर परायों के सहारे ही जीना है तो काहे का स्वाभिमान और काहे के संस्कार।

जो कुछ करना है वह पाने के लिए करना है और इसमें जो कुछ संस्कार, मर्यादाएं और सीमाएं आड़े आती हैं वे हमारे लिए बेकार हैं। हमें अपने कामों से मतलब है और जिन्दगी की गाड़ी को धक्के दे देकर मुकाम तक ले जाने की जरूरत है।

आजकल जेट रफ्तार के जमाने में भी आदमियों का बहुत बड़ा वर्ग किसी धक्का गाड़ी की ही तरह होकर रह गया है जहाँ धक्का लगवाने वाले भी प्रेम से धक्का लगवा रहे हैं और धक्के लगाने वालों की भी कहीं कोई कमी नहीं है।

सारे के सारे लोग फ्री स्टाईल अपना चुके हैं जहाँ एक-दूसरे की वाह वाही करते हुए सभी को आगे चलते चले जाना है। दमदार लोगों के नहीं रहने का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हो रहा है जो किसी न किसी की दुम लगाए घूम रहे हैं।

किसम-किसम की दुमें बाजारों में हैं। जिसे जो पसंद आए लगा लेता है, जी भर जाए तब दुम को उतार फेंक कर दूसरी दुम लगा लेता है। कभी बहुत ज्यादा ही कुछ हो जाए तो अपनी दुम किसी और को ट्रांसफर ही कर देता है।

इन दिनों दुमों का धंधा बहुत ज्यादा चल निकला है। पता नहीं ऎसा क्या हो गया है कि बिना दुम के आदमी में दम ही नहीं आ पा रहा। हर दुम किसी रिमोट कंट्रोल की तरह ही हो गई है।

दुम का मनोविज्ञान भी बड़ा ही अजीब हो चला है। जहाँ दाल न गले वहाँ दुम ढीली और पस्त होकर लटक जाती है और जहाँ मनमानी और मनचाही करने के अवसर हों वहाँ एकदम कड़क होकर धारदार तीखे हथियार के रूप में सामने आ जाती है।

जहाँ सारी अनुकूलताएं हों वहाँ दुम हिला-हिला कर आत्मिक प्रसन्नता का इज़हार अपने आप में सब कुछ बयाँ कर देता है। आखिर कब तक हम परायी दुमों पर इतराते-इठलाते फिरेंगे, कुछ समझ में नहीं आता।

हर आदमी को भगवान ने अकेले के दम पर बहुत कुछ कर देने का माद्दा दिया है लेकिन हम लोग अपने भीतर समाहित शक्तियों से या तो अपरिचित हैं अथवा सब कुछ जानते-बूझते हुए भी आत्महीनता के दौर से गुजरने को विवश हैं।

वर्तमान युग की सबसे बड़ी समस्या यही है। जब तक हम इस हीन भाव को त्यागने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक हमें परायी दुमों से दम तलाशने की मजबूरी बनी रहेगी।  खुद की पहचान बनाएं और अपने भीतर वह ज़ज़्बा पैदा करें कि दुनिया को कुछ दे सकें। वरना हमारा आना और यों ही चले जाना व्यर्थ ही है।

 

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

--

(ऊपर का चित्र - जगदीश बगोरा की कलाकृति)

 

-मनोज कुमार

संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने अपने पंजे फैलाना आरंभ कर दिया और अपनी मनमर्जी से इंटरनेट यूजर्स के लिए दरें तय कर दी। भारत में चूंकि इस तरह का कोई कानून नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार की सख्ती से अभी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। समाज का एक बड़ा वर्ग ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ अर्थात नेट-निरपेक्षता का पक्षधर है अत: बाजार का फिलहाल कब्जा नहीं हो पाया है लेकिन उसने अपने नथुने दिखाना शुरू कर दिया है। ं ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ देश के बहुसंख्यक लोगों के लिए यह शब्द एकदम नया,अबूझ और कुछ विदेशी रंग लिए हुए है।यह मसला पूरी तरह से इंटरनेट की आजादी और बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता पूर्वक इंटरनेट का इस्तेमाल करने देने का मामला है। सामान्य भाषा में कहें तो कोई भी दूरसंचार कम्पनी या सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं कर सकती और न ही किसी खास वेबसाइट को फायदा और न ही किसी वेबसाइट को नुकसान पहुंचाने जैसा कदम उठा सकती है।  ‘नेट न्यूट्रलिटी’ शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर टिम वू ने किया था। ‘नेट न्यूट्रलिटी’ को हम ‘नेट निरपेक्षता’, तटस्थ इंटरनेट या नेट का समान इस्तेमाल भी कह सकते हैं। 

नई तकनीकी ने दूरसंचार कम्पनियों के व्यवसाय को बहुत नुकसान पहुंचाया है। मसलन एसएमएस के जरिये संदेशों का आदान-प्रदान करने की सुविधा को व्हाट्सऐप, स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे तमाम ऐप ने लगभग मुफ्त में देकर कम्पनियों की अकूत कमाई में सेंध लगा दी है। स्काइप के बाद व्हाट्सऐप और इसके जैसी कई इंटरनेट कॉलिंग सेवाओं से देश में और खासकर विदेशी फोन कॉलों पर काफी प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि लम्बी दूरी की अंतरराष्ट्रीय फोनकॉल के लिहाज से इंटरनेट के जरिए फोन करना कहीं अधिक सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि देश में एयरटेल की अगुआई में देश की तमाम दिग्गज दूरसंचार कम्पनियां खुले या छिपेतौर पर गोलबंद होकर व्हाट्सऐप,स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे ऐप के बढ़ते उपयोग को देखते हुए अब वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल यानी वीओआईपी सेवाओं के लिए ग्राहकों से अलग से शुल्क वसूलना चाहती हैं। इसकी शुरुआत भी एयरटेल ने की और एक ही डाटा पैक से नेट सर्फ के लिए अलग शुल्क और वाइस कॉल के लिए अलग शुल्क और एयरटेल जीरो जैसी लुभावनी योजनाओं की घोषणा करके नेट निरपेक्षता पर विवाद खड़ा कर दिया। हालांकि जनता, सरकार और इस बदलाव की जद में आने वाली कम्पनियों के दबाव में फौरीतौर पर इन योजनाओं को वापस ले लिया गया लेकिन ‘नेट निरपेक्षता’ का जिन्न अभी बोतल में बंद नहीं हुआ है। इस मुद्दे से जुड़े अनेक सवाल खड़े हैं और बहस जारी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने का अर्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करना है और इससे कई तरह की समस्याएं सामने आती है जिसमें सत्ता और प्रशासन का निरकुंश हो जाना सबसे पहले होता है. नेट निरपेक्षता को हमारे अपने मुल्क भारत के संदर्भ में देखें तो चिंता स्वाभाविक होने के साथ साथ बड़ी हो जाती है. भारत में साक्षरता का प्रतिशत वैसे भी बहुत उत्साहजनक नहीं है और इंटरनेट के उपयोग करने वालों का प्रतिशत भी बहुत संतोषजनक नहीं है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की संख्या भी अधिक नहीं कही जा सकती है और जब इंटरनेट सेवाओं का अलग अलग प्रभार लेने की स्थिति बनेगी तो भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में गिरावट स्वाभाविक होगी। यह स्थिति भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए चिंताजनक है क्योंकि इस स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपरोक्ष रूप से कुठाराघात होगा.

देखा जाए तो जनसंचार के विविध माध्यमों की तरह इंटरनेट का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। लगभग लगभग तीन दशक पूर्व इंटरनेट का जन्म हुआ और इस तीन दशक में इंटरनेट ने पूरे विश्व में स्वयं को स्थापित कर लिया। इंटरनेट यूं तो जनसंचार का ही एक स्वरूप मान लिया गया है किन्तु वास्तविकता यह है कि इंटरनेट महज एक तकनीक है और इस तकनीक के सहारे जनसंचार को विस्तार मिला है। इंटरनेट के आ जाने के बाद सबसे ज्यादा नुकसान मुद्रित माध्यम को हुआ। भारत सहित पूरी दुनिया में समाचार पत्र और पत्रिकाएं डिजीटल की दुनिया में आ गए. भारत को छोडक़र अन्य देशों में तो कागज पर अखबारों का मुद्रण बंद हो गया है और आने वाले समय में अखबार तो बने रहेंगे लेकिन इसका स्वरूप डिजीटल होगा. रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों के लिए इंटरनेट एक बहुउपयोगी तकनीक साबित हुआ है. सूचनाओं एवं विचारों के विश्वव्यापी आदान-प्रदान के लिए सोशल मीडिया का सर्वोच्च साधन इंटरनेट बना हुआ है. इस स्थिति में नेट निरपेक्षता को समाप्त किया जाता है तो यह समूचे विश्व के लिए घाती कदम होगा.

तीस साल की अल्प अवधि में अपना साम्राज्य फैलाने वाले इंटरनेट पर बाजार की नजर पहले से थी लेकिन शायद वे थोड़ा और समय इंतजार करना चाहते थे. भारत में साजिशन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ की गई किन्तु लगातार विरोध के बाद कदम तो बाजार ने पीछे खींच लिया लेकिन अभी वापस लौटने के मूड में दिखायी नहीं देता है. वैसे इस मामले में अब तक सरकार का कहना है कि इंटरनेट तक पहुंच को लेकर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस मामले पर एक कमेटी भी बनाई है जो जल्दी ही इस मसले पर अपनी राय देगी। इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया आम जनता या नेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों ने दी है। ट्राई को इस बारे में एक लाख से ज्यादा ईमेल भेजे गए हैं। सोशल मीडिया पर भी यह विषय छाया हुआ है। अब सारा दारोमदार सरकारी रपट, ट्राई की भूमिका और इंटरनेट यूजर्स की एकता पर टिका है क्योंकि मसला लाखों-करोड़ों के मुनाफे का है।

वीणा सिन्हा की कविताएँ

image

वीणा सिन्हा की इन कविताओं से गुज़रें तो प्रतीत होता है कि वीणा आज की नारी की पीड़ा, उसके दुःख-दर्द-दैन्य और प्रेम-वात्सल्य को इतनी गहरी द्वन्द्वात्मकता के साथ प्रस्तुत करती हैं कि आज के बहाने स्त्री का ऐतिहासिक क्रम-रूप प्रस्तुत हो जाता है, युगों से चली आ रही समाज व्यवस्था में स्त्री की पीड़ा प्रकट हो जाती है। आज जन्म से पूर्व भ्रूण रूप में या जन्म के बाद बालिकाओं के साथ जो बर्ताव है- वीणा ने गहरे अवसाद के साथ, एक चिकित्सक के मानवीय सरोकार के चलते उसकी अभिव्यक्ति की है जिसमें क्रूर स्थितियों के दबाव में असहाय आम आदमी की लाचारगी प्रकट होती है। कविताएँ सीधी सरल हैं- यही इनका शिल्प भी है जिसमें किसी अतिरिक्त शिल्प की निर्मिति का सर्वथा लोप है। आज जिस तरह स्त्री लेखन के नाम पर जो इकहरा जीवन प्रस्तुत किया जा रहा है-वीणा सिन्हा की कविताएँ उनके बरक्स स्त्री की निगाह से लिखी रचनाओं का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं जिनमें न किसी छद्म वैचारिकता का आग्रह है और न किसी ठस वाद का आतंक। है तो सिर्फ़ सीधा सच्चा जीवन जिसमें विचार की यात्रा प्रारंभ होती है।
वीणा सिन्हा चिकित्सक हैं। जय प्रकाश शासकीय अस्पताल, भोपाल में सीएमओ के पद पर पदस्थ हैं। कविताओं के साथ वीणा ने कहानियाँ और कई उपन्यास लिखे हैं जिनकी भारी प्रशंसा भी हुई है। आप कई पुरस्कारों से भी सम्मानित हैं। आपने अंग्रेज़ी में भी उपन्यास लिखे हैं जो शीघ्रप्रकाश्य हैं।


आग से निकलकर माँ तैरेगी नदी की तलहटी में

1.

आग जला देती है सबकुछ

पवित्र वस्त्र नीली त्वचा

गलते माँस के रेशे

पीला पड़ता रक्त प्रवाह

अस्थियाँ चुपचाप टूटती हैं


माँ तैरती थी तिलक वाड़ी के कुएँ में

फिर बहती रही जीवन दायिनी नदी की तरह

हमेशा सोचती रही दूसरों की भूख और प्यास के बारे में।


कोई हिलाता है रुका हुआ पालना

गालों को थपथपाती हथेलियाँ

पोंछती हैं आसुओं की लक़ीरें।


बीच फाग में गिर गया है पानी

कहीं गिरे हैं ओले भी

आग से निकलकर माँ तैरेगी

नदी की तलहटी में

देखेगी शायद नर्मदा में दीपोत्सव।

भले ही जला देती है आग सबकुछ

फिर भी बचे रहते हैं माँ के सपने


2.

आग की लपटों के बीच

हिलता है तुम्हारा चेहरा

उसे छूना मुमकिन नहीं है

धुएँ के बिस्तर पर किस तरह

लेटी रही चुपचाप

जबकि बग़ैर नींद के बीत गये थे बीसियों बरस

पल भर को डूब जाती है धरती अंधेरे में।


आकाश में दूर तक नाचते हैं अग्निकण

एक साथ चीखते हैं कौए

बच्चा करवट बदलता है बुरे सपने के बाद

अम्बा झरी में चुपचाप सिसकते हैं पीपल के पत्ते।


शाखों से टपकता है अमलतास

कोई मीठा कि़स्सा दूध रोटी जैसा

नरम नरम घी-भात-सा

बादलों के बीच फैलती हैं उसकी बाँहें।


जल गया है सब

बची कुछ गर्म राख़ और अस्थियों के भुरभुरे टुकड़े

धुँधली नहीं होतीं यादें बीतते वक़्त के साथ

क्योंकि मेरी बेटी मेरी उंगली थाम लेती है माँ।


3.

किसी नेक बख्त चेहरे पर

फबती होंगी तुम्हारी आँखें

ज़िन्दगी का सफ़र बदस्तूर जारी है

कोलार नदी में डुबकी लगाती है

आग खाने वाली चिड़िया।

गुड़हल के फूल शोखतरीन हैं

तुम अब भी देखती होगी

बहार का मौसम कलियों से लदी बेल,

हरे होते हुए पत्तों के गुच्छे

जल भरे बादल और नीला आकाश


नंगे सिर चलता हुआ हुजूम है

जहाँ से हट गया है नदी का पानी

वहाँ मछलियाँ छटपटा रही हैं।


कच्चा रेशम बार बार टूटता है

ज़मीन के भीतर गए हुए लोग

नदी के भीतर छोड़ने लगते हैं

पाँवों के निशान


4.

वह भूरी आँखों वाली औरत

ज़िन्दगी की क़ैद से देखती थी

उस पार फैला अंतरिक्ष

मानों एक हाथ की दूरी पर हो सातवाँ नक्षत्र


पाँवों से छूटती नहीं काली मिट्टी

लाल हंडिया से उठता है धुआँ कंडे का

और पानी की जगह गिरती है आग

आसान नहीं है किसी को

पुराने कपड़े उतार नया कमख़्वाब पहनते देखना


गंधक के पीले फूलों पर ओस नहीं ठहरती

काग़ज़ से मढ़ी हुई लालटेन घूमती है हवा में

छोटी नदियाँ मुड़ती हैं बड़ी नदियों में

कहीं तो होगा चश्म-ए-खिज्र

नवें आसमान के अलावा


उसके पास था महीन सूत

डालती थी कपड़े की बुनाई में बाना

पेड़ों के ऊपरी हिस्से में

गुँथी हुई आकाश बेल लगातार झूलती है

पहाड़ों से टकराती हैं हवाएँ

जंगलों में राह भूल जाती है रोशनी

एक साथ रोते हैं गलियों में यतीम बच्चे

फड़फड़ाती है पिंजरे में क़ैद चिड़िया


ज़िन्दगी तक आना और

फिर लौट-लौट जाना

मन्नतों और मुरादों की गांठें बांधना

किसे पता है।


जादू के मकान में रखी

उस तख्ती के बारे में

जिस पर ज़िन्दगी के तिलिस्म

का तोड़ लिखा है।

5.

किसी का नौ दरवाज़ों वाली कोठरी से बाहर निकलना

दरअसल हद से गुज़रना है

जो घटना है आँखों के सामने

उसे उसी तरह समझ लेना मुश्किल है

उससे सरल है किसी से सुनी बात

ज्यों की त्यों दोहरा देना।

फरिश्ते आसमानों के हुकुम सुनाते हैं

ऐलान करते हैं आरामगाहों का

हवा में टंगा हुआ है सलीब

उठे हुए हैं हाथ कि हर दुआ कबूल हो जाए

ख़ून का सिलसिला टूटता नहीं है

हमारे बाद हमारे बच्चे हैं

आदमी के भीतर बहता है झरना

इसीलिए कुछ रिश्तों में पेंच नहीं होते हैं।

एक हांडी रात भर पकती है

पवित्र ग्रंथ का पाठ ख़त्म नहीं होता एक रात में

आग ही आग है

जलते हैं लकड़ी के दोनों सिरे।

कोई घुमाता है उसे चक्र की तरह

ये तो रीमिया है

कीड़े को पाँवों से डोरे की तरह

खींच कर निकालते-निकालते

तैरने लगे कोई खारे पानी की नदी में

मरने के ठीक पहले नीला पड़ता जाए चेहरा

अचानक बरसने लगे बादल

पलभर में सारे दर्द मिट जाएँ

कहीं देखा था सौ पाँखुरियों वाला

प्रदीप्त सुनहरा फूल

अचानक गुम हो गया है।

6.

दरबार चौक और थामेल के बीच

ठहरा हुआ वक़्त उसके हाथों में

हिरण्यवर्ण महाविहार में नहीं खिला कोई फूल

जिस आँख में पानी न हो

उसे नहीं दिखती बागमती

न ही दिखता है आर्यघाट

आठ चेहरेवाले शिवलिंग पर

उड़ेलता है कोई चुल्लू भर पानी

बच्चे के गले में पड़ी मन्नतों वाली हँसली टूटती है

पाँवों के नीचे बह जाती है

पिघली हुई आग

आसमान के चक्कर काटती चील

नीचे उतरती है तेज़ी से

बहुत शोर है पहाड़ की तराई में

देखते रहे हैं उम्र भर चाँद

एक चाँद यह भी सूखी घास पर

सिर पटकता हुआ।

कोई बता गया कि मलकूत में

रहा करते हैं फरिश्ते

पर बिना कुछ देखे कैसे

पहुँचा जा सकता है बात की तह तक।

अब उस वक़्त को आज़ाद कर दो

जो तुम्हारी मुठ्ठी में क़ैद था माँ!

7.

वक़्ते मौत तक उम्मीदें

कि कुछ रिश्ते बचे रहेंगे

रात को पीठ देते ही

आसमानों से उतरती दिखती है धूप

पहाड़ों के रास्ते


यक़ीनन कोई निगहबान है

जिसने भर दी है कुछ

आँखों में ऐसी मलाहत कि

देखने वालों के दिल में लहरा उठे

मोहब्बत का दरिया


जिसे चाहे वह बख्श देता है

आसमान और ज़मीन के

ख़जानों की कुंजियाँ

सात आसमानों के बीच

टांग देता है सूरज का चिराग़

धूप में इस कदर चमकती है रेत

कि प्यासा उसे पानी समझकर

भागता चला जाता है।


यह तो नसीहत ही है

सारे जहान के लिए

कि जब भी देखो

चौथे आसमान में चाँद

तभी कह दो कि

सिवा मोहब्बत के कोई दीन कुबूल नहीं है।

आसमान में उड़ता है अजदहा

1.

कई बार नज़रों के सामने होते हुए भी

नज़र नहीं आती जन्नत

फिर भी यह कहा जा सकता है

कि गुज़र गया है कोई हवाओं से

और खोल गया है जुबां की गिरह

सुबह से घुटनों के बल खड़े लोग

शायद सुनते भी होंगे हवाओं में

उड़ता नाम और देखते होंगे

रोशन लक़ीरें

जो कुछ हमारे दर्मियान है

उसे जानने के लिये चाहिए

निहायत पाक और साफ़ रोशनी

पर यहाँ न तो आवाज़ है न रोशनी

जलाई जाती है अजीम आग

जिसकी तपिश में जल जाते हैं

हवा में परवाज करते परिंदे

कतार बांध कर जा रहे हैं लोग

उनके हाथ बंधे हैं गर्दनों से

आतिशी लिबास पहने हुए है एक शख्स

कोई चीख कर कहता है कि

फना होने वाली है यहाँ की हर चीज़

आग भूनेगी इस कदर

कि ओठ सिकुड़ कर सिर तक चला जाये

कुछ भी कहो मुर्दे सुनाए नहीं सुनते।

आसमान में उड़ता है अजदहा

यारब अजीब हाल है

सजदे में झुके हुए हैं सर

करते हैं फरियाद

वे नहीं सुनना चाहते

अब तक सुनी आवाज़ों में

सबसे खौफनाक आवाज़

जो आख़िरी साँस के साथ

आदमी के सीने से निकलती है।

2.

ज़न्नती ज़न्नत में दाखिल होंगे

हस्बे मर्जी परिन्द खायेंगे

देखेंगे हूरों की गर्दनों में सजे

याकूती हारों का नूर

और थामेंगे उनके मोती जैसे चेहरे

जिन्हें न तो टटोला था हवा ने

न ही छुआ था धूप ने

बेशक लदे होंगे मीठे फलों से

फुनगियों तक दरख़्त।


भला कौन बतायेगा इस तरह

कि जो भी उगता है ज़मीन से वह

ज्यों का त्यों लौट जाता है

ज़मीन में

कुछ उन लोगों के बयान जो

गुज़रे हैं हमसे पहले

जिनमें कायम है कायनात

और उन पर असर भी नहीं होता

गुज़रते वक़्त का


गुनाहों को धो देने वाली किताबें उतरती हैं।

जिस तरह पानी धो डालता है मैल

वैसे ही वे धोती हैं गुनाह

क्या यह सच है मेरे मौला

कि गुनहगार गुनाह करते जायें

और खुलते जायें

ज़न्नत के दरवाज़े उनके लिए भी।


बेटियाँ सोखती हैं माँओं के आँसू

सड़कों पर भागती मौत

दरवाज़े पर दस्तक देती है

खोलता है कोई आकाश के झरोखे

पृथ्वी के छोर से सुनाई देती नहीं

लगातार रोने की ध्वनि


यह सच है पत्थर तराश कर

बनाये गये हैं बुत

पर वे अचानक झपकाते हैं आँखें

जब अपनी बेटियों के जन्मने पर

हम गाने लगते हैं विलाप गीत

परमेश्वर के पहाड़ पर

पलीश्तियों की चौकी

उतरता है नबियों का दल

डफ, सितार और बांसुरी लिए

हर चौराहे पर बनी हैं वेदियाँ

गूंजती हैं मंत्र ध्वनियाँ।


किससे पूछा जाए यहाँ कि

कौन उठा सकता है पृथ्वी के इस पार से कोहरा

बंधे हुए हैं हाथ

और पाँवों में खनकती हैं बेड़ियाँ


दिया जला कर खाट के नीचे रखा है

जिसकी कोख से चलती है दुनिया

भला कैसे निर्वंश कहलायेगा

उसका पिता


नामिब का रेतीला फैलाव

मिलता है समुद्र की ठंडी धार से

जिस जगह

वहाँ उछलती है हज़ारों सील मछलियाँ

मानों पीना चाहती हों रेत का ताप

जैसे बेटियाँ

सोखती हैं माँओं के आँसू

और कुनबों का श्राप


सबसे छोटी चूड़ियाँ

बिना लपट का काला धुंआ

बड़ा गहरा है

किससे पूछें कि बीजों की ख़ातिर

किसने बनाये बिछौने


बेटियों का होना इस कदर

नागवार है लोगों को

कि ढूँढना पड़ती हैं बेटियाँ

धुंआ ही नहीं सन्नाटा भी है

आवाज़ नहीं है पायल की

बरसों से नहीं बिक रही हैं

सबसे छोटी चूड़ियाँ

लगता है कभी भी जलने लगेंगे

धरती, जंगल, दरिया

और पहाड़

फैलती जायेगी बिना धुँए वाली

अजीम आग

कब्रों से बाहर आयेंगे लोग

कौन सी नियामत झुठला दी जाएँ

शायद फट पड़े आसमान और

झरने लगें गुलाब के फूलों-सी बेटियों


कोई घसीटता है बेटियों को

पीठ के पीछे से लाकर

मिला देता है पाँव पेशानी से


हम मर जायें और हड्डियाँ

मिट्टी हो जायें

इससे पूरा नहीं होता फर्ज

पूछ लें आसमानों से

कि किस तरह घर में जन्मी हैं बेटियाँ


और कह दें हवाओं से कि

पहुँचा आयें हमारी दुआएँ उन तक

जुल्म और तारीकी से भरी हुई है दुनिया

धुआँ बाहर नहीं निकलता

और भीतर नहीं आती रोशनी

हमारी हदों में क्या हम सुन पायेंगे

उनकी खनकती हँसी?


जिस वक़्त उजाले नहीं होते हामिला

बेटियों के चेहरे थे

उतरे थे फरिश्ते आसमान से

कोई लड़की हो सकती है अल्लाह की अता

पर हर बेटी नहीं होती हजरत मरियम

जिसे ज़माने भर की औरतों में से चुन लेता है रब

और जो बढ़ती है एक दिन में साल भर की उम्र जितना

नसीब होते हैं उसे बेफसल मेवे

और नहीं पिलाया जाता उन्हें

औरत का दूध

जिसमें बाईं ओर उगता चाँद

और दाहिनी ओर होता है सूरज

वैसे तो हर लड़की अपने ज़माने

की औरतों में होती है

किसी न किसी लम्हे में

सबसे अज्मल और अफजल

फिर भी उनके हामिला होने पर

न कोई करता है सज्दे

न बन्दगी

न कोई गढ़ता है मिट्टी का परिंद

न ही फूँकता है जान कि वे

उड़ जाये आसमान में

अजीबतर परिन्द है चमगादड़

वह हँसती है

दाँत रखती है

अण्डे नहीं बच्चे जनती है

और उन्हें पिलाती भी है

अपनी छातियों से दूध

किसी अँधेरे में

भले ही कोई जानता जाये दिलों की बातें

पर फरिश्ते बुलाये नहीं आते

जिस वक़्त उजाले नहीं होते हामिला बेटियों के चेहरे थे।

ज़िन्दगी में डूबना चाहती थीं बेटियाँ

देखिए वे लड़कियाँ अभी ताज़ा हैं

हिरनी सी उमंग है उनमें

और निखरी हैं चांदनी सी

वे एच आई वी निगेटिव हैं।

उनके अपने फिसलते है ढलान पर

उन्हें मिलेंगे एक हज़ार डालर

समंदर में भर जाएगी रेत

उजाड़ हो जायेंगे गाँव के खेत

कुछ दिन तो चल जाएंगी लड़कियाँ ब्राथेल

खूब नाचेंगी

समेटेंगी दोनों हाथों से बख्शीश

शैतान बिल्ली बैठी है रोशनदान में।


लड़कियाँ देखेंगी रंगीनियाँ

उनका मतलब समझने के पहले


वक़्त उड़ा पाए उनकी यादों में

नदी का संगीत और )तुओं की महक

इसके पहले ही उनकी जाँघों पर

बहने लगता है जलता हुआ

दही जैसा स्राव


लड़कियों का नाम कुछ भी रहा हो

तेज़ बुखार में एक बार लेट जाए

तो फेक दी जाती हैं लत्ते सी

फिर नहीं चूमता कोई तपते ओठों को

वे जानती हैं अब पिघलेगा

साँचे में ढला उनका मोम जैसा तन

ज़िन्दगी में डूबना चाहती थीं बेटियाँ

वे कहते हैं डिस्पोजेबल पीपुल्स

कोई छाँह नहीं उनके जख्मों के लिए


तुम्हारे साथ थिरकेंगे ख़ून से

लथपथ बारह सौ क़दम

बेटी, सजाना है तुमको

तरुण टहलियानी के

जड़ाऊ डिजाइनर लहंगे से

तो ख़त्म करना होगा

छः सौ बेटियों को

जो जानती नहीं पूरी तरह

हमारी दुनिया के बारे में

बस चुपचाप हिलती डुलती हैं

माँ की कोख में

तेरा लहंगा ख़ूबसूरत होगा

हीरे मोतियों और सूर्यकांत मणियों से सजा

तुम नाचो,

तुम्हारे साथ थिरकेंगे

ख़ून से लथपथ बारह सौ क़दम

तुम गाओ

तुम्हारे स्वर में घुलेंगे छः सौ सुर

बस तुम रोना मत

तुम्हारे साथ रोने लगेंगी

छः सौ बेटियाँ।

डूब जायेगी धरती और

हमारी दुनिया आँसुओं के दरिया में।

हमारी तिजोरियों में ख़ून के

कलदार दरवाज़े खुले रहेंगे

दाइयों के पास क्यों जाते हैं आप

वे आपकी बेटियों को नमक चटाएंगी

मुँह में रूई ठूस देंगी

कहो रख दें बच्ची के

सीने पर खाट का पाँव

डुबो दें दूध में

क्या भरोसा दबा दें मुँह

और आपको दिखने लगें ऐंठते पाँव

आप हैं

शैम्बल्स आपके लिए नहीं

सदन के कसाईबाड़ों को ना कहिए

डॉ. टेम्बल ग्रांडिन ख़्याल रखती हैं

पशुओं के मृत्यु पूर्व स्ट्रेस का

उनकी मनःस्थिति का

और बना भी दिए हैं

लम्बे घुमावदार रास्ते

जिन पर जानवर पीछे खड़े

साथियों को आख़िरी दम तक देख सकते हैं।

कैटल होल्डिंग पेन्स में

उजली आँखों वाले

पशुशावक

उनका मिमियाना माँएँ सुनती नहीं हैं

न वे जानती हैं कि अब कटने वाला है उनके बच्चों का सिर

बाज़ारों में डिब्बा बंद गोश

बोतल बंद ख़ून

और झोलियों में सिक्के

हमारे दरवाज़ों पर क़तारें

पेट में छुपी लड़कियों को

ढूँढ़ती हैं भूखी नज़रों से

माँएँ, दादियाँ और नानियाँ

जब तक कोख में बेटियाँ हैं

और बेटियों से नफरत है माँओं को

हमारी तिजोरियों में ख़ून के कलदार

और दरवाज़े खुले रहेंगे

आपकी ख़ातिर


आसमानों में बेटियों का ठिकाना

आदमी बनायेगा कुतुब मीनार

खेलेगा मल्लखंम

भांजेगा अखाड़ों में नये पैतरे

काम चला लेगा सोडोमी से

आगे एक अंधा कुआं

असह्य दुर्गंध से भरा

वहाँ वीर्य की बूंदों से

नहीं गढ़े जायेंगे भविष्य

न ही बनायेगा कोई

ताजमहल

बग़ैर बेटियों के दुनिया में

स्वांग भरेंगे लड़के और पूछेंगे

आसमानों से बेटियों का ठिकाना


क्या हैं निशानियाँ बेटियों की

न खिलखिलाहटें न लोरियाँ

न ही वृंदावन में जुगल किशोर की

राह तकती हैं गोपियाँ

भूल गये हैं उबटन की गंध

चूल्हों में जलती है आग

आग पर जलतीं रोटियाँ

और रोटियों का धुआँ

क्या है निशानियाँ बेटियों की

जगह जगह से चटखी रातें

धूल भरी आंधियाँ

जिन के साये में सोते थे चैन से

वे साये नहीं हैं

ओस में उठायें यमुना जल तो

ख़ून से सन जाते हैं हाथ

बिना बाती के दियों से कब तक

उतारी जाये आरती

जो जा चुकी हमारी दुनिया से

उन्हें कौन लायेगा वापस

कौन सा पैगाम पढ़ते ही

सुनते ही लौट आयें बेटियाँ।


शायद लौट आए माँ प्रसव गंध में सनी हुई

लौट कर नहीं आती साँस

पिता देखते हैं उस दिशा में

जहाँ से बिछुड़ी थी माँ

खो गई थी दो जन्मों के बीच कैसे

अंतराल में


माँ के साथ ही है धरती आग हवा और पानी

परिवार के बीच संधियों को

सफ़ाई से जोड़ती उसकी और

लम्बी फेहरिस्त है उसके दिए शब्दों की

और उनका कोई विकल्प भी नहीं है


वर्तमान से अतीत में जाना और

बार बार वापस लौटना

माँ के शरीर पर घाव है

जिनकी गहराई उसकी आँखों में

पढ़ी जा सकती है

झाँकती हैं कहीं-कहीं हड्डियाँ

जिन पर लिपटी है दर्द की पूरी इबारत

अंतिम बार हिला था माँ का आँचल

जिसने हमेशा टोका था

धूल भरी गर्म आंधियों को

माँ के सीने में अब नहीं धड़कता

ख़ून फेकने वाला पम्प

नासापुटों में भरी है

उसके दूधों की मोहिनी महक

और कानों में गूँजती है उसकी आवाज़

संगीत की तरह


शायद लौट आये माँ

प्रसव गंध में सनी हुई

नई काया के साथ

वापस धरती पर

या कौन जाने वहीं बस जाए

फरिश्तों के साथ

रोशनी फैलाते हुए


दुनिया से ग़ायब होकर कहाँ मिलोगी बेटियों!

हमारी पकड़ से बचती रहना

हमारी पकड़ में पाप है।

तुम छटपटाओ

दम तोड़ दो

बच जाओ तो

हम पहना सकते हैं

तुम्हारे नन्हें पाँवों में

लोहे के जूते

सूखे ओठों पर

जीभ फेरती

देखती हो।

माँ के दूध की धार

दुखांत कथा की नायिकाओ

पी क्यों नहीं जातीं

समुन्द्र का जल

सोती होगी

तुम्हारे गर्भ में

अनागत सभ्यताएँ

कैसे लपटों में जलता है देशकाल

हमने ज्वालामुखियों के मुहानों

में सिर डाल दिए हैं

इस दुनिया से ग़ायब

होकर फिर कहाँ मिलोगी

बेटियो?


हम काम नहीं आए अपनी बेटियों के

सपनों का क्या मतलब है

सोनागाछी में

सड़कें गीली हैं

रात में उनका रंग दिखता भी नहीं


हवाएँ उभारती हैं नया बादल

चर्चगेट के आसमान में

मुर्दा शहर की छतों पर

बादलों का सुबकना


सख़्त अजाब है

हमने सुना तो था

पर माना नहीं

जब आग में पकने लगीं खालें

रास्ता भी नहीं?


यह कैसा फ़ज्ल है

सोने के कंगन और मोतियों से सजे

हमारे जिस्मों पर रेशमी कमख़्वाब हैं

और हम काम नहीं आये

अपनी बेटियों के


यहाँ कोई मादा अब बच्चे नहीं देगी

बेशक बनाए जाएँगे जोड़े

यह आसान है

कोई पानी मीठा हो या खारा

पर उनसे निकाली जाती है

बढ़िया मछलियाँ

दरिया से होते हुए मछलियाँ

चली जाती हैं समंदर में


तिजारत में आठ सौ परसेंट मुनाफा

मछलियाँ पानी में ही उछलती हैं

ऊपर वाले मेहरबान तो

दिन घटते जाते हैं लगातार

और रात सरेशाम गहरी हो आती है

झड़ने से बचे जो पत्ते

कब तक टिके रहेंगे डालों पर


उन्हें आँखें कैसे कहें

मिदान तहरिर में बहुत शोर है

कौन रोया तूतनखामन

कहना मुश्किल है

उतार दिए जायें सोने के जूते

मुकुट और सोने का मुखौटा

क्या तब भी हाथ रखेगी रानी

फराओं के कंधे पर


किसे पता होता है कि जिस जगह

खड़े हैं आप वहां

इतिहास रचा जा रहा है

इतिहास में शामिल होने का

मतलब है

खौफनाक मौसम को करीब से देखना

तूफानों की आवाज़ सुनना सहरा के साथ-साथ

हवाओं का मिज़ाज बदलते देखना


हवाएँ भला किसका हुक्म मानती हैं

दिल करे तो उकेर लाती हैं

समदंर की तलहटी से जवाहर

अल्मा अता के सब्ज ख़्वाब

फरिश्ते बेकार नहीं उतरते धरती पर

औरतों को सौंपे जाते हैं

उनके गर्भाशय

जिन पर ताले लगे हैं

चाबियाँ या तो मिलेंगी

धरती की तहों में

या कि दरख़्तों की फुनगियों पर

नील के पानी में आग बसती है

बाँस की टोकरियों में बहते हैं बच्चे

औरतें चेहरों से नकाब नहीं उठातीं

उन्हें आँखें कैसे कहें

जिनसे दिखता नहीं है।


अंधेरा उलीचतीं बेटियाँ

बात उनकी है

जिनका सफर अँधेरों से शुरू होता है

ये लगातार जागती हैं

दिन में जगाता है सूरज

सपनों की खोजवन्ती लेकर

वे लगातार तैरती हैं नींद की नदी में

सपनों का प्रकाश फूटता है

उनकी देह से

और गूंजती हैं सैकड़ों घंटियाँ

पीले और लाल फूलों से ढँकी

शाखों पर

खिलखिलता है बसंत

जो कभी बीतता नहीं है


उनकी फैली पुतलियों पर

प्रार्थनाएँ हैं प्रखर धूप की

हरी फुनगी की


और वे लगातार उलीचती हैं

अंधेरे हमारी दुनिया से

उनकी आँखों से गिरती हैं

लाख-लाख धाराएँ

मानों धो डालेंगी अंधेरे

और उजियार देंगी हर दहलीज

माँ की शगुन दृष्टि

1.

ठहरो, अभी माँ उसे चूम रही है

बेटी की मुँदी पलकों पर

अटकी है माँ की शगुन दृष्टि

छलकती है दूध की नदी

घुलने लगती है चाँदनी

हवाएँ पूछती हैं मौसम का मिज़ाज

ज़िन्दगी का काफिला

रोशनी के बुर्ज तक

नहीं पहुँचता बग़ैर दुआओं के।


2.

मेरी बेटी

तेरी ख़ातिर रची है दुनिया

जहाँ आसमान में

बादलों के संग इन्द्रधनुष नाचते हैं

धरती की कोख में छुपे हैं अनगिनत रंग

सूखे बीजों में भी

गुनगुनाती है फूलों की गंध

चाहो तो परिंदों से पूछ लो

इस धरती के हर रिश्ते पर

तुम्हारा हक़ है बिटिया।


3.

देखो मेरी बेटी का चेहरा

किसी पवित्र ग्रंथ से भी पवित्र

उसके क़दमों से धरती की बरकत

हवायें गुनगुनाएंगी अब

पंछियों के गुमशुदा गीत

और पूछेंगी सबसे

बेटी वाले घरों का पता।

4.

बेटियों के बहाने

लहराता है दरिया हमारे भीतर

इन्हें वे ही समझते हैं

जिन्होंने ओढ़ी है उम्र भर

रिश्तों की चादर

आओ देखो मुझे मेरी माँ की आँखों से

रेगिस्तान में भी उफन पड़े

हरा समंदर।


5.

तकलीफदेह वक़्त में भी

पूरे इत्मीनान से

बग़ैर खोए अपनी पहचान

बेटी बनी रहती है अपने ही जैसी


नर्मदा के घाट पर

जब क्षितिज था कुछ हरा कुछ नीला

उसी वक़्त लहरों से

लड़ते हुए

वह याद दिलाती रही कि

समुद्र क़ायम है धरती पर

और ढल भी जाये सूरज

तो सूरज, सूरज ही रहता है


बेटी रख देती है धूप हमारी चौखट पर

ताकि दूर तक रास्ते पर रोशनी

जागती रहे

और नज़र आता रहे सब कुछ

एकदम साफ़

वह प्रार्थना करती है

ताकि बनी रहे वक़्त को हराने की हिम्मत

हरियाती रहे धरती

और मिट सके दुनिया के

चेहरे से उदासी

6.

वह गुज़रती है जिस ओर से

रंग उसे घेर लेते हैं

लक़ीरों को दुलरा कर वह

फैला देती है सफे़द काग़ज़ पर

और अगले ही पल

वे लक़ीरें

रंगबिरंगी तितलियों की तरह

मँडराने लगती हैं।


जब भी गुमसुम होते हैं लम्हें

वह खोल देती है खिड़कियाँ

फिर चले आते हैं

पंछी, दरख़्त, बाग़, दरिया

और आसमान अपने आप

एक करिश्में की तरह

पृथ्वी के छोर से सुनाई पड़ती है

मंगल ध्वनियाँ

जब भी हँस देती है बेटी


बौरी

बड़वारा के ट्रक अड्डे पर

रूखी लटें चबाती

दबे पाँव लंगड़ाती, मचकती, आती है बौरी


चुभलाती है सूखी रोटी

सुड़कती है चाय

और फिक्क से हँसती है जवान होती बौरी


चिचियाती खाट पर पथरीली ज़मीन पर

ट्रक की सीटों पर लोहे के पट्टों पर

टायर के बिस्तर पर

रात-रात पौरुष की आग में बरती है बौरी


भीदती है

छीदती है

बिलखती है

फिर छूट कर फिक्क से हँसती है बौरी


दर्द से चीखती जार-जार रोती

तड़प कर खींचती है

कोख से मरे हुए बच्चे को

लोटती हुई बौरी


थाली में लाश सजा आँवले को चूसती

ख़ून भरी पीक

हमारे मुँह पर सरेआम थूकती है बौरी


नहीं बन पाई है लड़कियों के स्कूल जाने वाली राह

1.

आँखें मूंद लेती हैं पर्वतों की ऊँची चोटियाँ

काबुल की सड़कों पर गूँजती हैं

पीठ और पैरों पर कोड़े खाती

दो सौ पच्चीस औरतों की दर्दनाक चीख़ें


उन्हें कौन रोकेगा भला

उनके पास बंदूक है ताक़त है

विजय का पर्व है वे बना सकते हैं

हेरात में फ्रीडम गार्डन

जहाँ आज़ादी है उन्हें

औरतों को बकरियों की तरह घसीटने की


वहीं कहीं मारी जाती हैं

नादियाँ अंजुमन कालीन के

बदले कविताएँ बुनने के जुर्म में


खिड़कियों पर लटके हैं काले परदे

सूरज नहीं देख सकता

उनकी कलाई की बैंगनी चूड़ियाँ

न ही हवाएँ सुन सकती हैं

उनकी सुनहरी हँसी

पच्चीस बरसों की लड़ाई के बदनुमा दागों से

भरी हुई जेल की

दीवारों के भीतर

ज़िन्दगी अब भी बदतर है

कोई रास्ता नहीं है

सिवाय चट्टानों को पार करने के


औरतों के हिस्से की कोठरी है

अंधेरे कारीडोर में बूंद-बूंद टपकता है पानी

पेशाब की तीखी गंध के बीच

उन्होंने मुस्कुराना सीखा है


धकधकाता है पुराना जनरेटर

जलते बुझते बल्ब से फूटता है

नारंगी प्रकाश वर्तुल जो

चटकी दीवारों पर ढालता है विऔत परछाइयाँ


कोई बना लेगा नया शहर

गढ़ लेगा नई इमारतें

पर कौन बचायेगा सात बरस की सामिया को

बलात्कारी पिता के कुकर्मों का

हिसाब चुकाने से


अभी नहीं आया पहाड़ की तलहटी में

जूड़ा के फूल खिलने का मौसम

क्योंकि बन नहीं पाई है लड़कियों

के स्कूल तक जाने वाली राह

और पहाड़ों की चोटी पर

अभी भी चमक रही है बफर्‍


2.

जो मारे जा चुके हैं सुबह

कंधार या कुंदुस में

उनकी रूहें रात गये

भटकती हैं मजारे शरीफ के खण्डहरों में

भले ख़त्म हो जाए क़लम की स्याही

बाक़ी इबारत यहाँ

इंसानी ख़ून से पूरी की जा सकती है


सोने का वक़्त अभी

मुकर्रर नहीं हुआ

अंधेरों में गूंजते हैं

डेजी कटर के धमाके और

झुलसी हुई धरती की कराहें


बुरका ओढ़ा देने से

छुपाई नहीं जा सकती

सताई गई भूखी औरतों की चिल्लाहटें

वे बता सकती हैं कि

किस तरह उसने अपनी

औलाद के जिस्मानी टुकड़ों में

ख़ुद का ख़ून बहते देखा है


बेशक वे भूल गई हैं

जवानी में गाये हुए गीतों को

पर वे बता सकती हैं

कि सामने पड़ी लाशों के ढेर में

उसके मर्द का हाथ कौन-सा है


धरती से आसमान की ओर लपकती है

धारदार आग

मरते हुए सैनिक की आँखों से नहीं हटते

जिस्म से जुदा हिना से सजी हथेलियाँ और

एकटक निहारते मुर्दा बच्चे


हम देख पायें या न देख पायें

आसमान सब देखता है

और धरती सब समझती है


एक बात तय है

चाँद पर चलने के लिए जरूरी है

नदियों को बहते हुए देखना

पहाड़ों पर सूरज को चढ़ते उतरते देखना

बर्फ़ को पिघल कर बूंद-बूंद टपकते देखना

जंगली फूलों के बीच बच्चों को खिलते हुए देखना

और सन्नाटें के बीच

एक ताज़ा बच्चे को

पहली बार रोते हुए देखना


जरूरी है चाँद पर

चलने से पहले


3.

मालालाई वाट के चौराहे पर

अब नहीं दिखाई पड़ता कोई ऊँचा

अखरोट का दरख़त

आँखों में किटकिटाती है

एकदम महीन धूल


वजीर अकबर ख़ान में चीनी रेस्त्राँ

किसी ने जन्नत का रास्ता

काबुल से होते हुए चुना था

तजुर्बा धूप का हो पानी का हो

या एकदम ठंडी हवा का

धरती की छाती पर उगने वाले

हर बूटे से होकर वह छूता है


बंद दरवाजों के पार दूर कहीं

बीबी मातो और काबुल नदी की

पतली धार के किनारे

खेलते अधनंगे बच्चे

भेड़ों के झुण्ड, कुत्तों की लड़ाइयाँ और पतंगबाजी


रूबाब बजता है अभी भी मेरे भीतर

तुम पढ़ सकते हो

ओठों पर लिखा हर एक हिज्जा

रख सकते हो अपनी सांसें

ताकि जब जी चाहे तब

उसे दोहरा सकूँ तुम्हारे साथ

4.

मौसम खुश रहे या उदास

फूलों को खिलना पड़ता है


भले ही बरसों से न गिना गया हो

इंसानों को उस मुल्क में

पटी पड़ी हो ज़मीन बारूदी सुरंगों से

सियाह सिरों वाली बिना चेहरे की औरत

आहिस्ता आहिस्ता चलती जा रही हो

किसी घर में या कि क़ब्र में


क़ब्र के भीतर भी बदहवास हैं मुर्दे

अक्सर डोलती है धरती

फूलों की बातें सुनना फिर उनसे

अपने दिल की कहना

बीच बसंत में अचानक हो जाए बारिश

फूलों के बगीचे में बिखर जाए पुदीने की गंध

मुर्दे सिर उठाते हैं और टकराते हैं अंधेरों से


बच्चों को चाहिए थी ज़िन्दगी

चित्रित किताबें, कापियाँ

क़लम और रंग भरे सपने

आसमान गिराता है उनके लिए

एक सी रंगीन पन्नियों में

लिपटे खाने के पैकेट और क्लस्टर बम


गर्म हवाओं और बफर्‍बारी के बीच

अब भी लहलहाती है अफीम की फसल

आज़ाद घूमता है आकाश में शिकारी बाज

फिर भी बच्चे खेलते हैं

मिट्टी की छत पर कबूतरों के साथ


भले ही जानता हो आदमी कि

दुनिया में जीतता नहीं है प्रतिशोध

और नूरिस्तान में नहीं रहा अब खुदाई नूर

फिर भी वह गा नहीं सकता

जुलेखा और जोसेफ के प्रेमगीत

कितनी भी लम्बी हो

जीनी पड़ती है अपने हिस्से की ज़िन्दगी

क्योंकि सूरज तो निकलता ही है

कभी न कभी भले ही कोहरा घना हो

दरख़्त पर लटकी है तलवार

मुनकिरों के लिए सजाए हैं

औरतों से सोहबत करो तो

पाक मिट्टी से तयम्मुम करो

अपने मुँह और हाथ मसह करो

औरतों की तो दुनिया में रुसवाई

और आखिरत में बढ़ी है दोजख

हमल गिन कर कत्ल करते जाएँ

जो बचें उन्हें तम्बाकू या नमक चटाएँ

या फिर एक हाथ और पाँव काट कर

ढाँक दें उनके चेहरे

और रुखसत कर दें

एक अंधेरे से दूसरे अंधेरे में

बेटियाँ के आंसुओं से ही

जारी होते हैं पत्थरों से चश्में

और उनके क़दमों से बनती है

दरिया में राह

जिस ज़माने में मकबूल हुआ करती थी कुरबानियाँ

आसमान से उतरती थी एक आग

उन्हें उठाने की ख़ातिर

क्या करें हम अपनी बेटियों की लाशों का

कैसे कबूल होंगी कुरबानियाँ

वे गुलरूख हसीनाएँ अब तो

डरती हैं हमारे ख़्वाबों में आने से भी

देखना चाहता स्त्री को सिर्फ़ स्त्री की तरह

जिस वक़्त पृथ्वी हरी थी और आसमान था नीला

जितना कि उसे होना चाहिए था

उस वक़्त देखना चाहा एक स्त्री को सिफर्‍ स्त्री की तरह

पर ऐसा हुआ नहीं

कुछ चुप थीं झुकी हुई थीं उनकी आँखें

पिता, पति, पुत्र ही नहीं दादियों और माँओं की

असंख्य छायाओं में छुपी स्त्रियों की नींदों को नसीब नहीं थे सपने

वे कुछ भी नहीं कहती थीं प्रेम के बारे में

जब समुद्र में लहरें इठला रही हैं

और नई फुनगी पर सतरंगी चिड़िया चहक रही है

उस वक़्त तलाश जारी है उस औरत की

जो बता सके आँखें खोल कर

कि उसके पोर पोर में बसता है प्रेम

और बिना किसी शिकंजे के भी उतनी ख़ूबसूरत है उसकी देह

जितना कि पूरे खिले फूल को होना चाहिए

दरवाज़ों से निकल आईं औरतें

देह को अलगनी पर

टांग कर

दरवाज़ों से

निकल आईं औरतें


अब तक सि( हुए

तमाम पौरुषीय प्रमेयों को

उलट, पुलट,

गई हैं।

बिना देहवाली औरतें

बिना देह वाली औरतें

छीन लेती हैं अपना हक़

घसीट लाती हैं

वक़्त की दुकान से

जिंदा पल,

चुपचाप सांस लेती हैं

पत्तों की तरह

और

खिलना भी जानती हैं

भरपूर फूलों की तरह

अगवा हुईं बेटियाँ

अगवा हुईं बेटियाँ

बिखेर दी जाती हैं गलियों में

और पूरी दुनिया ही बन जाती है

सोनागाछी

वक़्त की चट्टानों के बीच मिलते हैं

दूधिया हँसी और

नन्हीं सिसकियों के जीवाश्म

ख़ून और वीर्य से सने चेहरों की भीड़ में

रिश्तों की तलाश करती जाती हैं

पाँच साल की उम्र में

अगवा हुईं बेटियाँ

आँखें खोल लो तुम

तुम्हारी माँ को भी याद नहीं

कि किस साइत में

जन्मी थीं तुम

कि धूप ने कब तुम्हारी

त्वचा

को झुलसा दिया,

कि कौन तुम्हारी

नसों में बहते ख़ून को निचोड़कर

धधकती आग भर गया

तुम्हारी आँखों का पानी

तुम्हारी माँ के आँसुओं की तरह वाष्पित हो जाये

इसके पहले हटा दो उन क्रूर हाथों को

जो तुम्हारी छातियों के साथ

तुम्हारी गर्दन पर भी अपने निशान छोड़ने लगे हैं

मस्तिष्क में चक्कर काटते

असंख्य विचारों की ऊर्जा

संस्कार पी जाये

उसके पहले ही आँखें खोल लो

ताकि तुम्हारे भीतर बहती आग को

फैलने की राह मिल जाये।

वह जो नहीं है बार्बी डॉल

बार्बी डॉल-सी

कभी नहीं रही उसकी टांगें


कछौटा लगाकर

टखनों तक कीचड़ पानी में

परहा लगाते

उसने कभी नहीं उखाड़े

टांगों पर उगे भूरे काले रोम


न ही फटी हुई एड़ियोें

पर जमा मजबूत शरीर

कभी हवा के

मामूली झोंकों से हिला


उसने कोशिश भी नहीं की

कमर पर झूल आई चरबी को शरमा कर

ढाँकने की


अलबत्ता

गोद में पड़ी बेटी को

आराम से दूध पिलाते हुए वह हँसी

और बेटी को कस कर चूम लिया


लकड़ी के कठघरे में खड़ी थी लड़की

रूखे बिखरे बाल

और फटी हुई आँखों से

सामने खड़े आदमी को पहचानने की

कोशिश करती लड़की

वह क्यों बीनती थी

कचरा?

कौन होता था

उसके साथ?

उसकी

मटमैली फ्रॉक पहले से फटी थी

या फाड़ी गई थी?


उसकी छातियों को

किसने नोचा था?


जांघ की खरोंचें

गिरने से तो नहीं आई थीं?


उसे एकाएक याद

आया था

भेदता हुआ दर्द, अपनी ही चीख,

और आँसुओं की धुंध में ग़ायब होता चेहरा


लकड़ी के कठघरे में खड़ी थी लड़की

उसने उंगली उठा दी थी

जिसकी सीध में दुनिया के तमाम

आदमी ही नहीं

सारी औरतें भी थीं


प्रेम का दुर्निवार ज्वार

आज तक वह किसी भी औरत से

उस तरह प्यार नहीं कर पाया

जैसा वह करना चाहता है


दरअसल वह जब भी बालों में हाथ फेरना शुरू करता है

तो उसके पोरों के नीचे सरक जाता है

कोई ताज़ा गूमड़ या कोई पुराना गहरा घाव


और उस घाव में वह देखने लग जाता है उस औरत के आँसू

दरवाज़े या पलंग के कोने से टकराता उसका सिर

उससे बह आया ख़ून

फिर वह खींच लेता है अपना हाथ

और रोशनी में फैलाकर हथेलियों पर ढूँढने लगता है कत्थई दाग़

फिर वह उस तरह प्यार नहीं कर पाता जैसे वह करना चाहता है

जब भी वह किसी औरत की

पीठ पर लिखना शुरू करता है कोई प्रेम कविता

और दिखाई पड़ते हैं उसे कुछ नीले दाग़, कुछ खरोंचें

तब वह समेट लेता है अपने हाथ

उसे सुनाई पड़ने लगती है उस औरत की सिसकियाँ


और वह उसे थपकने लगता है ताकि वह औरत सो सके सुकून से

फिर वह उस तरह प्यार कर ही नहीं पाता जैसा वह करना चाहता है


जब भी उसके पाँव की उंगलियों के नीचे खिसखिसाती थीं

उस औरत की एड़ियों की गहरी दरारें

तो वह सिकोड़ लेता था पैर

दिन भर चल कर थके हुए पाँवों पर वह रख देता था ओंठ

और मलने लगता था उन्हें

ताकि उनकी थकान उतर जाये

फिर वह उस तरह उस औरत से प्यार कर ही नहीं पाता था

जैसे वह करना चाहता था।


पर वह अब भी ढूँढ रहा है एक ऐसी औरत की आँखें

जिनके भीतर आँसुओं की जगह लहराता हो

प्रेम का दुर्निवार ज्वार

और वह उस औरत को उसी तरह प्यार कर पाये

जैसा वह करना चाहता है


अल्ट्रा साउण्ड की भेदती आँखें

बच भी जाओगी

कैरोसिन में छुलाई जाती

तीली की बदबूदार लपट से,


पर कैसे बचोगी

पिता के माथे पर

गहरा आई लकीरों के फन्दे से?

तुम्हें पैदा करने के

अपराध बोध से ग्रस्त

माँ की आँखों के अंधे कुएं से?

बिटिया

अब तो माँ की कोख भी

महफू़ज नहीं रही तुम्हारे लिये

जहाँ तैर लेती थीं तुम नौ माह निर्द्वन्द्व


तुम्हें तलाशते

गण्डे ताबीजों के अलावा

हमारे पास अब

अन्ट्रा साउण्ड की भेदती आँखें हैं,

कोरियन बायोप्सी की तीखी सलाई है


तुम फिर भी जीना लड़की!

जितनी बार मरना

उतनी ही बार जी जाना

हमारी मृत संवेदनाओं के किलिमिन्जारों में!


औरत, जान लो!

तुम गढ़ सकती हो

समूचा ब्रह्माण्ड


सिफर्‍ छुड़ाने होंगे

माथे से चिपके पौरुषीय मानदण्ड,

उतारने होंगे पवित्रता और सतीत्व के लेबल

फेकना होगा जोंक की

तरह चिपका हुआ डर


फिर देख लो

तुमने गढ़ ही लिया है

इसी देह से

मेरे बच्चे!

नौ माह तक चाँदनी

मेरी नसों से

कोख में रिसती रही

और

अचानक एक सुबह

सूरज दूध से नहा कर

आकाश चूमने लगा।

बसंत के आते ही

यह धुन

जो साल भर

शाखों में भटकती रही,


वह गंध

जो पूरे वर्ष

नसों को टटोलती रही,

वह पुलक

जो हर )तु में पोर-पोर खोजती रही,

बसंत के आते ही

काया पर फूट पड़ी है तुम्हारे रूप में।


उतना ही आना और बाक़ी है

जितना तुम आये हो

मुझमें

लगा उतना ही आना

और बाक़ी है।

तुम आये तो मैं ठहर गई।

फिर आये तो

उगने लगी

धरती की छाती भेद कर।

अपनी बाँहें मैंने

हर डाल में

तुम्हारी प्रतीक्षा में

फैला दी हैं।

तुम डालों से आओगे

तो मैं फूलों में

खुल जाऊँगी।

तुम्हारे पराग को

तितलियों से माँग लूँगी।

जब तुम छोटे बीजों में जन्मोगे

तब भी कई-कई

जगह उग कर

तुम्हारे इंतज़ार में यही दोहराऊँगी

जितना तुम

आए हो मुझमें

उतना ही आना और बाक़ी है।


तीस मौसम बाद

आज तीस मौसम बाद

महसूसा है

माँ, तुम्हारा वात्सल्य


मन घूम आया

उसे समेटने

बचपन की उस क्यारी में

जहाँ अपने हाथों

तूने रोपे थे

सींचे थे

पनपाये थे

मटर और चने के बूटे।


तुझसे छिपकर खाई

कच्ची फलियों की मिठास

जब-जब भी याद आती

तब यह ममत्व ही

आलोड़ित कर जाता है

पूरे अस्तित्व को।


आज वही मिठास

वही स्नेह

अपनी नन्ही के

पूरे तंत्र में बसा देना चाहती हूँ।


इस उम्मीद में कि,

अगले तीस साल बाद वह

यही ममत्व अपनी

अंजुरी में समेट

आगे बढ़ा

हममें से ही हो जायेगी।


कौन सी गंध मेरी है

आज मत पूछो मुझसे

कि, कौन सी गंध मेरी है।


कोरी माटी से

पहली बौछार के बाद उठती गमक

या उस जंगल की

पगडंडी पर

बावरी सी घूमती

मादक सुगंध

या तुम्हारे मीलों दूर

चले जाने के बाद

मेरी पड़ी हुई

देह की

चिरायँध गंध।


आज मुझसे मत पूछना

जवाब तुम ही देना।

आज कोई खोया नहीं।


उस पगडंडी पर!

हाँ, आज तो

गि(ों से जवाब

मिलेगा तुम्हें

कि, कौन सी गंध

मेरी है।

मेरे घर अब दरवाज़ा नहीं है

तुमने दस्तक दी

और मैंने

खोल कर रख दिया

दरवाज़ा

फिर तुम भीतर

चले आये।


मैं भूल गई

भीतर बाहर का अंतर।

आज दरवाज़ा बंद

करने की

बात से

परेशान हो उठी हूँ।


अब तुम हो

मैं हूँ

भीतर भी/बाहर भी

हाँ कि मेरे घर अब

कोई दरवाज़ा नहीं है।


तो तुमने क्या किया

जब-जब तुम्हें तोड़ने के लिए

हाथ उठाये

तुमने हाथों को आँखों पर रख लिया।


तुम्हें जब काँटों से बींधने की

कोशिश की

तब तुमने लहूलुहान ओठों से

मुझे चूम लिया।


मैंने तुम्हें पिघलाना चाहा

तो तुम, आप ही पिघल कर

मुझे भिगो गये

भीतर तक।

फिर आज मैंने तुम्हें समेट लेना चाहा

तो तुमने ये क्या किया।

मुझे समेट कर

मुट्ठी में क़ैद कर लिया।

लेकिन

आज, मैं जीत गई

क्योंकि तुम्हारी मुट्ठी में मैं हूँ

और मुझमें तुम।

शाम तुम्हारे इतंज़ार में

पूरी दोपहर

चिलकती धूप से

ओट होकर

शाम तुम्हारे इंतज़ार में

अपने पाँव

आलते से सजाती रही।

जब तुम नहीं आये

तो

पूरी शीशी आलते की

आसमान में फैलाकर

रात के घर में

उनींदी

तुम्हारा इंतज़ार ही

कर रही है।

हीरों पटी ज़मीन पर बचपन

हीरों पटी ज़मीन पर

चलना सीख चुकी लड़कियों का

बचपन ढूँढ़ती रही

केन के किनारों पर फैली रेत में

रंगीन पत्थरों की चौड़ी बिछावन में

पंडवन की सुराखों वाली चट्टानों के भीतर

कैथे, अमिया और इमली की खटास में

कच्ची गुनगुनी धूप की

सुनहरी छाँव में।

वही बचपन मिला

नान-चाँद के

सामूहिक विवाहोत्सव में।


घूँघट ओढ़े

चूल्हें में धुआँती

लकड़ियों को सुलगा कर रोटियाँ बनाते।


खिचड़ी के मेले में

जाते ट्रैक्टर की ट्राली में

रंग-बिरंगे पल्लों की ओट से

बौछारों की ठंडक को

आँखों में उतारते।


वही बचपन

लिथाटॉमी पोजीशन में पड़ा

चिथी हुई देह में

टाँके लगवाते मिल गया है

ऑपरेशन थियेटर में।


इस ख़तरनाक अपहरण की वारदात

कहीं दर्ज़ नहीं हुई है

और बचपन छुप गया है

जवानी की आड़ में।


रत्नगर्भा धरती की औरत

खदानों से निकली चाल से

हीरे चुनती उँगलियाँ

घर आकर रोटी बेलती हैं

‘कोदई’ चुराती हैं

और छत पर चढ़ी

बेल की तोरई तोड़ कर

सब्जी परोसती हैं।


इन्हीं उँगलियों वाली औरत

हर साल

कोख को

हीरे की उजास से

भरने की कोशिश में

निचुड़-निचुड़ कर

सरकारी अस्पताल के

गंधाते वार्ड में

दवाइयों के साथ

उलाहने का ज़हर पीकर

खड़ी हो पाये तो

फिर चुभने लगती है हीरे

या

मृत देह के साथ


इस रत्नगर्भा धरती में ही

घुल-मिल कर

समय की चट्टानों से

जूझने लगती है

खुद ही

हीरे में रूपांतरित होने।


खजुराहो

1.

सदियों से चलते-चलते

न तो देह की भाषा बदली

न ही आलिंगन मुद्रा।

हम नत्थी हो गये हैं।

साथ-साथ

खजुराहो के मंदिरों पर

बाहर उकेरे

मिथुन शिल्प में।


पर इस सदी में

अंतर्कक्ष से

देवता

अंतरिक्ष में

कूच कर गये हैं।

और हम

स्थिर रह गये हैं

मिथुन मुद्रा में

निर्विकार


2.

इस संवत् में

खजुराहो के

लक्ष्मण मंदिर की दीवार से

ऑर्गी का नियम भंग कर

मिथुन पुरुष सड़क पर उतर आया है

हशिश, हीरों और अपनी ही भंगिमाओं की

तस्करी करने।


सदियों से बल खायी हुई

नायिका भी उकता कर

उजड़े हुये हुए गर्भ गृह की शांति में

सुस्ताना चाहने लगी है

इस संवत् में


3.

लक्ष्मण मंदिर की नायिका

दीवार से उतर कर

सांझ के ढलते रंगों के साथ

अँधेरे की ओट में

अड्डों की ओर

चल पड़ी है।


उसी को देखा है

टूरिस्ट्स और ब्यूरोक्रेट्स की

शिफ्ट निपटाते।

फिर

मुँहअँधेरे

किसी होटल के बाथरूम में

रात भर की लिजलिजाहट के साथ

इस सदी का

इनटॉक्सिकेटिंग फ्रेग्नेंस बहाते।

अपना वालपेचुअस फि़गर संभाल कर

दीवार पर चढ़ते।


और फिर

उसे ही देखा है

बालों से टपकते

पानी की मोती जैसी बूँदों को

चोंच उघरे हंस पर बिखराते

एक सुबह

खजुराहो में।

4.

बरसों पहले

बिछुड़ी सखी का विदेश से आया

पत्र पढ़ कर

विश्वनाथ मंदिर की नायिका

कसमसा गयी है।


किसी करोड़पति के दीवानेख़ास में

रसायनों के लेप से

सुरक्षित होकर

ताम्बूल की जगह लिपिस्टिक से रंगे ओठों

शैम्पेन का प्याला थामे

नये केश विन्यास में

बाल छाँट कर

सुखों में लोटती

पुरानी सखी ने

इटली से लेकर न्यूयार्क तक का

सफर बयान किया है


शायद इसलिये

चिट्ठी लिखती नायिका ने

पुराना काग़ज़ फाड़ कर

मेरी डायरी का

पन्ना खींच लिया है

अपना पैगाम सागर पार

भेजने के लिये


डैफने1

प्रकाश के देवता

अपोलो के उन्मादी आलिंगन से

बच कर भागती

डैफने की पुकार

सुन ली थी

वनस्पति की देवी ने।

और लॉरेल के

वृक्ष में

प्रतिरोध का प्रतीक बन

डैफने स्थिर हो गयी।

अब भी अपोलो का

उन्मादी प्रेम

डैफने को समेटने दौड़ रहा है।


ओलिम्पस पर सुस्तानी वनस्पति की देवी

जानने लगी है कि

लॉरेल की छाल में

छिपने पर भी

डैफने को आपोलो का

अनचाहा प्रेमावेग

भोगना ही होगा।

इसीलिये वह उतरती नहीं

देवताओं की बस्ती से

और डैफने रोम की सड़कों से भागते हुए

साल और बीजा के जंगलों में

छुपने की बेमानी कोशिश

कर रही है।


स्त्रीत्व को सि( करते गुज़र गयी

पन्द्रह सालों से

मंदिरों-मज़ारों

ओझा-पीरों के दरवाज़ों से

गंडे तावीज़ों में

लिपटी हुयी

देवरी रनवाहा की

बांझ कहलाने वाली औरत


ज़िला अस्पताल की

देहरी चढ़ गयी,

और फौर्टिफाईड प्रोकेन पेनिसिलिन के

इन्जेक्सन्स लगवाने के बाद

भारी पाँव लेकर

मन्नतें उतराने

घूमती रही।


सातवें महीने में

फूली सूजी

एनीमिक देह लेकर

वापस लौटी है।

खेत गहन रख कर

चमार टोले वाली

देवरी रनवाहा की औरत

ख़ून खरीद कर

चढ़वा गयी है।


बीसवीं सदी के आख़िरी दशक की छाती पर

मरे बच्चे को पटक कर

स्त्रीत्व को सि( करते

गुज़र गई है वह औरत।


सदी की विरासत

सदियों से

सृजन गौरव को

माँग के टीके में सजा कर

अनागत को

आँचल में ढाँकती आयी

औरत की लुनाई

बीसवीं सदी की

कगार पर

अबॉर्शन क्लीनिक्स के

वेक्यूम सैक्शन से होकर

गटर में

बही जा रही है।


बच रही है

खरोंची हुई

इंसानियत की

झिल्ली ही

हमारे हाथों

नयी सदी के स्वागत में।


साल दर साल

साल दर साल

बाड़ पर फैली करेले की बेल से

ताज़े करेले उतारती

या कच्चे आम की पाल लगाती

उसी सहजता से

हर साल कोख अजियारती


दिया उमरी की औरत

सातवें बच्चे के फँस जाने से

भय ग्रस्त है।


पिछले क्वार में

गौना दी

लड़की की जचकी

नई बहू की गोद भराई

बैलों की टूटी जोड़ी

दूसरी लकड़ी की पक्कियात


गाँव भर डोलते दो लड़के

और गोद में रिरियाता छोटा बच्चा

की सोच भी

कमर तोड़ते दर्द के साथ

चीखों में बदलने लगी


तब वह दिया उमरी की औरत

किशोर जू को थाल मान कर

ख़ून के पनाले में डूब कर

आख़िरी ज़ोर लगा रही है।

सपनों की छाया में सोती बेटियाँ

1.

एक ठण्डा कमरा

एक मशीन की आँख

हज़ारों सपनों की छाया में सोती

बेटियाँ

थरथराती हैं कोख में!


2.

आकाश से पंछी गुम

जल से मछली गुम

बाग़ से कलियाँ गुम

कोख से बेटियाँ गुम

आगे हमारे जिस्म से

हमारे दिल भी गुम।


3.

धरती से जंगल ग़ायब

जंगल से जानवर ग़ायब

आँगन से गौरैयाँ ग़ायब

माँ की कोख से बेटियाँ ग़ायब

इंसानों की बस्ती पर

शैतान का साया!


4.

बेटी को देखा

कुछ हँस दिये

कुछ गुमसुम हुये

कुछ रोये

कुछ खीझें

कुछ मुस्कुराये

कुछ उठ पड़े

कुछ चिल्लाये

कुछ चल दिये

कुछ खड़े रहे

देखते रहे

खोदते रहे मिट्टी

कुछ ने पत्थर जड़ दिये


5.

हमने ज़िन्दगी की दौड़ में

ख़ुशबू खोई

फूल खोये

बेटियाँ खोयीं

फुरसत खोई

यहाँ तक कि भूल गये

सही वक़्त पर साँस खीचना


6.

एक औरत कोख में सपने बुनती है

आँचल में उरसती है

पायल के रुम झुम

फूलों की क्यारियाँ

और

फुदकती हुई चुटिया

और

मुस्कुराती है करवट बदल कर


7.

तुम्हारे पास एक मशीन है

जिससे तुम गर्म जल में तैरती

जल परियों की पहचान कर सकते हो।


तुम्हारे पास भाषा है

जिससे तुम निशानिया ज़ाहिर कर सकते हो


तुम्हारे पास औजार है

जिनसे उन्हें पकड़ सकते हो


यक़ीनन तुम्हारे बुत

यहाँ पूजे जायेंगे।

8.

जब पहाड़ों से नदी उतरेगी

पगडंडियों पर धूप टहलेगी

सर्दियों की सुबह

क्या हवाएँ सुना पायेंगी

बेटियों के तराने


9.

बरस पड़े बाद अचानक

बरफ की चादर पर

छा जाये रंग अचानक


रेत से उफन पड़े

समुन्दर अचानक

बेटियों के क़दमों से

बदलते हैं मौसम


10.

उनके चेहरे पर नक़ाब

हाथों में खोजबत्ती

स्क्रीन पर हिलाती तस्वीरें


घर-घर औजारों से खोलता है कोई

दुनिया का तानाबाना


बेटियों के ख़ून से लिखी

इबारत को पढ़ ले।


इन गुनाहों के लिये

माफी मयस्सर नहीं।


11.

विश्वास से प्रेम का रिश्ता

प्रेम से उम्मीदों का रिश्ता

उम्मीदों से ज़िन्दगी का

ज़िन्दगी से तकलीफों का

तकलीफ से आँसुओं का

समझ से सहने का

सहने से प्रार्थना का

प्रार्थना से अस्तित्व का

अनोखा रिश्ता


गोद में कुनमुनाता बच्चा

समुद्र में उठती हैं लहरें

एकाएक हिलने लगती है पृथ्वी

नदियाँ मुड़ जाती हैं तिर्यक होकर

तुम्हारी आर्किअक मुस्कान में


तुम्हारे आस-पास मंडराती

पीली तितलियों के झुण्ड देखता

वहीं खड़ा है वसंत

अपना रंगीन लबादा संभालते

कई-कई बरसों से


हवाएँ गर्म हैं

तुम फैलाए रखो अपना आंचल

ताकि कच्ची नींद से जागने न पाये

तुम्हारी गोद में कुनमुनाता बच्चा


अपनी दुनिया में बंद आदमी

कौन गवाह है जब ओसिरस खड़ा था

घुटनों के बल आइरिस के सामने

पत्थर की दीवारों के अलावा

किसने देखा था उसकी आँखों

में उतर आया निवेदन


किसी दरार से झांकती चांदनी

धूप या बादल भी नहीं जानते

कि अपने हिस्से की दुनिया में बंद आदमी

को सुनाई नहीं पड़तीं हवाओं की तालियाँ

यु( विराम के बाद

1.

किसे ढूँढता है

सरायेवो की छत पर टहलता चांद

दहशत भरी बेनींद आँखों में चांदनी घोंपकर

क्या देखता है भीगे चेहरों में घूरता हुआ चांद

जिस्म के चिथड़ों और हड्डियों को जोड़ते मुर्दे

अपनों से फुसफुसा कर अपनी पहचान बताने निकलते हैं

तब चांदनी की खोज बत्ती से उन्हें

फिर क्यों धज्जी-धज्जी कर जाता है चमकता चांद


उजड़ी हुई बस्तियों में

जमे हुए खून के थक्कों को खुरच खुरच कर

किसे नींद से जगाकर किसका पता पूछता रहता है

सरायेवो की छत पर टहलता चांद


कौन सुन पायेगा कि

एयर रेड्स के धमाकों के बीच

किस किस की आखिरी चीख खो गई थी

एक और सवाल बन कर

फूलों की नई फसल आने को है

कौन बता पायेगा

किस गंध और किस रंग के फूल

किस कौम की लाशों पर उगते हैं?

2.

अब कौन बता पायेगा क्रोशिया में कि

मक्के के दूधिया दानों की मिठास में

सर्ब खून घुला है या क्रोट

अंगूर के बगीचे में

टहलती धूप से कौन पूछेगा कि

वह अभी गिरजे से लौटी है

या अभी अजान करने जायेगी

कौन समझायेगा

डेढ़ साल के राबिन को उठाये

बिस्तर ठीक करती मार्था को कि

उसकी पलकों में रुकी हुई प्रतीक्षा को चूम लेने

फ्रेंजो अब नहीं आयेगा


रात दिन घूमती हवाओं में


दर्द

किसने कहा

तुमसे

तुम न आओ

पर ये भी

नहीं कहा

अपने साथ

दुनिया भर

की भीड़

उठा लाओ

एकांत

तुम्हारे साथ

लगता है

कभी कभी

भला सा

पर तुम

आये तो

साथ तुम्हारे था

मेला सा

तुम्हीं कहो

मैं तुम्हें

कैसे

अपनाऊँ

एक को

निमंत्रण देते देते

कहीं सैकड़ों

से

न घिर जाऊँ

कभी तो

आओ

चुपचाप

सुन न पाये

कोई तुम्हारे

पदचाप

लेकिन तुम

दर्द हो

तुम आओगे

अकेले कैसे

मैं तुमसे

अब कुछ नहीं

कहूँगी

खुशियों से

भरी

ज़िन्दगी में तुम्हारी

कमी खलेगी

उसे भी

जज्ब कर लूँगी

और ये जज्ब

करना भी तो

शायद

तुम्हारा ही

कोई साथी है

ओफ!

तुम सच

बड़े वैसे हो

बता नहीं पाऊँगी

कैसे हो

कभी तो

आओ

ऐसे कि मैं

तुम्हें

सिर्फ तुम्हें

बस महसूस

ही करूँ

साथ तुम्हारे

न हो कोई

तुम्हें हमेशा

के लिये

बस उसी

तरह

महसूस

करूँ

लेकिन तुम नहीं

आओगे

कम्बख्त! दर्द जो हो

भीड़ सहित आकर बस

रुलाओगे बेदर्द!

दर्द।


आग-सी तपिश

गालों तक

झुक आया

गुलमोहर

भला तो

है

भाता भी है

बार बार झुककर

हौले-हौले छूकर

मन को लुभाता

भी है

पर अभी

नहीं

ये भी कहूँगी

आख़िर कब

तक नहीं!

आग सी तपिश लिये

चंचल पवन

सच कहूँ

अच्छा भी लगे

जब ओ

गुलमोहर

तुम्हें छू न पाये

तुम्हें देख न पाये

तुम्हें दहला न पाये

झुलसाने वाली धूप के लम्बे लम्बे

ये डरावने साये धूप का चकता आया है

तो क्या

फिर

जा नहीं सकता?

जब वो जायेगा

ठण्डी मीठी

अरुणिन संध्या

को पीछे

छोड़ जायेगा

तब तुम मुझे

छूना

कंधों तक

आकर धीमे से

हलके से

तुम मुझे छूना

कपोलों को

स्पर्श के

मन के

किसी

भीतरी कोने को

फिर वैसे ही छूना

देखो फिर

अछूता

अधूरा न रह जाये

न महसूस

हो कोई हिस्सा सूना।

 

---------

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *