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प्रेमचन्दीय थीम पर पाद टिप्पण / आलेख / डॅा0 मनोज मोक्षेंद्र

वर्ष 2004 में 'हंसाक्षर ट्रस्ट' द्वारा कहानी विधा पर 'प्रेमचन्द कथा-सम्मान' के लिए वरिष्ठ कथाकार कमलेश्वर के सौजन्य से अखिल भारतीय स्तर पर एक कहानी प्रतियोगिता के आयोजन की घोषणा की गई थी। निःसंदेह, काफी संख्या में प्रविष्टियाँ आई होंगी और अच्छी कहानियाँ भी आई होंगी क्योंकि पुरस्कार राशि 51,000/- रुपए थी । इससे सर्वकालिक कथा-सम्राट प्रेमचन्द के चहेतों को अपार प्रसन्नता हुई थी। चूँकि यह प्रतियोगिता मुंशी प्रेमचन्द की स्मृति में घोषित की गई थी, इसलिए ज़्यादातर कथाकारों ने प्रेमचन्दीय ढर्रे पर, उनकी भाषा-शैली, उनके अनुरूप विषय और कथानक के अनुसार कहानियाँ लिखकर भेजी होंगी ताकि प्रेमचन्दीय परंपरा को तरोताज़ा बनाया जा सके। बहरहाल, आयोजकों को तत्काल अपनी गलती महसूस हुई कि यदि प्रेमचन्द्रीय परंपरा के अनुरूप किसी कहानी को सम्मानित किया जाता है तो उक्त परंपरा के पुनः लोकप्रिय होने की संभावना प्रबल हो जाएगी और ऐसी स्थिति में उनके द्वारा थोपे जा रहे कहानी सिद्धांतों को मात भी खानी पड़ सकती है। किंतु, प्रतिभागियों और प्रेमचन्द के प्रशंसकों को निराशा इस बात से हुई की उस प्रतियोगिता को यह कहते हुए ख़ारिज़ कर दिया गया था कि प्राप्त प्रविष्टियों में ऐसी कोई कहानी नहीं थी जो मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा कहानी-लेखन में छोड़े गए रिक्त स्थान को भर सके अर्थात प्रतियोगिता के लिए उन विषयों पर कहानियाँ नहीं मिलीं जिन प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखीं। आश्चर्य यह सोचकर होता है कि उक्त प्रतियोगिता की घोषणा करते समय इस शर्त का साफ-साफ उल्लेख क्यों नहीं किया गया था कि प्रेमचन्द ने जो रिक्त स्थान छोड़ रखे हैं, यह प्रतियोगिता उन्हीं की भरपाई के लिए आयोजित की जा रही है। चुनांचे, इस घटना ने एक अनसुलझाया सवाल खड़ा कर दिया कि आख़िर, वे कौन-से विषय हैं जिन पर प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखी और आयोजकों ने उन विषयों का उल्लेख क्यों नहीं किया? विषयों का उल्लेख किया जाना तो अत्यंत आवश्यक था क्योंकि इसके बिना तो किसी प्रतियोगिता की सार्थकता ही समाप्त हो जाती है। कोई बात नहीं, प्रतियोगिता को ख़ारिज़ करते समय ही उन विषयों का उल्लेख कर दिया जाता! पर, ऐसा नहीं किया गया और यह बात उन सभी हिंदी-प्रेमियों को और ख़ास तौर से उन्हें जो प्रेमचन्दीय साहित्य के गहन अनुशीलक-विश्लेषक रहे हैं, चुभ गई। ऐसा करके उन्होंने यह सोचने पर विवश कर दिया कि आख़िरकार, वे किन विषयों की ओर इशारा कर रहे हैं जिन पर प्रेमचन्द ने कहानियाँ नहीं लिखीं। आज स्त्री विमर्श और दलित आंदोलन को मुखर करने के लिए कुछ दिग्गज साहित्यकारों के बैनर के नीचे अनेक संपादक इन दोनों पक्षों पर विशेषांक निकालने पर तुले हुए हैं कि स्त्रियों की समस्याओं पर महिला लेखिकाएँ और दलितों के शोषण पर दलित लेखक ही अच्छी रचनाएं लिख सकते हैं। लिहाजा, स्त्रियों और दलितों की समस्याओं पर प्रेमचन्द ने इतने व्यापक रूप से लिखा है कि भावी लेखकों की पीढ़ियाँ प्रेरित होकर इन पक्षों पर बहुतायत से लिख रहे हैं। प्रेमचन्द की सर्वयुगीन प्रासंगिकता पर अंगुली उठाने से पहले यह अच्छी तरह सोच-समळा लेना चाहिए था कि जिस विचारधारा को उन्होंने हमारे राष्ट्रीय समाज में प्रवाहित किया है, वह आने वाली कई सदियों तक लेखकों को प्रेरित-अनुप्राणित करता रहेगा। वर्ष 2002 में 'प्रेमचन्द की परंपरा और अमरकांत' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार अमरकांत ने कहा था, "कथा साहित्य के सारे विवाद के बावज़ूद प्रेमचन्द न सिर्फ़ खड़े हैं बल्कि लोकप्रिय भी हैं। संवेदना के स्तर पर उन्होंने जिन मूल्यों को अभिव्यक्त किया, वे आज भी प्रासंगिक हैं और इसलिए प्रेमचन्द आज हमारे अत्यंत निकट हैं।" (हंस, अक्तूबर, 2002, पृ.81) दरअसल, प्रेमचन्द की प्रासंगिकता कभी ख़त्म नहीं होगी क्योंकि जब कोई शोषक वर्ग किसी निर्धन, निर्बल और उपेक्षित व्यक्ति का शोषण करेगा, प्रेमचन्द वहाँ खड़े नज़र आएंगे। न शोषक वर्ग समाप्त होगा, न प्रेमचन्द धूमिल पड़ेंगे।

लिहाजा, उक्त प्रतियोगिता के संदिग्ध उद्देश्य पर चिंता किया जाना लाज़मी है। क्योंकि बात प्रतिभागियों को निराश करने की नहीं है; बल्कि, इससे प्रेमचन्द्र के प्रशंसकों के दिल को ठेस पहुंची थी। बेशक! इस कृत्य में उन साहित्यिक ठेकेदारों का हाथ अवश्य रहा होगा जो येन-केन-प्रकारेण प्रेमचन्द्रीय साहित्य पर उंगलियाँ उठाते रहे हैं और उनकी कथा-परंपरा को समाप्त करने का ढिंढोरा पीटते हुए कहानी-विधा के लिए बेहद घातक--नई परंपराओं, नए 'वाद', विचारधारा और नए कथा-युग का सूत्रपात करना चाहते हैं जबकि ठोस तथ्य यह है कि मौज़ूदा कहानीकार कितना भी प्रयोगधर्मी हो, वह अनजाने में ही प्रेमचन्द्रीय कथा-परंपरा से जुड़ जाता है क्योंकि प्रेमचन्दीय कथा-परंपरा सर्वजनीन, सर्वकालिक और सार्वत्रिक आधार पर सर्व-सम्मत और सर्वसमर्थित है और इससे पृथक होने का अर्थ है मूल कथात्मकता की भावना की अनदेखी करना। प्रेमचन्द द्वारा कहानियों के लिए प्रयुक्त 'थीम' जहाँ उनके समकालीन समाज की यथावत प्रतिकृति थी, वहीं इसमें भावी जगत का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब भी साफ नज़र आता है। जो समस्याएं उन्होंने उद्घाटित की, उनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है क्योंकि मौज़ूदा कहानीकार उन्हीं की थीम पर कहानियाँ लिख रहा है; हाँ, उसकी प्रस्तुति का अंदाज़ अलग हो सकता है, कथानक बुनने की शैली ज़ुदा हो सकती है, देशकाल के निरूपण के संबंध में वह उतना दूरदर्शी और सार्वभौमिक नहीं हो सकता है... किंतु, वह प्रेमचन्द द्वारा स्थापित परंपराओं का अनजाने में ही उसी प्रकार कर्ज़दार हो जाता है जिस प्रकार मौज़ूदा नई कविता के रचनाकार निराला, मुक्तिबोध, अज्ञेय और धूमिल की प्रच्छाया से मुक्त नहीं हो पाते। विसंगतियों में सामंजस्य स्थापित करने, संप्रदायों और जातियों में तालमेल बैठाने, गाँव से शहर की दूरियाँ मिटाने, जनरेशन-गैप समाप्त करने, पहले-पहल दलित चेतना को मुखर करने, स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर चिंता जताने, दार्शनिक आधार पर जीव जगत की महत्ता को विशद रूप से रेखांकित करने और सामाजिक जीवन को वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा सत्यापित तथ्यों के आधार पर उन्नत सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने जैसी बातों में प्रेमचन्द सदैव हमारे मार्गदर्शक बने रहेंगे। यह तथ्य भी निर्विवाद है कि जीव जगत में सामाजिक दलन पर चिंता करते हुए वह मनुष्य ही नहीं, जानवरों और पशुओं के दलन पर भी अत्यंत भावुक हो उठते हैं और उनकी पीड़ाओं के संप्रेषण में सभी लेखकों और कवियों को बहुत पीछे छोड़ जाते हैं।

यद्यपि प्रेमचन्द स्वघोषित रूप से साम्यवादी सिद्धांतों के पोषक और उन्नायक रहे हैं तथापि इसका आशय यह नहीं लगाना चाहिए कि उन्होंने कृषकों, मज़दूरों और दलितों को ही शोषित वर्ग में शामिल किया है। इसके अलावा, उनका दलित चिंतन कही अधिक व्यापक और साधारणीकृत (generalised) और सर्वजनीन (universal) है। सामाजिक समतलीकरण के भावी दौर में जब सभी जातियाँ विलुप्त हो जाएंगी, लोगों में भेदभाव का आधार आर्थिक ही होगा और इस आर्थिक वैषम्य को प्रेमचन्द ने जितने व्यापक रूप से उजागर किया है, उतना किसी कहानीकार द्वारा अपने पूरे जीवनकाल में किया जाना दुष्कर लगता है। अस्तु, अधिकतर जातिविहीन समाज की अभिकल्पना करते हुए प्रथमतः वे मानते हैं कि समाज में ऐसे वर्गों की संख्या अधिक है, जो आर्थिक आधार पर दलित हैं, उपेक्षित हैं। उनके साहित्य में धनाढ्य वर्ग ही उच्च वर्ग के रूप में प्रभुत्त्व हासिल करता है तथा गरीब और विपन्न लोगों का दलन और शोषण करते हुए सामाजिक और राजनीतिक रूप से अभिभावी होता है। आज सत्तासीनों में उनका ही बहुमत बढ़ता जा रहा है जो विगत में महाजनी प्रथा और सामंती संस्कृति के उन्नायक थे तथा समाज में उनकी संख्या 3-4 फीसदी होते हुए भी समाज में उपलब्ध कुल सुविधाओं का लगभग 95% का उपभोग करते थे। बहरहाल, प्रेमचन्द, जातीय आधार पर दलितों के प्रति चिंता जताने के साथ-साथ, युवा और अर्थक्षम सदस्यों द्वारा मध्यम और उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों में स्त्रियों और वृद्धों के प्रति उपेक्षात्मक और शोषणात्मक रवैया अपनाए जाने पर बड़े व्यग्र नज़र आते हैं। बेशक जनरेशन गैप के कारण वृद्धों के लिए उत्पन्न कष्टकर अमानवीय स्थितियों का उल्लेख (बूढ़ी काकी) करने में भी वे बाजी मार जाते हैं। यह थीम मौज़ूदा कथाकारों में भी पूरी अभिव्यंजकता से विद्यमान है। जिन किसानों के प्रति वे आत्मीय और सहिष्णु रहे हैं, उनकी समस्याएं आज और भी विकट रूप से असमाधेय हो गई हैं। उनमें हाल ही में आत्महत्यात्मक प्रवृत्तियों का विकराल रूप लेना अनियंत्रणीय होता जा रहा है क्योंकि मौज़ूदा राजनीतिक व्यवस्था भी निरंतर उनके हितों की उपेक्षा करती जा रही है। प्रेमचंदीय काल में जो शोषक वर्ग, उच्च सामाजिक वर्ग से संबद्ध थे, वे आज राजनीतिक बल-प्रतिष्ठा प्राप्त कर उनका शोषण करने के लिए और अधिक पैने होते जा रहे हैं। निःसंदेह, तत्कालीन जमींदार, सेठ और महाजन न केवल किसानों और मजदूरों को ही अपने शोषण-चक्र का ग्रास बनाते थे अपितु निर्धन परिवारों में केंद्रीकृत आर्थिक ढाँचे के चलते जिस पर उन्हीं की पकड़ रहती थी, स्त्रियों, वृद्धों, बीमारों और बच्चों को भी इस कुचक्र का शिकार बनाते थे। प्रेमचन्दीय साहित्य में इस पूरे विषय पर समग्रतावादी रूप से चर्चा की गई है। बेशक! यह थीम वर्तमान कहानीकारों के लिए कोई नया नहीं है। हाँ, जहाँ प्रेमचन्द की कहानियों में शोषक और शोषित के बीच समझौतावादी नज़रिया अपनाया गया है, वहीं वर्तमान कहानीकारों और विशेषतया दलित कहानीकारों की कहानियों में शोषकों के प्रति शोषितों का विद्रोहात्मक स्वर अत्यंत प्रबल है। वे उनसे सामंजस्य स्थापित करने की बात सोच तक नहीं सकते। मौज़ूदा कहानीकार उस आदर्शवाद को अस्वीकार कर रहे हैं जिसमें शोषक वर्ग अंततोगत्वा पर्याप्त रूप से विनम्र होकर शोषितों के साथ तालमेल बैठाते हुए उसे उन समस्त सामाजिक सुविधाओं का हक़दार मानने लगता है, जिनका उपभोग वह स्वयं करता रहा है।

मौज़ूदा कहानियों में राजनीतिक कुचक्रों से उत्पन्न समाज में अराजक दशाओं का विश्लेषण और विवेचन प्रमुखता से किया जा रहा है तथा कहानीकार परोक्षतः प्रत्यक्षतः राजनीति का मार्गदर्शक बनने की भूमिका निभाना चाह रहा है। प्रेमचंदीय साहित्य में भी साहित्य को मार्गदर्शक और गाइड बताया गया है जैसाकि प्रेमचंद स्वयं स्वीकारते हैं, "साहित्य, राजनीति के पीछे चलने वाली चीज नहीं है, उसके आगे-आगे चलने वाली एडवांस गार्ड है। वह उस विद्रोह का नाम है जो मनुष्य के हृदय में अन्याय, अनीति और कुरुचि से उत्पन्न होता है।" साहित्य की इस भूमिका से कौन साहित्यकार अवगत नहीं है? तभी तो वह सामाजिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलावों के साथ-साथ राजनीतिक हथकंडों को आड़े हाथ लेने से बाज नहीं आता है। अपनी कहानी 'आहुति' (1930) में, प्रेमचन्द कहानी की नायिका रूपमणि की ज़ुबान से कहलवाते हैं, "साहित्य, देशभक्त और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है" और उक्त सच्चाई यह है कि राजनीतिक व्यवस्था को लोककल्याणकारी होना चाहिए जो नहीं है। इसका सैद्धांतिक परीक्षण प्रेमचन्द कर रहे थे जबकि राजनीति के मुखर व्यावहारिक स्वरूप को आज के कथाकार भोग रहे हैं। चूंकि राजनीति जनहितकारी नहीं है, इसलिए दोनों यानी प्रेमचन्द और वर्तमान लेखकगण राजनीतिक कुचक्रों की बखिया उधेड़ना अपना पुनीत कर्त्तव्य मानते हैं। किंतु, ख़ेद इस बात का है कि जहां प्रेमचन्दीय साहित्य में उच्चवर्ग आख़िरकार सहृदय हो जाता रहा है, यह राजनीतिक व्यवस्था न तो उनके समय में, न ही इस समय जनकल्याणकारी और सहृदय है। यद्यपि वे भिन्न होते हुए भी काफी हद तक गाँधीवादी सिद्धांतों में विश्वास रखते थे, तथापि वे उन सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से न अपनाए जाने पर चिंतित रहे हैं। किंतु, उन्हें इस बात पर पूरा यक़ीन था कि एक-न-एक दिन, जनता की शक्ति इस कुटिल राजनीति को अपने अनुकूल बना देगी। उनका कहना है, "हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त कराना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है" और आज़ाद हिंदुस्तान का वह जुआ, जिसके बारे में प्रेमचन्द केवल कल्पना की थी, आज हमारे कुटिल राजनेताओं द्वारा खेला जा रहा है।

सांप्रदायिक सद्भाव के लिए उर्वर जमीन तैयार कर, उस पर सहिष्णुता, सामंजस्य और सहयोग की खेती करने की कोशिश ग़ुलाम हिंदुस्तान से लेकर आज तक बड़े नैष्ठिक रूप से, लेकिन विफलतापूर्वक की गई है। विफलता का यह दौर प्रेमचन्द के काफी पहले से शुरू होकर मौजूदा कथाकारों को लांघता हुआ असीम भविष्य तक चलता रहेगा। लेकिन, सांप्रदायिक सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश भी बरकार रहेगी। प्रेमचन्द ने 'कर्मभूमि' में आज़ादी की लड़ाई में मुस्लिमों के उल्लेखनीय योगदान को रेखांकित करते हुए सांप्रदायिक सौहार्द का जो बढ़िया मिसाल दिया है, उसका अक्स आज के कहानीकारों में भी कमोवेश मिलता है। किंतु, सांप्रदायिक सौहार्द एक ऐसी फसल है जिसे राजनीतिक कुचेष्टाओं की सर्द हवा ने बार-बार पाला मारकर नष्ट कर दिया। आज ख़ूंख़ार सांप्रदायिक दुराव के साथ-साथ जातीय भेदभाव भी अपने अनोखे रूप में घटित होता नज़र आ रहा है। एक ओर धार्मिक संकीर्णता से उत्पन्न अस्मिता की लड़ाई के लिए आतंकवाद का ख़ौफ़नाक़ चेहरा है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय जनसुविधाओं में, जिनमें राजनेताओं का दाँत गड़ा हुआ है, हिस्सेदारी के लिए सभी वर्गों के बीच छीना-झपटी का बौख़लाने वाला दृश्य है। जहाँ तक जनसुविधाओं में हिस्सेदारी का संबंध है, प्रेमचन्द सन 1927 से ही दलित चेतना की भभक को भाँपकर चौकन्ना हो गए थे जबकि डा0 अंबेडकर ने दलितों के हित में एक आंदोलन का विगुलनाद किया था। उस विगुलनाद की प्रतिध्वनि अछूतों के मंदिर में प्रवेश के मसले पर 'कर्मभूमि' में सुनाई देती है। तदनन्तर, उन्होंने 'ठाकुर का कुआं' और 'दूध का दाम' जैसी कहानियों में दलितों के प्रति किए जा रहे भेदभाव पर गंभीर चर्चा की।

बेशक! प्रेमचन्द जी ने ऐसा कोई रिक्त स्थान नहीं छोड़ा जिसे आसानी से भरा जा सके। सिर्फ़, 'गोदान' को ही अनुशीलन और शोध की परिधि में रखा जाए तो यह इकलौता उपन्यास ही सर्वकालिक समस्याओं के आईने के रूप में मानवीय जीवन को बहुआयामी रूप से बिंबित करता है। इसलिए, प्रेमचन्द जी के संबंध में यह कहना बेहद नामुनासिब होगा कि उनके द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थानों को भरने के लिए कथाकारों को आगे आना चाहिए या ऐसे कथाकारों की ज़रूरत है।

(समाप्त)

डा. मनोज मोक्षेंद्र,

सी-66, 'विद्या विहार',

नई पंचवटी, जी.टी. रोड,

ग़ाज़ियाबाद, उ0प्र0,

--

जीवन-चरित

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लिखता रहा हूँ।}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इन्कलाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6. 7-एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; अदमहा (नाटकों का संग्रह--ऑनलाइन गाथा, 2014); 8--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 9.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), शीघ्र प्रकाश्य

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि)

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

लोकप्रिय पत्रिका "वी-विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमिक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, शब्दव्यंजना, अनहदकृति, ब्लिट्ज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में कम से कम 2500 से अधिक बार प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में प्रथम श्रेणी के अधिकारी के पद पर कार्यरत

मोबाइल नं० 09910360249, 07827473040, 08802866625

इ-मेल पता: drmanojs5@gmail.com; wewitnesshindimag@gmail.com

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मनोज जी का यह बहुत ही सारगर्भित आलेख है.वास्तव में प्रेमचंद ने ऐसी कोई रिक्ति नहीं छोडी ,जिसे एक नए आन्दोलन का आधार बनाया जा सके .ण

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