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November 2015
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अपर्णा शर्मा की कहानी - पतिव्रता

अरूण और मैनी के हिन्दुस्तान आने की खबर से अरूण का पूरा परिवार उनके स्वागत को उत्सुक हो गया। दो साल पहले अरूण ने अमेरिका में अपनी सहकर्मी मैनी से शादी कर ली थी। मैनी का परिवार हिन्दुस्तानी था। वे अभी दो पीढ़ी पहले ही अमेरिका में बस गए थे। अरूण और मैनी की शादी से दोनों के परिवार खुश थे। वे पहली बार हिन्दुस्तान आ रहे थे। इसीलिये मैनी का अरूण के रिश्तेदारों और मित्रों से परिचय कराया जाना जरूरी था और साथ ही विदेशी बहू को कुछ दिन स्वदेशी रीति रिवाजों की जानकारी दिया जाना भी। अरूण के परिवार के सभी लोग अपने-अपने तरीके से योजना बना रहे थे। उसकी बहनें विशेष उत्साहित थीं। वे भैया-भाभी के साथ एक-एक दिन कैसे एन्जाय करना है इसकी तैयारी कर रही थी। माँ भी बहू के आराम, पसंद और जरूरतों का सामान जुटा रही थी। दादी का ध्यान केवल बहू के रंग रूप और संस्कारों पर था। उसे पूरा यकीन था कि उसका लाड़ला पोता कभी गलत चुनाव कर ही नहीं सकता है। उसने निश्चय ही सुन्दर सुघड़ बहू चुनी होगी।

अरूण और मैनी के स्वागत के लिये पूरा परिवार हवाई अड्डे पर पहुँच गया। अरूण ने बड़ों के पैर छुए। उसने मैनी को भी ऐसा करने का इशारा किया। मगर माँ ने आगे बढ़कर उसे रोक दिया और मैनी को गले लगा लिया। वे बोली-”नहीं अभी ऐसे नहीं। नई बहू का स्वागत होने के बाद ही वह किसी के पैर लगती है।”

दादी घर के दरवाजे पर खड़ी बहू का बेताबी से इंतजार कर रही थी। उन्होंने मुख्य द्वार और गलियारे में शुभ चिन्हों वाली सुन्दर रंगोली सुबह ही बनवा दी थी। पूजागृह में कुल देवता की स्थापना कर नवदम्पत्ति से पूजन कराने की व्यवस्था भी कर ली थी।

जैसे ही द्वार पर गाड़ी रूकी। दादी आगे बढ़ी। उन्होंने सम्भाल कर बहू को गाड़ी से उतरवाया। अरूण के साथ बहू की आरती कर दोनों को घर में लाया गया। देवपूजन के बाद जलपान और थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद अरूण और मैनी अपने कमरे में चले गए। चार छः दिन हल्की-फुलकी रस्में चलती रही। माँ जो भी जिस तरह मैनी को समझाती वह बिना संकोच और झुंझलाहट के कर देती। दादी और माँ खुश होती। दादी हर बार कहती. “संस्कारित है।” अरूण की बहनें मैनी से दिन भर बातें करती। वे माँ और दादी की हिन्दी में कही बातें अँग्रेज़ी में मैनी को और मैनी द्वारा अँग्रेज़ी में कही बातें हिन्दी में अनुवाद कर माँ और दादी को समझाती रहती। मैनी से उसके देश और घर के रिवाज व बातें बूझती और उसे अपने घर व देश की बातें बताने की कोशिश करती। मैनी बातों को समझने और सबके साथ घुलमिलकर रहने की कोशिश करती। वह हिन्दू धर्म ग्रंथों व धर्म स्थलों में विशेष रुचि रखती थी। अतः अवसर मिलते ही उनकी विस्तृत जानकारी लेने का प्रयास करती। अरूण के परिवार के सभी लोग अपनी समझ से उसे पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते। वे उसकी जिज्ञासाओं की खूब तारीफ करते। अरूण के पापा तो दिन में कितनी ही बार रिश्तेदारों और मित्रों को मैनी द्वारा पूछे गए प्रश्नों का हल खोजने के लिये फोन करते रहते। अरूण भी मैनी के अपने परिवार में घुलमिल जाने से बेहद खुश था। वह इसके लिये मैनी की तारीफ करता और माँ, बहनों व दादी को भी उत्साहित करता। अरूण की उम्मीद से भी अधिक मैनी उसके परिवार में मिक्सप हो गई थी। उसका हिन्दुस्तान आने का मकसद पूरा हो गया था। अब वह मैनी को रिश्तेदारों और मित्रों से मिलवाने की योजना बनाने लगा। माँ और पापा से हर दिन यह चर्चा होती कि एक दावत का आयोजन कर सब रिश्तेदारों को यहाँ बुला लिया जाय या फिर हम ही लम्बे टूर पर निकल जाँय। लेकिन कुछ निश्चित नहीं हो पा रहा था।

मैनी अब अरूण से अलग भी उसकी बहनों के साथ घूमने, शापिंग करने और मूवी देखने जाने लगी थी। वह उनसे सूट और साड़ी पहनना सीखती, भारतीय व्यंजनों के गुणों और बनाने के तरीकों में रुचि लेती। कभी-कभी रसोई में चली जाती और माँ को खाना बनाते हुए ध्यान से देखती। एक दो बार उसने रोटियाँ बेलने का भी प्रयास किया। अरूण की बहनें उसे अँग्रेज़ी में व इशारों से या कभी रसोई के सामान दिखाकर थोड़ा बहुत समझाती रहती। वह सहमति में ऐसे सिर हिलाती जैसे सब समझ गई हो। दादी उसकी ऐसी बातों पर निहाल हो जाती। वह उसकी बलाएँ लेती और माथा चूम लेती। दादी घर में आने वाले मेहमानों से मैनी की तारीफ करती न अघाती। बाई को मैनी के कमरे की विशेष रूप से सफाई करने और उसकी जरूरतों का खास ध्यान रखने को बराबर कहती रहती। मैनी माँ को दादी और उसकी हम उम्र महिलाओं के पैर छूते देखती तो स्वयं भी ऐसा करती। दादी खुशी से फूली न समाती और इशारे से उसे अपनी सास के भी पैर छूने को समझाती। इसी हँसी खुशी के माहौल में पूरा महीना कब बीत गया किसी को एहसास ही न हुआ। अरूण और मैनी को पन्द्रह दिन इण्डियन टूर पर जाना था। माँ ने उनके लिये आवश्यक सामग्री इकट्ठा कर दी। अरूण और उसके पापा ने मिलकर फ्लाइटें बुक करा लीं। अरूण की बहनों ने मैनी को इण्डियन टूरिस्ट प्लेस पर होने वाली मुश्किलों-चोर, ठगों, जहर खुरानों, खान-पान के प्रदूषण आदि के विषय में समझा दिया। एक छोटा सा ब्रेकफास्ट और एक फस्टएड बाक्स उनके लिये तैयार कर दिया गया। अरूण और मैनी चले गए।

परिवार के लोग अरूण और मैनी के लौटकर आने पर होने वाली दावत की तैयारी में जुट गए। सभी रिश्तेदारों और मित्रों को निमंत्रण भेज दिया गया। पूजा भोज, मेहमानों के रूकने आदि की सभी व्यवस्था कर ली गई। मैनी के लिये दुल्हन वाला जोड़ा और गोल्डन सैट खरीदा गया। सप्ताह भर पहले मेहमान आने शुरू हो गए। ठीक समय पर अरूण और मैनी भी आ गए। दादी की दो छोटी बहनें हरिद्वार यात्रा पर गई हुई थीं। बुलावा पाकर वे अपने कार्यक्रम को बीच में ही छोड़कर आ गई। दादी उनसे हर दिन मैनी की ढेरों तारीफ करती। एक दोपहर दादी ऐसी ही बातें कह रही थी। छोटी दादियाँ ध्यान लगाकर सुन रही थी। एक बोल उठी. “अरी जीजी, सब आपकी प्रभु भक्ति का प्रसाद है। वरना इतना सलीका और संस्कार तो यहाँ की लड़कियों में भी नहीं है।” दूसरी बोली. “हमारा अरूण क्या कम है। जीजी ने उसे श्रवण कुमार के संस्कार जो दिये हैं। अब जैसा बेटा वैसी बहू।” दादी बोली. “सब ऊपर वाले की कृपा है बहन।” तभी बाई ने आकर कहा. “माँजी ने खाना लगा दिया है। आप लोग भोजन कर लें।” छोटी दादी बोली. “अरे मैनी को भी बुला लो। एक दो दिन तो सबके साथ खा पी ले।” दादी बोली. “ना बहन, वो सबके बाद में खाना खाती है। चाहें जितना कहो। जब तक अरूण खाना न खा ले वो एक दाना भी मुँह में नहीं डालेगी। वो भी अरूण की थाली का बचा खाती है बस और कुछ नहीं।” शुरू में तो हम समझते ही नहीं थे। बेचारी भूखी रह जाती होगी। अब अरूण के लिये ही अधिक परस देते हैं। कम से कम दोनों का पेट तो भर जाय। मैनी माँ की मदद करने चौके में आ गई थी। वह परसी थालियों को मेहमानों तक पहुँचाने का काम कर रही थी। अरूण की बहनें दौड़-दौड़ कर चटाईयाँ बिछाने, बरतन लाने और भोजन परसने का काम कर रही थी। दादियाँ भोजन करते हुये आपस में बातें कर रही थी। मैनी थोड़ा रूककर दादियों की बात ध्यान से सुनने लगी। छोटी दादी बोली. “ऐसे सुसंस्कार बहू ने कहाँ पाये होंगे जीजी?”

दादी ने समझाया. “उसकी दादी इण्डियन है उसी से सीखा है और कहाँ से?” मझली दादी बोली. “ऐसी पति भक्ति तो पहले जमाने में ही थी। अब तो बस सती सावित्री की कहानियों में समझो। हमारे धन्य भाग हैं। जो मैनी जैसी बहू मिली है। मन खुश हो गया जीजी।”

मैनी अब तक दादी की बातों को काफी हद तक समझने लगी थी। उन्होंने उसकी तारीफ के बहुत से वाक्यों को आने वालों के सामने इतनी बार दोहराया था कि उसे लगभग कंठस्थ हो गए थे। पतिव्रता, सती सावित्री संस्कारों जैसे शब्द भी अब उसके परिचित हो गए थे। वह अचानक बोल उठी. “नहीं.नहीं दादी, ऐसा नहीं है। मैं अरूण का बचा अपनी दादी के निर्देशानुसार खाती हूँ। उन्होंने इण्डिया आते समय मुझे चेताया था कि इण्डियन सास बहू को जहर दे देती है। यह कोई संस्कार नहीं है बल्कि सावधानी है।” बात अँग्रेज़ी में कही गई थी। दादियों की समझ में कुछ नहीं आया।

दादी बोली. “बहू कहती है। सब खूब अच्छे से खाओ।”

अरूण की बहन दोनों की बात का अंतर समझ कर ठहाका मार कर हँस पड़ी। मैनी तेज आवाज में बोली थी। माँ ने भी उसे रसोई में स्पष्ट सुना। वह बाहर देखने लगी। माँ को झटका सा लगा. संस्कारों की उदाहरण भारतीय नारी का बाहर ऐसा प्रचार। अरूण की बहन दादी को सही बात बताने को बोलने ही वाली थी कि माँ ने उसे तेज आवाज लगाई। साथ ही चुप रहने का इशारा कर बोली. “हँसी मजाक का समय नहीं है। खाना ठण्डा हो रहा है जल्दी से रोटियाँ लेकर जाओ।” बेटी जैसे ही रसोई में आई माँ ने उसे धीमी आवाज में कहा. “दादी जो समझ रही है उसे वैसा ही समझने दो। कोई तो सुख से जिये। नासमझी में ही सही।”

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लेखिका.

डॉ0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी.एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डाॅ0 शर्मा की एक शोध पुस्तक . भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र.पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा. एम0 ए0 (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी0 एड0, एम0 फिल0 (इतिहास), पी.एच0 डी0 (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं. भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस0 एस0 पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गांव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो.बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाॅ (कहानी संग्रह), 2014

मैं किशोर हूॅ (बाल कविता संग्रह), 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कहानियां, कविताएं प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

 

सम्पर्क -

डा0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा,

“विश्रुत”, 5, एम.आई.जी., गोविंदपुर,

निकट अपट्रान चैराहा,

इलाहाबाद (उ0प्र0), पिनः 211004,

दूरभाषः ़91.0532.2542514,

 

ई.मेलः <draparna85@gmail.com>

मलेशिया का एक राज्य ,मलाका स्वच्छ नील गगन ,घनघोर हरियाली और विशाल समुद्र तट पर बसा हुआ एक बहुत ही खूब सूरत जगह है।  यह पर्यटकों के लिए एक बेहद आकर्षक जगह बन गया है । बचपन में पढे गए सिंदबाद की यात्रा अनायास याद आ जाना मेरे मस्तिष्क में एक ऐसा रहस्यमय किला बना गया ,लगा ,इसे गंभीरता से जानने ,समझने ,बूझने के लिए ही मैं यहाँ की दहलीज पर आ खड़ी हुई थी । सुल्तान ,शाहजादे ,शाहजादिओं की धरती ,व्यापार और व्यापारियों की धरती ,तीर और तलवार की धरती ,तिलस्म और खुराफात की धरती ,षडयंत्र और गुनाह की धरती । क्या इसे कभी चैन मिला होगा ?

0 । यह देश की राजधानी कुवालालम्पूर से 147 किलोमीटर और सिंगापूर से 245किलो मीटर दूर है ।यहाँ की सड़कें चौड़ी और सुंदर है ,।  इसकी विधिवत  स्थापना 1396 ईसवी में परामेश्वरा जो तेमासिक {प्राचीन सिंगापूर का अंतिम राजा था } ने किया । यहाँ मलाका नाम का वृक्ष और नदी  भी है,शायद इसी के नाम पर इसका नाम कारण हुआ हो । प्रथम सुल्तान के आगमन के पहले मलाका एक मछुआरों का गाँव था ।उसकी अपनी व्यथा कथा थी और अपना एक इतिहास था । मलय सभ्यता का प्रभाव अगल बगल के पड़ोसी राज्यों मे आज भी दिखाई पड़ता है ।

      मलाका पर मलाका सुल्तान ,डच ,पुर्तगाल ,ब्रिटेन ,और जापान ने भी शासन किया था ,और अपने अपने स्थापत्य कला,रीति रिवाज के अवशेष भी छोड़े । सन 1957 के 31 अगस्त को यह स्वतंत्र हो गया {मलेशिया}  अपनी प्राचीन धरोहरों  की वजह से यह एक अति महत्वपूर्ण स्थान समझा गया और ,7 जुलाई 2008 को इसे यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज मे शामिल कर लिया गया ।

     प्राचीन काल मे यह सामुद्रिक व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था ,प्राय; कई देशों से इसके व्यापारिक संबंध थे जिसमें भारत भी एक था ।अपने सामरिक महत्व के खातिर यह प्राय; दुश्मनों की आँखों मे खटकता रहता था । इसकी प्राचीन गाथाएँ इसके म्यूजियम ,इसकी कला कृतियों ,इसके वर्तमान शहर में भी अंगड़ाई लेती देखी जा सकती है । मलाका राज्य की राजधानी मलाका है । मलाका का नारा है “विजिटिंग मलाका मीन्स विजिटिंग मलेशिया”। यह मलेशिया का तीसरा सबसे छोटा राज्य है ,पहला पेरालिस और दूसरा पेनांग है ।  मलाका  के एक खूब सूरत  पाँच सितारे बहुमंजिले होटल से मलाका शहर का दृश्य देखते ही बनता था , शहर के किनारे दूर दूर तक समंदर ,समंदर मे जाती हुई कश्तियां,कश्तिओ पर मचलती हुई,ख्वाब से भरी , जिंदगानियाँ । रात में रंगबिरंगी बल्बों से चमकता शहर अलिफलैला के किसी सुनहरे संसार की रचना करती हुई सी लगती  है।

यहाँ बहुत कुछ देखने वाली जगहें हैं ।सेंट पीटर चर्च ,कहते हैं कि इसकी घंटी 1608 ईसवी में गोवा से लायी गई थी । इस्ताना केसुलताना मेलाका – इस बहू मंज़िले  महल रूपी म्यूजियम को देखने पर वहाँ के प्राचीन राजदरबार के गतिविधिओं की झलक मिलती है । मंहगी लकड़ी का नक्काशीदार महल ,दरवाजे पर दो हबशी भाला  लिए खड़े ॰हब्शी की आँखों मे क्रूरता ,राजमहलों की छतों पर बैठी ,घूमती किसी भी महिला पर कोई आँख भी उठा कर देख ले ,चाहे वो जो हो ,उसकी मौत तय थी ,इन्हीं खूंखार पहरूओं के हाथों ।

दरबार में राजा के बाद कौन अधिकारी कहाँ बैठता था ,इसे मूर्ति के माध्यम से बहुत खूबसूरती के साथ दिखाया गया है । राजकुमारों के सजीले वस्त्र ,गहने, सुल्तान का शयन कक्ष ,उनके दरबार में आने वाले विदेशी व्यापारियों ,उनके उत्पादन या सामाग्री आदि को बहुत ही बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया गया है । बड़े बड़े आयल पेंटिंग के माध्यम से भी तत्कालीन सल्तनत की दिन चर्या दिखाई गई है ।

इसके अलावे भी यहाँ बहुत सारे म्यूजियम है ।एक म्यूजियम विराट जहाज पर भी बना हुआ है जो अपने आप मे निराला है  इस प्राचीन  जहाज के सबसे नीचे वाले तल में समुद्री लुटेरों ,आक्रमणकारियों को पकड़ कर रखा जाता था ,कुछ को मार दिया जाता था कुछ को गुलाम बना कर बेच या काम पर रख लिया जाता था । एडुकेशन म्यूजियम ,कस्टम म्यूजियम आदि भी देखने योग्य है । ।कस्टम म्यूजियम में तो साठ के दशक के मोहम्मद रफी के गाने बज रहा था ,काउंटर पर बैठे मलय व्यक्ति ने इसे सुनना अपना शौक बताया । द्वितीय विश्व युद्ध से पहले 1876 और 1941 के बीच वहाँ तकरीबन 55 मलय अखबार प्रकाशित होती थी और 100पत्रिकाएँ मलय ,अरबी और रोमन मिश्रित भाषाओं में प्रकाशित हुई थी .। यहाँ का पहला मलय  अखबार जावी पेराना कान1876 में सिंगापूर से प्रकाशित हुई थी ।यहाँ का साहित्य बहुत ही समृद्ध है । और साहित्यकारों का सम्मान भी काफी है ।

  लिटरेचर म्यूजियम की संरचना एक निवास स्थान की तरह ,यहाँ नीचे के तहखाने में बंदियों ,लुटेरों को कैद करने की जगह बनी है । समुद्री इलाका होने के कारण यहाँ चोर लुटेरों का काफी उपद्रव भी होता रहता था । विभिन्न प्रान्तों के व्यापारियों के आने से यहाँ इस्लाम का प्रादुर्भाव बहुत पहले हो गया था ।

वहाँ का मौल पहलावान का वास्तु शिल्प बेहद आकर्षक है । अलादीन के चराग ,जुते ,सुराही आदि देखते ही बनती है ।

वहाँ खाने पीने के लिए अनेक बेहतरीन होटल और रेस्तरा हैं । यहाँ मलय ,चीनी ,भारतीय आदि सभी प्रकार के भोजन मिलते हैं । यहाँ प्राचीन चर्च की सुन्दर इमारत के सामने खूब सूरत तरीके से सजाए रिक्शे लगे रहते हैं ,जिसपर लोग सवारी कारण पसंद करते हैं ।

    मेनारा तमिंग साई सबसे ऊंची[ 110 मीटर]  परिक्रमा करती हुई मीनार है जहां से पूरे मलाका का दृश्य दिखाई पड़ता है ,पुरानी पुर्तगाली बिल्डिंग से दूर आधुनिक इमारतें इसे नूतन और पुरातन दोनों दृष्टि से बेमिसाल बनती है ।

सन 2010 के 21 अक्तूबर को हुए एक समारोह मे कहा गया कि ओरगनाईजेशन फॉर इकनॉमिक कोओपरेसन एंड डेव्लपमेंट द्वारा निर्धारित बेंचमार्क पूरा कर यह डेव्लप्ड स्टेट बन गया है ।

   यहाँ की आबादी के 63% मलय हैं ,25.3% चीनी ,भारतीय और चील्टी 6% ।कुछ संख्या मे यहाँ सिक्ख समुदाय है जिन्होने गुरुद्वारा बनाया है । मलाका एक समृद्ध देश है {पहले यह ओपेक का सदस्य था } और प्रकृतिक संसाधन से भरपूर भी ।  यहाँ के लोग बड़े रईस  स्वभाव के होते हैं बड़ी बड़ी गाडियाँ चलाना ,मौज मस्ती करना इन्हें अच्छा लगता है । वहाँ चारों तरफ काफी लंबी दूरी तक ऊंचे ऊंचे पेड़ है यहाँ का टिंबर पूरे विश्व में निर्यात होता है ।

    कामिनी कामायनी ॥

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भारत में श्वेत क्रांति के जनक और अमूल के संस्थापक वर्गीस कुरियन की 94वीं जयंती के मौके पर सर्च इंजन गूगल ने अपनी लाज़वाब पेशकश की फेहरिस्त में एक और कड़ी जोड़ते हुए अपने डूडल के जरिए उन्हें अर्थपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। गूगल ने कुरियन को दूध का डोलची लिए हुए दिखाया है जिसमें वह एक दुधारू पशु के पास बैठे हुए हैं। डूडल में उनके पास एक भैंस खड़ी है और पास में दूध की तीन डोलची रखी हैं, जिनमें से एक को उन्होंने हाथ में थामे हुआ है।गूगल का यह डूडल भारत के ग्रामीण इलाके का चित्र भी प्रस्तुत करता है।

लिहाज़ा, कहना न होगा कि एक तस्वीर में गूगल ने दिखा दिया भारत में श्वेत क्रांति के जनक और अमूल के संस्थापक वर्गीस कुरियन की 94वीं जयंती है। किसी समय दूध की कमी से जूझने वाले भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने वाले 'श्वेत क्रांति के जनक' डा. वर्गीज कुरियन 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' के नाम से भी जाने जाते हैं। उन्हें भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने का श्रेय जाता है। स्मरण रहे कि कुरियन को 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) का संस्थापक-अध्यक्ष नियुक्त किया था।

गौरतलब है कि डॉ वर्गीज कुरियन ने देश में सहकारी दुग्ध उद्योग के मॉडल की आधारशिला रखी थी। वर्गीज कुरियन का जन्म केरल के कोझिकोड में 26 नवंबर 1921 को हुआ था। वर्गीस ने लोयोला कॉलेज से 1940 में स्नातक करने के बाद चेन्नई के गिंडी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। जमशेदपुर स्थित टिस्को में कुछ समय काम करने के बाद कुरियन को डेयरी इंजीनियरिंग में अध्ययन करने के लिए भारत सरकार की ओर से छात्रवृत्ति दी गई। बेंगलुरु के इंपीरियल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल हजबेंड्री एंड डेयरिंग में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कुरियन अमेरिका गए जहां उन्होंने मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी से 1948 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अपनी मास्टर डिग्री हासिल की, जिसमें डेयरी इंजीनियरिंग भी एक विषय था।

डॉ.वर्गीज कुरियन ने गुजरात के आंणद में एक छोटे से गैराज से अमूल की शुरुआत करनी पड़ी। कुरियन का सपना था देश को दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर करने के साथ ही किसानों की दशा सुधारना। उन्होंने त्रिभुवन भाई पटेल के साथ मिलकर खेड़ा जिला सहकारी समिति शुरू की। उस समय डेयरी उद्योग पर निजी लोगों का कब्जा था। उन्होंने ज्ञान और प्रबंधन पर आधारित संस्थाओं का विकास किया।

डॉ.कुरियन कुरियन ने गुजरात में वर्ष 1946 में दो गांवों को सदस्य बनाकर डेयरी सहकारिता संघ की स्थापना की। वर्तमान में इसकी सदस्य संख्या 16,100 है। इस संघ से 32 लाख दुग्ध उत्पादक जुड़े हैं। भैंस के दूध से पावडर का निर्माण करने वाले कुरियन दुनिया के पहले व्यक्ति थे। इससे पहले गाय के दूध से पावडर का निर्माण किया जाता था।

डॉ.वर्गीस का जीवन सहकारिता के माध्यम से भारतीय किसानों को सशक्त बनाने पर समर्पित था। उन्होंने 1949 में कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड के अध्यक्ष त्रिभुवनदास पटेल के अनुरोध पर डेयरी का काम संभाला। सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर इस डेयरी की स्थापना की गई थी। बाद में पटेल ने कुरियन को एक डेयरी प्रसंस्करण उद्योग बनाने में मदद करने के लिए कहा जहां से ‘अमूल’ का जन्म हुआ। भैंस के दूध से पहली बार पाउडर बनाने का श्रेय भी कुरियन को जाता है। उन दिनों दुनिया में गाय के दूध से दुग्ध पाउडर बनाया जाता था।

अमूल की सफलता से अभिभूत होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अमूल मॉडल को अन्य स्थानों पर फैलाने के लिए राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड (एनडीडीबी) का गठन किया और उन्हें बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। एनडीडीबी ने 1970 में ‘ऑपरेशन फ्लड’ की शुरुआत की जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बन गया। कुरियन ने 1965 से 1998 तक 33 साल एनडीडीबी के अध्यक्ष के तौर पर सेवाएं दीं। साठ के दशक में भारत में दूध की खपत जहां दो करोड़ टन थी वहीं 2011 में यह 12.2 करोड़ टन पहुंच गई। 1965 के बाद के 33 वर्षों में उनके बनाए सहकारिता पर आधारित अमूल मॉडल का अनुकरण पूरे देश में किया गया। कुरियन 1965-1998 तक एनडीडीबी के संस्थापक प्रमुख, 1973 से 2006 तक गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के प्रमुख और 1979 से 2006 तक इंस्टीट्‍यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट के अध्यक्ष रहे।

भारत सरकार ने वर्गीज़ कुरियन को पद्म श्री (1965), पद्म भूषण (1966), पद्म विभूषण (1999) से सम्मानित किया था। उन्हें सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (1963), 'कार्नेगी वाटलर विश्व शांति पुरस्कार', 'वर्ल्ड फ़ूड प्राइज़' (1989),'विश्व खाद्य पुरस्कार' (1989), 'कृषि रत्न' (1986), और अमेरिका के 'इंटरनेशनल परसन ऑफ द ईयर सम्मान' से भी नवाजा गया। इसके अतिरिक्त 'मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी' और 'तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय' समेत कई संस्थानों ने डॉक्टरेट की उपाधि दी। वर्गीज़ कुरियन और श्याम बेनेगल ने मिलकर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फ़िल्म 'मंथन' की कहानी भी लिखी है जिसे क़रीब 5 लाख किसानों ने वित्तीय सहायता दी। विश्व बैंक ने ग़रीबी उन्मूलन के लिए अमूल मॉडल को चिन्हित किया है। अमूल मॉडल को व्यापक और लोकप्रिय बनाने में वर्गीज़ की बड़ी भूमिका रही है। स्वयं जवाहरलाल नेहरू अमूल के उद्घाटन के अवसर पर आए थे।

‘द मैन हू मेड द एलिफैंट डांस’ नाम की ये ऑडियो बुक, वर्ष 2005 में छपी उनकी जीवनी, ‘आई टू हैड ए ड्रीम’ पर आधारित है।  याद रहे कि इसका अनावरण करते हुए नारायण मूर्ति ने कहा था, “एक सभ्य समाज वही है जो किसी के महत्वपूर्ण योगदान का आभार व्यक्त करे, अगर हमारा देश डॉ. कुरियन को भारत रत्न से सम्मानित नहीं करता तो मुझे नहीं समझ आता कि और कौन इस सम्मान के योग्य है ? बहरहाल, डॉ.कुरियन भारत के अमूल्य रत्न और अमूल के अनमोल संस्थापक तो हैं ही, इसमें दो मत नहीं कि उनके कार्यों और काबिलियत के दम पर भारत का नाम पूरी दुनिया में मशहूर हुआ है। श्वेत क्रांति के इस मसीहा के लिए डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल का एक मुक्तक बेशक माकूल मालूम पड़ता है कि -

सभी को देखता है, जाँचता है, प्यार करता है

वह सैलानी है मन मेरा किसी से कुछ नहीं लेता

सभी के काम आ, लेकिन न बदले की तमन्ना रख

कि सूरज रोशनी देकर ज़मीं से कुछ नहीं लेता

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय

स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय

राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )

26 साल पहले संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने बाल अधिकार समझौते को पारित किया गया था जिसके बाद वैश्विक स्तर से बच्चों के अधिकार को गंभीरता से स्वीकार किया जाने लगा. इस समझोते की रोशनी में भारत में भी बच्चों के हक में कई नीतियाँ और कानून बनाये गये हैं. बच्चों और किशोरों की सुरक्षा, संरक्षण और देखभाल के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000 में किशोर न्याय अधिनियम लाया गया। यह एक ऐसा प्रगतिशील कानून है ।इसके तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी विधि विवादित बच्चे के साथ वयस्कों की तरह व्यवहार नही किया जा सकता है उनके लिए लिए अलग से न्याय व्यवस्था की गयी है, इस कानून के दूसरे हिस्से में घर से भागे हुए, अत्यन्त गरीब परिवारों के, अनाथ या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था है। 2007 में केंद्र सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल संरक्षण योजना बनाई गयी। अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह हो, एक आश्रय गृह हो, एक आबजव्रेशन होम हो, एक विशेष गृह हो। आश्रय गृह और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाना है।

किशोर न्याय अधिनियम और एकीकृत बाल संरक्षण योजना कागजी रुप से सबसे अच्छी योजना है। यह कानून इतना आदर्श है कि अगर इसे उसकी आत्मा के अनुसार लागू किया जाये तो शायद कोई भी बच्चा लावारिस,सड़क पर भीख मांगता, मजदूरी करता दिखाई नहीं देगा और सभी विधि विवादित बच्चों का सुधारात्मक पुनर्वास हो जाएगा । लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सारी समस्याऐं, जटिलतायें और रुकावटों सामने आ रही है।। इसे लागू करने में 9 विभागों की भूमिका बनती है लेकिन हकीकत यह है कि महिला बाल विकास और सामाजिक न्याय विभाग को छोड़ कर ज्यादातर विभाग इसके प्रति उदासीन है और यह उनकी प्राथमिकता में नही आता है। इसे लागू करने वाली संस्थाओं , पुलिस, अभियोजन पक्ष, वकीलों और यहाँ तक कि जजों को भी इस कानून के प्रावधानों और इसकी आत्मा की जानकारी नहीं हो सकी है। इसे जमीन स्तर पर उतारने के लिए संस्थाओं, एजेंसियों में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी एक बड़ी चुनौती है। संरक्षण और सुधार गृहों की स्थिति भी दयनीय है आईसीपीएस को लागू करने में राज्य के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं की भी महती भूमिका बन गई है। इसकी वजह से भी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं इससे सरकारों को बच्चों के प्रति अपनी जवाबदेही को स्वंयसेवी संस्थाओं की तरफ मोड़ने में आसानी हो जाती है। ।

आये दिन शिशु ,बाल एवं सुधार गृहों से बच्चों के उत्पीड़न, उनके देखभाल में कोताही, सुरक्षा में चूक, पर्याप्त सेवाओं और सुविधाओं के अभाव की खबरें आती रहती हैं। हर घटना एक सुर्खी तो बनती है फिर कहीं और एक और पुनरावृत्ति सामने आ जाती है, इसे रोकने के लिए शायद ही कोई ठोस कदम उठाया जाता हो। सारा जोर किसी पर दोषारोपण करके पूरे मामले को दबाने पर होता है। समस्या की जड़ पर शायद ही बात की जाती हो।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरे देश देश के बाल सुधार ग्रहों की स्थिति के अध्यन के लिए न्यायाधीश मदन बी. लोकर की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गयी थी, इस न्यायिक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश के सरकारी बाल सुधार गृहों में रह रहे 40 प्रतिषत “विधि विवादित बच्चे” बहुत चिंताजनक स्थिति में रहते हैं, यहाँ उन्हें रखने का मकसद उनमें सुधार लाना है लेकिन हमारे बाल सुधार गृहों की हालत वयस्कों के कारागारों से भी बदतर है. कमेटी के अनुसार बाल सुधार गृहों को को “चाइल्ड फ्रेंडली” तरीके से चलाने के लिए सरकारों द्वारा पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं, किशोर न्याय अधिनियम के कई सारे प्रावधान जैसे सामुदायिक सेवा, परामर्श केंद्र और किशोरों की सजा से संबंधित अन्य प्रावधान जमीन पर लागू होने के बजाये अभी भी कागजों पर ही है।

सुधार और आश्रय गृहों में रहने वाले बच्चे ही सुरक्षित नही हैं सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि गृहों में बच्चों के साथ उत्पीड़न और र्दुव्यवहार के ज्यादातर मामलों में वहां के कर्मचारी और अधिकारी ही शामिल पाये गये हैं। एशियन सेंटर फॉर हयूमेन राइट्स,नई दिल्ली की रिर्पोट “India's Hell Hole: Child Sexual Assault in Juvenile Justice Homes जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों में स्थित बाल गृहों में बच्चों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न के जिन 39 मामलों का अध्ययन किया गया है, इसमें से 11 मामले सरकारी सम्प्रेक्षण गृह,बाल गृह,आश्रय गृह और अनाथालयों के हैं, जबकि 27 केस प्रायवेट या स्वंसेवी संस्था द्वारा चलाये जा रहे संम्प्रेक्षण गृह, बाल गृह, आश्रय गृह और अनाथालयों के हैं। सरकारी गृहों के मामले में ज्यादातर अपराधकर्ता वहीं के कर्मचारी जैसे केयर- टेकर, रसोईया, सुरक्षाकर्मी शामिल थे। जबकि प्रायवेट या स्वंसेवी संस्था के द्वारा चलाये गृहों में अपराधकर्ता संस्था के मैनेजर/ संस्थापक , संचालक, उनके रिश्तेदार /दोस्त, अन्य कर्मचारी जैसे केयरटेकर, वार्डन, रसोईया, सुरक्षाकर्मी आदि शामिल थे। रिर्पोट के अनुसार ज्यादातर राज्य सरकारों द्वारा जे.जे. होमस के लिए निरीक्षण कमेटी का गठन नही किया गया है। किशोर न्याय अधनियम 2007 के नियमों के अनुसार सभी तरह के गृहों में रहने वाले बच्चों का उनके जुर्म, आयु, लिंग के आधार पर वर्गीकरण करके उन्हे अलग अलग रखना चाहिए। लेकिन इसका पालन नही किया जा रहा है। इससे बड़े बच्चों द्वारा छोटे बच्चों के उत्पीड़न के संभावना बढ़ जाती है .

किशोर न्याय व्यवस्था अभी भी ठीक से लागू नही हो सकी है। बाल सुरक्षा के लिए काम करने वाली संस्था “आंगन” द्वारा 31 संप्रेक्षण गृहों के कुल 264 लड़कों से बात करने के बाद जो निष्कर्ष सामने आये हैं वे हमारी किशोर न्याय व्यवस्था की चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। अध्ययन में शामिल 72 प्रतिषत बच्चों ने बताया कि उन्हें किशोर न्याय बोर्ड के सामने प्रस्तुत करने से पहले पुलिस लॉक-अप में रखा गया था, 38 प्रतिषत बच्चों का तो कहना था कि उन्हें पुलिस लॉक-अप में 7 से 10 दिनों तक रखा गया था जो की पूरी तरह से कानून का उलंघन है। इसी तरह से 45 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि पुलिस कस्टडी के दौरान उन्हें शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया गया , जिसमें चमड़े की बेल्ट और लोहे की छड़ी तक का इस्तेमाल किया गया. कुछ बच्चों ने यह भी बताया कि उन्हें उन अपराधों को स्वीकार करने के लिए बुरी तरह से पीटा गया जो उन्होंने किया ही नहीं था। किशोरे न्याय व्यवस्था की कार्यशाली और संवेदनहीनता को रेखांकित करते 75 प्रतिषत बच्चों ने बताया कि पेशी के दौरान बोर्ड उनसे कोई सवाल नहीं पुछा और ना ही उनका पक्ष जानने का प्रयास किया।

शायद इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किशोर गृहों के का निगरानी निर्णय लिया गया। इसके तहत एक पैनल का गठन किया गया है . सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने सभी राज्यों के हाई कोर्ट को भी लिखा कि वे अपने यहाँ एक जज को नामांकित करे जो इन गृहों का निरीक्षण करेगें। समय समय पर ये जज गृहों में जाकर देखेगें कि वे सही चल रहे है या नही और उन्हें पर्याप्त राशि प्राप्त हो रही है या नही और इसकी रिर्पोट वे राज्य सरकार और जुवेनाइल कमेटीयों को भेजेगी। सितंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केन्द्र और राज्य सरकारों को यह निर्देष दिया गया है कि देश में अपंजीकृत स्वंसेवी संस्था द्वारा चलाये जा रहे बाल गृहों को तत्काल बंद किया जाये और उन्हें किसी भी तरह की सरकारी फंड न दिया जाये इसके लिए 31 दिसंबर 2015 तक का समय दिया है।

समाज में बच्चे सबसे असुरक्षित होते है इसलिए उनकी सुरक्षा,देखरेख और बचाव के लिए विशेष प्रयास की जरुरत होती है। हमारे देश में किशोर न्याय अधनियम और एकीकृत बाल संरक्षण योजना इसी दिशा में किये गये प्रावधान हैं। इस व्यवस्था के तहत बनाये गये आवासीय, देखरेख और सुधार गृहों से यह अपेक्षा की जाती है कि वहां बच्चे ना केवल सुरक्षित रहेगें बल्कि उनके लिए एक वैकल्पिक परिवार के रूप में भी कार्य करेगें और उसकी भावनात्मक और विकास से जुडी आवश्यकताऐं पूरी हो सकेगीं।

लेकिन दुर्भाग्य से ये भरोसा बन नही पाया है और अपेक्षाऐं पूरी नही हो पायी। सरकारी और गैर सरकारी दोनों संस्थानों से शारीरिक,मानसिक व यौन उत्पीड़न के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इन संस्थानों में ऐसी घटनाओं को रोकने और बच्चों की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार लाना एक ऐसी चुनौती है जिसे सम्पूर्णता के साथ सम्बोधित करने की जरूरत है।

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दो कविताएँ
       1. चिन्तन और मैं
           प्रोफेसर महावीर सरन जैन
 
जब होते हो,
मन में रह रहकर
पलने वाला कम्पन
सिगरेट धुएँ की भाँति-
सुलगता है।
जलता नहीं।
ज़ीरो बाल्ट के बल्ब की
मद्धिम रोशनी की भाँति-
कोठरी के अनेक खुरदुरे चिह्नों को,
धुँधला देता है;
ढाँक लेता है।
होलिका दहन की
तेज रोशनी की भाँति-
अतीत की परम्परा से बने
अन्तर्जगत के गह्वरों को-
कौंधाता नहीं।
मन के पट भिड़ जाते हैं।
महानगरों के पड़ौसियों की भाँति-
बन्द दरवाजे के सामने होकर
मैं,
अपने को,
कनखियों से निहार भर पाता हूँ


नयनों में चित्र नहीं बनते,
कानों में राग नहीं बजते,
जड़ता, मरघट सी शान्ति,
अजीब, निगूढ़, काले वलयों में-
भावों की रेखायें आबद्ध हो जाती हैं।


इन्द्रियेत्तर बोध के मोह में,
बर्फीली श्वेतता की आभा में,
अहसास होता है -
मेरा ‘मैं’ जीने लगा है।
इन्द्रियों की शिथिलता,
अन्तर की निष्क्रियता,
जड़ता की योगिनी,
लगता है -
मूलाधार पर कुंडली मारी हुई प्रज्ञा
फन उठा रही है।
चिन्तन का स्फीत्कार साँप
अन्न से आनन्द की ओर
दौड़ रहा है।
अब,
सब,
निःशेष हो गया है।
निर्मल,
असीम,
मेरा ‘मैं’ बचा है।


घुमड़ता नीलापन,
लालिमा सा पगलाकर,

फैलता चला जाता है
दिग-दिगन्त।
मेरे ‘मैं’ में-
असीम के कण कण,
प्रकाशित से होते लगते हैं।


मगर,
उसी मैं
सबके सब
तिरोहित से हो जाते हैं।


 
2.             संवेदना और मैं
                 

 
बुद्धि की राख के
हटते ही-
स्वप्निल पंखो के यान,
सहज,
सचेष्ट,
सजग हो उठते हैं।


मेरा ‘मैं’-
दब जाता है।
अन्य बहुत से ‘मैं’
जो कभी मेरे ‘मैं’ पर
साधिकार छाए थे
आत्मीय भाव से,
उभरने लगते हैं।


चित्रलिपि,
धीमे-धीमे,
चोंच खोलती है।
अनुभूति की यादों का दबाव
बढ़ने लगता है।
ओस की बूँदें
थरथराती सी हैं।


फूलों को चूमने
तितलियाँ,
ललचाती सी हैं।
कामनाएँ
तरल होने लगती हैं।
उन्मादिनी सी हवा,
थिरकने लगती है।
मन-सूर्य की-
प्रखर प्रज्जवलता
बन्द शत दल को
बिखेर-बिखेर देती है।


अबाध्य,
मधु स्मृतियों का पीड़न।
तर्कों की तख्ती के नीचे,
सिसकता जीवन।
अस्तित्व के सागर में,
कराहती लहरें।
सब घेर लेती हैं।
सब लील जाती हैं।
कोलाहल के वात्याचक्रों से
जड़ता मिट जाती है।
रिक्तता भर जाती है।


व्यष्टि,
समष्टि,
‘मैं’ और ‘तू’
सारे भेद मिट जाते हैं।


दौड़ में,
गति में,
सक्रियता में,
‘मैं’-
स्मृतियों के रथ में-
घूमने वाला,
एक पहिया मात्र होता हूँ।

--

प्रोफेसर महावीर सरन जैन, सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

Professor Mahavir Saran Jain                                 
( Retired Director, Central Institute Of Hindi )
Address:
India:  Address:   Sushila Kunj, 123, Hari Enclave, Chandpur Road, Buland Shahr-203001, India.         
                       Mobile: 09456440756 / 08938840864 / 07409562277
USA :  Address: 855 De Anza Court, Milpitas CA 95035 - 4504
Email:     mahavirsaranjain@gmail.com

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ना वो चंद्रमुखी

ना वो है परियों की कोई कहानी

है अगर कुछ तो,

लफ़्ज है वो मेरे गीतों के

दबे हुए जज्बात है मेरे

कहीं गुम हो रही साँस है वो मेरी

मेरे कोरे कागज की कल्पना है वो

मेरी मुस्कान की वजह तो नहीं पर जीने की आस है वो ।

 

तुम पूछते हो कोन लगती है वो मेरी...?

मुझे आनंदित करने वाली सूरज की किरण है वो

मेरे धड़कते दिल की धड़कन है वो

ख़्यालो में दस्तक देने वाली एक ख्याब है वो

कोई नशा तो नहीं मेरा पर बनती हुई लत है वो मेरी ।।

 

वो पगली किसी और को चाहती है

पर मेरी कभी तो होगी , क्योंकि मेरे जीने की उम्मीद है वो

दर्द भरे नगमों का संगीत है वो

स्वंय को जीवित रखने के लिये प्रेरित करने वाले जज्बात है वो

प्रश्न तो नहीं मेरा , पर हर प्रश्न का उत्तर है वो...

 

कवि परिचय-अनुज कटारा, व्यवसाय:छात्र(राजकीय अभियांत्रिकी कॉलेज)
वर्तमान पता: H.N. 548/12 महुकलां,गंगापुर सिटी,सवाई माधोपुर,राजस्थान
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1.  तुम बिन
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तुम बिन मैं जी ना पाऊँगा |

अपने इस छोटे से हृदय मेँ ,

जाने कितने ख्वाब सजाये

तोड़ जग के सारे बंधन ,

तुमसे हम सम्बन्ध बनाये

ये जहर-ए-जुदाई

किसी कीमत पे पी न सकूंगा ,

तुम बिन मैं जी ना सकूंगा |

मेरे जीवन के मालिक तुम हो,

मैं इक दरिया और
साहिल तुम हो

अपने दिल के घावोँ को

अश्कोँ से धो ना पाऊँगा ,

तुम बिन मै जी ना पाऊँगा |



2.तुम्हेँ देखने के बाद
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पल भर का भी सुख

मेरी किस्मत मेँ नहीँ

मगर ,तुम्हेँ देखने के बाद

मैं डूब जाता हूँ

तुम्हारे प्यार के अथाह सागर मेँ |

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सागर यादव 'जख्मी'

नरायनपुर,बदलापुर,जौनपुर,उत्तर प्रदेश,भारत |

मो.8756146096

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हमारा यह शरीर परमात्मा की अनुपम कृति है। यह समस्त ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतिनिधित्व करने का सामथ्र्य रखता है। ब्रह्माण्ड भर में जो कुछ है उस तक पहुँचने का शोर्ट कट इंसान की देह में सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता ही है। चाहे इंसान किसी भी वर्ण, जाति, सम्प्रदाय, लिंग, क्षेत्र या आयु का क्यों न हो।

इस दृष्टि से पिण्ड अपने आपमेंं अनुपम ईश्वरीय कृति है। इस सत्य को जानने वाले लोग बहुत कम हैं लेकिन जो जान जाते हैं उनका जीवन धन्य हो जाता है। शेष लोग अपने तुच्छ सांसारिक स्वार्थों को ही जीवन का परम लक्ष्य मानकर श्वानों की तरह इधर-उधर भटकते ही रहते हैं।

इस पिण्ड में वो सारी ताकत है जो ब्रह्माण्ड के संचालन में समर्थ है। इसीलिए पिण्ड की शक्तियों के जागरण पर जोर दिया गया है। यह स्पष्ट है कि पिण्ड का जागरण होने पर ब्रह्माण्ड से सीधा सम्पर्क जोड़ कर दैवीय और पारलौकिक ऊर्जाओं को पाया एवं उनका उपयोग किया जा सकता है।

विज्ञान और मूर्ख लोग इस बात को मानें या न मानें, लेकिन जो अनुभवातीत शाश्वत सत्य और सनातन तथ्य है उसे कभी झुठलाया नहीं जा सकता। कोई इस पर विश्वास करे या न करे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। यों भी धर्म, न्याय और सत्य नास्तिकों, विधर्मियों और कुतर्कियों के विषय नहीं हैं। 

हमारा शरीर निरन्तर समुद्र मंथन की तरह वैचारिक मंथन करता रहता है। कभी नकारात्मक भाव पैदा हो जाते हैं तब गरल का अहसास होता है। जब कभी सकारात्मक भावों का उद्गम होता है अमृत तत्व का अनुभव होने लगता है।

यह इंसान की सोच और मनःस्थिति, संकल्पों की दृढ़ता और ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था के साथ ही मानवोचित मौलिक गुणों, धर्माचार और हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है। हम जब दैवीय भावभूमि में होते हैं तब अमृत झरने लगता है और आसुरी भावभूमि में होने पर विष झरने लगता है।

हमारे शरीर में ही दोनों का सृजन, स्फुरण और संग्रहण करने वाली पृथक-पृथक ग्रंथियां होती हैं। ये निर्झरण हमारे मन, मस्तिष्क और शरीर की हलचल, संकल्पों, आवेग-संवेगों और हरकतों पर निर्भर करता है।

जब हम वजह-बेवजह क्रोध में होते हैं तब हमारी आँखें लाल हो जाती हैं, दाँत दिखाने और चिल्लाने लगते हैं, पूरे शरीर की समस्त ऊर्जा मुँह में एकत्रित कर जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं। यही पिण्ड का वह समय होता है जब उसकी विष ग्रंथियों में विष निर्माण और इसका झरना आरंभ होने लगता है।

हम देखते हैं जिस प्रकार साँप के दाँतों से जहर निकलता है उसी प्रकार इंसान जब तीव्र गुस्से में होता है जब उसकी दाढ़ों से विशेष प्रकार का थूक निकलने लगता है जिसमें विष होता है। जैस-जैसे उसका क्रोध बढ़ता जाता है, विष सृजन और स्फुरण का घनत्व बढ़ता चला जाता है।

इस वजह से क्रोधग्रस्त इंसान का मुँह उस थूक से भरता रहता है जिसे विषैला अथवा विष कहा जा सकता है। यह विष पेट में जाकर पाचन होकर रस व उसके बाद रक्त में घुलकर सारे शरीर में फैल जाता है। इससे हमारा पूरा शरीर जहरीला होने लगता है।

यही कारण है कि क्रोध के बाद काफी समय और दिनों तक क्रोध का वेग और दुष्प्रभाव हमारे मन-मस्तिष्क और शरीर पर देखा जा सकता है। किसी भी इंसान में क्रोध का असर निरन्तर रहने पर उसके शरीर में विष बनने, नाड़ियों में प्रवाह और अन्ततोगत्वा शरीर, मन एवं दिमाग पर घातक प्रभाव बढ़ता चला जाता है और इससे इंसान की कार्यक्षमता, शारीरिक सौष्ठव और ओज-तेज-ताजगी से लेकर शरीर से संबंधित तमाम क्रियाओं पर खराब असर पड़ता है।

इंसान को असाध्य बीमारियां घेर लेती हैं, चिड़चिड़ापन तथा सभी के प्रति अविश्वास का भाव व्याप्त होने लगता है तथा इंसान को लगता है कि सारी दुनिया बेकार है, उसके काम कोई नहीं आता। इस प्रकार मनुष्य में आत्महीनता के भाव घर कर लिया करते हैं।

अधिकांश लोगों के जीवन में असफलता, हीनता और निराशा का यही कारण है। इस किस्म के लोगों का शरीर भी समय से पहले ही बूढ़ा या समाप्त हो जाता है। इस तरह शरीर में ही निर्मित विष कितना घातक होता है, इसका हम संसारी मनुष्यों को कोई ज्ञान नहीं है। यह अज्ञानता हमारे विनाश का प्रमुख कारण बनी हुई है।

दूसरी ओर हमारे शरीर की ग्रंथियों से अमृत का स्त्राव भी होता रहता है।  जिस समय हम चरम आनंद भाव में होते हैं उस समय दैवीय भावभूमि और आत्म आनंद की वजह से मस्तिष्क की गुहा से संबंधित गले से जुड़े ऊपरी हिस्से से हमारे मुँह में अमृत की बूँदें टपकती हैं।

जिस समय हम प्यार, श्रद्धा या स्नेह के चरमोत्कर्ष पर होते हैं, किसी अप्रत्याशित सफलता की सूचना या पुरस्कार-सम्मान प्राप्त होता है अथवा किसी सिद्ध संत या कृपालु बुजुर्ग का हाथ हमारे सर पर फिरता है, उन्मुक्त प्रकृति या देवदर्शन का सुकून मिलता है, तब कुछ-कुछ क्षणों में हमारे कण्ठ में ऊपर से महीन बूँद कण्ठ पर गिरती है और उदर तक पहुंच जाती है।

यह अहसास हममें से हर किसी को हो सकता है। एक बार हम समझ जाएं तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी आसानी से कर सकते हैं। लेकिन यह अमृत तत्व तभी झरता है जबकि हम आनंद के क्षणों में हों, हर प्रकार से आनंद भाव में रमण कर रहे हों।

हमारे शरीर में अमृत और विष दोनों को पैदा करने तथा झराने वाली ग्रंथियाँ विद्यमान हैं। इनका अनुभव करने और लाभ पाने के लिए सजग रहना हमारी अपनी जिम्मेदारी है।

जो लोग अमृत के सृजन और इसके झरने के क्रम को निरन्तर बनाए रखते हैं उनका यह स्रोत ज्यादा सक्रिय रहता है और इन लोगों में अमृत का संग्रहण अधिक से अधिक होने लगता है जो इनके मुख मण्डल के ओज-तेज और शारीरिक सौंदर्य की अभिवृद्धि करता है, साथ ही आयु भी बढ़ती है तथा कर्मयोग में दिव्यता आने से अतुलनीय यश-कीर्ति प्राप्त होती है।

यह हम पर है कि हम अमृत चाहते हैं या जहर। अमृत चाहें तो सभी से प्यार करें, अच्छे कर्म करें और आनंद भाव में रमण करते रहें। एक बार यह रहस्य समझ में आ जाने पर इंसान मृत्युंजयी और यशस्वी जीवन प्राप्त कर सकता है।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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टिम टिम जलता दीपक

स्तब्ध वातावरण
गहन अंधकार में
टिमटिम जलता दीपक को देखा ,
तो पाया कि
उसके चारों ओर
प्रकाश का एक वृत्त है
जो धीरे धीरे
धुंधला होता हुआ
अंधकार के विशाल घेरे में
पड़ा रो रहा है
उस वृत्त प्रकाश के चारों ओर
पाषाण सा विशाल
अंतहीन अंधेरा
उसे बुरी तरह दबाए हुए है
दीपक की लौ तूफानी झोंकों से
पल भर को कांप जाती है
तो अंधेरा खिसककर
उसके निकट आ जाती है
तम की विशाल सेना
मानों पूरी तरह तैयार
और चौकस खड़ी है
कि वह दीपक कब बुझे
और एकदम से वे
धावा बोलकर
अपने राज्य के
कटे छटे भाग पर
अपना आधिपत्य जमा ले

---

विवशता
हमारे सम्बंध
सिमटकर
कितने बौने हो गए हैं
कि सिर्फ
पत्रों के आदान प्रदान
तक ही उनकी सीमा है
एक दूसरे के
आड़े वक्त में
काम आने वालों का स्वर
अत्यंत धीमा है
हमने अपने इर्द गिर्द
बुन लिए हैं इतनी
व्यस्तता के जालें
कि मकड़ी की भांति
उन्ही में फंसकर
रह गए हैं
हाय !
हम कितने असहज
और अमानवीय हो गए हैं ।
--

लक्ष्मीकांत बैष्णव , रायपुर

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               देश का सम्मान


शब्द-शब्द के जाल से
छोड़ूँ ,देश अरमान आया

मारो-मारो ,काटो-काटो
शब्दों का शैलाब आया

सच में है,या फिर भ्रम
असहिष्णुता का आसमान छाया

जब तक पाया जुड़ा रहा
अब मन में बेईमान आया

कल तक रहा 'अतुल्य ' बना
अब उसका अपमान आया

रणछोड़ तो बन जाऊँ
पर,मन में राष्ट्रगान आया

जब तक जिन्दा डटे रहो
दिल से यह फरमान आया

सब धर्मों के भेद भुला
एक राष्ट्र आह्वान आया

मन से मन और दिल से दिल
मिलवाने का अभियान आया

सीधे-सादे जज्बे में
देशभक्त का स्वाभिमान आया

रोम-रोम के पुलकन में
देश का सम्मान आया
देश का सम्मान आया

 

सुमन त्यागी 'आकाँक्षी'
मनियाँ ,धौलपुर (राज)

समीक्षक : डा रमेश सोबती (डी लिट)

अंग्रेजी साहित्य के इतिहास के रोमांटिसिज्म, हिन्दी के छायावाद और अमेरिका के ट्रांसेंडेंटल रोमांटिसिज्म-आधुनिक कविता की केन्द्रीय दिशा और बोध को प्रभावशाली तौर पर व्याख्यायित करते हैं।वर्ड्सवर्थ ने पहले कविता को “भावों के अतिरेक का उच्छलन” कहा फिर “एकाग्रता में संकलित विचार” को कविता कहा। आधुनिक युग में एलियट ने निर्वेयक्तिक्ता के सिद्धांत पर जोर देकर कविता को भावभूमि प्रदान की। अब प्रश्न यह उठता है कि कोई कविता क्यों लिखता है? कोई कहता है कि वह बिना लिखे रह नहीं सकता, अर्थात कविता की वेलासिटी यानी वेग लेखक के भीतर उसी विहीमेन्स यानी तीव्रता से कार्य करती है जितनी तीव्रता से उसमे अन्य प्राकृतिक आवेग उत्पन्न होते हैं। ऐसा भी कहा गया है कि कविता से बेहतर आत्मप्रकटीकरण का दूसरा कोई माध्यम है ही नहीं।कविता समाज को अच्छी सेहत देने और लोक कल्याण के लिए लिखी जाती है जैसे रामचरित मानस ( तुलसीदास), नीर भरी दु:ख की बदली (महादेवी), दु:ख ही जीवन की कथा रही (निराला), घनीभूत पीड़ा (प्रसाद), अथवा our sweetest songs are those that tell us of the saddest thoughts (शैली) आदि भाव और संवेदना के अतिरेक के सिद्धांत के प्राधान्य का प्रतिपादन करते हैं। इसे एक बेहतरीन कला भी माना गया है। इसका “आदि और अंत” नितांत एक कला मात्र ही है।

हिंदी के छायावाद और उत्तर छायावादी कवियों (दिनकर, बच्चन, भगवतीचरण वर्मा,नरेन्द्र शर्मा आदि के द्वैत या द्वंद्व से आगे हिंदी कविता में प्रयोगवाद और नई कविता का जन्म हुआ। अग्येय, जो प्रयोगवाद के प्रथम प्रस्तोता थे, “दूसरा सप्तक” के बाद “प्रयोगवाद” शब्द का प्रयोग बंद कर “नई कविता” शब्द का प्रयोग करने लगे थे। नई कविता का अधिक विकसित पक्ष रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, केदारनाथ सिंह और कुंवरनारायण की कविता में व्यक्त हुआ।इसी परंपरा का राजेन्द्र नागदेव का सद्य प्रकाशित काव्य संकलन “उस रात चांद खण्डहर में मिला” है। बेशक ये कविताएं बौद्धिकता के प्रभाव से अछूती नहीं हैं, फिर भी इन कविताओं में ऊर्जा, उत्तेजना, सड़ती हुई सत्ता तथा व्यवस्था के प्रति जो रचनात्मक आक्रोश मिलता है वह कम ही अन्य कवियों में मिलता है।इन कविताओं में सत्यान्वेषण की प्रक्रिया है। नागदेव सत्यान्वेषण के समर्थक हैं और परंपरा से जो संचित किया उसी से परितोष करने में विश्वास रखते हैं।उनकी वृत्ति इस बात की द्योतक है कि वे एक प्रकार का नैतिक आग्रह विकसित कर सकें। अर्जित तथा मर्यादित नैतिकता का साक्ष्य यह काव्य संकलन और संकलित कविताएं तीव्र भावुकता के साथ उपस्थित हैं। बेशक ये कविताएं रुचिकर हैं लेकिन इस भावबोध में तथा सौन्दर्यपरक तुष्टि में बहुत भिन्नता है, यथा-

“मैं आकाश को / दोनों हाथों से पकड़ / झिंझोड़ देना चाहता हूं

कि कंकड़ों की तरह खड़खड़ाकर / बज उठें ग्रह-नक्षत्र

फट जाए बासी हो चुका जमा हुआ सन्नाटा/

मेरे आकाश में ग्रह-नक्षत्र थे ही नहीं।“ (पृ – 22)

नागदेव का कवि-व्यक्तित्व एक variegated यानी विचित्र प्रकार के मानसिक reciprocation परिवर्तन से गुजर रहा होता है, अर्थात उसके भीतर एक प्रक्रिया-वृत्त खत्म हो चुका है और एक और आक्रोश की अकुलाहट विद्यमान है।यह अकुलाहट नागदेव के परिपक्व व्यक्तित्व का बीज न होकर नितांत छटपटाहट ही manifest कर पाई है, जैसे-

“गाड़ियां पागल कुत्तों की तरह दौड़तीं हर तरफ़,

कुत्तों के बीच फँसी हुई एम्बुलेन्स/ सांसें धीमी हो रही होंगीं/

प्रार्थनाएं निरर्थक/ एम्बुलेन्स शायद अब सीधी मरघट जाए” (पृ-48)

यश:वृद्धि करने वाले इस संकलन की रचनाएं पाठक के ह्र्दय में पूर्णरूपेण अपनी छाप छोड़ने में सफल रही हैं।ये कवि के सम्पूर्ण मन के प्रबल वेग से कागज़ पर उतरी हैं।इन कृतियों में मध्यवर्गीय मन का जीता जागता चित्रण प्रस्तुत किया गया है। कुछ कविताएं लंबी तथा प्रतीकात्मक हैं। इनमे नई पीढी के कल्याणार्थ पुरानी पीढी के त्याग करने का सुंदर चित्रण है, “बाल्कनी में शहर” नामक रचना पूर्वार्ध्द की अच्छी रचनाओं में से एक है। “शहर में चांदनी” और “उस रात चांद खण्डहर में मिला” तथा “जा रहे हैं परिंदे” महत्वपूर्ण कविताएं हैं। नागदेवजी की एक बड़ी विशेषता यह है कि उनकी प्रतिक्रियात्मक अनुभूतियां भी अकलात्मक तरीके से नहीं प्रस्तुत हो पातीं। अपनी घुटन तथा अकुलाहट और अतृप्ति को वे कलात्मक पुट देकर ऐसे परोक्ष ढ़ंग से कहते हैं कि पाठक का ज़हन एकदम सर्द हो जाता है और कविताएं अपना सम्पूर्ण प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहतीं।

पारंपरिक काव्य सिध्दांत के अनुसार- ‘कविता अर्थकृते, यशकृते, शिवेतरक्षये” अर्थात धन लाभ, यश और लोक कल्याण के लिए लिखी जाती है। यह बहुत व्याव्हारिक दर्शन है जो अर्थकृत है वह सोद्देश्य लेखन है।मैं यहां यश तथा लोक कल्याण की बात करूंगा। यश मनुष्य की सामान्य अभीप्सा है- “उत्पतस्यते स्पदि कोडपि नम्र समानधर्म….” कभी तो कहीं तो मुझे जानने वाला पैदा होगा, इस बड़ी धरती पर और अनंत काल श्रंखला में! शिव से इतर के क्षय अर्थात लोक कल्याण के लिए भी कविता लिखी जाती है। नागदेव के इस काव्य संकलन के प्रणयन के प्रति मैं यही कहूंगा कि इतनी आधुनिक “सेंसिबिलिटी” के भाव हमारे काव्य में बहुत नहीं हैं। यहां फिर देखिए, “प्रत्युत्तर” की कुछ पक्तियां-

“प्रार्थना कर रहा था सुबह/ ऐसे ही उड़ते रहें पक्षी/

आकाश के अनंत विस्तार में स्वच्छंद/ एक पीली चिड़िया का/

गीला लाल पंख/ पांव पर गिरा तभी,

कितनी जल्दी/ प्रार्थना का प्रत्युत्तर आ जाता है कभी !” पृ- 83

नागदेव की कविताओं में कितने ही विचारों, भावों का आना जाना है। ऐसी सच्ची, तटस्थ तथा जानदार कविता इस बीच लिखी जा रही है, जो आदमी की आज की दशा के सम्बंध में हमारी समझ और संवेदना को गहरा और सार्थक करती है।कवि की व्यक्तिवादी दृष्टि की सीमा संकुचित नहीं है। विराट आयाम है,सार्थक दृष्टि है।इस संकलन में सही अर्थों में नई काव्य भाषा और भावबोध नागदेव ने दिया है।सच यही है कि ये विभिन्न प्राविधिक उपयोगों की कविताएं हैं अत: खूब खूब स्वागत होगा, क्योंकि इसमे कीमती धातु की मणियां सजी हुई हैं

 

कविता संग्रह : “उस रात चांद खण्डहर में मिला”

कवि : राजेन्द्र नागदेव

प्रकाशक : पुनर्नवा प्रकाशन, रेवतीकुंज, हापुड़- 245101

मूल्य : रु 295/-

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डा रमेश सोबती

एन आर आई एवेन्यू

सुखचैन रोड, फगवाड़ा (पंजाब)- 144401

मो- 098153-85535

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बातों का आतंकवाद .....

हमारे देश में टी वी युग के आरंभ से एक नए आतंकवाद का जन्म हो गया है, वो है ‘बातों का आतंकवाद’ ....।

चैनल वाले बड़-बोलों का, पेनल बना के रोज-रोज नया तमाशा परोसने में लगे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में भड़काऊ वाद-विवाद आये दिन जनतांत्रिक देश में, तांत्रिक रूपी एंकर द्वारा चीख-चीख कर कहा जाता है कि ‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’......?ये कैसी जागृति का ढिंढोरा है ....?जो जनता के कान खाए जा रही है। शायद ही इतना विस्फोटक और विनाशकारी ‘वार्ता-बम’ किसी भी देश के, मीडिया-वालों के हाथ अब तक लग पाया हो जो अपने यहाँ रोज विस्फोटित होते रहता है।

दुश्मनी भांजने में इन चेंल्बाजों का कोई सानी नहीं। सब एकतरफा एक सुर में हमला बोलते हैं। जिस किसी का ये गुणगान कर दें उन्हें देश की गद्दी पकड़ा के दम लेते हैं। एक बार हादी चढाने का तजुर्बा हो गया तो प्रयोग दुहराया जाने लगा।

पर दिल्ली बिहार राज्य के मामले में,उनकी हांडी दुबारा चढाने की बस हसरत ही रह गई। उन्होंने अपनी तरफ से , भरपूर कोशिश की मगर जनता को बना-मना नहीं पाये।

पुराने जमाने में , इस ‘बातूनी आतंकवाद’ का अंडर करंट, सामन्ती-राजसी व्यवस्था में देखने को मिलता था। किसी जगह राजा ,कहीं मालगुजार कहीं का सूबेदार तो कहीं सूदखोर बनिया जमात की बातें ‘दबंगई’ लिए होती थी। उनका कहा एक मायने में, कानून या फतवा से कम नहीं आंका जाता था।

जनता को इनका सामना करने के बाद मुक्ति मिल जाती रही हो, ऐसा भी नहीं था। वे इनके अलावा , दीगर आतताइयों से भी निपटते थे ,निपटते क्या थे अपने आप को पिटवाने के लिए परस देते थे। वे जाति के नाम, मजहब के नाम खुद को नोचवाने -खसोटवाने के लिए बाध्य होने की श्रेणी में गिने जाते थे।

उनकी डिक्शनरी में,या उनकी सोच में ,इन आकाओं के प्रति कभी कोई असहिष्णुता का भाव दूर दूर तक पैदा नहीं हुआ। ‘माई-बाप’ के लिए ,विद्रोह या बगावत की कभी सपने में भी सोचा जाना पाप की केटेगरी का हुआ करता था। वे दयनीय से दयनीय किसी हालात में भी गुजरे उनकी पत्नियों का मनोबल कभी टूटता सा नहीं दिखा करता। अपने पतियों के सामने कभी मुंह नहीं खोलने वाली स्त्रियाँ, घर या गाँव छोड़ के जाने की बात कभी कर या कह भी नहीं पाती थी ....?

अब हालात बदले हैं। अच्छी बात है कि आज आप, जी-भर के किसी को भी कोस सकते हैं। किसी को इस मुल्क में रहने या उसका तंबू उखाड़ने की बात कर सकते हैं। किसी को तमाचा जड़ने के लिए खुलेआम इनाम इकराम की व्यवस्था किया जा सकता है। किसी टार्गेट को उसके बयान और गतिविधियों के इतिहास का बखान करके, कालिख पोतने और पोंछने की राजनैतिक कवायद की जा सकती है। एक से एक बोल-बचन,चेनल के माध्यम से हाईलाईट हुआ करते हैं। सुबह अखबार की सुर्ख़ियों में कमजोर दिल वाले पढ़ कर दुआ मनाते हैं कि फिलहाल आंच उन तक नहीं पहुंच पाई है।

मान हानि के दावे , यदि फिफ्टी परसेंट केस में ‘बुक’ होने लगे तो फरियाद में लगने वाले कागज़ की पूर्ती हेतु एक इंडस्ट्री लग सकती है। टाइपिस्ट की इफरात मांग बढ़ सकती है ,नौकरी के नये सेक्टर बन सकते हैं। लेपटाप की बिक्री जोर पकड़ सकती है। तरफदारी करने वाले हिमायती, या विरोध पक्ष के वकीलों का अकाल पड सकता है।

दरअसल ,इस देश में “लघु शंकाओं का निवारण” ठीक से नहीं हो पा रहा है। सरकार सोचती है की एयर- कंडीशन-शौचालय बना देने से बात बन जाएगी। वे गलत हैं। ये लघुशंका, किडनी उत्सर्जित ताज्य अवशेषों का नहीं है,वरन , जनता की दिमाग उत्सर्जित विष्ठा है। इसे हटाने के लिए,फकत चार पेनलिस्ट के बीच अपना एक प्रवक्ता मात्र , टी वी में बिठा देने से मामला बनने की जगह बिगड़ता दिखता है। ये लोग ताबड़तोड़ बातों की गोलियां, स्टेनगन माफिक चलाने लग जाते हैं। इन्हें कोई भी टापिक दे दो, ये सभी इस मुस्तैदी से डट जाते हैं कि सालुशन केवल उनकी बात में है। ये कभी किसी बलात्कारी संत का बचाव करते दीखते हैं तो कभी मांस के नाम पर मारे गए व्यक्ति के, हत्यारों की पैरवी कर डालते हैं। ये लोग अपने फैब्रिकेटेड-आंकड़ों पर महीनों बहस बेवजह करवा लेते हैं कि, अमुक पार्टी क्लीन स्वीप कर रही है, जबकि परिणाम एकदम विपरीत आता है। यानी जिसका ये दम भरे होते हैं, वही धाराशायी हुआ दिखता है। टी आर पी का खेल गजब का है .....?

जनता बेचारी इडियट बाक्स के एक और आतंक से रूबरू हो रही है ,वो है इनका बाजार भाव में अपनी टाग घुसेड़ना।

होता ये है कि जो अनाज- सब्जी आपके स्थानीय बाजार में कम कीमतों में मिल रही होती है, एक बार दिल्ली की कीमत सुनते ही अपने-आप उछल जाती है। आप बाजार में टमाटर बीस रुपये किलो में तुलवा रहे हैं, तभी दूकानदार की टी व्ही में, अस्सी रूपये किलो का एलान होता है ,दूकानदार वापस अपनी तौल खीच लेता है। कभी दालें सत्तर-अस्सी रूपये किलो की हुआ करती थी ,इनकी बातों ने कीमतों में जहर घोल दिया। ये लोग ,बकायदा रिपोर्ट दिखा देते हैं, फलाने स्टेट में इस साल कम बारिश के चलते दलहन तिलहन फसल चौपट होने के आसार हैं,लो बढ़ गए दाम।

कभी-कभी तो यूँ भी लगता है,कि किसी सटोरिये-लाबी वालों की चल रही है वे इधर स्टाक जमा किये, उधर दाम बढ़ने की बात कह दी।

सरकार कहाँ होती है या कहाँ सोती है......पता नहीं चलता ?

किसी को सुध लेने की जरूरत नहीं महसूस होती।

जनता बेचारी तंग आ के मन बहलाव् की दीगर खबरों में, अपनी (अल्प) बुद्धि खर्च करने में लग जाती हैं।

पसंद न हो तो, चैनल बदलने का अधिकार अभी सब के पास बरकरार है,यही काफी है .....। ........ .?

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com ०९४०८८०७४२० //२७.११.१५

लोक सभा के चुनावों तथा उनके बाद के कालखण्ड में मोदी जी के भक्त और भाजपा के प्रवक्ता “सेकुलर” शब्द को गाली देते रहे तथा देश के कट्टरवादी विचारक “सेकुलर” को राजनैतिक पूर्वग्रह और विचारधाराओं की जकड़बंदी का कारण निरूपित करते रहे। आज भारत की लोक सभा के अन्दर मोदी जी का भाषण ने जैसे हवा का रुख बदल दिया। “कोई भी व्यक्ति भारत के संविधान से झेड़खानी की कल्पना नहीं कर सकता और अगर वह ऐसी कोशिश करेगा तो वह खुदकुशी होगी। - -”। जब मोदी जी बोल रहे थे तब उनकी बगल में बैठे भारत के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह की सूरत देखने लायक थी।

मुझे जनवरी, 2001 में भारत के प्रख्यात विधिवेत्ता, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के तत्कालीन अध्यक्ष एवं गहन चिंतक तथा साहित्य मनीषी श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी जी के साथ “सेकुलर” शब्द के धर्मनिपेक्ष हिन्दी अनुवाद पर हुए वार्तालाप का स्मरण हो आया है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में 31 जनवरी, 2001 को आयोजित होने वाली “हिन्दी साहित्य उद्धरण कोश” विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करने के लिए सिंघवी जी पधारे थे। संगोष्ठी के बाद घर पर भोजन करने के दौरान श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी ने मुझसे कहा कि सेक्यूलर शब्द का अनुवाद धर्मनिरपेक्ष उपयुक्त नहीं है। उनका तर्क था कि रिलीज़न और धर्म पर्याय नहीं हैं। धर्म का अर्थ है = धारण करना। जिसे धारण करना चाहिए, वह धर्म है। कोई भी व्यक्ति अथवा सरकार धर्मनिरपेक्ष किस प्रकार हो सकती है। इस कारण सेक्यूलर शब्द का अनुवाद पंथनिर्पेक्ष अथवा धर्मसापेक्ष्य होना चाहिए।

मैंने उनसे निवेदन किया कि शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से आपका तर्क सही है। इस दृष्टि से धर्म शब्द किसी विशेष धर्म का वाचक नहीं है। जिंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्त्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है। मगर संकालिक स्तर पर शब्द का अर्थ वह होता है जो उस युग में लोक उसका अर्थ ग्रहण करता है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से तेल का अर्थ तिलों का सार है मगर व्यवहार में आज सरसों का तेल, नारियल का तेल, मूँगफली का तेल, मिट्टी का तेल भी “तेल” होता है। कुशल का व्युत्पत्यर्थ है कुशा नामक घास को जंगल से ठीक प्रकार से उखाड़ लाने की कला। प्रवीण का व्युत्पत्यर्थ है वीणा नामक वाद्य को ठीक प्रकार से बजाने की कला। स्याही का व्युत्पत्यर्थ है जो काली हो।

मैंने उनके समक्ष अनेक शब्दों के उदाहरण प्रस्तुत किए और अंततः उनके विचारार्थ यह निरूपण किया कि वर्तमान में जब हम हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, इसाई धर्म, सिख धर्म, पारसी धर्म आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इन प्रयोगों में प्रयुक्त “धर्म” शब्द रिलीज़न का ही पर्याय है। अब धर्मनिरपेक्ष से तात्पर्य सेक्यूलर से ही है। सेकुलर अथवा धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म विहीन होना नहीं है। इनका मतलब यह नहीं है कि देश का नागरिक अपने धर्म को छोड़ दे। इसका अर्थ है कि लोकतंत्रात्मक देश में हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का समान अधिकार है मगर शासन को धर्म के आधार पर भेदभाव करने का अधिकार नहीं है। शासन को किसी के धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसका अपवाद अल्पसंख्यक वर्ग होते हैं जिनके लिए सरकार विशेष सुविधाएँ तो प्रदान करती है मगर व्यक्ति विशेष के धर्म के आधार पर सरकार की नीति का निर्धारण नहीं होता। उन्होंने मेरी बात से अपनी सहमति व्यक्त की। आज मोदी जी ने यह कहकर कि बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यक समाज पर कुछ थोप नहीं सकता उन लोगों के मुँह पर तमाचा जड़ा है जो “सेकुलर” शब्द को गाली देते रहे हैं और तुष्टिकरण का पूर्ववर्ती सरकारों पर आरोप लगाते रहे हैं।

प्रत्येक लोकतंत्रात्मक देश में उस देश के अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष सुविधाएँ देने का प्रावधान होता है। अल्पसंख्यक वर्गों को विशेष सुविधाएँ देने का मतलब “तुष्टिकरण” नहीं होता। यह हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रदत्त “प्रावधान” है। ऐसे प्रावधान प्रत्येक लोकतांत्रिक देशों के संविधानों में होते हैं। उनके स्वरूपों, मात्राओं एवं सीमाओं में अंतर अवश्य होता है। भारत एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है। संविधान में स्पष्ट है कि भारत “सेकुलर” अथवा “धर्मनिरपेक्ष” लोकतांत्रिक गणराज्य है। जिस प्रकार “लोकतंत्र” संवैधानिक जीवन मूल्य है उसी प्रकार “धर्मनिरपेक्ष” संवैधानिक जीवन मूल्य है। एक बार भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश पर आपात काल थोपकर लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत कदम उठाया था और उनको इसका परिणाम भुगतना पड़ा था। जो देश के सेकुलर अथवा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से छेड़छाड़ करने की कोशिश करेगा, उसको भी उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। मोदी जी बार-बार स्वामी विवेकानन्द के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित कर चुके हैं। मैं यह निवेदित करना चाहूँगा कि स्वामी विवेकानन्द धार्मिक सामंजस्य एवं सद्भाव के प्रति सदैव सजग दिखाई देते हैं।विवेकानन्द ने बार-बार सभी धर्मों का आदर करने तथा मन की शुद्धि एवं निर्भय होकर प्राणी मात्र से प्रेम करने के रास्ते आगे बढ़ने का संदेश दिया।

पूरे विश्व में एक ही सत्ता है। एक ही शक्ति है। उस एक सत्ता, एक शक्ति को जब अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है तो व्यक्ति को विभिन्न धर्मों, पंथों, सम्प्रदायों, आचरण-पद्धतियों की प्रतीतियाँ होती हैं। अपने-अपने मत को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की विशिष्ट शैलियाँ विकसित हो जाती हैं। अलग-अलग मत अपनी विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग करने लगते हैं। अपने विशिष्ट ध्वज, विशिष्ट चिन्ह, विशिष्ट प्रतीक बना लेते हैं। इन्हीं कारणों से वे भिन्न-भिन्न नजर आने लगते हैं। विवेकानन्द ने तथाकथित भिन्न धर्मों के बीच अन्तर्निहित एकत्व को पहचाना तथा उसका प्रतिपादन किया। मनुष्य और मनुष्य की एकता ही नहीं अपितु जीव मात्र की एकता का प्रतिपादन किया। स्वामी विवेकानन्द का नाम जपने वाले विवेकानन्द का साहित्य भी पढ़ पाते तथा विवेकानन्द की मानवीय, उदार, समतामूलक दृष्टि को समझ पाते। सर्वधर्मसमभाव की स्वीकृति भारतीय संविधान की आत्मा है और हमारे राजनेताओं तथा बुद्धिजीवियों को इसे मन से स्वीकार करना चाहिए और सबको मिलजुलकर देश के विकास के मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए। देश का विकास किसी भी वर्ग के प्रति नफरत, घृणा तथा हिंसा के रास्ते से सम्भव नहीं है।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव

बुलन्दशहर - 2013001

मैं अपनी जिंदगी से बिल्कुल संतुष्ट थी, कोई शिकायत नहीं थी मुझे जिंदगी से. विवाह के आठ वर्ष बाद ईश्वर ने हमें एक बेटा दिया था, हम दोनों ने उसे नाजों से पाल- पोसकर बड़ा किया, अच्छे स्कूल में पढ़ाया, पढ़ लिखकर वह ऑफिसर बन गया, हमने एक अच्छी लड़की देख उसका विवाह भी कर दिया, वह जल्दी ही दो बच्चों का पिता बन गया और मैं दादी माँ बन गई. हमारा भरा पूरा परिवार था, बेटे और बहू अपनी अपनी नौकरी में व्यस्त थे... वे जिंदगी की दौड़ में बहुत आगे निकल जाना चाहते थे... इसके लिए परिश्रम भी किया करते. इस बीच मेरे पति ने मेरा साथ छोड़ दिया ... मैं तो टूट ही गई... मैंने तो अपनी सबसे बड़ी ताकत को खो दिया था...लेकिन मैंने देखा बेटे- बहू में कोई खास परिवर्तन नहीं आया.. वे पहले की ही तरह व्यस्त रहते थे... हों भी क्यों न! उन्हें समय से पहले बहुत कुछ हासिल करना था. पति के चले जाने के बाद से मैं अक्सर बीमार रहने लगी, शुगर, ब्लड प्रेशर की शिकार तो पहले से ही थी अब कुछ ब्रीदिंग प्रॉब्लम भी रहने लगी, जोड़ो में दर्द जैसे सारी बीमारियों ने मुझे जकड़ लिया और मैं बिस्तर पर पड़ गई. मैं जानती थी कि बहू बेटे पर मैं एक बोझ बन गई हूँ लेकिन क्या करूँ... मैं लाचार थी... बहू- बेटे ने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा... मेरी देख-भाल के लिए उन्होंने एक फुल- टाइम मेड रख दी... मैं भी अपनी कोई परेशानी उनसे नहीं कहती... मैं जानती थी... क्या मिलेगा कहकर...जो भी परेशानी है उसे सह लेना ही बेहतर है.... वैसे भी मैं उनके आगे बढ़ने में, समय से पहले सबकुछ हासिल करने में बाधा बनना नहीं चाहती थी... मुझे आभास हो गया था कि इसी बिस्तर पर मैं अपनी अंतिम साँसें लूँगी. एक दिन एक घटना मेरे साथ हो गई... घर पर अकेला पाकर यमराज जी मेरे सामने प्रकट हो गए...कहने लगे... तुम्हारे दिन अब पूरे हो चुके हैं... किसी से कुछ गिला-शिकवा है तो दूर कर लो... मैंने कहा—नहीं यमराज जी, मुझे किसी से कुछ भी गिला-शिकवा नहीं है... पूरे डेढ़ महीने से इस बिस्तर पर पड़ी हूँ... अब उठा लीजिए... बस आपसे एक ही विनती है... यमराज जी ने पूछा-

‘क्या’?...

विनती यह है यमराज जी कि इस घर में सभी काफी व्यस्त रहते हैं... रविवार को सभी देर से सोकर उठते हैं... सुबह के 10-11 बजे तक नाश्ता करते हैं... और फिर उसके बाद तीन चार घंटे फ्री रहते हैं.... उसी समय आप मुझे उठा लीजिएगा... ताकि अपने  फ्री टाइम में ही वे मुझे निपटा लें... माँ हूँ न! बच्चों का ख्याल हमेशा सर्वोपरि रहता है ... और एक बार फिर कहती हूँ कि उनकी व्यस्त दिनचर्या में मैं बाधा बनना नहीं चाहती...

यमराज ने मुस्कुराकर कहा-

‘कोई और विनती होती तो मैं जरुर मान लेता, लेकिन मेरी मज़बूरी है मैं आपकी यह विनती नहीं मान सकता...यह पूर्णत: मेरी इच्छा पर निर्भर करता है कि मैं किसे, कब, कहाँ और कैसे अपने पास बुला लूँ.... मैं आपकी यह विनती नहीं मान सकता.

    दूसरे दिन ऑफिस में अधिक काम होने की वजह से बेटे को घर आते आते रात के ग्यारह बज गए... काफी थका दिख रहा था...उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह खड़े-खड़े ही निंद्रा देवी की गोद में समा जाए... मैं चाहती थी कि वह जल्द से जल्द खा-पीकर बिस्तर पर चला जाए लेकिन मेरे लाख मना करने पर भी यमराज जी नहीं माने, मुझसे उन्होंने उसी समय कहा कि अब तुम्हारा समय पूरा हो गया... अभी इसी वक्त तुम्हे मेरे पास आना होगा...फिर  अचानक मेरे सीने में ऐसी दर्द हुई कि मैं छटपटाने लगी... बेटा- बहू दौड़कर मेरे पास आए... मुझे अस्पताल ले जाने लगे...लेकिन अस्पताल पहुँचने के पहले ही रास्ते में मैं यमराज जी के पास चली आई थी... मैं यमराज जी के पास आकर संतुष्ट थी.... मेरी आत्मा कोई भटकने वाली नहीं थी...मेरी सभी इच्छाएँ पूरी हो चुकीं थीं... मैंने देखा मेरे बेटे बहू कुछ रिलैक्स्ड लग रहे थे.... रात भर के लिए उन्होंने मुझे अस्पताल के शव गृह में छोड़ दिया और वे दोनों वापस घर चले आए...दूसरे दिन मैं सुबह सुबह घर पर लाई गई.... घर के पास कुछ लोगों की भीड़ लगी हुई थी...मेरी पूजा की गई... मुझे फूलों से सजाया गया...एक ट्रक पर रखकर मुझे शमशान लाया गया... वहाँ पहले से ही पाँच शव इन्तजार कर रहे थे... मैंने सुना बेटा एक सफेद कमीज वाले व्यक्ति से कह रहा था—

‘अरे जाकर बात कर नंबर वन पे ले चलिए... कुछ ले देकर बात बन जाती है तो ठीक है...कहिए कि हम पाँच मिनट में पूजा खत्म करवा देंगे और फर्नेस में ही जलाएंगे... पर्यावरण के हिसाब से भी ठीक है और समय की बचत भी है...

चार-पाँच  लोगों के साथ बेटा खड़ा था ...कह रहा था... डेढ़ महीने से खटिया पकड़ ली थी... कल 11 बजे ऑफिस से लौटने के बाद... फिर हमलोग अस्पताल ले गए.... ऑफिस में काम बहुत बढ़ गया है...परसों नए प्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन है....कैंसिल नहीं कर सकते... बाहर से क्लाइंट आ रहा है...

मैं इन्तजार में थी कि मेरा इकलौता बेटा बस इतना ही कहता कि मैं अब अनाथ हो गया या मेरी माँ एक अच्छी माँ थी या कुछ भी मेरे बारे में... लेकिन उसने ऐसा नहीं कहा... मुझे नंबर वन... मिल गया ... और कुछ ही सेकण्ड में शरीर के रूप में जो मेरी अस्तित्व बची थी.. वह खत्म हो गई...

 

गीता दुबे 

जमशेदपुर 

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सब तरह भारी हो हल्ला है

असहिष्णुता का बोलबाला है

जिस भारत ने दुनिया को संस्कार सिखाए, सभ्यता दी और इंसानियत का पैगाम दिया।

उस भारत में असहिष्णुता की बात कहना भी बेमानी है।

कोई इसे हल्के में ले या भारीपन से, यह सरासर भारतमाता का अपमान ही है।

और हममें से ही कई लोग इस  अपमान के सहभागी होकर जाने क्या संदेश देना चाह रहे हैं।

कहाँ है असहिष्णुता, कोई तो बताए।

बार-बार चिल्लपों मचा रहे लोग और उनकी हाँ में हाँ करते हुए टर्र-टर्र करने वाले मेंढकों, रुदाली में रमे हुए रंगे सियारों को और इस नाउम्मीद भीड़ में अपना खान-पान व नाम तलाशने वाले लोमड़ों को देखिये।

क्या से क्या करने लगे हैं, कुछ न कुछ बकवास करने लगे हैं।

और जता यों रहे हैं जैसे कि भारत में असहिष्णुता का कोई बीज अचानक अंकुरित हो गया हो।

पिछले काफी दिनों से असहिष्णुता का बवाल हर तरफ फन उठा रहा है।

पढ़े-लिखे भी चिल्लाने लगे है और अनपढ़ भी। वज्रमूर्ख, आधे मूर्ख और जड़मूर्खों से लेकर होशियार और  डेढ़ होशियार सारे के सारे इन दिनों व्यस्त हो गए हैं। सभी को असहिष्णुता के नारे लगाने का  धंधा जो मिल गया है। नाम का नाम और बवाल का बवाल।

सभी को लगता है कि जैसे भारत में अचानक कोई भूकंप आ गया है।

सारी समस्याएं नदारद, पुरस्कार लौटाने की नौटंकियां बंद, समाज और देश के लिए कुछ करने की बात नहीं,  आतंकियों के खात्मे की चर्चा नहीं, और लो ये आ गया भूत असहिष्णुता का।

पता नहीं हम लोगों को क्या से क्या हो गया है। हम कहाँ जा रहे हैं, कहां ले जाए जा रहे हैं।

कुछ अरसे से असहिष्णुता उन लोगों का ब्रह्मास्त्र ही हो गया है जिन्हें पब्लिसिटी चाहिए, अपने डूबते हुए सितारों को आसमान चाहिए और गर्दिश में जा रही जिन्दगी को ताजगी।

भारतीय संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से अनभिज्ञ, नासमझ और नुगरे लोगों का बना-बनाया सब कुछ चल पड़ा है।

हर बाजार में चर्चे आम हैं असहिष्णुता के।

सब तरफ असहिष्णुता पर चर्चाओं का बवण्डर जोरों पर है।

गांव की चौपाल से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक इसी की चर्चा है।

हमने अपनी सारी समस्याओं, अभावों, आवश्यकताओं और बुनियादी जरूरतों को ताक में रख दिया है और पिल पड़े हैं इस शब्द पर जैसे कि पूरी दुनिया की डिक्शनरी में अब यह एक ही शब्द बचा है - असहिष्णुता।

सारे के सारे इसी के सहारे वैतरणी पार करने चले हैं।

जिधर देखो उधर असहिष्णुता शब्द को धारदार हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा है।

पता नहीं ं आजकल यह सब क्यों हो रहा है।

जानकार लोग समझते हैं इसके पीछे आखिर माजरा क्या है।

बाकी सारे लोग भ्रमित होकर इस शब्द का खोल ओढ़े हुए इधर से उधर भाग रहे हैं। भीड़ का अपना चरित्र नहीं होता और रेवड़ों में शामिल भेड़ों के विचरण पर लगाम होती है उनकी जो उन्हें ले जाते हैं।

इन दिनों यही सब तो हो रहा है हमारे आस-पास, सर्वत्र।

भारत को जानें, इसकी संस्कृति और परंपराओं का अध्ययन करें, पाश्चात्यों के पिछलग्गू न बनें।

फिर देखें, अपने आप आत्मा से स्वीकारने लगेंगे कि ब्रह्माण्ड भर में भारत जैसा सहिष्णु और कोई नहीं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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सड़क से लेकर संसद तक असहिष्णुता की चर्चा है। बढ़ती सांप्रदायिकता की चर्चा है। कलाकार, साहित्यकार सबका इस फिजां में दम घुट रहा है और वे दौड़-दौड़कर पुरस्कार लौटा रहे हैं। राष्ट्रपति से लेकर आमिर खान तक सब इस चिंता में शामिल हो चुके हैं। भारत की सूरत और शीरत क्या सच में ऐसी है, जैसी बतायी जा रही है या यह ‘आभासी सांप्रदायिकता’ को स्थापित करने के लिए गढ़ा जा रहा एक विचार है। आज के भारतीय संदर्भ में पाश्चात्य विचारक मिशेस फूको की यह बात मौजूं हो सकती है जो कहते हैं कि विमर्श एक हिंसा है जिसके द्वारा लोग अपनी बात सही सिद्ध करना चाहते हैं।

  भारत जिसे हमारे ऋषियों, मुनियों, राजाओं, महान सुधारकों, नेताओं और इस देश की महान जनता ने बनाया है, सहिष्णुता और उदात्तता यहां की थाती है। अनेक संकटों में इस देश ने कभी अपने इस नैसर्गिक स्वभाव को नहीं छोड़ा। तमाम विदेशी हमलों, आक्रमणों, 1947 के रक्तरंजित विभाजन के बावजूद भी नहीं। यही हिंदु स्वभाव है, यही भारतीय होना है। यहां सत्ता में नहीं, समाज में वास्तविक शक्ति बसती है। सत्ता कोई भी हो, कैसी हो भी। समाज का मन निर्मल है। वह सबको साथ लेकर चल सकने की क्षमता से लैस है। यही राम राज्य की कल्पना है। जिसे महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक एक नारे या सपने की तरह इस्तेमाल करते हैं। राम राज्य जुमला नहीं है, एक ऐसी कल्पना है जिसमें लोकतंत्र की औदार्यता के दर्शन होते हैं। रामराज्य दरअसल भारतीय राज्य का सबसे बड़ा प्रतीक है। जहां तुलसीदास कृत रामचरित मानस में उसकी व्याख्या मिलती है-

सब नर चलहिं परस्पर प्रीती

चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।

   हमारी परंपरा सिर्फ गौरवगान के लिए नहीं है बल्कि वास्तव में इन्हीं भावों से अनुप्राणित है। वह सबमें प्रेम और सद्भावना तो चाहती है और आपको आपके ‘स्वधर्म’ पर चलने के लिए प्रेरित भी करती है। किंतु लगता है कि एक झूठ को सौ बार बोलकर उसे सच बना देने वाली ताकतों का भरोसा अभी भी टूटा नहीं है। वे निरंतर इस महादेश को जिसके समानांतर पूरी कम्युनिस्ट दुनिया और पूरी इस्लामी दुनिया के पास कोई देश नहीं है, को लांछित करना चाहती हैं। राज्य के खिलाफ संघर्ष को वे देश के खिलाफ संघर्ष में बदल रही हैं। एक नेता से उनकी नफरत उन्हें अपने देश के खिलाफ षडयंत्र करने की प्रेरणा बन गयी है। आखिर इस देश में मर्ई,2014 के बाद ऐसा क्या घटा, जिसे लेकर ये इतने संवेदनशील और बैचैन हैं।

   इस देश की बन रही वैश्चिवक छवि को मटियामेट करने के ये यत्न संदेह जगाते हैं। पुरस्कार वापसी के सिलसिले स्वाभाविक नहीं लगते, क्योंकि इनकी टाइमिंग पर सवाल पहले दिन से उठ रहे हैं। देश का प्रधानमंत्री इस देश के लोगों से शक्ति पाकर सत्ता तक पहुंचता है। मोदी भारतीय लोकतंत्र का परिणाम हैं। क्या आप जनता के द्वारा दिए गए जनमत को भी नहीं मानते। नरेंद्र मोदी को मिले जनादेश को न स्वीकारना और उन्हें काम करने के अवसर न देना एक तरह का अलोकतांत्रिक प्रयत्न है। एक गरीब परिवार से आकर, अपनी देश की भाषा में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने जो कुछ अर्जित किया है, वही इस देश के लोकतंत्र का सौंदर्य है। नरेंद्र मोदी को लांछित करने वाले यह भूल जाते हैं कि हर तरह के विरोधों और षडयंत्रों ने मोदी को शक्तिमान ही बनाया है। देश की जनता को ये उठाए जा रहे भ्रम प्रभावित करते हैं। लोग पूछने लगे हैं कि आखिर असहिष्णुता कहां है भाई? दुनिया के पैमाने पर हो रही तमाम घटनाएं हमारे सामने हैं। इस रक्तरंजित दुनिया को शांति की राह दिखाने वाले देश भारत को लांछित करने का कोई कारण नहीं है। भारत और उसका मन विश्व को अपना परिवार मानने की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से ओतप्रोत है। यह भारत ही है जिसने विविधता और बहुलता को आचरण में लाकर विश्व मानस को प्रभावित किया है। हमारे तमाम देवी- देवता और प्रकृति के साथ हमारा संवाद, चार वेद, दो महाकाव्य-रामायण और महाभारत, अठारहों पुराण और एक सौ आठ उपनिषद इसी विविधता के परिचायक हैं। इस विविधता को स्वीकारना और दूसरी आस्थाओं का मान करना हमें हमारी जड़ों से मिला है। इसीलिए हम कहते हैं-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयं,

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नं।

यानि अठारहों पुराणों में व्यास जी दो ही बातें कहते हैं, परोपकार पुण्य है और पाप है दूसरों को कष्ट देना। यानि भारत का मन पाप और पुण्य को लेकर भ्रम में नहीं है। उसे पता है कि दूसरों को जगह देना, उन्हें और उनकी आस्था को मान देना कितना जरूरी है। वह जानता है कि विविधता और बहुलता को आदर देकर ही वह अपने मानबिंदुओं का आदर कर पाएगा। किंतु यह उदार संस्कृति अगर साथ ही, यह भी चाहती है कि हम तो आपकी आस्था का मान करते हैं आप भी करेगें तो अच्छा रहेगा, तो इसमें गलत क्या है? परस्पर सम्मान की इस मांग से ही आप सांप्रदायिक धोषित कर दिए जाते हैं। यह कहां की जिद है कि आप तो हमारे विचारों का, आस्था का मान करें किंतु हम आपके मानविंदुओं और आस्था का विचार नहीं करेगें। अगर ऐसा होता तो क्या अयोध्या में राममंदिर के लिए मुकदमा अदालत में होता। कभी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा था कि यह प्रमाणित हो जाए कि कि बाबरी ढांचे के नीचे कोई हिंदू मंदिर था तो वे इस पर दावा छोड़ देगें। आज अदालत प्रमाणित कर चुकी है कि यह राम जन्मभूमि है। किंतु विरोधी पक्ष सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा है। गाय को लेकर भी जैसी गलीज बहसें चलाई गयीं, वह यही बताती हैं। सहिष्णुता का पाठ पढाने वालों को इतना ही देखना लेना चाहिए कि इस हिंदु बहुल देश में भी कश्मीरी हिंदुओं को विस्थापन झेलना पड़ा। इस पाप के लिए माफी कौन मांगेगा?

जाहिर तौर पर एक शांतिप्रिय समाज को, एक समरसतावादी समाज को जब आप बार-बार लांछित करते हैं, तो जरूरी नहीं कि उसे यह अच्छा ही लगे। हिंदु मन प्रतिक्रियावादी मन नहीं है। उसे दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार रखना ही है, भले ही अन्य उसके साथ कैसा भी आचरण करें। इस मन को खराब मत कीजिए। पेड़, पौधों, नदियों, मंदिरों, मजारों, गुरूद्वारों सब जगह मत्था टेकता यह भारतीय मन है, इसे आहत मत कीजिए। यह तो गायों, कौवों, कुत्तों का भी विचार करता है, खाने के लिए उनके लिए हिस्सा निकालता है। उसे असहिष्णु मत कहिए। उसने गोस्वामी तुलसीदास की वाणी-

परहित सरिस धरम नहीं भाई,

परपीड़ा सम नहीं अधमाई।

को आत्मसात किया है। उसे पता है कि दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। इसलिए उसके हाथ गलत करते हुए कांपते हैं। उसके पैर भी यह विचार करते हैं कि कोई चींटी भी उसके पैरों तले ना आ जाए। इसलिए उसकी इस सदाशयी वृत्ति, परोपकार चेतना, दान शीलता, सद्भावना, दूसरों की आस्थाओं को सम्मान देने की भावना का मजाक मत बनाइए। इस देश को नेताओं और राजनीतिक दलों ने नहीं बनाया है। यह राष्ट्र ऋषियों और मुनियों ने बनाया है। पीर-फकीरों ने बनाया है, उनकी नेकनीयती और दिनायतदारी ने बनाया है। राजसत्ता यहां बंटी रही, राजाओं के राज बंटे रहे किंतु भारत एक सांस्कृतिक प्रवाह से अपनी महान जनता के आत्मविश्वास में कायम रहा है। इसीलिए हम कह पाए-

हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षयते ।।

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रिश्चैव दक्षिणम् ।
वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति: ।।

   इसलिए उनसे इस तर्क का कोई मतलब नहीं है जो यह मानते,लिखते और कहते हैं कि यह राष्ट्र तो टुकड़ों में बंटा था और 1947 में अंग्रेज हमें इसे एक करके दे गए। ये वे लोग हैं जो न देश को समझते हैं, न इसके इतिहास को। जिन्हें इस राष्ट्र की अस्मिता को लांछित करने, इसके इतिहास की विकृत व्याख्याओं में ही आनंद आता है। उन्हें सारे गुण और गुणवान इस देश की घरती के बाहर ही नजर आते हैं। ऐसे जानबूझकर अज्ञानी बनी जमातों को हम हिंदुस्तान समझा रहे हैं। उसकी रवायतों और विरासतों को समझा रहे हैं, तो यह होने वाला नहीं हैं। आज राजनीतिक रूप से ठुकराई जा चुकी ताकतों द्वारा सम्मानित ‘रायबहादुरों’ की इस पुरस्कार वापसी पर बहुत चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि इन्हीं के लिए ईसा ने कहा था- “हे प्रभु इन्हें माफ करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।“

(लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

-संजय द्विवेदी,
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 09893598888

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- संजय द्विवेदी,
अध्यक्षः जनसंचार विभाग,
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,
प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)
मोबाइलः 09893598888
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http://sanjaydwivedi.com/

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नेता


पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ

मीठा-मीठा बोलकर
मैं जनता को बहलाता हूँ

पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ

करके वादे, लेकर कसमें
सबको विश्वास दिलाता हूँ
पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ

जनता भोली बन जाती है
मैं कुर्सी पे जम जाता हूँ

पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ

जीत चुनाव में सबको
अपना रंग दिखलाता हूँ

पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ

                     पीयूष गुप्ता

नाम-पीयूष गुप्ता
जन्म-22-9-2002
पिता-श्री अनूप गुप्ता
माता-श्रीमती नीलम गुप्ता
राज्य-उत्तर प्रदेश
हिन्दी साहित्य की प्रमुख विधाएं जैसे आलोचना, लेख, समीक्षा, कविता, गीत, गजल, कहानी, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं में स्फुट लेखन।
बड़े-बड़े लेखकों का आशीर्वाद प्राप्त

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"फोटो"
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पहली कक्षा के बच्चोँ को पढ़ाने के बाद मैं ज्योँ ही दूसरी कक्षा मेँ
प्रवेश किया तो मेरी नजर एक सात वर्षीय लड़की पर जा टिकी | गोरा रंग,भूरे
बाल ,साधारण कपड़े |
"तुम्हारा नाम क्या है ?" मैने पूछा |
बालिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ," अर्पिता मिश्रा |"तुम्हारा घर कहाँ है ?"
"बेदौली , मितावाँ ,जौनपुर |"
"तुम्हारे पिता क्या करते हैँ ?"
"ड्राईवर हैँ |"
"क्या आप मुझसे दोस्ती करेँगे ?" कहकर बालिका ने प्यार से मेरी तरफ अपने
नन्हेँ पंजे बढ़ा दिए |उसका भोलापन देखकर मैं भी अपने आपको रोक न पाया
|मैंने उसका हाथ अपने हाथ मेँ लेते हुए जवाब दिया ,"हाँ , अगर कभी न
टूटने वाली दोस्ती करोगी तो जरूर करूँगा |"
"मैं तो कभी नहीँ तोड़ूँगी ,जब तक ये जीवन रहेगा |छोटी मुँह बड़ी बात | उस
नन्ही सी बालिका की करुणा भरी बातेँ सुनकर मै चकित रह गया | कुछ दिन
पश्चात् हम दोनोँ की दोस्ती ऐसी रंग लायी कि पूरा स्कूल हमारी दोस्ती का
लोहा मानने लगा |इस घटना को लगभग एक वर्ष बीत गए |ग्रीष्मावकाश हुआ |न
चाहते हुए हम दोनोँ को एक दूसरे से अलग होना पड़ा |

जुलाई का महीना है |स्कूल खुल चुके हैँ |अर्पिता ने तीसरी कक्षा मेँ
प्रवेश लिया |मेरा मुरझाया हुआ चेहरा खिला कमल हो गया |मेरी आँखोँ से
खुशी के आँसू निकल पड़े |मैने दौड़कर उसे अपनी गोद मेँ उठा लिया | कुछ देर
बाद जब वह जाने लगी ,मैने बिना देर किए फूल की पंखुड़ी की- सी उसकी कोमल
कलाई को अपने पत्थर जैसे हाथोँ से पकड़ लिया और पूछा ,"तुम मुझे याद करती
थी ,इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास ?"
अर्पिता थोड़ी देर चुप रही फिर अपने बैग मेँ से मेरा फोटो निकालकर मेरे
हाथ मेँ रख दी और बोली ," जब घर का कोई सदस्य मुझे डाँटता-मारता था तो
मैं अकेले मेँ रोती थी और आपकी फोटो देखकर ऐसा महसूस करती थी कि आप मेरे
साथ हैँ |फिर मैं चुप हो जाती थी |

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सागर यादव 'जख्मी '

नरायनपुर ,बदलापुर ,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश |
मो . 8756146096

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कुछ दिन पहले मैं अपने चचेरे भाई से मिलने उनके घर गया था. भाभीजी यथासाध्य आवभगत कर मेरा कुशल-क्षेम पूछा फिर गृहकार्य निपटाने में व्यस्त हो गई. उनका छोटे- छोटे बच्चों से भरा-पुरा परिवार था. पूरा परिवार सभी तरह से सुखी और खुश था, सिवाय इस बात के कि उनके बच्चों में अच्छी बातें सीखने की ललक थोड़ा मंदा था. इस बात के लिए भाभीजी मेरे सामने भी बच्चों को डॉट-फटकार लगाई.

यह सब देखकर मुझे भी थोड़ा चिंता हुआ,किंतु सबकुछ समझे बिना किसी से कुछ कहना उचित न समझा. शाम में भाई साहब घर आए. उनसे बातचीत होने लगी. बातचीत के दरम्यान वे बीच- बीच में बच्चों की लापरवाही पर उस पर चिल्लाए भी.किंतु बच्चों पर ज्यादा असर नहीं हुआ. फिर हमलोग खाना खाकर सो गये.

मैं वहां पूरे एक दिन ठहरा. उपरोक्त घटना मानो उस परिवार के दिनचर्या का एक हिस्सा था. मैंने बच्चों को लाड़-प्यार किया और उसे समझने की कोशिश की. बच्चे जल्दी से घुलने-मिलने वालों में से नहीं थे.एक दब्बू था तो दूसरा मुँहफट. किंतु दोनों में एक बात में समानता थी. वह कि उनके मन में क्रोध,घृणा,प्रतिशोध और द्वेष की भावना प्रबल थी.

निःसंदेह मन में ऐसी भावना रहने पर संयम और आत्मनिरीक्षण कहां रह सकता है? इसके बिना जीवन में अपेक्षित सुधार भी कैसे आ सकता है? क्रोधादि तो विचार और इच्छा शक्तिओं को नष्ट कर ही देता है, फिर इस सबके बिना लक्ष्य -निर्धारण कैसा हो सकता है? मैं चिंतन करने लगा.

कहते हैं कि लाड़-प्यार से बच्चों का चरित्र बिगड़ जाता है. पर भारतीय इतिहास तो कुछ और भी कहता है. बालक शिवाजी को माता जिजाबाई द्वारा बार-बार समझाया गया और इस योग्य बनाया गया कि वे छत्रपति का अलंकार धारण-योग्य बन गये. बालक चंद्रगुप्त को 'मुरा का बेटा-मौर्य' नाम देकर महान् गुरु चाणक्य ने महान् सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का आधारशिला प्रदान किये. वे सब अलंकार के शब्द लक्ष्य का प्रतिनिधित्व किया. इस तरह गुरु द्वारा लक्ष्य का निर्धारण किया गया. उस अलंकार के अनुरुप उनके भावनाओं का विकास हुआ. नेपोलियन बोनापार्ट अपनी ऊर्जा शक्ति स्वयं विकसित की. उन बालकों के अभिभावक, गुरु अथवा स्वयं अपने आकांक्षा के अनुरुप ही लक्ष्य प्रदान किये,जैसा सभी अभिभावक करते हैं. संभवतः उन्होंने भी अत्यधिक लाड़-प्यार न किया हो, किंतु उन्होंने सम्यक उपाय जरुर किये. संभवतः बच्चों की निंदा वे करते हों,किंतु निंदा करने की उनकी नियति थी इतिहास में इस बात का कोई जिक्र नहीं है.

अंग्रेजी का एक पुरानी कहावत है, जिसका आशय है कि छड़ी का टूटना और बच्चों का सुधरना. यानि बच्चों की पिटाई इस कदर करने की सलाह दी गई है कि वह इतना भयभीत हो जाये कि हर कही बात मानने लगे. जहां भय हो वहां घृणा और द्वेष न हो अथवा प्रेम हो ,यह किस तरह संभव है? वह घृणा और द्वेष क्रमशः क्रोध और प्रतिशोध का बीज नहीं है क्या! फिर एक कार्य जो उत्साहपुर्वक किया जाता है और वही भयभीत होकर अथवा अति-उत्साह से किया जाए तो प्रतिफल एक-सा हो सकता है? कदाचित ऐसा संभव नहीं है.

यह परम सत्य है कि मनुष्य लक्ष्य-विहीन रह कर जीवन पथ में प्रगति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता. यह सच है कि बालपन में लक्ष्य निर्धारित हो जाने से आशानुकुल प्रगति हो सकता है. यह भी कि अबोध बच्चे हेतु लक्ष्य का निर्धारण उसके अभिभावक को करना ही होता है,जो उनका दायित्व है. किंतु यह भी एक सत्य है कि सम्यक उपाय रहित लक्ष्य निर्धारण चिर समय तक ठहर नहीं सकता. उपाय ऐसे किये जाए कि बच्चों में इच्छा और विचार शक्तियां बनी रहे. तभी वह लक्ष्य प्राप्य होगा. अर्थात बच्चों के प्रति अभिभावक का स्पष्ट लक्ष्य हो कि वह सम्यक उपाय से बच्चों को उनके लक्ष्य से अवगत कराएं एवं प्रेरित करें.

मैंने भाभीजी को अपने विचार से अवगत कराया . तर्क-वितर्क के पश्चात् उन्होंने मेरे विचार से सहमति जताई और उक्त विचार को अपनाने का आश्वासन दिया. फिर मैं उनसे अनुमति लेकर अपने घर चला आया.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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मैं तेरा अपराधी
तू मेरा अपराधी
प्यार किया पर साथ नहीं कैसी ये विचित्र
कहानी


मैं तेरा.....
लबों के स्पर्श हुए,तन भी जाने क्यों मदमस्त हुए
मनों में टकराव हुआ और हो गयी बात
पुरानी


मैं तेरा....
याद किया जब मुझको , मैंने था साथ निभाया
प्यार किया जब तुझको, तूने क्यों बंधन छुटकाया
भूल गए वो वादे , और वो इरादे
जो बाँहों की उर्मियों में तूने थे साथ गुजारे
सावन की रातों की ,
तेरी उन बातों की , याद है
पुरानी


लेकिन मेरे जीवन की अब
यही एक कहानी
मैं तेरा....

Name - Anuj Katara
College -Govt. College of engg. & technology, Bikaner
Address -behind the ICICI bank ,mahukalan ,sawai madhopur, Raj.

E mail-anujkatara7@gmail.com

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वो जमाना चला गया जब इंसान की खूबियों और उपयोगिता का आकलन-मूल्यांकन और उपयोग करने के लिए समाज आगे आता था और सदाचारी, सत्यवादी, सज्जनों, सेवाभावियों तथा सिद्धान्तवादी लोगों को सामाजिक संरक्षण, प्रोत्साहन और हरसंभव मदद प्राप्त होती थी और वह भी पूरी उदारतापूर्वक।

जो जिस योग्य होता था उसे उसी के अनुरूप काम मिलता और उसकी प्रतिभाओं के हिसाब से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी। वो जमाना सिद्धान्तों, संस्कारों और आदर्शों का हुआ करता था।

आज पूंजीवाद और प्रोपेगण्डा का जमाना है, भौतिकता की चकाचौंध है इसलिए उन लोगों को आदर-सम्मान, मान-प्रतिष्ठा और यश प्राप्त है जिनके पास पैसा है अथवा पॉवर। दोनों के ही रास्ते परिग्रह और भोग-विलासिता के उन्मुक्त लक्ष्यों की ओर हैं जिनका न कोई ओर-छोर है, न मर्यादाएं। सब कुछ मनमर्जी और स्वेच्छाचारों पर निर्भर है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।

समाज-जीवन का क्षेत्र कोई सा हो, कोई सा अँचल हो, वहाँ समाज की नज़र अच्छे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्तित्वों पर बनी रहती थी और उन्हें उनके योग्य कर्म, आदर और सम्मान दिलाने का काम समाज पूरा करता था।

आज वे सारे मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं इसलिए श्रेष्ठताओं के सारे मानदण्डों पर दूसरी अत्याधुनिक और भौतिकतावादी कसौटियां हावी होती जा रही हैं। अब प्रतिभा, हुनर या सिद्धान्तों की बजाय जिन तत्वों के आधार पर इंसान का कद तय होने लगा है उसके बारे में सर्वविदित है।

बात सामाजिक प्रतिष्ठा से लेकर अपने आपको स्थापित करने की हो या अपने हुनर विशेष के सार्वजनीन प्रकटीकरण की, हर जगह दूसरों के मुकाबले स्वयं को स्थापित करने के लिए इंसान हर संभव उपायों का सहारा ले रहा है।

इसके लिए अब न कोई वर्जनाएं रह गई हैं, न मानवोचित मर्यादाएं। एक तरह से यह सीधा और खुला संघर्ष है जिसमें हर कोई पाने और कब्जा जमाने के लिए प्रयत्नशील है चाहे वह किसी भी तरह से हथिया क्यों न लिया जाए। छीना-झपटी और लूट-खसौट का यह दौर हाल के वर्षो में पूरी दुनिया में चल निकला है।

शोर्ट कट अपनाने वाले, अपने को ऊँचा बनाने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर जाने वाले और किसी के भी आगे नाक रगड़ कर आगे बढ़ जाने वालों की भरमार है, पाँव पखारने वाले भी खूब हैं और पाँव दबाने लेकर चरणस्पर्श करने वाले भी कम नहीं। बहुत सारे लोग जिधर देखो उधर किसी न किसी पाँव धोक लगाते हुए दिखने लगे हैं। कई तो पूरे पसर ही जाते रहे हैं।

अक्सर ऎसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनमें कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया में ऎसे अधिकांश लोग जिनके सामने झुक-झुक कर सलाम करते हैं, हाथ जोड़कर आदर भाव दर्शाते हैं, वे ही लोग बाद में अपने काम निकल जाने पर अंगुली दिखाते हैं। इसी प्रकार पाँवों में गिरकर चरणस्पर्श करने वाले लोगों में से ही खूब सारे टाँग खिंचने लगते हैं।

आदमी का अब कोई भरोसा ही नहीं रहा। वह किस समय क्या कर गुजरे। किसे अच्छा और बुरा बता दे, यह सब उसके स्वार्थ पूरे होने पर निर्भर करता है।

दुनिया में जो भी अच्छे लोग हैं उनकी सबसे बड़ी कमजोरी या कमी यही होती है कि वे अपनी प्रतिभाओं के सार्वजनिक तौर पर प्रकटीकरण से हिचक रखते हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि प्रतिभाएं अपना काम करने में विश्वास रखती हैं आडम्बरों में नहीं।

दूसरी ओर प्रतिभाशून्य लोगों के लिए आडम्बरों और पाखण्डाेंं के सिवा और कुछ भी होता नहीं, इसलिए उन्हें आए दिन किसी न किसी से समझौते करने की विवशता होती ही है। ये लोग खुद नहीं जीते बल्कि दूसरों के सहारे जिन्दा रहने को मजबूर होते हैं।

आज का जमाना कुछ विचित्र है। दुनिया में जहां जो लोग अच्छे काम कर रहे हैं, सेवा और परोपकार में रमे हुए हैं, रचनात्मक कर्म अंगीकार किए हुए हैं अथवा उनके पास किसी भी प्रकार का हुनर है, इन सभी को चाहिए कि वे औरों के भरोसे न रहें, न चुपचाप और स्वान्तः सुखाय बने रहें, बल्कि अपने आपको स्थापित करने और अपनी अच्छाइयों से जमाने भर को अवगत कराने के लिए प्रयास करें।

इन प्रयासों में यह जरूरी नहीं कि किन्हीं प्रकार के गोरखधंधों, षड़यंत्रों अथवा बुरे लोगों का साथ लिया जाए। अपने दायरों और मर्यादाओं में रहकर अपनी बात जमाने तक पहुंचाएं। यह किए जाने पर ही अच्छाइयों का वजूद और अधिक मजबूत होकर प्रसार पाएगा अन्यथा बुरे और स्टंटबाज लोग संगठित होकर अपने हीन और क्षुद्र, कुटिल और कपटी धंधों से अच्छे लोगों को हाशिये पर लाने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं।

अपने आपको स्थापित करने के लिए खुद आगे आएं। यह हमारे अपने लिए नहीं बल्कि समाज और देश के लिए जरूरी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसका लाभ समाज को प्राप्त होना चाहिए। हमारे कर्म का अनुकरण करने का संदेश सभी तक पहुंचना चाहिए।

आज समय की मांग यही है कि हम कंदराओं में बैठकर काम करने वाली कार्यशैली छोड़ें, अपने व्यक्तित्व में थोड़ा सुधार लाएं और अपने आपको प्रतिष्ठित करें। समाज सेवा का यह भी एक बहुत बड़ा आयाम है जिसके माध्यम से अच्छाइयों की बेहतर ढंग से मार्केटिंग कर समाज और देश के लिए हम अपने आपको उपयोगी बना सकते हैं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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मनुष्य और देवता में अन्योन्याश्रय संबंध रहा है । पहले देवता ने मनुष्य को बनाया ,फिर मनुष्य ने देवता को बनाया ,दूसरे शब्दों में अगर यूं कहे कि मनुष्य देवता के बिना जी नहीं सकता और देवता का अस्तित्व मनुष्य के बिना शून्य है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं मानी जाती  ।

    हड़प्पा और मोहन जोदाड़ों की खुदाई इस विश्वास को काफी बल देती है कि   प्राचीन काल से उपासना की  परंपरा  चली आ रही है। ,जिस जिस चीज से लोग डरते थे उसको प्रसन्न करने के लिए उसकी  पूजा अर्चना शुरू कर देते थे  । पहले लोग प्रकृति की पूजा करते थे ,फिर अपने घरों में पूजा करने लगे जो कालांतर में एक गोत्र या कुल की पूजा कहलाती रही । इसी प्रकार  अपने वास स्थान या गांव की सुरक्षा के लिए ,दैविक या भौतिक या प्राकृतिक आपदा जैसे आग ,बाढ़ ,महामारी ,बाहरी आक्रमण आदि से दूर रखने के लिए गांव की सीमा पर ग्राम देवता या कुल देवता की स्थापना की गई ।,।

  ऐसा पाया गया है कि  हिंदुस्तान के अधिकांश हिस्सों  में ग्राम देवता स्त्रियाँ होती हैं, जैसे सत्ती माई ,काली माई ,दुरगा माई ,चंडीमाई ,शीतला माई आदि;मगर कहीं कहीं पुरुष देवता भी होते हैं ,जैसे भैरो बाबा , बजरंग बली ,ब्रम्हा  शंकर ,नंदी आदि  आदि ।

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   किसी समय मे स्थापित होने वाले ये पवित्र स्थान [,गाव से बाहर या सीमा पर ],ऐसे निर्जन ,सुनसान खेतों ,या गाछों के बीच हुआ करते जहां कम आबादी के कारण शाम ढलते ही भयानक और रोमहर्षक वातावरण  ,विभिन्न प्रकार के भूत ,प्रेत ,चुड़ैल ,आदि की दंतकथाओं के विकास और प्रचलन से उत्पन्न भय से  मनुष्यों को निजात दिलाया करते थे । पीपल या बरगद की विशाल वृक्षों की शाखाओं से बंधे  नए लाल ,पीले ,कपड़े या झंडे या त्रिशूल ,सिंदूर पुते पत्थर के आकृति आदि उन्हें आसुरी या पैचासिक प्रवृत्तियों से , प्राकृतिक और ,मनुष्य कृत आपदाओं से ,मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करता था । उनकी दृढ़ आस्था और विश्वास के प्रतीक ये न्याय के देवता उनके  आपसी और सामाजिक झगड़ों के निबटारे के  लिए वास्तव में  न्यायाधीश का कार्य करते । उन्हें अगाध विश्वास था कि अगर कोई बलशाली उसकी संपत्ति हड़पेगा ,उसे बिना कसूर के सताएगा तो ये देवता आततायी को अवश्य दंडित करेंगे ।

   इसके अलावा बहुत सारे पवित्र पेड़ों एवं झाड़ों जैसे पीपल ,बरगद केला ,बेल ,शमी ,तुलसी ,आवला  आदि की; जानवरों की ,साँपों की पूजा भी वहां होती ,समय समय पर भजन कीर्तन होता ,जिससे उनकी आध्यात्मिक शक्तियां और भी बलवती होती थी ।

    राजतंत्र में भी नगर या ग्राम की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के लिए राजे महाराजे ग्राम या नगर देवता की मूर्ति स्थापित कराते थे ।और उनकी विधि वैट पूजा करवाते, राजा के अलावे  उस  इलाके के सारे लोग अपने परिवार की सुख शांति के लिए उनकी उपासना करते और बच्चों के जन्म ,मुंडन ,उपनयन ,शादी ब्याह आदि मांगलिक मौकों पर सर्व प्रथम उस सर्वाधिक आदरणीय एवं  प्रतिष्ठित स्थान को न्योता जाता ,तदुपरांत वहां  जाकर अपनी अगाध भक्ति , निष्ठा और आस्था का परिचय देते । सजी धजी सुहागिनें देवता को प्रसन्न करने के लिए एक से एक भक्ति पूर्ण गीत बनाती औरबड़ी भावुकता से  गाती थीं । बली प्रथा समाप्त होने के बाद अनेक स्थानों पर लोग मिट्टी के हाथी ,घोड़े या ऐसी ही कुछ प्रतीकात्मक चीजें मन्नत पूरा हो जाने पर चढ़ाते हैं हालांकि किसी किसी समुदाय मे जानवरों की बली प्रथा अभी भी सुनी जाती है  ।

   अलग अलग गावों मे अपनी समुदाय या जाति के आधार पर लोग अपने देवता की स्थापना की गई थी । आज के बड़े बड़े नगरों या महानगरों में जो प्राचीन मंदिर हैं उनका भी स्वरूप कभी ग्राम या नगर  के रक्षक ,जनकल्याण कारक ,और असीम शक्ति पूंज के रूप में था । मुंबा देवी किसी जमाने में मुंबई की ग्राम देवी ही थी । आज  भी इन की महिमा कम नहीं हुई है ।पहाड़ो मे भी अनेक देवी देवता है जिन्हें वहां के स्थानीय लोग अपने इलाके का रक्षक मानते हैं,और उनके रुष्ट होने पर भयंकर प्रलय की बात कहते हैं ,जिसका एक उदाहरण केदारनाथ के प्रलय से जोड़ा गया । बहुत से आदिवासी बहुल इलाकों में आज भी लोग अपने इस ग्राम्य देवता की उपासना साल में एक बार ,ढ़ोल ,मंजीरे ,पिपही ,के साथ नाच गाकर बड़े पैमाने पर  उत्सव मना कर करते हैं।

प्रकृति मे फैली अपार सकारात्मक ऊर्जा से, प्राण वायु से नवीन चेतना प्राप्त कर अपनी मानवीय जिंदगी को बेहतरीन और सुखमय बनाने का हमारे प्रात: स्मरणीय ऋषिओ ,मुनियो ,पूर्वजों आदि द्वारा दिखाया गया यह आध्यात्म का मार्ग निस्संदेह अद्भुत हैं , परम वैज्ञानिक है ।

   सनातन धर्म के छत्तीस कोटि देवी देवताओं में ये सभी शामिल हैं ।लोगों ने अपनी जाति और व्यवसाय के अनुकूल अपने अपने देवता को चित्रित किया था ।

जब  भारत माता  ही ग्राम वासिनी हुई ,तो भले उनके देवी देवता भी कैसे उनका दामन छोड़ते । पूरब से पच्छिम ,उत्तर से दक्छिन तक ही नहीं ,सनातन धर्म  के

अवशेषों को अपने सीने में सँजोए विश्व में जहां जहां भारत वंशी हैं,अपने अपने कुल या ग्राम देवता को अपने से जुदा कर ही नहीं सकते ।  देश परदेश की कभी कोई गहन मजबूरी हुई तो भी हृदय से कौन मिटा सकता है भला ।

        ऐसे संस्थानों या जगहों पर सीधे सरल चित्त आस्थावानों की भावना का लाभ उठाकर  , धूर्त और चालाक लोगों द्वारा  कभी कभी बहुत से अंध विश्वासों का जन्म और पोषण भी होता है जो यदा कदा उस समाज के लिए घातक भी हो जाता है ,अत; उन अंध विश्वासों से, पाखंडों से  समाज का दोहन या शोषण रोकना बेहद आवश्यक है , जिसके लिए अंध विश्वास निरोधक कानून काफी कारगर होगा ,बशर्ते इसे ईमानदारी से लागू किया जाय ।

  कामिनी कामायनी ॥

भाषा-चिन्तन

अपनी-अपनी आसानी

डॉ. रामवृक्ष सिंह

भारत सरकार की राजभाषा नीति सरकार के श्रेणी तीन और उससे ऊपर के कर्मचारियों पर लागू होती है। राजभाषा विषयक सांविधिक प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम, संकल्प और नियम तथा तत्पश्चात् राष्ट्रपति महोदय द्वारा जारी आदेशों का उल्लंघन करने पर दंड का विधान नहीं है। अलबत्ता बार-बार यह अवश्य कहा गया है कि राजभाषा नीति का अनुपालन प्रेरणा और प्रोत्साहन से होगा। जब प्रक्रियाएँ जटिल और दुरूह होती हैं तो प्रेरणा और प्रोत्साहन काम नहीं करते। अनुपालनकर्ता आसान रास्ते चुनने लगते हैं। जटिलता और दुरूहता वस्तु और प्रक्रिया-विशेष में भी हो सकती है और प्रयोक्ता के मन में भी। भारत सरकार की राजभाषा यानी हिन्दी के साथ भी यही सच है। विगत पैंसठ वर्षों में राजभाषा हिन्दी का जो रूप उभरकर सामने आया है उसका अपना वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्ट्य पर चर्चा करना यहाँ अभीष्ट नहीं। अभीष्ट है सरलता और दुरूहता की मीमांसा।

हमने अभी-अभी कहा कि अनुपालनकर्ता आसान रास्ता चुनने लगते हैं। इसे एक दृष्टान्त से समझा जाए। यदि किसी चौराहे पर कोई गोल चक्कर बना हो और हमें वहाँ से यू-टर्न मारना हो तो हमारे लिए आसान क्या है? गाड़ी में बैठे लोग प्रायः ऐसे मौके पर अपेक्षाकृत अधिक चलते हुए, गोल-चक्कर के साथ-साथ न घूमकर, अपने दाहिने घूमते हुए पीछे गाड़ी घुमा लेते हैं। यही करना उनके लिए आसान पड़ता है। मैंने अच्छे-अच्छे लोगों को पार्कों की रेलिंग फाँदते देखा है, क्योंकि वे पार्क के फाटक तक जाने की जहमत नहीं उठाना चाहते। तो क्या आसानी का अर्थ जायज़ और न्यूनतम प्रयास से भी जी चुराना है? सही रास्ते जाना हो तो कई बार थोड़ा अधिक चलना पड़ता है, अधिक प्रयास करना पड़ता है। ज़रूरी नहीं कि आसान रास्ते चलकर हम सही-सलामत सही जगह पहुँचें। मसलन किसी ऊंचे भवन से नीचे उतरना हो तो बेहतर है कि सीढ़ी या लिफ्ट से उतरा जाए। किन्तु आसानी तो वहाँ से छलांग मारने में ही है। बिलकुल सीधे और जल्दी नीचे उतर आएँगे। लेकिन इस प्रकार उतरने में कितना बड़ा जोखिम है, यह भी तो देखिए। प्रकटतया यह कुतर्क लग सकता है, किन्तु इस बात में दम तो है।

हिन्दी को कितना सरल होना चाहिए? कैसी कर दी जाए तो हिन्दी सरल हो जाएगी? क्या सब लोगों के दूर बैठकर देखते रहने से हिन्दी सरल हो जाएगी? जिन लोगों को हिन्दी में काम करना है, वे कब तक हिन्दी के सरल होने का इन्तज़ार करते हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? यदि हिन्दी उनके हिसाब से सरल नहीं है तो क्या वे खुद इसे सरल बनाने में कोई योगदान करने का कष्ट करेंगे? अपने मन की बात तो वे ही जानते हैं। उन्हें क्या सरल लगता है और क्या कठिन, यह भी वे ही बेहतर जानते होंगे। तो क्या यह उचित नहीं होगा कि हिन्दी की कठिनता, जटिलता, दुरूहता आदि की सहस्रनामी माला जपते रहने के बजाय वे खुद ही अपने लिए सरल भाषा की ईज़ाद कर लें और उसे इस्तेमाल करें? क्या ऐसा करने के लिए उन्हें कोई रोकता है?

क्या आभरणहीन, सौष्ठव-विहीन, सरल, सपाट हिन्दी उन्हें रुचेगी? चलिए यह भी सही। तो क्या ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, भैषिकी, गणित, लेखा, वित्त, बैंकिंग, व्यापार, वाणिज्य, विपणन. शिक्षा, मनोविज्ञान, समाज-कार्य, समाज-शास्त्र, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में जो नित नई अवधारणाएं नित्य-प्रति, क्षण-अनुक्षण जुड़ती जा रही हैं, उनके लिए हमें कोई नए शब्द न तो अपनाने चाहिए, न सीखने चाहिए? बस कुछ गिने-चुने शब्द जो हमने बचपन में सीखे थे, उन्हीं से काम चला लेना चाहिए? यदि आसान शब्द की अवधारणा में नई संकल्पनाओं, नए शब्दों एवं नूतन अवधारणाओं को सीखने व अपनाने का निषेध निहित है, तो भी क्या हमें आसानी के प्रति आग्रहशील रहना चाहिए?

तो क्या हम निरन्तर सीखते रहने की सहज मानवीय प्रवृत्ति को ही सिरे से नकार देना चाहते हैं? राजभाषा हिन्दी के सन्दर्भ में आसान शब्द की मीमांसा करते हुए तो हमें यही प्रतीत होता है।

क्या हम अपने कार्यालयीन जीवन में नया ज्ञान अर्जित नहीं करते? भर्ती के समय हम सबके बौद्धिक स्तर का आकलन किया गया और लाखों अभ्यर्थियों के बीच से केवल उनका चयन किया गया, जिनका सामान्य ज्ञान, संबंधित विषय का ज्ञान और बौद्धिक स्तर ऊँचा था। ऊँची बौद्धिक क्षमता वाले लोगों को ही भर्ती करने की क्या ज़रूरत है? मेरे तईं तो इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि ऐसे लोग अपने कार्य-काल में संस्था की आवश्यकता और अपेक्षानुसार नयी प्रौद्योगिकी, नयी संकल्पनाओं, नए शब्दों, नई कार्य-शैलियों को सीख पाएँगे, उनके अनुरूप अनुकूलित हो पाएँगे और अपनी मेधा का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए संस्था, विभाग, समाज और देश की उन्नति में अपनी ओर से भरपूर योगदान कर पाएँगे। इसका अभिप्राय यह हुआ कि हमारी भर्ती के समय से ही हमारे बारे में यह धारणा रही है कि हम नई संकल्पनाएं और नए शब्द सीखेंगे और हमारे भीतर सीखने की क्षमता विद्यमान है। तो हम बात-बात पर आसानी की बात क्यों करते हैं? मेरे तईं आसानी की माँग करना, अपनी मेधा को ही सिरे से नकारना है। ऊँची बौद्धिक क्षमता वाला व्यक्ति जटिल से जटिल संकल्पनाओं को तेजी से सीखता है।

खुद को ईडियट कहलाना कौन पसंद करेगा? सभी तो स्वयं को जीनियस समझते हैं। जीनियस व्यक्ति यह नहीं कहता कि मैं नया कुछ भी नहीं सीख सकता। वह तो हर समय नई चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए सन्नद्ध रहता है। यदि ऐसा न होता तो न तो हम बाज़ार में उतर रही नई-नई कारें दौड़ा पाते, न ही स्मार्ट फोन, कंप्यूटर और हर रोज आ रहे नए-नए उपकरण चला पाते। अपनी रुचि के उपकरण इस्तेमाल करना हम तेजी से सीख लेते हैं। उनसे जुड़े शब्द भी ग्रहण कर लेते हैं। फिर हिन्दी ही हमें जटिल क्यों लगती है? क्या हमारी मनोवृत्ति में ही कोई खोट है? डू वी हेट हिन्दी? एंड फॉर दैट मैटर, डू वी लाइक इंग्लिश मोर दैन हिन्दी? इफ दैट इज ट्रू- हाउ अनलकी एंड हाउ अनग्रेटफुल ऑफ अस!!

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