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September, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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हिंदी जगत को एक अनूठी भेंट आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ का लोकार्पण

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प्रस्तुति - अरविंद कुमार सिंहराजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया है। आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है। ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्…

श्रद्धा से करें श्राद्ध

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डॉ0 दीपक आचार्यहमारे कर्तव्य कर्म उन सभी लोगों के लिए हैं जो वर्तमान में हैं, अतीत में रहे हैं तथा भविष्य में आने वाले हैं। इस दृष्टि से दैवीय गुणों, धर्म-संस्कृति एवं समाज की सनातन परंपराओं से जुड़े व्यक्तियों का सीधा सा संबंध भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से जुड़ा रहता है। आत्मा नित्य और अमर है, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म में हमारा प्रगाढ़ विश्वास है और इस दृष्टि से हमारे प्रत्येक कर्म, स्वभाव और व्यवहार का असर हर युग में पड़ता है। हमारा यह सनातन रिश्ता न सिर्फ बीते किसी युग से होता है बल्कि कई-कई युगों से हमारे तार मजबूती से बंधे रहते हैं और आने वाले कई जन्मों तक यों ही किसी न किसी रूप में सम्बद्ध रहा करते हैं। संबंधों के मामले में कई सारे साक्षात होते हैं, बहुत सारे आभासी होकर अनुभवित होते हैं और ढेरों संबंध ऎसे हुआ करते हैं जो अदृश्य होते हैं और किसी न किसी कर्षण शक्ति की वजह से हमेशा सेतु के रूप में पीढ़ियों को जोड़े रखते हैं। यह जरूरी नहीं कि ये मनुष्य-मनुष्य में ही हों।  मनुष्य के अदृश्य तंतुओं भरे संबंध प्रायःतर देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, सिद्धों, तपस्वियों से लेकर पितरों और भ…

हास्य-व्यंग्य - पितृपक्ष में एक पुण्यात्मा

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वीरेन्द्र 'सरल'जब एक पुण्यात्मा चित्रगुप्त जी के दफ्तर में पन्द्रह दिन के लिए अर्जित अवकाश का आवेदन लेकर प्रवेश किया तो चित्रगुप्त जी चौंक गये। उन्होने पूछा-''ये सब क्या है। आप इतने लम्बे समय तक स्वर्ग से बाहर रहेंगे तो स्वर्ग का क्या होगा, पता है आपको? पुण्यात्मा ने कहा-''सर आज पता नहीं कैसे अचानक मेरे दिमाग मे यह विचार आया कि अभी जम्बूद्वीप, आर्यवर्त, देव भूमि और ना जाने क्या-क्या नाना अलकंरणों से अलकृंत मेरे देश में पितृ पक्ष का पर्व चल रहा है। मैंने सुना है कि इस समय वंशज अपने पूर्वजों का पुण्य स्मरण करते हैं और उनके अधूरे कार्यो को आगे बढ़ाते हुए पूर्ण करते है। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए मैंने अपनी कुर्बानी दी थी, देह छोड़ते समय मेरे भी बहुत से स्वप्न अधूरे थे। मैं अपने देश को खुशहाल देखना चाहता था। सभी देशवासियों को सुखी और सम्पन्न करने का मेरा लक्ष्य था। अब तो बहुत समय बीत चुका है शायद मेरे अधूरे स्वप्न अब पूरे हो गये होगे। जिस आदर्श समाज की कल्पना मैंने अपने जीवन काल में की थी अब वह साकार हो गया होगा। देश भय, भूख और भ्रष्ट्राचार से मुक्त हो गया होगा। क्यों न …

अंतरिक्ष में भारतीय दूरबीन

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प्रमोद भार्गव भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सफलता के लगातार नए-नए झण्डे फहरा रहा है। इसी क्रम में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने देश की पहली अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट का सफल प्रक्षेपण किया है। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-30 ने उड़ान भरने के बाद महज 22 मिनट 32 सेकेंड में 650 किलोमीटर की दूरी तय करके ऐस्ट्रोसेट को पृथ्वी की निर्दिष्ट कक्षा में प्रक्षेपित करने में अहम् कामयाबी हासिल कर ली। अमेरिका,यूरोपीय संघ,जापान और रूस के बाद यह उपलब्धि अब तक भारत के ही हाथ लग पाई है। जबकि हमारा प्रतिद्वंद्वी चीन अभी अपनी अंतरिक्ष दूरबीन के निर्माण की प्रक्रिया में ही है। इस दूरबीन को खगोलीय स्त्रोतों का अध्ययन करने का एक समग्र साधन माना जा रहा है। इसलिए भारत के इस वैज्ञानिक - खगोलीय करिश्मे पर दुनिया की निगाहें टिक गई हैं। मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव उसकी प्रकृति का हिस्सा रहा है। मानव की खगोलीय खोजें उपनिषदों से शुरू होकर उपग्रहों तक पहुंची हैं। हमारे पूर्वजों ने शून्य और उड़न तश्तरियों जैसे विचारों की परिकल्पना की। शून्य का विचार ही…

क़ैस जौनपुरी की कविता - मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा

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क़ैस जौनपुरीमैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगाआज बक़रीद है सुबह सुबह किसी ने टोका ईद मुबारक़ हो ईद मुबारक़ हो नमाज़ पढ़ने नहीं गए लेकिन स्वीमिंग करने जा रहे हो हाँ मैं नहीं गया क्यूँकि मैं नाराज़ हूँ उस ख़ुदा से जो ये दुनिया बना के भूल गया है कहीं खो गया है या शायद सो गया है या जिसकी आँखें फूट गयी हैं जिसे कुछ दिखाई नहीं देता कि उसकी बनाई इस दुनिया में क्या क्या हो रहा है हाँ मैं नाराज़ हूँ और तब तक मस्ज़िद में क़दम न रखूँगा जब तक आयलन कुर्दी फिर से ज़िन्दा नहीं होता जब तक दिल्ली की वो दो लड़कियाँ सही सलामत वापस नहीं आतीं जिन्हें जलते हुए तारकोल के ड्रम में सिर्फ़ इसलिए डाला गया था क्यूँकि वो मुसलमान थीं और हाँ मुझे उनके चेहरे पे कोई दाग़ नहीं चाहिए मैं नाराज़ हूँ और तब तक मस्ज़िद में क़दम न रखूँगा जब तक हरप्रीत कौर और हर पंजाबन औरत और बच्ची बिना खंजर लिए सुकून से नहीं सोती जब तक दंगों में ग़ुम मंटो की शरीफन अपने बाप क़ासिम को मिल नहीं जाती तब तक मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा मुझे तुम्हारे क़ुरआन पे पूरा भरोसा है बस उसमें से ये जहन्नुम का डर निकाल दो डर की इबादत भी भला कोई इबादत है कैसा होता कि मैं अपनी ख़ुशी से जब चाहे मस्ज़िद …

पांच हजार दो, पत्रकार बनो

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रवि श्रीवास्तवजी हां आप सोच में पड़ गए होगें. पांच हजार देने पर कैसे पत्रकार बनेंगे. लेकिन पत्रकारिता के इस दौर में सब कुछ मुमकिन है. पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए लाखों का खर्चा आता है. अगर आप किसी प्राइवेट इंस्टीट्यूट से पढ़ाई करते हैं. लेकिन आज के इस दौर में इसकी पढ़ाई की जरूरत ही नहीं. अगर आप के पास पैसा खर्च करने के लिए है. एक सच्चाई से आप को वाकिब कराना चाहता हूं. नौकरी बदलने के लिए मैने कई जगहों पर अपना बायोडाटा भेजा था. एक जगह से जिसका जवाब आया. नाम से तो लग रहा था काफी संस्कार भरा न्यूज चैनल हैं. लेकिन फोन उठाते ही जब बात हुई तो मुझसे कहा गया कि आप हमारे साथ काम कर सकते हैं. जिसके लिए आप को पांच हजार रूपए डिपोजिट करने होगें. पैसे के डिपोजिट होते ही आप को लेटर, आईडी, चैनल की आईडी भेज दी जाएगी. अगर आप रूपए नहीं दे सकते तो 5000 का विज्ञापन दे दीजिए. बात यही खत्म नहीं होती. मैने जब उनकी तरफ से हमें खबर का क्या मिलेगा पूछा तो साफ मना कर दिया. हम आप को कुछ नहीं देंगे. विज्ञापन का 20% आप को दिया जाएगा. अगर आप विज्ञापन देते है. मैने फिर अपनी एक बात रखी. इतनी जल्दी ये संभव नहीं होगा. …

शहरी जीवन की मनोदशा का वर्णन : सपना

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समीक्षक - एम.एम.चन्द्रा डॉ. लवलेश दत्त की कहानी संग्रह की समीक्षा लिखना बहुत ही श्रमसाध्य रहा. वैसे तो इस कहानी संग्रह को दो अन्य साथियों ने भी पढ़ा और अपनी राय जाहिर की लेकिन उनका नजरिया इस पुस्तक को लेकर काफी भिन्न था. इस संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं जिन्हें बिना किसी भूमिका के प्रकाशित किया गया है. शायद नये लेखकों के सामने आने वाली कठिनाईयों को आप सभी सुधी लेखक एवं पाठक आसानी से समझ सकेंगे. यह कहानी संग्रह संवाद शैली में लिखा गया अपने आप में अनोखा संकलन है जिसके माध्यम से कहानी सरपट दौड़ती है और अंत तक पाठक को बांधे रखती है. ‘सपना’ कहानी स्त्री होने के अपने दर्द को पाठक के सामने एक सवाल के रूप में प्रस्तुत करती है-“क्यों लोग उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाते? वह तो दोस्ती करती है और लोग उसकी दोस्ती को क्या समझ बैठते हैं? बार-बार उसे यही लगता है कि क्या मेरा लड़की होना गलत है?” यह कहानी एकतरफा प्रेम की दुखांत कहानी है. आपको ऐसी ही कहानी ‘पत्थर के लोग’ पढ़ने को मिलेगी जिसमे एकतरफा प्यार और पागलपन है. प्यार में असफल होने के बाद भी वह समाज की सेवा करने में अपना जीवन समर्पित करने की सोचत…

खुद में लाएं बदलाव

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डॉ0 दीपक आचार्यपरिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। हर परिवर्तन अवश्यंभावी है और इसके लिए हरेक जीव को तैयार रहना ही चाहिए। हर समय एक जैसा नहीं होता, उसमें निरन्तर बदलाव का दौर चलता ही रहता है। परिवर्तनों का हर किसी पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। कुछ के लिए परिवर्तन सुखद होते हैं और कुछ के लिए दुःखद। कुछ लोग परिवर्तन से प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन बहुत सारे लोग परिवर्तनों से परेशान हो जाते हैं। मूल बात यही है कि जो परिवर्तन हमारे मनचाहे होते हैं वे हमें पसंद आते हैं और जो परिवर्तन अनचाहे होते हैं उन्हें हम नापसंद करते हैं। हर प्रकार के परिवर्तन का अपना प्रभाव होता है और इसका असर भी भिन्न-भिन्न लोगों पर अलग-अलग तरीकों से होता है। कुछ लोग परिवर्तनों को स्वीकार कर उनके अनुरूप ढल जाते हैं और अपने हाल में मस्त रहते हुए जीवन निर्वाह करते रहते हैं। बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपने आपको एक सीमित परिधि में ढाल कर अपना आभामण्डल निर्मित कर दिया करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उनके आभामण्डल की तरह अपने आपको ढाल लें। लेकिन ऎसा हो नहीं पाता। संसार नित्य परिवर्तनीय है और परिवर्तन का यह दौर हर द…

ब्रहमाण्ड में विद्यमान विकसित सभ्यताएँ

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सृष्टि का विस्तार असीम है. जितनी भी जानकारियाँ अब तक मिल पायी हैं, वे इतनी अल्प है कि उनके आधार पर सब कुछ जान लिया जा सका है, यह दावा नहीं किया जा सकता. हम भले ही अपनी प्रतिभा, योग्यता एवं वर्चस्व का कितना ही गुणगान कर लें, पर सर्वज्ञ कदापि नहीं हो सकते. कितने ही तथ्य एवं रहस्य ऎसे है जिनके संदर्भ में मनुष्य अब भी कुछ जान नहीं सका है. बल, बुद्धि, विज्ञान भी उनको समझ सकने में असमर्थ रहा है. अपनी सभ्यता के लिए भी वह यह अभिमान नहीं कर सकता और न ही इस बात की घोषणा की जा सकती है कि चेतन प्राणियों का अस्तित्व मात्र पृथ्वी तक ही सीमित है. अब तक जो भी परिणाम मिले हैं, उनसे पता लगा है कि अन्यान्य ग्रहों पर भी जीवन विद्यमान है. ब्रह्माण्ड में पृथ्वी से अधिक विकसित सभ्यताओं की सम्भावना भी व्यक्त की जा रही है. हाँ, इतना अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि अन्य ग्रहों के जीवों का आकार-प्रकार, जीवन-यापन, का तरीका हम पृथ्वीवासियों से सर्वथा भिन्न हो. और यह भी जरूरी नहीं है कि वहाँ की परिस्थितियाँ जीवित रहने के लिए पृथ्वी जैसी ही हो. पृथ्वी पर जीवित रहने के लिए आक्सीजन जरूरी है. पर अन्य ग्रहों पर स्थिति…

'किस किसको प्यार करूं':- "कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल" का सिनेमाई विस्तार

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जावेद अनीसहमारे यहाँ कॉमेडी का मतलब औरतों, ट्रांसजेंडर्स, मोटे लोगों, बुजर्गों, काले–सावंले लोगों और विकलांगों का मजाक उड़ाना सा बन गया है. पिछले कुछ सालों से कपिल शर्मा यही सब कर-करके काफी नाम और दाम कम चुके हैं. उन्हें हमारे समय के कॉमेडी के बादशाह के तौर पर पेश किया जा रहा है .टीवी पर उनका शो "कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल" काफी टीआरपी खोर रहा है. अपने शो में आनस्क्रीन बीवी, मोटे किरदारों और प्रतिभागियों का मजाक बनाकर कॉमेडी करते रहे हैं. एक बार तो गर्भवती महिलाओं पर आपतिजनक जोक के चलते उनकी शिकायत महिला आयोग तक भी पहुँच चुकी है. उनकी डेब्यू फिल्म 'किस किसको प्यार करूं' भी उसी आजमाए हुए फार्मूले पर आधारित है, इसके निर्देशक है अब्बास-मस्तान, जो थ्रिलर फिल्मों के लिए मशहूर रहे हैं. यह फिल्म अपने दर्शकों को बेवकूफ समझती है, अपने मूल रूप में यह सामान्य हिंदी फिल्मों से भी ज्यादा महिला विरोधी है. जो महिलाओं को नासमझ के तौर पर पेश करते हुए पुरुषों को कुछ भी करने की छूट देती हुए उसे मजबूरी और महिलाओं के प्रति अहसान बताती है. कहानी के लेखक अनुकल्प गोस्वामी हैं जो कपिल के कॉमेडी …

स्मृति शेष : वीरेन डंगवाल

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कवि वीरेन डंगवाल नहीं रहे.विष्णु खरे ने वीरेन डंगवाल को याद करते हुए श्रद्धांजलि स्वरूप अपने संस्मरण में लिखा  - हमारे जमाने का एक अद्वितीय बड़ा कवि चला गया. मंगलेश डबराल ने श्रद्धांजलि दी - एक अपराजेय का  जाना. अनिल यादव ने बीबीसी के पन्ने पर उन्हें बेतरह याद किया - जिंदगी से छलकता आदमी और कवि वीरेन डंगवाल.फ़ेसबुक में नीलाभ इलाहाबादी (https://www.facebook.com/neelabh.1945) ने वीरेन की इन कविताओं को पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी -दो कविताएं जो वीरेन के लिए लिखी थीं
---------------------------------------- एक दिन इसी तरह
(वीरेन के लिए) एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर
या कविता की किताब के पन्नों में दबा
तुम्हारा ख़त बरामद होगा मैं उसे देखूंगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से
खोलूंगा उसे, पढ़ूँगा एक बार फिर
कई-कई बार पढ़े पुरानी बातों के कि¤स्से तुम्हारी लिखावट और तुम्हारे शब्दों के सहारे
मैं उतर जाऊँगा उस नदी में
जो मुझे तुमसे जोड़ती है
जिसके साफ़-शफ़्फ़ाफ़ नीले जल में
घुल गयी हैं घटनाएँ, प्रसंग और अनुभव
घुल गयी हैं बहसें और झगड़े एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल में
किसी किताब के पन्नों में
बरामद होगा तुम्हारा ख़त मैं उसे खोलूंग…

चर्चित एवं पुरस्कृत कवि एकांत श्रीवास्तव का कविता पाठ

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अति चर्चित एवं अति पुरस्कृत कवि एकांत श्रीवास्तव का कविता पाठ देखें-सुनें -

लाइव वीडियो - राम कुमार तिवारी का कविता पाठ

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मानवीय भावों के सुप्रसिद्ध कवि - रामकुमार तिवारी का कविता पाठ देखें-सुनें नीचे दिए यूट्यूब वीडियो विंडो पर -

लाइव वीडियो महेश वर्मा का कविता पाठ

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युवा कवि महेश वर्मा का कविता पाठ देखें सुनें नीचे दिए गए यूट्यूब वीडियो में -

लाइव वीडियो - कमलेश्वर साहू का कविता पाठ

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कमलेश्वर साहू ने अपनी कविताओं के पाठ के दौरान खूब तालियाँ बटोरीं. आप भी सुनें और तालियाँ बजाएँ -

लाइव वीडियो - सी. सुनील का कविता पाठ

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छत्तीसगढ़ी उत्सव के मौके पर युवा कवि सी. सुनील का कविता पाठ देखें सुनें यूट्यूब वीडियो पर -
आप भी अपनी कविताओं का पाठ कर सेल्फी वीडियो लेकर उसे यूट्यूब पर प्रकाशित कर सकते हैं. और यह बड़ा आसान है.

लाइव वीडियो - भास्कर चौधरी का कविता पाठ

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छत्तीसगढ़ उत्सव में युवा कवि भास्कर चौधरी ने अपनी कवितापाठ में खूब तालियाँ बटोरीं. देख सुनकर आप भी आनंद लें -
आप भी अपनी कविताएँ सेल्फी मोड में, अपने मोबाइल फ़ोन में वीडियो-रेकार्ड कर सकते हैं और यूट्यूब पर टांग सकते हैं. बहुत ही आसान है यह.

माह की कविताएँ

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गजानंद प्रसाद देवांगन व्यंग्य कविताएँ 1
बापू तेरे बंदर
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर , कभी अंदर ।
तेरे स्वर्गवासी होने का
इन्हें है शोक ।
जीविकोपार्जन के लिये
ये कर रहे दलाली थोक ।
आपके पुराने सीख
नीलाम हो गये ।
धरम करम उनके लिये
बेकाम हो गये ।
इसीलिये ये तीनों
स्वर बदल रहे ।
लोग भले ही कहते हैं
कि ये दल बदल रहे ।
कभी राज घाट
कभी शांतिवन ।
कभी अयोध्या
कभी वृन्दावन ।
खा रहे देश को
जैसे चुकंदर ।
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर कभी अंदर ।

खा रहे भालू
साझे की खेती ।
बंदरों को बांट रहे
उस्तरा की पेटी ।
राम के लिये फिर
बनायेंगे सेतु ।
घायल लक्ष्मणों को
जिलायेंगे कालकेतु ।
कैकेई जगा रही
कहीं राष्ट्र भक्ति ।
दिखा रहे भरत कई –
अपनी भी शक्ति ।
राम के राज्य में भी
था , बानर का तंत्र ।
आज  वर्चस्व उनका
करें जो स्वतंत्र ।
कभी दिल्ली की किल्ली
कभी भीगी सी बिल्ली ।
दुविधा में पड़ा देश
जैसे सांपनी छुछंदर ।
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर कभी अंदर ॥
2
ऐसी जयंतियां मनाइये


पहले अपने सिर को
हाथ धर आइये ।
माता के चरणों में
सादर चढ़ाइये ।
बलिदानी पथ में
कदम फिर मिलाइये ।
दमखम हों ऐसे –
तब जयंतियां मनाइये ।।
हर जख्म करबला –काशी
श्रेष…

हास्य-व्यंग्य : अथ महाभारतम

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सुशील यादवहे इंडिया के भ्रष्ट टी.वी. चेनलों ! अगर सत्ता के तुम चमचे नहीं हो, तो पाटलीपुत्र के चुनावी दंगल के बारे में उत्सुक जनता को सही सही ‘भीतरी’ बात बताओ .......! टी. वी. एंकर उवाच ! इधर अपने, ई सी ने आम चुनाव का आगाज कर दिया है, उधर लोग जीत हार के फर्जी आंकड़े जुटाने में लग गए हैं। इसे आम जनता तक चुनावी संभावना के नाम पर इलेक्शन पोल के ग्राफिक बना कर जीतने वाली ‘प्रायोजित पार्टी’ के बारे में ढिंढोरा पीटना है। आजकल ‘महा’ शब्द का चलन व्यवहार में बहुत आने लगा है,कोई इसे गठबंधन के आगे लगा रहा है कोई दलित वोटर को लुभाने के चक्कर में अपने नाम के पहले रखना चाहता है। किसी-किसी के द्वारा, इसे ‘पदवी-स्वरूप’ धारण करने की खींच-तान भी देखी जाती है। किसी पार्टी ने, छोटे-मोटे दान से राज्य को उबारते हुए पूरे राज्य को ‘महादान’ देने का ऐलान, इलेक्शन-संभावना देखते हुए कर दिया। देखा जाए तो ‘महा-नालायकों’ के बीच में से , चंद ‘कम- महा-ना-लायक’ को चुनावी मैदान में उतारने का वादा हर पार्टी अपने-अपने तरीकों से कर रही है। आइये आपको कुछ पार्टी दफ्तर में लिए चलते हैं। ये ‘महा-गठी’ वालों का दफ्तर है। वो,…

जहाँ अहंकार, वहाँ पराभव

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डॉ0 दीपक आचार्यईश्वर अपने प्रतीक रूप में सभी शक्तियों के साथ इंसान के रूप में जीवात्मा को धरती पर भेजता है और यह मानकर चलता है कि वह ईश्वरीय कार्य करता हुआ सृष्टि के किसी न किसी काम आएगा ही। और जब लौटेगा तब उसके खाते में कम से कम इतना कुछ तो होगा ही कि ईश्वर को अपनी बनाई प्रतिकृति पर गर्व हो। ईश्वर तो हमें शुद्ध-बुद्ध भेजता है लेकिन संसार की माया के बंधनों में फँसकर ईश्वर का अंश होने का भान समाप्त हो जाता है और हमें लगता है कि हम ही हैं और कोई कुछ नहीं। जो लोग अपनी आत्मस्थिति में होते हैं उनके लिए सांसारिक माया अनासक्त भोग से अधिक कुछ नहीं होती लेकिन बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपनी संस्कृति, संस्कारों और ईश्वरीय तंतुओं से पृथक होकर अपने आपको ही बहुत कुछ मान लिया करते हैं। ऎसे लोगों का फिर ईश्वर या वंशानुगत संस्कारों, पुरातन काल से चली आ रही गौत्र, वंश या कुटुम्ब की मर्यादाओं आदि से नाता पूरी तरह टूट चुका होता है। इस अवस्था में पहुंच जाने के उपरान्त इंसान की स्थिति  ‘ न घर का - न घाट का’ वाली हो जाती है।  इंसानों की विस्फोटक भीड़ में बहुत से लोग हैं जो अपने सिवा किसी और को कुछ समझ…

हास्य-व्यंग्य : पी ले, पी ले, ओ मोरी जनता

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देश के युवाओं में नशा का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है. किसी को शौक है तो कोई इसका आदी बन चुका है. छोटी खुशी हो या बड़ी बस बहाना चाहिए पार्टी करने का. चलो पार्टी करते हैं और जाम छलकाते हैं. गिलास को टकराकर चेयर्स करते हैं. और टल्ली होकर हंगामा. वाह क्या खूबी है इस शराब में. ऐसे में दिल्ली सरकार के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने शराब पर एक नई बात कह दी. दिल्ली में शराब पीने की उम्र को कम करने की बात कही है. अभी दिल्ली में शराब पीने की जो कानूनी उम्र है वो 25 साल है. मंत्री जी ने इसे कम करके 21 साल करना चाहते हैं. मंत्री जी के मुताबिक दिल्ली में फिलहाल शराब पीने की उम्र ज्यादा है जिसे कम कर दिया जाना चाहिए। उन्होने कहा कि कई बीजेपी शासित राज्यों में भी शराब पीने की उम्र 21 है। तो दिल्ली में शराब पीने की आयु 25 क्यों है? वैसे आज कल देश का युवा नशे की लत में फंसता जा रहा है. ऐसे में ऐसी बातें करना कि उम्र सीमा घटा दो. दूसरे राज्यों में तो उम्र सीमा कम है. दिल्ली के जनता ने आप को गद्दी पर इसलिए बैठाया है कि उसकी समस्या दूर कर दिल्ली का विकास करे. आप तो शराबी बनाने में जुट गए. वैसे ये लोगों का…

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