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October 2015
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अपना कहो मुझे और खुशियां हज़ार दो
यूँ ही किसी गरीब की किस्मत सँवार दो

दीवाना बन गया हूँ तेरी तिरछी नज़र का
पलकें झुका, झुका के, दिल को क़रार दो

जीता हूँ तेरे प्यार में, खामोश हूँ मगर
कभी तो मेरे प्यार का, सदका उतार दो

महका हुआ बदन तेरा, ऑंखें है मरमरी
छूकर मुझे ऐ गुलबदन, मुझको निखार दो 

#Surabhi Saxena
Geetkar , Actress, poetess, Radio jockey
surabhisaxena77@gmail.com

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कुछ भी हो,अपने मसीहा को बड़ा रखता है
आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है


वो सरेआम हकीकत से मुकर जायेगा
गिरगिटों जैसी बदलने की अदा रखता है


तुम गरीबी को तो इनसान का गहना समझो
जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है ।


जुल्म पर जुल्म जो करता है यहाँ दुनिया में
उसके हिस्से में भी भगवान सजा रखता है ।


मार के कुंडली,खजाने पे अकेला बैठा
हक गरीबों का यहाँ सेठ दबा रखता है


एक दिन मैं तुझे आईना दिखा दूंगा "सुजान "
मेरे बारे में जो तू ख्याल बुरा रखता है

 

सूबे सिंह सुजान
गाँव -सुनेहडी खालसा 
डॉ -सलारपुर,
जिला कुरूक्षेत्र ,हरियाणा
मोबाइल नंबर -09416334841

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बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
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हमको भी हासिल है इतनी आजादी
इज्जत लौटाना थी,हमने लौटा दी
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हम फ़क़ीर हैं नंगे भी रह सकते हैं
आप वजीर बने हैं,पहने अब खादी
*
बहती गंगा में हाथों को धो लीजे
लोग कहें,कहने दें हम अवसरवादी
*
हिंसा का शिकार है ,कोई बात नहीं
आधी से ज्यादा दुनिया की आबादी
*
अचल लिखोगे और तो मारे जाओगे
बात खरी भी है समझो सीधी-सादी
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हम कागज के शेर, तो डरते क्यों हो

बोलो कुछ शमशेर, बगरते क्यों हों

*

सब कुछ है मामूल तो फिर घर बैठो

बेमतलब निशि-याम विचरते क्यों हो ?

*

यहां नहीं है वीफ,थीफ या गैया

रोज गली से आप गुजरते क्यों हो ?

*

सांप और सीढ़ी का खेल अजब है

सीढ़ी चढ़ते और उतरते क्यों हो ?

*

हम तो नहीं मुनव्वर राना भाई

नए पैरों को रोज कतरते क्यों हो?

*

कोई नहीं देखने वाला तुमको

अचल व्यर्थ में आप संवारते क्यों हो ?

*

@राकेश अचल

f/10,new park hotel,padav

gwalior

[m.p.]

09826217795

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विद्या, बुद्धि और कला-संपन्न व्यक्ति वही होता है, जो सहनशील, नम्र और मधुर व्यवहार वाला होता है। व्यवहार रेगिस्तान में नहीं पनपता। वह तो एक फूल है,जिसे खिलने के लिये उद्यान की जरूरत होती है। लोग सोचते है कि उन्हें व्यवहार करना आता है। लेकिन उन्हें व्यवहार करना सीखना होगा। सीखने की संभावना तो हैं उनमें, पर यह संभावना इसलिये निष्क्रिय हो जाती है कि वे समझते हैं कि उन्हें व्यवहार करना पहले से ही आता है। चीजें जैसी है उन्हें सीधे-सीधे वैसा ही देखने की कोशिश करना होगा। पहली बात तो यह है कि परिस्थिति कितनी भी खराब क्यों न हो, उसके प्रति साफ तौर से सचेत और सकारात्मक होना होगा। न तो उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर पेश की जाये और न उन्हें छिपायी जाये। अगर छिपायेंगे तो व्यवहार बाधित होगा। अपने सारे मुखौटे उतारने होंगे। ऐसा करके ही हम व्यवहार क्या होता है समझ सकेंगे और तभी इस व्यवहार से बनने वाले रिश्तों की महत्ता एवं रसपूर्णता को जी सकोगे।

श्रीकृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। मार्ग में जीवा नाम का एक भिक्षुक दिखाई दिया। अर्जुन ने उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली दी। वह घर की तरफ लौट चला। किंतु राह में एक लुटेरे ने उससे वह पोटली छीन ली। वह फिर भिक्षावृत्ति में लग गया। अर्जुन ने उसे देखा और टोका। जीवा ने सारा विवरण बताया। अर्जुन ने उसे इस बार एक माणिक दिया। घर पहुंचकर जीवा ने माणिक एक घड़े में छिपा दिया, फिर थोड़ी देर के लिए सो गया। इस बीच जीवा की पत्नी पानी भरने गई। संयोग से वह वही घड़ा ले गई, जिसमें जीवा ने माणिक छिपाया था। नदी में जैसे ही उसने घड़े को डुबोया, वह माणिक भी बह गया।

जीवा फिर भिक्षावृत्ति करने लगा। यह देखकर अर्जुन को बड़ी हताशा हुई। लेकिन इस बार कृष्ण ने उसे दो पैसे दिए और अर्जुन से पीछे-पीछे जाने को कहा। अर्जुन ने देखा कि जीवा मछुआरे के जाल में फंसी मछली को छटपटाते देख रहा है। जीवा से रहा न गया और उसने मछली को छुड़ा लिया, और उसे नदी में छोड़ने चला। रास्ते में मछली ने कुछ उगला। जीवा ने देखा कि वह वही माणिक था, जो उसने घड़े में छिपाया था। जीवा चिल्लाने लगा, मिल गया, मिल गया...। तभी वह लुटेरा भी अचानक वहां से गुजरा। जीवा को चिल्लाते देख उसने समझा कि पहचान लिया गया हूं। उसने लूटी हुई सारी मुद्राएं तुरंत वापस कर दीं।

अर्जुन ने कृष्ण से पूछा कि आपके दिए दो पैसों ने वह काम कैसे कर दिखाया, जो स्वर्ण मुद्राएं और माणिक से नहीं हुआ? कृष्ण ने कहा, जब कोई दूसरों के दुख के बारे में सोचता है, तो वह ईश्वर का काम कर रहा होता है, और तब ईश्वर उसके साथ होते हैं। जीवा ने स्वर्णमुद्राओं और माणिक को नहीं, दो पैसों को परोपकार में लगाया। और परमात्मा उसके साथ खड़ा हुआ।

जब कोई दूसरों के दुख के बारे में सोचता है, तो वह ईश्वर का काम कर रहा होता है। हमारा सोच, हमारा व्यवहार एवं  हमारी संवदेनाएं ही हमें महान् बनाती है, हमारे जीवन को परिपूर्णता देती है।

सवाल यह है कि क्या हमने व्यवहार की गुणवत्ता का अनुभव हुआ है? क्या उसके समृद्धि का एहसास हुआ है? क्या वह परितृप्ति हमको मिली है जिससे व्यवहार का जन्म होता है? बजाय इसके कि आप-हम खुद को कसूरवार और दुखी महसूस करते रहे, अपना वक्त और ऊर्जा बरबाद करते रहे, हमें अपनी ऊर्जा को व्यक्तित्व विकास में नियोजित करना चाहिए। जब आप एक सक्षम व्यक्तित्व बनोगे तो व्यवहार फूटेगा- कुशल व्यवहार, पवित्र व्यवहार। न कि वह नकली एवं दिखावेवाला व्यवहार जो दुनिया के हर कोने में मिलता है।

अच्छा व्यवहार दीपक के समान है, जो कइयों को रोशनी प्रदान कर सकता है। दर्पण व्यक्ति के बाहरी रूप को दर्शाता है और व्यवहार व्यक्ति के अंदरुनी रूप को दर्शाता है। हमारा समग्र जीवन व्यवहार रूपी नौका पर टिका हुआ है। अगर व्यवहार अच्छा है तो सारा संसार अपना है। अगर व्यवहार बुरा है तो सारे जहां को छोड़े, अपने परिवार वाले, आस-पड़ोस वाले भी अपने नहीं बनते। सुख-शांति-पूर्ण जिंदगी हमारे व्यवहार पर निर्भर करती है।

महाभारत की बात है-श्रीकृष्ण ने दुर्योधन और युधिष्ठिर को एक-एक कागज हाथ में देते हुए पहले दुर्योधन से कहा-तुम द्वारिका नगरी में जाओ और जितने भी अच्छे व्यक्ति हैं, उनकी सूची बनाकर मेरे पास लाओ। भगवान कृष्ण ने फिर युधिष्ठिर से कहा-तुम बुरे व्यक्तियों की सूची बनाकर मेरे पास लाओ। दोनों द्वारिका गए। थोड़ी देर बाद में दोनों ही खाली कागज लेकर श्रीकृष्ण के पास आए। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पूछा-‘तुम्हें अच्छे व्यक्तियों की सूची बनाकर लाने को कहा था और तुम खाली कागज ही ले आए!’ तब दुर्योधन ने कहा-‘आपके द्वारिका में अच्छे व्यक्ति हैं ही नहीं, सबमें कोई-न-कोई बुराई है।’ तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से पूछा-‘तुमने भी सूची नहीं बनाई?’ युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा-‘महाराज! आपके द्वारिका में मुझे कोई बुरा व्यक्ति मिला ही नहीं। हर किसी व्यक्ति में कुछ-न-कुछ अच्छाई है। इसलिए मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सका।’

हमारे व्यवहार के आईने में ही दूसरे लोगों का व्यवहार झलकता है। उसमें वैसा ही प्रतिबिम्ब होता है, जैसा हम होते हैं। व्यवहार के धरातल पर ही जीवनरूपी मकान की नींव टिकी हुई है। व्यवहार रूपी नींव कमजोर है यानी व्यक्ति व्यवहार-कुशल नहीं है तो जीवनरूपी मकान बदहाल व जर्जर हो जाएगा। वह व्यक्ति हताश-निराश होकर कुंठा-ग्रस्त हो जाएगा और अपने-आप को अकेला महसूस करने लगेगा।

जिंदगी में सफलता हासिल करने के लिए अच्छे व्यवहार का होना बहुत जरूरी है। व्यवहार वह चाबियों की चाबी है जो सारे दरवाजे खोल देती है। यह चाबी प्रेम का द्वार भी खोल सकती है, विकास का द्वार भी खोल सकती है, शक्ति का द्वार भी खोल सकती है और भक्ति का द्वार भी खोल सकती है। शत्रु हो या मित्र, आप सबके लिये अपना हृदय खोल सकोगे। भले ही आप उन्हें जानते हो या फिर वे अजनबी हों। तब आपको ऐसे जीवन-उपहार मिलेंगे, जिनकी आपने कल्पना भी न की होगी।

एक बार गुरुनानक किसी गांव पधारे। उस गांव के लोगों ने गुरुनानक एवं उनके शिष्यों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, पर गुरुनानक ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा-‘बसे रहो।’ और दूसरे गांव की ओर चले गए। वहां के लोगों का व्यवहार बहुत मधुर और सम्मानजनक था। गुरुनानक ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा-‘बिखर जाओ।’ गुरुनानक के साथ जो शिष्य मंडली थी, उन्हें गुरुनानक का व्यवहार बहुत विचित्र लगा। आखिर एक शिष्य ने उनसे प्रश्न कर ही लिया-‘प्रभो! पहले गांव के लोगों का व्यवहार इतना बुरा था, फिर भी आपने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा-‘बसे रहो’ और इस गांव के लोगों का व्यवहार इतना अच्छा है, जिन्हें आपने आशीर्वाद देते हुए कहा-‘बिखर जाओ’ यह कैसा न्याय?’

तब गुरुनानक ने शिष्य के प्रश्न को समाहित करते हुए कहा-‘उस गांव के लोगों का व्यवहार अच्छा नहीं था, वे जहां भी जायेंगे अपने दुव्र्यवहार के अंश वहां भी बिखेर देंगे। इसलिए मैंने उन्हें वहीं बसे रहने का आशीर्वाद दिया और इस गांव के लोग जहां भी जायेंगे अपने अच्छे और मधुर व्यवहार की खुशबू वहां बिखेरेंगे और वहां के लोगों को भी वैसा ही बना देंगे।’

अगरबत्ती और बीड़ी दोनों ही जलती हैं, मगर अगरबत्ती जलकर वातावरण को सुगंधित और खुशनुमा बना देती है, वहीं बीड़ी जलकर वातावरण को बदबूदार बना देती है। ठीक इसी प्रकार अच्छे व्यवहार वाला व्यक्ति हर जगह अच्छाई बिखेरता है और बुरे व्यवहार वाला व्यक्ति बुराई। व्यक्ति कोई अच्छा या बुरा नहीं होता, अच्छा या बुरा होता है उसका व्यवहार।

शेक्सपियर की चर्चित पंक्ति है- ‘अगर रोशनी पवित्रता का जीवन रक्त है तो विश्व को रोशनीमय कर दो/ जगमगा दो और इसे जी-भरकर बाहुल्यता से प्राप्त करो।’ शेक्सपियर ने यह पंक्ति चाहे जिस संदर्भ में कही हो, पर इसका उद्देश्य निश्चित ही पवित्र था और अनेक अर्थों को लिए हुए यह उक्ति सचमुच मंे जीवन व्यवहार की स्पष्टता के अधिक नजदीक है।

रोशनी! उत्सव का प्रतीक, खुशी के इज़हार करने का प्रतीक है, सफलता का प्रतीत है। अगर हम इस सोच को गहराई में डुबो लें तो ये सूक्तियां हमारे जीवन की रक्त धमनियां बन सकती हैं और उससे उत्तम व्यवहार की रश्मियां प्रस्फुटित हो सकती है। उन रश्मियों की निष्पत्तियां के स्वर होंगे-  ”सदा दीपावली संत की आठों पहर आनन्द“, ”घट-घट दीप जले“, ”दीये की लौ सूरज से मिल जाये“।

एक प्रश्न बार-बार मन को झकझोरता है कि गुणों की सुगन्ध को हवा उतनी तेजी के साथ औरों तक क्यों नहीं पहुंचाती जितनी तेजी के साथ वह दुर्गुणों की दुर्गन्ध को फैलाव दे जाती है? यह भी सच है कि अच्छाइयों के लिये एक लम्बा सफर तय करना पड़ता है जबकि बुराइयां तो हर मोड. पर हाथ मिलाने को तैयार रहती है। इन स्थितियों में जीवन-मूल्यों से पहचान जरूरी है।  मनुष्य की वास्तविक पहचान लिबास नहीं है, भोजन नहीं है, भाषा नहीं है और उसकी साधन-सुविधाएं नहीं हैं। वास्तविक पहचान तो मनुष्य का व्यवहार है, व्यवहार की  पहचान होती है उसके  आत्मिक गुणों के माध्यम से। जीवन की सार्थकता और सफलता का मूल आधार व्यक्ति के वे गुण हैं जो उसे मानवीय बनाते हैं, जिन्हें संवेदना और करुणा के रूप में, दया, सेवा-भावना, परोपकार के रूप में हम देखते हैं। असल मंे यही गुणवत्ता बुनियाद है, नींव हैं जिसपर खड़े होकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बनाता है। जिनमें इन गुणों की उपस्थिति होती है उनकी गरिमा चिरंजीवी रहती है।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था कि आप प्रसन्न है या नहीं यह सोचने के लिए फुरसत होना ही दुखी होने का रहस्य है, और इसका उपाय है व्यवसाय।’ व्यवसाय यानी हमारा व्यवहार। एक प्रौढ़ महिला का पति क्लास इन्कम टैक्स अधिकारी है। आमदनी बढि़या है। बहू-बेटे बाहर रहते हैं। घर का काम नौकर-चाकर संभालते हैं। किसी प्रकार की तकलीफ नहीं, चिंता का कोई कारण नहीं, फिर भी सदा बीमार रहती हैं, निरंतर डाॅक्टरों का चक्कर। कारण नेगेटिव विचार एवं उपेक्षित व्यवहार। उपेक्षित व्यवहार एवं नकारात्मक विचारों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा सामान्यतः कोई डाक्टर नहीं कर सकता। ये निषेधात्मक विचार न केवल शरीर को रुग्ण बनाते हैं अपितु जीवनी शक्ति को भी क्षीण करते हैं। भीतर में बिलौना चलता है तो छींटे आसपास उछलते ही हैं। तनाव, चिंता, गुस्सा, चिड़चिड़ापन-इनसे शरीर की 185 मांसपेशियां एक साथ प्रभावित होती हैं। इससे बचने के लिए सकारात्मक सोच की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। महान् वैज्ञानिक आइंस्टीन का कहा हुआ प्रासंगिक है कि सफल मनुष्य बनने के प्रयास से बेहतर है गुणी मनुष्य बनने का प्रयास।

गुणीजन सदा दूसरों की ही चिंता करते हैं, अपनी नहीं। उनमें दया होती है इसलिए उनकी भावना में मानवता भरी होती है। यही मानवता उनमें संवेदना की और मित्रता की पात्रता पैदा करती है। एक गुणी दूसरे गुणी से मिलकर गुणों को विकसित करता है जबकि वही निर्गुण को पाकर दोष बन जाता है। गुणों की पात्रता के लिए स्वयं को गुणी बनना जरूरी है। नदियों का जल बहता है वह अत्यंत स्वादिष्ट होता है किंतु समुद्र को प्राप्त कर वही जल अपेय अर्थात् खारा बन जाता है।

बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कितनी वजनवाली बात कही है कि हँसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना ही लाभकर है जितना कि स्वस्थ ऋतु। हम प्रसन्न होते हैं तो हमारी सारी नस-नाडि़यां खिल उठती हैं। हम उदास होते हैं तो पूरा स्नायु तंत्र उदास-शिथिल हो जाता है। हमारी भावनाएं स्वस्थ-प्रसन्न रहें। मन उल्लास-उत्साह से भरा रहे। इससे चेहरा तेजस्वी बनता है, आंखों में चमक आती है। इसके विपरीत चिंताओं में डूबे, हीन भावनाओं से घिरे, हताश-निराश व्यक्ति का चेहरा बुझा-बुझा, कांतिहीन प्रतीत होता है। झुका हुआ सिर, धंसी हुई आंखें, मरियल-सी चाल एक सुंदर चेहरे को भी दयनीय बना देती है। सकारात्मक सोच और पवित्र अंतःकरण वाला व्यक्ति चेहरे से सुंदर न भी हो उसके व्यक्तित्व की गरिमा, आभा और प्रभावोत्पादकता दूसरी ही होती है। अतः यदि अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठता प्रदान करना है तो स्थूल शरीर से प्रारंभ कर सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर को शुद्ध करें, सिद्ध करें। चैतन्य के साथ संपर्क होगा। राग-द्वेष क्षीण होंगे। ज्ञाता-द्रष्टा भाव जागेगा। आंतरिक अर्हताएं प्रकट होंगी। यही है अस्तित्व बोध से समग्र व्यक्तित्व विकास की महायात्रा। यही है स्वयं के सम्यक् निर्माण की प्रक्रिया। डिजरायली का कथन बिल्कुल सही है-तुम्हारे अंदर के भाव ही तुम्हारी दशा और दिशा तय करते हैं।

भारतीय संस्कृति का मूलाधार व्यवहार और उसकी अनुभूतियां हैं। उसने सिद्धांत का निरुपण किया, परंतु उतने तक ही अपने को सीमित नहीं रखा। ज्ञान को अनुभूत किया अर्थात सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन में उतारा। यही कारण है कि उसकी हस्ति आजतक नहीं मिटी। उसकी दृष्टि में गुण कोरा ज्ञान नहीं है, गुण कोरा आचरण नहीं है। दोनों का समन्वय है। जिसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता वही समाज मंे आदर के योग बनता है। इसलिए कहा गया है कि गुणःसर्वत्र पूज्यंते-गुण की सब जगह पूजा होती है। आज के युग में इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज मानव मूल्यों का हृास हो गया है, नैतिकता चरमरा रही है, और इन्सानियत की नींवें कमजोर और खोखली होती जा रही है। चारों ओर भौतिक मूल्य छा गए हैं। यही वजह है कि नाना प्रकार के विकृतियों से मानव, समाज और राष्ट्र आक्रांत हो गया है।

(ललित गर्ग)

ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट

25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92

फोनः 22727486, 9811051133

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स्पष्ट अभिव्यक्ति ही सरोकार की पत्रकारिता : स्वामी निरंजनानंद
                            आनंद


बिहार के चर्चित पत्रकार आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र की पुण्यतिथि पर
लक्ष्मीकांत मिश्र मेमोरियल फाउंडेशन नई दिल्ली और पत्रकार समूह मुंगेर
द्वारा आयोजित समारोह में महात्मा गांधी और स्वामी सत्यानंद के विचारों
के परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के सरोकार पर संगोष्ठी महत्वपूर्ण रही.
इस संगोष्ठी की अहमियत इसलिए है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार
हमले हो रहे हैं और लेखक पुरस्कार लौटा रहे हैं. बिहार का पत्रकारों के
लिए घोषित सरकारी पुरस्कार फाइलों के बस्ते में धूल फांक रहा है. वैसे
समय में एक पत्रकार की याद में विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धि हासिल
किये. पांच लोगों को पुरस्कृत तथा सम्मानित किये जाने का भी एक मायने है.
कार्यक्रम का शुभारंभ बिहार योग  विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी
निरंजनानंद सरस्वती ने दीप प्रज्वलित कर तथा उनके चित्र पर माल्यार्पण कर
किया गया.


आरंभ में देश के चर्चित पत्रकार रामबहादुर राय के संदेश् को अजाना घोष ने
पढ़ा. रामबहादुर राय ने अपने संदेश में कहा कि यह उम्मीद पैदा करती सूचना
है कि आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र की याद में सरोकारी पत्रकारिता का आयोजन
मुंगेर में हो रहा है. यह समय चौतरफा मूल्यों में गिरावट का है,
पत्रकारिता में भी. ऐसा नहीं हो सकता है कि पत्रकारिता अपने समय की इस
प्रवृति से पड़े हो जाय. यदि ऐसा होता है तो यह एक चमत्कार होगा. ऐस समय
में लक्ष्मीकांत मिश्रा को याद करने में अपना एक खास महत्व है. उनकी
पत्रकारिता अपने जीवनकाल में निरंतर ऐसी खोज की ओर अग्रसर थी. जिसमें लोक
हित लक्ष्य होता था. ऐसी पत्रकारिता में सच को जानने की कोशिश चलती थी.


जानना सहज नहीं होता है उसके लिए प्रयास करना पड़ता है. कई बार प्रयास थका
देने वाला भी होता है. हमेशा सफलता हाथ नहीं लगती है. निराषा के क्षण भी
आते हैं. फिर भी जो व्यक्ति एक पत्रकार के रूप में जानने में लगा रहता है
वह इसकी परवाह नहीं करता है कि सफलता हाथ लगती है या नहीं. जानने और
मानने में जमीन-आसमान का फर्क है. बिना जानने माने वाला ईमानदार नहीं हो
सकता. जानने के बाद न मानने वाला भी ईमानदार नहीं हो सकता. जानना एक घटना
भी हो सकती है. वह एक तथ्य ज्ञान का साक्षात्कार भी हो सकता है. कोई
पत्रकार अपने काम में जानने में लगा होता है. जो जान पाता है वही लोगों
को बता पाता है. यही सार्थक पत्रकारिता है. आज के समय में क्रम पलट गया
है. बिना जानने-माने वाले पत्रकार अधिक हुए. वे जो मानते हैं वे दूसरे भी
माने सक्रिय हो गये हैं. फिर पत्रकारों के सामने रौल मॉडल यानी आदर्श हो.


यही सवाल है जो आयोजन से हल हो सकता है. पत्रकार की भूमिका चाहे जो हो एक
निरंतरता हमेशा बनी रहेगी. इन दिनों एक ज्ञान बड़े जोर से फैलाया जा रहा
है कि हमारा वास्ता उस पत्रकारिता से नहीं है जिसे स्वाधीनता संग्राम में
अपनाया गया. इसे एक तर्क पर खड़ा किया जा रहा है. देश आजाद है और आजादी के
अनेक दशक हो गये तो उस समय के पत्रकारिता के आदर्श पर चलने की क्या
जरूरत. यह तर्क बहुत खोखला है. इसे जितना जल्दी समझ सकेंगे उतना ही जल्दी
हमारी भटकन खत्म होगी. आजादी के आंदोलन की पत्रकारिता में समग्रता थी.
इसलिए उसे आदर्श मानकर भारत में पत्रकारिता को अपनी भूमिका तय करनी
चाहिए. यही बात आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र को याद करते हुए हमें समझने की
जरूरत है.


संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त योग संस्थान
बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने
कहा कि पत्रकारिता चिंतन की अभिव्यक्ति है. चिंतन से ही मनुष्य लक्ष्य
निर्धारित करता है और समाज के उत्थान में अपनी भूमिका निभाता है. महात्मा
गांधी एवं परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपने चिंतन के माध्यम से ही
समाज को दिशा दी.


सूचना  भवन के प्रशाल में आयोजित ‘‘ महात्मा गांधी व स्वामी सत्यानंद के
विचार के परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के सरोकार ’’ विषय पर अपने उद्गार
व्यक्त करते हुए स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि गांधी जी ने अपने चिंतन के
माध्यम से स्वराज को आंदोलन बनाया और पूरी दुनिया को एक संदेश दिया. जबकि
स्वामी सत्यानंद ने आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से पूरी दुनिया में योग
को जनसाधारण तक पहुंचाया. उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति की बात की और
उनके उत्थान के लिए कार्य किये.  उन्होंने कहा कि स्वामी सत्यानंद जी का
चिंतन न सिर्फ आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक चिंतन था. हम शांति को स्थापित
करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए जरूरी है अशांति के कारणों का निराकरण
करना. अब जहां पत्रकारिता सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक स्तर पर फैल
चुका है वहां संगठित पत्रकार की भूमिका है कि वे बेहतर चिंतन के माध्यम
से समाज को नई दिशा दे.

इससे पूर्व संगोष्ठी में विषय प्रवेश कराते हुए
वरिष्ठ पत्रकार कुमार कृष्णन ने कहा कि महात्मा गांधी व स्वामी सत्यानंद
का पत्रकारिता के दृष्टिकोण से काफी एकरूपता है. स्वामी सत्यानंद का
पत्रकारिता से गहरा लगाव रहा. वे स्वामी शिवानंद के आश्रम में निकलने
वाले हस्त लिखित पत्रिका का जहां संपादन किये थे. वहीं सुमित्रानंदन पंत
के साथ मिल कर अनुगामी पत्रिका का संपादन किया था. उन्होंने कहा कि
स्वामी जी महात्मा गांधी के विचार से ही जुड़े रहे. यहां तक कि वे वरधा व
साबरमती आश्रम  भी  गये थे. दिल्ली जनसत्ता के महानगर संपादक प्रसून
लतांत ने कहा कि पत्रकारिता का क्षेत्र व्यापक रहा है और अब सिटीजन
जर्नलिज्म का दौर शुरू हो गया है. इस परिस्थिति में जरूरत है कि गांधी और
स्वामी सत्यानंद के पत्रकारिता को समझने की.समारोह की अध्यक्षता सूचना
एवं जनसंपर्क के निदेशक कमलाकांत उपाध्याय ने की. कार्यक्रम का संचालन
कुमार कृष्णन ने किया.


समारोह को शिक्षक संघ के वयोवृद्ध नेता हर्ष नारायण झा, मुंगेर चैंबर आफ
कामर्स के अध्यक्ष राजेश जैन, वरिष्ठ साहित्यकार अतुल प्रभाकर, पत्रकार
प्रशांत, अवधेश कुंवर, किशोर जायसवाल, शिवशंकर सिंह पारिजात, राजेश
तिवारी, मीणा तिवारी ने भी संबोधित किया.


इस अवसर पर आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र मेमोरियल फाउंडेशन नई दिल्ली की ओर
से विभिन्न क्षेत्रों के पांच विभूतियों को परमहंस स्वामी निरंजनानंद
सरस्वती ने सम्मानित किया. साहित्य सेवा के क्षेत्र में दिल्ली के वरिष्ठ
साहित्यकार अतुल प्रभाकर, समाजसेवा के क्षेत्र में भागलपुर की अमिता
मोइत्रा एवं वंदना झा, पत्रकारिता के क्षेत्र में राणा गौरी शंकर तथा
पर्यावरण के क्षेत्र में अनिल राम को स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र एवं
शाल देकर सम्मानित किया गया. इसका चयन एक निर्णायक समिति ने किया था.
जिसमें प्रसून लतांत, डॉ रामनिवास पांडेय, मनोज सिन्हा, अमर मिश्रा और डॉ
नृपेंद्र प्रसाद वर्मा थे. इस अवसर पर एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया
गया. कवि सम्मेलन में अनिरुद्ध सिन्हा, अशोक आलोक, विजय गुप्त एवं विकास
सहित अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर भाव तथा बोध को अभिव्यक्ति
प्रदान की.
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Thanks & Regards
ANAND
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MUNGER

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kumar krishnan (journalist)

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बिदाई

अपनी कोमल ऊँगलियों से पापा के कठोर हाथों को छूती उसकी हथेली, छोटे-छोटे कदमों से चलके सुबह पापा के मोज़े तलाशती उसकी मासूम निगाहें, गाड़ी की चाभी कभी, कभी पेन या रूमाल छिपा के ऑफिस न जाने देने का बहाना बनाती उसकी शरारती व निःश्चल मुस्कान।
टिफ़िन में अपने हाथों की बनी टेढ़ी-सीधी, कच्ची-पक्की रोटी रख के मम्मी के आँचल से अपना पसीना पोंछते उसके वो फरिश्ते जैसे हाथ।
ऑफिस से लौटने पर दौड़कर गोद में चढ़कर ज़ेब में टाफियों को तलाश करती नन्हीं चिड़ीया, न मिलने पर शिकायत की अदा और मिलने पर घुँघरूओँ सी छनकती हँसी।
अपनी मम्मी से हमेशा होड़ कि पापा को पानी कौन पहले ला कर देता है। पापा का टावेल लाना या अपने हाथों से पापा का शू पॉलिश करना फिर चाहे वो ब्लेक शू पर रेड पॉलिश ही क्यों न हो।
स्कूल के पिकनिक की परमिशन या कॉलेज़ के टूर पर जाने के लिए पापा के पॉकेट से पैसे निकालने की हरकत साथ ही भाई का मोबाइल रिचार्ज कराने को उसमें से हिस्सा देने की अदा। रिज़्लट बिगड़ने पर पापा के क्रोध से भाई को बचाती उसकी ढाल बन के सामने आकर खड़े होने की स्टाइल।
खाँसने की आवाज़ सुनते ही अपने हाथों से ज़बरन कड़वी गोलियाँ खिलाना। अपनी स्कूटी पे बिठा के पापा को ऑफिस छोड़ने की ज़िद करना। नये-नये कपड़े पहनकर सबसे पहले पापा को दिखाने की ज़िद लिए इंतज़ार करती वो हिरनी जैसी चुलबुली आँखें।
अब कभी नज़र नहीं आयेंगी................................................

क्योंकि आज उस बिटिया की बिदाई है।

कृष्णा कुमार चंचल

M/9-D, Maroda Sector, Bhilai,

C.G. 490006

Mob. No.9630820666

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इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना एक शौक में, चीख में बदल चुका है.लोग माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आ गया है. कोई खास वजह नहीं है, फिर भी बोला जा रहा है. कोई सुनने वाला नहीं है,फिर भी बोला जा रहा है.शब्दों की इतनी फ़िज़ूलख़र्ची कभी नहीं की गई, जितनी आज की जा रही है. लोग अगर किसी को सुनते भी हैं तो सिर्फ सुनने के लिए नहीं बाद में बोलने के लिए सुनते हैं. बोलना एक अहम जिम्मेदारी है पर अफ़सोस कि अब वह बीमारी की शक्ल में ढल सा गया लगता है.

वाणी की महिमा कौन नहीं जानता. मनुष्य के जीवन में सुख और दुख के जो प्रमुख कारण हैं, उनमें वाणी भी एक है. इसलिए वाणी की शक्ति को जानना और उसे जीवनोपयोगी बना लेना वास्तव में बड़ी बात है.

संत कबीर कहते हैं-

एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास

एक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस.

संत कबीर ने एक पद में बताया है कि कब, किससे, क्या बोलना चाहिए-

बोलत बोलत बाढ़ विकारा,

सो बोलिए जो पड़े विचारा.

मिलहिं संत वचन दुइ कहिए,

मिलहिं असंत मौन होय रहिए.

पंडित सों बोलिए हितकारी,

मूरख सों रहिए झखमारी.

क्या आप भी बोलने की कला सीखना चाहते हैं ? तो बोल-चाल में शब्दों का सही चयन करें. आपको महत्वपूर्ण शब्दों को चुनना होगा और महत्वहीन शब्दों को छोड़ना होगा, क्योंकि शब्द ही आपके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं. बोलने की आदत डालिए, क्योंकि बोलने से आत्मविश्वास पैदा होता है, लेकिन बोलने से पहले अपने शब्दों को रचनात्मक विचारों की तराजू में तोलिए. यदि आप एक शब्द बोलने से पहले दो बार सोच लेंगे, तब आप हमेशा अच्छा बोलेंगे. जिन्हें बातचीत करना नहीं आता, वही लोग सबसे अधिक बोलते हैं. लेकिन जिन्हें बातचीत करनी आती है, वे कम बोलते हैं.

कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके.‘ कबीर ने भी यही कहा है-

बोली तो अनमोल है,जो कोई बोले जान.

हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आन..

संयमित वाणी को विद्वानों ने अधिक महत्व दिया है. ऋषि नैषध कहते हैं-‘मितं च सार वचो हि वाग्मिता‘ अर्थात, थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्डित्य है. जैन और बौद्ध धर्मों में वाक्संयम का महत्वपूर्ण स्थान है.

तुलसीदास जी की यह व्यंग्योक्ति बहुत बड़ी सीख देती है-

पेट न फूलत बिनु कहे, कहत न लागत देर.

सुमति विचारे बोलिए, समझि कुफेर सुफेर।

भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा है-‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा.‘ इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए.

कबीर के अनुसार-

शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव

एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव.

फ्रांसीसी लेखक कार्लाइल ने कहा है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति है. गांधीजी ने भी मौन को सर्वोत्तम भाषण कहा है. सुकरात कहा करते थे-ईश्वर ने हमें दो कान दिए हैं और मुंह एक, इसलिए कि हम सुनें अधिक और बोलें कम.

अंत में देखिये कि संत कबीर ने बोलते समय मध्यम मार्ग अपनाने का सटीक सुझाव दिया है-

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप.

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

प्राध्यापक,हिन्दी विभाग, दिग्विजय

कालेज,राजनांदगांव। मो.9301054300

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''प्रेम''

अहसास ए मुहब्बत की सदा, दिल से लीजिए।,

करना है सच्चा इश्क तो फिर, दिल से कीजिए।।

1.महफिल में हो तन्हाई में हो ,जिक्र उसी का,

आंखों से उसके प्यार को महसूस कीजिए।

है प्रेम की बुनियाद तो विश्वास पर टिकी,

गहराई इसकी रूह से महसूस कीजिए।।

2.ये प्रेम इबादत है ,फिदाई की नजर में,

इकरार से इसके कभी मुकरा न कीजिए।

है सबसे एक बात मुझे कहना बस यही,

खेल नहीं प्यार ,बस एक बार कीजिए।।

---

''आज''

1.आज सच्चे इंसान नहीं मिलते हैं,

लोगों के दिल से दिल नहीं मिलते हैं।

आज कल के इस जमाने में

सच्चे आइने कहां मिलते।।

2.दिखा करके सब झूठे सपने ,

दिल के अरमान तोड़ देते है।

मत जीना किसी के अहसानों तले,

लोग मजबूरियों में वार करते हैं।।

3.धोखे खाये हैं मैंने अपनों से,

मुझे अपने ही मात देते हैं।

लोग छोटों पर उगलियां उठाते हैं

गुनाह बड़ों के तो बेहिसाब होते हैं।।

3.वादा करके जो गया था कभी,

उसका आज भी इंतजार करते हैं।

वफा न मिली वफा करके ,

इसलिए आज भी तन्हा रहते हैं ।।

--

कविता -''बेटी''

आने वाला कल है बेटी,

पावन गंगा जल है बेटी।

प्रेम,दया, ममता की मूरत,

शुभ कर्मों का फल है बेटी।।

मुश्किल में मुस्कान है बेटी,

दो-दो कुल की शान है बेटी।

जीती है संघर्ष का जीवन,

ईश्वर का वरदान है बेटी।।

माँ-बहना का रूप है बेटी,

पति के घर का दीप है बेटी।

बेटी माँ के दिल का टुकड़ा,

लक्ष्मी,दुर्गा का रूप है बेटी।।

---

''गुनाह''

गुनाह करके बच तो जाओगे ,दुनिया की नजर से,

खुद को न बचा पाओगे खुदा की नजर से ।

1.मंदिर में तो लिखा दोगे नाम ऊँचे दाम से ,

खुदा न पडेगा तेरा नाम बिन अच्छे काम के।

मुसीबत में किसी को तूने एक आना न दिया,

किसी का न किया भला तू ने अपने हाथ से ।।

2.तेरे महलों से तो है उनकी झोंपड़ी भली ,

रहते हैं जहां मिलके सब आपस में प्यार से।

मतलब नहीं होता है उन्हें किसी गुनाह से ,

खुश हैं जहां पर सभी अपनों के साथ से ।।

--

'बेटी' हेतु गीत''

बेटी को न समझो तुम बोझ यारो।

बेटी रचती नया एक संसार यारो।।

बंद करो अब सब तुम भ्रूण हत्या,

हो जाने दो कन्या का अवतार यारो।

बेटी को भी है यह अधिकार यारो,

करलो-करलो तुम लाड़ली को प्यार यारो।।

बेटी मे होता है एक माँ का दिल,

पिता की छवि होती है अभिराम यारो।

कन्या का है ऐसा एक दान यारो,

जिसमें रमते हैं चारों-धाम यारो।।

देश का जब करेगी बेटी नाम रोशन,

होगा तुमको भी बेटी पर नाज यारो।

दो-दो कुल की है बेटी शान यारो,

बेटी होती है ईश्वर का वरदान यारो।

--

 

बी.के.गुप्ता

कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स

बिजली आफिस के पास बड़ामलहरा

जिला-छतरपुर .प्र. पिन-471311

मो.-9755933943

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''ईश्वर क्या है''

र्इ्रश्वर वह शक्ति है ,जिसके सहारे सूर्य, चन्द्रमा ,पृथ्वी घूम रहे हैं, पेड़-पौधे फल-फूल रहे हैं ,नदियाँ बह रही हैं ,हवा चल रही है, और प्राणी जीवित हैं।

रामायण के अनुसार-

तुलसीदास जी ने कहा है-

सीय राममय सब जग जानी। करऊँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।

अर्थात पृथ्वी का हर जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु-पक्षी या पेड़-पौधे सभी ईश्वर का ही रूप हैं।

भगवद् गीता के अनुसार-

गीता में कहा गया है, कि जो करता हूँ ''मैं'' करता हूँ।

अर्थात ''मैं'' शब्द में ही ईश्वर छुपा हुआ है, हर व्यक्ति या जीव ईश्वर है ,जो वह खुद करता है और किये हुए कर्मों का फल उसे प्राप्त होता है।

अर्थात मनुष्य की आत्मा ही ईश्वर है, जो कुछ मनुष्य बोलता है वह मनुष्य के अंदर से ईश्वर ही बोलता है। जब आत्मा रूपी ईश्वर इस शरीर से निकल जाता है, तब शरीर सिर्फ चमड़े का एक खोल बचता है,जहाँ ईश्वर था।

अतः ईश्वर का न तो कोई रंग है ,न ही कोई रूप है ,ईश्वर सिर्फ एक दिव्य शक्ति है। ईश्वर के जो भी रूप माने गए हैं वो सब काल्पनिक है।

अतः ईश्वर अदृश्य है, जिसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। इस दिव्य शक्ति को हम ''ऊँ''नाम से सम्बोधित करते हैं। सभी धर्मों का ईश्वर एक है, जो कि अदृश्य है और हर जीव के आत्मा में निवास करता है

 

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नाम-बी.के.गुप्ता

पूरा नाम-बृज किशोर गुप्ता

पिता का नाम-श्री लक्ष्मी प्रसाद गुप्ता

शिक्षा-बी.ए.(समाज शास्त्र) एवं कम्प्यूटर पी.जी.डी.सी.ए.

जन्म तिथि-01-जुलाई सन्1982

व्यवसाय-कम्प्यूटर शिक्षक

कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स बड़ामलहरा

जिला-छतरपुर म.प्र.

लेखन की विधा-कविता ,गजल ,निबंध।

स्थाई पता-बी.के.गुप्ता

ग्राम-चन्दौरा तहसील-अजयगढ

़जिला-पन्ना(म.प्र.)

वर्तमान पता- बी.के.गुप्ता

कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स

बिजली आफिस के पास बड़ामलहरा

जिला-छतरपुर म.प्र. पिन-471311

मोब.-9755933943

-मेल-bkgupta193@gmail.com

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रेप

पानी के बुलबुले सी एक लड़की थी ॰॰॰॰

होठों पर मुस्कान लिये घर से निकली थी ॰॰॰॰

कि पड़ नजर शैतानों की॰॰॰॰

और डूब गयी नाव इंसानियत की॰॰॰॰

ओढ ली थी काली चादर आसमान ने॰॰॰॰

 

निर्वस्त्र कर दिया था भारत माँ को आज इस संसार ने॰॰॰॰

चीखें गूँजती रही मासूम सी जान की॰॰॰॰

बन गयी शिकार वो शैतानों के हवस की॰॰॰॰

कहर की अविरल धारा बहती रही॰॰॰॰

और वो ओस की बूंन्दो सी पिघलती रही ॰॰॰॰

जिस्म गलता रहा और तड़पती रही वो॰॰॰॰

आखिर बन ही गयी लाश वो॰॰॰॰

 

उसकी मृत आँखें जैसे सारा किस्सा बयां करती थी॰॰॰॰

उसके मृत होंठ सिसकते यह कहते थे कि॰॰॰॰

“ यह संसार नहीं दरिंदों का मेला है, नहीं रहना अब मुझे इस दुनिया में ,

यहाँ सिर्फ अपमान मेरा है ।”

“आज रेप मेरा नहीं इस देश का हुआ है, क्योंकि इस देश का कानून , अंधा है।”

 

उसकी मृत काया मानो चीख—चीख कर एक ही गुहार लगाती हो॰॰॰॰

“ कि तभी आग लगाना इस शरीर को॰॰॰॰

जब सुला दो इन लड़कियों में उन दरिंदों को

और दिला न पाये इंसाफ मुझे, तो सड़ जाने देना इस शरीर को ॰॰॰॰

क्योंकि जल तो गयी थी मैं , उसी दिन को॰॰॰॰

अब क्या जलाओगे तुम इस राख को —

इस राख को ”

 

अंजली अग्रवाल

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जीवन में इस तरह उदास न होना,

मिली असफलता से निराश न होना,

जीवन सुख-दुःख का पहिया है,

कभी किसी वक्त हताश न होना |

 

जीवन में आए मुश्किलों से अपने को परेशान न करना,

जीवन उतार-चढ़ाव का पर्याय है,

कवि अपने आत्मबल को कमजोर न होने देना |

 

यही है जीवन आनंद का अंदाज़,

हर किसी के जीने का असल में,

हर कोई को इस अंदाज़ को न खोने देना |

 

पत्थरों को टूटते भी देखा,

आसमां को भी रोते देखा,

सूरज की पहली किरण से,

जीवन आनंद विभोर होते हुए भी देखा |

 

इंसानियत की भाषा लिए,

दुनिया में शांति का आनंद भी देखा |

 

इंसान के संघर्ष से,

उसके व्यक्त्तिव की चमक भी देखा,

जिससे उजाला हो,

उसे जलता भी देखा,

कामयाब हुए इंसान के संघर्षपथ को भी देखा,

जो निरंतर परिश्रम करते हैं,

उनकी कामयाबी भी देखा,

जीवन में इस तरह उदास न होना,

मिली असफलता से निराश न होना,

जीवनपथ में संघर्ष कर अपने को सफल बनाना |

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AKHILESH KUMAR BHARTI

JUNIOR ENGINEER

MPPKVVCL, JABALPUR

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कोई काम आता हो या न आता हो, किसी भी प्रकार की काबिलियत हो, न हो, मानवीय संवदनाएं, संस्कार, सिद्धान्त और आदर्श से कोसों दूर हों, न अनुशासन को अपनाने की कोई जरूरत है, न किसी प्रकार की कोई मर्यादाएं।

जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों, आजकल कर्मयोग से कहीं ज्यादा प्रभाव छोड़ती है मुँह दिखाई। किसी कोने में दुबके हुए हम कितनी ही शिद्दत और समर्पण से कितना ही बड़ा भारी काम क्यों न कर लें, इस ओर न कोई देखने वाला है, न हमारे इन कामों की पूछ करने वाला कोई है।

अब काम से अधिक चेहरों का मंजर है। कुछ करो न करो, उन लोगों के आगे-पीछे लगे रहो, उन्हें बार-बार अपना चेहरा दिखाते रहो, बस यही है कर्मयोग की प्रामाणिकता और हाजरी। 

आजकल सब जगह यही सब कुछ हो रहा है। काम करने वालों से ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ चेहरे दिखाकर वाहवाही लूट लिया करते हैं, बड़े-बड़ों और महानों-प्रभावशालियों के खास हो जाते हैं तथा वह सब कुछ पा लिया करते हैं जो एक मामूली इंसान पाना चाहता है।

आजकल इंसानों के भीतर से कर्मनिष्ठा और समर्पण गायब होता जा रहा है और इसकी जगह ले ली है सिर्फ और सिर्फ मुँह दिखाई ने। यह मुँह दिखाई ही है जो कि औरों को खुश करती है, और खुद को भी खुश करने के तमाम जतन करते हुए दिली सुकून का अहसास कराती है।

बहुत सारे लोगों के बारे में साफ-साफ कहा भी जाता रहा है कि ये लोग काम-धाम में विश्वास नहीं रखते, न इन्हें अपने काम में कोई रुचि है, और न ही इन्हें कोई काम आता है।

केवल अपने वजूद को बनाए रखने की जद्दोजहद में ये लोग जिन्दगी भर अपने एकसूत्री एजेण्डे पर कायम रहते हैं और उसी पर चलते हुए पूरी जिन्दगी गुजार देते हैं और वह भी दूसरे लोगों की अपेक्षा मौज-मस्ती के साथ, बेपरवाह होकर। और वह है जहां मौका मिल जाए वहां मुँह दिखाई।

कोई सा आयोजन चाहे कहीं हो, न्यौता हो या न हो, कोई बुलाये या न बुलाये। ये लोग पहुंच जाते हैं और अपने आपको इस तरह पेश करते हैं जैसे कि पूरा का पूरा आयोजन उन्हीं को हो अथवा इसका सारा भार उन्हीं के कंधों पर हो।

ये लोग हमेशा मुख्य भूमिका में रहने का भ्रम बनाए रखते हैं और हर क्षण इसी फिराक में रहा करते हैं कि अधिक से अधिक लोगों की नज़र उन्हीं पर पड़े, और सभी लोग यही महसूस करते रहें कि आयोजन उन्हीं के दम पर हो रहा है अथवा वे ही हैं जो अतिथियों और कर्ता-धर्ताओं के साथ अत्यन्त करीब, विश्वासपात्र हैं, बड़े लोगों के मार्गदर्शक या सलाहकार हैं तथा बड़े-बड़े लोग उन्हीं के इशारों पर चलते हैं।

प्रगाढ़ आत्मीयता और विश्वासपात्रता का मिथ्या भाव दर्शाने वाले ये लोग हर हमेशा वीआईपी के करीब बने रहते हैं और यही दर्शाते रहते हैं कि वे ही लोग हैं जो पूरी दुनिया का काम करने वाले हैं और उनके बगैर न कोई कर्मयोगी है, न ही  करीबी।

तकरीबन हर क्षेत्र में आजकल यही होने लगा है। काम की बजाय नाम और चेहरे दिखाकर समय गुजारने और अपनी चलाने का शगल हर तरफ बढ़ता ही जा रहा है। बहुत सारे लोगों के बारे में सभी की धारणा होती है कि ये लोग सब जगह पहुंच जाते हैं और दिखावों के नाम पर जमाने भर में आगे ही आगे रहने के लिए हरचन्द कोशिश करते रहते हैं।

और इन लोगों के काम-काज या धंधों के बारे में पूछपरख की जाए तो कुछ और ही सामने आता है। आजकल यही मुँह दिखाई का दौर सर्वत्र चला आ रहा है। जो इसमें जितना अधिक माहिर है वह उतना ही अधिक अहंकारी होकर औरों की छाती पर मूंग दल रहा है।

वह जमाना चला गया जब अच्छे इंसान, अच्छे कर्मों और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण की कद्र हुआ करती थी। आज कर्मयोग, समर्पण और सिद्धान्तों की बजाय मुँह दिखाई का जमाना है। काम-धाम कुछ न करो, तो चलेगा।

केवल अपने चेहरे दिखाते रहो, हाँ जी-हाँ जी करते रहो और सभी को भरमाते रहो। जो बड़े कहे जाते हैं उन्हें भी काम-धाम से कोई सरोकार नहीं है, उन्हें भी भीड़ चाहिए जो उनके इर्द-गिर्द घूमती-फिरती रहकर जयगान करती रहे, झुक-झुक कर अभिवादन करती रहे, चरण स्पर्श करते हुए अपनी पूरी की पूरी श्रद्धा उण्डेलती रहे और उनके सामने पसरते हुए अपने वजूद को गिरवी रख दे।

जीने के दो ही रास्ते हैं कर्मयोग में रमे रहें और आत्म आनंद पाते हुए जीवन को धन्य करें। और ऎसा न कर सकें तो मुँह दिखाई करते हुए टाईमपास करते रहें, मौज-मस्ती में रमें रहें, इसमें कुछ भी हुनर दिखाने की कोई जरूरत नहीं, बहुत सारे लोग ऎसा ही कर रहे हैं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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हम सभी के पैदा होने का उद्देश्य लोक मंगल और विश्वोत्थान के कामों को आगे बढ़ाने में भागीदार बनना और मुक्ति पाने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना है।

जिसे मुक्ति की कामना होती है वह सारे के सारे बंधनों से परे रहता है। जीवन में सारे कर्म अनासक्त होकर करता है और वे ही काम करता है जिससे हमारी जीवन्मुक्ति का दौर बना रहे और जीवन का अंत हो जाने पर शाश्वत गति-मुक्ति हो।

लेकिन यह सब कुछ केवल सोच-विचार तक ही सीमित रहता है। इसके बाद इन बातों का कोई वजूद नहीं रहता। जब तक हम शुद्ध चित्त और निर्मल शरीरी होते हैं तभी तक हमारा मस्तिष्क ऊर्वरा और सकारात्मक वैचारिक भावभूमि से परिपूर्ण बना रहता है। 

जैसे ही हमारे दिल और दिमाग में संसार घुसने लगता है तभी से हमारा मन-मस्तिष्क और शरीर संसारी हो जाते हैं और असारी बातों का दामन थाम लिया करते हैं।

हम सभी लोगों ने इस मामले में अपनी मौलिकता को खोकर आडम्बर और बहुविध कृत्रिमता ओढ़ ली है जहाँ हम छोटे-मोटे स्वार्थों और वासनाओं का पल्ला पकड़ कर किसी न किसी विचार, व्यक्ति या संसाधन से बंध जाते हैं। और एक बार जब कोई भी किसी भी प्रकार क बंधन से सायास या अनायास बंध जाता है तब इसके बाद वह निरन्तर बंधता ही चला जाता है।

एक बार बंधन का स्वभाव पा जाने के बाद इंसान हर मामले में बंधता ही चला जाता है और वह भी ऎसा बंधन कि हम चाहे जितना सोचें, करें और प्रयासरत रहे, उन बंधनों को काटना या ढीला कर पाना कभी संभव नहीं होता।

इस मामले में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। स्वार्थ, मोह और आसक्ति के पाशों से जकड़ा रहने वाला इंसान कोई भी हो सकता है। जिसका जितना बड़ा स्वार्थ उतनी अधिक गहरी आसक्ति का भाव। इस मामले में सारे के सारे सरीखे हैं। 

हर कोई प्राणी आजादी, मस्ती और आनंद के साथ जीना चाहता है लेकिन वह अपने इन मौलिक गुणों का इस्तेमाल करते हुए जीने तथा जियो और जीने दो के सिद्धान्त का पालन करने की बजाय दूसरों के भरोसे अपने आपको आनंदित और मस्त रखना चाहता है।

कई बार अपने घृणित और तुच्छ स्वार्थ को लेकर वह किसी की भी गुलामी करने लग जाता है, कभी दूसरों के दिखाये प्रलोभन के आगे घुटने टेक देता है, कुछ पाने के लिए वह आपको समर्पित कर देता है, कभी दबावों में झुक जाता है और अधिकांश बार किसी न किसी आकर्षण के मारे किसी न किसी से बंध जाता है। और बंधता भी ऎसा है कि लाख कोशिश कर ले, छूट नहीं पाता।

इंसान अपने आप में संप्रभु और स्वतंत्र अस्तित्व वाला प्राणी है जो सामाजिकता की वजह से समाज के बंधनों को स्वीकार करता है, मर्यादाओं को पालता है । जो अपने आत्म अनुशासन में रहता है वह स्वतंत्रतापूर्वक मस्ती के साथ जीवनयापन का आनंद पा लेता है लेकिन जो अनुशासनहीनता और स्वेच्छाचार अपना लेता है अथवा किसी न किसी नाजायज इच्छा की पूर्ति या ऎषणाओं के जंगल में भटक जाता है उसके लिए दूसरों का सहारा लेना जीवन की सबसे बड़ी और अपरिहार्य विवशता हो जाता है।

ऎसा इंसान अपने आपको घर-बाहर सब जगह बंधनों में ही घिरा पाता है। आज के जमाने में हम सभी लोग अपनी कामनाओं और स्वार्थों से इतने अधिक घिर गए हैं कि हमारे चारों तरफ दबावों, प्रलोभनों और आकर्षणों के पाशों का पूरा का पूरा नेटवर्क पसरा हुआ है।

मामूली ऎषणाओं की पूर्ति के लिए हम जाने कैसे-कैसे सडान्ध भरे समझौते करने लगते हैं, किन-किन नुगरों, नालायकों और कमीनों से समीकरण बिठाते रहते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। यही नहीं तो निन्यानवें और चार सौ बीसी के फेर में हम क्या कुछ नहीं करते जा रहे हैं।

यह सारे बंधन हमारे ही पैदा किए हुए हैं अन्यथा ऎसी कौन सी शक्ति है जो इंसान को किसी न किसी से बांधे रखे, किसी का दास बनाकर रखे और पूरी की पूरी आजादी छीन कर गुलाम बना दे। और गुलाम भी ऎसा कि वह न बोल सके, न देख सके और न ही कोई प्रतिक्रिया कर सके।

हम सभी लोग मर्यादाओं और अनुशासन की परिधियों में हर मामले में स्वतंत्र और मुक्त हैं लेकिन अपने स्वार्थों, कुटिलताओं और षड़यंत्रों ने हमें कहीं का नहीं रहने दिया है। हम भले ही अपने को कितना ही महान और प्रतिष्ठित क्यों न समझते रहें, आखिरकार किसी न किसी मामले में कोई न कोई बंधन हम पर हावी है ही। और ये सारे बंधन हमने स्वेच्छा से ओढ़ रखे हैं वरना हमारी आजादी छीनने की हिम्मत किस में है।

हममें से हरेक आदमी अपना आत्म मूल्यांकन करे तो पाएंगे कि सारे बंधन हमने ही आदर सहित स्वीकार किए हुए हैं। और ये बंधन ही हैं जिनकी वजह से हम सारे मशीन बने हुए किसी न किसी बाड़े के दास या गुलाम की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

मुक्ति का सफर चाहें तो इन बंधनों को एक-एक कर छोड़ें और आत्मस्थिति में आएं,  अपने भीतर के उस इंसान को जानें जिसे ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है। अपनी शक्तियों और कर्मयोग को पहचानें तथा सारे आत्म स्वीकार्य बंधनों को एक तरफ फेंक कर खुद भी मुक्ति का अहसास करें और अपने संपर्क में आने वाले तमाम प्राणियों को भी मुक्ति का मार्ग दिखाएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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    करवा चौथ - लौटा फिर से प्यार

चंदा देख रही चंदा में, सजन की सूरत, सजन का प्यार
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
  चंदा ढ़ूंढ़ रही चंदा को, दूर गगन के पार,
  निराहार दिन भर से फिर भी, न माँगे संसार,
  लंबी उम्र सजन की माँगे, माँगे सच्चा प्यार।
  आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।
करवॉ चौथ, पावन गंगा सा, निर्मल जिसकी धार,
जिनके साजन रूठ गये थे, चंदा के संग वे भी लौटे,
                      लौटा फिर से प्यार।
आज सुहागिन सजी है फिर से, फिर से किये सिंगार।

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                याद फिजा़ में रहती हैं.....

आती-जाती साँसें मुझसे, चुपके से कुछ कहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   अंग-अंग में घाव लगे हों, पोर-पोर भी घायल हो,
   मन भारी हो धरा के जितना, फिर भी सब कुछ सहती हैं...
   आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
इन नयनों से जो कुछ दिखता, वो तो केवल नश्वर है...
भूख, प्यास, एहसास शाश्वत, इन्हीं की नदियां बहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
   दूर कहीं से बिन बोले ही, बाँह पसारे आती है,
   गोद बिठाकर सबको इक दिन, दूर कहीं ले जाती है....
   सदियों से वो लगी हुई है, सब कुछ करके देख लिया...
   नींद भी संग में ले गई अपने, सपने यहीं पे छूट गये,
   आशा-तृष्णा बचीं यहीं पर, आस-पास ही रहती हैं...
   आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
आती-जाती लहरें तट पर, ठहर-ठहर कुछ कहती हैं,
संग चलो पाताल दिखा दूं, आसमान से कहती हैं...
मंद-मंद पवन के झोंके, कलियों से कुछ कहते हैं...
फूलों के संग-संग भँवरे भी, घाव सदा ही सहते हैं...
पत्थर दिल इंसानों में भी, सपने अक्सर नर्म हुये,
दिल में ठंडा बर्फ है फिर भी, आंसू अक्सर गर्म हुये....
ऋतुऐं तो आनी-जानी हैं, यहां तो खुशबू बहती हैं...
आनी-जानी काया लेकिन, याद फिजा में रहती हैं
       
                        ''सनातन''
                     कैलाश प्रसाद यादव       

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    उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के अनेक उपक्रम संचालित हो रहे हैं। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों में यह अभियान चला हुआ है। करोड़ों रुपयों के विज्ञापन प्रकाशित किये और कराये जा रहे हैं। उपभोक्ताओं की श्रेणी में उन्हें रखा जा रहा है जो टीवी, फ्रिज, कूलर से लेकर दवाएं खरीदते हैं। इस श्रेणी में संभवतः पत्र-पत्रिकाएं और केबल कनेक्शन लेने वालों को शामिल नहीं किया गया है। इसका कारण शायद इनकी श्रेणी अलग है क्योंकि इन्हें उपभोक्ता न कहकर पाठक और दर्शक कहा जाता है अर्थात इनका संबंध बाजार से न होकर बौद्धिक दुनिया से है। कानून की भा में भले ही ये उपभोक्ता नहीं कहलाते हों किन्तु प्राथमिक रूप से यह उपभोक्ता की ही श्रेणी में आते हैं। पढ़ने के पहले की प्रक्रिया पत्र-पत्रिका खरीदना अथवा केबल कनेक्शन के लिये तयशुदा रकम चुकाना है, ऐसे में वे पहले उपभोक्ता होते हैं और बाद में पाठक या दर्शक। पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी लम्बे समय से की जा रही है, वह अन्यायपूर्ण है बल्कि ये पाठक और दर्शक तानाशाही के शिकार हो चले हैं। सीधे तौर पर पाठक और दर्शकों के हिस्से में सेंधमारी का मामला साफ नहीं होता है किन्तु मैंने अपने अध्ययन में पाया है कि एक साल में पाठकों के हिस्से में लगभग पच्चीस फीसदी हक पर सेंधमारी की जाती है।

    सभी अखबारों की कीमत तय है, वैसे ही जैसे साबुन की टिकिया की। वह कम या ज्यादा हो सकती है किन्तु यह प्रबंधन का फैसला है कि वह अखबार की कीमत क्या तय करे किन्तु जो कीमत तय की जाती है, वह पाठकों से वसूली जाती है। कीमत में कमी अथवा बढोत्तरी भी की जाती है। यह सब ठीक है किन्तु जब तयशुदा कीमत आप वसूल रहे हैं तो आपकी जवाबदारी बन जाती है कि जितने पन्नों के अखबार का वायदा किया है, वह पाठकों को दिया जाए। पन्ने ही नहीं बल्कि खबरों वाले पन्ने दिये जाएं किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है। हमें पढ़ाया गया है, बताया गया है कि किसी समय अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के लिये एक हिस्सा तय होता था। पहले अस्सी प्रतिशत खबरें और बीस प्रतिशत विज्ञापन और बाद में यह प्रतिशत बदल गया और साठ प्रतिशत खबरें और चालीस प्रतिशत विज्ञापन की जगह हो गई। शायद अभी भी यही फार्मूला काम कर रहा है किन्तु कागज में, वास्तविकता में नहीं। अखबार जब तब पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर देते हैं।

    हर साल एबीसी अर्थात आडिट ब्यूरो सर्कुलेशन पड़ताल कर यह जानकारी देता है कि किन अखबारों की बिक्री में कितना इजाफा हुआ अथवा कितना ग्राफ उसका गिरा। एबीसी मशीन पर छपने वाले अखबार की प्रतियों गिनने के बाद अपना निर्णय सुनाता है। लिहाजा हर अखबारों की संख्या अलग अलग होती है तथा इसमें भी शहरवार अलग अलग होते हैं। एबीसी के ये आंकड़ें प्रबंधन तक होते हैं, आंकड़ों को सार्वजनिक करने का काम उनका नहीं है किन्तु अपनी श्रेष्ठता सिद्व करने के लिये अखबार वाले तत्काल एक पूरा पेज कौन किससे आगे, कौन किससे पीछे और वे किस मायने में श्रेष्ठ हैं बताने के लिये छाप देते हैं। साल में एक बार पूरा का पूरा पेज जो खबरों के लिये होता है, पाठकों के हिस्से में सेंधमारी कर स्वयं की वाहवाही में निकाल दिया जाता है।

    यह तो एक उदाहरण मात्र है। उत्सव के समय तो विज्ञापनों के बीच खबरों को तलाश करना पड़ता है। दीपावली के पांच दिनों के अखबारों का विश्लेशण करेंगे तो पाएंगे कि बीस प्रतिशत खबरें होती हैं और अस्सी प्रतिशत विज्ञापन किन्तु अखबार के मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता है। कई बार का अनुभव यह रहा है कि विज्ञापनों के लिये वद्वि किये पन्ने की कीमत भी पाठकों से वसूल कर ली जाती है। इसे कहना चाहिए आम के आम और गुठलियों के दाम भी प्रबंधन ले लेता है। इसी तरह चुनाव के समय अखबारों में भी पाठकों के साथ अन्याय होता है तो राजनीतिक दलों में नियुक्तियां, आगमन, स्वागत आदि के पूरे पूरे पन्ने का विज्ञापन प्रकाशित कर खबरों को कम कर दिया जाता है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की अधिसूचना प्रकाशन के समय भी अतिरिक्त पष्ठ नहीं जोड़े जाते हैं। एक तरफ तो विज्ञापन प्रकाशित कर पाठकों के हिस्से में सेंधमारी की जाती है तो दूसरी तरफ रविवार के परिशिष्ट की कीमत सामान्य दिनों से अतिरिक्त वसूली जाती है।

    पेड न्यूज का हल्ला मचाने वाले लोगों को इस बात का इल्म नहीं होगा, यह कहना गैरवाजिब है किन्तु पाठकों के हक में जो सेंधमारी हो रही है, उसके बारे में खामोश बने रहना ठीक नहीं है। पाठकों की हिस्सेदारी में सेंधमारी का एक और तरीका है पाठकों की राय के बिना नियमित स्तंभों को बदलना। इस बारे में कुछ लोगों से बात करने पर उनका यह कहना था कि यह प्रबंध का सर्वाधिकार है कि वह अखबार को किस तरह निकालता है अथवा में उसमें संशोधन करता है जब कुछ लेखक और पाठकों से बात की गई तो उनका कहना था कि अखबार प्रकाशन में लाभ का मामला प्रबंधन का हो सकता है किन्तु अखबार तो पाठक की पसंद और उसकी जरूरत के अनुरूप्‌ निकलना चाहिए। इस बारे में उनका कहना था कि हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी की अनुदित सामग्री प्रकाशित की जा रही है जिससे हिन्दी के मूल विचारों से पाठकों का वास्ता खत्म हो रहा है।

एक बड़े वर्ग की चिंता पाठकों के पत्र कॉलम को लेकर भी जाहिर हुई। इस वर्ग का कहना यह था कि पाठकों के पत्र के माध्यम से न केवल विचारों का आदान प्रदान होता था बल्कि वह समस्याएं जिनका हल मुद्दत से नहीं होता था, उसके निदान में भी मदद मिलती थी। अब पाठकों के पत्र औपचारिक रूप से प्रकाशित किये जा रहे हैं। इस वर्ग की चिंता इस बात को लेकर भी थी कि इससे पाठकों की हिस्सेदारी खत्म हो रही है जो अखबारों की गंभीरता के लिये खतरनाक है।  पाठकों के हिस्से पर सेंधमारी के सवाल पर महिला पाठकों से चर्चा करने पर यह बात भी सामने आयी कि जो अखबार प्राथमिक शाला की भूमिका में थे, उनका लोप हो गया है बल्कि अपनी बिक्री बढ़ाने के लिये ईनाम बांटे जा रहे हैं। अखबारों से हम बाजार से सौदा कैसे करें सीखते थे किन्तु अखबारों की यह सामाजिक जवाबदारी भी कम होती जा रही है। बाजार में ठगने से कैसे बचें, लालच में खरीददारी नहीं करें जैसे नैतिक बातें सिखाने वाले अखबार स्वयं लालच देकर अखबार बेचने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

    लगभग सभी पाठकों को इस बात की निराशा थी कि हर अखबार अपने आपको सर्वाधिक लोकप्रिय बताने पर जुटा है किन्तु सबका दावा पाठक संख्या पर है न कि बिक्री पर। अखबारों का स्लोगन होता है कि उनकी पाठक संख्या कितनी है। इस बारे में मीडिया पर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों से हुई बातचीत में उनका कहना था कि अपने को श्रेश्ठ बताने का यह शॉर्टकट रास्ता है।  मैंनेजमेंट की टर्मानोलॉजी के मुताबिक एक परिवार पांच सदस्यों का माना जाता है और एक अखबार के पांच पाठक होते हैं। इसी तरह सार्वजनिक स्थलों पर अखबारों का पठन पाठन करने वालों की संख्या को अखबार चौगुनी करके देखता है और इस हिसाब से वह तुलना कर अपनी प्रसार संख्या के स्थान पर पाठकों की संख्या बता देता था।

    पाठकों के हिस्सेदारी में सेंधमारी के संदर्भ में अध्ययन के दौरान मुझे याद आया कि अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में हम लोगों को सिखाया जाता था कि अखबार के पाठक नहीं बल्कि पाठकों की आंखों की संख्या से अखबार की रीडरशिप गिनी जाए अर्थात एक व्यक्ति की दो आंखें और पाठक पाठक यानि दस आंखें। हालांकि यह बातें हमें अखबार की सामाजिक एवं नैतिक जिम्मेदारी के मद्देनजर बताया जाता था कि हमारी एक गलती से किसी भी व्यक्ति की मानहानि किस स्तर पर और कैसे हो सकती है जिसकी भरपाई करना अखबार के लिये नामुमकिन होगा। तथ्यों की पड़ताल और संबंधित व्यक्ति का पक्ष सुन लेने के बाद खबर लिखना चाहिए। हालांकि तीस वर्श पुरानी पत्रकारिता की नैतिक बातें आज भी उतनी मूल्यवान हैं किन्तु व्यवहार से परे हो चली हैं। फिलवक्त चिंता इस बात की है कि पाठकों की हिस्सेदारी पर जो सेंधमारी हो रही है, उसे कैसे रोका जाए। यह चिंता मामूली नहीं है क्योंकि साबुन की टिकिया एक समय के बाद अपना अस्तित्व खो देती है किन्तु एक अखबार इतिहास बन जाता है और इतिहास में पाठकों के हिस्से की सेंधमारी हिस्सा न बन पाये, इसकी चिंता पाठक को, पत्रकार को और प्रबंधन को करना होगी

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका "समागम" के संपादक है } मोबाइल. 9300469918 

इमेज का दुखियारा : भारतीय लेखक

श्रीलाल शुक्ल

भारतीय भाषाओं में जब साहित्यकार के संघर्षशील क्षणों या उसके गर्दिश के दिनों का प्रसंग आता है, तो वह प्रायः उसकी गरीबी या अभावों का प्रसंग होता है, अपने परिवेश से टकराने या रचना-प्रक्रिया के तनावों को झेलने का नहीं. संघर्षशील साहित्यकार की एक खास तस्वीर बन गयी है जिसमें वह कविता या कहानी या उपन्यास नहीं लिखता, वह साहित्य-सेवा या साहित्य-साधना करता है. गरीबी और अभाव की स्थिति उसके साहित्यिक कृतित्व को अतिरिक्त गरिमा देती जान पड़ती है. एक तरह से साहित्यकार के हक में गरीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है.

साहित्यकार के प्रति स्वाभाविक सहानुभूति होने के बावजूद मुझे उसकी गरीबी का अनावश्यक गरिमा मंडन अप्रिय लगता रहा है. ‘वह तोड़ती पत्थर’ की नायिका और उसके रचयिता का अपना विशिष्ट महत्त्व मानते हुए भी मैं यह नहीं जान पाया हूं कि पत्थर तोड़ने वाली के आर्थिक संघर्ष से निराला का आर्थिक संघर्ष वस्तुतः भिन्न है या वह किसी अतिरिक्त चिंता का विषय है. बुनियादी तौर पर चिंतन का विषय अगर कोई है तो देानेां की जड़ में मौजूद वह व्यवस्था है जो शोषण के सिद्धांत पर पनप रही है.

वास्तव में भारत जैसे देश में गरीब या बेरोजगार होना बड़ी बात नहीं है. तभी जब कोई लेखनीधारी नागरिक अपनी विपन्नता के आत्मदयापूर्ण विवरण पेश करता है तो मुझे लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से उन सबका अपमान कर रहा है जो उससे भी कड़े अभावों को झेल रहे हैं पर उसकी तरह आत्म-प्रकाशन नहीं कर पा रहा है.

(‘यह प्यार मेरा नहीं’ में संकलित ‘अपने बारे में’ शीर्षक टिप्पणी से साभार)

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साहित्यिक समाचार

 

काव्य गोष्ठी

मीरजापुरः 21(जून 2015) योग दिवस पर सायं शवपुरी कालोनी, (स्टेशन रोड) में लालव्रत सिंह सुगम के आवास पर काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसकी अध्यक्ष्ता प्रभुनारायन श्रीवास्तव ने और संचालन सुरेश चंद्र वर्मा विनीत ने किया.

आरम्भ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की महत्ता पर वक्ताओं ने प्रकाश डाला. फिर गणेश गम्भीर, केदारनाथ सविता, भोलानाथ कुशवाहा, प्रमोद कमार सुमन, भानु कुमार मुंतजिर, शुभम् श्रीवास्तव, प्रमोद चंद्र गुप्त, श्याम अचल, पूनम केशरी आदि ने अपनी सुंदर कविताओं का पाठ किया. इस अवसर पर आनन्द केशरी, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, पीयूष दत्त सिंह, अमरनाथ सिंह आदि उपस्थित रहे.

मीरजापुरः 27 जून 2015 वासलीगंज स्थित भानु कुमार मुंतजिर के आवास पर सायं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता प्रभुनारायण श्रीवास्तव ने और संचालन शुभम् श्रीवास्तव ने किया. गोष्ठी में केदारनाथ सविता, भोलानाथ कुशवाहा, आनन्द संधिदूत, गणेश गम्भीर, प्रमोद कुमार सुमन, भानु कुमार मुंतजिर आदि ने अपनी एक से बढ़ कर एक कविताओं को प्रस्तुत किया. गोष्ठी में भोलानाथ कुशवाहा के तीन काव्य-संग्रहों की चर्चा हुई. प्रमोद कुमार सुमन और केदारनाथ सविता के काव्य संग्रह भी इस वर्ष प्रकाशित होने जा रहे हैं. दोनों काव्य-संग्रहों की चुनिंदा रचनाओं का पाठ किया गया.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता, मीरजापुर

राजस्थान का प्रथम ‘‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजनाग्राम’’ बना झुन्झूनू का बाय गांव

नवलगढ़ः आज का दौर बेटियों का है. बेटियां समाज में नित नये मुकाम हासिल कर रही हैं. बेटियों की समृद्धि और खुशहाली में ही समाज का भविष्य टिका हुआ है. इसीलिए बेटियों की उच्च शिक्षा और उनके विवाह में सुविधा के लिए 10 वर्ष तक की बेटियों हेतु डाकघरों में सुकन्या समृद्धि योजना आरंभ की गयी है. उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने झुंझुनू के नवलगढ स्थित बाय गांव में सुकन्या समृद्धि योजना के लिये 7 अगस्त को आयोजित मेले में व्यक्त किये.

मुख्य अतिथि के रूप में अपने सारगर्भित सम्बोधन में राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ के अंतर्गत बालिकाओं के राष्ट्र निर्माण पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि सुकन्या समृद्धि योजना सिर्फ निवेश का एक माध्यम नहीं है, बल्कि यह बालिकाओं के उज्ज्वल व समृद्ध भविष्य से भी जुडा हुआ है. इस योजना के आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक आयाम महत्वपूर्ण हैं. इसमें जमा धनराशि पूर्णतया बेटियों के लिए ही होगी, जो उनकी शिक्षा, कैरियर एवं विवाह में उपयोगी होगी. श्री यादव ने कहा कि 21वीं सदी में बेटियों की भूमिका अहम् हो गई हैं और सुकन्या समृद्धि योजना बेटियों के सपनों को पूरा करने का सशक्त माध्यम है. उन्होंने कहा कि हर बेटी को उसके जन्म पर अभिभावकों द्वारा सुकन्या समृद्धि खाता उपहार स्वरूप देकर नई परम्परा का सूत्रपात करना चाहिये.

इस अवसर पर झुन्झूनू मण्डल के अधीक्षक डाकघर श्री के.एल. सैनी ने कहा कि यह स्कीम 10 साल तक की बच्चियों के लिए है. इसमें एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 1000 और अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक जमा किये जा सकते हैं. इस योजना में खाता खोलने से मात्र 14 वर्ष तक धन जमा कराना होगा. ब्याज दर 9.2 प्रतिशत है और जमा धन राशि में आयकर छूट का भी प्रावधान है.

कार्यक्रम की विशिष्ठ अतिथि श्रीमती तारापूनिया, सरपंच बाय ग्राम पंचायत ने इस योजना की भूरि-भूरि प्रशंसा कर लोकप्रिय एवं कल्याणकारी योजना बताया तथा कहा कि बालिकाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया यह प्रयास एक मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने कहा कि यह अत्यन्त ही सौभाग्य की बात है कि इस गांव की 10 वर्ष तक की समस्त योग्य बालिकाओं के सुकन्या खाते खोलकर, उनका गांव राजस्थान का प्रथम ‘‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजना ग्राम’’ बन गया है.

इस दौरान बाय गांव की समस्त कुल 215 बालिकाओं के खाते खोले गये. इसके बाद झुंझुनू का बाय गांव राजस्थान का प्रथम सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि योजना गांव बन गया है. उपस्थित बच्चियों व उनके अभिवावकों को निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने पास बुकें व उपहार देकर उनके सुखी व समृद्ध भविष्य की कामना की. इस अवसर पर डाक निदेशक के. के. यादव ने सरपंच श्रीमती तारापूनिया के प्रयासों की सराहना की और आशा व्यक्त की कि बेटियों के लिए ऐसे प्रयास अन्य गांवों में भी किये जायेंगे. श्री यादव ने श्रीमती पूनिया को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित भी किया.

स्वागत संभाषण झुन्झूनू मण्डल के अधीक्षक डाकघर श्री के.एल. सैनी द्वारा, आभार ज्ञापन सहायक अधीक्षक डाकघर श्री जी. एन. कनवाडिया द्वारा एवं कार्यक्रम का संचालन श्री एस. के. पोरवाल द्वारा किया गया. इस अवसर पर क्षेत्रीय कार्यालय जोधपुर के सहायक अधीक्षक पुखराज राठौड़, निरीक्षक डाक राजेन्द्र सिंह भाटी, नवलगढ़ उपमंडल के निरीक्षक आर. पी. कुमावत, श्री अनिल मीणा, ग्रामीण डाक सेवक शाखा डाकपाल बाय तथा डाक विभाग के तमाम अधिकारी-कर्मचारियों के साथ स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक व अध्यापक भी शामिल हुए.

प्रस्तुतिः के. एल. सैनी, झुंझनू (राज.)

आचार्य रत्नलाल विज्ञानुग स्मृति अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता के अन्तर्गत ‘शब्द निष्ठा सम्मान’ के विजेता

प्रथम ग्यारह समूह-प्रत्येक को रु. 5000/- मानदेय व एतदर्थ प्रकाशित पुस्तक की 10 प्रतियां.

1. हैदराबाद के श्री विजय कुमार सम्पत्ति की कहानी- ‘अमृत वृद्धाश्रम’, 2. पटना के श्री अशोक कुमार प्रजापति की कहानी- ‘अपने-अपने स्वर्ग’ 3. पिलानी (राजस्थान) की श्रीमती वंदना शुक्ला की कहानी- ‘सहर होगी किसी स्याह रात के बाद’ 4. जयपुर के श्री हरदान हर्ष की कहानी- ‘पिघलते हिमखण्ड’ 5. नोहर (राजस्थान) की श्रीमती कीर्ति शर्मा की कहानी- ‘जौहरा आपा’ 6. नरसिंहपुर (म.प्र.) के राकेश माहेश्वरी की कहानी- ‘मुस्कान की करवटें’ 7. इन्दौर की डॉ. प्रेम कुमार नाहटा की कहानी- ‘अप्रासंगिक’ 8. लखनऊ की डॉ. अमिता दुबे की कहानी -‘लड़खड़ाते कदम’ 9. पुणे के श्री राजेन्द्र श्रीवास्तव की कहानी- ‘पूरी लिखी जा चुकी कविता’ 10. धार (म.प्र.) के श्री निसार अहमद की कहानी- ‘धुंधली यादें और सिसकते जख्म’ 11. जयपुर के श्री रत्न कुमार सांभरिया की कहानी-‘हिरणी’

द्वितीय समूहः प्रथम ग्यारह समूह की बेहतरीन कहानियों के करीबीः-

1. पंतनगर (उत्तराखंड) की श्रीमती किरण अग्रवाल की कहानी- ‘न हन्यते’ 2. मुंबई के श्री इश्तियाक सईद की कहानी- ‘फिरंगी’ 3. लालमादड़ी (राजस्थान) के श्री माधव नागदा की कहानी- ‘आत्मवत् सर्वभूतेशु’ 4. नई दिल्ली के श्री रणीराम गढ़वाली की कहानी- ‘घरबैंस’ 5. अहमदाबाद की श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ की कहानी- ‘फतह’ 6. दिल्ली के श्री विवेक मिश्र की कहानी- ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ 7. लखनऊ की श्रीमती अलका प्रमोद की कहानी- ‘सच क्या था’ 8. जयपुर के श्री भगवान अटलानी की कहानी- ‘हत्या’ 9. बीकानेर (राजस्थान) के श्री हरदर्शन सहगल की कहानी- ‘लुटे हुए दिन’ 10. पटना की श्रीमती विद्या लाल की कहानी- ‘बिगड़ैल लड़की’ 11. अलवर (राजस्थान) की श्रीमती राजश्री अग्रवाल की कहानी- ‘स्रावित मूल’ 12. भिलाई के श्री परदेशी लाल वर्मा की कहानी- ‘पकड़’

तृतीय समूहः उल्लेखनीय कहानियां-

1. जबलपुर के श्री राकेश भ्रमर की कहानी- ‘पटाक्षेप’ 2. भरतपुर (राजस्थान) के श्री अशोक सक्सेना की कहानी- ‘दस्तूरी’ 3. रावतभाटा (राजस्थान) के श्री श्याम कुमार पोकरा की कहानी- ‘भ्रूण हत्या’ 4. जयपुर की डॉ. रीता सोलंकी की कहानी- ‘अपराजिता’ 5. शिमला के श्री सुदर्शन वशिष्ठ की कहानी- ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ 6. छिन्दवाणा (म.प्र.) के श्री देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी- ‘गुमशुदगी’ 7. गाजियाबाद (उ.प्र.) के श्री मनीष कुमार सिंह की कहानी- ‘अतीतजीवी’ 8. जयपुर की श्रीमती नीलिमा टिक्कू की कहानी- ‘मिट्टी की खुशबू’ 9. पलवल (हरियाणा) के डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार की कहानी- ‘इक बंध चलै जंजीर’ 10. रायपुर (छ.ग.) की श्रीमती उर्मिला शुक्ला की कहानी- ‘फूल गोदान के’ 11. जयपुर के श्री संदीप माली की कहानी- ‘दूजी मीरा’ 12. जयपुर की डॉ. आशा शर्मा की कहानी- ‘पहचान’ 13. जयपुर की श्रीमती कमलेश माथुर की कहानी- ‘एक पल ठिठका हुआ.’ 14. गुडगांव (हरियाणा) के श्री मुकेश शर्मा की कहानी- ‘नेकी कर, दरिया में मत डाल’ 15. उज्जैन (म. प्र.) के डॉ. राम सिंह यादव की कहानी- ‘मनीषा नहीं, रेखा हूं’ 16. वाराणसी (उ. प्र.) के डॉ. अभिताभ शंकर राय चौधरी की कहानी- ‘कोसी सतलज एक्सप्रेस’ 17. बहराइच (उ. प्र.) के श्री राजेश मलिक की कहानी- ‘गांधी के आंसू’ 18. दौसा (राजस्थान) के श्री अंजीव अंजुम की कहानी- ‘अस्थि कलश’ 19. जयपुर के श्री हरिशंकर शर्मा की कहानी- ‘एक अधूरा सफर’ 20. सोहागपुर (म. प्र.) के डॉ. गोपाल नारायण आप्टे की कहानी- ‘बुद्ध रिपोर्ट’ 21. अमरावती (महाराष्ट्र) के श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की कहानी- ‘सांप’ 22. जोधपुर (राजस्थान) के श्री मुरलीधर वैष्णव की कहानी- ‘तीसरा वज्रपात’ 23. मंडी (हि. प्र.) के श्री मुरारी शर्मा की कहानी- ‘ढोल नगाड़ा’ 24. लखनऊ के श्री नवनीत मिश्र की कहानी- ‘झूठी सच्ची हथेलियां’ 25. यमुनानगर के श्री ब्रह्मदत्त शर्मा की कहानी- ‘अपना अपना डर’ 26. जोधपुर के श्री कन्हैयालाल देव की कहानी- ‘दामिनी’ 27. अजमेर की डॉ. शमा खान की कहानी- ‘कान्हा’ 28. जोधपुर की डॉ. जेबा रशीद की कहानी- ‘चिड़िया एक मां’.

उक्त तीनों समूहों के सभी 51 कथाकारों को एक-एक श्रेष्ठ कथा शिल्पी का प्रमाण-पत्र व सभी 84 प्रतिभागियों को पुस्तक दीपावली से पूर्व रजिस्टर्ड डाक से प्रेषित कर दी जाएगी.

प्रस्तुतिः- डॉ. अखिलेश पालरिया, सरवाड़ (राज.)

 

 

डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने लिखी साहित्य की नई इबारत-डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव

जोधपुरः हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बना चुके मुंशी प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे. ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था. पोस्टमास्टर जनरल कार्यालय में प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित एक समारोह में उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं और हिंदी साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये. डाक निदेशक श्री यादव ने कहा कि डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत लिखी. जब प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाक मुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे, उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी.

निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था. प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के

धरातल पर उतारा. प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं. प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शो-िात वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं. उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेता नजर आता है.

श्री यादव ने कहा कि प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा. राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहं वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो. कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढ़ते नजर आते हैं.

इस दौरान डाक विभाग के तमाम अधिकारीगण, कर्मचारी, साहित्यकार मौजूद थे.

प्रस्तुतिः तरुण कुमार शर्मा, जोधपुर

प्रेमचंद जयंती पर बृज मोहन का एकल कथा पाठ

झांसीः मुंशी प्रेमचंद की 135वीं जयंती पर बुन्देलखण्ड साहित्य कला अकादमी ने वरिष्ठ साहित्यकार वल्लभ सिद्धार्थ के मुख्य आतिथ्य तथा वरिष्ठ कवि डॉ. रामशंकर भारती की अध्यक्षता में एकल कथा पाठ का आयोजन किया. जिसमें सुपरिचित कथाकार बृज मोहन ने कहानी ‘चंगुल में तीमारदार’ का पाठ किया. मुख्य अतिथि वल्लभ सिद्धार्थ ने कहा कि प्रेमचंद के बाद कहानी में विषय की विविधता तथा दृष्टि का विकास तो भरपूर हुआ, किंतु किस्सागोई निरन्तर गायब होती गई. खासतौर से इधर एक ढर्रे की कथाएं निजी प्रतिबद्धता से लिखी जाने लगी हैं. चिंता की बात यह है कि इनमें हाशिये पर खड़ा आदमी कहीं दिखाई नहीं देता. इस मामले में बृज मोहन की कथा का पात्र और तानाबाना हमें आश्वस्त करता है. श्री सिद्धार्थ ने कथा में भाषा-शिल्प तथा संप्रेषण को दुरुस्त बताते हुये कहा-कि कथा कल्पना या फन्तासी के भ्रम से पाठकों को दूर ले जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रेमचंद का समय लौटकर नहीं आयेगा, किन्तु वैसी किस्सागोई अवश्य आ सकती है, बशर्ते कथाकार अपने दृष्टिकोण कोे हाशिये से ओझल पात्रों पर केन्द्रित कर लें. ऐसे पात्र शहर, गांव और महानगरों में बिखरे पड़े हैं. चर्चा में वरिष्ठ कथाकार अशोक पाण्डेय, प्रसन्नकुमार नायक, ब्रह्मादीन ‘बन्धु’, साकेत सुमन चतुर्वेदी, अजयकुमार दुबे आदि ने भाग लिया. प्रतिभागी रचनाकारों ने कहानी की बहुकोणीय जांच-परख करते हुये आमन्त्रित कथाकार को सुझाव भी दिये. कथा पर उठाये गये प्रश्नों तथा सुझावों को लेकर कथाकार ने अपना पक्ष स्पष्ट किया. संस्था की ओर से अतिथि कथाकार बृज मोहन को मुंशी प्रेमचंद सम्मान से अलंकृत किया गया. इस अवसर पर संस्था ने मुख्य अतिथि व अध्यक्ष को भी शॉल एवं स्मृतिचिन्ह्व भेंट कर सम्मानित किया.

इसके पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण किया. संस्था अध्यक्ष कवयित्री कुन्ती हरीराम ने अतिथियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम के औचित्य पर पत्रकार वाई. के. शर्मा ने संक्षिप्त प्रकाश डाला. अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. रामशंकर भारती ने कहा कि गोष्ठी में प्रस्तुत कथा मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ के डॉ. चषा के निर्मम बर्ताव की याद दिलाती है. प्रेमचंद व बृज मोहन की कथा में वर्णित पात्र गांव से ही आते हैं. दोनों में चिकित्सा पेशे की अमानवीयता उपस्थित है. इन अर्थों में यह आयोजन सार्थक परिणति तक पहुंचता है. गोष्ठी में प्रख्यात चित्रकार कामिनी बघेल, जनकवि नाथूराम साहू ‘कक्का’, सलीम शेख, अलख प्रकाश साहू, अंकित अग्रवाल आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन दायित्व प्रेमकुमार गौतम ने निर्वाह किया. आभार ज्ञापन संस्था के सचिव एस.पी. सिंह ‘सत्यार्थी’ ने किया।

प्रस्तुतिः प्रेमकुमार गौतम (झांसी)

वरिष्ठ कवि मनोज शुक्ल मनोज का सुयश

कनाडाः कनाडा के टोरेन्टो शहर में विगत दिनों विश्व हिन्दी संस्थान के तत्वाधान में अन्तर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका प्रयास के प्रधान संपादक वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. सर सरन घई जी के 65वें जन्म दिवस एवं सेवानिवृत्ति पर रिद्धि-सिद्धि मंदिर में एक भव्य कार्यक्रम के अंतर्गत कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. काव्य पाठ में बॉलीवुड के श्री संदीप नागपाल बाम्बे, मनोज शुक्ल ‘मनोज’ जबलपुर (म. प्र.) सरन घई, भारतेन्दु, देवेन्द्र मिश्र, कैलाश भटनागर असर अकबर कुरैशी इलाहाबादी, सविता अग्रवाल, भगवत शरण

अध्यक्ष हिन्दी साहित्य सभा, कुलदीप, सुधा मिश्र, राजेश माहेश्वरी, निर्मल लाल, सुरेन्द्र पाठक, अजय पराशर गौड़, मीना चोपड़ा सरोजनी जौहर राजकुमारी शर्मा आदि ने भाग लिया

साहनी को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत : कल्पना

नई दिल्लीः पिता जी को बड़े परिदृश्य में देखने की जरूरत है. भले ही हम अपने माता-पिता को उस समय नहीं समझ पाए हों. लेकिन, जब उन्हें व्यापक नजरिये से देखा तो पाया कि उनकी सोच में सादगी थी. उनकी सोच में आम आदमी के प्रति गहरा लगाव भी था. यह उनकी रचनाओं में भी देखने को मिलता है.

भीष्म साहनी शतवार्षिकी समारोह के दूसरे दिन यह बातें उनकी पुत्री कल्पना साहनी ने कहीं. वह रविवार को साहित्य अकादमी में पहले सत्र के विष्य ‘भीष्म साहनी : यादों के झरोखे से ’ में अपनी यादों को साझा कर रही थीं. कल्पना साहनी ने उनके जीवन से जुड़े दुर्लभ चित्रों के साथ स्मृतियों को भी साझा किया. जबकि उनकी भतीजी हर्षी आनंद ने भीष्म साहनी की एक चिट्ठी को पढ़कर सुनाया.

हर्षी आनंद ने बताया कि इसमें भीष्म साहनी ने अपनी एक रचना का उनके द्वारा विरोध करने पर अपनी सफाई पेश की थी. यह बहुत ही मार्मिक थी और साथ ही उनकी रचना प्रक्रिया को भी रेखांकित करती थी. कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विषय ‘नई कहानी-आंदोलन और भीष्म साहनी’ था. इसकी अध्यक्षता प्रो. नित्यानंद तिवारी ने की और अब्दुल बिस्मिल्लाह, रविभूषण और अजय तिवारी ने अपने-अपने आलेख पढ़े.

कई कहानियों का किया जिक्र

सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. नित्यानंद तिवारी ने भीष्म साहनी की कई कहानियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उनकी कहानियों में इतिहास को देखते हुए वर्तमान में आगे जाने के रास्ते दिखते हैं. भीष्म जी जैसे बहुत कम रचनाकार देखने को मिलते हैं. तीसरे सत्र का विषय ‘भीष्म साहनी के उपन्यासः सांप्रदायिकता, विभाजन और रूढ़ियों का प्रतिरोध’ था. इसमें असगर वजाहत, प्रो. गोपेश्वर सिंह और रवींद्र त्रिपाठी ने विचार रखे. असगर वजाहत ने भीष्म साहनी के लेखन की चर्चा करते हुए कहा कि साहनी ने प्रगतिशील लेखक संघ की चुनौतियों को स्वीकार किया.

नाटकों का मंचन भी

जबकि रवींद्र त्रिपाठी ने भीष्म साहनी के लेखन के विभिन्न आयामों पर आलेख पढ़ा. रविवार को भीष्म साहनी के उपन्यास लीला नंदलाल की और सोमवार को चीफ की दावत एवं अन्य कहानियों का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सभागार में किया जाएगा.

जन्म शतवार्षिकी समारोह के अंतिम दिन चार सत्र में संगोष्ठी का आयोजन किया. इसके विषय थे- भीष्म साहनीः नाटक, रंगमंच और फिल्म, प्रगतिशील आंदोलन और भीष्म साहनी और भारतीय भाषाओं में भीष्म साहनी. पहले सत्र में प्रख्यात फिल्मकार गोविंद निहलानी, देवेन्द्र राज अंकुर और नरेंद्र मोहन के अलावा कुछ अन्य शख्सियतों ने भी शिरकत की.

प्रस्तुतिः किरण वर्मा

आलेख

शताब्दी वर्ष पर विशेष

भीष्म साहनी : मासूम इंसानियत के लेखक

राजीव आनन्द

भीष्म साहनी के लेखन, अभिनय और जीवन से ‘मासूम इंसानियत’ पर अडिग विश्वास मजबूत होता है, जो उनकी संपूर्ण रचनाकर्म की विशेषता भी है और ताकत भी. भीष्म साहनी की रचनाएं आमजन के साथ किए जा रहे भेदभाव, शोषण और षड्यंत्र की यथार्थ बयान करते दस्तावेज हैं. उन्होंने देश की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक कुरूपताओं तथा साम्प्रदायिकता की सड़ांध पर प्रखरता और गहराई से लिखा. राजनीति और धर्म की जुगलबंदी की त्रासदी को उन्होंने आंखों से देखा था और विभाजन की गहरी साजिश को पहचाना, जिसे हम ‘तमस’ में पढ़

सकते हैं.

उन्होंने नाटक की नई परम्परा शुरू की, जिसके तहत वे नाटक के अंशों को लिखकर अपने साथियों को सुनाते व राय लेते थे फिर आगे का अंश लिखते थे. देवताओं का मानवीकरण तथा देवताओं के कार्यों की मनुष्यों द्वारा समीक्षा, इसी मूलभूत ढांचे पर भीष्म साहनी ने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ लिखा था. उन्होंने सहज मानवीय अनुभूतियों और तत्कालीन जीवन के अर्न्तद्वंद को अपनी रचना का विषय बनाया. जनता की पीड़ा भीष्म साहनी की लेखकीय संवेदना का आधार बनी. जनता को समर्पित भीष्म साहनी का लेखन यथार्थ की ठोस जमीन पर अवलम्बित है. उनकी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सामाजिक विषमता व विड़म्बनाओं के बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ने का आह्वान है. मानवीय करुणा, मूल्य एवं नैतिकता उनके साहित्य में सर्वत्र विद्यमान है.

लेखन की सच्चाई को अपनी सच्चाई मानने वाले भीष्म साहनी ने जिस जीवन को जिया, जिस संघर्षों से रूबरू हुए, उसी को हर्फ-हर्फ अपनी रचनाओं में लिखा. भीष्म साहनी के उपन्यासों में हम भारत के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ का स्पष्ट चित्र देख सकते हैं. जनवादी कथा आंदोलन के दौरान भीष्म साहनी ने आम आदमी की आशा, दुख, पीड़ा, दर्द, अभाव, संघर्ष तथा विडम्बनाओं को अपने उपन्यासों में समेटा तथा नई कहानी में उन्होंने कथा साहित्य की जड़ता को तोड़कर उसे ठोस सामाजिक आधार दिया. विभाजन के दुर्भाग्यपूर्ण खूनी इतिहास को भीष्म साहनी ने व्यक्तिगत तौर पर सहा और भोगा जिसकी मार्मिक अभिव्यक्ति हम ‘तमस’ में देख सकते हैं.

प्रेमचंद तथा यशपाल से प्रभावित भीष्म साहनी कई अर्थों में प्रेमचंद और यशपाल से कहीं आगे निकल गए. भीष्म साहनी की रचनाओं में सामाजिक अन्तर्विरोध पूरी तरह उभर कर सामने आता है. भारतीय राजनीति में निरंतर बढ़ते भ्रष्टाचार, नेताओं की पाखंडी प्रवृत्ति, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, वंशवाद, शोषण की षड्यंत्रकारी प्रवृत्तियां तथा राजनैतिक आदर्शों के खोखलेपन का चित्रण अपनी रचनाओं में बड़ी तटस्थता व प्राथमिकता के साथ किया है.

भीष्म साहनी का सांस्कृतिक दृष्टिकोण काफी वैज्ञानिक और व्यावहारिक रहा, जो निरंतर परिष्करण, परिशोधन एवं परिवर्धन की प्रक्रिया से गुजरता रहा. पूंजीवाद के द्वारा अपनी बुर्जुआ संस्कृति से लोकप्रिय हुई निम्नकोटि के बुर्जुआ संस्कारों पर कुठाराघात करते भीष्म साहनी प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाते चलते हैं. वे पूंजीवादी आधुनिकताबोध और यथार्थवादी विचारधारा के अन्तर्विरोधों का पर्दाफाश करते हैं और आधुनिकताबोध की विसंगतियों और अजनबीपन के विरुद्ध लड़ते भी हैं. उन्होंने अपनी रचनाओं में रूढ़ियों, अंधविश्वासों वाली धार्मिक कुरीतियों पर जम कर प्रहार किया है.

भीष्म साहनी शोषणविहीन, समतामूलक प्रगतिशील समाज की स्थापना के पक्षधर रहे, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज में व्याप्त आर्थिक विसंगतियों के त्रासद परिणाम, धर्म की विद्रुपता व खोखलेपन उद्घाटित हुए हैं. अपने उपन्यासों ‘बंसती, झरोखे, तमस, मायादास की माड़ी तथा कड़ियां’ में उन्होंने आर्थिक विषमता और उसके दुखद परिणामों को बड़ी मार्मिकता से उद्घाटित किया है.

रावलपिंडी में 8 अगस्त 1915 को जन्में भीष्म साहनी का साहित्यिक सफर उनकी पहली कहानी ‘अबला’ से प्रारंभ हुआ, दूसरी कहानी ‘नीली आंखें’ थी जो उस समय प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय के द्वारा निकाली जा रही पत्रिका ‘हंस’ में छपी थी. उन्होंने ‘झरोखे, कड़ियां, तमस, मायादास की माड़ी, कुंतों, नीलू नीलिमा निलोफर’ नामक उपन्यासों के अलावा ‘निशाचर, पाली, शोभायात्रा, भाग्यरेखा, पटरियां, पहला पाठ, भटकती राख, वाङचू आदि कहानियों का सृजन किया. उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटक यथा, ‘हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, माधवी, मुआवजे आदि लिखे. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ के नाम से लिखी तथा अपने बड़े भाई बलराज साहनी की भी कथा, ‘मेरे भाई बलराज’ लिखा. बाल साहित्य के अंतर्गत उन्होंने ‘गुलेल का खेल’ और ‘वापसी’ का सृजन किया. इस तरह भीष्म साहनी ने साहित्य की लगभग हर विद्या पर अपनी कलम चलाई.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी ने कई फिल्मों जैसे ‘मोहन जोशी हाजिर हो’, तमस, कस्बा, लिटिल बुद्धा तथा मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’ में बतौर कलाकार भूमिका भी निभायी थी. हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र को स्थापित करने हेतु उन्होंने थियेटर कलाकार सफदर हासमी की याद में ‘सहमत’ नामक संस्था की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष भी रहे.

11 जुलाई 2003 को दिल्ली में 87 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ. अपनी कालजयी रचनाओं के कारण भीष्म साहनी हिन्दी साहित्य में युगान्तकारी रचनाकार के रूप में सदा स्मरणीय रहेंगे. उनकी स्मृति को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि.

 

संपर्कः प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा,

गिरिडीह-815301, (झारखंड)

काव्य जगत

 

राकेश भ्रमर

तुमने मुझे छुआ कि बदन जगमगा गया.

कोई जला चराग, सहन जगमगा गया.

ये फूल कौन-सा तेरे माथे पे खिल गया,

गुजरे इधर से तुम जो, चमन महमहा गया.

इस दर पे तेरा नाम हवाओं ने लिखा था,

खुशबू के बोझ से ये बदन थरथरा गया.

इतनी थी आरजू कि मेरे दर पे वो रुकें,

आए जो मुक़ाबिल तो कदम डगमगा गया.

चलते हो धूप में कभी साए में बैठ लो,

देखो तो किस तरह ये बदन तमतमा गया.

हमने तो उस परी से कोई बात भी न की,

किसके ये बोल थे कि बदन गुनगुना गया.

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शहर और सड़क

राजेश माहेश्वरी

शहर की सड़क पर

उड़ते हुए धूल के गुबार ने

अट्टहास करते हुए मुझसे कहा-

मैं हूं तुम्हारी ही भूल का परिणाम

पहले मैं दबी रहती थी

तुम्हारे पैरों के नीचे सड़कों पर

पर आज मुस्कुरा रही हूं

तुम्हारे माथे पर बैठकर

पहले तुम चला करते थे

निश्चिंतता के भाव से

शहर की प्यारी-प्यारी

सुन्दर व स्वच्छ सड़कों पर

पर आज तुम चल रहे हो

गड्ढों में सड़कों को ढूंढ़ते हुए

कदम-दर-कदम संभलकर

तुमने भूतकाल में

किया है मेरा बहुत तिरस्कार

मुझ पर किए हैं अनगिनत अत्याचार

अब मैं उन सबका बदला लूंगी

और तुम्हारी सांसों के साथ

तुम्हारे फेफड़ों में जाकर बैठूंगी

तुम्हें उपहार में दूंगी

टी.बी., दमा और श्वास रोग

तुम सारा जीवन रहोगे परेशान

और खोजते रहोगे

अपने शहर की पुरानी

स्वच्छ और सुन्दर सड़कों को!

सम्पर्कः 106, नयागांव, रामपुर, जबलपुर (म.प्र.)

......

 

दो गजलें : कुमार नयन

1

मैं पैदा हुआ कर्जदारों में था.

बड़ा हो के बेरोज़गारों में था.

मिरी मां ने दम तोड़ा जब भूख से,

मैं राशन की लम्बी कतारों में था.

मिरी बदनसीबी को मत कोसना,

मुकद्दर मिरा बेकरारों में था.

तू दरिया था जब तो मिला क्यों नहीं,

समन्दर तो अपने किनारों में था.

न पूछो मैं जिन्दा रहा किस तरह,

किसी अजनबी के सहारों में था.

मैं खुशबू कहां से लुटा पाऊंगा,

खुदा की कसम मैं तो खारों में था.

 

2

रगों में चीखते नारे लहू सा चलते हैं.

मिरे जिगर में हजारों जुलूस पलते हैं.

सदी की आग का अन्दाज क्या लगाओगे,

कि सिर्फ जिस्म नहीं साये भी पिघलते हैं.

बहार भी न गुलों को खिला सके शायद,

यहां दरख्त फजां में धुआं उगलते हैं.

उठा है दर्द तो होने दो जिन्दगी रौशन,

चिरागे जख्म कहां रोज-रोज जलते हैं.

कोई नहीं है नया कुछ भी सोचने वाला,

यहां ढले हुए सांचे में लोग ढलते हैं.

पता न था कि जमाने का रंग यूं होगा,

हमारे खून के रिश्ते भी अब बदलते हैं.

लगा के दांव सियासत ठठा के हंसती है,

घरों से खौफजदा लोग जब निकलते हैं.

 

सम्पर्कः खलासी मुहल्ला

बक्सर-802101 (बिहार)

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कविता

पन्ने पलट रही हूं

पूजाश्री

धरती की शुच्छाओं ने,

युगों तक पुकारा मुझे.

स्तत् आश्वासन देकर के,

आकाश से उतारा मुझे.

मेरी तपिश से जगमगाकर,

सूर्य ने आकार लिया.

मेरे अंतर मन ने सब,

नक्षत्रों का विस्तार दिया.

मैं आदि-अनंता, अरुणाई,

ब्रह्माण्ड की तरुणाई.

स्नेह देने की इच्छा ही,

मुझे धरा पर ले आई.

मैंने आनंदित होकर के,

मन से आशीर्वाद दिया

अंतर की सुधा पिला कर के,

तनमन सब, कुछ वार दिया.

सबकी इच्छा पर बनी-ठनी,

मां, बेटी, बहन, पत्नी बनी.

किन्तु काल की इच्छाएं क्यों,

ढूंढ़े मुझ में नागमणि?

इसलिए इस धरती पर मुझे,

युगों तक सताया गया.

नीलम घरों में सजा कर के,

दांव पे लगाया गया.

मैं! इस संसार में केवल,

मातृत्व से हूं हारी.

मैं क्षमाशील होकर भी,

कहलाई अबला नारी.

किन्तु रहो अब सावधान!

अब, करवट बदल रही हूं

युगों की काली कुटिलता के,

सब पन्ने पलट रही हूं

संपर्कः बंगला नं. 1, इन्द्रलोक, स्वामी समर्थ नगर, लोखण्डवाला, अंधेरी पश्चिम, मुंबई-400053

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आत्मपथ की पिपासा

यशोधरा यादव ‘यशो’

आज मन पूछता है, समय की परिभाषा,

अनवरत चलना है, इसकी अभिलाषा.

खोजकर देखा था, पकड़ नहीं पाई,

जागृत हो उठी थी, कोई नई आशा.

कदम तो बढ़ाया था, चलने की खातिर,

कदमों की ठिठकन देती है निराशा.

समय की मार तो झेलता है मानव,

फिर भी न शब्द हैं, न कोई भाषा.

समय ऐसा मानव जो, पीछे से गंजा है,

आगे से पकड़ो तो, देगा दिलासा.

सुख-दुख की औषधि, समय में निहित है,

चिन्मय निरन्तर है, हर पल नया सा

‘यशो’ कर्मपथ का, बने सत्य सहचर,

जगेगी अगर आत्मपथ की पिपासा.

 

संपर्कः डी. 963/21 कालिंदी विहार

आवास विकास कॉलोनी, आगरा (उ.प्र.)

 

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दोहे

डॉ. अशोक गुलशन

कहना है मुश्किल बहुत, अब चूल्हे का हाल.

चावल भी मंहगा हुआ, सस्ती रही न दाल.

सूखे-सूखे गाल हैं, उलझे-उलझे केश.

महंगाई की मार से, जनता है बेहाल.

मंजिल तक जाना लगे, वैसे ही दुश्वार.

घिसट-घिसट जैसे चले, कछुआ अपनी चाल.

तुमको जब भाता नहीं, मेरा कुछ शृंगार.

ऐसे में फिर क्या कहें, तुमसे दिल का हाल.

पीला अब चेहरा हुआ, लाल हो गयी आंख.

गुलशन मुश्किल है बहुत, कटना अबकी साल.

 

संपर्कः उत्तरी कानूनगोपुरा,

बहराइच-271801 (उ.प्र.)

 

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दोहे

सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’

आजादी के गांव में, बबार्दी की रेल.

खेती भ्रष्टाचार की, होती रेलमपेल.

रोज घुटाले हो रहे, होती है नित जांच.

पर इसके तन पर कभी, तनिक न आती आंच.

संसद बौनी हो गई, केवल चीख-पुकार.

गांव तमाशा देखता, मौसम है बीमार.

अच्छे दिन की चाह में, नयन बिछे सब ओर.

किन्तु निशा घनघोर है, दूर बहुत है भोर.

सभी अंग बीमार हैं, किन्तु चिकित्सक मौन.

कैसे हो उपचार अब, इसे सुझाये कौन.

शान्ति शान्ति चिल्ला रहे, बनते रोज शिकार.

सभी ओर घुसपैठिये, करते बम की मार.

बस, आटो, रेलें सभी, नहीं निरापद यान.

सभी जगह ही नारियां, झेल रहीं अपमान.

घोर अराजकता बनी, नियम धरम अहसान.

छीना-झपटी, चोरियां, बनीं गांव की आन.

पूर्ण व्यवस्था पंगु है, धरे हाथ पर हाथ.

भोले भाले लोग अब, पीट रहे हैं माथ.

चोटी पर बैठे हुए, आज बने सिरमौर.

घर भरने में व्यस्त हैं, छीन सभी के कौर.

कैसा परिवर्तन हुआ, कैसा है यह सोच.

बाह्य रूप मोहक सुघर, घर अंदर से पोच.

किससे निज विपदा कहें, नहीं किसी से आस.

बना चरोखर गांव अब, जी भर चरते घास.

 

सम्पर्कः पुराना कछपुरा स्कूल, गढ़ा,

जबलपुर (म. प्र.)-482002

 

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गजल

अरविन्द अवस्थी

अंधेरे में रहने की आदत बुरी है.

दिखावा भरी ये इबादत बुरी है.

कि ले नाम मजहब का जो जान देते,

असल में तो उनकी शहादत बुरी है.

नहीं साथ जाता है धन और वैभव,

तो इसके लिए फिर अदावत बुरी है.

अगर न्याय मंदिर में चढ़ता चढ़ावा,

तो समझो कि ऐसी अदालत बुरी है.

पता ही नहीं ऊंट कब लेगा करवट,

जख़म खाके उनकी तो हालत बुरी है.

मिला ही नहीं प्रेम से द्वार पर जो,

तो उसके यहां जश्ने-दावत बुरी है.

भरी है अगर गंदगी मन के अंदर,

तो बाहर से तन की मलासत बुरी है.

अलग कर रही आदमी आदमी को,

तरक्की नहीं तो विरासत बुरी है.

नहीं खींच लेती है खुशबू अगर तो,

खिले फूल की फिर नफासत बुरी है.

संपर्कः पाण्डे सदन, मीरजापुर (उ.प्र.

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दो कविताएं

अभिनव अरुण

एक

हमें चाहिए सौ-सौ हाथों वाले

हजार आंख वाले

सशक्त सतर्क योद्धा

लाखों-लाख

क्योंकि करोड़ों-करोड़ हो गए हैं

सफेदपोश

परजीवी

जो हमारी ही देह से लिपट

हमारा ही खून चूस रहे हैं.

 

दो

हर सुबह हाथ में सत्य की हथौड़ी ले

निकल पड़ेगी हमारी फौज

काटने उन चट्टानों को

जो सदियों से

हमारी राह रोके खड़ी हैं

यही चट्टानें

नहीं आने देतीं निरपेक्ष हवाओं को

हमारे खेतों तक

रोकती हैं ऊर्जावान रोशनी

और अमृतमय बारिश भी

और सदियों से हमारी नस्लें

इनकी गुलामी को ही मानती

आई हैं अपनी नियति

अब हमें बोने होंगे इरादे

उगाने होंगे दशरथ मांझी.

 

संपर्कः बी-12, शीतल कुंज, लेन-10,

निराला नगर, महमूरगंज,

वाराणसी-221010 (उ.प्र.)

 

...

 

दोहे

संजीव कुमार अग्रवाल

अपनी किस्मत को कहे, अक्सर वही खराब

जिसको जीने की कला, आती नहीं जनाब!

बंट जाती हैं बेटियां, शादी करके हाय

तन जाता ससुराल पर, मन मैके रह जाय!

दिन भर जल कर सूर्य जब, घर जाता है शाम

दे जाता है दीप को, अपना बाकी काम!

छुप कर बैठे हो कहां, ऐ मेरे हमराज

देखो कब से दे रहा, मैं तुमको आवाज!

अंधियारा जब आ गया, मन के बहुत समीप

मैंने तेरी याद का, जला दिया इक दीप!

सुख के पढ़ना चाहते, अगर पाठ दो-चार

तो दुख के स्कूल में, नाम लिखा ले यार!

चोरी करता हो भले, घर में पहरेदार

मिलती है लेकिन सजा, नौकर को हर बार!

आए जब भी क्रोध तो, कर लेना इक काम

केवल इतना सोचना, क्या होगा परिणाम!

दोष रहा मुझमें कहीं, खाई दिल पे चोट

वरना तेरे प्यार में, हो नहिं सकता खोट!

जीवन भी आखिर करे, कैसे उसको तंग

दुख में भी दिखता जिसे, किसी खुशी का रंग.

संपर्कः गर्ग स्टोर्स, पुस्तकालय रोड,

बक्सर-802101(बिहार)

 

....

 

क्षणिकाएं

अविनाश ब्यौहार

 

1. चुगली खाना

भैया जी

छोटी सी

छोटी बात भी

पचा नहीं

पाते हैं...!

क्योंकि

वे चुगली

खाते हैं...!!

 

2. हेरा-फेरी

यदि लेखाकार

सरकारी खजाने में

हेराफेरी करे तो

उस पर लानत है...!

क्योंकि यही तो

अमानत में

खयानत है...!!

 

3. ट्यूशन

वर्तमान

शिक्षा प्रणाली

छात्रों के

भविष्य को

छल रही है...!

स्कूल जाना

तो औपचारिकता है,

दरअसल यह

ट्यूशन की

बदौलत चल

रही है...!!

संपर्कः 86,रायल एस्टेट कालोनी,

माढ़ोताल, कटंगी रोड, जबलपुर-482002

भाषा राष्ट्र की संजीवनी

पूजाश्री

जादी के अड़सठ-बरस बाद भी, देश ने हिंदी को हृदय से राष्ट्र-भाषा स्वीकार नहीं किया है.

उच्च स्तर पर साधन-सम्पन्न लोग, अक्सर ही अंग्रेजी माध्यम से ही अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं. उनके बच्चों को हिन्दी के साधारण व्यवहार में आने वाले शब्दों का अर्थ भी मालूम नहीं होता है. कुछ लोग तो अंग्रेजी के इतने दास हैं कि यदि उनके पास-पड़ोस में हिन्दी बोलने वाले कोई रहने को आ जाएं, तब वे अजीबो-गरीब ढंग से उन पर नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं. इसका कारण है, राजनेताओं द्वारा राष्ट्र-भाषा को उलझाए हुए रखना.

किसी भी राष्ट्र में, राष्ट्र की सर्वाधिक उन्नति और आपसी आत्मीयता, एकता के लिये, एक भाषा ही, उस राष्ट्र के लिए संजीवनी का काम करती है.

देश के दुश्मनों या देश में ही छिपे देश-द्रोहियों ने, राष्ट्र भाषा की अवहेलना करने का षड्यंत्र किया है और करते रहते हैं, जबकि हमारे देश में सिद्धनाथ पंथी साधुओं, सूफी-संतों, महाराष्ट्र और गुजरात के भक्तों, बंगाल और असम के वैष्ण संतों ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हिन्दी को ही बनाया था. जिस समय हमारे देश का राजनीतिक स्तर एक नहीं था, तब उससे भी पहले ‘पद्मरचित’ लिखा गया था.

पश्चिम से आए मुस्लिम लेखक अब्दुल रहमान ने ‘संदेशरासक’ मोहम्मद जाससी के द्वारा रचित ‘पद्मावत’ को कौन नहीं जानता?

तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरित मानस’ जनता तक पहुंचाने के लिए हिन्दी का ही सहारा लिया गया था.

आज भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए कई तरह की गलत धारणाएं फैलायी जाती रही हैं.

जैसे कि हिन्दी संबंधी-अध्याय, हिन्दी समर्थकों के आग्रह पर संविधान में जोड़ा गया था. समय-समय पर इस झूठ का प्रचार, विभिन्न दलों के धड़ल्ले से किया जबकि संविधान निर्माण के लिए जो मसौदा-समिति बनी थी, उसमें डॉ. अम्बेडकर सर-अल्लाड़ी कृष्णा स्वामी अय्यर, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, गोपाल स्वामी अय्यंगार. एन. माधव राव, सैय्यद मुहम्मद और सर बिजेन्द्रलाल मित्तल जैसे महानुभाव थे.

इनमें से एक भी हिन्दी भाषी नहीं था, किन्तु सभी हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में थे. यहां तक कि संविधान सभा के सभी अहिन्दी भाषी नेताओं ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में अपनी सहमति, सहज रूप से दी. बस, उनका सिर्फ इतना ही आग्रह था कि प्रांतीय भाषाओं के ऊपर हिंदी रखकर, अंग्रेजी हटाने के लिए कानून बनाने का बंधन नहीं लगाना चाहिए.

महात्मा गांधी सौराष्ट्र में जन्में, ब्रिटेन में पढ़े तथा कार्य भूमि दक्षिण अफ्रीका को बनाया, किन्तु जब से भारत आए, तब उन्होंने जनता को प्रोत्साहित करने के लिए हिन्दी को ही कांग्रेस की भाषा बनायी और हिन्दी भाषा को रचनात्मक कार्यों से जोड़ा.

कहने का अर्थ है, हमारे देश के महान विभिन्न भाषाओं के विद्वानों ने हिन्दी को देश की सर्वेसर्वा भाषा के रूप में स्वीकार किया है.

आज हमें यह याद रखना चाहिए कि पूरे देश की एकता-प्रतिबद्धता आत्मीयता के सूत्र को जोड़ने के लिये अपनी एक भाषा हमें प्राणों से भी प्यारी होनी चाहिए.

जिस दिन एक भाषा के सूत्र में, हृदय से बंध जायेंगे, उसी दिन से, देश की एकता का गुलशन महक उठेगा.

 

संपर्कः बंगला नं. 1, इन्द्रलोक, स्वामी समर्थ नगर,

लोखण्डवाला, अन्धेरी पश्चिम, मुम्बई-400053

आलेख

राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी है

डॉ. प्रभु चौधरी

डॉ. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में सात सौ वर्षों से कायम हिन्दी नष्ट होने वाली नहीं है. हिन्दी वषरें से इस देश की सम्पर्क भाषा और धीरे-धीरे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपना स्थान सुनिश्चित कर रही है. सन् 1975 में नागपुर में हुए पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी को विदेशों में पहुंचाने की नींव रखी. हिन्दी मॉरीशस, ट्रिनीडाड तक पहुंच गई. अप्रवासी भारतीय एवं विदेशों में रहने वाले हिन्दी भाषियों के हिन्दी के प्रति गहन अवदान की वजह से हिन्दी आज विश्व भाषा बनने की तरफ अग्रसर है.

14-18 सितम्बर, 1999 में छठें विश्व हिन्दी सम्मेलन द्वारा हिन्दी लंदन पहुंच गयी. 1975 में नागपुर से शुरू की गई यात्रा में हिन्दी मॉरीशस, दिल्ली, ट्रिनीड्राड होते हुए लंदन पहुंची है. लंदन से सारे विश्व में हिन्दी को जाना है. कहने को यह यात्रा सहज नहीं रही है. आज हिन्दी को विश्व भाषा बनना है. अंग्रेजी का विकल्प बनना है. इसके लिए हिन्दी भाषा के साहित्य प्रचार-प्रसार में जुटे विद्वानों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना पड़ेगा, तभी हिन्दी सहयोग, सहचर्य और स्नेह की भाषा है. इसीलिए आज वह मातृभाषा का दर्जा भी पा लेगी, क्योंकि हिन्दी बोलने वालों की संख्या विश्व में तीसरे स्थान पर है. पहला स्थान अंग्रेजी एवं दूसरी चीनी बोलने वालों का है. संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य भाषाएं हिन्दी की तुलना में काफी पीछे हैं क्योंकि हिन्दी का प्रसार विदेशों में भी काफी है. इसका कारण यह है कि भारतीय मूल के लाखों व्यक्ति विदेशों में रह रहे हैं.

आज विश्व में मॉरीशस, श्रीलंका, ट्रिनाड्राड, मलेशिया, गयाना, ट्रिनिड्राड टोकागों, बर्मा, फीजी, कैन्या, सूरीनाम, सिंगापुर, तंजानिया, आदि देशों में भारतीय मूल के लोग काफी रहे हैं और इन लोगों में प्रायः अधिकांश लोग उत्तर भारत के हैं, जो हिन्दी बोलते हैं. इसीलिए वे लोग वहां भी हिन्दी बोलते हैं. इससे वहां भी हिन्दी का प्रचार होता है. पूरे विश्व में इस समय लगभग 125 विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में हिन्दी पढ़ने की व्यवस्था है. अतः हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य स्थानों में प्रशासनिक भाषा बनाया जा सकता है. आज अमेरिका के 10 एवं जर्मनी के 6 विश्वविद्यालयों में हिन्दी साहित्य पर शोध कराने में खासी लोकप्रियता पाई है.

कनाडा में 5 और इंग्लैण्ड में 35 शिक्षक संस्थाओं में हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा है. विश्व में हिन्दी में अनुवाद एवं प्रकाशन होता है. रूस में हिन्दी पुस्तकों का प्रकाशन होता है. इंग्लैण्ड में त्रैमासिक पत्रिका, ‘प्रवासिनी’ का प्रकाशन होता है. तात्पर्य यह है कि विदेशों में भी हिन्दी लोकप्रियता हासिल कर रही है, लेकिन दुःख तब होता है जब अपने ही देश में हिन्दी की जगह अंग्रेजी शासन करती रहती है.

भारत को आजादी मिले 68 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, किन्तु हिन्दी मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा बनने के बाद भी परतंत्र है. हमारी गुलाम मानसिकता की वजह से हिन्दी अंग्रेजी का पूरा विकल्प नहीं पा रही है. स्वतंत्रता पूर्व हिन्दी राष्ट्रीय आंदोलन एवं जलसों तथा जन-जन की भाषा थी. तिलक, दयानंद सरस्वती, भारती, टंडन, रवीन्द्रनाथ, सुभाष, गांधीजी की भाषा थी. राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का भाव थी. हिन्दी ने ही रामेश्वर से अमरनाथ, द्वारिका से कामाख्या, कन्याकुमारी से कश्मीर तक देश को बांधे रखा था. आजादी के बाद वही हिन्दी दीन-हीन की भाषा बनकर रह गई, अंग्रेजी ऊपर हो गयी. हिन्दी तिरस्कृत एवं आहत होती रही, लेकिन शनैः-शनैः हिन्दी की ओर ध्यान उठने लगा और उसे पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए राजभाषा तथा राष्ट्रभाषा बनाया गया. ये सच है कि हिन्दी के साथ आज भी अंग्रेजी का प्रकाशन जारी है, किन्तु आज हिन्दी और विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली तीसरे नम्बर की भाषा बन सकी है. भारत के बाहर बसे लगभग 75 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं. भारत में 14 दिसम्बर 1949 को हिन्दी राजभाषा संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में घोषित की गई है और 26 जनवरी 1950 से लागू हो गई, किन्तु भारत में हिन्दी अभी भी पूरी तरह अंग्रेजी को विस्थापित नहीं कर पाई है एवं आज भी हिन्दी संघर्षरत है. कहने को हिन्दी दिवस, मास, वर्ष मनाये जाते हैं, पर सब औपचारिकता भाव सिद्ध होते हैं. कहने को भारत में 520 दूरदर्शन केन्द्र एवं 180 आकाशवाणी केन्द्र हैं, पर उन पर भी अंग्रेजी हावी है. अतः राजभाषा हिन्दी आज भी अंग्रेजी का विकल्प नहीं बन पा रही है. विश्वभाषा की ओर अग्रसर हिन्दी अपने ही देश में स्वयं को प्रतिष्ठित करने हेतु युद्धरत है. स्थिति चाहे जो भी हो हिन्दी नष्ट होने वाली नहीं है, न ही अंग्रेजी के सामने कमजोर पड़ने वाली है. देर-सवेर हिन्दी ही अंग्रेजी का विकल्प और विश्वभाषा बनेगी.

हिन्दी आज विश्व में बहुतायत द्वारा बोली जाने वाली भाषा बन गयी है. फीजी एवं बर्मा में भी हिन्दी बोलने वाले काफी संख्या में हैं. नेपाल में 53 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं. इसके अलावा अमेरिका, रूस, यूरोप, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि देशों में भी भारतीय मूल के हिन्दी बोलने वाले काफी लोग हैं. वस्तुतः इन देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की भाषा हिन्दी ही है. प्रवासी भारतीयों का दल 1843 ई. में मॉरीशस, 1860 में दक्षिण अफ्रीका, 1870 में गुयाना, 1873 में सूरीनाम, 1879 में फीजी एवं 1945 में त्रिनिड्राड गये. इनमें मुख्यतः बिहार एवं उत्तरप्रदेश के लोग थे, जो अवधी, खड़ी बोली एवं भोजपुरी बोलते हैं.

धीरे-धीरे हिन्दी में वहां के स्थानीय शब्दों का समावेश हो गया. फीजी में बोली जाने वाली हिन्दी को सरनामी हिन्दी या सरनामी कहा जाता है. इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी नेता की कहलाती है. कुछ भी हो, है तो हिन्दी ही. फीजी में फीजी-हिन्दी का व्याकरण बन चुका है. फीजी-हिन्दी-अंग्रेजी-फीजी हिन्दी शब्दकोष है. इसके पूर्व भी 1645 ई. में डच में हिन्दी ग्रंथ ग्रामवाटिका लिखी गई थी. तात्पर्य यह है कि हिन्दी काफी पहले से विदेशों में भी बोली लिखी जाती रही है.

हिन्दी में अध्ययन एवं अध्यापन आज विश्व में लगभग सभी देशों में हो रहा है. साथ ही विश्व में अनेक देशों में हिन्दी भाषा में साहित्य भी लिखा जा रहा है. फीजी के कमलाप्रसाद मिश्र, मॉरीशस के अभिमन्यु अनन्त, सोमदत्त, बखोरी, सूरीनाम के मुंशी रहमान खान, सूर्यप्रसाद बोरे एवं स्वीडन के ओदफोन स्मेकल का हिन्दी साहित्य में सराहनीय योगदान रहा है. फीजी टाइम्स द्वारा निकलनेवाला शांतिदूत एवं हिन्दी पत्रकारिता का रूप उजागर करता है. फीजी में इसके अलावा अनेक भारतीय कवि, लेखकों के साहित्य का विश्व में अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है. इस तरह हिन्दी विश्व में प्रतिष्ठित बनने की दिशा में संघर्षरत हैं.

संपर्कः 15 स्टेशन मार्ग, महिदपुर रोड

जिला उज्जैन, (म.प्र.)

आलेख

हिन्दी में राष्ट्रीय चेतना का स्वर

डॉ. भावना शुक्ल

वैदिक काल से ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग होता रहा है. राष्ट्र की परिभाषायें समय-समय पर बदलती रही हैं. किन्तु राष्ट्र और राष्ट्रीयता का भाव गुलामी के दौरान अधिक पनपा. जो साहित्य के माध्यम से हमारे समक्ष आया जिसके द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ.

साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है. साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है. समाज का राष्ट्र से बहुत गहरा और सीधा संबंध है. संस्कारित समाज की अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली होती है. जिसका संबंध सीधा राष्ट्र से होता है जो इस रूप में सीधे समाज को प्रभावित करती है. कवियों ने राष्ट्र जागृत करने के लिये, सोये हुये राष्ट्र को अपनी कविताओं के माध्यम से संघर्ष के लिये प्रेरित किया. भक्त कवियों ने अपने अंतःकरण में बह रही राष्ट्रीय चेतना की धारा से सुप्त और निरासित समाज को नयी दिशा दी.

भक्तिकाल के कवि कबीरदासजी ने निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का आदर्श प्रस्तुत किया और इसी के माध्यम से राष्ट्रीय गरिमा में नवजीवन का संचार कर राष्ट्र को नई दिशा दी. महान राष्ट्रवादी कवि कबीर ने राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया. तुलसीदासजी राष्ट्रभक्त संत थे इन्होंने राम के समन्वयी लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक एकता को शक्ति प्रदान की. सूरदास जी ने आध्यात्मिक चेतना का संचार कृष्ण की विविधता के माध्यम से किया और समाज के सत्कर्म की प्रेरणा दी.

कविवर भूषण के राष्ट्रवादी स्वरों की झंकार ने लोक चेतना में हलचल उत्पन्न कर दी.

1857 से लेकर जो मुक्ति संग्राम चला, उसमें कवियों और शायरों ने अपनी कविताओं, गीतों और गजलों के माध्यम से राष्ट्र को जागृति का संदेश दिया.

स्वतंत्रता संग्राम की धूम, देश में मच रही हलचल ने कवियों को राष्ट्रवादी काव्य की गंगा बहाने के लिये प्रेरित किया. स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार राष्ट्रीय भावों के द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रीय भावधारा लिये हुये कविताओं के गर्भ में राष्ट्रीय चेतना का विकास होता रहा. 1857 में पहला अखबार निकला ‘पयामे आजादी’.

आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने अपनी लेखनी के जादू से भारत दुर्दशा का चित्रंकन कर समाज को जागृति का संदेश दिया है. इसी प्रकार प्रेमधन की अरुणोदय, देशदशा,

राधाकृष्णदास की भारत की बाहरमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई. द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अन्तर्गत बलिदान गान में प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये क्रांति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी. ‘बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लगा दे’ के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतकार, मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा पहला राष्ट्रवादी स्वर उठा. गुप्तजी की भारतभारती पढ़कर भारत के सैकड़ों नौजवानों में राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ और वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उन्होंने अंग्रेजों की दमनात्मक कार्यवाही का मुकाबला किया और जेल यात्रायें सही.

‘‘हम मौन थे क्या हो गये,

और क्या होंगे अभी

आओ विचारें बैठकर

ये समस्यायें सभी.’’

छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुंदर और प्रेरणादायी राष्ट्रवादी, मधुरगीतों व कविताओं की रचना की. निराला की ‘वर दे वीणा वादिनी’, भारती जय विजय करे, जागो फिर एक बार, शिवाजी का पत्र, प्रसाद की ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा.’ चन्द्रगुप्त नाटक में आया, ‘हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ आदि कविताओं में कवियों में राष्ट्रीयता की भावना की प्रशस्त अभिव्यक्ति दी है.

राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता माखन लाल चतुर्वेदी ने अपने काव्य हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता युगचरण, समर्पण, काव्य कृत्तियों की रस की धारा से राष्ट्रीयता का भाव जागृत किया. चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतंत्रतकर जनतंत्रात्मक की पद्धति की स्थापना का संकल्प किया. इनकी कविता से संघर्ष की प्रबल प्रेरणा मिलती है. जेल की हथकड़ी उनके जीवन को अलंकृत करती है.

‘क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना

हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना

(कैदी और कोकिला)

स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया.

‘उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है

कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है.’

‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता की पंक्तियां भारतीय आत्मा की पहचान कराती हैं.

‘मुझे तुम तोड़ लेना वनमाली देना उस पथ पर फेंक

मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ आते वीर अनेक’

राष्ट्रीय भावधारा की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का

‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झांसी की रानी’ वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति है. ‘जलियांवाला बाग में बसंत’ कविता में कवयित्री ने नृशंस हत्या पर करुणा का भाव प्रदर्शित करते हुये कहा है.

आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना

यह है शोक स्थान, यहां मत शोर मचाना

कोमल बालक मरे यहां गोली खा-खा कर

कलियां उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर.

रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुये और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी कवि के रूप में जाने जाते रहे. कवि ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जनमानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है. कुरुक्षेत्र महाकाव्य राष्ट्रीयता से परिपूर्ण है.

‘‘लड़ना उसे पड़ता मगर.

औ’ जीतने में वह देखता है सत्य को रोता हुआ,

वह सत्य है जो रो रहा, इतिहास के अध्याय में,

विजयी पुरुष के नाम पर कीचड़ नयन का डालता.’’

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कविताओं को रचकर राष्ट्रीयभाव जागृत किये.

‘‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,

जिससे उथल-पुथल मच जाए

एक हिलोर इधर से आये,

एक हिलोर उधर से जाये.

नाश! नाश! हां महानाश! की प्रलयंकारी आंख खुल जायें.

कवि जयशंकर प्रसाद की देश को समर्पित अपनी मातृभूमि के चरणों में अर्पित ये पंक्तियां-

‘अरुण यह मधुमय देश हमारा

जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’’

हिन्दी साहित्य के अनेक कवियों ने राष्ट्रीयता की भावभूमि पर अपना काव्य रचकर नवजागरण का संदेश दिया. यह कहा जाता है कि राष्ट्रीय भावना राष्ट्र की प्रगति का मूल मंत्र है. और सच है कि आधुनिक काव्य में राष्ट्रीयता का भाव प्रत्येक भाषा में समाविष्ट है. किसी भी राष्ट्र-रूपी वृक्ष की छाया में अनेक पंथ-

धर्म और भाषाएं पल्लवित और पुष्पित होती है. एक राष्ट्र अनेक धर्म हो सकते हैं. किन्तु व्यक्ति मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी.

सोहन लाल द्विवेदी ने अपने काव्य संग्रहों में स्वतंत्रता के आह्वान व देश-प्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर का प्रस्फुरण हुआ उसका अविरल प्रवाह बहा.

मातृभूमि के प्रति करुणा का भाव-

‘कब तक क्रूर प्रहार सहोगे? कब तक अत्याचार सहोगे?

कब तक हाहाकार सहोगे? उठो राष्ट्र के हे अभिमानी

सावधान मेरे सैनानी.’

सियाराम शरण गुप्त की ‘बापू’ कविता में गांधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करुणा, विश्वबंधुत्व शांति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है. रामनरेश त्रिपाठी, गया प्रसाद शुक्ल, श्रीधर पाठक आदि कवियों ने काव्य रस के आधार पर देश के उद्धार के लिए आत्मोसर्ग की भावना उत्पन्न थी.

स्वतंत्रता के यज्ञ में कवियों ने अपनी काव्य रस की आहुति देकर राष्ट्रीय कविता के ओजस्वी स्वरों की गूंज के द्वारा देश-प्रेम की भावना उत्पन्न की.

स्वतंत्रता के यज्ञ में कवियों ने अपनी काव्य रस की आहुति देकर राष्ट्रीय कविता के ओजस्वी स्वरों की गूंज के द्वारा देश-प्रेम की भावना मजबूत हुई.

हम यह कह सकते हैं कि हर युग में जो साहित्य लिखा गया है, उसका प्रभाव साहित्य का समाज पर और समाज का साहित्य पर पड़ रहा है.

गणेशशंकर विद्यार्थी, महात्मा गांधी आदि जैसे संपादकों ने लेख और संपादकीय लिखकर लोगों को देशप्रेम की प्रेरणा दी.

राष्ट्रीयता का भाव मानव का प्रथम पायदान है. कवियों ने कविता, गीतों, गजलों, लेखों, संपादकीय आदि के माध्यम से जन-जन तक व्यक्ति के अंदर राष्ट्रीयता का संचार किया. यानी हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय चेतना की सुप्तधारा को नयी दिशा मिली और जनजागरण को नयी चेतना और जागृति मिली.

संदर्भः

1. भारत की राष्ट्रीय चेतना

2. भारत के शक्ति के स्त्रोत

3. वृहत निबंध साहित्य

4. हिन्दी की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा.

संपर्कः डब्लू.जेड. 21, हरिसिंह पार्क, मुल्तान नगर,

पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-110056

मो. 9278720311

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