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गिरीश पंकज के प्रसिद्ध उपन्यास "एक गाय की आत्मकथा" की यथार्थ गाथा

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(गिरीश पंकज के उपन्यास एक गाय की आत्मकथा का विमोचन) दिनेश कुमार माली,तलचेर,ओडिशा 'एक गाय की आत्मकथा'ही क्यों ? ‘एक गाय की आत्मकथा’ गिरीश पंकज जी का आधुनिकता के प्रभाव से विकृत होती मानवीय चेतना को झकझोरने वाला शिक्षाप्रद उपन्यास है, जो न केवल वर्तमान समय वरन मानव सभ्यता के उद्भव से लगाकर वेद-पुराण सारे धार्मिक ग्रन्थों के रचयिताओं, धर्मगुरुओं, राज-नेताओं, गांधी, विनोबा भावे, शंकराचार्य जैसे महान विद्वानों द्वारा गो-वध पर रोक लगाने के आवाहन को चरितार्थ करने के पीछे छुपे उद्देश्यों के प्रासंगिकता पर पूरी तरह से खरा उतरता है। गिरीश पंकज जी से मेरा व्यक्तिगत परिचय लगभग एक दशक पुराना है,इसलिए मैं यह कह सकता हूँ कि वे जितने मितभाषी है, उतने ही ज्यादा मृदुभाषी भी है।यह ही नहीं,वे बहुत ही कम शब्दों में अधिक से अधिक सारगर्भित बातों को रखने में सिद्धहस्त हैं। व्यंग्य की दुनिया में तो उनका कहना ही क्या! गैलेक्सियों में चमकते हुए एक सितारे की तरह वह दैदीप्यमान है।सृजन गाथा में लगातार कई वर्षों से प्रकाशित हो रहे उनके स्थायी स्तंभ “विक्रम वेताल” का मैं नियमित पाठक व प्रशंसक रहा हूँ, उनकी …

नाराज हैं प्रकृति और परमेश्वर

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डॉ. दीपक आचार्यपिण्ड और ब्रह्माण्ड का सीधा रिश्ता है जो दिखता भले न हो लेकिन इसके मुकाबले संबंधों की प्रगाढ़ता कहीं और देखी नहीं जा सकती। जिन पंच तत्वों से प्राणियों का निर्माण हुआ है वे प्रकृति से ही प्राप्त हैं और उन्हीं का पुनर्भरण करते हुए जीव अपनी निर्धारित आयु पूर्ण करता हुआ स्वाभाविक जीवन जीता है। सृष्टि में रहने वाले हर जड़ और चेतन तत्व का संबंध प्रकृति से सीधा जुड़ा हुआ है। अंश और अंशी का संबंध ही है ये। इन सभी में जो चैतन्य तत्व है वह परमात्मा का ही अंश है। प्रकृति को मातृभाव से देखने और आदर-सम्मान देने पर वह हमारा भरण-पोषण, संरक्षण, पल्लवन, पुष्पन और फलन आदि सब कुछ बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक करती है और खुद धन्य होती है। लेकिन यह सब तभी तक था जब तक कि प्रकृति और हमारा संबंध आत्मीयता भरा और श्रद्धायुक्त था। जब से हमने प्रकृति का शोषण करना आरंभ कर दिया है, भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण प्रारंभ कर दिया है, धर्म की अपने-अपने हिसाब से परिभाषाएं गढ़ ली हैं, हिंसा, अन्याय, अत्याचार का ताण्डव मचाने लगे हैं, हरामखोरी की आदत बना डाली है, मानवीय मूल्यों का गला घोंट कर रख दिया है और म…

हिन्दी भाषा को केवल खड़ी बोली मानना उसी प्रकार भ्रामक है जैसे भारत को केवल दिल्ली मानना

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प्रोफेसर महावीर सरन जैनहिन्दी भाषा-क्षेत्र की समावेशी अवधारणा रही है, हिन्दी साहित्य की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है, हिन्दी साहित्य के इतिहास की समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है और हिन्दी साहित्य के अध्ययन और अध्यापन की भी समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा रही है। हिन्दी की इस समावेशी एवं संश्लिष्ट परम्परा को जानना बहुत जरूरी है तथा इसे आत्मसात करना भी बहुत जरूरी है तभी हिन्दी क्षेत्र की अवधारणा को जाना जा सकता है और जो ताकतें हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का कुचक्र रच रही हैं तथा हिन्दी की ताकत को समाप्त करने के षड़यंत्र कर रही हैं उन ताकतों के षड़यंत्रों को बेनकाब किया जा सकता है तथा उनके कुचक्रों को ध्वस्त किया जा सकता है। वर्तमान में हम हिन्दी भाषा के इतिहास के बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हुए हैं। आज बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। आज हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने के जो प्रयत्न हो रहे हैं सबसे पहले उन्हे जानना और पहचानना जरूरी है और इसके बाद उनका प्रतिकार करने की जरूरत है। यदि आज हम इससे चूक गए तो इसके भयंकर परिणाम होंगे। मुझे सन् 1993 के एक प्रसंग का स्मरण…

याकूब मेमन की फांसी बरकरार

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प्रमोद भार्गव 1993 के मुंबई बम धमाकों में शामिल याकूब मेमन की फांसी की सजा बरकरार रहेगी। सर्वोच्‍च न्‍यायालय की तीन सदस्‍सीय खंडपीठ ने उसकी दया याचिका और मौत के वारंट पर उठाए सवाल खारिज कर दिए हैं। इस सुनवाई की खास बात यह रही कि तीनों न्‍यायाधीश फांसी देने की राय पर एकमत रहे हैं। इसके साथ ही महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल ने भी याकूब की दया याचिका निरस्‍त कर दी। इन फैसलों से अब याकूब को नागपुर के केंद्रीय कारागार में तय समय पर फांसी दिया जाना निश्‍चित है। हालांकि इस याचिका के पहले भी दो बार न्‍यायालय याकूब की याचिका खारिज कर चुकी थी। इसके पहले राष्‍ट्रपति से भी दया याचिका खारिज हो चुकी है। राष्‍ट्रपति से याचिका खारिज होने के बाद अपवादस्‍वरूप ही सुप्रीम कोर्ट किसी याचिका पर सुनवाई करता है। बावजूद सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने याचिका पर सुनवाई की और फांसी की सजा को यथावत रखा। टाडा अदालत ने 2007 में याकूब को फांसी की सजा सुनाई थी। चूंकि इस अदालत की अपील उच्‍चतम न्‍यायालय में करने का प्रावधान नहीं है,इसलिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय में ही टाडा से सजा पाए अपराधियों की अपील की जा सकती है और अपील पर निराकरण क…

इस्मत चुगताईः एक दुस्साहसी नगमानिगार

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शताब्दी वर्ष              इस्मत चुगतईः एक दुस्साहसी नगमानिगार- राजीव आनंद
    इस्मत चुगतई, जिन्हें 'इस्मत आपा' के नाम से भी जाना जाता है, उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादस्पद लेकिन सर्वप्रमुख लेखिका थी। इस्मत आपा ने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया। उन्होंने निम्न मघ्यवर्गीय मुस्लिम तबके की दबी-कुचली लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है
    इस्मत आपा का साहित्यिक फलक काफी व्यापक था जिसमें उन्होंने अपने अनुभव के विविध रंग को उकेरा है। अपनी उपन्यास 'टेढ़ी लकीर' में उन्होंने अपने ही जीवन के अनुभवों को स्त्री के नजरिए से समाज को दिया है। अपनी कहानी 'लिहाफ' जिसके कारण वो खासी मशहूर हुई और आज भी है, उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए समलैंगिकता के मुद्दे पर कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था, जिसके लिए उन्हें अश्लीलता को लेकर लगाए गए इल्जाम और मुकदमें के रूप में चुकानी पड़ी थी। उन्हें कहानी 'लिहाफ' के लिए लाहौर हाईकोर्ट में समलैंगिकता के आरोप पर मुकद…

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रचनाकार

रवि रतलामी

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