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अपर्णा शर्मा की कहानी - पतिव्रता

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अरूण और मैनी के हिन्दुस्तान आने की खबर से अरूण का पूरा परिवार उनके स्वागत को उत्सुक हो गया। दो साल पहले अरूण ने अमेरिका में अपनी सहकर्मी मैनी से शादी कर ली थी। मैनी का परिवार हिन्दुस्तानी था। वे अभी दो पीढ़ी पहले ही अमेरिका में बस गए थे। अरूण और मैनी की शादी से दोनों के परिवार खुश थे। वे पहली बार हिन्दुस्तान आ रहे थे। इसीलिये मैनी का अरूण के रिश्तेदारों और मित्रों से परिचय कराया जाना जरूरी था और साथ ही विदेशी बहू को कुछ दिन स्वदेशी रीति रिवाजों की जानकारी दिया जाना भी। अरूण के परिवार के सभी लोग अपने-अपने तरीके से योजना बना रहे थे। उसकी बहनें विशेष उत्साहित थीं। वे भैया-भाभी के साथ एक-एक दिन कैसे एन्जाय करना है इसकी तैयारी कर रही थी। माँ भी बहू के आराम, पसंद और जरूरतों का सामान जुटा रही थी। दादी का ध्यान केवल बहू के रंग रूप और संस्कारों पर था। उसे पूरा यकीन था कि उसका लाड़ला पोता कभी गलत चुनाव कर ही नहीं सकता है। उसने निश्चय ही सुन्दर सुघड़ बहू चुनी होगी। अरूण और मैनी के स्वागत के लिये पूरा परिवार हवाई अड्डे पर पहुँच गया। अरूण ने बड़ों के पैर छुए। उसने मैनी को भी ऐसा करने का इशारा किय…

कामिनी कामायनी का यात्रा संस्मरण : मलाका -एक अद्वितीय शहर

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मलेशिया का एक राज्य ,मलाका स्वच्छ नील गगन ,घनघोर हरियाली और विशाल समुद्र तट पर बसा हुआ एक बहुत ही खूब सूरत जगह है।  यह पर्यटकों के लिए एक बेहद आकर्षक जगह बन गया है । बचपन में पढे गए सिंदबाद की यात्रा अनायास याद आ जाना मेरे मस्तिष्क में एक ऐसा रहस्यमय किला बना गया ,लगा ,इसे गंभीरता से जानने ,समझने ,बूझने के लिए ही मैं यहाँ की दहलीज पर आ खड़ी हुई थी । सुल्तान ,शाहजादे ,शाहजादिओं की धरती ,व्यापार और व्यापारियों की धरती ,तीर और तलवार की धरती ,तिलस्म और खुराफात की धरती ,षडयंत्र और गुनाह की धरती । क्या इसे कभी चैन मिला होगा ? 0 । यह देश की राजधानी कुवालालम्पूर से 147 किलोमीटर और सिंगापूर से 245किलो मीटर दूर है ।यहाँ की सड़कें चौड़ी और सुंदर है ,।  इसकी विधिवत  स्थापना 1396 ईसवी में परामेश्वरा जो तेमासिक {प्राचीन सिंगापूर का अंतिम राजा था } ने किया । यहाँ मलाका नाम का वृक्ष और नदी  भी है,शायद इसी के नाम पर इसका नाम कारण हुआ हो । प्रथम सुल्तान के आगमन के पहले मलाका एक मछुआरों का गाँव था ।उसकी अपनी व्यथा कथा थी और अपना एक इतिहास था । मलय सभ्यता का प्रभाव अगल बगल के पड़ोसी राज्यों मे आज भी दिखाई पड़…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' डॉ. वर्गीस कुरियन

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भारत मेंश्वेत क्रांति के जनक और अमूल के संस्थापक वर्गीस कुरियनकी 94वीं जयंती के मौके पर सर्च इंजन गूगल ने अपनी लाज़वाब पेशकश की फेहरिस्तमें एक और कड़ी जोड़ते हुए अपने डूडल के जरिए उन्हें अर्थपूर्ण श्रद्धांजलिदी है। गूगल ने कुरियन को दूध का डोलची लिए हुए दिखाया है जिसमें वह एकदुधारू पशु के पास बैठे हुए हैं। डूडल में उनके पास एक भैंस खड़ी है और पासमें दूध की तीन डोलची रखी हैं, जिनमें से एक को उन्होंने हाथ में थामे हुआहै।गूगल का यह डूडल भारत के ग्रामीण इलाके का चित्र भी प्रस्तुत करता है।लिहाज़ा, कहना न होगा कि एक तस्वीर में गूगल ने दिखा दिया भारत में श्वेत क्रांति के जनक और अमूल के संस्थापक वर्गीस कुरियन की 94वीं जयंती है। किसी समय दूध की कमी से जूझने वाले भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने वाले 'श्वेत क्रांति के जनक' डा. वर्गीज कुरियन 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' के नाम से भी जाने जाते हैं। उन्हें भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने का श्रेय जाता है। स्मरण रहे कि कुरियन को 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राष्ट्रीय डेयरी विकास बो…

जावेद अनीस का आलेख - बाल संरक्षण की उलटी चाल

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26 साल पहलेसंयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने बाल अधिकार समझौते को पारित किया गया था जिसके बाद वैश्विक स्तर से बच्चों के अधिकार को गंभीरता से स्वीकार किया जाने लगा. इस समझोते की रोशनी में भारत में भी बच्चों के हक में कई नीतियाँ और कानून बनाये गये हैं. बच्चों और किशोरों की सुरक्षा, संरक्षण और देखभाल के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000 में किशोर न्याय अधिनियम लाया गया। यह एक ऐसा प्रगतिशील कानून है ।इसके तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी विधि विवादित बच्चे के साथ वयस्कों की तरह व्यवहार नही किया जा सकता है उनके लिए लिए अलग से न्याय व्यवस्था की गयी है, इस कानून के दूसरे हिस्से में घर से भागे हुए, अत्यन्त गरीब परिवारों के, अनाथ या छोड़े गए बच्चों के संरक्षण की व्यवस्था है। 2007 में केंद्र सरकार द्वारा किशोर न्याय अधिनियम को मजबूती से लागू करवाने के लिए समेकित बाल संरक्षण योजना बनाई गयी। अधिनियम के अनुसार देश के प्रत्येक जिले में एक बाल गृह हो, एक आश्रय गृह हो, एक आबजव्रेशन होम हो, एक विशेष गृह हो। आश्रय गृह और बाल गृहों में जरूरतमंद बच्चों को रखा जाना है। किशोर न्याय अधिनियम और एकीकृत बाल संरक्ष…

महावीर सरन जैन की दो कविताएँ

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दो कविताएँ
     1. चिन्तन और मैं
प्रोफेसर महावीर सरन जैन

जब होते हो,
मन में रह रहकर
पलने वाला कम्पन
सिगरेट धुएँ की भाँति-
सुलगता है।
जलता नहीं।
ज़ीरो बाल्ट के बल्ब की
मद्धिम रोशनी की भाँति-
कोठरी के अनेक खुरदुरे चिह्नों को,
धुँधला देता है;
ढाँक लेता है।
होलिका दहन की
तेज रोशनी की भाँति-
अतीत की परम्परा से बने
अन्तर्जगत के गह्वरों को-
कौंधाता नहीं।
मन के पट भिड़ जाते हैं।
महानगरों के पड़ौसियों की भाँति-
बन्द दरवाजे के सामने होकर
मैं,
अपने को,
कनखियों से निहार भर पाता हूँ
नयनों में चित्र नहीं बनते,
कानों में राग नहीं बजते,
जड़ता, मरघट सी शान्ति,
अजीब, निगूढ़, काले वलयों में-
भावों की रेखायें आबद्ध हो जाती हैं।
इन्द्रियेत्तर बोध के मोह में,
बर्फीली श्वेतता की आभा में,
अहसास होता है -
मेरा ‘मैं’ जीने लगा है।
इन्द्रियों की शिथिलता,
अन्तर की निष्क्रियता,
जड़ता की योगिनी,
लगता है -
मूलाधार पर कुंडली मारी हुई प्रज्ञा
फन उठा रही है।
चिन्तन का स्फीत्कार साँप
अन्न से आनन्द की ओर
दौड़ रहा है।
अब,
सब,
निःशेष हो गया है।
निर्मल,
असीम,
मेरा ‘मैं’ बचा है।
घुमड़ता नीलापन,
लालिमा सा पगलाकर, फैलता चला जाता है
दिग-दिगन्त।
मेरे ‘मैं’ में-
असीम के कण कण,

अनुज कटारा की कविता - ना वो चंद्रमुखी

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ना वो चंद्रमुखीना वो है परियों की कोई कहानीहै अगर कुछ तो,लफ़्ज है वो मेरे गीतों केदबे हुए जज्बात है मेरेकहीं गुम हो रही साँस है वो मेरीमेरे कोरे कागज की कल्पना है वोमेरी मुस्कान की वजह तो नहीं पर जीने की आस है वो ।तुम पूछते हो कोन लगती है वो मेरी...?मुझे आनंदित करने वाली सूरज की किरण है वोमेरे धड़कते दिल की धड़कन है वोख़्यालो में दस्तक देने वाली एक ख्याब है वोकोई नशा तो नहीं मेरा पर बनती हुई लत है वो मेरी ।।वो पगली किसी और को चाहती हैपर मेरी कभी तो होगी , क्योंकि मेरे जीने की उम्मीद है वोदर्द भरे नगमों का संगीत है वोस्वंय को जीवित रखने के लिये प्रेरित करने वाले जज्बात है वोप्रश्न तो नहीं मेरा , पर हर प्रश्न का उत्तर है वो...कवि परिचय-अनुज कटारा, व्यवसाय:छात्र(राजकीय अभियांत्रिकी कॉलेज)
वर्तमान पता: H.N. 548/12 महुकलां,गंगापुर सिटी,सवाई माधोपुर,राजस्थान
Pin code-322202

सागर यादव 'जख्मी' की प्रेम कविताएँ

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1. तुम बिन
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तुम बिन मैं जी ना पाऊँगा |

अपने इस छोटे से हृदय मेँ ,

जाने कितने ख्वाब सजाये

तोड़ जग के सारे बंधन ,

तुमसे हम सम्बन्ध बनाये

ये जहर-ए-जुदाई

किसी कीमत पे पी न सकूंगा ,

तुम बिन मैं जी ना सकूंगा |

मेरे जीवन के मालिक तुम हो,

मैं इक दरिया और
साहिल तुम हो

अपने दिल के घावोँ को

अश्कोँ से धो ना पाऊँगा ,

तुम बिन मै जी ना पाऊँगा |



2.तुम्हेँ देखने के बाद
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पल भर का भी सुख

मेरी किस्मत मेँ नहीँ

मगर ,तुम्हेँ देखने के बाद

मैं डूब जाता हूँ

तुम्हारे प्यार के अथाह सागर मेँ |

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सागर यादव 'जख्मी'

नरायनपुर,बदलापुर,जौनपुर,उत्तर प्रदेश,भारत |

मो.8756146096

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - अपने भीतर ही झरता है अमृत, और विष भी

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हमारा यह शरीर परमात्मा की अनुपम कृति है। यह समस्त ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतिनिधित्व करने का सामथ्र्य रखता है। ब्रह्माण्ड भर में जो कुछ है उस तक पहुँचने का शोर्ट कट इंसान की देह में सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता ही है। चाहे इंसान किसी भी वर्ण, जाति, सम्प्रदाय, लिंग, क्षेत्र या आयु का क्यों न हो। इस दृष्टि से पिण्ड अपने आपमेंं अनुपम ईश्वरीय कृति है। इस सत्य को जानने वाले लोग बहुत कम हैं लेकिन जो जान जाते हैं उनका जीवन धन्य हो जाता है। शेष लोग अपने तुच्छ सांसारिक स्वार्थों को ही जीवन का परम लक्ष्य मानकर श्वानों की तरह इधर-उधर भटकते ही रहते हैं। इस पिण्ड में वो सारी ताकत है जो ब्रह्माण्ड के संचालन में समर्थ है। इसीलिए पिण्ड की शक्तियों के जागरण पर जोर दिया गया है। यह स्पष्ट है कि पिण्ड का जागरण होने पर ब्रह्माण्ड से सीधा सम्पर्क जोड़ कर दैवीय और पारलौकिक ऊर्जाओं को पाया एवं उनका उपयोग किया जा सकता है। विज्ञान और मूर्ख लोग इस बात को मानें या न मानें, लेकिन जो अनुभवातीत शाश्वत सत्य और सनातन तथ्य है उसे कभी झुठलाया नहीं जा सकता। कोई इस पर विश्वास करे या न करे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला…

लक्ष्मीकांत बैष्णव , रायपुर की कविताएँ

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टिम टिम जलता दीपकस्तब्ध वातावरण
गहन अंधकार में
टिमटिम जलता दीपक को देखा ,
तो पाया कि
उसके चारों ओर
प्रकाश का एक वृत्त है
जो धीरे धीरे
धुंधला होता हुआ
अंधकार के विशाल घेरे में
पड़ा रो रहा है
उस वृत्त प्रकाश के चारों ओर
पाषाण सा विशाल
अंतहीन अंधेरा
उसे बुरी तरह दबाए हुए है
दीपक की लौ तूफानी झोंकों से
पल भर को कांप जाती है
तो अंधेरा खिसककर
उसके निकट आ जाती है
तम की विशाल सेना
मानों पूरी तरह तैयार
और चौकस खड़ी है
कि वह दीपक कब बुझे
और एकदम से वे
धावा बोलकर
अपने राज्य के
कटे छटे भाग पर
अपना आधिपत्य जमा ले ---विवशता
हमारे सम्बंध
सिमटकर
कितने बौने हो गए हैं
कि सिर्फ
पत्रों के आदान प्रदान
तक ही उनकी सीमा है
एक दूसरे के
आड़े वक्त में
काम आने वालों का स्वर
अत्यंत धीमा है
हमने अपने इर्द गिर्द
बुन लिए हैं इतनी
व्यस्तता के जालें
कि मकड़ी की भांति
उन्ही में फंसकर
रह गए हैं
हाय !
हम कितने असहज
और अमानवीय हो गए हैं ।
-- लक्ष्मीकांत बैष्णव , रायपुर

सुमन त्यागी 'आकाँक्षी' की कविता - मैं भी छोड़ूं देश, ये अरमान आया

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देश का सम्मान
शब्द-शब्द के जाल से
छोड़ूँ ,देश अरमान आयामारो-मारो ,काटो-काटो
शब्दों का शैलाब आयासच में है,या फिर भ्रम
असहिष्णुता का आसमान छायाजब तक पाया जुड़ा रहा
अब मन में बेईमान आयाकल तक रहा 'अतुल्य ' बना
अब उसका अपमान आयारणछोड़ तो बन जाऊँ
पर,मन में राष्ट्रगान आयाजब तक जिन्दा डटे रहो
दिल से यह फरमान आयासब धर्मों के भेद भुला
एक राष्ट्र आह्वान आयामन से मन और दिल से दिल
मिलवाने का अभियान आयासीधे-सादे जज्बे में
देशभक्त का स्वाभिमान आयारोम-रोम के पुलकन में
देश का सम्मान आया
देश का सम्मान आयासुमन त्यागी 'आकाँक्षी'
मनियाँ ,धौलपुर (राज)

समीक्षा “खण्डहर में चांद” की अतृप्त-कलात्मक कविताएं

समीक्षक : डा रमेश सोबती (डी लिट) अंग्रेजी साहित्य के इतिहास के रोमांटिसिज्म, हिन्दी के छायावाद और अमेरिका के ट्रांसेंडेंटल रोमांटिसिज्म-आधुनिक कविता की केन्द्रीय दिशा और बोध को प्रभावशाली तौर पर व्याख्यायित करते हैं।वर्ड्सवर्थ ने पहले कविता को “भावों के अतिरेक का उच्छलन” कहा फिर “एकाग्रता में संकलित विचार” को कविता कहा। आधुनिक युग में एलियट ने निर्वेयक्तिक्ता के सिद्धांत पर जोर देकर कविता को भावभूमि प्रदान की। अब प्रश्न यह उठता है कि कोई कविता क्यों लिखता है? कोई कहता है कि वह बिना लिखे रह नहीं सकता, अर्थात कविता की वेलासिटी यानी वेग लेखक के भीतर उसी विहीमेन्स यानी तीव्रता से कार्य करती है जितनी तीव्रता से उसमे अन्य प्राकृतिक आवेग उत्पन्न होते हैं। ऐसा भी कहा गया है कि कविता से बेहतर आत्मप्रकटीकरण का दूसरा कोई माध्यम है ही नहीं।कविता समाज को अच्छी सेहत देने और लोक कल्याण के लिए लिखी जाती है जैसे रामचरित मानस ( तुलसीदास), नीर भरी दु:ख की बदली (महादेवी), दु:ख ही जीवन की कथा रही (निराला), घनीभूत पीड़ा (प्रसाद), अथवा our sweetest songs are those that tell us of the saddest thoughts (शैली) …

सुशील यादव का व्यंग्य - बातों का आतंकवाद

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बातों का आतंकवाद ..... हमारे देश में टी वी युग के आरंभ से एक नए आतंकवाद का जन्म हो गया है, वो है ‘बातों का आतंकवाद’ ....। चैनल वाले बड़-बोलों का, पेनल बना के रोज-रोज नया तमाशा परोसने में लगे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में भड़काऊ वाद-विवाद आये दिन जनतांत्रिक देश में, तांत्रिक रूपी एंकर द्वारा चीख-चीख कर कहा जाता है कि ‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’......?ये कैसी जागृति का ढिंढोरा है ....?जो जनता के कान खाए जा रही है। शायद ही इतना विस्फोटक और विनाशकारी ‘वार्ता-बम’ किसी भी देश के, मीडिया-वालों के हाथ अब तक लग पाया हो जो अपने यहाँ रोज विस्फोटित होते रहता है। दुश्मनी भांजने में इन चेंल्बाजों का कोई सानी नहीं। सब एकतरफा एक सुर में हमला बोलते हैं। जिस किसी का ये गुणगान कर दें उन्हें देश की गद्दी पकड़ा के दम लेते हैं। एक बार हादी चढाने का तजुर्बा हो गया तो प्रयोग दुहराया जाने लगा। पर दिल्ली बिहार राज्य के मामले में,उनकी हांडी दुबारा चढाने की बस हसरत ही रह गई। उन्होंने अपनी तरफ से , भरपूर कोशिश की मगर जनता को बना-मना नहीं पाये। पुराने जमाने में , इस ‘बातूनी आतंकवाद’ का अंडर करंट, सामन…

महावीर सरन जैन का आलेख - सर्वधर्मसमभाव की स्वीकृति

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लोक सभा के चुनावों तथा उनके बाद के कालखण्ड में मोदी जी के भक्त और भाजपा के प्रवक्ता “सेकुलर” शब्द को गाली देते रहे तथा देश के कट्टरवादी विचारक “सेकुलर” को राजनैतिक पूर्वग्रह और विचारधाराओं की जकड़बंदी का कारण निरूपित करते रहे। आज भारत की लोक सभा के अन्दर मोदी जी का भाषण ने जैसे हवा का रुख बदल दिया। “कोई भी व्यक्ति भारत के संविधान से झेड़खानी की कल्पना नहीं कर सकता और अगर वह ऐसी कोशिश करेगा तो वह खुदकुशी होगी। - -”। जब मोदी जी बोल रहे थे तब उनकी बगल में बैठे भारत के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह की सूरत देखने लायक थी। मुझे जनवरी, 2001 में भारत के प्रख्यात विधिवेत्ता, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के तत्कालीन अध्यक्ष एवं गहन चिंतक तथा साहित्य मनीषी श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी जी के साथ “सेकुलर” शब्द के धर्मनिपेक्ष हिन्दी अनुवाद पर हुए वार्तालाप का स्मरण हो आया है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में 31 जनवरी, 2001 को आयोजित होने वाली “हिन्दी साहित्य उद्धरण कोश” विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करने के लिए सिंघवी जी पधारे थे। संगोष्ठी के बाद घर पर भोजन करने के दौरान श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी ने म…

गीता दुबे की कहानी - नंबर वन

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मैं अपनी जिंदगी से बिल्कुल संतुष्ट थी, कोई शिकायत नहीं थी मुझे जिंदगी से. विवाह के आठ वर्ष बाद ईश्वर ने हमें एक बेटा दिया था, हम दोनों ने उसे नाजों से पाल- पोसकर बड़ा किया, अच्छे स्कूल में पढ़ाया, पढ़ लिखकर वह ऑफिसर बन गया, हमने एक अच्छी लड़की देख उसका विवाह भी कर दिया, वह जल्दी ही दो बच्चों का पिता बन गया और मैं दादी माँ बन गई. हमारा भरा पूरा परिवार था, बेटे और बहू अपनी अपनी नौकरी में व्यस्त थे... वे जिंदगी की दौड़ में बहुत आगे निकल जाना चाहते थे... इसके लिए परिश्रम भी किया करते. इस बीच मेरे पति ने मेरा साथ छोड़ दिया ... मैं तो टूट ही गई... मैंने तो अपनी सबसे बड़ी ताकत को खो दिया था...लेकिन मैंने देखा बेटे- बहू में कोई खास परिवर्तन नहीं आया.. वे पहले की ही तरह व्यस्त रहते थे... हों भी क्यों न! उन्हें समय से पहले बहुत कुछ हासिल करना था. पति के चले जाने के बाद से मैं अक्सर बीमार रहने लगी, शुगर, ब्लड प्रेशर की शिकार तो पहले से ही थी अब कुछ ब्रीदिंग प्रॉब्लम भी रहने लगी, जोड़ो में दर्द जैसे सारी बीमारियों ने मुझे जकड़ लिया और मैं बिस्तर पर पड़ गई. मैं जानती थी कि बहू बेटे पर मैं एक बोझ बन गई हूँ ल…

दीपक आचार्य का आलेख - नहीं सहेगा हिन्दुस्थान, असहिष्णुता का यह बवाल

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सब तरह भारी हो हल्ला है असहिष्णुता का बोलबाला है जिस भारत ने दुनिया को संस्कार सिखाए, सभ्यता दी और इंसानियत का पैगाम दिया। उस भारत में असहिष्णुता की बात कहना भी बेमानी है। कोई इसे हल्के में ले या भारीपन से, यह सरासर भारतमाता का अपमान ही है। और हममें से ही कई लोग इस  अपमान के सहभागी होकर जाने क्या संदेश देना चाह रहे हैं। कहाँ है असहिष्णुता, कोई तो बताए। बार-बार चिल्लपों मचा रहे लोग और उनकी हाँ में हाँ करते हुए टर्र-टर्र करने वाले मेंढकों, रुदाली में रमे हुए रंगे सियारों को और इस नाउम्मीद भीड़ में अपना खान-पान व नाम तलाशने वाले लोमड़ों को देखिये। क्या से क्या करने लगे हैं, कुछ न कुछ बकवास करने लगे हैं। और जता यों रहे हैं जैसे कि भारत में असहिष्णुता का कोई बीज अचानक अंकुरित हो गया हो। पिछले काफी दिनों से असहिष्णुता का बवाल हर तरफ फन उठा रहा है। पढ़े-लिखे भी चिल्लाने लगे है और अनपढ़ भी। वज्रमूर्ख, आधे मूर्ख और जड़मूर्खों से लेकर होशियार और  डेढ़ होशियार सारे के सारे इन दिनों व्यस्त हो गए हैं। सभी को असहिष्णुता के नारे लगाने का  धंधा जो मिल गया है। नाम का नाम और बवाल का बवाल। सभी को …

संजय द्विवेदी का आलेख - इस असहिष्णु समय में आभासी सांप्रदायिकता को स्थापित करने में लगी शक्तियों के इरादों को समझें

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सड़क से लेकर संसद तक असहिष्णुता की चर्चा है। बढ़ती सांप्रदायिकता की चर्चा है। कलाकार, साहित्यकार सबका इस फिजां में दम घुट रहा है और वे दौड़-दौड़कर पुरस्कार लौटा रहे हैं। राष्ट्रपति से लेकर आमिर खान तक सब इस चिंता में शामिल हो चुके हैं। भारत की सूरत और शीरत क्या सच में ऐसी है, जैसी बतायी जा रही है या यह ‘आभासी सांप्रदायिकता’ को स्थापित करने के लिए गढ़ा जा रहा एक विचार है। आज के भारतीय संदर्भ में पाश्चात्य विचारक मिशेस फूको की यह बात मौजूं हो सकती है जो कहते हैं कि विमर्श एक हिंसा है जिसके द्वारा लोग अपनी बात सही सिद्ध करना चाहते हैं।  भारत जिसे हमारे ऋषियों, मुनियों, राजाओं, महान सुधारकों, नेताओं और इस देश की महान जनता ने बनाया है, सहिष्णुता और उदात्तता यहां की थाती है। अनेक संकटों में इस देश ने कभी अपने इस नैसर्गिक स्वभाव को नहीं छोड़ा। तमाम विदेशी हमलों, आक्रमणों, 1947 के रक्तरंजित विभाजन के बावजूद भी नहीं। यही हिंदु स्वभाव है, यही भारतीय होना है। यहां सत्ता में नहीं, समाज में वास्तविक शक्ति बसती है। सत्ता कोई भी हो, कैसी हो भी। समाज का मन निर्मल है। वह सबको साथ लेकर चल सकने की क्ष…

पाठकीय : पीयूष गुप्ता की हास्य-व्यंग्य कविता - नेता

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नेता
पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँमीठा-मीठा बोलकर
मैं जनता को बहलाता हूँ पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ करके वादे, लेकर कसमें
सबको विश्वास दिलाता हूँ
पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ जनता भोली बन जाती है
मैं कुर्सी पे जम जाता हूँ पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ जीत चुनाव में सबको
अपना रंग दिखलाता हूँ पाँच साल में एक बार
मैं धरती पर आ जाता हूँ          पीयूष गुप्तानाम-पीयूष गुप्ता
जन्म-22-9-2002
पिता-श्री अनूप गुप्ता
माता-श्रीमती नीलम गुप्ता
राज्य-उत्तर प्रदेश
हिन्दी साहित्य की प्रमुख विधाएं जैसे आलोचना, लेख, समीक्षा, कविता, गीत, गजल, कहानी, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं में स्फुट लेखन।
बड़े-बड़े लेखकों का आशीर्वाद प्राप्त

उमेश मौर्य का कविता पाठ - माझी मन घबराए...

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सागर यादव 'जख्मी ' की लघुकथा - फ़ोटो

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"फोटो"
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पहली कक्षा के बच्चोँ को पढ़ाने के बाद मैं ज्योँ ही दूसरी कक्षा मेँ
प्रवेश किया तो मेरी नजर एक सात वर्षीय लड़की पर जा टिकी | गोरा रंग,भूरे
बाल ,साधारण कपड़े |
"तुम्हारा नाम क्या है ?" मैने पूछा |
बालिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया ," अर्पिता मिश्रा |"तुम्हारा घर कहाँ है ?"
"बेदौली , मितावाँ ,जौनपुर |"
"तुम्हारे पिता क्या करते हैँ ?"
"ड्राईवर हैँ |"
"क्या आप मुझसे दोस्ती करेँगे ?" कहकर बालिका ने प्यार से मेरी तरफ अपने
नन्हेँ पंजे बढ़ा दिए |उसका भोलापन देखकर मैं भी अपने आपको रोक न पाया
|मैंने उसका हाथ अपने हाथ मेँ लेते हुए जवाब दिया ,"हाँ , अगर कभी न
टूटने वाली दोस्ती करोगी तो जरूर करूँगा |"
"मैं तो कभी नहीँ तोड़ूँगी ,जब तक ये जीवन रहेगा |छोटी मुँह बड़ी बात | उस
नन्ही सी बालिका की करुणा भरी बातेँ सुनकर मै चकित रह गया | कुछ दिन
पश्चात् हम दोनोँ की दोस्ती ऐसी रंग लायी कि पूरा स्कूल हमारी दोस्ती का
लोहा मानने लगा |इस घटना को लगभग एक वर्ष बीत गए |ग्रीष्मावकाश हुआ |न
चाहते हुए हम दोनोँ को एक दूसरे से अ…

प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - लक्ष्य

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कुछ दिन पहले मैं अपने चचेरे भाई से मिलने उनके घर गया था. भाभीजी यथासाध्य आवभगत कर मेरा कुशल-क्षेम पूछा फिर गृहकार्य निपटाने में व्यस्त हो गई. उनका छोटे- छोटे बच्चों से भरा-पुरा परिवार था. पूरा परिवार सभी तरह से सुखी और खुश था, सिवाय इस बात के कि उनके बच्चों में अच्छी बातें सीखने की ललक थोड़ा मंदा था. इस बात के लिए भाभीजी मेरे सामने भी बच्चों को डॉट-फटकार लगाई. यह सब देखकर मुझे भी थोड़ा चिंता हुआ,किंतु सबकुछ समझे बिना किसी से कुछ कहना उचित न समझा. शाम में भाई साहब घर आए. उनसे बातचीत होने लगी. बातचीत के दरम्यान वे बीच- बीच में बच्चों की लापरवाही पर उस पर चिल्लाए भी.किंतु बच्चों पर ज्यादा असर नहीं हुआ. फिर हमलोग खाना खाकर सो गये. मैं वहां पूरे एक दिन ठहरा. उपरोक्त घटना मानो उस परिवार के दिनचर्या का एक हिस्सा था. मैंने बच्चों को लाड़-प्यार किया और उसे समझने की कोशिश की. बच्चे जल्दी से घुलने-मिलने वालों में से नहीं थे.एक दब्बू था तो दूसरा मुँहफट. किंतु दोनों में एक बात में समानता थी. वह कि उनके मन में क्रोध,घृणा,प्रतिशोध और द्वेष की भावना प्रबल थी. निःसंदेह मन में ऐसी भावना रहने पर संयम और…

अनुज कटारा की कविता - मैं तेरा अपराधी

चित्र
मैं तेरा अपराधी
तू मेरा अपराधी
प्यार किया पर साथ नहीं कैसी ये विचित्र
कहानी
मैं तेरा.....
लबों के स्पर्श हुए,तन भी जाने क्यों मदमस्त हुए
मनों में टकराव हुआ और हो गयी बात
पुरानी
मैं तेरा....
याद किया जब मुझको , मैंने था साथ निभाया
प्यार किया जब तुझको, तूने क्यों बंधन छुटकाया
भूल गए वो वादे , और वो इरादे
जो बाँहों की उर्मियों में तूने थे साथ गुजारे
सावन की रातों की ,
तेरी उन बातों की , याद है
पुरानी
लेकिन मेरे जीवन की अब
यही एक कहानी
मैं तेरा....Name - Anuj Katara
College -Govt. College of engg. & technology, Bikaner
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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - खुद आगे आएँ अपनी पहचान बनाएँ

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वो जमाना चला गया जब इंसान की खूबियों और उपयोगिता का आकलन-मूल्यांकन और उपयोग करने के लिए समाज आगे आता था और सदाचारी, सत्यवादी, सज्जनों, सेवाभावियों तथा सिद्धान्तवादी लोगों को सामाजिक संरक्षण, प्रोत्साहन और हरसंभव मदद प्राप्त होती थी और वह भी पूरी उदारतापूर्वक। जो जिस योग्य होता था उसे उसी के अनुरूप काम मिलता और उसकी प्रतिभाओं के हिसाब से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी। वो जमाना सिद्धान्तों, संस्कारों और आदर्शों का हुआ करता था। आज पूंजीवाद और प्रोपेगण्डा का जमाना है, भौतिकता की चकाचौंध है इसलिए उन लोगों को आदर-सम्मान, मान-प्रतिष्ठा और यश प्राप्त है जिनके पास पैसा है अथवा पॉवर। दोनों के ही रास्ते परिग्रह और भोग-विलासिता के उन्मुक्त लक्ष्यों की ओर हैं जिनका न कोई ओर-छोर है, न मर्यादाएं। सब कुछ मनमर्जी और स्वेच्छाचारों पर निर्भर है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। समाज-जीवन का क्षेत्र कोई सा हो, कोई सा अँचल हो, वहाँ समाज की नज़र अच्छे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्तित्वों पर बनी रहती थी और उन्हें उनके योग्य कर्म, आदर और सम्मान दिलाने का काम समाज पूरा करता था। आज वे सारे मूल्य समाप्त होते …

कामिनी कामायनी का आलेख - ग्राम देवता

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मनुष्य और देवता में अन्योन्याश्रय संबंध रहा है । पहले देवता ने मनुष्य को बनाया ,फिर मनुष्य ने देवता को बनाया ,दूसरे शब्दों में अगर यूं कहे कि मनुष्य देवता के बिना जी नहीं सकता और देवता का अस्तित्व मनुष्य के बिना शून्य है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं मानी जाती  ।     हड़प्पा और मोहन जोदाड़ों की खुदाई इस विश्वास को काफी बल देती है कि   प्राचीन काल से उपासना की  परंपरा  चली आ रही है। ,जिस जिस चीज से लोग डरते थे उसको प्रसन्न करने के लिए उसकी  पूजा अर्चना शुरू कर देते थे  । पहले लोग प्रकृति की पूजा करते थे ,फिर अपने घरों में पूजा करने लगे जो कालांतर में एक गोत्र या कुल की पूजा कहलाती रही । इसी प्रकार  अपने वास स्थान या गांव की सुरक्षा के लिए ,दैविक या भौतिक या प्राकृतिक आपदा जैसे आग ,बाढ़ ,महामारी ,बाहरी आक्रमण आदि से दूर रखने के लिए गांव की सीमा पर ग्राम देवता या कुल देवता की स्थापना की गई ।,।   ऐसा पाया गया है कि  हिंदुस्तान के अधिकांश हिस्सों  में ग्राम देवता स्त्रियाँ होती हैं, जैसे सत्ती माई ,काली माई ,दुरगा माई ,चंडीमाई ,शीतला माई आदि;मगर कहीं कहीं पुरुष देवता भी होते हैं ,जैसे भैरो बाबा , ब…

रामवृक्ष सिंह का आलेख - हिन्दी : क्या आपको कठिन लगती है?

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भाषा-चिन्तनअपनी-अपनी आसानीडॉ. रामवृक्ष सिंहभारत सरकार की राजभाषा नीति सरकार के श्रेणी तीन और उससे ऊपर के कर्मचारियों पर लागू होती है। राजभाषा विषयक सांविधिक प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम, संकल्प और नियम तथा तत्पश्चात् राष्ट्रपति महोदय द्वारा जारी आदेशों का उल्लंघन करने पर दंड का विधान नहीं है। अलबत्ता बार-बार यह अवश्य कहा गया है कि राजभाषा नीति का अनुपालन प्रेरणा और प्रोत्साहन से होगा। जब प्रक्रियाएँ जटिल और दुरूह होती हैं तो प्रेरणा और प्रोत्साहन काम नहीं करते। अनुपालनकर्ता आसान रास्ते चुनने लगते हैं। जटिलता और दुरूहता वस्तु और प्रक्रिया-विशेष में भी हो सकती है और प्रयोक्ता के मन में भी। भारत सरकार की राजभाषा यानी हिन्दी के साथ भी यही सच है। विगत पैंसठ वर्षों में राजभाषा हिन्दी का जो रूप उभरकर सामने आया है उसका अपना वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्ट्य पर चर्चा करना यहाँ अभीष्ट नहीं। अभीष्ट है सरलता और दुरूहता की मीमांसा। हमने अभी-अभी कहा कि अनुपालनकर्ता आसान रास्ता चुनने लगते हैं। इसे एक दृष्टान्त से समझा जाए। यदि किसी चौराहे पर कोई गोल चक्कर बना हो और हमें वहाँ से यू-टर्न मारना हो तो हमारे लिए…

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