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September 2015
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प्रस्तुति - अरविंद कुमार सिंह

 

राजधानी के प्रवासी भवन में ऐतिहासिक द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण के मौके पर साहित्यिक हस्तियों और पत्रकारों के साथ राजधानी में साहित्यप्रेमियों का समागम हुआ। आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में प्रकाशित हिंदी का पहला अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ दशा को प्राप्त था। 83 सालों के बाद इस ग्रंथ को हूबहू पुनर्प्रकाशित करने का काम नेशनल बुक ट्स्ट, इंडिया ने किया है। आज के संदर्भ में इस ग्रंथ की उपयोगिता पर मैनेजर पांडेय का एक सारगर्भित लेख भी है।

ग्रंथ के लोकार्पण और विमर्श के मौके पर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और विख्यात लेखक डॉ.विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग निर्माता और युग-प्रेरक थे। उन्होंने प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त जैसे लेखकों की रचनाओं में संशोधन किए। उन्होंने विभिन्न बोली-भाषा में विभाजित हो चुकी हिंदी को एक मानक रूप में ढालने का भी काम किया। वे केवल कहानी-कविता ही नहीं, बल्कि बाल साहित्य, विज्ञान और किसानों के लिए भी लिखते थे। हिंदी में प्रगतिशील चेतना की धारा का प्रारंभ द्विवेदी जी से ही हुआ।’’
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मैनेजर पांडे ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि, “यह भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।” उन्होंने आचार्य जी की अर्थशास्त्र में रूचि व‘‘संपत्ति शास्त्र’’ के लेखन, उनकी महिला विमर्श और किसानों की समस्या पर लेखन की विस्तृत चर्चा की। इस ग्रंथ में उपयोग की गयीं दुर्लभ चित्रों को अपनी चर्चा का विषय बनाते हुए गांधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र ने इन चित्रों में निहित सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने नंदलाल बोस की कृति ‘‘रूधिर’’ और अप्पा साहब की कृति ‘‘मोलभाव’’ पर विशेष ध्यान दिलाते हुए उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि सकारात्मक कार्य करने वाले जो भी केन्द्र हैं उनका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।

‘नीदरलैड से पधारीं प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि हिंदी सही मायने में उन घरों में ताकतवर है जहाँ पर भारतीय संस्कृति बसती है। नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की निदेशक व असमिया में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखिका डॉ. रीटा चौधरी ने कहा कि, यह अवसर न्यास के लिए बेहद गौरवपूर्ण व महत्वपूर्ण है कि हम इस अनूठे ग्रंथ के पुनर्प्रकाशन के कार्य से जुड़ पाए। ऐसी पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने इस ग्रंथ की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ हिंदी का ही नहीं बल्कि भारतीयता का ग्रंथ है और उस काल का भारत-दर्शन है।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय ने इन दिनों मुद्रित होने वाले नामी गिरामी लोगों के अभिनंदन ग्रंथों की चर्चा करते हुए कहा कि, “ऐसे ग्रंथों को लोग घर में रखने से परहेज करते हैं, लेकिन आचार्य द्विवेदी की स्मृति में प्रकाशित यह ग्रंथ हिंदी साहित्य,समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्ष है न कि आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ।” इस ग्रंथ की प्रासंगिकता व इसकी साहित्यिक महत्व को उल्लेखित करते हुए श्री राय ने यहां तक कहा कि, “यह ग्रंथ अपने आप में एक विश्व हिन्दी सम्मेलन है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में पत्रकार गौरव अवस्थी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी से जुड़ी स्मृतियों को पावर प्वाइंट के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रेजेंटेशन यह बात उभर कर सामने आयी कि किस तरह से रायबरेली का आम आदमी, मजूदर व किसान भी आचार्य द्विवेदी जी के प्रति स्नेह-भाव रखते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार सिंह ने इस ग्रंथ के प्रकाशन के लिए नेशनल बुक ट्रस्ट और रायबरेली की जनता को धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के संपादकीय और रेल जीवन पर भी काम करने की जरूरत है।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली और राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी ने किया।

सन् 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा आचार्य द्विवेदी के सम्मान में प्रकाशित इस ग्रंथ में महात्मा गांधी के पत्र के साथ भारत रत्न भगवान दास, ग्रियर्सन, प्रेमंचद, सुमित्रानंदन पंत, काशीप्रसाद जायसवाल,सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उस दौर की तमाम दिग्गज हस्तियों की रचनाएं और लेख है। वैसे तो इस ग्रंथ का नाम अभिनंदन ग्रंथ है और आचार्यजी के सम्मान में प्रकाशित हुआ लेकिन आज कल जैसी परिकल्पना से परे इसमें आचार्य जी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है।

इस समारोह में विख्यात लेखक रंजन जैदी, अर्चना राजहंस, योजना के संपादक ऋतेश, राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के महासचिव शिवेंद्र द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार अरुण खरे, जय प्रकाश पांडेय, राकेश पांडेय, संपादक प्रदीप जैन, भाषा सहोदरी के संयोजक जयकांत मिश्रा, विख्यात कवि जय सिंह आर्य,देवेंद्र सिंह राजपूत,शाह आलम, विनय द्विवेदी, गणेश शंकर श्रीवास्तव, बरखा वर्षा, तरुण दवे समेत तमाम प्रमुख लोग मौजूद थे।

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(अरविंद कुमार सिंह)

वरिष्ठ सहायक संपादक,राज्य सभा टीवी, भारतीय संसद

अध्यक्ष, रायटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन, दिल्ली

12 ए, गुरुद्वारा रकाबगंज रोड, संसद भवन के पास नयी दिल्ली 110001

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

हमारे कर्तव्य कर्म उन सभी लोगों के लिए हैं जो वर्तमान में हैं, अतीत में रहे हैं तथा भविष्य में आने वाले हैं।

इस दृष्टि से दैवीय गुणों, धर्म-संस्कृति एवं समाज की सनातन परंपराओं से जुड़े व्यक्तियों का सीधा सा संबंध भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से जुड़ा रहता है। आत्मा नित्य और अमर है, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म में हमारा प्रगाढ़ विश्वास है और इस दृष्टि से हमारे प्रत्येक कर्म, स्वभाव और व्यवहार का असर हर युग में पड़ता है।

हमारा यह सनातन रिश्ता न सिर्फ बीते किसी युग से होता है बल्कि कई-कई युगों से हमारे तार मजबूती से बंधे रहते हैं और आने वाले कई जन्मों तक यों ही किसी न किसी रूप में सम्बद्ध रहा करते हैं।

संबंधों के मामले में कई सारे साक्षात होते हैं, बहुत सारे आभासी होकर अनुभवित होते हैं और ढेरों संबंध ऎसे हुआ करते हैं जो अदृश्य होते हैं और किसी न किसी कर्षण शक्ति की वजह से हमेशा सेतु के रूप में पीढ़ियों को जोड़े रखते हैं।

यह जरूरी नहीं कि ये मनुष्य-मनुष्य में ही हों।  मनुष्य के अदृश्य तंतुओं भरे संबंध प्रायःतर देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, सिद्धों, तपस्वियों से लेकर पितरों और भूत-प्रेतों तक किसी से भी हो सकते हैं। ये सभी दिव्य आत्माएं हैं जिनके लिए शरीर की आवश्यकता नहीं होती बल्कि इनका समस्त व्यवहार और लोक व्यापार अशरीरी ही होता है।

यही कारण है कि हम वर्तमान में जिन स्थूल पदार्थों को औरों की प्रसन्नता के लिए अर्पित करते हैं वे सूक्ष्म तत्वों के रूप में रूपान्तरित व उनके अनुकूल होकर उन तक पहुंचते हैं।

इन सभी तक अपनी श्रद्धा पहुंचाने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग समय निर्धारित है और इसी दौरान जो कुछ श्रद्धा भाव से किया जाता है वह इन्हें प्राप्त होता है। जितनी अधिक श्रद्धा होगी उतनी अधिक इनकी प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है।

यही कारण है कि पितरों के निमित्त श्राद्ध पक्ष निर्धारित है जिसमें हमारे समस्त पितर पृथ्वी लोक के निकट होते हैं और उन्हें अपने वंशजों से इस अवधि में श्राद्ध के रूप में प्राप्ति और वरदान देने की आकांक्षा साल भर से बनी रहती है।

श्राद्ध पक्ष में हमारा समस्त ध्यान पितरों की तरफ लगा रहे इसलिए दूसरे काम्य कर्मों को वर्जित किया हुआ है अन्यथा हम अपने स्वार्थों में इतने अधिक उलझे रहें कि पितरों की तरफ पर्याप्त ध्यान ही नहीं दे पाएं।

श्राद्ध श्रद्धा का प्रतीक है जिसमें अपने पुरखों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का अहसास करना हम सभी का प्राथमिक फर्ज है। जो इसे फर्ज समझकर पूरी श्रद्धा से निभाते हैं उन्हें आत्मतुष्टि भी प्राप्त होती है और पितरों की कृपा का भी वर्ष भर अनुभव करते रहते हैं।

जो लोग इसे भार या परंपरा समझ कर जैसे-तैसे श्रद्धाहीनता से औपचारिकता पूरी कर लेने के आदी होते हैं उनके लिए कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि जिनमें श्रद्धा का अभाव है वह जीवन में किसी भी प्रकार से सुगंध का अहसास नहीं कर सकते।

श्रद्धा हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म के लिए वह ऊर्जा है जो आशातीत सफलता भी दिलाती है और निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए दिव्य प्रेरणा का संचार भी करती है।

श्राद्ध को लेकर जो भी परंपराएं और नीति-नियम निर्धारित हैं, उनका पूरा-पूरा पालन करते हुए अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा और पितरों के प्रति आस्था के साथ श्राद्ध करें और इसमें औपचारिकता निर्वाह की बजाय इस बात का ध्यान रखें कि किस तरह हमारे पितर हम पर प्रसन्न हो सकते हैं।

श्राद्ध पक्ष में अपने पितर विशिष्टतम व दुर्लभ अतिथियों के रूप में उपस्थित रहते हैं। दूसरे अतिथियों को तो  साल भर में कभी भी अपनी सहूलियत देखकर बुलाया और जिमाया जा सकता है लेकिन पितरों के लिए केवल श्राद्ध पक्ष ही निर्धारित है। इसमें पूरे मनोयोग से जुटें और पितरों की प्रसन्नता व कृपा प्राप्ति के लिए उदारतापूर्वक सारे जतन करने में कहीं कृपणता का भाव न लाएं।

श्राद्ध में महत्त्व छप्पन भोग, मिष्टान्न और तरह-तरह के व्यंजनों का नहीं है, जीमने वालों की अधिकाधिक संख्या का भी नहीं है बल्कि श्राद्ध के लिए निर्धारित समय में पूरी श्रद्धा समर्पित करने का है।

जो जितनी अधिक श्रद्धा से पितरों का आवाहन, तर्पण, भोज आदि करता है उसे उतना अधिक लाभ प्राप्त होता है। भरपूर श्रद्धा समर्पण के साथ पिछली पीढ़ियों के प्रति तन, मन और धन से कृतज्ञता अर्पित करें और जीवन में आनंद पाएं।

श्राद्ध में हमारी अपरिमित श्रद्धा भावना से हमारे समस्त पितर तुष्ट हों, गति-मुक्ति को प्राप्त करें, यही कामना है। श्राद्ध का आनंद देने, दिलाने और पाने वाले सभी के प्रति हार्दिक शुभकामनाएँ ...।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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वीरेन्द्र 'सरल'

जब एक पुण्यात्मा चित्रगुप्त जी के दफ्तर में पन्द्रह दिन के लिए अर्जित अवकाश का आवेदन लेकर प्रवेश किया तो चित्रगुप्त जी चौंक गये। उन्होने पूछा-''ये सब क्या है। आप इतने लम्बे समय तक स्वर्ग से बाहर रहेंगे तो स्वर्ग का क्या होगा, पता है आपको? पुण्यात्मा ने कहा-''सर आज पता नहीं कैसे अचानक मेरे दिमाग मे यह विचार आया कि अभी जम्बूद्वीप, आर्यवर्त, देव भूमि और ना जाने क्या-क्या नाना अलकंरणों से अलकृंत मेरे देश में पितृ पक्ष का पर्व चल रहा है। मैंने सुना है कि इस समय वंशज अपने पूर्वजों का पुण्य स्मरण करते हैं और उनके अधूरे कार्यो को आगे बढ़ाते हुए पूर्ण करते है। आजादी की लड़ाई लड़ते हुए मैंने अपनी कुर्बानी दी थी, देह छोड़ते समय मेरे भी बहुत से स्वप्न अधूरे थे। मैं अपने देश को खुशहाल देखना चाहता था। सभी देशवासियों को सुखी और सम्पन्न करने का मेरा लक्ष्य था। अब तो बहुत समय बीत चुका है शायद मेरे अधूरे स्वप्न अब पूरे हो गये होगे। जिस आदर्श समाज की कल्पना मैंने अपने जीवन काल में की थी अब वह साकार हो गया होगा। देश भय, भूख और भ्रष्ट्राचार से मुक्त हो गया होगा। क्यों न एक बार अपने वंशजो से जाकर मिला जाय। वे सब मुझे अचानक अपने बीच पाकर खुशी से उछल पड़ेंगे। मेरा वहाँ जाना उनके लिए सरप्राइज गिफ्ट के समान होगा। प्लीज सर, बस पन्द्रह दिन के लिए मेरी यह छुट्टी स्वीकृत कर लीजिए।

चित्रगुप्त जी ने उन्हें समझाने की काफी कोशिश की पर वह पुण्यात्मा अपनी जिद पर अड़ा रहा। अन्ततः हार कर चित्रगुप्त ने उनकी भावना का सम्मान करते हुए उनकी छुट्टी स्वीकृत कर ली। पुण्यात्मा ने प्रसन्नता से चित्रगुप्त को थैंक्यू सर कहा और उस कार्यालय से बाहर निकल आए।

अब पुण्यात्मा ने एक गरीब आदमी का भेष धारण किया और रात में ही यहाँ आने के लिए निकल पड़े। यहाँ पहुँचते-पहुँचते रात बीत गई। चलते-चलते सूरज सिर पर चढ़ आया था।

अभी वे एक महानगर में थे। दोपहर का समय था पर वहाँ स्ट्रीट लाइट वैसे ही जल रही थी जैसे रात में किसी गाँव का दिल जल रहा हो। तेज धूप से उनकी हालत वैसे ही खराब हो रही थी जैसे बढ़ती महंगाई में आम आदमी की और गला प्यास से वैसे ही सूखा जा रहा था जैसे सत्तालोलुपों के हृदय की संवेदना सूख रही है। उन्होंने पानी मांगने के लिए एक दुकान पर ठहर कर दुकानदार से कहा-'' क्या एक गिलास पानी मिलेगा।'' दुकानदार ने उन्हें अजीब से नजरों से देखकर कहा-''पानी बोतल बीस रूपये और पाऊच पाँच रूपये कौन सा दूँ?''यह सुनकर पुण्यात्मा को चक्कर आ गया। वे सोचने लगे, पानी भी बेचने की चीज हो गई?

वे पास वाले एक चाय ठेले पर जाकर बैठ गये। ठेले वाले से एक गिलास पानी माँगकर पीते हुए उन्होने उससे पूछा-''क्यों भाई, क्या अब यहाँ पानी भी बिकने लगा है।'' ठेले वाले ने उसे अजीब से नजरों से देखकर कहा-''लगता है किसी देहात से पहली बार शहर आये हो। अरे! बाबा जी यहाँ लोग अपना ईमान बेचने के लिए लाइन पर खड़े हैं और आप पानी की बात कर रहे है। इनका वश चले तो ये धरती, आकाश, हवा सब बेच खाये। पता नहीं इनका पेट, पेट है या पाप का घड़ा जो कभी भरता ही नहीं है। चाय ठेले वाला क्रोध से काँपते हुए कुछ और कहना चाह रहा था पर पुण्यात्मा ने उसे रोकते हुए कहा-''बस भाई बस। मुझे बस इतना ही और बता दो कि क्या आजादी के बाद भी यहाँ कुछ नहीं बदला।

ठेले वाले ने उसे घूरते हुए कहा-''आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे कि आजादी की लड़ाई आपने भी लड़ी हो। अरे साहब! दो-चार महीने यहाँ रहकर खुद देख लीजिए, आपको सब पता चल जायेगा। बदला है तो सिर्फ लूटने वाले बदले हैं पहले गैरों ने लूटा अब स्वयं अपने ही देश को लूट रहे है। पहले गैरों ने खून बहाया अब भाई ही भाई का खून बहाने लगा है। किसी के पास अकूत दौलत है तो कोई दो जून की रोटी के लिए तरस रहा है। कितना गिनाऊँ, जाओ भाई जाओ अपना रास्ता नापो। ये सब बताकर अपना ही दिल दुखाने के सिवा और कुछ नहीं होने वाला है।''

पुण्यात्मा का जी चाह रहा था कि चिल्ला-चिल्लाकर कहे कि हाँ हमने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। अपना खून-पसीना बहाया था। अपनी कुर्बानी दी थी। इसलिए नहीं कि अपने ही अपनों को लूटे बल्कि इसलिए कि हमारा देश खुशहाल हो। समाज मे समरसता का भाव हो । समाज अन्याय और शोषण से मुक्त हो। पर उन्हे मन मार के रह जाना पड़ा। यह सोचकर कि शायद मेरा यह सब कहना लोगो को नागवार गुजरे। सुनने वाले कहीं मुझे सिरफिरा न समझ ले। वे आँखें में आँसू भरे वहाँ से उठ कर आगे बढ़ गये।

चलते-चलते वे रात के गहन अंधेरे में डूबे एक गाँव में पहुँचे। गाँव में पहुँचने का रास्ता इतना दुर्गम था जितना बेईमानों के बीच ईमानदारी का रहना। अभी चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। चारों तरफ से सायं-सायं की आवाज आ रही थी। दिनभर के थके हारे मजदूर-किसान अपने टूटे-फूटे झोपड़ों में बेसुध सोये हुए थे। तभी पुण्यात्मा को किसी बूढ़े की सिसक-सिसक कर रोने और लाठी की ठक-ठक की आवाज सुनाई दी। वे चौंक गये। अंधेरे में चलते हुए वे किसी खंभे से टकराते-टकराते बचे। तब तक लाठी की ठक-ठक की आवाज नजदीक आ गई थी। पुण्यात्मा ने देखा कि एक बूढ़ा आदमी बिल्कुल नजदीक में आकर उसे सहारा देते हुए खड़ा है। पुण्यात्मा ने उससे पूछा-''आप कौन हैं भाई?'' और इस उमर में इतनी रात गये घर से बाहर क्यों निकल आये हैं?'' बुढ़े ने जवाब दिया-''मैं भारत की आत्मा हूँ, आजादी के बाद से अब तक खुशियों की रोशनी की तलाश में भटक रहा हूँ।'' पुण्यात्मा ने कहा-''भारत की आत्मा? मैं कुछ समझा नहीं, कृपया विस्तार से बताने की कृपा करें। बूढ़े ने कहा-''पूज्य बापू कहा करते थे कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। मैं इस देश का एक अभागा गाँव हूं जहाँ अब तक खुशियों की रोशनी नहीं पहुँच पायी है। यहाँ अभी तक न स्वच्छ पेयजल की व्यस्था हो पायी है और न ही पक्की सड़के बन पाई है। सड़कें बनती भी है तो इतनी मुलायम जो राहगीर के पाँव का वजन भी नहीं सह पाती। पहली बरसात के बूंदों से ही बहने लगती है। यहाँ शिक्षक विहीन पाठ शाला और डॉक्टर विहीन अस्पताल भर है। गाँव वाले अब तक विकास का झुनझुना बजा रहे हैं। भाषण खा रहे है और आश्वासन पी रहे है। मैं आज तक गहन निराशा के अंधकर में डूबा हुआ हूँ अब तक हर उम्मीद की एक किरण के तलाश में भटक रहा हूँ। बूढ़े की करूण क्रंदन सुनकर पुण्यात्मा की आंखे नम हो गई और दिल फूट-फूटकर रोने लगा।

अपनी नम आँखों को पूछते हुए पुण्यात्मा ने बूढ़े से पूछा-'' मगर अभी-अभी जिस खंभे से टकराते हुए मैं बड़ी मुश्किल से बचा वह क्या है?'' बूढ़े ने कहा-'' वह जनकल्याण्कारी योजनाओं के पोल है। पहले ढोल के अंदर पोल होता था अब तो पोल के अंदर ही भारी पोल है। सुबह आप देखेंगे कि ये सारे पोल भ्रष्ट्राचार के तारों से जुड़े हुए हैं। पोल पर बल्ब के स्थान पर फाइलें लटक रही है। जिससे देश के अंतिम आदमी के अंधेरे जीवन में रोशनी पहुँचाने का भ्रम पैदा होता है। हर पोल में हुक लगाकर तार खींचे गये है। जो किसी राजशाही, नौकरशाही, बाबूशाही और चमचाशाही के बंगले पर गया है। विकास की सारी रोशनी यहीं खींचे जा रहे है। देश के अंतिम आदमी के घर के पास लगे पोल पर आप चढ़कर टेस्टर से चेक करेंगे तो आपको पता लगेगा कि विकास की धारा यहां शून्य है। अंतिम आदमी लो वोल्टेज का शिकार है बाबू। उनकी खुशियों को भ्रष्ट्राचार का दानव लील रहा है। जब तक इस दानव का वध नहीं किया जायेगा तब तक गरीब के घर में विकास का राम नहीं आने वाला है, समझ गये। मेरी बातों पर विश्वास न हो तो सुबह का इंतजार करिये और सब कुछ अपनी आँखों से देख लीजिए। यह सब बताकर बूढ़ा जोर से रो पड़ा, पुण्यात्मा का सपना चकनाचूर हो चुका था। सुबह के इंतजार करने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। भरे मन से विदा लेना ही उन्हें उचित लगा। वे अविलंब लौटने लगे

वीरेन्द्र 'सरल'

धमतरी (छत्तीसगढ़)

भारतीय अंतरिक्ष दूरबीन एस्ट्रोसेट का प्रक्षेपण

प्रमोद भार्गव

भारत अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में सफलता के लगातार नए-नए झण्डे फहरा रहा है। इसी क्रम में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने देश की पहली अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट का सफल प्रक्षेपण किया है। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-30 ने उड़ान भरने के बाद महज 22 मिनट 32 सेकेंड में 650 किलोमीटर की दूरी तय करके ऐस्ट्रोसेट को पृथ्वी की निर्दिष्ट कक्षा में प्रक्षेपित करने में अहम् कामयाबी हासिल कर ली। अमेरिका,यूरोपीय संघ,जापान और रूस के बाद यह उपलब्धि अब तक भारत के ही हाथ लग पाई है। जबकि हमारा प्रतिद्वंद्वी चीन अभी अपनी अंतरिक्ष दूरबीन के निर्माण की प्रक्रिया में ही है। इस दूरबीन को खगोलीय स्त्रोतों का अध्ययन करने का एक समग्र साधन माना जा रहा है। इसलिए भारत के इस वैज्ञानिक - खगोलीय करिश्मे पर दुनिया की निगाहें टिक गई हैं।

मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव उसकी प्रकृति का हिस्सा रहा है। मानव की खगोलीय खोजें उपनिषदों से शुरू होकर उपग्रहों तक पहुंची हैं। हमारे पूर्वजों ने शून्य और उड़न तश्तरियों जैसे विचारों की परिकल्पना की। शून्य का विचार ही वैज्ञानिक अनुसंधानों का केंद्र बिंदु है। बारहवीं सदी के महान खगोलविज्ञानी आर्यभट्ट और उनकी गणितज्ञ बेटी लीलावती के अलावा वराहमिहिर,भास्कराचार्य और यवनाचार्य ब्रह्मांण्ड के रहस्यों को खंगालते रहे हैं। इसीलिए हमारे वर्तमान अंतरिक्ष कार्यक्रामों के संस्थापक वैज्ञानिक विक्रम साराभाई और सतीश धवन ने देश के पहले स्वदेशी उपग्रह का नामाकरण 'आर्यभट्ट' के नाम से किया है। अंतरिक्ष विज्ञान के स्वर्ण-अक्षरों में पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री के रूप में राकेश शर्मा का नाम भी लिखा गया है। उन्होनें 3 अप्रैल 1984 को सोवियत भूमि से अंतरिक्ष की उड़ान भरने वाले यान 'सोयूज टी-11 में यात्रा की थी। सोवियत संघ और भारत का यह साझा अंतरिक्ष कार्यक्रम था। तय है,इस मुकाम तक लाने में अनेक ऐसे दूरदर्शी वैज्ञानिकों की भूमिका रही है,जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने इस पिछड़े देश को न केवल अंतरिक्ष की अनंत उंचाईयों तक पहुंचाया,बल्कि अब धन कमाने का आधार भी मजबूत कर दिया। ये उपलब्धियां कूटनीति को भी नई दिशा देने का पर्याय बन सकती हैं।

अंतरिक्ष में स्थापित कर दी गई इस दुरबीन से ब्रह्माण्ड के रहस्यों से पर्दा उठाने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिक इससे क्षुद्र ग्रहों, तारों और आकाश गंगाओं के बनने व नष्ट होने के बारीक सूत्रों को पकड़ सकेंगें। भारत को यह समझना इसलिए भी आसान होगा, क्योंकि उसके पास पहले से ही बहुतरंगदैर्ध्य वाला संवेदी अंतरिक्ष उपकरण है। यह उपकरण वृहद अंतरिक्षीय स्त्रोतों में तीव्र गति से होने वाले परिवर्तनों पर नजर रखने में सक्षम है। चंद्र और मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के बावजूद अभी तक भारतीय अंतरिक्ष मिशन रिमोट सेंसिंग, संचार, मैपिंग, नेविगेशन तक ही सीमित था। खासतौर से एस्ट्रोसेट बृहस्पति और शनि ग्रह के राज खोलने में अहम् भूमिका निभायेगा। यह अंतरिक्ष की दर्शनीय पराबैंग्नी और एक्सरे तंरगों पर भी दृष्टि रखेगा। जाहिर है, एस्ट्रोसेट के प्रक्षेपण के बाद अब हम खगोलीय घटनाओं के भौतिक प्रक्रियाओं के अध्ययन में भी सक्षम हो रहे हैं।

अंतरिक्ष में सक्रिय हुई इस एस्ट्रोसेट नामक आंख को अमेरिका की दूरदर्शी वेधशाला 'हबल' का लघु संस्करण माना जा रहा है। हबल को नासा ने 1990 में अंतरिक्ष में स्थापित किया था। जो बीते 25 साल से लगातार सक्रिय है। जबकि एस्ट्रोसेट की उम्र महज 5 साल है। हालांकि एस्ट्रोसेट और हबल के भार और खर्च में भी जमीन आसमान का अंतर है। एस्ट्रोसेट का वजन 1513 किलोग्राम है जबकि हबल का 1500 किलोग्राम है। एस्ट्रोसेट के निर्माण में 10 साल लगे और लागत आई 178 करोड़ रूपये, जबकि हबल का वजन 10 गुना ज्यादा है और इसकी लागत 195 अरब रूपये है। नासा ने हबल का प्रक्षेपण यूरोपीय संघ अंतरिक्ष एजेंसी के सहयोग से किया है, जबकि भारत ने एस्ट्रोसेट का प्रक्षेपण स्वयं के संसाधनों से किया है। एस्ट्रोसेट को स्थापित करने के दौरान भारत ने दूसरे देशों के सात उपग्रह भी पृथ्वी की कक्षा में पहुंचायें हैं। इनमें चार अमेरिका के और एक-एक इंडोनेशिया व कनाडा के हैं। प्रक्षेपण तकनीक में दुनिया के चंद देश ही दक्ष हैं, उनमें से एक भारत है। भारत प्रक्षेपण के जरिए अंतरिक्ष व्यापार से भी जुड़ गया है।

सूचना तकनीक का जो भूमंडलीय विस्तार हुआ है, उसका माध्यम अंतरिक्ष में छोड़े उपग्रह ही हैं। टीवी चैनलों पर कार्यक्रमों का प्रसारण भी उपग्रहों के जरिए होता है। इंटरनेट पर बेबसाइट,फेसबुक,ट्विटर, ब्लॉग और वॉट्सअप की रंगीन दुनिया व संवाद संप्रेषण बनाए रखने की पृष्ठभूमि में यही उपग्रह हैं। मोबाइल और वाई-फाई जैसी संचार सुविधाएं उपग्रह से संचालित होती है। अब तो शिक्षा,स्वास्थ्य,कृषि, मौसम, आपदा प्रबंधन और प्रतिरक्षा क्षेत्रों में भी अपग्रहों की मदद जरूरी हो गई है। भारत आपदा प्रबंधन में अपनी अंतरिक्ष तकनीक के जरिए पड़ोसी देशों की सहयता पहले से ही कर रहा है। हालांकि यह कूटनीतिक इरादा कितना व्यावहरिक बैठता है और इसके क्या नफा-नुकसान होंगे,यह अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसरो ने अंतरिक्ष में व्यापार का सिलसिला शुरू करके जो आत्मनिर्भरता हासिल की है, उसके लाभ बहुआयामी हैं।

बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं,क्योंकि हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों और अंतरराष्ट्र्रीय प्रतिबंधों के बावजूद जो उपलाब्धियां हासिल की हैं,वे गर्व करने लायक हैं। गोया, एक समय ऐसा भी था,जब अमेरिका के दबाव में रूस ने क्रायोजेनिक इंजन देने से मना कर दिया था। दरअसल प्रक्षेपण यान का यही इंजन वह अश्व-शक्ति है, जो एस्ट्रोसेट जैसे भारी वजन वाले उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाने का काम करती है। फिर हमारे जीएसएलएसवी मसलन भू-उपग्रह प्रक्षेपण यान की सफलता की निर्भरता भी इसी इंजन से संभव थी। हमारे वैज्ञानिकों ने दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय दिया और स्वेदेशी तकनीक के बूते क्रायोजेनिक इंजन विकसित कर लिया। और अब तो अंतरिक्ष में चीन को पछाड़ते हुए दुरबीन भी पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर दी है। इसीलिए अब इसरो की स्वदेशी तकनीक का दुनिया लोहा मानने लगी है।

अंतरिक्ष में प्रक्षेपण की तकनीक और दुरबीन स्थापित कर लेने के बावजूद भारत के समक्ष रक्षा क्षेत्र में नये आविष्कारों और हथियारों के निर्माण की चुनौतियां अब भी हैं। क्योंकि फिलहाल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की दिशा में हम मजबूत पहल ही नहीं कर पा रहे हैं। जरूरत के साधारण हथियारों का निर्माण भी हमारे यहां नहीं हो पा रहा है। आधुनिकतम राइफलें भी हम आयात कर रहे हैं। इस बद्हाली में हम भरोसेमंद लड़ाकू विमान, टैंक विमानवाहक पोत और पनडुब्यिों की कल्पना ही कैसे कर सकते हैं ? हाल ही में हमने विमान वाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य रूस से खरीदा है। जबकि रक्षा संबंधी हथियारों के निर्माण के लिए हमारे यहां रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान (डीआरडीओ) काम कर रहा हैं,परंतु इसकी उपलब्धियां इसरो की तुलना मे गौण हैं। इसे अब इसरो से प्रेरणा लेकर अपनी सक्रियता बढ़ाने की जरूरत है। क्योंकि भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है। रक्षा सामग्री आयात में खर्च की जाने वाली धन-राशि का आंकड़ा हर साल बढ़ता ही जा रहा है। भारत वाकई दुनिया की महाशक्ति बनना चाहता है तो उसे रक्षा-उपकरणों और हथियारों के निर्माण की दिशा में स्वावलंबी होना ही चाहिए। अन्यथा क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक के बाबत रूस और अमेरिका ने जिस तरह से भारत को धोखा दिया था,उसी तरह जरूरत पड़ने पर मारक हथियार पाप्त करने के परिप्रेक्ष्य में भी मुंह की खानी पड़ सकती है

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

फोन 07492 232007

लेखक, वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार हैं।

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क़ैस जौनपुरी

 

मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा

आज बक़रीद है

सुबह सुबह किसी ने टोका

ईद मुबारक़ हो

ईद मुबारक़ हो

नमाज़ पढ़ने नहीं गए

लेकिन स्वीमिंग करने जा रहे हो

हाँ मैं नहीं गया

क्यूँकि मैं नाराज़ हूँ उस ख़ुदा से

जो ये दुनिया बना के भूल गया है

कहीं खो गया है या शायद सो गया है

या जिसकी आँखें फूट गयी हैं

जिसे कुछ दिखाई नहीं देता

कि उसकी बनाई इस दुनिया में क्या क्या हो रहा है

 

हाँ मैं नाराज़ हूँ

और तब तक मस्ज़िद में क़दम न रखूँगा

जब तक आयलन कुर्दी फिर से ज़िन्दा नहीं होता

जब तक दिल्ली की वो दो लड़कियाँ

सही सलामत वापस नहीं आतीं

जिन्हें जलते हुए तारकोल के ड्रम में

सिर्फ़ इसलिए डाला गया था

क्यूँकि वो मुसलमान थीं

और हाँ मुझे उनके चेहरे पे कोई दाग़ नहीं चाहिए

 

मैं नाराज़ हूँ

और तब तक मस्ज़िद में क़दम न रखूँगा

जब तक हरप्रीत कौर और हर पंजाबन औरत और बच्ची

बिना खंजर लिए सुकून से नहीं सोती

जब तक दंगों में ग़ुम मंटो की शरीफन

अपने बाप क़ासिम को मिल नहीं जाती

तब तक मैं नमाज़ नहीं पढ़ूँगा

मुझे तुम्हारे क़ुरआन पे पूरा भरोसा है

बस उसमें से ये जहन्नुम का डर निकाल दो

डर की इबादत भी भला कोई इबादत है

कैसा होता कि मैं अपनी ख़ुशी से

जब चाहे मस्ज़िद में आता

और एक रक़ात में ही गहरी नींद

और तेरी गोद में सो जाता

मुझे तुमसे शिकायत है

एक सेब खाने की आदम को इतनी बड़ी सजा

तुम्हें शरम नहीं आती

तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजता

यहाँ तुम्हारे मौलवी

मस्ज़िद की तामीर के लिए

कमीशन पे चन्दा इकट्ठा कर रहे हैं

जहाँ ग़रीबों को दो रोटी नसीब नहीं

वहाँ मूर्तियों पे करोड़ों रुपये पानी की तरह बह रहे हैं

 

तुम्हारे नाम पे यहाँ रोज़ जाने कितने मर रहे हैं

तुम्हें पता भी है कुछ

लोग पाकिस्तान को इस्लामिक देश कहते हैं

तुम्हें हँसी नहीं आती

और तुम्हें शरम भी नहीं आती

तुम्हारी मासूम बच्चियों को पढ़ने से रोका जाता है

उन्हें गोली भी मार देते हैं

तुमने एक मलाला को बचा लिया तो ज़्यादा ख़ुश न होओ

तुम्हारे आँसू नहीं बहते

जब किसी बोहरी लड़की का

ज़बरदस्ती ख़तना किया जाता है

क्या तुम्हें उन मासूम लड़कियों की चीख सुनाई नहीं देती

या तो तुम बहरे हो गए हो

या तुम्हारे कान ही नहीं हैं

या फिर तुम ही नहीं हो

 

तुम तो कहते हो तुम ज़र्रे ज़र्रे में हो

फिर जब कोई मंसूर अनल-हक़ कहता है

तब उसकी ज़बान क्यूँ काट ली जाती है

क्या उस कटी ज़ुबान से टपके ख़ून में तुम नहीं थे

क्या मंसूर की उन चमकती आँखों में

तुम उस वक़्त मौज़ूद नहीं थे

जो तुम्हारी आँखों के सामने फोड़ दी गयीं

क्या मंसूर के उन हाथों में तुम नहीं थे जो काट दिए गए

क्या मंसूर के पैर कटते ही

तुम भी अपाहिज़ हो गए

आओ आके देखो अपनी दुनिया का हाल

आबादी बहुत बढ़ चुकी है

 

अब सिर्फ़ एक मुहम्मद से काम नहीं चलेगा

तुम्हें पैग़म्बरों की पूरी फ़ौज़ भेजनी होगी

क्यूँकि मूसा तो यहूदियों के हो गए

और ईसा को ईसाईयों ने हथिया लिया

दाऊद बोहरी हो गए

बुद्ध का अपना ही एक संघ है

महावीर जो एक चींटी भी मारने से डरते थे

उस देश में इंसान की लाश के टुकड़े

काग़ज़ की तरह बिखरे मिलते हैं

 

जाने कितने दीन धरम मनगढ़ंत हैं

श्वेताम्बर दिगम्बर जाने कितने पंथ हैं

आदम की औलाद सब जाने कैसे बिखर गए

तुम्हारे सब पैग़म्बरों के टुकड़े टुकड़े हो गए

तुम तो मुहम्मद की

इबादत में बहे आँसुओं से खुश हो लिए

मगर क्या तुम्हें ये सूखी धरती दिखाई नहीं देती

ये किसान दिखाई नहीं देते

 

तेरी दुनिया में आज

अनाज पैदा करने वाले ही भूखे मरते हैं

मुझे हँसी आती है तेरे निज़ाम पर

और तू जहन्नम का डर दिखाता है

जा मैं नहीं डरता तेरी दोज़ख़ की आग से

यहाँ ज़िन्दगी कौन सी जहन्नम से कम है

पीने का पानी तक तो पैसे में बिकता है

 

तू पहले हिन्दुस्तान की औरतों को

मस्ज़िद में जाने की इजाज़त दिला

तू पहले अपने मुल्ला मौलवियों को समझा

कि लोगों को इस तरह गुमराह न करें

तीन बार तलाक़ कह देने से ही तलाक़ नहीं होता

तू आके देख

मदरसों में मासूम बच्चों को क़ुरआन

पढ़ाया नहीं रटाया जाता है

फिर इन्हीं रटंतु तोतों को हाफ़िज़ बनाया जाता है

जो तेरी बाकमाल आयतों को तोड़ मरोड़ कर

अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं

 

मैं किस मस्ज़िद में जाऊँ

तू तो मुझे वहाँ मिलता नहीं

और तेरे दर क़ाबा आने के इतने पैसे लगते हैं

जहाँ हर साल भगदड़ होती है

और न जाने कितने ही बेवकूफ़ मरते हैं

मैं कहता हूँ इतनी भीड़ में जाने की ज़रूरत क्या है

कितना अच्छा होता कि मैं मक्का पैदल आता

और तू मुझे वहाँ अकेला मिलता

तू पहले ये सरहदें हटा दे

 

ये क्या बात हुई

कि तेरे क़ाबा पे अब सिर्फ़ कुछ शेख़ों का हक़ है

तू पहले समझा उन पागलों को

कि तुझे सोने के तारों से बुनी चादर नहीं चाहिए

मैं तब आऊँगा वहाँ

तेरी मस्ज़िद में अभी आने का दिल नहीं करता

जानता है क्यूँ

अँधेरी ईस्ट की साई गली वाली मस्ज़िद के बाहर

एक मासूम सी लड़की

आँखों में उम्मीद लिए और हाथ फैलाये हुए

भीख़ माँगती है

मैं उसे पाँच रूपये देने से पहले सोचता हूँ

कि इसकी आदत ख़राब हो जायेगी

फिर ये इसी तरह भीख़ माँगती रह जायेगी

अगर मैं उससे थोड़ी हमदर्दी दिखाऊँ

तो लोगों की नज़र में मेरी नज़र ख़राब है

मैं उसे अपने घर भी ला नहीं सकता

कुछ तो घर वाले लाने नहीं देंगे

और कुछ तो उसके मालिक भी

 

हाँ शायद तुम्हें किसी ने बताया नहीं होगा

हिन्दुस्तान में बच्चों से भीख़ मँगवाने का

बाक़ायदा क़ारोबार चलता है

मासूम बच्चों को पहले अगवा किया जाता है

फिर उनकी आँखें फोड़ दी जाती हैं

कुछ के हाथ काट दिए जाते हैं कुछ के पैर

और फिर तेरी बनाई हुई क़ुदरत रहम का सहारा लेकर

तेरे ही नाम पे उनसे भीख़ मँगवाया जाता है

 

अब तुझे मैंने सब बता दिया

अब तू कुछ कर

इन बच्चों को पहले इस क़ैद से रिहा कर

फिर मैं तेरी मस्ज़िद में आऊँगा

तेरे आगे सर भी झुकाऊँगा

 

अभी मुझे लगता है तू इबादत के क़ाबिल नहीं

अभी तुझको बहुत से इम्तेहान पास करने होंगे

हाँ इम्तेहान से याद आया

ये तूने कैसी बक़वास दुनिया बनाई है

जो सिर्फ़ पैसे से चलती है

मुझे इस पैसे से नफ़रत है

ये निज़ाम बदलने की ज़रूरत है

 

तुम पहले कोई ढँग की रहने लायक दुनिया बनाओ

फिर मुझे नमाज़ के लिए बुलाओ

और तब तक तुम यहाँ से दफ़ा हो जाओ

 

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qaisjaunpuri@gmail.com

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रवि श्रीवास्तव

जी हां आप सोच में पड़ गए होगें. पांच हजार देने पर कैसे पत्रकार बनेंगे. लेकिन पत्रकारिता के इस दौर में सब कुछ मुमकिन है. पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए लाखों का खर्चा आता है. अगर आप किसी प्राइवेट इंस्टीट्यूट से पढ़ाई करते हैं. लेकिन आज के इस दौर में इसकी पढ़ाई की जरूरत ही नहीं.

अगर आप के पास पैसा खर्च करने के लिए है. एक सच्चाई से आप को वाकिब कराना चाहता हूं. नौकरी बदलने के लिए मैने कई जगहों पर अपना बायोडाटा भेजा था. एक जगह से जिसका जवाब आया. नाम से तो लग रहा था काफी संस्कार भरा न्यूज चैनल हैं.

लेकिन फोन उठाते ही जब बात हुई तो मुझसे कहा गया कि आप हमारे साथ काम कर सकते हैं. जिसके लिए आप को पांच हजार रूपए डिपोजिट करने होगें. पैसे के डिपोजिट होते ही आप को लेटर, आईडी, चैनल की आईडी भेज दी जाएगी.

अगर आप रूपए नहीं दे सकते तो 5000 का विज्ञापन दे दीजिए. बात यही खत्म नहीं होती. मैने जब उनकी तरफ से हमें खबर का क्या मिलेगा पूछा तो साफ मना कर दिया. हम आप को कुछ नहीं देंगे. विज्ञापन का 20% आप को दिया जाएगा. अगर आप विज्ञापन देते है.

मैने फिर अपनी एक बात रखी. इतनी जल्दी ये संभव नहीं होगा. और हमें कुछ मिलेगा भी नहीं. तो क्या फायदा. तो जनाब ने कहा कि आप पुराने हैं तो कमाने का जरिया पता होगा. सब कमाने खाने का जरिया जानते हैं. मतलब उनका कहना साफ था पत्रकारिता का रौब दिखाकर वसूली कर अपना घर चलाओ, अपनी कमाई का जरिया बनाओ.

क्या संस्कार थे उस चैनल के ? ये तो साफ था कि लेटर और आईड़ी के दम पर वो अपनी दुकान चला रहे है. जो चैनल एक स्ट्रींगर को ऐसी सलाह देता है. वो खुद क्या करता होगा राम जाने ? वैसे ये कोई पहला चैनल नहीं था. जिसने ये बात कही है. ऐसा कई सारे न्यूज चैनल से सुन चुका हूं. कोई कम तो कोई इससे ज्यादा रकम की मांग करता है. महाशय को मैने बताया कि मैने दिल्ली में जहां काम किया था वहां ऐसा नहीं था.

मैने तो जॉब के लिए सोचा था. जवाब आया कि ये भी आप्शन है. बस आप अपने वेतन से 5 गुना ज्यादा विज्ञापन और 30 स्टोरी देनी पड़ेगी. पत्रकार बनने के लिए काफी अच्छी सौदेबाजी थी. शायद उनको पता नहीं था कि वो जिससे बात कर रहे है.

वो इस फील्ड में दिल्ली में 4 साल दे चुका है. कमाल है काश पहले पता होता तो लाखों खर्च कर पढ़ाई न करते हुए पांच हजार देकर पत्रकार बन जाते. जब आप अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकते तो ये तामझाम क्यों खोल रखे हो. अवैध पैसा वसूलने के लिए. दूसरों को ब्लैकमेल करने के लिए. हां इक बात तो बताना भूल गया. जिनका फोन आया था. देश के 16 राज्यों में उनका न्यूज चैनल और दो देशों में और चल रहा है. जब इतनी जगहों पर आप के चैनल को पसंद किया जा रहा है तो पैसे लेकर पत्रकार क्यों बना रहे हो.

मैने सोचा चलो इनकी वेबसाइट देख लेते हैं. तो उसमें लिखा पाया कि अगर चैनल के नाम से कोई पैसा वसूलता है तो आप इसकी शिकायत हमें कर सकते हैं. एक तरफ वसूलने की बात कर रहे हो, दूसरी तरफ पर्दा भी डाल रहे हो.

कितना अब और पत्रकारिता का स्तर गिराओगे. जिलों में देखता हूं एक एक स्ट्रींगर के पास 3 चार चैनल आईडी होती हैं. योग्य इंसान के पास एक भी नहीं. पैसा देने वालों के पास 3 से 4. वाह देश की मीडिया क्या खूब तरक्की की ? कमाने का एक बढ़िया जरिया है. एक वेब चैनल खोल लो और अपने आई बेंच दो. क्योंकि बहुत से लोग पैसा देकर पत्रकार बनना चाहते है.

उनका सिर्फ इतना सा काम होता है. गाड़ी में प्रेस लिखवा लो. गिरा दो जितना स्तर गिरा सकते हो. लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहलाने वाले को. दोष उन चैनलों का नहीं लोगों का है. जो पैसा देकर आईडी लेकर आते हैं. बढ़ावा तो खुद दे रहे हैं.

ऐसे चैनल साफ-साफ दलाली की ओर ढकेलते हैं. वसूली करते समय मार खाओ या मारे जाओ. लेकिन पांच हजार दो और लेटर आईड़ी ले जाओ.

रवि श्रीवास्तव

ravi21dec1987@gmail.com

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समीक्षक - एम.एम.चन्द्रा

डॉ. लवलेश दत्त की कहानी संग्रह की समीक्षा लिखना बहुत ही श्रमसाध्य रहा. वैसे तो इस कहानी संग्रह को दो अन्य साथियों ने भी पढ़ा और अपनी राय जाहिर की लेकिन उनका नजरिया इस पुस्तक को लेकर काफी भिन्न था. इस संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं जिन्हें बिना किसी भूमिका के प्रकाशित किया गया है. शायद नये लेखकों के सामने आने वाली कठिनाईयों को आप सभी सुधी लेखक एवं पाठक आसानी से समझ सकेंगे.

यह कहानी संग्रह संवाद शैली में लिखा गया अपने आप में अनोखा संकलन है जिसके माध्यम से कहानी सरपट दौड़ती है और अंत तक पाठक को बांधे रखती है. ‘सपना’ कहानी स्त्री होने के अपने दर्द को पाठक के सामने एक सवाल के रूप में प्रस्तुत करती है-“क्यों लोग उसकी भावनाओं को समझ नहीं पाते? वह तो दोस्ती करती है और लोग उसकी दोस्ती को क्या समझ बैठते हैं? बार-बार उसे यही लगता है कि क्या मेरा लड़की होना गलत है?” यह कहानी एकतरफा प्रेम की दुखांत कहानी है. आपको ऐसी ही कहानी ‘पत्थर के लोग’ पढ़ने को मिलेगी जिसमे एकतरफा प्यार और पागलपन है. प्यार में असफल होने के बाद भी वह समाज की सेवा करने में अपना जीवन समर्पित करने की सोचता है लेकिन उसके नेक इरादे, आज की दुनिया में उसको मुजरिम बना देती है. शायद ऐसी कानून व्यवस्था हमारे समाज में आज भी मौजूद है.

‘जरूरतें’ एक आम इन्सान की ऐसी कहानी है जो बॉस और उसके सहकर्मी के मध्य होने वाले तमाम तरह के समझौतेविहीन सम्मान को बचाय रखने की जद्दोजहद की दास्ताँ है– “जो भी नया बॉस आता है वह अपने अनुसार काम कराता है. रही बात नौकरी न करने की तो यह गलत है यार...तुम्हारा घर परिवार है...बच्चो का खर्च... अगर नौकरी छोड़ दी तो क्या करोगे?” आज शहरी जीवन बहुत ही कठिन हो गया है. अपने अस्तित्व को बचाय रखने के लिए एक आम इन्सान रात-दिन खटता है लेकिन वह अपने परिवार की परवरिश तक नहीं कर सकता- “अब तो घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है. दो-तीन महीने से तो विवेक को वेतन में से कुछ धनराशि अग्रिम लेनी पड़ती है.” यह कहानी प्रत्येक मध्यम, निम्न मध्यम और निम्न वर्ग के लोगों की अपनी कहानी लगती है.

‘अँधेरा’ जैसी कहानी ने यह साबित कर दिया है कि महिलाएं आज कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. खासकर पारिवारिक रिश्तों में महिलाओं का शोषण और उत्पीड़न इसलिए भी अधिक पाया जाता है क्योंकि मान-मर्यादा की वजह से लड़की पक्ष कुछ नहीं बोल पाता नतीजन महिलाओं को  विभिन्न तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है.

‘आइसक्रीम’ शहरी जीवन की वह महा-गाथा है जिसे कहीं भी सुना, पढ़ा और लिखा नहीं जाता है. डॉ. लवलेश ने शहर के नरकीय जीवन के ऐसे पहलू को उजागर किया है जिस पर हमारी नजर सिर्फ कभी-कभार ही पड़ती है- “आजकल तो ऐसी-ऐसी कालोनियाँ बन रही हैं जिसमें शोपिंगमॉल, सिनेमाघर, दुकानें, स्विमिंगपूल और न जाने क्या-क्या होता है. लेकिन धूप और वर्षा से बचने का कोई स्थान नहीं.”

आधुनिक तकनीक ने जहाँ दुनिया की दूरियों को कम किया है वहीं पारिवारिक रिश्तों को तोड़ने में भी अहम भूमिका निभाई है. ‘मैसेज’ नव दम्पत्ति की ऐसी कहानी है जिसमें एक मैसेज लड़की के चाल-चलन पर सवाल खड़ा करके रिश्तों में कड़वाहट पैदा करता है. यह कहानी पढ़े-लिखे सभ्य समाज में पैदा होने वाली ख़ास एवं नये तरीके की ऐसी बीमारी है जो शहरी जीवन के परिवारों में अविश्वास, इर्ष्या, द्वेष आदि मनोविकृति के रूप में हमारे सामने आ रही  है.

‘पराँठे’ और ‘रोंग नम्बर’ हमारे दौर की वो कहानियाँ हैं जिसमे भागदौड़ भरी जिन्दगी माँ-बाप के लिए बहुत ही दुखदायी होती है. ‘पराँठे’ कहानी के शर्मा जी मौत शहरी जीवन के पारिवारिक संबंधों में आ रही गिरावट की वह सडन है जिसकी बदबू धीरे-धीरे हमारे घरों तक पहुँच रही है. वहीं ‘रोंग नम्बर’ शहरों की उन परिवारों की कहानी है जो अपने परिवार, गाँव समाज से एकदम कट चुके हैं. “अरे अंकल आप किस चक्कर में पड़े हैं? यह दिल्ली है. आपका बेटा-बहू कोई आपको लेने आने वाला नहीं है. आप दोनों मेरी सलाह मानो... घर वापस चले जाओ. यह दिल्ली जितनी बड़ी है, यहाँ के लोगों के दिल  उतने ही छोटे हैं.”

शहर सिर्फ अमीरों, मध्यवर्गीय परिवारों का नहीं होता. उसमें गरीब परिवार और उनका जीवन भी होता है. ‘भाजी’ कहानी को पढ़ने के बाद आपको देखने को मिलेगा कि गरीब, गरीब जरूर होते हैं लेकिन जिन्दा रहने की जद्दोजहद में ही सही, छोटे-छोटे सपनों के साथ वे आज भी जिन्दा और जीवंत हैं- “अँधेरा घिर रहा था. पैरों की चोट दर्द कर रही थी पर ख़ुशी इतनी थी कि किसी दर्द, किसी अँधेरे की परवाह किये बगैर मन में बुदबुदाता हुआ बालक राम साइकिल दौड़ाए जा रहा था. आज गुड्डो रानी खुश हो जाएगी. एक नहीं दो-दो फिराक, पैसे का क्या है, कल नहीं तो परसों काम मिल ही जायेगा. फिर चार-पांच दिन तो यह तेल-मसाला चल ही जायेगा...”

डॉ. लवलेश दत्त की कहानियाँ शहरी जीवन की उस मनोदशा का वर्णन करती हैं जिसमें लोभ-लालच, अलगाव, घुटन, बेगानापन आदि मनोवृतियों का यथार्थ चित्रण है. एक-दो कहानियों का कथा शिल्प एक जैसा होने कारण कहानियों में दोहराव सा महसूस होता है. इसके बावजूद  कहानियों की बनावट, बुनावट और कथा शैली में एक नयापन है जो पाठक को शुरू से लेकर अंत तक बांधे बनाये रखने में सफल होती है.

सपना : डॉ. लवलेश दत्त | प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन | कीमत :120 | पृष्ठ 112 

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। हर परिवर्तन अवश्यंभावी है और इसके लिए हरेक जीव को तैयार रहना ही चाहिए। हर समय एक जैसा नहीं होता, उसमें निरन्तर बदलाव का दौर चलता ही रहता है।

परिवर्तनों का हर किसी पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। कुछ के लिए परिवर्तन सुखद होते हैं और कुछ के लिए दुःखद। कुछ लोग परिवर्तन से प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन बहुत सारे लोग परिवर्तनों से परेशान हो जाते हैं।

मूल बात यही है कि जो परिवर्तन हमारे मनचाहे होते हैं वे हमें पसंद आते हैं और जो परिवर्तन अनचाहे होते हैं उन्हें हम नापसंद करते हैं।

हर प्रकार के परिवर्तन का अपना प्रभाव होता है और इसका असर भी भिन्न-भिन्न लोगों पर अलग-अलग तरीकों से होता है। कुछ लोग परिवर्तनों को स्वीकार कर उनके अनुरूप ढल जाते हैं और अपने हाल में मस्त रहते हुए जीवन निर्वाह करते रहते हैं।

बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपने आपको एक सीमित परिधि में ढाल कर अपना आभामण्डल निर्मित कर दिया करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उनके आभामण्डल की तरह अपने आपको ढाल लें। लेकिन ऎसा हो नहीं पाता।

संसार नित्य परिवर्तनीय है और परिवर्तन का यह दौर हर दिन किसी न किसी रूप में अपने आपको परिमार्जित करता हुआ आगे बढ़ता रहता है, अपने स्वरूप और कार्यशैली में बदलाव लाता रहता है। हमेशा तरोताजा रहने और हर परिवर्तन के प्रति तैयार रहने वाले लोग मौज-मस्ती के साथ आनंद पाते रहते हैं।

सामाजिक प्राणियों की एक असामाजिक प्रजाति ऎसी भी है जिसे कोई परिवर्तन पसंद नहीं आता। यह प्रजाति मलिन सोच-विचार और हीन कर्मों में इतनी लिप्त रहती है कि किसी और को स्वीकार कर ही नहीं पाती।

इस प्रजाति के लोग अपने आपको सर्वस्व, संप्रभु और सर्वज्ञ होने का इतना बड़ा भ्रम हमेशा पाले रहते हैं कि अपने अहंकारी व्यक्तित्व के झण्डे के नीचे सभी को नत मस्तक खड़ा हुआ देखना चाहते हैं और यही कारण है कि ये कहीं भी किसी भी प्रकार का समन्वय स्थापित नहीं कर पाते हैं।

ऎसे लोगों की स्थिति जिन्दगी भर उस द्वीप की तरह होती है जिसे चारों तरफ से खारे पानी का समुद्र घेरे हुए रहता है और द्वीप पर विषैले और हिंसक जानवरों तथा जहरीले पेड़-पौधों के सिवा और कुछ नहीं होता।

इस प्रजाति के लोग हर युग में दुःखी, संतप्त और आत्महीन बने रहते हैं। न और लोग इनसे सामंजस्य स्थापित करने की कल्पना कर पाते हैं, न ही ये दंभी स्वभाव वाले औरों के पास जाने की उदारता रख पाते हैं।

ऎसे बहुत सारे द्वीप लोक में विद्यमान हैं जिनकी वजह से लोग परेशान हैं और इनकी वजह से पूरा का पूरा समुदाय। इस प्रजाति के लोग पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं लेकिन ऎसा होना संभव नहीं हो पाता। इस कारण ये हमेशा खिन्नता और मायूसी में जीने के आदी रहते हैं।

इन लोगों को हमेशा लगता है कि हर बार होने वाला परिवर्तन उनके लिए लाभकारी या सुकून देने वाला साबित होगा लेकिन थोड़े दिन गुजर जाने के बाद वही स्थिति - ढाक के पात तीन के तीन। इसका कारण यही है कि इनमें किसी भी परिवर्तन को उदारतापूर्वक स्वीकार करने और अच्छाइयों को आत्मसात करने का माद्दा नहीं होता।

इसलिए ये बार-बार परिवर्तन के पहले वाली स्थिति में आ जाते हैं और अपनी अहंकारी सत्ता को बनाए या स्थापित रखने के फेर में हर बार परिवर्तन की आकांक्षा में जायज-नाजायज ताने-बाने बुनते रहते हैं, नापाक समीकरणों और समझौतों का सहारा लेते रहते हैं।

इससे परिवर्तन हो भी जाता है मगर इनके लिए हर परिवर्तन कुछ दिन बाद बेमानी ही साबित होता है क्योंकि ऎसे लोग जीवन में कभी भी खुश नहीं रह सकते। यही इनके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप होता है।

चाहे परिवर्तन कैसा भी हो, इन लोगों के लिए इसका कोई अर्थ नहीं होता क्योंकि किसी भी प्रकार का परिवर्तन इन्हें बर्दाश्त नहीं होता। दूसरी तरफ ये इतने दंभी होते हैं कि खुद में किसी भी प्रकार बदलाव लाने को कभी राजी नहीं होते। इनके स्वयं द्वारा अपने लिए बनाया गया अदृश्य खोल इन्हें बाहर निकलने नहीं देता और ये हमेशा उस खोल के भीतर रहकर ही जमाने भर को अपने अनुरूप ढालने और चलाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।

इस वजह से जमाना और संगी साथी तो निरन्तर बहुत आगे बढ़ चलते हैं और ये लोग जहाँ होते हैं वहीं ठहरे होते हैं। अहंकार के लंगर इनकी हर हरकत को बांधे रखते हैं। और अहंकार भी ऎसा कि इसके आगे और सब कुछ गौण ही बना रहता है।  दुनिया में जहाँ-जहाँ इस मानसिकता के लोग मौजूद रहते हैं वहाँ हर तरफ मायूसी और शोक के सिवा और कुछ भी नहीं होता। 

अच्छा यही होगा कि हम अपने मिथ्या भ्रमों और अहंकारों को खत्म कर हर प्रकार के परिवर्तन के प्रति सजग रहें और जो-जो परिवर्तन हमारी तरक्की, हुनर विकास और प्रतिभा विस्तार के लिए लाभकारी हैं उन्हें अपनाने में कंजूसी न रखें।

उदारतापूर्वक जो हितकारी परिवर्तनों को स्वीकारता है वही आगे बढ़ सकता है, दुनिया पर राज करने का सामर्थ्य पा सकता है। किसी और को या जमाने को दोष न दें, अपनी गलतियों को देखें, अपने अहंकारों के खोल से बाहर निकल कर देखें, अपने आपको किसी अच्छे आईने में देखें, और फिर तय करें कि खराब कौन है, जमाना या हम। पूरी गंभीरता और ईमानदारी के साथ समय-समय पर यह भी सोचते रहें कि आखिर लोग हमें ही खराब क्यों मानते और कहते हैं। कुछ तो कारण होगा ही इसका।

दूसरों को दोष  देने या खराब कहने से पहले यह सोचें कि जिन लोगों को हम खराब बताते हैं उनकी छवि जमाने में कैसी है, हमारे सिवा और कौन है जो उन्हें खराब कहता है। दूसरी तरफ हममें से बहुत से लोग ऎसे हैं जिन्हें कोई अच्छा नहीं कहता, सभी हमारी छवि, स्वभाव और व्यवहार को खराब बताने से कोई परहेज नहीं रखते।

अपने आपको देखें, सुधारने के प्रयास करें और हर परिवर्तन से कुछ सीखें तथा अपने आप में बदलाव लाएँ। अन्यथा हम जिन्दगी भर बदलाव करते रहकर भी कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। और अन्त में लोग यह कहने को मजबूर हो ही जाएंगे कि ये हैं ही ऎसे खराब कि किसी को न पसंद आते हैं, न कोई इन्हें पसंद करता है।

हर बदलाव से सीखें और अपने गिरेबान में पूरी ईमानदारी के साथ कम से कम एक बार तबीयत से झाँक लें, अपने आप सच सामने आ ही जाएगा। फिर भी न सुधर पाएं तो दोष भगवान को देने में कोई आपत्ति नहीं जिसने मनुष्य का शरीर भूल से ही दे दिया लगता है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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सृष्टि का विस्तार असीम है. जितनी भी जानकारियाँ अब तक मिल पायी हैं, वे इतनी अल्प है कि उनके आधार पर सब कुछ जान लिया जा सका है, यह दावा नहीं किया जा सकता. हम भले ही अपनी प्रतिभा, योग्यता एवं वर्चस्व का कितना ही गुणगान कर लें, पर सर्वज्ञ कदापि नहीं हो सकते. कितने ही तथ्य एवं रहस्य ऎसे है जिनके संदर्भ में मनुष्य अब भी कुछ जान नहीं सका है. बल, बुद्धि, विज्ञान भी उनको समझ सकने में असमर्थ रहा है. अपनी सभ्यता के लिए भी वह यह अभिमान नहीं कर सकता और न ही इस बात की घोषणा की जा सकती है कि चेतन प्राणियों का अस्तित्व मात्र पृथ्वी तक ही सीमित है. अब तक जो भी परिणाम मिले हैं, उनसे पता लगा है कि अन्यान्य ग्रहों पर भी जीवन विद्यमान है. ब्रह्माण्ड में पृथ्वी से अधिक विकसित सभ्यताओं की सम्भावना भी व्यक्त की जा रही है. हाँ, इतना अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि अन्य ग्रहों के जीवों का आकार-प्रकार, जीवन-यापन, का तरीका हम पृथ्वीवासियों से सर्वथा भिन्न हो. और यह भी जरूरी नहीं है कि वहाँ की परिस्थितियाँ जीवित रहने के लिए पृथ्वी जैसी ही हो. पृथ्वी पर जीवित रहने के लिए आक्सीजन जरूरी है. पर अन्य ग्रहों पर स्थिति इससे उलट भी हो सकती है. यह जरूरी भी नहीं है कि वे इन्हीं आँखों से हमें दिखाई दे. त्रिआयामिक दृष्य जगत से उनकी स्थिति अलग भी हो सकती है. सम्भव है कि वे सशरीर अन्य ग्रहों में पृथ्वी आदि के टोह लेने के लिए उतरते भी हों. हमारी आँखें उनको देख पाने में असमर्थ हों.

यह मात्रा एक कल्पना नहीं वरन एक तथ्य है. समय-समय पर दिखाई पडने वाली उडनतश्तरियों के प्रमाण उस तथ्य की पुष्टि करते हैं. उडनतश्तरियों की बनावट, अचानक प्रकट होकर लुप्त हो जाना कुशल वैज्ञानिक मस्तिष्क एवं विकसित सभ्यता का प्रमाण देती हैं. सैकडॊं वर्षों से वैज्ञानिक यह जानने का प्रयत्न कर रहे है के ये अचानक कहाँ से प्रकट होती हैं तथा कहाँ चली जाती हैं पर उनके ये प्रयत्न असफ़ल ही सिद्ध हुए हैं. मात्र अनुमान लगाया गया है कि जहाँ से ये उडनतश्तरियाँ आती हैं, वहाँ की सभ्यता पृथ्वी की तुलना में कहीं ज्यादा अधिक विकसित है.

अनेकों बार तश्तरियाँ देखी गई हैं तथा अपने रहस्यों को साथ समेटे देखते ही देखते आँखों से ओझल हो गई हैं. सन १९४७ में अमेरिका के पश्चिमी तट राकोमा के निकट मोटर बोट में बैठे दो रक्षक एच.ए.डहल एवं फ़ैड के. क्रैसवेल समुद्र तट की निगरानी कर रहे थे. अचानक डहल ने दो हजार फ़ीट की ऊँचाई पर आकाश में छः फ़ुटबाल की तरह गोल आकृति की मशीनों को घूमते हुए देखा, पाँच मशीनें एक के चारों ओर घूम रही थीं. वे क्रमशः नीचे उतरने लगीं और सागर से मात्र ५०० फ़ुट की उँचाई पर आकर रुक गईं. तट के रक्षक डहल ने अपने साथी की सहायता से अपने कैमरे से एक फ़ोटॊ खींचने का प्रयत्न किया. अभी कैमरे का स्विच दबाया ही था कि आकाश में जोर का धमाका हुआ. आकाश में उडने वाली मशीनों में से बीच की मशीन फ़ट गई. मोटर बोट में सवार अंगरक्षक छलाँग लगाकर पास की एक गुफ़ा में घुस गए. पर उनके साथ का कुत्ता वहीं मर गया. कुछ देर बाद जब बाहर निकले तो देखा आकाश में उडने वाली वस्तुओं का नामोनिशान नहीं है. विस्फ़ोट से फ़टी मशीन के टुकडॆ तट पर बिखरे पडॆ थे जो चमकीले एवं गरम थे. दुर्घटना की सूचना तट रक्षकों ने मोटरबोट में लगे ट्रान्समीटर द्वारा देनी चाही पर उन्हें यह देखकर आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि किसी ने रेडियोलाजिकल मशीन से मोटर बोट में लगे द्रान्समीटर को जाम कर दिया है. निरीक्षण को आये अनुसन्धान दल ने वाशिंगटन के उक्त टापू मरे पर लगभग २० टन धातु के टुकडॊं को एकत्रित किया. परीक्षा पर मालूम हुआ कि धातु के टुकडॊं में अन्य सोलह धातुओं का सम्मिश्रण हैं तथा उनके ऊपर केलसियम की मोटी चादर चढी है. वैज्ञानिकों को यह जानकर विशेष आश्चर्य हुआ कि इन धातुओं में से एक भी पृथ्वी पर नहीं पायी जाती. वे उनके नाम तक बता पाने में असमर्थ रहे. उन्होंने सम्भावना व्यक्त की कि अन्तरिक्ष यान विशेष शक्तिशाली आण्विक यन्त्रों से संचालित था.

लेकन हीथ ( इंग्लैण्ड) १३ अगस्त १९५६ को रात्रि तीन बजे रायलफ़ोर्स के दो राडार स्टेशनों से तेज गति से उडती हुई उडनतश्तरियों को देखा. पृथ्वी से मात्र ११०० मीटर की ऊँचाई पर साढे तीन हजार किलोमीटर प्रति घण्टा की गति से ये विचित्र संरचनाएँ पश्चिम दिशा की ओर उड रही थीं. रायल एअरफ़ोर्स के एक लडाकू विमान ने इनका पीछा किया किन्तु देखते-देखते वे अदृष्य हो गईं.

१० अक्टूबर १९६६ को सायं ५ बजकर २० मिनट पर “न्यूटन इलिनाय़”( अमेरिका) में पृथ्वी से मात्र १५ मीटर की ऊँचाई पर एक यान जैसी वस्तु उडती दिखाई दी. देखने वालों ने बताया कि वह मात्र ६ मीटर लम्बी, २ मीटर व्यास वाली, सिगार की शक्ल जैसी थी. जो एल्म्युनियम जैसी किसी चमकीली धातु से बनी प्रतीत होती थी. अग्रभाग का छिद्र प्रवेश द्वार जैसा लगता था, उडती हुई वस्तु के चारों ओर हलकी नीली रंग की धुंध छाई थी. यान से किसी प्रकार की ध्वनि तो सुनाई नहीं पड रही थी पर वातावरण में एक विचित्र प्रकार के कंपन का आभास मिल रहा था. कुछ मिनटॊं के बाद वह वस्तु गायब हो गई.

पिछले दिनों भारत में भी उडनतश्तरियाँ देखी गईं. ३ अप्रैल १९७८ को अहमदाबाद में उदयपुर विश्व-विद्यालय के प्रोफ़ेसर दिनेश भारद्वाज ने रात्रि नौ बजे तश्तरी जैसी चीजों को उडते देखा. वे प्रकाश पुन्ज जैसी समानान्तर एक साथ उडती रही थीं. पर अचानक एक- दूसरे के विपरीत दिशा की ओर मुड रही थीं तथा कुछ देर बाद लुप्त हो गईं. वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें उल्का पिण्ड नहीं माना जा सकता क्योंकि उल्का पिण्ड अपनी इच्छानुसार दिशा नहीं बदल सकते. उन्हें किसी कुशल मस्तिष्क द्वारा संचालित माना जाना चाहिए. अपने अन्दर अनेकों रहस्य छिपाये हुए वैज्ञानिकों को चुनौती देती ये उडनतश्तरियाँ समय-समय पर दिखाई पडती है.

पृथ्वीवासियों की वैज्ञानिक क्षमता, बुद्धि का उपहास करते हुए आँखों से ओझल हो जाती हैं. उनकी शक्ति, सामर्थ्य का अनुमान इस बात से लगता है अनेकों बार प्रयत्न किए जाने के बाद भी मनुष्य उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जान सका है. पीछा करने वाले यान असमर्थ रहे हैं. इन विचित्र आकृतियों के साथ सुरक्षा की भी पूरी व्यवस्था है. यही नहीं खतरे की सम्भावना भी उन्हें तुरन्त मिल जाती है.

कितनी ही बार तो पीछा करने वाले यानों के चालकों को जीवन से हाथ धोना पडा है. उनकी वैज्ञानिक क्षमता बडी-चढी है इसका अनुमान इस घटना से लगता है. “मेलबोर्न” २४ अक्टूबर,७८ को एक विमान चालक सहित एक उडनतश्तरी जैसी धातु को देखने के बाद लापता हो गया. बीस वर्षीय युवा चालक श्री “फ़्रेडरिक वाकेटिच” ने आस्ट्रेलिया एवं तस्मानिया के बीच चाटर्ड उडान भरी. चालक फ़्रेडरिक ने हवाई अड्डॆ के ऊपर से चाटर्ड रेडियो सन्देश द्वारा अधिकारियों से पूछा कि १५२४ मीटर ऊँचाई पर उसी क्षेत्र में कोई दूसरा विमान तो नहीं उड रहा है. फ़्लाइट सर्विस ने नकारात्मक उत्तर दिया. फ़्रेडरिक ने अधिकारियों को बताया कि वह १८२ मील दूर १३७ मीटर की ऊँचाई पर किंग आइसलैंड के पास से उड रहा है. उसे एक लम्बी आकार की वस्तु तेज गति से उडती दिखाई पड रही है. वह मेरे विमान के ऊपर चक्कर काट रही है. तभी धातु के टकराने जैसा शोर सुनाई पडा तथा विमान का सम्पर्क नियन्त्रण कक्ष से टूट गया. मेलबोर्न हवाई अड्डॆ से अनेकों जहाजों ने खोज के लिए उडान भरी किन्तु चालक और यान का कुछ पता भी न चल सका. न ही दुर्घटना का कोई चिन्ह ही मिला. पृथ्वी के वैज्ञानिक अन्यान्य ग्रहों की स्थिति का पता लगाने के लिए प्रयत्नशील हैं. समय-समय पर वैज्ञानिकों के दल अन्तरिक्ष में खोज के लिए जाते हैं. अन्य ग्रहों की स्थिति के खोज का कार्य मात्र मनुष्य द्वारा नहीं किया जा रहा है वरन जो प्रमाण मिले हैं उनसे पता चलता है कि अन्य ग्रहों पर पृथ्वी की तुलना में अधिक विकसित सभ्यताएँ हैं. वे भी खोज के लिए पृथ्वी पर आते रहते हैं. “इन्डियन एक्सप्रेस” ५ जनवरी १९७९ में प्रकाशित समाचार के अनुसार दक्षिण अफ़्रीका जोहान्सबर्ग के निकट एक महिला एवं उसके पुत्र ने अपने घर के निकट एक उडनतश्तरी को उतरता हुआ देखा. उड्नतश्तरी की अन्य घटनाऒ से इसमें भिन्नता यह थी कि श्रीमती की गन क्वीगेट ने यान जैसी आकृति के निकट पाँच मनुष्य की शक्ल से मिलते जीवों को खडॆ देखा.

अलग-अलग इन्टरव्यू लेने पर उसके पुत्र ने भी यही बात बताई. श्रीमती क्वीगेट ने बताया कि जैसे ही उसने अपने पुत्र से कहा कि, “अपने पिता को बुलाओ” यान के निकट खडॆ सभी व्यक्ति उडनतश्तरी में बैठ गए और कुछ ही क्षणॊं में वह यान हवा में विलीन हो गया. पूरी घटना में ५ या ६ मिनट लगे होंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने भी उडनतश्तरी देखी. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने उडनतश्तरियों को अपने शोध का विषय बनाया. इसका नाम उन्होंने यू.एफ़.ओ.( अनाइडेन्टीफ़ाइड फ़्लाइंग आब्जेक्टस), “जे एल.हाइनेक” ने नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में यू.एफ़.ओ. अध्ययन केन्द्र की स्थापना की है. इस शोध संस्थान का कार्य रहस्यमय उडने वाली वस्तुओं के सन्दर्भ में तथ्य एवं जानकारी इकत्रित करना है.

अब वैज्ञानिकों में भी यह मान्यता परिपुष्ट हो रही है कि सभ्यता पृथ्वी तक ही सीमित नहीं है. डा. फ़्रेडमैन जैसे वैज्ञानिकों का विश्वास है कि जीवन और सभ्यता अन्य ग्रहों पर भी है जो पृथ्वी की तुलना में कहीं अधिक विकसित है. इसका प्रमाण है कुशल वैज्ञानिक यन्त्रों से सुसज्जित रहस्यमय उडतश्तरियाँ. जिनका रहस्योद्घाटन कर सकना वैज्ञानिकों द्वारा अब तक सम्भव नहीं हो सका है. डा. फ़ैडमैन ने सम्भावना व्यक्त करते हुए कहा कि पृथ्वी ऊर्जा का स्त्रोत है. सम्भव है अन्य ग्रहों के निवासी पृथ्वी पर ऊर्जा संग्रह करने आते हैं और इस कार्य के लिए उन्होंने वैज्ञानिक तकनीकी का विकास कर लिया हो. बहुत समय पूर्व सन १९५९ में रूसी वैज्ञानिक एलेक्जेंडर काजन्तसेव ने अपने अनुसंधान कार्यों के उपरान्त घोषणा की थी कि जिस प्रकार हम चन्द्रमा और अन्य ग्रहों की जानकारी प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार से यानों का प्रयोग कर रहे हैं, उसी प्रकार की खोजबीन अन्य ग्रहों के निवासियों द्वारा भी की जा रही है. जर्मन वैज्ञानिक “एरिकबन डेनिकेन” के अपनी पुस्तकें “ चैरियट्स आफ़ गाड” और रिटर्नमद स्टार्स” में भी इस तथ्य का उद्घाटन किया है कि अन्य ग्रहों के निवासी पृथ्वीवासियों की टोह लेने के लिए समय-समय पर उतरते हैं. यहाँ के वैज्ञानिकों की तुलना में विज्ञान के क्षेत्र में उनकी पहुँच अधिक है.

बुद्धिमता एवं सभ्यता के क्षेत्र में मनुष्य ही सबसे अग्रणी नहीं है. पृथ्वी की तुलना में विकसित सभ्यताएँ भी ब्रह्माण्ड में मौजूद हैं. मनुष्य को अपनी तुच्छता समझानी चाहिए. मिथ्या गर्व की अपेक्षा ईश्वर प्रदत्त क्षमता का उपयोग मानवोचित रीति-नीति में करना ही श्रेयस्कर है.

-- १०३, कावेरी नगर, छिन्दवाडा(म.प्र.) ४८०-००१ गोवर्धन यादव ०९४२४३५६४००

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(संपादकीय टीप – उड़न तश्तरियाँ देखे जाने आदि के प्रमाण आमतौर पर सत्य कम काल्पनिक अधिक हैं, मगर यह भी वैज्ञानिक सत्य है कि कई खरब वर्ष की उम्र के, अनंत विस्तार लिए ब्रह्मांड में कोई एक दो नहीं, बल्कि अनेकों जीव सभ्यता के मौजूद होने के पुख्ता गणितीय कारक हैं. यह दीगर बात है कि उन तक हमारी पहुँच या उनकी हम तक पहुँच सदा सर्वदा के लिए असंभव ही बनी रहेगी)

किस किस को प्यार करूं - कपिल शर्मा kapil sharma kis kis ko pyar karun

जावेद अनीस

हमारे यहाँ कॉमेडी का मतलब औरतों, ट्रांसजेंडर्स, मोटे लोगों, बुजर्गों, काले–सावंले लोगों और विकलांगों का मजाक उड़ाना सा बन गया है. पिछले कुछ सालों से कपिल शर्मा यही सब कर-करके काफी नाम और दाम कम चुके हैं. उन्हें हमारे समय के कॉमेडी के बादशाह के तौर पर पेश किया जा रहा है .टीवी पर उनका शो "कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल" काफी टीआरपी खोर रहा है. अपने शो में आनस्क्रीन बीवी, मोटे किरदारों और प्रतिभागियों का मजाक बनाकर कॉमेडी करते रहे हैं. एक बार तो गर्भवती महिलाओं पर आपतिजनक जोक के चलते उनकी शिकायत महिला आयोग तक भी पहुँच चुकी है.

उनकी डेब्यू फिल्म 'किस किसको प्यार करूं' भी उसी आजमाए हुए फार्मूले पर आधारित है, इसके निर्देशक है अब्बास-मस्तान, जो थ्रिलर फिल्मों के लिए मशहूर रहे हैं. यह फिल्म अपने दर्शकों को बेवकूफ समझती है, अपने मूल रूप में यह सामान्य हिंदी फिल्मों से भी ज्यादा महिला विरोधी है. जो महिलाओं को नासमझ के तौर पर पेश करते हुए पुरुषों को कुछ भी करने की छूट देती हुए उसे मजबूरी और महिलाओं के प्रति अहसान बताती है. कहानी के लेखक अनुकल्प गोस्वामी हैं जो कपिल के कॉमेडी शो की स्क्रिप्ट लिखते हैं,कहानी कुछ इस तरह से है शिव राम किशन (कपिल शर्मा) औरतों का दिल नहीं तोड़ सकता है इसलिये वह ना चाहते हुए भी तीन शादियाँ करने को मजबूर हो जाता है, उसकी तीनों पत्नियों जूही (मंजरी फडनिस), सिमरन (सिमरन कौर मुंडी), अंजली (साइ लोकुर) को एक दूसरे के बारे में पता नहीं है. बात में तीनों को और अच्छे से “मैनेज” करने के लिए उन्हें एक ही बिल्डिंग ले आता है जहाँ वे अलग-अलग फ्लोर पर रहती हैं लेकिन उन्हें भनक ही नहीं लग पाती है कि उनके पति एक ही हैं और वह दो दिन बाद प्रत्येक बीवी के पास रहता है. लेकिन शिव राम किशन के लिए तो यह तीनों शादियाँ हादसा हैं, दरअसल उसकी एक गर्लफ्रेंड दीपिका (एली अवराम) भी है जिसके साथ वह “सच्ची वाला” प्यार करता रहता है. पूरी फिल्म में शिव राम किशन अपनी तीनों बीवियों को मैनेज करने और गर्लफ्रेंड दीपिका से शादी करने के प्रयास करता है और इस काम में उसका दोस्त वरूण शर्मा जो की वकील है उसकी मदद करता है.

फिल्म क्लाइमैक्स झटका देता जब एस.आर.के.गर्लफ्रेंड से शादी करने के लिए मंडप में बैठा होता है और वहां पर उसकी तीनों बीवियां भी मौजूद होती हैं और क्या उसकी सच्चाई सामने आ जाती है. इसके बाद जिस तरह से शिव राम किशन के कारनामों को जस्टिफाई करते हुए इसे औरतों की मदद के तौर पर पेश किया है वह हैरान करने वाला है. बाद में तीनों पत्नियों उसके इस अहसान का बदला चुकाते हुए उससे माफ़ी मांगती हैं और गर्लफ्रेंड से शादी हो जाती है, अंत में चारों महिलायें एक ही छत के नीचे अपने कॉमन पति के साथ रहने लग जाती हैं.

कपिल शर्मा ज्यादातर अपने टीवी के अवतार को दोहराते हुए नजर आते है, कॉमेडी भी वे स्टैंडअप स्टाइल में करते हैं, इमोशनल और बाकी दृश्यों में उनकी सीमायें साफ नजर आती है. तीनों पत्नियों का किरदार निभाने वाली लड़कियों को पूरी फिल्म में ज्यादातर बेवकूफ बन कर खुश होते रहना था, जो उन्होंने बखूबी निभाया है. अरबाज खान, सुप्रिया पाठक, शरत सक्सेना के पास ज्यादा करने को कुछ नहीं था.

कुल मिलकर यह फिल्म "कॉमेडी नाइट्स विथ कपिल" का सिनेमाई विस्तार है. अगर आप इंसानों को लेकर संवदेनशील हैं तो यह फिल्म आप को निराश और परेशान कर सकती है. नारीवादियों के लिए यह फिल्म अध्ययन के लिए अच्छा विषय हो सकती है. इधर ख़बरें आ रही हैं कि इस फिल्म ने पहले ही दिन 10.15 करोड़ रुपये की कमाई कर ली है। अगर लोगों को कॉमेडी के नाम पर ऐसी फिल्में पसंद आ रही हैं तो समाज विज्ञानियों को हमारे समाज के पड़ताल की भी जरूरत है.

 

Javed4media@gmail.com

कवि वीरेन डंगवाल - संस्मरण

कवि वीरेन डंगवाल नहीं रहे.

विष्णु खरे ने वीरेन डंगवाल को याद करते हुए श्रद्धांजलि स्वरूप अपने संस्मरण में लिखा  - हमारे जमाने का एक अद्वितीय बड़ा कवि चला गया. मंगलेश डबराल ने श्रद्धांजलि दी - एक अपराजेय का  जाना.

अनिल यादव ने बीबीसी के पन्ने पर उन्हें बेतरह याद किया - जिंदगी से छलकता आदमी और कवि वीरेन डंगवाल.

फ़ेसबुक में नीलाभ इलाहाबादी (https://www.facebook.com/neelabh.1945) ने वीरेन की इन कविताओं को पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी -

दो कविताएं जो वीरेन के लिए लिखी थीं
----------------------------------------

एक दिन इसी तरह
(वीरेन के लिए)

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर
या कविता की किताब के पन्नों में दबा
तुम्हारा ख़त बरामद होगा

मैं उसे देखूंगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से
खोलूंगा उसे, पढ़ूँगा एक बार फिर
कई-कई बार पढ़े पुरानी बातों के कि¤स्से

तुम्हारी लिखावट और तुम्हारे शब्दों के सहारे
मैं उतर जाऊँगा उस नदी में
जो मुझे तुमसे जोड़ती है
जिसके साफ़-शफ़्फ़ाफ़ नीले जल में
घुल गयी हैं घटनाएँ, प्रसंग और अनुभव
घुल गयी हैं बहसें और झगड़े

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल में
किसी किताब के पन्नों में
बरामद होगा तुम्हारा ख़त

मैं उसे खोलूंगा
झुर्रीदार हाथों की कँपकँपाहट के बावजूद
आँखों की ज्योति मन्द हो जाने पर भी
मैं पढ़ सकूंगा तुम्हारा ख़त
पढ़ सकूंगा वे सारे ख़त
जो तुमने मुझे लिखे
और वे भी
जो तुमने नहीं लिखे

एक दिन इसी तरह
तुम्हारा ख़त होगा: और मैं

1986

मित्रताएँ

मनुष्यों की तरह
मित्रताओं का भी आयुष्य होता है

यही एक रिश्ता है
बनाते हैं जिसे हम जीवन में
शेष तो जन्म से हमें प्राप्त होते हैं
भूल जाते हैं लोग सगे-सम्बन्धियों के नाम
मित्रों के नाम याद रहे आये हैं

मित्रताओं का भी आयुष्य होता है
मनुष्यों की तरह
कुछ मित्रताएँ जीवित रहीं मृत्यु के बाद भी
आक्षितिज फैले कछार की तरह थीं वे
मिट्टी और पानी का सनातन संवाद
कुछ मित्रताएँ नश्वर थीं वनस्पतियों की तरह
दिवंगत हुईं वे
जीवित बचे रहे मित्र
2004

--

शंभूनाथ शुक्ल ( https://www.facebook.com/shambhunaths ) ने वीरेन दा को कुछ यूँ याद किया -

वीरेन डंगवाल यानी वीरेन दा को मैने सदैव एक बड़े पत्रकार के रूप में देखा। यकीनन वे बहुत अच्छे कवि रहे होंगे पर मैने उनमें सदैव एक बड़े पत्रकार और बेहतर इंसान की छवि देखी। पहली बार जब मैं उनसे मिला था तब वे कानपुर में अमर उजाला के संपादक थे और उन्होंने कानपुर में अपेक्षाकृत नये आए अखबार अमर उजाला को जन-जन तक पहुंचा दिया था। उनके बाद कानपुर अमर उजाला में प्रदीप कुमार संपादक रहे और प्रदीप जी के जाने के लगभग छह महीने बाद मैं कानपुर में अमर उजाला का संपादक बन कर गया। तब अखबार के प्रबंध निदेशक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी ने मुझसे कुछ कहा तो नहीं था लेकिन मैने लक्ष्य निर्धारित किया कि अखबार को उस ऊँचाई तक पुन: पहुंचाना जहां पर उसे वीरेन दा छोड़ गए थे। इसलिए मैने अखबार का प्रसार बढ़ाने हेतु काफी कुछ वीरेन दा की ही लाइन पकड़ी। नतीजा आशा के अनुरूप ही रहा और अखबार मात्र छह महीने में ही फिर वहीं पहुंच गया। कुछ दिनों बाद हमारे कानपुर कार्यालय के एक रिपोर्टर रजा शास्त्री की शादी फतेहपुर जिले के खागा कस्बे के पास गंगा किनारे एक गांव में हुई। मेरे वहां जाने का एक मकसद वीरेन दा से मिलना था क्योंकि मुझे बताया गया था कि वीरेन दा वहां पर इलाहाबाद से आएंगे। वे आए और आते ही मुझे गले लगा लिया बोले- 'शंभूजी आपसे यही उम्मीद थी'। हमारे युग के एक महान पत्रकार का आकस्मिक और असमय काल कवलित हो जाना दुखद है और तब तो और भी जब वे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से अपनी हिम्मत और बहादुरी से लड़े और जीतकर निकले थे। वीरेन दा की मृत्यु पर मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

--

कृष्ण कल्पित (कल्बे कबीर https://www.facebook.com/krishna.kalpit )  के कीबोर्ड से श्रद्धांजलि की कविता छलक पड़ी -

'वह लोग तुमने एक ही शोख़ी में खो दिये
पैदा किये थे चर्ख ने जो ख़ाक छानकर !'
‪#‎अलविदा_वीरेन_डंगवाल_1947_2015‬.
अग्नि जलेगी आप से तू सोमपान कर
फिर कर सुरत-निरत वृहद्-सामगान कर
धरनी पड़ेगी एक दिन ऐसा ही मानकर
सोजा अभी तो तू उसी चादर को तानकर ! 

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कोई सात साल पहले, कुमार मुकुल ने वीरेन पर संस्मरण लिखा था - हिन्‍दी कविता में जो कुछ प्‍यारे से लोग हैं उनमें एक हैं - वीरेन डंगवाल.

--

छत्तीसगढ़ी उत्सव के मौके पर युवा कवि सी. सुनील का कविता पाठ देखें सुनें यूट्यूब वीडियो पर -


आप भी अपनी कविताओं का पाठ कर सेल्फी वीडियो लेकर उसे यूट्यूब पर प्रकाशित कर सकते हैं. और यह बड़ा आसान है.

छत्तीसगढ़ उत्सव में युवा कवि भास्कर चौधरी ने अपनी कवितापाठ में खूब तालियाँ बटोरीं. देख सुनकर आप भी आनंद लें -


आप भी अपनी कविताएँ सेल्फी मोड में, अपने मोबाइल फ़ोन में वीडियो-रेकार्ड कर सकते हैं और यूट्यूब पर टांग सकते हैं. बहुत ही आसान है यह.

image

गजानंद प्रसाद देवांगन

 

व्यंग्य कविताएँ

1


बापू तेरे बंदर
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर , कभी अंदर ।
तेरे स्वर्गवासी होने का
इन्हें है शोक ।
जीविकोपार्जन के लिये
ये कर रहे दलाली थोक ।
आपके पुराने सीख
नीलाम हो गये ।
धरम करम उनके लिये
बेकाम हो गये ।
इसीलिये ये तीनों
स्वर बदल रहे ।
लोग भले ही कहते हैं
कि ये दल बदल रहे ।
कभी राज घाट
कभी शांतिवन ।
कभी अयोध्या
कभी वृन्दावन ।
खा रहे देश को
जैसे चुकंदर ।
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर कभी अंदर ।
 
खा रहे भालू
साझे की खेती ।
बंदरों को बांट रहे
उस्तरा की पेटी ।
राम के लिये फिर
बनायेंगे सेतु ।
घायल लक्ष्मणों को
जिलायेंगे कालकेतु ।
कैकेई जगा रही
कहीं राष्ट्र भक्ति ।
दिखा रहे भरत कई –
अपनी भी शक्ति ।
राम के राज्य में भी
था , बानर का तंत्र ।
आज  वर्चस्व उनका
करें जो स्वतंत्र ।
कभी दिल्ली की किल्ली
कभी भीगी सी बिल्ली ।
दुविधा में पड़ा देश
जैसे सांपनी छुछंदर ।
बापू तेरे बंदर
कभी बाहर कभी अंदर ॥
2
ऐसी जयंतियां मनाइये

 
पहले अपने सिर को
हाथ धर आइये ।
माता के चरणों में
सादर चढ़ाइये ।
बलिदानी पथ में
कदम फिर मिलाइये ।
दमखम हों ऐसे –
तब जयंतियां मनाइये ।।
हर जख्म करबला –काशी
श्रेष्ठ तीर्थ कर आइये ।
आंसुओं की गंगा में
डूबकर नहाइये ।
निर्मलता - नमाज
ध्यान-सच्चाई , जानिये ।
ईमान को पूजकर
फिर जयंतियां मनाइये ।
शौर्य के सूर्य को
शीश नित झुकाइये ।
पसीने की अर्ध्य
निष्ठा से चढ़ाइये ।
साधना – उपासना
आराधना दुहराइये ।
जय की न अंत हो –
ऐसी जयंतियां मनाइये ।
                                          गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा
 
----.

योगेन्द्र प्रताप मौर्य


 

बाल कविता


गांव में मेरे
लगा है मेला
चलो देखने
सजा है ठेला
बोलो मीनू तुम
क्या खाओगी
क्या-क्या लेकर
घर आओगी
मीनू बोली पहले भैया
हम झूला पर झूलेगें
फिर चाट जलेबी खा करके
थोड़ा मेले में घूमेगें
पर भैया यह कैसा पुतला
बहुत बड़ा व भारी है
कौन इसे खरीदेगा
बोलो किसकी मति मारी है
मीनू तुम भी भोली हो
यह तो रावण का पुतला है
इसे जलाना ही तो
विजयादशमी का मेला है
राम ने रावण को मारकर
पापी का पाप मिटाया है
तभी से विजयादशमी पर्व
शहर गांव में छाया है
चल मीनू अब लौट चलें
खरीद खिलौना और मिठाई
अम्मा रस्ता तकती होगी
देख अँधेरा हो आई
योगेन्द्र प्रताप मौर्य
बरसठी ,जौनपुर

----
 

सुधीर पटेल  “सृजन"


छुपकर गुनगुनाती हो मेरा नाम,
       शौक तुम भी लाजवाब रखती हो..
बहक जाता हूँ देखकर तुम्हें,
      आँखों में तुम शराब रखती हो..
इल्तजा है हुकूमत की अपनी,
      माँ तुम रोज मुझे नवाब कहती हो...
चाँद सितारे जलते है फूलों से,
      बालों में जब तुम गुलाब गुंथती हो..
अनकहे अफसानों के भी कुछ कायदे है,
     क्यों बीते दिनों का हिसाब पूछती हो..
तोड़ दिया रोजा चाँद देखे बगैर,
    आँगन में तुम आफताब रखती हो...
    
सुधीर पटेल  “सृजन"
खरगोन, मध्यप्रदेश
---------.

क़ैस जौनपुरी


तुम होती तो


 
  
तुम होती
तो तुम्हें अपने कंधे पे घुमाता
ख़ूब हँसाता
तुम होती
तो तुम्हें दौड़ने से कभी न रोकता
कि तुम्हें चोट लग जायेगी
तुम होती
तो तुम्हें बड़ों के बीच भी बोलने देता
तमीज़ के नाम पे तुम्हारी आवाज़ को न दबाता
तुम होती
तुम होती
तो तुम्हें पूरी आज़ादी देता
दोस्त बनाने की
तुम्हारा जब जी चाहता घर वापस आने की
तुम होती
तुम होती
तो तुम्हें तेज़ाब का डर भी न दिखाता
खुलके जीना सिखाता
अपनी बात कहना सिखाता
तुम होती
तो तुम पर अपने फैसले न लादता
तुम्हारी ज़िन्दगी में दख़ल भी न देता
तुम्हारा मालिक भी न बनता
तुम होती
तुम होती
तो मुस्कुरा के तुम्हारे
ख़ुद से चुने हुए
जीवन साथी को गले से लगाता
तुम होती
तुम होती
तो तुम्हें ख़ुद का कोई हुनर भी सिखाता
किसी के ऊपर बोझ न बनाता
तुम होती
तुम होती
तो तुम्हें अपने होने पे ख़ुशी होती
कितना अच्छा होता
जो मेरे घर भी एक बेटी होती
 
qaisjaunpuri@gmail.com
                                               
 
*******
 
------.

अरूण कुमार झा


 
 
एक मरीचिका ने हमें जिन्दा रखा है
 
समय साक्षी है
आदि काल से देखा है हमने
कैसे-कैसे अत्याचार हुए हैं हम पर
अहंकारों की विजय की खातिर
व्यवस्था के क्रूर हाथों हम
हमेशा छले गये हैं।

समय साक्षी है
देवासुर संग्राम हो या
महाभारत का संग्राम,
लंका विजय हो या आधुनिक
विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में
युद्ध के इस खेल में
मरता कौन है?
वही जिसे इस अहंकार-महासंग्राम
से कोई मतलब नहीं होता।

समय साक्षी है
जो पैदा हुआ
वह मरना नहीं चाहता
लेकिन उसके अपने अहंकार ने
उसके अंदर के मनुष्यत्व को
मार डाला क्यों?
यह सिलसिला अनवरत जारी है
युगों-युगों से!

समय साक्षी है
पहरूए हमें जगा-जगा कर
लूटते रहें, हम पिटते रहें
सावधान! जागते रहो! के ढोंग से
हमारा विश्वास जीतते रहे
ये न सोने देते, न जागने देते
हमारे मन-मस्तिष्क में
हमारे विचारों में छलिया-पहरूए
पहरूए की तरह पलते रहे
हम हमेशा छलते रहें हैं, छलते रहेंगे।

समय साक्षी है
यह सब आखिर इस लिए कि
व्यवस्था इनके क्रूर हाथों में
खिलौने की तरह रहे
वे उनसे खेलते रहें,
हम दर्शक की भूमिका में
हम खेल देखते रहें हैं, देखते रहेंगे
कई-कई वेशों में होते हैं ये
कभी खिलाड़ी के वेश में तो
कभी कबाड़ी के वेश में तो
कभी जुआरी के वेश में
कभी मदारी के वेश में।

समय साक्षी है
आज तक कोई रहबर नहीं हुआ
जन-नायक नहीं हुआ
नाम और काम इनके
जन-नायकों के जैसे
मायावी बने महाभ्रम में डाल हमें
युगों-युगों से छलते रहे ऐसे
समाज के उत्थान के लिए
मसीहा के वेश में जमीन पर
उतरा हो जैसे।

समय साक्षी है
एक मरीचिका ने हमें
जिन्दा रखा हुआ है युगों-युगों से
कि एक दिन हम
बोलने के काबिल जरूर बन जायेंगे
बोलने कौन देगा
महाबलियों के इस मायाजाल में
कानफोड़ू आवाज हमारी बुद्धि
को गुलाम बना रखी है
युगो-युगों से।

समय साक्षी है
गुलामी की जंजीरों को तोड़ने
के लिए बड़े-बड़े नाटक होते रहे हैं
इस धरा पर
युगों-युगों से इस नाटक में
अहंकार हमेशा विजयी होता रहा।
परास्त हुए हैं हम
युगों-युगों से
शांति के लिए बड़े-बड़े यज्ञ हुए
इस धरा पर, महा-हवन हुए
लेकिन हमारे अंदर के अहंकार ने
लील लिया शांति के
मूल-मंत्र के आह्वान को।

समय साक्षी है
सारा खेल जमीन के टुकड़ों
के बहाने
हमारे लिए खेले, लड़े गये
हमें क्या मिला इस खेल में
सिर्फ मौत, प्रताड़ना और गुलामी।
आदि युग में रहे तब भी
पाषाण युग में रहे तब भी
मध्य युग में रहे तब भी
आधुनिक युग को भी देख रहे हैं।

समय साक्षी है
समय खबरदार करता है
युग करवटें ले रहा है
सम्हलने और सोचने का समय
आ गया है
गुलामी की जंजीरों को
तोड़ स्वतंत्र होने का
युग प्रारंभ हो गया है
गुलामी की नीम तंद्रा को तोड़ना होगा
पेट तो उनका भी भर जाता है
जो सोये-पड़े रहते हैं।
सिर्फ पेट भरने के लिए गुलामी
की जिंदगी जीना ही हमने
अपनी नियति बना ली है तो
कोई बात नहीं

समय साक्षी है
पहले की गुलामी नंगे बदन और
भूखे पेट रह की जाती थी
अब सूट-बूट में जारी है गुलामी
रूप और रंग अत्याचार के लिए
बदल गये हैं सिर्फ
मोटी-मोटी रकम बैंक में
और खर्च करने की पूरी आजादी
बाजारवाद जीवन पर इतना भारी
कि आप भाग भी नहीं सकते कहीं
राजनीति रास्ते में लुटेरी बनी बैठी है।


अरुण कुमार झा,
प्रधान संपादक, दृष्टिपात हिंदी मासिक
 
-------------.

नन्दलाल भारती



ओल्डएज होम
अरे नव जवानों  धर्म-कर्म काण्ड त्यागो 
धरती के जीवित भगवान  को पहचानो 
ओल्डएज होम का पता पूछना उनका 
तुम्हारी उड़ान पर सवाल खड़ा कर रहा है  
धरती का भगवान क्यों बेघर हो रहा है ……
कांपते हाथ,आँखों  में अँधियारा,
लुटाया  जीवन का बसंत तुम्हारे लिए 
वही नाथ अनाथ हो रहा है 
दर्द में जीया,स्वर्णिम भविष्य सीया
किस गुनाह की सजा ,
धरती का भगवान छाँव ढूढ़ रहा है ……
कितने हो गए मतलबी ,
पत्थर के सामने सिर पटकते अब 
जीवित भगवान बोझ लग रहा है ,
घुटने बेदम लिए 
वही शाम ढले सहारा खोज रहा है …… 
जाए कहा लाचार कब्र में पाँव लटकाये 
ओल्डएज होम का पता पूछ रहा है 
ये उड़ान , ऊंचा मचान देन  किसकी 
श्रम से बोया लहू से सींचा ये मुकाम किसका 
स्वार्थ के सौदागरों सोचो जरा 
क्या गुनाह, वही भगवान बेबस आज 
दर्द का जहर पी रहा है  …… 
धरती के जीवित भगवान माँ-बाप 
मान दो सम्मान दो,ढलती शाम में ,
भरपूर छाँव दो ,
वक्त पुकार रहा है
नव जवानों धरती के भगवान को  पहचानो 
ना खोजे ओल्डएज होम का सहारा वे 
खा लो कसम ,ना हो 
धरती के भगवान का निष्कासन 
वक्त धिक्कार  रहा है
ये अदना गुहार कर रहा है……  
डॉ नन्द लाल भारती  23 .09. 2015 
---------.


 

अखिलेश कुमार भारती


                           “जीवन की कठिनता से सरलता की नयी परिभाषा”
“राहों से गुज़रते हमने,                                                                          
कांटों पे चलना सीख लिया अब तो...
“सुबह की नयी किरणों से,
उम्मीदों की लकीर खींचना….
भी सीख लिया हमने”.
निकल चला अकेला सा,
ना आस लिए था... ना कोई दूजा पास था,
अकेले के सफ़र में खुद ही एक खास था…!!
                                                                    “जो ना पाया वादों से हमने....
                                                                         वो हमें मिला इन रास्तों के मुकामों से !!
                                                "सुना है किसी ने उसे नहीं देखा...,
                                                  उसकी अनुभूति हमने जिंदगी में,
                                                 हमेशा आवाज़ देती है.”!!
                                           "सुबह की किरणों से,
                                                         अब तो जिंदगी जीना भी…
                                              सीख लिया हमने”…….
--
 
"जिंदगी" (दो टूक)
 
"दुनिया में जीने का एक मुकाम होता है,
हर किसी के जिंदगी का इस दुनिया में हिसाब होता है...
"जीना जानते है सही से कुछ लोग,
पर जिंदगी जीने का अंदाज कुछ को ही होता है.
"तकदीर लिखती नहीं...,
बनाई जाती है………!
मंज़िल पाने के लिए हमेशा हर किसी की...,
जिंदगी को रुलाई नहीं जाती".
"दुनिया में जीने का एक मुकाम होता है,
हर किसी के जिंदगी का सा दुनिया में हिसाब होता है...!!
--
("विद्युत उर्जा का संकल्प गीत")  
बिजली है उर्जा की रानी,                                                  
दुनिया में है उसकी नयी-नयी कहानी.                                          
पानी, खेती, रोशनी, संचार आदि...
है उसकी सही पहचान !!
.विद्युत रक्षा, राष्ट्र रक्षा,..! .हित रक्षा ..
यही संकल्प ..ले हम सब का रक्षा.
सही समय पे सही उपयोग;
उसकी विशेषता है, निराली..
राष्ट्र रक्षा हम सब है, मिलजुल कर करे विद्युत रक्षा.
विद्युत की बचत धर्म की रक्षा समान,..संकल्प अपनाये..
हम सब जन ऐसा..!
ना हो नष्ट दुरुपयोग से, हम दे इसे अपनी पहचान, राष्ट्र हित में ...
विद्युत बचाव, जन- जन की यही पुकार..,
विद्युत है हम सब का,
राष्ट्रहित! राष्ट्र निर्माण में करे हम मिलजुलकर इसकी रक्षा...,
संकल्प ले! जन- जन तक पहुंचाये ..इसकी उपलब्धि....नयी जोश, संकल्प से इसकी रक्षा....
नयी उर्जा हमें पैदा करना है.,
यही हमारा, हम सब का नारा है..     
                                                                                                                                                        
 
 
-----.

कैलाश यादव सनातन


अपराध हो गया  है..........
 
फूलों की ओट लेकर, फिर चुभ गया है कांटा।
मंदिर भी जाना अब तो, अपराध हो गया है॥
   साहिल पे आकर अक्सर, डूबी है देखो कश्ती।
   उस पार भी जाना अब तो, इक ख्वाब हो गया है॥
जलजले में अक्सर, खुलती नहीं हैं आँखें,
क्या खाक तुम लिखोगे, किस्सा-ए-जिंदगी का॥
   अश्कों में तुमने यूंही, गम को बहा दिया है।
   पलकों पे उसको थामा, इक मोती बन गया है॥
       मंदिर भी जाना अब तो, अपराध हो गया है.......
 
 
                                        कैलाश यादव ‘‘सनातन’’             
----.
 

दिनेश कुमार जांगड़ा


एक ही गलती दुबारा खूब होता है,
अक्सर ये नज़ारा खूब होता है।
 
तक़दीर का रोना क्यूँ रोते हो दोस्त?
मेहनती का गुज़ारा खूब होता है।
 
बुलंदी किरदार में यूँ ही नहीं आती,
आज का विजेता हारा खूब होता है।
 
अँधेरी रात में मुसाफिर हार ना हिम्मत,
सुबह सूरज का उजाला खूब होता है।
 
सफर के संघर्ष को उठकर बता देता,
पाँव का छाला हमारा खूब होता है।
 
उसूल वाला राह से जाता है बेदाग़,
यूँ तो फिसलन ने पुकारा खूब होता है।
 
सूखा होकर भी बड़ा सुकून देता है,
ईमानदारी का निवाला खूब होता है।
 
कल की फ़िक्र में आज दुखी होता,
नादान इन्सां भी बेचारा खूब होता है।
--
1. बेटी बचाओ बेटी पढाओ
नाज करो तुम ना शर्माओ,
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।
बेटी आँगन का अनमोल मोती होती है,
आशाओं के दीपक की ज्योति होती है।
नयी सोच से दो घर का कल्याण करो,
पढा-लिखा के बेटी का उत्थान करो।
इसी मुहीम में तुम भी आगे आओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।
कमजोर-अबला अब शब्द पुराने होने दो,
फूलों को ए माली! अब फौलादी होने दो।
बेटी घर की रोशनी, बेटा घर का उजियारा है,
बेटी हमको प्यारी, बेटा भी हमको प्यारा है.
बेटा-बेटी का भेद मिटाते जाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।
बेटी बेटों से कदमों से कदम मिलाती है,
सरहद से घर तक ये हरेक फर्ज निभाती है।
बेटों ने बुढापे में जब भी बुरा हाल किया,
बेटी ने आकर माँ-बाप का ख्याल किया।
बुढ़ापे की लकड़ी को और मजबूत बनाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।
क्यों बेटी को गर्भ में मारा जाता है?
बेटी को बेटों से कम क्यूँ दुलारा जाता है?
क्यूँ हम बेटी की शिक्षा का ध्यान नहीं देते?
क्यूँ हम बेटी को उचित सम्मान नहीं देते?
बेटी की गरिमा को और बढाओ,
बेटी बचाओ बेटी पढाओ।
 
 
2.पढने दो बेटी को
 
आगे बढाती सोच का नया आगाज होने दो,
पढने दो, बेटी को आजाद होने दो।
 
भ्रूण-हत्या का पाप कह दो नहीं करेंगे,
उकसाने वालों को बेशक नाराज होने दो।
 
बेटियों ने साहस से पर्वत भी लांघे हैं,
फूलों को माली अब फौलाद होने दो।
 
पढाया तो बेटी आगे बहुत बढेगी,
कैद पंछी को उड़ता जहाज होने दो।
 
बेटा-बेटी में अंतर कह दो नहीं करेंगे,
जो कल ना किया ‘दिनेश‘ वो आज होने दो।
 
आगे बढाती सोच का नया आगाज होने दो,
पढने दो, बेटी को आजाद होने दो।
 
 
 
कवि परिचय
नाम-दिनेश कुमार जांगड़ा  (डी जे)
सम्प्रति- भारतीय वायु सेना में वायु योद्धा के रूप में कार्यरत 
तिथि - 10.07.1987
शिक्षा-  १. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कनिष्ठ शोध छात्रवृत्ति एवं राष्ट्रीय  पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण      २. समाज कार्य में स्नातकोत्तर उपाधि 
३. योग में स्नातकोत्तर उपाधिपत्र
लिखित पुस्तकें -दास्तान ए ताऊ, कवि की कीर्ति एवं प्रेम की पोथी
पता-  मकान नंबर 1,बाडों पट्टी, हिसार (हरियाणा)- 125001
फेसबुक प्रोफाइल. www.facebook.com/kaviyogidj  
-----.

अतुल कुमार मिश्रा


 
उधेड़-बुन
 
पल-छिन, पल-छिन बीतता है दिन,
दिन व दिन, बीतता है दिन।
तू चाहे तो भी,
और न चाहे तो भी,
दिन को बीतना है, बीतता है दिन,
तू क्यों थकता है,
तू क्यों रूकता है,
पल भर ही हंसी-खुशी है,
पल भर ही, दुःख की घड़ी है,
घड़ी-घड़ी कर बीतता है दिन,
पल-छिन, पल-छिन बीतता है दिन,
दिन व दिन, बीतता है दिन।
पल में कुदरत की मेहर है,
पल में काल का कहर है,
जो वर्तमान की बाती है,
वो कल भूत की थाती है,
भविष्य की आंशाकाओं को,
क्यों रहा है-- गिन,
पल-छिन, पल-छिन बीतता है दिन,
दिन व दिन, बीतता है दिन।
दिन व दिन की कीमत, कहां कर छुपी है,
ये बात, कब तूने समझी है,
कब खुद से कही है,
दिनों की दूरी में--
एक दिन को जन्मा, एक दिन को मरेगा,
क्या आशय है तेरा, किस धारणा को धरेगा,
या सांसों की रवानगी को,
रहता रहेगा बस--- गिन
पल-छिन, पल-छिन बीतता है दिन,
दिन व दिन, बीतता है दिन।
अतुल कुमार मिश्रा
369 , कृष्णा नगर
भरतपुर, राजस्थान
 
---------

देवेन्द्र सुथार


गांधी अब इस मुल्क में तेरी जरुरत नहीं है
एक गाल पर खाकर दूसरा गाल आगे करने वाली नहीं है
अहिंसा तो रोज रोती हिंसा के दरवाजे पर
अब लाठी के बलबूते पर आजादी नहीं है
रामराज्य तो राम के साथ ही चला गया
तेरा चरखा और चश्मा विदेशों में चला गया
तेरे ही देश में तेरा अपमान करना अब मजबूरी है
तेरे नाम को लेना आज लगता सबको गद्दारी है
कुछ लोग तुझे कोसते है देते है गाली सरेआम
आखिर गांधी तूने ऐसा क्या किया है काम
तू भी अपने आप को बहुत कोसता होगा
किन लोगों के लिए तू लड़ा खायी तूने गोली
आजादी के लिए तूने आखिर क्यों खेली खूनी होली
अब लगता नहीं गांधी फिर इस देश में लेगा जन्म
जहां गांधी एक गाली हो गोडसे के लिए हो श्रद्घा व मन।।
 
- बालकवि देवेन्द्रराज सुथार‚ बागरा‚ जालौर‚ राजस्थान।
ईमेल- devendrasuthar196@gmail.com
---...
 

अंजली अग्रवाल


 
जिन्दगी उस घड़े का नाम है ॰॰॰॰॰॰
जिसमें ढेरों पत्थर डालने के बाद पानी ऊपर आता है ॰॰॰॰॰॰
और हम वो पक्षी हैं जो आकाश में उड़ते वक्त तक तो बड़े खुश रहते है‚
पर प्यास लगने पर ये पत्थर डालना हमारी परेशानी बन जाती है ॰॰॰॰॰॰
 
 
हम अपने हाथ का सही उपयोग तब कर पाते है‚
जब हमें पता होता है कि हमें इस समान उठाना हैं॰॰॰॰
ठीक उसी प्रकार हम अपने दिमाग का सही उपयोग तब कर पाते है‚
जब हमें यह पता होता है कि हमें क्या करना हैं।
 
एक पक्षी के उड़ने में उसकी सबसे बड़ी बाधा हवा हैं ‚
पर सच यह भी है कि हवा के बिना एक पक्षी ढंग से उड़ नहीं सकता॰॰॰॰
ठीक उसी तरह मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी बाधा ये परेशानियाँ है ‚
पर सच यह भी है कि इन परेशानियों के बिना मनुष्य जी भी नहीं सकता॰॰॰॰
 
जिन्दगी की राह में चलते — चलते जब लगे कि थक गये हैं आप ‚
और थोड़ा रूकने का मन करे‚
तो समझ लेना कि अभी तक तो सिर्फ जिन्दा थे आप‚
और अब जीना चाहते हैं आप।
 
मंजिल उसी को मिलती हैं‚
जिसे रास्तों से प्यार होता हैं‚
जो दर्द को भी मरहम बना ले‚
कारवां उसी का होता हैं।

image

सुशील यादव

 

हे इंडिया के भ्रष्ट टी.वी. चेनलों !

अगर सत्ता के तुम चमचे नहीं हो, तो पाटलीपुत्र के चुनावी दंगल के बारे में उत्सुक जनता को सही सही ‘भीतरी’ बात बताओ .......!

टी. वी. एंकर उवाच !

इधर अपने, ई सी ने आम चुनाव का आगाज कर दिया है, उधर लोग जीत हार के फर्जी आंकड़े जुटाने में लग गए हैं। इसे आम जनता तक चुनावी संभावना के नाम पर इलेक्शन पोल के ग्राफिक बना कर जीतने वाली ‘प्रायोजित पार्टी’ के बारे में ढिंढोरा पीटना है।

आजकल ‘महा’ शब्द का चलन व्यवहार में बहुत आने लगा है,कोई इसे गठबंधन के आगे लगा रहा है कोई दलित वोटर को लुभाने के चक्कर में अपने नाम के पहले रखना चाहता है। किसी-किसी के द्वारा, इसे ‘पदवी-स्वरूप’ धारण करने की खींच-तान भी देखी जाती है।

किसी पार्टी ने, छोटे-मोटे दान से राज्य को उबारते हुए पूरे राज्य को ‘महादान’ देने का ऐलान, इलेक्शन-संभावना देखते हुए कर दिया।

देखा जाए तो ‘महा-नालायकों’ के बीच में से , चंद ‘कम- महा-ना-लायक’ को चुनावी मैदान में उतारने का वादा हर पार्टी अपने-अपने तरीकों से कर रही है।

आइये आपको कुछ पार्टी दफ्तर में लिए चलते हैं।

ये ‘महा-गठी’ वालों का दफ्तर है। वो, जिनको ‘गठिया’ का दर्द रहता है ,वे इसके इलाज में आजीवन लगे रहते हैं। हाँ गुजरातियों के ‘गाठिये’ के स्वाद जिसने चखा है वे इसका लुत्फ भी जानते हैं। ’चखना’ बतौर इसका इस्तेमाल कहीं-कही संभावित रहता है।

इस ‘महागठी’ की नीव जिसने रखी, वही नीव के पत्थर को निकाल के खिसक गया।

सारे गठबंधन वाले मिलकर, ‘मेंढक’ को एक साथ टोकरे में रख के, तौलने का प्रयास शुरू किये थे। ’कंट्रोल’ ,’रिमोट कंट्रोल’ के स्विच को आन भी न कर पाए थे कि मेंढक बाहर कूद-कूद के बाहर छिटकने लगे, नौबत बुरी देख के समझदार खुद भी छलांग लगा गए ....?

कहते हैं, नाव में एक छेद हो तो एक दूसरा छेद और कर लेना चाहिए जिससे एक से पानी भीतर घुसे तो दूसरी से निकल जावे। वही दूसरे छेद वाली तरकीब को जी जान से इस महा-गठी वालों द्वारा आजमाया जा रहा है।
एक दफ्तर में, टिकट-खिड़की खुलते ही, बंद होने का ऐलान हो गया। रिश्तों में, भाई-भतीजा ,दूर का भाई, दूर का भतीजा ,श्वसुर के नाती, सब को टिकट बांटने के बाद, बाबा जी के ठुल्लु के अलावा कुछ बचा नही, किसे क्या दें.......? पार्टी अध्यक्ष को बहुत अफसोस है सगे दामाद को टिकट न दे सके। अब किस मुह से भाई, बहन के घर राखी पर जाएगा। बहन कहेगी, जब तुम्हारे हाथ में बांटने की नौबत आई थी, तो कैसे इकलौते जीजा को भूल गए .....?कट्टी ,कट्टी .....

इधर देखिये ,ये फूट-फूट के रोने वाला शख्श, किसी समय, एम. एल. ए. हुआ करता था। इसकी टिकट काट दी गई। सिर्फ कटती तो बात नहीं थी ,इनका इल्जाम है, टिकट दो करोड़ में किसी दबंगई करने वाले को बेच दी गई। अब इसे खुदा का कहर न कहे तो क्या,पार्टी वाले भी सोच रहे, कि जिस आदमी को समय रहते कुछ कमाने का शऊर नहीं, विधायक रहते अपनी विधायकी बचाने लायक न कमा पाया, लानत है ! उसे पार्टी से भला क्या टिकट देना....? वे सड़कों पर आने-जाने वालों को अपना दुखड़ा गली -गली सुना रहे हैं।

कुछ टिकट कटाई के खेल को, ‘स्पोर्टली’ लेते हैं। वे तत्काल अपने आदमी भेज के दूसरी पार्टी में मुआयना करवा लेते हैं ,’ग्रीन-सिंगनल’ और टिकट पक्का होते ही दूसरी पार्टी की चाशनी में घुल जाते हैं। बचे वो ,जिनके आका नहीं दीखते, वे वोट-कटुआ के रोल में निर्दलीय खड़े हो जाते हैं ,बाद में मान-मनौव्वल होने के पर , अधिक पैसे देने वाली पार्टी के हक़ में अपना नाम वापस ले लेते हैं। इसे ‘भागते भूत’ वाले केंडीडेट के नाम से जाना जाता है।

आइये ,अब हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलवा रहे हैं ,जिसके पीछे पार्टिया, टिकट लिए-लिए घूमती हैं और वो इनकार किये रहता है। आज के जमाने में, ऐसे शख्श का मिलना अजूबा कहा जाएगा। चंद मिनट का उनका इंटरव्यू देख लीजिये ......

इस देश की दिग्गज पार्टियाँ आपको, अपना केन्डीडेट डिक्लेयर करना चाहती हैं और आप महाभारत के अर्जुन की तरह पीछे हटते रहते हैं क्या वजह है .....?

हे एंकर जनाब ! मैं इलेक्शन किसके लिए लडू....?,किसके विरोध में खड़ा होऊं .....?सब मेरे पुराने समय के साथी हैं। किसी समय ये मेरे चेलेचपाटे थे। ये नहीं तो अब इनकी औलाद, मेरे मुक़ाबिल रहेंगे ....इन्हें हराना मुझे शोभा देगा भला ....?और मै जीत के भी क्या भाड फोड़ सकूंगा .....तुमने सुना होगा अकेला चना भाड नहीं फोड़ सकता। मेरे अकेले की बात विधान सभा में क्या मायने रखेगी .....?चारों तरफ अंधी-गलियाँ हैं। खनिज माफिया हैं। लुटेरे कांट्रेक्टर घुसे हैं। शिक्षा के व्यापम माफिक घोटालेबाज हैं। ट्रांसफर पोस्टिंग करवाने वालों की लाबियाँ हैं। बात की अनदेखी करने वाले ठुल्ले हैं। इन सब के बीच मेरे कदम कहाँ टिक पायेंगे.....?जिस पार्टी से चुनाव लडूंगा वही अगले दिन बाहर का रास्ता दिखा देगा। तो मेरे भाई ,बंद मुट्ठी जो लाख की है, उसे मेरी पूंजी समझ के बंद ही रहने दो .....क्यों खुलवाने पे तुले हो ......?

इसके मायने हम क्या निकालें ....?अपने देश को जिस चंगुल में फंसे होने की बात आप कह रहे हैं ,उसी में ये देश जकड़ा रहेगा ......?कोई उद्धार करने वाला मसीहा नहीं आयेगा ......?

नहीं एंकर जी ! आपका ख्याल गलत है ...महाभारत में दिए गए भगवान के वचनों पर आस्था रखो .....

“यदा यदा ही धर्मस्य ,ग्लानिर्भवति भारत:

अभ्युथानामधर्मस्य तदात्मान्यं सृजाम्यहम

वे, “जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होने पर, अपने रूप को रचने और साकार रूप में लोगो के बीच प्रकट होने का वादा किये हैं। ”

घबराने की कतई जरुरत नहीं इधर ,मैं भी प्रयासरत हूँ , एक सेना ऐसी खड़ी करू जो अन्याय ,अत्याचार के विरोध में, आने वाले दिनों में इससे लड़ सके.....तब तक मुझे बख्श दो.......? ..मुझे .. किसी सीट से टिकट मत दो

--

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com

२७/९/१५

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

ईश्वर अपने प्रतीक रूप में सभी शक्तियों के साथ इंसान के रूप में जीवात्मा को धरती पर भेजता है और यह मानकर चलता है कि वह ईश्वरीय कार्य करता हुआ सृष्टि के किसी न किसी काम आएगा ही। और जब लौटेगा तब उसके खाते में कम से कम इतना कुछ तो होगा ही कि ईश्वर को अपनी बनाई प्रतिकृति पर गर्व हो।

ईश्वर तो हमें शुद्ध-बुद्ध भेजता है लेकिन संसार की माया के बंधनों में फँसकर ईश्वर का अंश होने का भान समाप्त हो जाता है और हमें लगता है कि हम ही हैं और कोई कुछ नहीं।

जो लोग अपनी आत्मस्थिति में होते हैं उनके लिए सांसारिक माया अनासक्त भोग से अधिक कुछ नहीं होती लेकिन बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपनी संस्कृति, संस्कारों और ईश्वरीय तंतुओं से पृथक होकर अपने आपको ही बहुत कुछ मान लिया करते हैं।

ऎसे लोगों का फिर ईश्वर या वंशानुगत संस्कारों, पुरातन काल से चली आ रही गौत्र, वंश या कुटुम्ब की मर्यादाओं आदि से नाता पूरी तरह टूट चुका होता है। इस अवस्था में पहुंच जाने के उपरान्त इंसान की स्थिति  ‘ न घर का - न घाट का’ वाली हो जाती है। 

इंसानों की विस्फोटक भीड़ में बहुत से लोग हैं जो अपने सिवा किसी और को कुछ समझते ही नहीं। अंधकार से परिपूर्ण आसुरी माया के पाश से बँधे इन लोगों के लिए सारा जहाँ उनका अपने लिए ही, अपनी सेवा-चाकरी के लिए ही बना हुआ दिखता है, इनकी यही अपेक्षा होती है कि दुनिया उनके पीछे-पीछे चलती रहे, उन्हें पालकियों में बिठा कर इच्छित स्थानों का भ्रमण कराती रहे और चूँ तक न करे।

वे जैसा कहें, वैसा होता रहे, वे जैसा करें वैसा ही दूसरे लोग भी अनुकरण करते रहें। इन लोगों के लिए स्वाभिमान, साँस्कृतिक परंपराओं, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं है।

सामाजिक प्राणी कहे जाने के बावजूद इस प्रजाति के लोगों को किसी भी दृष्टि से इंसानी बाड़ों में रखकर नहीं देखा जा सकता। इसका मूल कारण यही है कि इनके भीतर अहंकार का समन्दर इस कदर हमेशा ज्वार वाली स्थिति में रहता है कि इन्हें अपने अलावा और कुछ दिखता ही नहीं। न इंसान दिखते हैं न परिवेश के अनुपम नज़ारे।

इंसानी बाड़ों से लेकर समाज और क्षेत्र भर में हर तरफ ऎसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो अपने इर्द-गिर्द अहंकारी आभामण्डल हमेशा बनाए रखते हैं और दिन-रात उसी में रमण करते हुए आसमान की ऊँचाइयों में होने का भ्रम पाले रहते हैं। 

इनके अहंकार का गुब्बारा दिन-ब-दिन फूलता ही चला जाता है जो इनको आसमानी ऊँचाइयों में होने का भरम पैदा करने के लिए काफी है।

जो लोग जमीन से जुड़े हुए हैं उन लोगों को अहंकार छू तक नहीं पाता है लेकिन जो लोग हवा में उड़ने के आदी हो गए हैं उनके लिए अहंकार हाइड्रोजन गैस का काम करता है जिसकी वजह से इनके गुब्बारे बिना किसी सामर्थ्य के ऊपर की ओर बढ़ते चले जाते हैं।

ईश्वर को सबसे ज्यादा नफरत उन लोगों से होती है जो अहंकारी होकर उसे भी भूल जाते हैं और उसके कर्म को भी। इंसान के अहंकार को परिपुष्ट करने में तमाम प्रकार की बुराइयों का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

ये बुराइयां उसके भीतर इंसानियत के संतुलन को बिगाड़ कर आसुरी बना डालती हैं। साफ तौर पर  देखा जाए तो अहंकार एक ओर जहाँ आसुरी व्यक्तित्व का सुस्पष्ट प्रतीक है वहीं दूसरी ओर यह उन तमाम द्वारों को खोल देता है जो इंसान के पराभव और निरन्तर क्षरण के लिए बने हुए होते हैं।

अहंकार होने का अर्थ ही यही है कि ईश्वर की नाराजगी। भगवान जिस किसी इंसान पर कुपित और रुष्ट हो जाता है उसके अहंकार का शमन करना बंद कर देता है। अन्यथा भगवान की कृपा जब तक बनी रहती है तब तक संसार की माया और अहंकार को वह नियंत्रित रखता है, विस्तार नहीं होने देता।

लेकिन जब मनुष्य ईश्वरीय भावों, मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को भुला बैठता है उस स्थिति में ईश्वर उसे मझधार में छोड़ देता है जहाँ अहंकार धीरे-धीरे ऑक्टोपस की तरह इंसान को अजगरी पाशों में बाँधने लगता है और एक स्थिति ऎसी आती है जब वह नितान्त अकेला रह जाता है। न वह किसी के भरोसे पर खरा उतरने के काबिल होता है, न वह किसी और पर भरोसा कर पाने की स्थिति में होता है।

विश्वासहीनता और अहंकार के चरम माहौल में दुर्गति और पराभव के सिवा मनुष्य को कुछ भी हाथ नहीं लगता। हमारे आस-पास भी बहुत सारे लोग ऎसे रहते हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे घोर दंभी हैं जिनसे न कोई बात करना पसंद करता है, न अहंकार भरे ये लोग संसार से संवाद रख पाते हैं।

आत्म अहंकारी लोगों का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं और उनके मुकाबले कोई इंसान हो ही नहीं सकता। अहंकार अपने आप में ऎसा एकमात्र सटीक पैमाना है जो यह स्पष्ट संकेत करने के लिए काफी है कि किस पर भगवान मेहरबान है। 

जिस पर ईश्वर प्रसन्न रहता है वह इंसान सभी प्रकार के अहंकारों से मुक्त रहता है, भगवान की कृपा से कोई से अहंकार उसे छू तक नहीं पाते। इसके विपरीत भगवान जिस पर से अपनी कृपा हटा लेता है उसके भीतर विद्यमान किन्तु सुप्त पड़े अहंकार के बीज अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं और धीरे-धीरे पूरे आभामण्डल को अपनी कालिख से ढंक लिया करते हैं।

यह अहंकार अपने आप में यह संकेत है कि अहंकारी इंसान का मानसिक और शारीरिक क्षरण आरंभ हो चुका है और उसके अधःपतन के सारे रास्ते अपने आप खुलते चले जा रहे हैं।  इस दुर्भाग्य को गति देने के लिए इन्हीं की किस्म के दूसरे अहंकारी, दोहरे चरित्र वाले और पाखण्डी लोग भी इनके साथ जुड़ जाते हैं जो इनके ताबूत में कील ठोंकने के लिए काफी होते हैं।

इसलिए जहाँ जो लोग किसी न किसी अहंकार के मारे फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं, उन्हें अपने अहंकारों के साथ जीने दें। ऎसे अहंकारी लोगों के सान्निध्य व सामीप्य तथा इनके साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार तक भी अपने पुण्यों को क्षीण करने वाला होता है।

अहंकारी मनुष्यों के साथ रहने वालों, उनका जयगान करने वालों और उनकी पूछ करने वालों से भी भगवान नाराज रहता है। अधिकांश सज्जनों और अच्छे लोगों की बहुत सारी समस्याओं का एक कारण यह भी है।   अहंकारियों से दूर रहें, ये समाज के कूड़ेदान हैं, इनसे जितनी दूरी होगी, उतना हमारा व्यक्तित्व सुनहरा, दिव्य और सुगंधित बना रहेगा।

 

---000---

- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

हिंदी हास्य व्यंग्य पी ले पी ले ओ मेरी जनता

 

देश के युवाओं में नशा का दौर लगातार बढ़ता जा रहा है. किसी को शौक है तो कोई इसका आदी बन चुका है. छोटी खुशी हो या बड़ी बस बहाना चाहिए पार्टी करने का. चलो पार्टी करते हैं और जाम छलकाते हैं. गिलास को टकराकर चेयर्स करते हैं. और टल्ली होकर हंगामा.

वाह क्या खूबी है इस शराब में. ऐसे में दिल्ली सरकार के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने शराब पर एक नई बात कह दी. दिल्ली में शराब पीने की उम्र को कम करने की बात कही है. अभी दिल्ली में शराब पीने की जो कानूनी उम्र है वो 25 साल है. मंत्री जी ने इसे कम करके 21 साल करना चाहते हैं.

मंत्री जी के मुताबिक दिल्ली में फिलहाल शराब पीने की उम्र ज्यादा है जिसे कम कर दिया जाना चाहिए। उन्होने कहा कि कई बीजेपी शासित राज्यों में भी शराब पीने की उम्र 21 है। तो दिल्ली में शराब पीने की आयु 25 क्यों है?

वैसे आज कल देश का युवा नशे की लत में फंसता जा रहा है. ऐसे में ऐसी बातें करना कि उम्र सीमा घटा दो. दूसरे राज्यों में तो उम्र सीमा कम है. दिल्ली के जनता ने आप को गद्दी पर इसलिए बैठाया है कि उसकी समस्या दूर कर दिल्ली का विकास करे.

आप तो शराबी बनाने में जुट गए. वैसे ये लोगों का निजी मामला होता है. अब 18 साल के ऊपर हो गए तो अच्छा बुरा अपना सभी सोच सकते हैं. बोतल पर एक चेतावनी भी लिखी होती है. लेकिन अगर बीजेपी और कांग्रेस शासित राज्यों को देखते है तो कुछ दूसरी चीजों में देखें. जिसमें रोजगार, शिक्षा, मंहगाई, सुरक्षा, सम्बंधित बातें.

और दिल्ली को और आगे लेकर जाओ. इन राज्यों से भी आगे. लेकिन अच्छी चीजों को कौन देखता है. रेस्तरां एसोसिएशन की मांग पर आप उम्र सीमा घटनी चाहिए ये तो कह दिया. दिल्ली की जनता ने जिस उम्मीद के साथ आप को ताज पहनाया उसके बारे में क्या ख्याल है. आज दिल्ली के वो नौजवान जो शराब पीना चाहते है लेकिन 25 साल उम्र कम होने की वजह से रेस्तरों में जाने से डरते हैं.

हालांकि वो भले ही अपना जुगाड़ ढ़ूंढ लेते हो. लेकिन कानून का डर तो दोनों में देखा जाता है. वाह मंत्री साहब आप ने कहा कि हमने बाकी सभी राज्यों में देखा है कि कांग्रेस और बीजेपी शासित राज्यों में भी शराब पीने की उम्र 25 साल से कम है.

अगर वो विरोध करते हैं तो वो पहले अपने शासित राज्यों में देखें. चलो वो विरोध करते हैं वो तो इतने सालों से देश में और दिल्ली में कुछ नया नहीं कर पाए. दिल्ली की जनता ने आप पर तो काफी भरोसा किया था. इक बार अंधेरे में छोड़कर भाग गए थे.

लेकिन दोबारा से फिर भी पूरा मौका दिया. कहा गए वो वादे वो बातें. क्या ये सब और राजनीतिक दलों का चुनावी जुमला था. देश की राजधानी में कितने युवा पढ़ने और रोजगार की तलाश में आते हैं. तो शिक्षा और रोजगार पर क्यों नहीं विचार किया जाता.

कितने नाबालिग लड़के होटल और ढाबों में काम करते हैं. उनपर क्यों नहीं ध्यान जाता है. कितने गरीब के बच्चें सड़को पर भीख मांगते हैं. वो इनको नजर नहीं आता. कुछ अच्छाई की शुरूआत तो करो. जिससे दूसरा राज्य भी सीख ले.

आप तो शराब में आकर अटक गए. चलो शायद मंत्रीजी चाहते हैं दिल्ली वाले झूम बराबर झूम की तरह रहे. यहां शराब को बैन करने की मांग होती रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि मंत्री जी चाहते हैं पी ले पी ले ओ मोरी जनता.

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रवि श्रीवास्तव

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