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August 2015
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नीलम यादव

मनोवैज्ञानिक,इतिहास,संस्कृति एवं सामाजिक सरोकारों की प्रगतिवादी लेखिका नीलम यादव ने अपने लेखन के द्वारा हाशिए पर पड़े समाज को केन्द्र में रखकर अपना सृजन किया है। लेखन के क्षेत्र में भी नीलम यादव राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाती रही हैं। आपके लेखन में समाज के दबे,कुचले एवं पीड़ित आम जन के साथ ही साथ मानव मूल्य तथा मनुष्यता की बात देखने को मिलती है। वर्तमान में आप एक अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका का सम्पादन सफलतापूर्वक कर रही हैं।

 

भारत में महिलाओं की स्थिति सदैव एक समान नही रही है। इसमें युगानुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। उनकी स्थिति में वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे हैं तथा उनके अधिकारों में तदनरूप बदलाव भी होते रहे हैं। वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति सुदृढ़ थी, परिवार तथा समाज में उन्हे सम्मान प्राप्त था। उनको शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। सम्पत्ति में उनको बराबरी का हक था। सभा व समितियों में से स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेती थी तथापि ऋगवेद में कुछ ऐसी उक्तियां भी हैं जो महिलाओं के विरोध में दिखाई पड़ती हैं। मैत्रयीसंहिता में स्त्री को झूठ का अवतार कहा गया है। ऋगवेद का कथन है कि स्त्रियों के साथ कोई मित्रता नही है, उनके हृदय भेड़ियों के हृदय हैं। ऋगवेद के अन्य कथन में स्त्रियों को दास की सेना का अस्त्र-शस्त्र कहा गया है। स्पष्ट है कि वैदिक काल में भी कहीं न कहीं स्त्रियाीं नीची दृष्टि से देखी जाती थीं। फिर भी हिन्दू जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह समान रूप से आदर और प्रतिष्ठित थीं। शिक्षा, धर्म, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास में उसका महान योगदान था। संस्थानिक रूप से स्त्रियों की अवनति उत्तर वैदिककाल से शुरू हुई। उन पर अनेक प्रकार के निर्योग्यताओं का आरोपण कर दिया गया। उनके लिए निन्दनीय शब्दों का प्रयोग होने लगा। उनकी स्वतंत्रता और उन्मुक्तता पर अनेक प्रकार के अंकुश लगाये जाने लगे। मध्यकाल में इनकी स्थिति और भी दयनीय हो गयी। पर्दा प्रथा इस सीमा तक बढ़ गई कि स्त्रियों के लिए कठोर एकान्त नियम बना दिए गये। शिक्षण की सुविधा पूर्णरूपेण समाप्त हो गई।

नारी के सम्बन्ध में मनु का कथन ''पितारक्षति कौमारे..........न स्त्री स्वातंन्न्यम् अर्हति।'' वहीं पर उनका कथन ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'', भी दृष्टव्य है वस्तुतः यह समस्या प्राचीनकाल से रही है। इसमें धर्म, संस्कृति साहित्य, परम्परा, रीतिरिवाज और शास्त्र को कारण माना गया है। भारतीय दृष्टि से इस पर विचार करने की की जरूरत है। पश्चिम की दृष्टि विचारणीय नहीं। भारतीय सन्दर्भों में समस्या के समाधान के लिए प्रयास हो तो अच्छे हुए हैं। भारतीय मनीषा समानाधिकार, समानता, प्रतियोगिता की बात नहीं करती वह सहयोगिता सहधर्मिती, सहचारिता की बात करती है। इसी से परस्पर सन्तुलन स्थापित हो सकता है।

वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल में महिलाओं को गरिमामय स्थान प्राप्त था। उसे देवी, सहधर्मिणी अर्द्धांगिनी, सहचरी माना जाता था। स्मृतिकाल में भी ''यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'' कहकर उसे सम्मानित स्थान प्रदान किया गया है। पौराणिक काल में शक्ति का स्वरूप मानकर उसकी आराधना की जाती रही है। किन्तु 11 वीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी के बीच भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय होती गई। एक तरह से यह महिलाओं के सम्मान, विकास, और सशक्तिकरण का अंधकार युग था। मुगल शासन, सामन्ती व्यवस्था, केन्द्रीय सत्ता का विनष्ट होना, विदेशी आक्रमण और शासकों की विलासितापूर्ण प्रवृत्ति ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु बना दिया था और उसके कारण बाल विवाह, पर्दा प्रथा, अशिक्षा आदि विभिन्न सामाजिक कुरीतियों का समाज में प्रवेश हुआ, जिसने महिलाओं की स्थिति को हीन बना दिया तथा उनके निजी व सामाजिक जीवन को कलुषित कर दिया।

धर्मशास्त्र का यह कथन नारी स्वतन्त्रता का अपहरण नहीं है अपितु नारी के निर्बाध रूप से स्वधर्म पालन कर सकने के लिए बाह्य आपत्तियों से उसकी रक्षा हेतु पुरूष समाज पर डाला गया उत्तरदायित्व है। इसलिए धर्मनिष्ठ पुरूष इसे भार न मानकर ,धर्मरूप में स्वीकार अपना कल्याणकारी कर्त्तव्य समझता है। पौराणिक युग में नारी वैदिक युग के दैवी पद से उतरकर सहधर्मिणी के स्थान पर आ गई थी। धार्मिक अनुष्ठानों और याज्ञिक कर्मो में उसकी स्थिति पुरूष के बराबर थी। कोई भी धार्मिक कार्य बिना पत्नी नहीं किया जाता था। श्रीरामचन्द्र ने अश्वमेध के समय सीता की हिरण्यमयी प्रतिमा बनाकर यज्ञ किया था। यद्यपि उस समय भी अरून्धती (महर्षि वशिष्ठ की पत्नी), लोपामुद्रा, महर्षि अगस्त्य की पत्नी),अनुसूया ( महर्र्षि अ़त्रि की पत्नी) आदि नारियाँ दैवी रूप की प्रतिष्ठा के अनुरूप थी तथापि ये सभी अपने पतियों की सहधर्मिणी ही थीं।

मध्यकाल में विदेशियों के आगमन से स्त्रियों की स्थिति में जबर्दस्त गिरावट आयी। अशिक्षा और रूढ़ियाी जकड़ती गई,घर की चाहरी दीवारी में कैद होती गई और नारी एक अबला,रमणी और भोग्या बनकर रह गई। आर्य समाज आदि समाज-सेवी संस्थाओं ने नारी शिक्षा आदि के लिए प्रयास आरम्भ किये। उन्नीसवीं सदीं के पूर्वार्द्ध में भारत के कुछ समाजसेवियों जैसे राजाराम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द विद्यासागर तथा केशवचन्द्र सेन ने अत्याचारी सामाजिक व्यवस्था के विरूद्ध आवाज उठायी। इन्होंने तत्कालीन अंग्रेजी शासकों के समक्ष स्त्री पुरूष समानता, स्त्री शिक्षा, सती प्रथा पर रोक तथा बहु विवाह पर रोक की आवाज उठायी। इसी का परिणाम था सती प्रथा निषेध अधिनियम ,1829,1856 में हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम,1891 में एज आफ कन्सटेन्ट बिल ,1891 , बहु विवाह रोकने के लिये वेटिव मैरिज एक्ट पास कराया। इन सभी कानूनों का समाज पर दूरगामी परिणाम हुआ। वर्षों के नारी स्थिति में आयी गिरावट में रोक लगी। आने वाले समय में स्त्री जागरूकता में वृद्धि हुई ओैर नये नारी संगठनों का सूत्रपात हुआ जिनकी मुख्य मांग स्त्री शिक्षा, दहेज, बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर रोक, महिला अधिकार, महिला शिक्षा का माँग की गई।

महिलाओं के पुनरोत्थान का काल ब्रिटिश काल से शुरू होता है। ब्रिटिश शासन की अवधि में हमारे समाज की सामाजिक व आर्थिक संरचनाओं में अनेक परिवर्तन किए गए। ब्रिटिश शासन के 200 वर्षों की अवधि में स्त्रियों के जीवन में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अनेक सुधार आये। औद्योगीकरण, शिक्षा का विस्तार, सामाजिक आन्दोलन व महिला संगठनों का उदय व सामाजिक विधानों ने स्त्रियों की दशा में बड़ी सीमा तक सुधार की ठोस शुरूआत की।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक स्त्रियों की निम्न दशा के प्रमुख कारण अशिक्षा, आर्थिक निर्भरता, धार्मिक निषेध, जाति बन्धन, स्त्री नेतृत्व का अभाव तथा पुरूषों का उनके प्रति अनुचित दृष्टिकोण आदि थे। मेटसन ने हिन्दू संस्कृति में स्त्रियों की एकान्तता तथा उनके निम्न स्तर के लिए पांच कारकों को उत्तरदायी ठहराया है, यह है- हिन्दू धर्म, जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार, इस्लामी शासन तथा ब्रिटिश उपनिवेशवाद। हिन्दूवाद के आदर्शों के अनुसार पुरूष स्त्रियों से श्रेष्ठ होते हैं और स्त्रियों व पुरूषों को भिन्न-भिन्न भूमिकाएीं निभानी चाहिए। स्त्रियों से माता व गृहणी की भूमिकाओं की और पुरूषों से राजनीतिक व आर्थिक भूमिकाओं की आशा की जाती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से सरकार द्वारा उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने तथा उन्हे विकास की मुख्य धारा में समाहित करने हेतु अनेक कल्याणकारी योजनाओं और विकासात्मक कार्यक्रमों का संचालन किया गया है। महिलाओं को विकास की अखिल धारा में प्रवाहित करने, शिक्षा के समुचित अवसर उपलब्ध कराकर उन्हे अपने अधिकारों और दायित्वों के प्रति सजग करते हुए उनकी सोंच में मूलभूत परिवर्तन लाने, आर्थिक गतिविधियों में उनकी अभिरूचि उत्पन्न कर उन्हे आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन की ओर अग्रसारित करने जैसे अहम उद्देश्यों की पूर्ति हेतु पिछले कुछ दशकों में विशेष प्रयास किये गए हैं।

उन्नीसवीं सदी के मध्यकाल से लेकर इक्कीसवीं सदी तक आते-आते पुनः महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ और महिलाओं ने शैक्षिक, राजनीतिक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, प्रशासनिक, खेलकूद आदि विविध क्षेत्रों में उपलब्धियों के नए आयाम तय किये। आज महिलाएँ आत्मनिर्भर, स्वनिर्मित, आत्मविश्वासी हैं, जिसने पुरूष प्रधान चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता प्रदर्शित की है। वह केवल शिक्षिका, नर्स, स्त्री रोग की डाक्टर न बनकर इंजीनियर, पायलट, वैज्ञानिक, तकनीशियन, सेना, पत्रकारिता जैसे नए क्षेत्रों को अपना रही है। राजनीति के क्षेत्रों में महिलाओं ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर श्रीमती प्रतिभा पाटिल, लोकसभा स्पीकर के पद पर मीरा कुमार, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, वसुन्धरा राजे, सुषमा स्वराज, जयललिता, ममता बनर्जी, शीला दीक्षित आदि महिलाएँ राजनीति के क्षेत्र में शीर्ष पर हैं। सामाजिक क्षेत्र में भी मेधा पाटकर, श्रीमती किरण मजूमदार, इलाभट्ट, सुधा मूर्ति आदि महिलाएँ ख्यातिलब्ध हैं। खेल जगत में पी.टी. ऊषा, अंजू बाबी जार्ज, सुनीता जैन, सानिया मिर्जा, अंजू चोपड़ा आदि ने नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। आई.पी.एस. किरण बेदी, अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स आदि ने उच्च शिक्षा प्राप्त करके विविध क्षेत्रों में अपने बुद्धि कौशल का परिचय दिया है।

20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और अब 21 वीं सदी के प्रारम्भ में बराबरी व्यवहार वाले जोड़े बनने लगे हैं। नौकरी वाली नारी के साथ पुरूष की मानसिकता में बदलाव आया है। पहले नौकरी वाली औरत के पति को ''औरत की कमाई खाने वाला'' कह कर चिढ़ाया जाता था। आज यह सोच बदल चुकी है। स़्त्री स्वातय में अर्थशास्त्र का योगदान अद्भुत है। स्त्रियां धन कमाने लगीं हैं तो पुरूष की मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। आर्थिक दृष्टि से नारी अर्थचक्र के केन्द्र की ओर बढ़ रही है। विज्ञापन की दुनियां में नारियां बहुत आगे हैं। बहुत कम ही ऐसे विज्ञापन होंगे जिनमें नारी न हो लेकिन विज्ञापन में अश्लीलता चिन्तन का विषय है। इससे समाज में विकृतियाीं भी बढ़ रही हैं। अर्थशास्त्र ने समाजशास्त्र को बौना बना दिया है।

आज की नारी राजनीति, कारोबार, कला तथा नौकरियों में पहुीचकर नये आयाम गढ़ रही हैं। भूमण्डलीकृत दुनियां में भारत और यहाी की नारी ने अपनी एक नितांत सम्मानजनक जगह कायम कर ली है। आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रतिवर्ष कुल परीक्षार्थियों में 50 प्रतिशत महिलाऐं डाक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण करती हैं। आजादी के बाद लगभग 12 महिलाएीं विभिन्न राज्यों की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। भारत के अग्रणी साफ्टवेयर उद्योग में 21 प्रतिशत पेशेवर महिलाऐं हैं। फौज, राजनीति, खेल, पायलट तथा उद्यमी सभी क्षेत्रों में जहाी वषरें पहले तक महिलाओं के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वहां सिर्फ नारी स्वयं को स्थापित ही नहीं कर पायी है बल्कि वहां सफल भी हो रही हैं।

यदि आपको विकास करना है तो महिलाओं का उत्थान करना होगा । महिलाओं का विकास होने पर समाज का विकास स्वतः हो जायेगा।-जवाहर लाल नेहरू

महिलाओं को शिक्षा देने तथा सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिये जो सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हुआ उससे समाज में एक नयी जागरूकता उत्पन्न हुई है। बाल-विवाह, भ्रूण-हत्या पर सरकार द्वारा रोक लगाने का अथक प्रयास हुआ है । शैक्षणिक गतिशीलता से पारिवारिक जीवन में परिवर्तन हुआ है । गाीधीजी ने कहा था कि एक लड़की की शिक्षा एक लड़के की शिक्षा की उपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है क्यों लड़के को शिक्षित करने पर वह अकेला शिक्षित होता है किन्तु एक लड़की की शिक्षा से पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है । शिक्षा ही वह कुंजी है जो जीवन के वह सभी द्वार खोल देती है जो कि आवश्यक रूप से सामाजिक है । शिक्षित महिलाओं को राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने में बहुत मदद मिली । महिलाएीं अपनी स्थिति व अपने अधिकारों के विषय में सचेत होने लगी । शिक्षा ने उन्हें आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक न्याय तथा पुरूष के साथ समानता के अधिकारों की माीग करने को प्रेरित किया ।

संवैधानिक अधिकारों में विभिन्न कानूनों के द्वारा महिलाओं को पुरूषों के समान अधिकार मिलने से उनकी स्थिति में परिवर्तन हुआ । महिलाओं की विवाह विच्छेद परिवार की सम्पत्ति में पुरूषों के समान अधिकार दिये गये । दहेज पर कानूनी प्रतिबन्ध लगा तथा उन व्यक्तियों के लिये कठोर दण्ड की व्यवस्था की गयी जो दहेज की मांग को लेकर महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं । अब सरकार लिव इन पर विचार कर रही है । संयुक्त परिवारों के विघटन होने से जैसे-जैसे एकांकी परिवार की संख्या बढ़ी इनमें न केवल महिलाओं को सम्मानित स्थान मिलने लगा बल्कि लड़कियों की शिक्षा को भी एक प्रमुख आवश्यकता के रूप में देखा जाने लगा । वातावरण अधिक समताकारी होने से महिलाओं को अपने वयक्तित्व का विकास करने के अवसर मिलने लगे ।

महिला शिक्षा समाज का आधार है । समाज द्वारा पुरूष को शिक्षित करने का लाभ केवल मात्र पुरूष को होता है जबकि महिला शिक्षा का स्पष्ट लाभ परिवार, समाज एवं सम्पूर्ण राष्ट्र को होता है । चूंकि महिला ही माता के रूप में बच्चे की प्रथम अध्यापक बनती है । महिला शिक्षा एवं संस्कृति को सभी क्षेत्रों में पर्याप्त समर्थन मिला। यद्यपि कुछ समय तक महिला शिक्षा के समर्थक कम किन्तु आज समय एवं परिस्थितियों ने महिला शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है ।

स्त्री और मुक्ति आज भी नदी के दो किनारे की तरह है जो कभी मिल नहीं पाती सतही तौर पर देखा जाये तो लगता है कि भारत ही नहीं, विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाती हुई स्त्रियों ने अपनी पुरानी मान्यतायें बदली हैं। आज की स्त्री की अस्मिता का प्रश्न मुखर होता जा रहा है। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये संघर्ष करती हुई स्त्रियों ने लम्बा रास्ता तय कर लिया है, परन्तु आज भी एक बड़ा हिस्सा सदियों से सामाजिक अन्याय का शिकार है। ''जब-जब स्त्री अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है तब तब जाने कितने रीति-रिवाजों, परम्पराओं पौराणिक आख्यानों की दुहाई देकर उसे गुमनाम जीवन जीने पर विवश कर दिया जाता है।''

वस्तुतः इक्कीसवीं सदी महिला सदी है। वर्ष 2001 महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में मनाया गया। इसमें महिलाओं की क्षमताओं और कौशल का विकास करके उन्हें अधिक सशक्त बनाने तथा समग्र समाज को महिलाओं की स्थिति और भूमिका के संबंध में जागरूक बनाने के प्रयास किये गए। महिला सशक्तिकरण हेतु वर्ष 2001 में प्रथम बार प्रथम बार ''राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति'' बनाई गई जिससे देश में महिलाओं के लिये विभिन्न क्षेत्रों में उत्थान और समुचित विकास की आधारभूत विशेषताए निर्धारित किया जाना संभव हो सके। इसमें आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में पुरूषों के साथ समान आधार पर महिलाओं द्वारा समस्त मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं का सैद्धान्तिक तथा वस्तुतः उपभोग पर तथा इन क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी व निर्णय स्तर तक समान पहुँच पर बल दिया गया है।

आज देखने में आया है कि महिलाओं ने स्वयं के अनुभव के आधार पर, अपनी मेहनत और आत्मविश्वास के आधार पर अपने लिए नई मंजिलें, नये रास्तों का निर्माण किया है। क्या मात्र इस आधार पर उस सफलता के पीछे क्षणांश भी किसी पुरुष के हाथ होने की सम्भावना को नकार दिया जायेगा? यदि नहीं तो फिर समस्या कहाँ है? मैं कौन हूँ का प्रश्न अभी भी उत्तर की आस में क्यों खड़ा है?

जवाब हमारे सभी के अन्दर ही है पर उसको सामने लाने में हम घबराते भी दिखते हैं। स्त्री को एक देह से अलग एक स्त्री के रूप में देखने की आदत को डालना होगा। स्त्री के कपड़ों के भीतर से नग्नता को खींच-खींच कर बाहर लाने की परम्परा से निजात पानी होगी। कोड ऑफ कंडक्ट किसी भी समाज में व्यवस्था के संचालन में तो सहयोगी हो सकते हैं किन्तु इसके अपरिहार्य रूप से किसी भी व्यक्ति पर लागू किये जाने से इसके विरोध की सम्भावना उतनी ही प्रबल हो जाती है जितनी कि इसको लागू करवाने की। क्या बिकाऊ है और किसे बिकना है, अब इसका निर्धारण स्वयं बाजार करता है, हमें तो किसी को बिकने और किसी को जोर जबरदस्ती से बिकने के बीच में आकर खड़े होना है। किसी की मजबूरी किसी के लिए व्यवसाय न बने यह समाज को ध्यान देना होगा।

नग्नता और शालीनता के मध्य की बारीक रेखा समाज स्वयं बनाता और स्वयं बिगाड़ता है। एक नजर में उसका निर्धारक पुरुष होता है तो दूसरी निगाह उसका निर्धारक स्त्री को मानती है। उचित और अनुचित, न्याय और अन्याय, विवेकपूर्ण और अविवेकपूर्ण, स्वाधीनता और उच्छृंखलता, दायित्व और दायित्वहीनता, श्लीलता और अश्लीलता के मध्य के धुँधलके को साफ करना होगा। समाज में सरोकारों का रहना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि किसी भी स्त्री-पुरुष का। सामाजिकता के निर्वहन में स्त्री-पुरुष को समान रूप से सहभागी बनना होगा और इसके लिए स्त्री पुरुष को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझे और पुरुष भी स्त्री को एक देह नहीं, स्त्री रूप में एक इंसान स्वीकार करे। स्त्री की आज़ादी और खुले आकाश में उड़ान की शर्त उत्पादन में उसकी भूमिका हो। स्त्री की असली आज़ादी तभी होगी जब उसके दिमाग की स्वीकार्यता हो, न कि केवल उसकी देह की। अन्ततः कहीं ऐसा न हो कि स्त्री स्वतन्त्रता और स्वाधीनता का पर्व सशक्तिकरण की अवधारणा पर खड़ा होने के पूर्व ही विनष्ट होने लगे और आने वाली पीढ़ी फिर वही सदियों पुराना प्रश्न दोहरा दे कि 'मैं कौन हूँ?'

वर्तमान समय में भारतीय सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्यक्रम एवं योजनाओं का संचालन तो की जा रहीं हैं लेकिन इन योजनाओं का क्रियान्वयन निचले स्तर तक उचित ढंग से न पहुँच सकने के कारण स्त्रियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। यह सत्य है कि वर्तमान समय में स्त्रियों की स्थिति में काफी बदलाव आए हैं, लेकिन फिर भी वह अनेक स्थानों पर पुरुष-प्रधान मानसिकता से पीड़ित हो रही है। इस सन्दर्भ में युगनायक एवं राष्ट्रनिर्माता स्वामी विवेकानन्द का यह कथन उल्लेखनीय है- ''किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है, वहाँ की महिलाओं की स्थिति। हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुँचा देना चाहिए, जहाँ वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें। हमें नारीशक्ति के उद्धारक नहीं, वरन् उनके सेवक और सहायक बनना चाहिए। भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भाँति अपनी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता रखती हैं। आवश्यकता है उन्हें उपयुक्त अवसर देने की। इसी आधार पर भारत के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ सन्निहित हैं।''

 

संदर्भ ग्रंथ सूची-

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2.भारतीय संविधान,अनु0 14,15,16,19,21,23,39

3. गुप्ता कमलेश कुमार, महिला सशक्तिकरण,बुक एनक्लेव, जयपुर

4. सिंह करण बहादुर ,महिला अधिकार व सशक्तिकरण ,कुरूक्षेत्र , मार्च 2006

5.सुरेश लाल श्रीवास्तव, राष्ट्रीय महिला आयोग, कुरूक्षेत्र, मार्च 2007

6. गौतम हरेन्द्र राज , महिला अधिकार संरक्षण , कुरूक्षेत्र मार्च 2006

7 व्यास, जय प्रकाश , नारी शोषण , ज्ञानदा प्रकाशन , 2003

8.शैलजा नागेन्द्र , वोमेन्स राइट्स , ए डी वी पब्लिशर्स जयपुर , 2006

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12. जोशी, पुष्पा (1988) गांधी आन वोमन, सेन्टर फार वोमन'स डेवलपमेन्ट स्टडीज, दिल्ली

13. मिश्र, जयशंकर (2006) प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी, पटना

14. श्रीनिवास, एम0एन0 (1978) द चेन्जिग पोजीशन ऑफ इण्डिया वूमन, आक्सफोर्ड, यूनिवर्सिटी प्रेस, बाम्बे

15. राजनारायण डॉ0,स्त्री विमर्श और सामाजिक आन्दोलना

16. अखण्ड ज्योति

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डी0एस0एम0एन0 पुनर्वास,विश्वविद्यालय,लखनऊ,उ.प्र-226017

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एकविंशी शताब्दी समागता

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

श्वानो गच्छति कारयानके

मार्जारः पर्यङ्के शेते,

किन्तु निर्धनों मानवबालः

बुभुक्षितो रोदनं विधत्ते।

 

अचेतनाः पाषाणमूर्तयः

वखसज्जिताः सराजन्ते,

किन्तु दरिद्रो वृद्धोऽशक्तः

शीते वस्रं विना कम्पते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

विद्यालयेषु भवनाऽभावात्

ग्रामे तरुच्छायासु बवालकाः,

प्रकृतिनिर्मिते वातावरणे

किं पठन्ति जानन्तु भवन्तः।

 

परस्परं ते कलहायन्ते

मुहुर्मुहुर् अपशब्दायन्ते,

किन्तु शिक्षकाश्चिन्तारहिता:

तरोरधस्तात् सुख शेरते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

अतिवृष्टिभिः पीड़िता ग्रामाः

यदा जलौधे भृशं निमग्नाः,

जलप्रवाहे वहन्ति पशवः

अन्नाऽभावे रुदन्ति शिशवः

 

एतमेव जलप्रलयं ब्रहम

दुर्लभमिदं दृश्यमवगन्तुम्,

वायुयानमारुह्य प्रहृष्टः

नेता सपरिवारन् उड्डयते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्वचिद् बाबरीमस्जिद काण्डम्

क्वचिद् अयोध्यामार्च - कीर्तनम्

सतीप्रथामण्डने भाषणमू

अस्मृश्यता - समर्थन - वचनम्।

 

समानताया अधिकारस्य

संविधान - भावना - नाशनम्

मन्दिरेषु हरिजनव्यक्तीनाम्

नैवाऽद्यापि प्रवेशस्तनुते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

निर्वाचने न कोऽपि सज्जनः

प्रत्याशी भवितुमिह क्षमः,

चालयन्ति निर्वाचनकार्यम्

साहसिकास्तस्करा दस्यवः।

 

मतदाने केन्द्रेऽधिकारिणः

चाटुकारितामेव कुर्वते।

पराजितोऽपि येन प्रत्याशी

अन्तिमचरणे विजयं लभते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

मुख्यमंत्रि - निर्वाचन - करणे

विधायकानां न त्वधिकारः

दिल्लीतः प्रेक्षका निशायाम्

आगच्छन्ति राजधानीषु।

 

प्रात: कश्चित् काष्ठोलूकः

त्वरितमेव शपथं गृहणीते,

लोकतन्त्रमेतत् सुनवीनम्

राजतन्त्रमुपहसति भारते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्वचित् समक्षे बैंक - लुण्ठनम्

क्वचित् बलात् बालिकाऽपहरण्

क्वचिद् यौतकार्थ मध्याह्ने

गृहमध्ये नववधू- ज्वालनम्।

 

इतोऽधिकं का भवेद् विवक्षा?

दिनेऽप्यत्र नैवास्ति सुरक्षा,

नगरे नगरे मानव - हत्या

मत्कुण - वध - सादृश्यं भजते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

क्य गन्तासि? कुत आयातः?

का ते जननी? कस्ते तातः?

सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्येति

वेदान्तम् अनुचिन्तय भ्रातः!।

 

वृथा रति नश्वरे शरीरे

भज गोविन्दम् इत्युपदिश्य,

रेलविभागो यत्र सहर्षम्

नित्यं मुक्तिपथं दर्शयते।।

 

इयम् एकविंशतिः शताब्दी

पश्य सखे! आगता भारते।।

 

आई इक्कीसवीं शताब्दी

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कुत्ता चलता कार यान में

बिस्तर पर बिल्ली सोती है।

बेचारे गरीब की सन्तति

किन्तु भूख सहती रोती है।।

 

पत्थर की निर्जीव मूर्तियाँ

अच्छे- अच्छे वस्त्र पहनतीं।

किन्तु गरीबों की सन्ततियाँ

बिना वस्त्र के रहें काँपती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

विद्यालय भी भवन-हीन हैं

चलते हैं वृक्षों के नीचे।

सभी जानते खुली जगह में

क्या पढ़ रहे हमारे बच्चे।।

 

बच्चों की टोलियाँ परस्पर

गाली देकर युद्ध ठानती।

किन्तु शिक्षकों की यह पीढ़ी

सोती है कुछ नहीं जानती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कभी बाढ़ से गाँव हमारे

सहसा जल निमग्न हो जाते।

बहते हैं पशु जल धारा में

बच्चे अन्न बिना चिल्लाते।।

 

यही बात तब किसी के लिये

सुन्दरता की छवि बन जाती।

बैठे वायुयान में उड़ते

नेता जी की दृष्टि लुभाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कहीं बाबरी मस्जिद टूटी

कहीं अयोध्या-मार्च कीर्तन।

सती प्रथा मंडन में भाषण

छुआछूत का कहीं समर्थन।।

 

समता का अधिकार कहाँ है

संविधान भावना मिटा दी।

मन्दिर में हरिजन भक्तों पर

मनमानी से रोक लगा दी।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

निर्वाचन में कोई सज्जन

प्रत्याशी होता न यहाँ पर।

निर्वाचन का कार्य चलाते

चोर, लुटेरे, डाकू तस्कर।।

 

चाटुकारिता अधिकारी को

किंकर्तव्यविमूढ़ बनाती।

हुये पराजित प्रत्याशी को

अन्त समय में जीत दिलाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

मुख्य मंत्रियों के चुनाव भी

नहीं विधायक कर पाते हैं।

दिल्ली से जाते हैं प्रेक्षक

रातों रात बना जाते हैं।।

 

पता सबेरे चलता सबको

निर्वाचन की हुई मुनादी।

हंसता राजतंत्र कहता है

देखो लोकतंत्र आजादी।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

कहीं बैंक लुट रहा सामने

कहीं बालिका गयी भगाई।

कहीं दहेज नाम पर कोई

वधू नवेली गयी जलाई।।

 

क्या कहना है इसके आगे

कहीं सुरक्षा नजर न आती।

खटमल जैसी मानव हत्या

बुद्धि किसी की समझ न पाती।।  

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

जाना कहाँ-कहाँ से आये?

माता कौन पिता है कैसा?

ब्रह्म सत्य जग मिथ्या का

वेदान्त यही है सोचो ऐसा।।

 

वृथा प्रेम नश्वर शरीर से

भज गोविन्द कहो अब साथी।

रेल व्यवस्था इसीलिये ही

रोज मुक्ति का मार्ग दिखाती।।

 

भारत में आ रही साथियों

देखो इक्कीसवीं शताब्दी।।

 

(व्यंग्यार्थकौमुदी - डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री  से साभार).

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सार्थक सिनेमा की बढ़ती जरूरत
प्रमोद भार्गव

    अब फिल्म देखने की इच्छा दिमाग में नहीं जागती। यही वजह रही कि पिछले ड़ेढ़ दशक से छविगृह में जाकर कोर्ई फिल्म नहीं देखी। इधर 'मांझी द माउंटेन मैन' आई तो इसे देखने की इच्छा प्रबल हुई। दरअसल दशरथ मांझी 1990 के ईद-गिद जब अपने संकल्प के पथ निर्माण का सपना बाईस किलोमीटर पहाड़ का सीना तोड़कर पूरा कर चुके थे,तब इसकी सचित्र कहानी 'धर्मयुग' में छपी थी। तभी से इस दलित नायक की शौर्यगाथा ने मेरे अवचेतन में कहीं पैठ बना ली थी। सत्तर-अस्सी के दशक में समाज का कटू यर्थाथ और सामाजिक प्रतिबद्धता दर्शाने वाली फिल्में आती रहती थीं

आर्थिक रूप से समर्थ व्यक्ति भी इन फिल्मों को देखकर गरीब और वंचित के प्रति एक उदार भाव लेकर सिनेमा हॉल से निकलता था,लेकिन 1990 के बाद आए आर्थिक उदारवाद ने समुदाय के सामूहिक अवचेतन पर प्रभाव डालने वाले इस उदात्त भाव को प्रगट करने वाली फिल्मों को भी निगल लिया। युवाओं में संकल्प की दृढ़ता आज भी है। लेकिन प्रतिस्पर्धा की इस जबरदस्त होड़ में असफलता तमाम युवाओं को स्वयं में अयोग्य होने की ऐसी गुंजलक में जकड़ लेती है कि वह आत्मघाती कदम उठाने तक को विवश हो जाते हैं। प्रेम की असफलता भी उन्हें इस मोड़ पर ला खड़ा कर रही है। ऐसे में प्रेम,संकल्प और जिजीविषा की उधेड़बुन व निराशा के भंवरों को अपने चट्टानी इरादों से एक अति साधारण नायक कैसे रौंदता है, इस यथार्थ का पर्दे पर आना बेहद जरूरी था। जिससे एक प्रेरक नायक के चरित्र से लोग प्रभावित हो सकें। इस नाते ऐसी सार्थक फिल्में भविष्य में भी बनती रहनी चाहिए।


        दशरथ मांझी का चरित्र प्रेम,प्रण और दुस्साहस की ऐसी अनूठी गाथा है,जो हमारे इतिहास-चरित्रों में कम ही देखने को मिलती है। भगवान राम हमारे नायकों में ऐसे नायक जरूर हैं,जो अपनी अपहृत पत्नी सीता की मुक्ति के लिए समुद्र में सेतु बांधते हैं और लंका व लंकापति रावण का दहन करते हैं। किंतु राम एक बड़े साम्राज्य के युवराज थे। युवराज सत्ता से निष्कासित भले ही हो अंततः उसका वैभव,आकर्षण और नेतृत्व कायम रहता है। इसलिए उसे नया संगठन खड़ा करने में आसानी होती है। उसे अन्य सहयोगी सम्राटों का सहयोग भी आसानी से मिल जाता है। राम ने ऐसे ही संगठन और सहयोग के चलते वनवास में भी सैन्य-शक्ति अर्जित की और लंका पर विजय पाकर प्रिय पत्नी को छुड़ाया।


    इसके उलट एक विचित्र और अविश्वसनीय लगने वाली कथा हमें महाभारत के वन-पर्व में सावित्री-सत्यवान की मिलती है। दोनों आम परिवारों से थे। राजवंशी नहीं थे। यह भी प्रेम कथा है। सावित्री यह जानते हुए भी कि सत्यावन की आयु अल्प है,उससे स्वयंवर रचाती है। विवाह के एक वर्ष बाद वह भरी जवानी में विधवा हो जाती है। लेकिन वैधव्य को प्रारब्ध मानकर स्वीकार नहीं करती। मृत्यु के प्रशासक यमराज के प्रति प्रतिरोध पर आमदा हो जाती है। अंततः उसकी दृढ़ इच्छा-शक्ति और वाक्पुटता के चलते पुरूषवादी व्यवस्था के संचालक यमराज लाचार हो जाते हैं और सत्यवान को जीवन दान  देते हैं। आजकल साहित्य में यही जादुई यथार्थवाद खूब प्रचलन में है। हमारे प्राचीन साहित्य में स्त्री सशक्तीकरण का यह सशक्त उदाहरण है। पारंपररिक समाज व्यवस्था के अनुसार एक स्त्री युवा-अवस्था में विधवा हो जाने पर जीवनपर्यंत वैधव्य का अभिशाप भोगने को बाध्य थी। लेकिन वह इस अनुचित विधि-सम्मत प्रावधान का विरोध करती है। नियंता पुरूष इस सत्याग्रह के समक्ष घुटने टेकते हैं और सत्यवान को पुनर्जीवन देते हैं। इस अलौकिक घटना के माध्यम से वेद व्यास सामाजिक जड़ता को तोड़ते हुए दो प्रगतिशील मूल्यों को स्थापित करते हैं। पहला,स्त्री को सती होने की विवश्ता से मुक्ति दिलाते हैं। दूसरे,विधवा के पुनर्विवाह का रास्ता खोलते हैं।


    हमारे यहां दलितों के प्रतीक-पुरूषों के रूप में शंबूक,एकलव्य,अंगुलिमाल और डॉ भीमराव आंबेडकर भी सशक्त नायकत्व के रूप में पेश आए हैं। फिल्मों में इन चरित्र-नायकों को भी स्थान मिला है। एकलव्य तात्कालिक शिक्षा व्यवस्था में केवल ब्राह्मण और सामंत-पुत्रों को शिक्षा देने के प्रावधान के चलते अपना अंगूठा ही गुरू-दक्षिणा दें बैठता है। वहीं शंबूक के विद्रोह का शमण उसका वध करके राम कर देते हैं। भगवान बुद्ध के काल में सांमती मूल्यों के प्रखर लड़ाके के रूप में अंगुलिमाल सामने आए थे। लेकिन बुद्ध ने बड़ी चतुराई से अंगुलिमाल से हथियार डालवाकर सामंतवाद के विरूद्ध उसके विद्रोह को शांत कर दिया था। अंबेडकर समाजवादी लड़ाई के प्रणेता थे,लेकिन दलितों में बढ़ते बुद्धवाद ने व्यवस्था के खिलाफ आबंडेकर की सारी लड़ाई को ठंडा कर दिया है।
 

  प्रेम की उक्त शौर्य-गाथाओं और दलित नायकों के संघर्ष-कथाओं के क्रम में आजादी के ड़ेढ़ दशक बाद गया जिले के गिल्होर गांव में दशरथ मांझी के पराक्रम के उदय की शुरूआत होती है। दशरथ दलितों में भी एक ऐसी मुसहर जाति से है,निके ज्यादातर लोग चूहे मारकर अपने उदर के भरण-पोषण के लिए आजादी के 68 साल बाद भी अभिशप्त हैं। साथ ही सवर्ण,समर्थ और प्रशासकों के अत्याचार व शोषण की गिरफ्त में भी हैं। ऐसे में एक साहसी इंसान है,जो एक अविचल विशाल पहाड़ को अपनी पत्नी फगुनिया की मृत्यु का दोषी मानता है। क्योंकि यही वह पहाड़ है,जिसकी बाधा के चलते मांझी पहाड़ की ठोकर खाकर गिरी घायल व गर्भवती पत्नी को समय पर अस्पताल नहीं ले जा पाता और उसकी असमय मृत्यु हो जाती है। यही वह शख्स है,जो उसकी पत्नी-वियोग में लाचार नहीं होता। टूटकर आत्मघाती कदम नहीं उठाता। पुनर्विवाह भी नहीं करता। इसके उलट पत्नी के उपचार में बाधा बने पहाड़ के शिखर पर चढ़कर पहाड़ को ललकारता है कि वह कितना भी कठोर क्यों न होगा,तोड़ देगा। आखिर में 22 साल के अथक परिश्रम से वह उसे तोड़ भी देता है और दशरथ मांझी पथ का निर्माण भी हो जाता है। पहाड़ तोड़ने की प्रक्रिया में एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है,जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है। जीवन का ककहरा भी उसने नहीं पढ़ा है। पथ-निर्माण का उसने कोई अक्श कागज पर नहीं उकेरा। निर्माण के लिए धन उसके पास था ही नहीं,सो लागत के प्राक्कलन का सवाल ही नहीं उठता ? लेकिन बाधाएं कम नहीं थीं ? अपने ही गांव के संगी-साथियों की उलाहनाएं थीं। विकासखंड कार्यालय का भ्रष्टाचार था। वन और पुलिस अधिकारियों की प्रताड़नाएं थीं। मसलन एक बड़ी सामाजिक समस्या के निदान में निर्विकार व निर्लिप्त भाव से लगे व्यक्ति के समक्ष भी बीच-बीच में स्वार्थी तत्व पहाड़ सी बाधाएं उत्पन्न करते रहे। अलबत्ता जिस व्यक्ति ने यथार्थ में ही पहाड़ का सीना चीरने की ठान ली थी,उसके लिए कृत्रिम बाधाएं कहां रोक पाती ?


    कला फिल्में जीवन के यथार्थ का आईना होती हैं। विषयवस्तु में,शैली में,प्रस्तुतीकरण में और अभिनय में,सो केतन मेहता ने वर्तमान जिंदगी की असलियत को सटीक सांचों में ढाला है। इस फिल्म ने यह सच कर दिखाया है कि जिंदगी की असलियत किताबों और हरफों में नहीं है। यह भी सही नहीं है कि सिविल इंजीनियर ही रास्ता बनाने में दक्ष हो सकते हैं। हमें यह जानने की जरूरत है कि  रुड़की में जो देश का पहला अभियांत्रिकी महाविद्यालय अंग्रेजों ने खोला था,उसके पहले छात्र वे क्षेत्रीय किसान-मजदूर थे,जो अपनी ज्ञान-परंपरा से नहरों के निर्माण में दक्ष थे। देश का यह दुर्भाग्य रहा कि आजादी पाने के बाद से ही यह कोशिश नहीं की गई कि जनता को सामाजिक रूप से लोक-शिक्षण या देशज ज्ञान परंपरा के जरिए जागरूक व शिक्षित किया जाए।


    दरअसल,ज्ञान परंपरा समतामूलक समाज के निर्माण में अहम् भूमिका का निर्वाह करती है और ज्ञान-परंपरा में दक्ष सबसे ज्यादा कोई हैं तो वे पिछड़े और दलित ही हैं। लेकिन देखने में आ रहा है कि समूची सत्ता लोक-समाज के प्रति बेदर्द,निरकुंश और हिंसक बनी हुई है। प्रतिपक्ष भी उसके लोकविरोधी षड्यंत्रों में साझीदार हो गया है। यही स्थिति साहित्य और संस्कृति की है। अन्यथा क्या वजह है कि एक फिल्मकार तो दलित नायक का सामुदायिक हित साधने वाला चरित्र सिनेमा की विधा में उकेर देता है,लेकिन साहित्य पिछड़ जाता है। विभिन्न वैचारिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े और परस्पर पददलन में लग,साहित्य-मनीषियों के इस वास्तविक सामाजिक दायित्व से चूक जाने के परिप्रेक्ष्य में भी सोचने की जरूरत है ? क्योंकि दशरथ मांझी नाम का सख्श बुनियादी समस्या के समाधान के लिए अकेला ही मशाल लेकर बढ़ा और राह बनाई। ऐसे अनूठे व्यक्तित्वों की प्रेरक संघर्ष कथाएं साहित्य और फिल्म दोनों ही सार्थक माध्यमों से समाज के सामने लाईं जाना जरूरी हैं। जिससे अभावग्रस्त समाज भी नवोन्मेष और नवजागृति की ओर सोचने व समझने को उन्मुख है। दरअसल,ऐसे ही उपाय सामूहिक चेतना के फलक को व्यापक रूप देने का काम करते हैं।


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।

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रवि श्रीवास्तव

 

हर पल हर दिन उसका ख्याल मेरे दिमाग में रहता है। एक दिन बात न हो तो ऐसा लगता है कि सालों बीत गए हैं। उसे देखे बिना तो लगता है कि जिंदगी का सारा टेंशन आज ही है। एक परेशान आत्मा की तरह कब से भटक रहा हूं। लेकिन वो है कि बाहर ही नहीं निकल रही है। आंखें तलाश रही थी कि एक बार दीदार हो जाए। आज शायद खुदा को ये मंजूर नहीं है।

हर रोज की मेरी आदत बन गई है। सुबह 11 बजे से गेट पर खड़े होकर उसका दीदार करना। बिना उसके दीदार के पूरा दिन ठीक से नहीं गुजरता था। घर के बाहर और अंदर लगाए रहता। फिर उसका इशारा मिलता कि धूप है घर के अंदर जाओ फोन पर बात करना। मैं खुशी से अंदर चला आता था। आज फिर मैं उसी के इंतजार में दीदार के लिए अपने गेट पर खड़ा हूं।

तेज धूप से जमीन तप रही थी। मैं भी जिद पर अड़ा था। उसे देखकर ही दम लूंगा। धूप कह रही थी कि अंदर चला जा वरना जल जाएगा। वो बेरहम बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थी। जैसे उसे कुछ पता ही न हो। कोई उसका बाहर इंतजार कर रहा है।

सामने घर होने की वजह से इंतजार करने में मजा और गुस्सा दोनों आ रहा था। धूप में बैठा था। तभी एक हल्की सी झलक पैर की मिली। मुझे लगा शायद वो होगी। आंखे एकदम से उसी जगह रूकी थी। पहचानने की कोशिश कर रही थी। वो है या कोई और । आजकल उसके घर रिश्तेदार आते जाते रहते थे। बुआ की लड़की भी आई हुई हैं।

तेज धूप की वजह से प्यास भी लग रही थी। सोच रहा था अंदर गया तो कही आकर चली न जाए। मैं उसे देख न पाऊं। बड़ा दर्द था इस इंतजार में। वो आज तो नहीं दिखने वाली। घर पर बहुत काम होगा। पैर की जो झलक मिली भी थी वो भी कुछ ही सेकेंड में गायब हो गई थी। दिल सोच रहा था कि वह होगी या कोई और। बगल में हैंडपम्प लगा था। कुछ औरतें पानी भरने आ रही थी।

इस भीषण धूप में बैठा देख आश्चर्य चकित हो रही थी। लोगों को गर्मी की धूप बर्दाश्त नहीं और ये लड़का धूप में बैठा पसीने से तरबदर हो गया है। उठकर जाने का नाम नहीं ले रहा है। मैं भी नीचे सर किए बैठा था। घर पर कोई नहीं था। पापा, मम्मी आफिस गए हुए थे। इक पल को मुझे लगा चक्कर आ जाएगा। प्यास और भूख ने भी अपना कब्जा मुझ पर कर लिया था।

मैं कह रहा था भगवान ये कैसी सज़ा दे रहा है। मेरी जान ले ले पर ऐसी सज़ा मत दे।

तभी एक आवाज़ कानों में गूंजती है। जिसे सुनकर मैं दंग रह जाता हूं। उस आवाज़ का जवाब नहीं था मेरे पास। काफी देर से धूप में बैठा देख बगल की एक औरत पानी भरने आई थी। ये आवाज़ उसकी थी।

अरे भैया एतनी तेज धूप है, बाहर बैठे हो बहुत देर से, बीमार पड़ जाओगे। का घर से भगा दिहिन है का। मैं उसको देखता रह गया। कुछ जवाब नहीं दे पाया। मन में सोचा कभी तूने प्यार किया है जो आज बता रही है। धूप इतनी तेज है। बीमार हो जाओगे। बीमार मैं हूंगा। और दर्द इनको हो रहा है। जिसे देखो वही ज्ञान देने लगता है। गुस्सा तो इतना आया था कि पूछो मत। फिर मन में सोचा इतनी गाली तो दे दी है। ये बात भी सही कह रही थी। चलो कुछ देर अंदर चले जाए। फिर बाहर आकर देखेंगे।

फिर दिमाग ने कहा कि यही खड़ा रह बीमार हो जाएगा तो देखने के लिए आएगी वो। दिल ने कहा जो बाहर नहीं आई वो कहां से बीमार होने पर आएगी? अब तो पूरा मोहल्ला शांत होने लगा था। लूक चलने लगी थी। मेरे दिल में जो तूफान मचल रहा था ये इस लूक से कही ज्यादा था। दोपहर के खाने का वक्त हो गया था।

लेकिन यहां तो भूख प्यास मर गई थी। आंखें छत और गेट की तरफ देखें। शायद छत पर कपड़ा फैलाने के लिए आ जाए। या फिर गेट पर इक झलक दिखला जाए।

दिल को मनाकर कहा चलो, कुछ खा पी लेते हैं। यार नहीं तो, इंतजार काफी महंगा पड़ने वाला है। वो तो खा पीकर मस्त गर्मी में कूलर के सामने ठण्डी हवा का लुफ्त उठा रही होंगीं।

मैंने ठान ली । अब अंदर जा रहा हूं। कुछ भी हो जाए वो आए य न आए। इंतजार क्या करना जब उसे मेरी कोई कदर नहीं है तो?

जैसे ही मैं पीछे मुड़ा जाने के लिए। एक मोटर साईकिल आकर उसके गेट के पास खड़ी हुई। मैं रूक गया। दिल में उमंग अब तो गेट खोलने बाहर आओगे। गेट पर खटखट की आवाज़ हुई। अंदर से कदमों की आहट सुनाई पड़ी। गेट को खोला गया। और सामने देखकर मैं बौखला उठा।

गुस्से में एक घूंसा दीवार पर मारा और हाथ की उंगली फट गई। खून निकल आया था। जिसे देखने वाला सिर्फ मैं ही था। खून बह रहा था। उंगली पर काफी चोट आई थी। लेकिन दिल पर जो चोट लगी थी वो इस चोट से ज्यादा थी। ये दर्द तो बर्दाश्त हो रहा था। दवा से ठीक हो जाएगा। दिल का ये दर्द तो अब उसके दीदार से ही सही होता।

मेरा दायाँ हाथ कांप रहा था। गुस्से में मैंने जो दीवार पर मारा था। वो सिर्फ इसलिए वो नहीं उसकी दादी ने गेट खोला था।

आज मैं काफी बेचैन था रीता को देखने के लिए। और आज वो कि निकल नहीं रही थी। यहां तक कि पानी भरने भी नहीं आई थी। मोटर साईकिल से उतरे दोनों लोग अंदर गए। गेट फिर से बंद। मुझे लगा सो रही होगी। अब घर में मेहमान आए हैं तो उठेगी। चाय नाश्ता तो देगी।

अब तो दर्शन कर लूंगा। उसके बाद घर में जाकर खाना पीना खां लूंगा। मुझसे रहा नहीं गया। सड़क पर जाकर खड़ा हो गया। उसके गेट के करीब ताकि उसे देख सकूं। आए मेहमानों ने पानी पिया। एक टिफन बाक्स उठाया। और चलते बने। गेट उसकी दादी ने बंद कर लिया।

वो चलते बने लेकिन मेरे लिए सवाल छोड़ गए। आखिर रीता कहा है। वो बाहर क्यों नहीं आ रही है। हाथों में लगी चोट को उसके गेट की तरफ करके बैठ गया अपने गेट के पास सीढियों पर। और उस तेज धूप में सपने की दुनिया में खो गया। यही कि अब दरवाजा खुलेगा। वो मुझे देखेगी। मेरे हाथों में लगी चोट को देखकर परेशान हो जाएगी। कहेगी कि ये क्या हो गया ? जल्दी से घर से पानी लाकर घाव को साफ करेगी। पट्टी बांधेगी। और कहेगी आखिर ये सब क्यों करते हो। मैं थोड़े से काम में व्यस्त थी। बाहर नहीं आ पाई और आप ने इतनी बढ़ी सज़ा दे दी अपने को।

मैं उसे फोन भी कर रहा था। फोन की पूरी घण्टी भी जाती लेकिन उठता नहीं। गर्मी के साथ मेरा पारा भी बढ़ रहा था। बस एक बार फोन उठ जाए तो उसे काफी फटकार लगाऊंगा। एक, दो बार नहीं शायद सैकड़ों बार फोन किया था। जवाब एक ही था नॉट एंसरिंग।

मेरे किसी बात से नाराज तो नहीं हो गई है। दो दिन पहले मैंने कहा था कि हम घूमने चलेंगे। वो इंतजार कर रही थी। मुझे कुछ काम से कानपुर जाना पड़ गया था। उसने फोन भी किया था। मैं उसको बता नहीं पाया था। लौटकर आया था तो काफी नाराज हुई थी। बात नहीं कर रही थी। किसी तरह से उसे मना तो लिया था।

फिर से हम बात कर रहे थे। रात में करीब 12 बजे तक हमने बात की थी। फिर हम सो गए थे। और आज सुबह से खड़ी दोपहर हो गई और वो नहीं दिखी।

मुझे तो लग रहा है। वो दो दिन पहले वाली बात का बदला ले रही है। बेरहम घर के सामने पागलों की तरह धूप में बाहर बैठा हूं। उसे बदला लेने की सूझी है।

अगर बदला लेना ही उसे था तो बता देती। कम से कम मुझे पता तो होता कि वो नाराज है इसलिए नहीं आई।

दोपहर के करीब दो बज चुके थे। या ज्यादा से ज्यादा ढ़ाई। हाथों से बहा हुआ खून सूख गया था। हाथ में सूजन आ गई थी। मेरे दरवाजे के पास गिरी खून की बूंदें जम चुकीं थी।

तेज लूक धूल को आंखों में झोंक रही थी। प्यास से गला सूख चुका था। मैं अकेला बैठा था। ईश्वर को मेरा अकेला बैठना गवारा नहीं गुजरा। शायद रहम कर लिया था।

मेरा साथी भेज दिया था। जो इस धूप में मेरे रह सके। सर नीचे किए बैठा था। तभी मेरे बालों को किसी के छूने जैसा महसूस हुआ। मुझे लगा चलो सब्र का फ़ल मीठा हुआ। मुझे धूप में बैठा देख सबसे छुपते छिपाते वो आ गई है।

इतने में हाथ मे लगी चोट को ऊपर बिना देखे आगे कर दिया। मुझे लगेगा इसे देखकर वो चौंक जाएगी। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि मैं चौंक गया। मेरे हाथ पर किसी की जुबान का स्पर्श हुआ। अब मुझे लग गया था कि वो नहीं कोई और है।

जब देखा तो ईश्वर ने जो साथी भेजा था। वो हर रोज सुबह-शाम हमारे दरवाजा पर धक्का मारती थी। और घर से कोई निकलकर उसे रोटी खाने को दे देता था। वो गाय हमारे हाथों को चाटने लगी थी। जिसमें चोट लगी थी।

दर्द से मैं कराहने लगा था। जैसे वो चोट को चाटते हुए कह रही हो कि ये तुमने क्या किया? इन हाथों से मुझे रोटी खिलाते थे। इसमें चोट कैसे लग गई। दर्द होने की वजह से अपना हाथ खींच लिया था मैंने।

वो गाय भी उसी धूप में मेरे साथ बैठ गई थी। जिसे मैंने पाल नहीं रखी थी। बस सुबह-शाम का दोस्ताना था।

वो इस इंतजार में बैठ गई कि उसे खाने को कुछ मिलेगा। पर भूख की आग से ज्यादा तो दीदारे हुस्न की आग लगी थी।

मैं उस गाय से कह रहा था। उस लड़की से सही तो तुम ही हो। मेरे पास धूप में बैठ गए। उसे तो मेरे करीब आने का समय नहीं है। और न ही दरवाजे पर। कि मैं उसे देख सकूं।

वो गाय अपने सिर को ऐसे हिला रही है, जैसे वो मेरी पूरी बात समझ गई हो। मैं भी बेवकूफों की तरह उसे बता रहा था। कह रहा था किसी को इतना नहीं चाहना चाहिए? उसे कदर नहीं है मेरे प्यार की न मेरी। कब से यहां इंतजार कर रहा हूं। क्या वो अपने घर के बाहर भी नहीं निकल सकती? इतनी तो पाबंदी नहीं होगी उसे। मेरे सामने बैठी गाय अपनी सींगों से मुझे धक्का दे रही थी। जैसे कह रही हो अंदर जाओ वो नहीं आएगी। धूप में मत बैठो। या फिर वो गाय कह रही है कि कुछ खाने को दो। भूख लगी है। भूख से याद आया मैं भी सुबह नाश्ता कर अपनी ड्यूटी निभाने बैठ गए थे।

काम इतना था कि उठ नहीं पाए। ये हमारी ड्यूटी ही तो थी। बाहर बैठकर किसी के दरवाजे को ताकना। समय बीत रहा था। सब्र टूट रहा था। ये क्या ये रात क्यों होने लगी है। अभी तो तेज धूप थी। और अब रात हो गई।

हाथ में दर्द बढ़ गया था। ऐसा लग रहा था कि कोई हड्डी टूट गई होगी। उंगलियां चल नहीं रही थी। ऐसा लग रहा था। जान निकल जाएगी। अंधेरा बढ़ता जा रहा था। आंखें बंद हो रही थी। सुबह-शाम का मेरी दोस्त गाय ने भी साथ छोड़ने का फैसला कर दिया। बंद हो रही आंखों से इतना तो दिख ही गया था। वो गाय वहां से उठी और आगे चलती बनी।

फिर मुझे पता भी नहीं चला कि आगे क्या हुआ। शाम को जब आंखें खुली तो मैं अस्पताल में भर्ती था। ग्लूकोस की बोतल चढ़ रही थी। हाथ में पट्टी बंधी थी। सामने मेरी मां, पापा और भाई खड़े थे। सब को देखकर बस आंख में आंसू आ गए थे।

तब तक बगल के यादव अंकल ने पूछा बेटा अब तबीयत कैसी है। मैंने कहा ठीक है। सबने पूछा हाथ में कैसे चोट लग गई। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। डॉक्टर ने एक्सरे के लिए लिख दिया था। यादव अंकल पापा से बता रहे थे। मैं वहां से गुजर रहा था तो देखा कि आप का लड़का बेहोश पड़ा था। हाथ से खून बहा हुआ था। तो मैं वहां से इसे लेकर जिला अस्पताल आया। इमरजेंसी में दिखाने के बाद आप सबको फोन पर सूचना दी। हाथ में लगी चोट से लगता है कही मारपीट तो नहीं की है।

अब क्या था जिसे देखो बस यही बात जानने में लगा है कि आखिर क्या हुआ है? चोट कैसे लगी?

अस्पताल के बेड पर ग्लूकोस चढ़ रहा था। मेरा ध्यान फिर घर की सीढियों पर था। उसे पता चल जाएगा तो देखने जरूर आएगी।

कोई तो इसकी सूचना उसे दे दे। एक्सरे की रिपोर्ट में हाथ की दो उंगलियां टूटी हुई थी। जिन पर अब प्लास्टर चढ़ना था। बड़ा अजीब लग रहा था।

घर जाऊंगा तो वो देखकर बहुत गुस्सा होगी। कही गुस्से में अपना कुछ न कर बैठे। एक बार ऐसे ही मैंने उससे लड़ाई कर ली थी। तो उसने अपना हाथ ब्लेड से काट लिया था।

अब मैं इस हालात में घर जाऊंगा वो मुझे देखने जरूर आएगी। तो उससे क्या कहूंगा? आज तुम घर से बाहर नहीं निकले इस वजह से मैंने अपना ये हाल बना लिया। कहीं वो कह दे कि बहुत ज्यादा काम था। इसलिए बाहर नहीं आ पाए।

ग्लूकोस चढ़ जाने के बाद मुझे डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। इतने में यादव अंकल और पापा के बीच कुछ बात हो रही थी। बातों से लग रहा था कि मेरे सामने वाले घर की बात है। मुझे लगा अब तो पकड़ा गया।

सब लोग क्या कहेंगे? यादव अंकल कुछ और कह रहे थे। उसके बाद दोनों लोग बाहर चले गए। कुछ देर बाद पापा आए। तब तक ग्लूकोस चढ़ चुका था। मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया था।

पापा, मम्मी ने भाई को मुझे घर ले जाने को कहा। वो लोग कुछ देर रूककर आएंगे। मैं गाड़ी में बैठा सोच रहा हूं कि घर पर जैसे उतरूगां वो देखेगी तो भागते हुए आएगी।

मुझे देखकर रोने लगेगी। अब मैं फिर से उसी मोहल्ले में अपने घर के सामने था। आस-पास के लोग तो आए थे। लेकिन उनके घर से कोई नहीं आया। आता भी कैसे घर में ताला बंद था। सब लोग कही गए होंगे।

मुझे लगा कि अगर मैं अस्पताल न जाता तो उसे घर के बाहर निकलते देख लेता। हाय रे मेरी किस्मत।

अब क्या करूं। तभी एक एम्बुलेंस की आवाज़ आती सुनाई पड़ी। धीरे-धीरे आवाज तेज़ होती गई। अब तो आवाज़ कानों तेजी से भेद रही थी। गाड़ी घर के सामने आकर खड़ी हो गई। गाड़ी खड़ी होते ही रोने की आवाज़ आने लगी। लोगों की भीड़ ने पूरे सड़क को घेर रखा था। मेरे घर से भाई भी देखने के लिए बाहर निकले।

रोने की आवाज़ काफी तेज हो गई थी। मैं भी आखिर क्या हो गया देखने के लिए बाहर आया? जब मैं उस गाड़ी के पास पहुंचा तो एक बॉड़ी उतारी जा रही थी।

समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया? हल्की सी हवा चलने के बाद बॉडी के चेहरे से कपड़ा उड़ गया था।

अपने टूटे हाथ को लेकर मैं वहां गया था। देखकर उस चेहरे को मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। मैं फिर से बेहोश हो गया था। जमीन पर गिर गया था। मैं जिसका इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रहा था वो मेरे पास आ तो गई थी। लेकिन अब हमेशा के लिए दूर जा चुकी थी।

रोने की आवाज़ और पानी की कुछ बूंदों ने मुझे होश में लाकर खड़ा कर दिया। सब रो रहे थे मैं खामोश खड़ा था। मेरा पूरा शरीर एक बुत की तरह हो गया था।

उसका शरीर जैसे मुझसे कह रहा हो। मेरा इंतजार कर रहे थे लो मैं आ गई हूं। सब लोग कह रहे थे कि रात में एक बजे अचानक तबीयत खराब हो गई। पता नहीं चल पाया क्या हुआ? डॉ. ने लखनऊ के लिए रेफर किया था। जैसे ही ले जाने लगे। पता चला रीता अब नहीं रही। ताज्जुब की बात ये थी कि जिला अस्पताल में जहां मैं था, उसी के बगल वाले रूम में रीता का इलाज हो रहा था।

यादव अंकल और पापा के बीच यही बात हुई थी। मेरे आंखों से आंसुओं की धार शुरू हो गई थी।

लेकिन जुबां खामोश थी। मैं सोच रहा था कि सबने मुझसे क्यों छिपाया। अगर ऐसा कुछ था तो अस्पताल में आखिरी बार उससे बात तो कर लेता।

ऊपर वाले से पूछ रहा था। कितनी बड़ी सज़ा दी है। जिसके दीदार का इंतजार मैं रोज करता था, उसका आखिरी दीदार भी नहीं कराया।

जब मैं उसका आखिरी दीदार करने को मिला तो वो कुछ बोल नहीं सकती थी। ये खुदा मुझे भी इसके साथ बुला ले। इतना सोचते ही मैं फिर से बेहोश हो गया। मेरी सारी दुनिया तो उजड़ चुकी थी।

अब किसके लिए जीता? उसके शरीर को देखकर सोच रहा था। अभी झट से उठकर कहेगी ये हाथ में चोट कैसे लग गई। और मुझे लापरवाह कहेगी।

जब मैं उसे हकीकत बताऊंगा तो गले से लगाकर कहेगी इतना प्यार करते हो मुझसे। एक दिन नहीं नज़र आई तो हाथ ही तोड़ लिया।

जिंदगी भर नहीं आऊंगी तो क्या कर बैठोगे पता नहीं? शायद वो सच कह रही थी। अब मुझे जीने का कोई मन नहीं था। दिल कर रहा था खुदकुशी कर लूं।

कर भी लेता, मेरी जान तो उसके साथ ही चली गई थी।

केवल ये नश्वर शरीर बचा था। उसके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई थी। घर की महिलाएं उसे नहला रही थी। रो रो कर सबका बुरा हाल था।

उसे दुल्हन की तरह सजाया गया। और चार कंधों पर लेकर चल दिए। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था। मेरी रीता को मत ले जाओ। मुझे भी इसके साथ जाना है। सबको तब आश्चर्य हुआ।

मुझे कुछ लोगों ने पकड़ लिया। मैं रो रहा था, तो जैसे उसने कहा कि मैं वापस आऊंगी। मेरा इंतजार करो। अब तो ये पूरा झूठ था। वो दूसरी दुनिया में थी जहां से कोई वापस नहीं आ सकता है। उसके घर वालों का हाल बुरा था। मां तो बेहोश हुई तो अस्पताल पहुंच गई। दिमागी संतुलन बिगड़ गया। हो भी क्यों न जवान लड़की चली गई थी।

सब लोग अंतिम संस्कार कर लौटे थे। रात में सब चुप थे। मुझे पता नहीं क्या हुआ मैं शमसान में जहां उसे जलाया गया था वहां पहुंचकर उसकी राख से बात कर रहा था।

देखो न मुझे चोट लगी है। दर्द हो रहा है। उठो कब तक सोओगे। राख को अपने शरीर पर लगाता। और रोता चिल्लाता उठो। लेकिन हमेशा के लिए सोने वाले कैसे उठ सकते हैं। वो भी जो राख हो गए हो। उस शमसान में मेरी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।

रात काफी हो चुकी थी। मैं उसकी राख पर लेट गया। कोई तो मुझे भी आग लगा दो। अब नहीं जीना है। कब सो गया पता नहीं चला। मैं ये सोच रहा था कि ये एक बुरा सपना होगा। कल सुबह रीता मेरे सामने होगी। सुबह उठा तो एक कुटिया के अंदर था। जब उठा तो डर गया। ये डर था अपने सामने औघड़ बाबा को देखा जो काफी डरावने थे।

उन्होंने ने मेरा पता पूछा और घर का नम्बर फोन कर घर वालों को बुलाया और सारी घटनाओं के बारे में बताया। सब रोने लगें थे।

कह रहे थे बेटा होनी को कोई नहीं टाल सकता है। चलो घर चलो। घर पहुंचकर मैं लेटा हुआ था। तभी रीता के पापा घर आए और मेरी तबीयत के बारे में पूछा।

कहा बेटा, तुम्हारे और रीता के बारे में सब जानता हूं। रीता ने आखिरी समय में तुमसे मिलने की इच्छा जताई थी। लेकिन तुम अस्पताल में बेहोश पड़े थे। उसने तुम्हारे और अपने बारे मे सब कुछ बता दिया था।

मैंने कहा ठीक हो जाओ तो दोनों की शादी की बात कर लूंगा। लेकिन जाने कैसे उसे पता था कि वो हमें छोड़कर जाने वाली है। उसने कहा, पापा मेरे दिवाकर को हमेशा खुश रखना। मेरे जाने के सदमे को वो बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। वो कुछ कर बैठेगा। मैं अपनी आखिरी कुछ आवाज़ उसे सुनाना चाहती हूं।

मोबाइल में रिकॉर्ड कर लो। लो उसकी आखिरी ख्वाहिश थी तुम ही इसे सुनो। वो आवाज़

दिवाकर मुझे माफ कर देना। आज सुबह मैं बाहर नहीं आ पाई। मुझे पता है कि तुम मेरा इंतजार कर रहे होगे। धूप में बैठे होगे। मैं इस हालात में फोन भी नहीं कर पा रही हूं तुम्हें। तुम्हारी आवाज़ सुनने का बड़ा मन है। शायद हमारा इस जन्म का साथ यही तक है।

मुझसे प्यार करते हो तो एक काम करना। मेरे जाने के बाद कोई ऐसा कदम मत उठा लेना जिससे मम्मी पापा को परेशानी हो।

मुझे पता है कि तुम्हारे लिए मेरे बिना जीना मुश्किल है। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगी। इतना ही कह पाई थी कि आंखे बंद हो गई थी। और डॉ. ने लखनऊ के लिए रेफर कर दिया था।

दिवाकर अब तुम बताओ अगर इस तरह का काम करोगे तो रीता की आत्मा को दुख होगा।

वहां बैठे हम सब के आंख में आंसू थे। हाथ में लगी चोट के बारे में भी सब जान चुके थे।

अगली सुबह मैं फिर से उठा और नाश्ते के बाद रीता के दीदार के लिए दरवाजे पर खड़ा हुआ। तभी मेरी आंखों में आंसू आ गए।

ऐसा लग रहा था अभी दरवाजा खुलेगा और कहेगी अंदर जाओ धूप से फोन पर बात करना। गेट पर खड़ा रो रहा था। और इसके आने का इंतजार कर रहा था। फर्क बस इतना था कि इस बार उसके छत और दरवाजे को नहीं उस रास्ते को देख रहा था ।

जिधर से वो सजधज कर चार कंधों पर गई थी। अब सारी उमर आंखें उस रास्ते का इंतजार करेंगी

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रवि श्रीवास्तव

लेखक, कवि, कहानीकार, व्यंग्यकार,

सम्पर्क सूत्र- ravi21dec1987@gmail.com

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

कहा तो जाता है कि सभी को धुन का पक्का होना चाहिए।

पता नहीं वे लोग कहाँ चले गए जो धुन के पक्के हुआ करते थे और वाणी के भी।

उस जमाने का भी अंत हो ही गया है जब लोग मन-वचन और कर्म के पक्के थे।

इनमें से कोई भी कानों का कच्चा नहीं होता था।

सब के सब पक्के और जगर्दस्त पक्के हुआ करते थे।

अब पक्के नहीं रहे, सब जब कच्चे ही कच्चे दिखने लगे हैं।

कोई कानों का कच्चा है, कोई लंगोट से लेकर कच्छे तक का कच्चा। 

हृदय की दीवारों से लेकर मस्तिष्क के तंतुओं तक, और नख से लेकर शिख तक कहीं न कहीं तानों-बानों में किसी खामी या विकृति के चलते कोई मानसिक कच्चा है, कोई शारीरिक कच्चेपन से ग्रस्त।

आजकल सारे के सारे कच्चों ने सच्चों को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है।

कुछ न कुछ पाने और पाते हुए जमा कर देने की दौड़-भाग में सारे भाग रहे हैं, कुछ को पता है कि कहां जा रहे हैं, कुछ को भनक तक नहीं कि कहां जा रहे हैं, किधर ले जाया जा रहा है और कौन है जो हाँकता हुआ कहीं न कहीं से ले जा रहा है।

बहुत सारे हैं जो भेड़ों की रेवड़ों को चिढ़ाते हुए किसी न किसी के पीछे अनुचरी परंपरा को धन्य करते हुए चलते ही चले जा रहे हैं।

कोई पंक्तियों में चल रहा है, कोई पंक्ति तोड़ कर उन्मुक्त विचरण करता हुआ भागा जा रहा है। खूब हैं जो अपनी ओर देख भी रहे दिखाई देते हैं, अपनी ओर आते भी दिखाई दे रहे हैं लेकिन पता नहीं उन्हें या तो हम दिख नहीं रहे या कोई दृष्टि विकार आ गया है।

गाँव-कस्बों और शहरों से लेकर महानगरों तक सभी जगह रेले के रेले दौड़ रहे हैं, पूछो तब भी न बताएं कि कहां जा रहे हैं, पूछने पर भी कुछ तो बताते हैं, कुछ को पता ही नहीं।

सब पर कोई न कोई धुन सवार है जो उन्हें अपने आप से भी दूर किए हुए है और जमाने भर से भी। बहुतेरे हैं जिनकी तरफ देखो, कुछ भी कहो, कुछ पता ही नहीं चलता कि हम क्या कह रहे हैं, वे सुन या देख भी रहें हैं या नहीं।

आजकल आदमी की स्थिति विचित्र हो गई है। वह न अपने आप में रहा है न अपने आपे में।

हर तरफ धुन सवार है और इसी धुन को सुनने में मस्त होकर धुनी आदमी अपने-अपने हिसाब से जाने कहाँ-कहाँ भाग रहे हैं।

आत्मा की धुन को सुनें, परंपराओं की धुनों पर थिरकें तभी आगे से आगे बढ़ते हुए तरक्की के सोपान पाए जा सकते हैं।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

जीवनचर्या को आनंद से संचालित करना भी कला है। जो लोग इसे सीख जाते हैं वे निहाल हो जाते हैं। जबकि इसके प्रति नासमझी और उपेक्षा दर्शाने वाले लोग जीवन में चाहे कितनी तरक्की पा लें, हमेशा दुःखी, अभिशप्त और आप्त ही रहते हैं।

संसार बहुत बड़ा है और यह अपार संसाधनों से भरा हुआ भी है। लेकिन इसमें से किसकी हमें कितने अनुपात में आवश्यकता है, इसका निर्णय हमें अपने ज्ञान और विवेक से ही करना है। यह निश्चय किसी और के भरोसे कभी नहीं हो सकता।

पुराने जमाने में आज की तरह संसाधन और सुख-सुविधाएं, सेवाएं नहीं हुआ करती थी। बावजूद इसके लोग खुश थे और जो प्राप्त होता था उसमें परम संतुष्ट रहते थे। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी।

संसाधनों और सुविधाओं के मामले में आज ही तरह जमीन-आसमान का अंतर नहीं था। सबके पास वे ही सब वस्तुएं होती थीं जो समान रूप से सभी के लिए होती थीं। थोड़ा-बहुत ही अंतर था।

लेकिन यह अंतर इतना अधिक नहीं था कि किसी एक के वैभव और संसाधनों को देखकर दूसरों में किसी भी प्रकार से ईर्ष्या का भाव जगे। फिर इन संसाधनों के उपयोग और स्वामित्व के मामले में वह जमाना अत्यन्त उदार था इसलिए किसी भी जरूरतमन्द के लिए इसका उपयोग करना कोई मुश्किल नहीं था बल्कि सारे संसाधन सभी के काम आते थे।

इसलिए हर किसी को इस बात का भरोसा था कि वक्त जरूरत इनका उपयोग हमारे अपने लिए भी संभव है। अब न वह उदारता कहीं दिखाई देती है, न हमारे भीतर मानवीय संवेदना। फिर अब संसाधनों और सुविधाओं, वैभव और सम्पन्नता के मामले में खाई बहुत बढ़ गई है।

पूंजीवादियों और गरीबों के बीच इतना अधिक अन्तर आ गया है कि इसे पाटने में सदियां भी कम पड़ें। फिर बीच का एक वर्ग जो मध्यम कहा जाता है, वह इतनी अधिक संख्या में पसर चुका है कि यह आत्मदुःखी  होता जा रहा है।

इसका कारण यह है कि न ऊपर के वर्ग में इनकी पूछ है, और न नीचे के वर्ग के प्रति आत्मीयता। इस वजह से जब-जब भी ऊपर की तरफ देखते  हैं तब आत्महीनता का बोध होता है और नीचे की ओर देखना हम पसन्द नहीं करते क्योंकि हम सारे के सारे लोग उच्चाकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और ऊँचे स्वप्न देखने की दिशा में सरपट भाग रहे हैं।

पूरे संसार की स्थिति ऎसी ही है जहाँ हर आदमी न अपने आपमें खुश है, न जमाने भर से। हम सभी को इतना अधिक पा लेने की भूख सवार है कि हमारा दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो गई है।

सारे के सारे लोग कोई न कोई शॉर्ट कट तलाश कर लम्बी छलांग लगाकर दूर-दूर तक अपना साम्राज्य फैलाना चाहते हैं।

हमारे दुःख और विषादों का मूल कारण यह है कि हम उन सभी सुविधाओं और सेवाओं के साथ संसाधनों पर अपना हक़ जताना और इस्तेमाल करना चाहते हैं जिनका हमारे जीवन के लिए कहीं कोई उपयोग है ही नहीं।

यह सब विलासिता से ज्यादा कुछ नहीं है और इनके बगैर भी हमारी जिन्दगी अच्छी तरह चल सकती है। यही नहीं तो इनके बिना हम और भी अधिक आनंद से जीने का मजा ले सकते हैं।

हमारे जीवन की सारी विपदाओं का मूल कारण यही है कि हम जमाने भर के उपकरणों और वैभव को पालने वाले भण्डारियों और कबाड़ियों की देखादेखी अपने जीवन को चलाना एवं सँवारना चाहते हैं और इस वजह से हम वह सारी सामग्री भी अपने घरों और परिसरों में ले आते हैं जो हमारे किसी काम की नहीं।

चाहे भविष्य के प्रति असुरक्षा का भय हो अथवा सामग्री की भावी अनुपलब्धता का कोई खतरा। हमारी सोच ही ऎसी हो गई है कि जो कुछ मिल जाए, वह हमारे अपने नाम कर लो, फिर देखा जाएगा। और तो और मुफ्त में यदि कुछ मिलना शुरू हो जाए तो हम लपक कर लेने में भी पीछे नहीं रहें।

हमारी इस मनोवृत्ति का ही परिणाम है कि हम सभी असंतोषी और उद्विग्न जीवन जी रहे हैं। जीवन में सब कुछ पा जाने के बाद भी हमें संतोष नहीं होता, हम हर बार हर क्षण कुछ न कुछ पाने को उतावले बने रहते हैं।

सभी प्रकार की सम्पन्नता, आरामतलबी और वैभव पा लेने के बाद भी हम अपने को अभावग्रस्त ही महसूस करते रहेंगे यदि हमारा स्वभाव संतोषी नहीं बन पाए। फिर सम्पन्नता और विपन्नता, सुविधाओं और अभावों में हमेशा द्वन्द्व और उतार-चढ़ाव की नौबत आती रहती है और इन हालातों में जब चरम विलासिता के उपरान्त अभावों का कोई दौर आरंभ हो जाता है तब हमारे दुःख, विषादों और कुण्ठाओं का कोई पार नहीं रहता। यह स्थिति जीवन में अत्यन्त दुःखदायी होती है।

जीवन भर यदि कोई पूरी मस्ती के साथ आनंद पाना चाहे तो उसके लिए सबसे प्राथमिक और अनिवार्य शर्त यही है कि शरीर धर्म को समझें, आवश्यकताओं के अनुरूप कदम बढ़ाए और पूरी सादगी से रहे।

सादगी से जीवनयापन का कोई मुकाबला नहीं है। चकाचौंध, फैशन और दूसरों की देखादेखी नकलची बंदरों की तरह व्यवहार न करें बल्कि आत्मस्थिति, अपनी हैसियत और जरूरतों के अनुसार जीवन यात्रा के रास्तों को तलाशें और सहज, सरल एवं सादगीपूर्ण व्यक्तित्व को अंगीकार करें।

जिसने जीवन में सादगी को अपना ली, वह जिन्दगी भर के लिए मस्ती और आनंद का पा जाता है। उसके आनंद को न अभिजात्य वर्ग छीन सकता है, न अभावग्रस्तों की फौज।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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अनुवाद - अनुराधा महेन्द्र

मिस एमेली का जब निधन हुआ तो समूचा शहर उसके जनाजे में शामिल हुआ। एक जोर जहाँ पुरुषों में इसके पीछे एक ' स्तंभ ' के ढह जाने पर सम्मान- भरे स्नेह की भावना थी, वहीं स्त्रियों में उसके घर को भीतर से देखने कीं जिज्ञासा थी। क्योंकि पिछले तकरीबन दस बरसों से एक बूढ़े नौकर के सिवाय उसके घर के भीतर कोई आया-गया नहीं था। यह नौकर ही उसका माली और रसोईया भी था।

विशाल चौकोर फ्रेमवाला उसका मकान, अठारहवीं सदी की अतिशय खूबसूरत शैली में ऊंचा गुंबदाकार तथा कुंडलीनुमा बाल्कनियों से सजा मकान था। यह किसी जमाने में सफेद. रहा होगा, जो उस जमाने के सबसे विशिष्ट इलाके में स्थित था, पर गराजों और रुई ओटने की मशीनों ने वहाँ अनधिकार प्रवेश कर इस इलाके और आसपास की भव्यता व खूबसूरती को नष्ट कर दिया था, बस मिस एमेली का मकान ही बचा था- माल डिब्बों और गैसोलिन पंपों के बीच इस हठीली और नखरेबाज सँड़ाँध के ऊपर- जो सबकी आँखों में कटि की तरह चुभता था और अब मिस एमेली भी नहीं रही। वह भी अपने उन्हीं नामी-गिरामी प्रतिनिधियों में शामिल हो चुकी थी, जो जेफरसन के युद्ध में शहीद सैनिकों व समाज के खास और अज्ञात व्यक्तियो' की कब्रों के बीच देवदार के वृक्षों से ढके इस समाधिस्थल में चिरनिद्रा में लीन हैं।

जब तक मिस एमेली जीवित थी, वह पूरे नगर के लिए एक परंपरा, एक कर्तव्य व एक जिम्मेदारी थी- यानी पूरे कस्बे के ऊपर तक एक पुश्तैनी दायित्व! और यह दायित्व काफी अरसे, यानी 1894 से चला आ रहा था, जब एक दिन कस्बे के मेयर कर्नल सरटोरिस ने फरमान जारी कर उसको टैक्स अदा करने से छूट दे दी। यह छूट उसके पिता की मृत्यु के वक्त से .अब तक चली आ रही थी। ऐसा न था कि मिस एमेली खैरात लेना पसंद करती। पर कर्नल सरटोरिस ने एक किस्सा गढ़ रखा था कि मिस एमेली के पिता ने इस शहर को कर्जा दिया था, जिसे कारोबारी उसूलों के तहत यह शहर इस रूप में चुकाना बेहतर समझता है। कर्नल सरटोरिस की पीढ़ी और विचारधारा का ही कोई व्यक्ति इस तरह की बात गढ़ सकता था और महज स्त्रियाँ ही ऐसी. बात पर यकीन कर सकती थीं। जब आधुनिक विचारधारा वाली नई पीढ़ी ने मेयर और नगरपालक का दायित्व संभाला तो यह व्यवस्था देखकर उन्हें असंतुष्टि हुई। नए साल की पहली तारीख को उन्होंने उसे एक टैक्स नोटिस डाक से जारी किया। फरवरी तक कोई जवाब न आया। फिर उसे एक औपचारिक पत्र लिखकर किसी सुविधाजनक दिन मेयर के दफ्तर में आकर मिलने का अनुरोध किया गया। हफ्ते- भर बाद खुद मेयर ने उसे पत्र लिखा और उससे आकर खुद मिलने या कार भेजकर उसे बुलवाने की पेशकश की। जवाब में उन्हें पुराकालीन आकार के कागज के टुकड़े पर एक नोट मिला- जिस पर बारीक व बेहद सुंदर लिखावट में धुँधली स्याही से लिखा था कि उसने एक अरसे से बाहर जाना छोड़ दिया है। नोटिस को भी बिना किसी टिप्पणी के लौटा दिया था।

नगरपालकों के बोर्ड की एक विशेष बैठक बुलाई गई। एक प्रतिनिधि दल को उसके घर भेजा गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी, जहाँ से पिछले आठ-दस बरसों से कोई भी शख्स भीतर नहीं गया था। यह तब की बात है, जब से उसने चाइना पेंटिंग की कक्षाएँ लेना बंद कर दिया था। एक बूढ़ा अश्वेत उन्हें रोशनी वाले हॉल में ले गया, जहाँ ऊपर की ओर एक जीना जाता था, ऊपर और घना अँधेरा था। पूरे घर में धूल व बदबू भरी थी- घुटन व सीलन- भरी बदबू! अश्वेत उन्हें बैठक में ले गया, यह चमड़े के महँगे और भारी फर्नीचर से सज्जित था। जब अश्वेत ने खिड़की के पट खोले तो चमड़ा चरमरा उठा और उनके बैठते ही मूल का हलका-सा भभका हवा में तैरते हुए सूरज की किरणों के साथ घुलमिल गया।

अँगीठी के पास बदरंग पड़ चुके सुनहरे चित्रफलक में मिस एमेली के पिता का खड़िया से बना एक रेखाचित्र रखा था। जब मिस एमेली भीतर आई तो सब खडे हो गए। काले लिबास में वह छोटी नाटी स्त्री थी- पतली सोने की चेन उसकी कमर से बेल्ट के भीतर कहीं लुप्त हो गई थी। मलिन पड़ चुकी सोने के मुट्ठी वाली आबनूस की छड़ी पर वह टिककर खड़ी थी।

उसकी देह दुबली और कमजोर थी; शायद इसलिए गोलमटोल दिखने की बजाय वह मोटी दिख रही थी। लंबे समय तक स्थिर जल में डूबी देह की मानिंद उसका शरीर फूला-फूला-सा था। उसकी आँखें चेहरे पर गीले आटे के किसी गोले में धँसे कोयले के दो टुकड़ों की तरह दिख रही थीं। जब हम अपनी शिकायत बयाँ कर रहे थे तो उसकी निगाहें तेजी से एक चेहरे से दूसरे चेहरे की ओर घूमती।

उसने बैठने के लिए नहीं कहा। वह दरवाजे पर बस खामोश खड़ी तब तक सुनती रही, जब तक हमारा साथी अपनी बात पूरी कर चुप नहीं हो गया। अचानक सोने की चेन के सिरे पर लटकी अदृश्य घड़ी की टिकटिक सुनाई देने लगी।

उसकी आवाज शुष्क और सर्द थी- '' जेफरसन में मेरा कोई कर बकाया नहीं है। कर्नल सरटोरिस ने मुझे समझा दिया था। आप चाहें तो शहर के रिकॉर्ड की जाँच कर खुद को आश्वस्त कर सकते हैं। ''

'' पर हमने जाँच की है। हम शहर के प्राधिकारी हैं, मिस एमेली क्या आपको शेरिफ के हस्ताक्षर से नोटिस नहीं मिला। '' '

'' हाँ एक कागज मिला था, '' मिस एमेली बोली, '' शायद वह खुद को शेरिफ मानता हो, पर मेरा कोई कर बकाया नहीं है। ''

'' पर बहियों में तो ऐसा ही दर्ज है। देखिए हमें रिकॉर्ड से ही चलना पड़ेगा। '' '' देखिए कर्नल सरटोरिस, जेफरसन में मेरा कोई कर बकाया नहीं है। ''

'' पर मिस एमेली

'' देखिए कर्नल सरटोरिस ( हालाँकि कर्नल सरटोरिस का निधन हुए दस बरस गुजर चुके थे) मेरा कोई कर नहीं है, टोबे उसने ऊँची आवाज में पुकारा, वह अश्वेत हाजिर हो गया।

'' इन्हें बाहर का रास्ता दिखाओ। ''

इस तरह उसने उन्हें निकाल दिया, बिलकुल जैसे तीस बरस पहले उनके पूर्वजों को बदबू की बात को लेकर किया था।

यह उसके पिता के गुजरने के दो बरस बाद और प्रेमी के उसे छोड्‌कर चले जाने के कुछ अरसे बाद की बात है। हमें लगता था कि वह उससे ब्याह करेगा, पर वह चला गया। पिता के गुजरने के बाद यह बहुत कम घर से बाहर निकलती। प्रेमी के जाने के बाद तो उसने घर से निकलना ही बंद कर दिया। कुछ स्त्रियों ने उससे संपर्क करने का दुःसाहस किया पर उन्हें बेइज्जत होना पड़ा। उसके घर में वह अश्वेत ही जीवन का एकमात्र संकेत था।. तब वह युवा था- अकसर थैला उठाए बाजार आते-जाते दिखाई दे जाता।

'' क्या कोई पुरुष रसोई को ढंग से चला सकता है!'' स्त्रियाँ आपस में खुसर-पुसर करतीं। इसलिए जब उसके घर से बदबू आने लगी तो उन्हें रत्ती- भर भी अचरज नहीं हुआ। इस विशाल भरे-पूरे संसार और श्रेष्ठ व महान् ग्रियरसन परिवार के बीच यह एक और संपर्क सूत्र था।

उसकी एक पड़ोसी महिला ने अस्सी वर्षीय मेयर जज स्टीवन से बदबू की शिकायत की।

'' क्यों, क्या आप उसे बदबू रोकने के लिए नहीं कह सकते, क्या कोई कानून वगैरह नहीं है?''

'' मुझे यकीन है, उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी, '' जज स्टीवन बोला, ' संभवत : कोई साँप या चूहा होगा, जिसे उसके नौकर ने मारकर बाहर फेंक दिया होगा। मैं उससे बात करूँगा।

अगले दिन उन्हें दो और शिकायतें मिलीं, एक शिकायत पुरुष ने की जो उसके प्रति निंदा से भरा था, '' हमें इसके बारे में कुछ तो करना होगा। जज, मेरा मिस एमेली को परेशान करने का कोई इरादा नहीं, पर हमें कुछ करना ही होगा। '' उसी रात नगरपालकों के बोर्ड की बैठक हुई- तीन खेर बुजुर्ग और एक युवक जो नई पीढ़ी का सदस्य था।

'' यह कौन-सी बड़ी बात है, '' वह बोला, '' बस उसे कह देते हैं कि अपना घर साफ करवाए। उसे कुछ वक्त दिया जाए और फिर भी यदि वह ऐसा नहीं करती तो... ''

'' छोड़ो भी, '' जज स्टीवन बोला, '' क्या आप किसी महिला को सीधे उसके मुँह पर बदबू आने की बात कह सकते हैं?''

इसलिए अगले दिन आधी रात के बाद चार व्यक्ति मिस एमेली के लॉन में चोरों की तरह घुसे और लॉन का कोना-कोना सूँघते हुए बदबू का सुराग तलाशने लगे। उनमें से एक कंधे पर टँगे बैग में से छिड़काव करता गया। उन्होंने तहखाने का दरवाजा तोड़कर अंदर और आसपास की सभी जगहों पर चूने का छिड़काव किया। जब वे दोबारा लॉन से गुजरने लगे तो पहले जिस खिड़की में अँधेरा था, अब बत्ती जल रही थी और मिस एमेली वहाँ बैठी थी। रोशनी में उसकी सीधी, निश्चल व स्पंदनरहित काया किसी प्रतिमा की मानिंद दिख रही थी। वे लॉन में से रेंगते हुए धुँधली सड़क पर निकल आए। एकाध हफ्ते बाद बदबू चली गई।

इस वक्त तक लोगों को उससे सहानुभूति हो चली थी। कस्बे के लोग उन दिनों की याद करने लगे, जब उसकी नानी की बहन बुढ़ापे में अपना संतुलन खो बैठी थी। उन्हें लगता था कि ग्रियरसन परिवार दरअसल हैसियत से कुछ ज्यादा ही खुद को श्रेष्ठ समझता है। उन्हें कोई भी नवयुवक मिस एमेली के योग्य नहीं दिखता। हम अकसर उसके विवाह की कल्पना करते, जिसमेँ पृष्ठभूमि में मिस एमेली सफेद लिबास में पिता के पीछे खड़ी दिखाई देती। इसलिए जब वह तीस के करीब आई फिर भी अविवाहित थी तो हम दरअसल खुश नहीं थे, हमें यकीन था कि परिवार वालों की सारी बेवकूफियों के बावजूद मिस एमिली योग्य वर के प्रस्ताव पर अवश्य राजी हो जाती।

जब उसके पिता का निधन हुआ, तब सबको पता चल गया कि अब उसके पास संपत्ति के नाम पर बस वह मकान ही था। लोग खुश थे कि आखिर उन्हें मिस एमेली पर दया दिखाने का मौका मिल गया था। अब वह पूरी तरह अकेली रह गई थी- उस नौकर के सिवाय कोई न था। अब उसे कुछ हद तक पैसे का महत्त्व समझ में आ जाएगा। रिवाज के मुताबिक पिता की मृत्यु के अगले दिन सभी औरतें इकट्ठी होकर शोक व्यक्त करने पहुँची। वे उसकी कुछ मदद भी करना चाहती थीं। हमेशा की तरह सजी सँवरी मिस एमेली उन्हें दरवाजे पर मिली। उसके चेहरे पर दुःख या शोक का नामोनिशान न था। उसने कहा कि उसके पिता की मृत्यु नहीं हुई है। तीन दिनों तक वह लगातार यही कहती रही। उसके घर आने वाले सभी सरकारी अधिकारी और डॉक्टर उसे समझाते रहे कि उन्हें शव का क्रियाकर्म करने दें। आखिर जब वे कानून व जोर-जबर्दस्ती पर उतर आए तब वह जोर-जोर से बिलखने लगी। उन्होंने झटपट उसके पिता को दफना दिया। उस वक्त किसी ने नहीं कहा कि वह पगला गई है। हमें लगा यह .स्वाभाविक था। हमें उन तमाम नवयुवकों की याद आई?र जिन्हें उसके पिता ने भगा दिया था। हम जानते थे कि अब जब उसके पास कुछ नहीं बचा था तो वह पिता को ही जकड़कर रख .लेना चाहती थी, जिन्होंने उसका सब कुछ छीन लिया था।

लंबे अरसे तक वह बीमार रही। जब हमने दोबारा उसे देखा तो उसने. अपने बाल छोटे कर लिए थे, जिससे वह एक किशोरी-सी दिखती- गिरजाघर की रंग-बिरंगी खिड़कियों में बने देवतुल्य फरिश्तों की तरह- शोकमग्न और शांत!

नगर मैं पटरी बनाने का ठेका किसी कांट्रेक्टर को दिया गया था और उसके पिता के गुजरने के कुछ अरसे बाद गर्मियों में पटरी बनाने का काम शुरू हो गया। निर्माण कंपनी द्वारा इस काम के लिए कई हब्शी, खच्चर व मशीनें लाई गईं। होमर-बेरॉन नाम का एक अमेरिकी फॉरमेन भी आया था- लंबा-चौड़ा, साँवला, निपुण, फुर्तीला, भारी आवाज और चेहरे की तुलना में उसकी आँखों का रंग हल्का था। नन्हे-मुन्ने लड़के झुंड बनाकर उसके पीछे जाते। उन्हें हब्शियों को ईंट-गारे उठाते-गिराते हुए लय में काम करते देखना अच्छा लगता था। जल्द ही वह कस्बे के हर व्यक्ति को जानने लगा था। जब कभी किसी नुक्कड़ या चौराहे से ठहाकों की आवाज गूँजती तो समझ लो. होमर बैरन यकीनन उस झुंड में मौजूद होगा। आजकल मिस एमेली और वह इतवार की दोपहर अकसर पीले पहियों वाली बग्घी में जाते दिखाई देते।

शुरू में हम खुश थे कि मिस एमेली उसमें दिलचस्पी दिखा रही है। सभी स्त्रियाँ कहतीं, '' ग्रियरसन परिवार किसी उत्तर देशवासी के दिहाड़ी मजदूर के बारे में गंभीरतापूर्वक सोच ही नहीं सकता? पर कई बड़े बुजुर्गों का मानना था कि दु ख की इस घड़ी में संभवत : वह अपने अभिजात्य या कुलीन वंश को भुला देगी। उनके मुँह से निकल पड़ता, '' बेचारी एमेली उसके नाते-रिश्तेदारों को आना चाहिए। '' अलबामा में उसके कुछ रिश्तेदार थे भी, पर बरसों पहले उसके पिता ने उनसे नाता तोड़ लिया था। दरअसल बुढ़ापे में मानसिक संतुलन खो बैठी नानी की बहन न्यार की संपत्ति को लेकर उनसे झगड़ा हो गया था। तब से दोनों परिवारों के बीच कोई सँपर्क नहीं रहा। वे उनकी शव- यात्रा में भी शामिल नहीं हुए थे।

बूढ़े बुजुर्गों द्वारा सहानुभूति दिखाने पर पूरे कस्बे में खुसर-पुसर शुरू हो गई। '' क्या वाकई यह सच है से '' वे एक-दूसरे से कहने लगे, '' हाँ बिलकुल और भला क्या बात हो सकती है?'' ज्यों ही इतवार की दोपहर बची कस्बे से गुजरती, फुसफुसाहट शुरू हो जाती, ' बेचारी एमेली, वह अब भी उसी गर्व से भरी: रहती चाहे हमें लगता कि वह गिर चुकी है, ऐसा लगता मानो ग्रियरसन परिवार की अंतिम सदस्य के नाते वह सबसे अधिक मान सम्मान की दरकार रख रही थी। जैसे एक मर्तबा वह चूहे मारने. की दवा-संखिया खरीद लाई। यह उसके एक बरस बाद की बात है, जब लोग उस पर तरस खाकर ' बेचारी एमेली ' कहने लगे थे। इस वक्त तक उसकी चचेरी बहनें भी कभी-कभार उसके पास आने लगी थीं।

'' मुझे जहर चाहिए '' वह दुकानदार से बोली, तब वह तीस को पार कर चुकी थी, हालाँकि वह. अब भी जवाँ दिखती थी। पहले से दुबली हो गई. थी। चेहरे पर सर्द, मोटी काली आँखें, जिसकी त्वचा अस्त्रों के गोले से कनपटी तक विकृत-सी हो गईं थी। '' मुझे जहर चाहिए '' वह फिर बोली।

'' हाँ मिस एमेली, किस प्रकार का जहर? क्या चूहे वगैरह मारने के लिए? तो मैं सिफारिश करूँगा कि.. ''

'' जो सबसे बढ़िया हो, मुझे वही चाहिए किस प्रकार का, इसकी मुझे परवाह नहीं।

दवाई विक्रेता ने कई नाम गिनाए। इनसे किसी को भी, यहाँ तक कि हाथी तक को मारा जा सकता है, पर आपको- '' संखिया ही चाहिए ''

मिस एमेली बोली, '' क्या वह ठीक रहेगा?''

'' हाँ मैडम, पर आपको किसलिए चाहिए?''

'' मुझे संखिया चाहिए। ''

दुकानदार ने झुककर उसे देखा। एमेली ने भी पलटकर उसे देखा, उसका चेहरा बिलकुल सपाट व मुरझाया-सा था। दुकानदार बोला, '' ठीक है, यदि आपको यही चाहिए तो दिए देता हूँ पर कानूनन आपको बताना होगा कि किस काम के लिए आप इसका इस्तेमाल करेंगी?''

मिस एमेली उसे घूरने लगी। सिर टेढ़ा कर वह एकटक घूरती रही, जब तक दुकानदार नजरें हटा संखिया लेने न चला गया। पैकेट दुकान में काम करने वाला एक अश्वेत छोकरा ले आया। दुकानदार दोबारा बाहर नहीं आया। घर आकर जब उसने पैकेट खोला तो उस पर छड़ी और खोपड़ी के चित्र के नीचे लिखा था, '' चूहों के लिए। ''

अगले दिन हम सब कहने लगे कि ' वह खुदकुशी कर लेगी ' और शायद यह मुनासिब भी होगा। जब पहले-पहल हमने उसे होमर बैरन के साथ घूमते देखा था तो हमें लगा कि वह उससे ब्याह करेगी। फिर सब कहने लगे कि ' वह उस पर जोर जबर्दस्ती करेगी ' क्योंकि खुद होमर ने ही हमें बताया था कि उसे पुरुष पसंद हैं। सभी जानते थे कि वह कस्बे के क्लब में नवयुवकों के साथ बैठ पीना पसंद करता है, वह विवाह करने वाले पुरुषों में से नहीं है। बाद में जब भी चमकदार बग्घी में गर्व से सिर ताने बैठी एमेली और तिरछी टोपी लगाए दाँतों में सिगार दबाए पीले दस्ताने वाले हाथों में लगाम व चाबुक थामे होमर बैरन इतवार की दोपहर सामने से गुजरते तो हम सब ईर्ष्या से कहते ' बेचारी एमेली!'

बाद में कुछ स्त्रियों ने कहना शुरू कर दिया कि यह इस कस्बे के लिए बड़े शर्म और बदनामी की बात है और इसका हमारे युवा बच्चों पर गलत असर पड़ सकता है। पुरुष इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे पर आखिरकार स्त्रियों ने दीक्षा देने वाले पादरी को मजबूर कर दिया कि वह मिस एमेली को सीख दे। पादरी ने किसी को नहीं बताया कि एमेली के साथ बातचीत के दौरान क्या घटा? पर उन्होंने दोबारा जाने से इनकार कर दिया। अगले इतवार वे फिर सड़कों पर घूमते दिखाई दिए और दूसरे ही दिन पादरी की बीवी ने अलाबामा में मिस एमेली के रिश्तेदारों को चिट्‌ठी लिखी।

इस तरह एक बार फिर करीबी रिश्तेदार उसके घर आकर रहने लगे। हम सब इसी इंतजार में थे कि देखें अब क्या होता है? शुरू में कुछ भी नहीं घटा। हमें यकीन था कि वे दोनों ब्याह करने वाले हैं। हमें पता चला कि मिस एमेली सुनार के पास भी गई थी। जहाँ उसने पुरुषों के लिए चाँदी के एक सिंगारदान का ऑर्डर दिया और उसके हर कोने में एच ०बी० अक्षर खुदवाए। दो दिन बाद हमें पता चला कि वह नाइट सूट समेत पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली हर चीज खरीदकर लाई है। सब कहने लगे कि ' वे विवाहित हैं। ' हम वाकई खुश थे।

हमें रत्ती- भर भी अचरज नहीं हुआ, जब सड़क का काम पूरा होने पर होमर बैरन शहर छोड्‌कर चला गया। हमें हल्की-सी निराशा जरूर हुई कि इस बात का कोई हो- हल्ला नहीं हुआ। हमें यकीन था कि वह मिस एमेली को अपने घर ले जाने की तैयारी करने गया है या फिर उसे अपनी चचेरी बहनों से छुटकारा पाने का मौका देना चाहता है। हमारा अंदाजा सही निकला, क्योंकि एक हफ्ते बाद ही वे चली गईं और जैसा हमें पूरा भरोसा था, तीन दिन बाद होमर बैरन शहर में मौजूद था। एक पड़ोसी ने शाम के पहर झुटपुटे में रसोई के दरवाजे से अश्वेत द्वारा उसे. भीतर छोड़ते हुए देखा।

उसके बाद किसी ने होमर बैरन को फिर कभी नहीं देखा,।? मिस एमेली भी बहुत कम दिखाई देती। अलबत्ता अश्वेत यदा-कदा पोटली उठाए बाजार आते-जाते दिख जाता, पर मुख्य द्वार हमेशा बंद ही रहता। एमेली कभी-कभार पल- भर के लिए खिड़की में खड़ी दिखाई दे जाती। जैसे, उस रात. उन लोगों ने उसे देखा; जो चूना छिड़क रहे थे। पर तकरीबन छह महीनों से वह कभी बाहर नहीं निकली थी। हम जानते थे कि यह तो होना ही था, क्योंकि उसके पिता ने अपनी आदतों की वजह से उसके जीवन को नष्ट कर जहर घोल दिया था।

अगली मर्तबा जब हमने एमेली को. देखा तो वह मोटी हो गई थी। उसके बाल पकने लगे थे। अगले कुछ बरसों में ही उसके बाल पूरी तरह भूरे हो गए। चौहत्तर बरस की आयु में उसकी मृत्यु तक किसी सक्रिय आदमी कीं तरह गहरे भूरे ही थे।

इन तमाम बरसों में उसका मुख्य द्वार हमेशा बंद ही रहा। बस, केवल उन छह-सात बरसों को छोड्‌कर, जब वह करीबन चालीस बरस की थी और चाइना पैंटिंग की कक्षाएँ चलाती थी। नीचे के कमरों में से एक कमरे में उसने स्टृडियो बना रखा था, जहाँ कर्नल सरटोरिस के समकालीनों की बेटियाँ व पोतियाँ नियमित रूप से उससे पेंटिंग सीखने आती बिलकुल उसी नियम व श्रद्धा से जैसे वह हर इतवार को गिरजाघर जाया करती थी। इसी बीच उसके कर को माफ कर दिया गया।

फिर नई पीढ़ी ने नगर का जिम्मा सँभाला और पेंटिंग सीखने वाले बच्चे भी बड़े हो गए और यहाँ-वहाँ बिखर गए। उन्होंने अपने बच्चों को रंगों की डिब्बियों तूलिकाओं और महिलाओं की पत्रिकाओं में से कटी तस्वीरों के साथ पेंटिंग सीखने नहीं भेजा। आखिरी बच्चे के कक्षा छोड़ने के बाद मुख्य दरवाजा सदा के लिए बंद हो गया। जब नगर में मुफ्त डाक प्रणाली शुरू हुई तब भी मिस एमेली ने अपने घर के ऊपर लोहे का नंबर और डाकपेटी लगवाने से इनकार कर दिया। वह किसी तरह इसके लिए राजी न हुई।

दिन ब दिन, माह दर माह और साल दर साल हम उस अश्वेत को बूढ़े होते और उसकी कमर को लगातार झुकते देखते रहे- जो झोला उठाए बाजार आता-जाता रहता। हर साल दिसंबर माह में हम उसे टैक्स नोटिस भिजवाते, जो सप्ताह- भर में लौट आता। कभी-कभार हम उसे नीचे की किसी खिड़की में देखते- आले में रखी, तराशी प्रतिमा की मानिंद! उसने जानबूझकर घर की ऊपरी मंजिल बंद कर रखी थी। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी वह मौजूद रही। उसकी मौजूदगी को नकारना नामुमकिन था- प्रिय, अनिवार्य, अभेद्य, प्रशांत, अड़ियल।

और वह मर गई। धूल और अंधकार से भरे घर में वह बीमार पड़ी रही। पास था तो केवल वह लड़खड़ाता बूढ़ा अश्वेत। वह बीमार है, इसकी किसी को भनक तक नहीं मिली। अरसा पहले हमने अश्वेत से उसकी खोज-खबर लेना छोड़ दिया था। वह किसी से बात नहीं करता था, एमेली से - भी नहीं। दरअसल इस्तेमाल न करने की वजह से उसके गले को मानो जंग लग गया था। उसकी आवाज कर्कश और फट गई थी।

निचले हिस्से के एक कमरे में ही उसकी मृत्यु हो गई। परदे से ढके भारी भरकम बिस्तरे पर पके भूरे बालों वाला सिर तकिए में धँसा हुआ था- जो बेहद पुराना होने और धूप न मिलने के कारण मैला और पीला पड़ चुका था।

अश्वेत ने स्त्रियों के लिए दरवाजा खोला और उन्हें अंदर जाने दिया। ताक-झाँक और खुसुर-पुसुर करती स्त्रियाँ जैसे ही भीतर आई, वह अश्वेत गायब हो गया। वह घर के भीतर से होते हुए सीधे बाहर निकल गया और फिर कभी दिखाई नहीं दिया।

दोनों चचेरी बहनें भी तत्काल वहाँ पहुँच गईं। अगले दिन ही उन्होंने अंतिम संस्कार रखा, जिसमें पूरा का पूरा कस्बा मिस एमेली को अंतिम विदाई देने 'आया। उसकी अरथी खरीदे गए फूलों के अंबार के नीचे थी, पास ही चिंतन में लीन पिता का रेखाचित्र रखा था। स्त्रियों की सिसकारियाँ गँज् रही थी। बूढ़े -बुजुर्ग, जिनमें से कई चमकदार संघीय वर्दियों में थे, मैदान और दालान में खडे मिस एमेली के बारे में ऐसे बतिया रहे थे, -मानो वह उनकी समकालीन रही हो। कुछ तो यहाँ तक कहने से नहीं चूके कि उन्होंने उसके साथ नृत्य भी किया है और इश्क तक लड़ाया है। वे शायद गुजरे वक्त के गणितीय हिसाब को भूल रहे थे, जैसे अकसर इस उम्र में बूढ़े करते हैं, जिनके लिए गुजरा वक्त खत्म होती सड़क न होकर मानो घास का मैदान है, जिसे कोई मौसम छू नहीं सकता।

अब तक हम जान चुके थे कि सीढ़ियों से ऊपर एक कमरा है, जिसे चालीस बरसों से किसी ने नहीं देखा था और जिसे तोड़कर खोलना पड़ेगा। खोलने से पहले उन्होंने मिस एमेली को पूरी मर्यादा के साथ दफनाने का इंतजार किया।

जिस आक्रामकता के साथ दरवाजे को तोड़ा गया, उससे पूरा कमरा धूल से भर उठा। कमरे में ताबूत पर बिछाने जैसा एक झीना आवरण फैला रखा था, मानो कोई कब हो। कमरा दुल्हन की तरह सजा था। गुलाबी रंग के मखमली परदे, गुलाबी श्रृंगार मेज पर क्रिस्टल की तमाम नाजुक वस्तुओं के साथ चाँदी से बने पुरुषों के प्रसाधन सामान भी रखे थे। वे इतने मेले हो चुके थे कि उन पर खुदे .अक्षर धुँधले पड़ चुके थे। सामान के बीच एक कॉलर 'और टाई भी रखी थी, बिल्कुल जैसे अभी निकालकर रखी हो, कुर्सी पर सलीके से तह किया एक सूट टँगा था; और वहीं एक जोड़ी जूते जुराबों के साथ रखे थे। आदमी खुद भी बिस्तर पर पड़ा था।

काफी देर हम यूँ ही खड़े रहे, उस गंभीर और साँसरहित मुस्कराहट को देखते हुए। साफ दिख रहा था कि देह पहले आलिंगन की मुद्रा में रही होगी, पर अब गहरी चिरनिद्रा में थी, जो प्रेम से कहीं परे की चीज है, जो प्रेम के डरावने व विकृत रूप पर भी जीत हासिल कर लेती है, पर उसने उसे व्यभिचारी स्त्री की गुलामी की अवस्था मैं ला छोड़ा था। कुछ भी नहीं बचा था, शरीर का निचला हिस्सा इतनी बुरी तरह सड़ चुका था कि पहने गए नाइटसूट समेत उसके धड़ को बिस्तर से अलग करना नामुमकिन-सा था। उसके ऊपर और तकिए के आसपास धूल की मोटी तह जम चुकी थी।

फिर हमने देखा कि दूसरे तकिए पर सिर के आकार का गड्‌ढा-सा बन गया था।

हममें से एक ने जब उसे झुककर उठाया तो धुँधली, शुष्क और अदृश्य धूल हमारी नासिकाओं मैं भर गई। वहाँ पके भूरे बालों की एक लट सबने देखी

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(नोबर पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ, संपादक सुरेन्द्र तिवारी, प्रकाशक आर्य प्रकाशन मंडल , दिल्ली से साभार)

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दुनिया की प्रथम प्रेम कहानी


1 :-
कितने पाकिस्तान में समय ही नायक, महानायक और है खलनायक
अदीब और विद्या के परस्पर आकर्षण से आरंभ होती है कहानी
खामोशी की गहराई ही शायद था लगाव का पैमाना
मिलन, प्रतीक्षा और साथ साथ सफर चलता रहा यह दो साल
फिर विद्या से अलगाव, विद्या द्वारा बिना नाम पता के खत लिखना
अगर भेजा जाए मन से खत, तो कई जन्मों के बाद भी
पहुँच ही जाता है पहुँचने वाले तक


2 :-
किसी कारण ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु
उसे जोड़कर देखा गया, शुद्र शंबुक की तपस्या से
राजाराम द्वारा हत्या है एक जघन्य अपराध
जिसे किया है राजा राम ने


3 :-
वैदिक युग आसक्ति और व्यभिचार बलात्कार की है दास्तान
ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या है अपूर्व सुन्दरी
परियाँ भी उसके सामने पानी भरी
इन्द्र हो गया उस पर आसक्त
धारण कर लिया ऋषि गौतम का भेष
चैकसी के लिए उसने साथ लिया चंद्रमा
उसे नियुक्ति किया आश्रम के द्वार पर
और और ऋषि पत्नी अहिल्या के साथ तब
इन्द्र ने किया संभोग
ऋषि गौतम ने सुनाए तीनों को सजाएँ
इन्द्र को उन्होंने दिया शाप
ओ दुराचारी इन्द्र तेरा होगा पराभव
जिस आसक्ति के कारण तूने
मेरी पत्नी के साथ किया है दुराचार
ऐसे सहस्रों पाप प्रकट होंगे तेरे शरीर पर
और करते रहेंगे लज्जित तुझे जीवन भर
चन्द्रमा तेरे शरीर में हमेशा बने रहेंगे
मृगचर्म के दाग , तुझे लगेगा क्षयरोग
महीने में केवल एक दिन मिलेगी तुझे पूर्णता
बाकी दिनों में तू रूग्ण रूप में
बना रहेगा घटता बढ़ता म्लान
अरे तू कैसी है पतिव्रता पत्नी
तूझे पता नहीं चला किसी कपट का
तू नहीं जान पाई परपुरूष और अपने पति का भेद
रूप गर्विता हृदयहीना जा पत्थर की शिला बन जा


4 :-
युरूक के सम्राट गिलगमेश की गूंजती आवाज
मैं लड़ूँगा पीड़ा से सहूँगा यातना
कुछ भी हो मैं पराजित करूँगा मृत्यु को
मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि लाउँगा खोजकर
सदियाँ बीत गई मृत्यु से मुक्ति की औषधि लेकर मनुष्य
सम्राट गिलगमेश नहीं लौटा अभी
लेकिन देवदासी रुना और वन्य पुरूष एंकिदू
ने सहज ही कर लिया था
प्रेम नामक जिस संवेग का अन्वेषण
उन्हें नहीं था मृत्यु का भय
मनुष्य जाति में वह सदा सदा के लिए
स्थिर हो गया था जीवित और जाग्रत
उसे मार नहीं सकती मृत्यु
जला नहीं सकती थी अग्नि
उड़ा नहीं सकती थी वायु
उसे काट नहीं सकता था शस्त्र
उसे डुबो नहीं सकता था सागर
यह दुनिया की थी प्रथम प्रेम कहानी
उस कहानी में शामिल है
बूटासिंह और रेतपरी की कहानी
वर्जित प्यार ही होता है असली प्यार
जिस प्यार में वर्जना नहीं, वह है वेश्यावृत्ति
पर वह वृत्ति समाज द्वारा है स्वीकृत
तुम समाज को करो बहिष्कृत
मैनें अभी अभी सुना
तुम्हारी प्रेमिका ने चाहा है उसे जी लो
जो दिल चाहता है सुनो
दिमाग से जिओगे तो जी नहीं पाओगे
और यह दुनिया भी तुम्हें जीने नहीं देगी
अपनी वर्जना से उपर उठकर ग्रहण करो आसक्ति को
आसक्ति में ही है आनंद, आसक्ति ही है अंतिम
वह चाहे प्राप्त होती हो किसी शाश्वत मार्ग से
या नश्वर उपादन से
वर्जनारहित आसक्ति का करो वरण
इसे जिओ क्योंकि मनुष्य के सबसे
कोमल प्रतिबद्ध क्षण आसक्ति में ही होते हैं निहित
और प्रकृति बनाती है इन्हें पवित्र
सच्चाई यही है कि कुदरत ने बनाएँ है कुछ कानून
आदमी औरत के आपसी रिश्तों का है यही कानून
औरत कुछ देकर पाती है और आदमी कुछ पाकर देता है
शायद हम ही है सृष्टि
नश्वर होते हुए भी निरन्तर जी सकने की श्रृंखला की एक कड़ी
बड़ी संस्कृति का सूरज भी होता है बड़ा
हर औरत की शायद यही है कमजोरी
वह खोजती है एक चेहरे वाले आदमी को
और यह भूलकर कि तुम कौन हो
समा जाओ मुझमें और कर दो मुझे आजाद


5 :-
बाजारों के लिए बनते हैं साम्राज्य
और साम्राज्यों को जीवित रखने के लिए बनाए जाते हैं बाजार
साम्राज्यों की नाभि जुड़ी है बाजार से
पूंजीवादी प्रजातंत्रों को जीने के लिए
मुनाफे की बाजारों की जरूरत है बाजार
बाजार ! बाजार ! बाजार !
यही है औद्योगिक क्राँति को
सतत जीवित रहने की मजबूरी भरा सिद्धांत
यही है पूँजीवाद ! इसी का नाम है साम्राज्यवाद
तीसरा नाम है उपनिवेशवाद
आज दस्तक देती हुई नई सदी में इसका नाम है बाजारवाद


6 :-
किसी नेता को यह नहीं होता गवारा
जनता की भावनाओं को भड़काकर
पैदा किए गए आंदोलनों की यही ताकत
और है कमजोरी , एक बार जो कह दिया
पर बाद में चाहे लगने लगे अनुचित और गलत
पर उसे नहीं जा सकता बदला
नफरत और खौप की बुनियाद पर बनने वाली
कोई चीज नहीं हो सकती मुबारक
जैसे बापू कह रहे हो
गलत फैसलों से उपजती है हिंसा
और हिंसा से अपसंस्कृतियाँ और रक्तपात
दाराशिकोह का सिर कलम हुआ
उसी दिन हिन्दुस्तान की बनती
एक सहिष्णु और नई तहजीब का हो गया सिर कलम


7 :-
हिन्दू मिथ्या अहंकार का है शिकार
इसलिए गुरूनानक का वचन
कह रहा है बंजारे की तरह भटक भटक कर
इस दौर में जात पांत और ठीक झूठे
अभिमान से उपर उठा हुआ
और मोह लोभ से मुक्त नहीं है कोई व्यक्ति
ब्राह्मण तो कर्मकांड का सहारा लेकर
बाकी जनता पर कर रहा अत्याचार
आज हर सभ्यता, हर धर्म में पैदा हुआ है ब्राह्मणवाद


8 :-
इतिहास और भूगोल से अतिक्रमण करता कितने पाकिस्तान
बीसवीं सदी की महान उपलब्धि, एक अविस्मरणीय और महान कृति
हिन्दी के प्रथम विश्व उपन्यास
इन बंद कमरों में मेरी सांस घुटी जाती है
खिड़कियाँ खोलता हूँ तो जहरीली हवा आती है

 

 

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चालाक खरगोश


हम सबने शेर और खरगोश की कहानी सुनी है, जिसमें खरगोश अपनी चालाकी से जंगल के और जानवारों को बचा लेता है, हम सबने कछुआ और खरगोश की एक दूसरी कहानी भी सुनी है, जिसमें खरगोश कुएँ के जगत के पास सो जाता है और कछुआ से दौड़ प्रतियोगिता हार जाता है, दोनों कहानी में खरगोश कुएँ के जगत के पास सो जाता है, पहले कहानी में उसकी बुद्धि जाग जाता है,पर दूसरी कहानी में आलसी बनकर सो जाता है, पहली कहानी में चालाक और दूसरी कहानी में आलसी। खरगोश खरगोश है वह आलसी कहाँ होगा, खरगोश दो प्रकार का नहीं हो सकता, बच्चा भ्रम में पड़ जायेगा, वास्तव में खरगोश चालाक है या आलसी, हम दोनों कहानी को एक कहानी कहने पर वह चालाक नजर आता है, ये जो दो कहानियाँ हमें सुनाई जाती है, वास्तव में दो कहानियाँ न होकर एक ही कहानी है, हम सब यह जानते हैं, कछुआ और खरगोश की प्रतियोगिता में खरगोश ही जीतेगा, पर यह खरगोश की सोची समझी चाल थी, उसने अपनी पारी में कछुआ से दौड़ प्रतियोगिता रखी और वह जान बूझकर कुएँ के जगत के पास सो गया, जिससे कछुआ दौड़ जीत जाये और शेर के मुँह में चला जाये।

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शेर और खरगोश की एक नई कहानी


जंगल में एक शेर रहता है, वास्तव में शेर जंगल में ही रहता है और वह वहाँ का राजा रहता है, वहाँ जंगलराज करता है, वह कितना निर्दयी होता है, वह ही जाने,हम उसके बारे में कुछ भी नहीं कह सकते, हम भी उस जंगल के छोटे से जानवर हैं,वह कितनों को मारकर खाता है,कितनों फेंकता है, इसका पता नहीं चलता,जंगल के सब जीव जन्तु मिलकर उसके पास आते हैं और कहते हैं-आप हमें इतनी निर्दयता से हमें न मारे, हम आपके पास एक एक कर आते जायेंगे और आप बड़े प्यार से आहिस्ता आहिस्ता चबा चबा कर खायेंगे जैसे सिनेमा में खलनायक मुर्गा के टाँग को चबा चबा कर खाता है, जंगल के राजा को जैव विविधता के बारे में बताते हैं तो उसकी समझ में आता है और वह बड़ी मुश्किल से मानता है,फिर उसके पास सभी जानवर पारी पारी से आते हैं और वह उन्हें बड़ी बेरहमी से मारकर खा जाता है।
एक बार खरगोश की पारी आता है,तो वह सोचता है मरना ही है तो डरना क्या, वह कुएँ के जगत के पास सो जाता है,जब वह उठकर मुँह धोना चाहता है, तो कुएँ के पानी में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, उसकी बुद्धि तुरंत जाग जाती है, वह जोर से चिल्लाता है, हिप हिप हुर्रे, कुएँ से फिर प्रतिध्वनि होता है हिप हिप हुर्रे।
वह खुश होकर राजा शेर के पास जाता है, राजा भूख से बेहाल है, उसे कुछ नहीं सूझता है,वह क्रोधित होकर जोर से चिल्लाता है- इतनी देर क्यों लगा दी?
खरगोश की सब हवा निकल जाता है, वह थर थर काँपते हुए कहता है- मैंने सोचा मरना है तो डरना क्या, कहकर कुएँ के जगत के पास सो गया। शेर कहता है-मुझे मालूम है , सब मुझे मालूम है, फिर तू उठा, कुएँ में अपना चेहरा देखा, चेहरा देखकर खुशी से चिल्लाया, हिप हिप हुर्रे, कुएँ से प्रतिध्वनि आई हिप हिप हुर्रे, तू खुश होकर मेरे पास आ गया, पर तुझे मालूम नहीं , ये कहानी मेरे पापा ने मुझे बताया था, हमारी पूर्वज ने वो गलती की थी, फिर वह गलती मैं कैसे दोहराउँगा, अब तुझे समझ आया।
बाकी आगे क्या हुआ होगा, आप सब जान गए होंगे,आज भी हमारे यहाँ जंगलराज चल रहा है।

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सीताराम पटेल

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अजय ठाकुर

“कहीं धरती हमेशा उबलती है, कहीं आसमां हमेशा झुकता है। कहीं भूख हमेशा सोती है, कहीं रोटी हमेशा लड़ती है”।

यह सच है, भूख जब चरम पर पहुँच जाती है तो हर प्राणी अपनी भूख के लिए लड़ता है, अपनी रोटी के लिए लड़ता है। कई बार ये लड़ाई मानवीय और अमानवीय दोनों तरह की हो जाती है।

मधेपुरा, बिहार का एक ऐसा जिला, जो जिला तो है मगर उसको पूरी तरह से जिला बनने में अभी बहुत वक़्त लगने वाला था। रेलवे स्टेशन से शुरू होता शहर कॉलेज चौक पर आकर ख़त्म, दो किलोमीटर में पूरा शहर। तमाम स्कूल कॉलेज, सरकारी दफ्तर, बाजार इन्हीं दो किलोमीटर के दायरे में थे। सन १९९० की बात है, मई दोपहर की उफनती गर्मी में शहर के बीचोबीच पीडब्लूडी ऑफिस के मेन गेट पर बड़ी तादाद में लोग इकट्ठे हुए और जम कर नारेबाजी करने लगे। “मौज्मा गाँव को शहर से जोड़ो, शहर से जोड़ो, शहर से जोड़ो” “पक्की सड़क बनवाओ, सड़क बनवाओ, सड़क बनवाओ। उस वक़्त पीडब्लूडी चीफ़ इंजिनियर ने उस भीड़ को यकीन दिलाते हुए कहा “जल्द से जल्द सड़क बनवा दी जाएगी, हमें सरकार के भी आदेश मिल चुके है। देरी हो रही है तो सिर्फ तारकोल की वजह से, जैसे ही हमें तारकोल मिल जायेंगे, मौज्मा गाँव को मुख्यालय आने वाली पक्की सड़क से जोड़ दिया जाएगा”।

यह आश्वासन नेताओं के तरह तो नहीं थे और न ही सड़क बनवाने की माँग, किसी पार्क या सौंदर्यीकरण की थी। यह उस गाँव की मूलभूत जरुरत और वहाँ के जनता का वाजिब हक़ था। जिसे पीडब्लूडी चीफ़ इंजीनियर ने बड़े ही गंभीरता से लिया था।

कुछ महीने दिन बाद सड़क बनाने का काम शुरू हो गया। मगर यह काम ज्यादा दिन नहीं चल पाया। रोज-दिन तारकोल की कमी के कारण काम रुक जाता। एक बार फिर जब ग्रामीणों ने बवाल काटा तो चीफ़ इंजीनियर ने कहा “अब काम तब ही शुरू होगा, जब तक हमें पूरा तारकोल नहीं मिल जाता। तारकोल हमें जैसे-जैसे आगे से मिलेंगे, उसे आपके गाँव में भरोसे के तौर पर रखवाते जायेंगे। जिस दिन पर्याप्त मात्रा में तारकोल इकट्ठा हो जायेगा, काम पुनः शुरू कर दिया जायेगा”।

फिर क्या था, चीफ़ इंजीनियर के कथनानुसार मौज्मा गाँव के बाहर चिकनी पोखर के पास तारकोल जमा होने लगा। तारकोल जमा तो हो ही रहे थे मगर जमा किये गये तारकोल के ड्रमों में से कुछ ड्रम धीरे-धीरे गायब भी होने लगे। जब यह बात पीडब्लूडी के चीफ़ इंजीनियर को पता चली तो उन्होंने शत्रुघन और राम खिलावन नाम के दो चौकीदार रखवा दिए। उन्हें लगा शायद कोई छोटा मोटा चोर या गाँव के आवारे लड़के होंगे, जो अपने पॉकेट खर्च के लिए ऐसा करते हो। ऐसे में जब तारकोल की रखवाली शुरू होगी तो वे ऐसा नहीं कर पाएंगे।

चौकीदार रखने के बाद अब तारकोल की चोरी होनी लगभग बंद हो गई थी। मगर फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ ड्रम गायब हो ही जाते। उस दिन शत्रुघन और रामखिलावन को बुला कर चीफ़ इंजीनियर ने खूब डांट-फटकार लगाईं “तुमलोगों को तारकोल के ड्रमों की निगरानी करने के लिए रखा गया है, न की रात को सोने के लिए” इस डांट के बाद भी उस रात वे दोनों बड़े गुस्साए मन से तारकोल की रखवाली कर रहे थे।

“ये वक़्त भी बड़ी अजीब है। एक तो, है भी ढाई आख़र की और चाल भी टेढ़ा, बिलकुल उ शतरंज के घोड़ा के माफ़िक। देखो कहाँ लाके पटक दिया है हमको। कितना निमन से थे अपने गाँव में, सुबह, शाम, या रात, कोनो बेला अकेले नहीं रहते। कोई न कोई हमेशा संगे रहता, फिर उ चाहे माल-जाल ही काहे न हो और आज इहाँ, न आदमी, न आदमी का जात, बस लाठी थमा दिए है और भगाते रहो भूत को, जेकर कोनो अता पता नाही। इ भी साला कोनो नौकरी है छेssssssssssssss........”।

जरूरतें हम सब से वो करवा लेता है जो हम करना नहीं चाहते, पर हकीकत तो दिल ही जानता है उन जरूरतों को पूरा करने के लिए, हमें किन हालातों और दौर से गुजरना पड़ता है। कुछ तो चुप्पी साध के सह लेते है और कुछ अल्फाजों में अपना दर्द कह जाते है। कभी क्या ठाट थे शत्रुघन के भी, और आज सर्द की इस अकेली रात में अपने आज को डंडा मारता हुआ, अतीत की सुख अग्नि में मन को धधका रहा है। जिससे उसे कुछ तो अभी के अकेलेपन से मुक्ति मिल जाए। लगता है उसके अकेलेपन की पुकार उसके साथी ने सुन ली, जमीन से पूछ-पूछ कर डंडा पटकता हुआ राम खिलावन शत्रुघन के पास आकर “अरे शत्रुघन अकेले में का बडबडा हो भाई”?

“अरे राम खिलावन भाई आवा, आवा। का बताये ससुरी ठंड को भी साय लग गया है। सारा जलावन धुक दिए मगर हाड़ से कंपकंपी जा ही नहीं रहा। बिहान तक बच गये, तो समझेंगे माई ने “जितिया” अच्छे से की थी”।

“हाहाहा ... सही कह रहे हो शत्रुघन। आज तो वाकई में बड़ी ठंडी है। हमको लगा तुम आग जला रखे होगे, इसलिए आ गये थोड़ा गरमाने मगर तुम तो ...”

“चिंता नाही करो भाई, अभी आग धधका देते है”।

शत्रुघन ने बुझती हुई आग में प्राण फूंकने के लिए, थोड़े सूखे पत्ते और टहनियाँ पास पड़ी बोरी से निकाल कर रखा और फूंक मारते हुए बोला, “इ बताओ भाई, इ चौकीदारी हमलोग कब तक करते रहेंगे” ??

“जब तक “तारकोल का चोर” पकड़ा नहीं जाता”।

चोर का नाम सुनते ही गुस्से से तमतमा गया शत्रुघन “कसम से राम खिलावन भाई, इ चोर जोन दिन धड़ाया न नरेट्टी दबा देंगे हम”।

जब भी गाँव का कोई आदमी शत्रुघन के सामने “तारकोल के चोर” की जिक्र करता, वो यूँ ही आग बबूला हो जाया करता। एक बार तो उसने माधो चमाड़ का गिरेहबान पकड़ लिया था, जब उसने सिर्फ ये कहा “जाय दो शत्रुघन भाई, उ चोरो त एगो आदमी है न। वैसे भी उ सरकारे का धन चुराता है, हमरा और तुमरा नहीं”। “इहाँ बात सरकार की नाही है, हमरी इज्ज़त की है और उ चोर का पक्ष लेने का कोनो जरूरत नाही”। शत्रुघन के लिए तारकोल की रखवाली एक इज्ज़त बन चुकी थी और वो अपने इज्ज़त के लिए कहीं समझौता नहीं कर सकता था।

राम खिलावन नरेट्टी दबा देंगे वाली बात पर हँसते हुए कहा “हाहाहा, शत्रुघन भाई तुम बड़े मजाकिया हो”।

“का मजाकिया है, हम अपना क्रोध चोर के लिए दिखाए और आपको मसखरी लगा”। अजीब तो नहीं पर अजीब के आस-पास का शख्स था शत्रुघन, पल में हँसता और पल में गंभीर हो जाता। “आप का जाने हमरे दर्द को” कार्तिक महीना में एक जोड़ी बैल ख़रीदे उहो मुखिया से कर्जा लेकर। सोचे हर बोह कर थोड़ा पैसा कमा लेंगे मगर हराशंका किस्मत देखिये। दुए महीना में दोनों बैल मर गया। सर पर कर्ज आ गया अलग मुखिया का भी तगादा रोजे आना लगा सो अलग, का करते शहर आ गये सोचे इहाँ कुच्छो काम करके पैसे कमा लेंगे और कमाए पैसे से मुखिया का कर्जा चूकाय देंगे पर इहाँ तो पैसा कमाना, इतना आसान नाही है। “शेर के मुँह से खाना निकालने वाला कहावत सुने है ठीक वैसने मुश्किलों भरा है”।

“बड़ा दुःख हुआ सुन कर शत्रुघन भाई, हमे लगता था आप यह नौकरी टाइम पास के लिए करते है। मगर आप तो बहुत परेशान है। ऐसा कीजिये आप जब तक अपने जीवन का लेखा-जोखा कीजिये, हम तब तक एक चक्कर मार के आते चिकनी पोखर का है, आज आपकी भौजी ज्यादा प्यार से खिला दी।

राम खिलावन के जाते ही शत्रुघन ने भी सोचा एक बार तारकोल के डिब्बो की गिनती कर आये। डंडे को जमीन पर पटकता गुनगुनाते हुए आगे बढ़ा “बीती न बितायी रैना, बिरहा की जाई रैना”। तारकोल के ड्रमों के पास पहुँचकर अपने तीन सैलिया टौर्च की मरी हुई रौशनी में “दुय-दुय चार, चार-चार आठ, आठ-आठ सोलह, सोलह छाके छियानवे और इ दुय, अट्ठानबे हो गये पुरे”।

 

वापस आते हुए, उसके जेहन में गिनती पूरी होने की ख़ुशी के साथ एक सवाल भी था “इ चोरवा तारकोल का आखिर करता क्या होगा, जलावन तो है नहीं जो जलाय लेता होगा, और नाही कोनो बेचने वाला समान, फिर काहे ऐसा करता है समझ नहीं आता, जोन दिन धरायेगा तो जरुर पूछ लेंगे आखिर ससुरी करता क्या है”।

छह महीने से लगातार चल रही तारकोल की पहेदारी में शत्रुघन का गाँव वालों से इतना लगाव हो गया था कि उन लोगों

ने उसके लिए बांस की बल्लियों का एक मचान बना दिया था। जिसमें पूस की रातों में खुद को महफूज़ रख सके और रात बिरात में कुछ देर सुस्ता सके। शत्रुघन आकर अभी उसी मचान पर बैठा ही था कि चिकनी पोखर वाले हनुमान मंदिर से घंटा बजने की आवाज़ आई “इतने रतिया में इ गाँव में बजरंगबली का कौन भक्त जग गया भाई”, कलाई पर बंधी एचएमटी की घड़ी पर टौर्च जला कर देखा तो साढ़े बारह का वक़्त हो रहा था। जो आग राम खिलावन के आने पर धधकाई, वो भी अब बुझ चुकी थी। जैसे-जैसे रात गहरा रही थी ठंड और बढ़ती जा रही थी। रही सही कसर बची हवा ने पूरी कर दी। दूर खेतों से गेहूँ के बालियों को छूकर आने वाली ठंडी हवा शत्रुघन को जब छूती तो उसे अपने अम्मा की यादों के आँचल में पहुँचा देता। कैसे अम्मा के साथ रातों को वो अपने गेहूँ से बालियों से लदे खेतों की रखवाली करने जाता था। जुगनू को पकड़ कर माँ के आँचल में रखता और कहता “माई, टौर्च की कोनो जरुरत नाही पड़ेगा, हम अहि रौशनी में खेत ओगर लेंगे” और माई हँसते हुए कहती “बेटा, एक्कोगो जुगनू मर गया न तो पाप लिखेगा, इहो एगो जीव है छोड़ दे इसे” और जब माँ के कहने पर शत्रुघन उसे छोड़ता तो वहीँ जुगनू पुरे खेत में मंडरा कर रौशनी फैला देते। पर आज यादों की वो गर्माहट भी बेअसर थी।

ठंड से बचने के लिए अम्मा की आखिरी निशानी वाली शौल से खुद को ढँकने की मशक्कत करता पर बार-बार नाकाम हो जाता। एक तो शौल छोटी उपर से वक़्त ने उसपर गरीबी की बड़ी-बड़ी सुराक बना रखे थे।

“बुझाता है आज माई भी हमे नहीं बचा पायेगी, हे बजरंगबली तुम ही कछु करो”।

मचान पर करवटें लेते खुद को ढँकने की नाकाम कोशिश कर ही रहा था कि इस बार हनुमान मंदिर से उसे एक तेज़ रौशनी आती दिखाई दी, जैसे वो रौशनी उसे इशारा कर रही हो, उसे बुला रही हो? “इ राम खिलावन भाई भी गजबे है। बोलकर तो गये कि चिकनी पोखर जाते है मगर इतनी रात को मंदिर में का कर रहे है और हमको इशारा काहे दे रहे है? कहीं उ कोनों मुसीबत में तो नाही है, हे बजरंगबली का हो रहा है इ, पहले घंटा बजने की आवाज अब इ रौशनी, कोनो बात तो है जरुर, लगता है देखे ले जाय पड़ेगा”।

एक शंका के साथ उसके जेहन में एक डर भी गहराने लगा था। कहीं “सत्तो का उ गंधर्व वाली बात तो सच नाही है, की जब रतिया में चाँद मस्तक के उपर होता है तो इस चिकनी पोखर में गंधर्व आकर नहाते है और फिर वे बजरंगबली की पूजा करते है। बाप रे कही सत्तो का बात सच हुआ तो” “अरे नाही उ साला गंजेरी है, अल-बल ऐसे ही बकता रहता है। उ जरुर राम खिलावन भाई होंगे, जाकर देखते है और अभी पूछते है का बात है” ???

सत्तो से दोस्ती रामखिलावन ने ही करवाई थी अभी कुछ हफ्ते दिन पहले। सत्तो मौज्मा गाँव में अपने छोटे परिवार के साथ रहता है, दिन में साईकिल पर बर्तन-हांडी बेचकर अपने परिवार का गुजारा चलाता और शाम में वक़्त गुजारने के लिए इसी मचान पर आ कर बैठ जाता। जहाँ राम खिलावन और सत्तो चिलम पर चिलम सुलगाते। धुएं के हर कश पर जब सत्तों की आँखें छोटी होकर लाल हो जाती तो ऐसी ही बातें करता।

शत्रुघन डंडा पिटता हुआ मंदिर के करीब पहुँच कर आवाज़ लगाई “राम खिलावन भाई” लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। जवाब नहीं आने पर शत्रुघन की हिम्मत लड़खड़ाने लगी। सत्तो की बातें याद आने से उसके मन में एक डर घर कर गया था। डरते-डरते मंदिर के अन्दर टौर्च की रौशनी डाली तो वहाँ कोई नहीं दिखा “इहाँ जब कोई नाही है फिर उ रौशनी कौन दिखाया था, बाप रे कहीं सचमुच में गंधर्व तो नाही था”। शत्रुघन को मिली नाकामी उसके चेहरे पर डर बनके झलकने लगी। वो दम साधे वापस मुड़ा और तेज़ डग भरते हुए मचान के तरह हो लिया। अभी कुछ कदम बढ़ा ही था कि मचान के पास बुझी आग से लपटे उठनी लगी। उन आग की लपटों को देखकर उसकी सारी हिम्मत हिल गई। “हे बजरंगबली इ का हो रहा सब” और फिर “अरे नाही, सब ठीक है, उ राम खिलावन भाई होंगे उहाँ, उनको ठंड लगी होगी तो आग जला लिए होंगे, मगर उहाँ तो कोई बैठा नाही दिख रहा है।“

शत्रुघन अजीब कशमकस में फँस गया था। जो आँख से देख रहा था उसे अभी झुठलाता और कभी खुद पर हावी कर लेता। डर की परिस्तिथि में हर इंसान की कमोबेश ऐसी ही हालत होती है जो अभी शत्रुघन की हो रही है। उसे बचपन की अम्मा की कही बात याद आ गई “जोन बखत तुमपर कोनो संकट आये या डर लागे। और ऐसन बखत में तुमको कुछो समझ नाही आये तो बजरंगबली का पाठ करने लगो, देखना तुरंते तुमरा सारा संकट छू मंतर हो जायेगा”। अब उसके होंठ पर हनुमान चालीसा के श्लोक थे “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपिश तिहूँ लोक उजागर”।

आज माँ उसके साथ पहले से नहीं थी, इसलिए उनकी शौल से लेकर कही बातें निरर्थक हो रही थी। हनुमान चालीसा के पाठ करने के बाद भी आग बना वो दानव धधक रहा था और हाँथ में थमा बड़ा डंडा बचपन के खेल वाली गिल्ली-डंडा से भी ज्यादा छोटा नजर आ रहा था। ऐसे में डर के शत्रुघन इस विशाल दानव को अपने छोटे से डंडे से कहाँ तक फेंक पाता।

मचान के पास पहुँच कर चारो ओर देखा तो वहाँ कोई नहीं था सिवाय धधकते आग के। अब तो शत्रुघन के चेहरे पर इतने ठंड में पसीने भी उतर आये, कि तभी धड़ाम से तारकोल के ड्रमों की गिरने की आवाज़ आई, साथ ही किसी के कराहने की भी।

“बुझाता है चोर आया है” और बेसुध उस आवाज़ की ओर दौड़ लगा दी। हर दौड़ते क़दमों के साथ उसे अपनी आखिरी हिम्मत दिख रही थी। मन में खौफ़ और शंका की ऐसी धुंध जमने लगी थी जो तारकोल के ड्रमों के पास कुछ और उल्टा-पुल्टा होता तो ये धुंध सुबह के पहली रौशनी में ही हटती।

तारकोल के ड्रमों के पास पहुँचकर जो उसने देखा, उससे हैरान और परेशान दोनों कर गया, “सत्तो” ।

एक तारकोल के ड्रम के नीचे दबा हुआ था सत्तो, उसे एक औरत और तीन छोटे-छोटे बच्चे तारकोल के ड्रम के नीचे से निकालने की कोशिश कर रहे थे।

“अरे सत्तो, तू इहाँ, कर का रहा है??? और इ ड्रम के नीचे कैसे आ गया”???

शत्रुघन ने सत्तो को देखते ही सवालों की लड़ी लगा दी थी। तारकोल से भरे ड्रम के वजन के कारण सत्तो की टांग टूट गई थी और जिसके कारण वो दर्द से बुरी तरह कराह रहा था। शत्रुघन ने उस औरत और बच्चों की मदद से सबसे पहले सत्तो को बाहर निकाला। शत्रुघन ने ड्रम से थोड़ी दूरी पर लाकर सत्तो को बैठाया ही था कि औरत छूटते बोली “हमको जाने दीजिये हम चोर नाही है”।

“गजब आदमी है महराज आपलोग भी, हम इ कब बोले की आप चोर हैं”।

दर्द भरे आवाज़ में सत्तो बोला “हमलोग ही तारकोल के चोर है शत्रुघन भाई”।

तारकोल के चोर ये वो शब्द थे, जो शत्रुघन को क्या-क्या नहीं करवा दिया था। कभी कुछ देर पहले इसी तारकोल की रखवाली के चक्कर में एक डर तो उसकी जान निगलने वाला था। बिना कुछ समझे बुझे उसने गुस्से से उसका गिरेहबान पकड़ कर कहा “पूरा परिवार मिलकर चोरी करता है, आज धडाया है, दिन में बर्तन हांडी बेचता है, साँझ में गंधर्व का खिस्सा सुनाता है, और रतिया में चोरी-चकारी, उहो विथ फैम्लिज, काहे रे पाखंडी ऐसन काहे करता है”???

इसी सवाल का जवाब तो शत्रुघन तब से जानना चाहता था, जब से उसने यहाँ चौकीदारी शुरू की थी।

इस दफा जवाब सत्तो ने नहीं उसकी औरत ने रोते हुई दी “साहिब, इ सब हमलोग पेट के खातिर करते है”।

त का तुमलोग तारकोल खाते हो??? शत्रुघन के सवाल हास्यापद तो जरुर थे मगर उस परिस्तिथि के लिए जायज थे।

“नाही साहिब”

“फिरो तारकोल का, का करते हो तुमलोग”??

“साहिब तारकोल को खाते नाही है, हमनी लोग इ राक्षस को मिट्टी के निचे गाड़ देते है”।

“पर ई से का फ़ायदा तुमको मिलता है, औरों इ राक्षस कबे से हो गया”।

“साहिब फायदा अहि की सड़क नाही बनेगा और जब सड़क नाही बनेगा तो इ राक्षस हमरे छोटे से परिवार का मुँह का निवाला नाही छिनेगा”।

औरत की इस जवाब ने शत्रुघन को चौका दिया था, फिर भी खुद की तसल्ली के लिए उसने पूछा “का मतलब”??

औरत फफक-फफक कर रोने लगी थी, सत्तो के दर्द और कराह ने उसे ओस की गीली घासों पर बैठा दिया था। और अर्धनग्न बच्चे इस दानवी ठंड में एक गर्म आस की राह तक रहे थे शत्रुघन की ओर देख कर। शत्रुघन अब तक सत्तों के गिरेहबान को उसी क्रूर अंदाज में पकड़े हुए था जैसे माँ के आँचल में जुगनुओं को पकड़ कर रखता था।

रोते हुए सत्तो की बीबी बोल पड़ी थी “साहिब सड़क नाही रहने से सत्तो दिन में आस-पास के गाँव में बर्तन-हांड़ी सायकिल पर रख कर बेच लेता है। जेकरा से हमार दो बखत का चूल्हा चल जाता है, अगर अहि सड़क बन जायेगा तो सब शहर जाकर ही बर्तन-हांड़ी खरीद लेंगे फिर हमसे कौन खरीदेगा, कहाँ से हमारा चूल्हा जलेगा ??

सत्तो की बीबी के जवाब ने उसके पकड़ को ढीला कर दिया था। हाँ, वो सही कह रही थी आज सड़क नहीं होने के कारण या यातायात के सही साधन के अभाव में गाँव वाले अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बाज़ार नहीं जा पाते है। जिससे उस छोटे से परिवार की जीविका चलती है। ऐसे में अगर सड़क बन जाएगी तो उसके परिवार का क्या होगा, कैसे वो बच्चों की भूख और अपने जरुरतों को पूरा करेंगे? शायद इस सवाल का जवाब शत्रुघन के पास नहीं था तभी तो उसने सत्तो के गिरेहबान को छोड़ते हुए कहा “जाओ, आज हम फिरो से कोनो जीव का हत्या नहीं करेंगे। हम तोहनी लोगन को छोड़ते है पर तुम अपनी लड़ाई जारी रखो जब तक सबको इ एहसास न हो जाए कि प्रगति जरुरी है लेकिन इ प्रगति कोनो परिवार के पेट पर लात मार कर नाही। या तो सरकार या समाज तुम जैसे परिवार के बारे में पहले सोचे फिर प्रगति करे फिरो सही मायने में परिवर्तन का धुप सब के देहिया पर फबेगा। वरना इ परिवर्तन और प्रगति सब बेकार होगा”।

मेरी यह कहानी उतना ही बड़ा सच है, जिसे आप और हम कई दफे अपने स्वार्थ के बंद दरवाजे के अन्दर से नहीं देख पाते है। पर सच तो बंद दरवाजे के उस पार भी होता है। और उस बंद दरवाजे के अंदर और बाहर कई ग्रहों का फासला होता है। “जेकरा जाने के जरुरत छेय, कोशिश त करा एक्को बार”

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अजय ठाकुर 

मधेपुरा बिहार 

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

कलिकाल के दुष्प्रभाव से घिरे वर्तमान समय में जात-जात के असुरों का बोलबाला है।  पिछले सारे युगों के तमाम किस्मों के असुरों के आधुनिकतम और हाईटेक संस्करण सर्वत्र दिखने में आ रहे हैं। कई बार तो लगता है कि जैसे यह पूरा युग धर्म, सत्य, ईमान, शालीनता और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े लोगों के लिए है ही नहीं, जो सज्जन लोग इसमें पैदा हो गए हैं वे किसी न किसी गलती से जन्म ले चुके हैं अथवा नरक में जगह कम पड़ जाने की वजह से भगवान से किश्तों-किश्तों में मानसिक और शारीरिक पीड़ाएं भुगतने, विभिन्न प्रकार के संत्रासों के जरिये अपनी सजा भुगतने के लिए ही भेज दिए हैं। सारे के सारे लोग मूल्यहीनता में जी रहे हैं, भय, हिंसा, पाखण्ड, आडम्बर और लूट-खसोट का माहौल लगातार पाँव पसारता ही जा रहा है। हरामखोरी, नालायकियां, छीना-झपटी और आसुरी प्रवृत्तियों से कोई क्षेत्र अछूता नहीं है। वैश्विक स्तर पर हर तरफ स्थितियाँ खराब हैं।

जो देश स्वतंत्र हैं उनमें से कितने ही ऎसे हैं जहाँ के लोग अपनी स्वतंत्रता पर न गर्व कर सकते हैं, न इन लोगों को स्वतंत्रता का कोई मीठा अनुभव हो पाया है। उलटे ये लोग स्वीकारते हैं कि तथाकथित स्वतंत्रता से पहले स्थिति और ठीक थी। अब तो हालात खूब बिगड़ते जा रहे हैं। पहले एक राजा हुआ करता था, चंद दरबारी। अब बहुत सारे राजा पैदा हो गए हैं और दरबारियों की विस्फोटक संख्या का कोई पार नहीं है। न कहीं कोई सुकून है, न आनंद।  अपने ही देश में हम पराये होकर जी रहे हैं। एक ही राष्ट्र में एक जगह के लोग दूसरी जगह में जाकर व्यापार, कर्म नहीं कर सकते। सब के लिए समान कानून केवल बातों का विषय होकर रह गया है।

कभी धर्म के नाम पर हम गर्दन निकाल कर शोर मचाते हैं, कभी भाषा और क्षेत्र के नाम पर, कभी हमें अचानक अपने किसी अधिकार की याद आ जाती है और हुड़दंग मचाने निकल पड़ते हैं, कभी हमारी निष्ठाएं डगमगा जाती हैं, कभी आकाओं के इशारों पर हमारी उछलकूद माहौल खराब कर दिया करती है। कोई कहता है मैकाले ने सारा मटियामेट करके रख दिया है, कोई कहता है अंग्रेज तो चले गए, काले अंग्रेजों के खिलाफ एक और स्वाधीनता का युद्ध लड़ना पड़ेगा तभी स्वराज्य आ पाएगा। मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना। हर किसी को अपनी पड़ी है, हर कोई अपनी ही अपनी बात करने का आदी हो गया है। हम न देश की बात करते हैं, न समाज की। न अपने क्षेत्र की।

हमारा हर कर्म हमसे ही शुरू होता है और हम पर ही आकर खत्म हो जाता है। गरीबों और जरूरतमन्दों का उपयोग हमने पब्लिसिटी पाने के लिए छोड़ रखा है। पूंजीवादियों का हर तरफ बोलबाला होता जा रहा है। इन सभी प्रकार के हालातों के बीच शालीन और सज्जनों की हर तरफ मौत है। कोई सा क्षेत्र हो, इन लोगों से गधों की तरह काम लिया जाता है और यही कारण है कि इनमें से अधिकतर लोगों को गधामजूरी का पर्याय माना जाता रहा है। गधा सहनशील, स्वामीभक्त, सहिष्णु, धीर-गंभीर और संवेदनशील होता है और उसकी यही शालीनता उसके शोषण के तमाम रास्ते अपने आप खोलने लगती है। यही कारण है कि कामचोर, संवेदनहीन और अक्खड़ लोग हमेशा मौज में रहते हैं लेकिन सज्जन लोग भीतर ही भीतर दुःखी, तनावग्रस्त और परेशान रहते हैं और इस कारण से मानसिक और शारीरिक पीड़ाओं को झेलते रहते हैं। इनकी मांग भी ज्यादा होती है लेकिन इसके मुकाबले इन्हें न तो आदर-सम्मान मिल पाता है, न अपने घर-परिवार के लिए कोई समय। अपनी शालीनता के कारण ये लोग मन मारकर भी काम करते रहते हैं।

वंशानुगत संस्कारों की वजह से ये सभी का आदर करते हैं, किसी को ना नहीं कह पाते हैं और जिंदगी भर बोझ ढोये रहते हैं। इनके लिए ऊपर वाले भी शोषक की भूमिका में होते हैं क्योंकि उन्हें काम चाहिए होता है। ऊपर वालों को इससे कोई सरोकार नहीं होता कि कौनसा काम किसका है, किसे करना चाहिए, कौन नहीं कर रहा है। उन्हें काम से मतलब होता है और वह काम निकलवाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल शालीनों पर ही करते हैं। कामचोर लोग हमेशा अपने हाल में मस्त रहते हुए कर्मवीरों पर हंसते हुए पूरा का पूरा गुजार दिया करते हैं। इस स्थिति में हर शालीन और कर्मयोगी व्यक्ति को चाहिए कि हर मामले में साफ और सत्य कहे और अपनी स्थिति स्पष्ट करे। हो सकता है इससे ऊपर वाले लोगों के अहंकार का ग्राफ बढ़ जाए और वे कुछ अनुचित निर्णय लेने की सोच लें, मगर स्पष्टवादिता से सज्जनों का चित्त हल्का और शुद्ध हो जाता है और इससे उनके हृदयाकाश में भगवान की शक्तियां प्रकट होने लगती हैं जो किसी भी प्रकार से उनका नुकसान नहीं होने देती।  आज मूल्यों, सिद्धान्तों और आदर्शों पर जीने वाले सभी लोगों को चाहिए कि वे अपना पक्ष साफ और स्पष्ट रखें और किसी की परवाह न करें।  ईश्वर हमेशा शुद्ध-बुद्ध और कर्म में विश्वास रखने वाले लोगों की मदद करता है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

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