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उपनाम की उत्पत्ति[2] / आलेख / कामिनी कामायनी

पहले जो हमने उपनामों पर दृष्टिपात किया है उसी क्रम को आगे बढ़ते हुए यहाँ देखा जा सकता है ।

अलवार – दक्षिण भारत की उपासक परंपरा से ज्ञात होता है किअति प्राचीन काल से उस प्रांत में हरी भक्ति का प्रचार था ।ये अलवार श्री वैष्णव संप्रदाय के शिक्षक माने जाते हैं ।

आंगिरस –यह आंगिरस परिवार की उपाधि है जिसे बहुत से आचार्यों ने ग्रहण किया है ।

गिरि- गिरि अथवा पर्वत हिन्दू धर्म में बड़े पवित्र माने गए हैं ।

दास –ऋग्वेद में दस्यु के सदृश दासों को भी देवों का शत्रु कहा गया है । मनुस्मृति के अनुसार सात प्रकार के दास होते थे ,युद्ध में बंदी बनाया हुआ ,जीविका के लिए स्वयं समर्पित ,अपने घर में दास से उत्पन्न ,क्रय किया हुआ ,दान में प्राप्त ,उत्तराधिकार में प्राप्त ,और विधि से दंडित ।

दीक्षित –यज्ञानुष्ठान की दीक्षा लेने वाला ।

पंडित- यह एक विरुद है । पंडित का प्रयोग सर्व प्रथम उपनिषदों में हुआ है । यह विरुद ब्रांहनों और अन्य वर्गों के विद्वानों के नाम के पूर्व लगाने की प्रथा थी ।

पुरी- आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित दस नामी सन्यासियों की एक शाखा ।कुछ विद्वानों के विचार से ईश्वरपुरी जैसे वैष्णव संतों द्वारा जगन्नाथपुरी में अधिकांश भजन साधन किया गया था ,इसलिए उनका उपनाम पुरी प्रसिद्ध हो गया ।

पुरोहित –पुरोहित को पुरोधा भी कहते हैं । इसका प्रथम कार्य किसी राजा या सम्पन्न परिवार का यज्ञ या धार्मिक कार्य सम्पन्न करना होता था ।

गोस्वामी – एक धार्मिक व्यक्ति ,जिसने अपनी इंद्रिय पर विजय प्राप्त कर ली हो ,वही वास्तव में गोस्वामी है । गौण रूप से गोस्वामी{गोसाईं} उन गृहस्थों को भी कहते हैं ,जो पुनः विवाह कर लेने वाले विरक्त साधू संतों के वंशज हैं ।

वैसे तो प्राचीन धर्म ग्रन्थों के अनुसार सभी ब्रामहन शर्मा{शर्मन्ह} कहलाते हैं  मगर उनके उपनाम समय और काल के अनुसार बदलते रहे ।

बंगाल के ब्रांहनों के उपनाम वंश या गोत्र पर होता था । लेकिन कुछ नाम आलंकारिक या उपाधि स्वरूप भी होता है ,जैसे चक्रवर्ती ,या भट्टाचार्य ।

उड़ीसा में बहुत से नाम काम और जाति सूचक है । आचार्य ,कर ,सबत ,पति ,मिश्र,मूँड, साहू ,द्विवेदी ,त्रिवेदी ,सारंगी ,रथ ,पंडा

सत्पथी ,बेहेरा,पाणिग्रही ,मुनि आदि ।

महाराष्ट्र में उपनाम की भरमार है और जरा जरा सा शब्दों के हेर फेर करने से पहचान ही बदल जाती है। वैसे वहाँ पर अत्री ,भारद्वाज ,गर्ग ,कश्यप ,कौंडिल,कौशिक ,जमदग्नि ,शांडिल्य,सावंक ,और वशिष्ठ ,इन 15 ऋषियों के वंशज का उपनाम भोले ,डांगे,करुलकर ,पिंपुटकर ,भटलेकर ,देवधेकर ,भड्साव्ले,तेरेदेसाई ,निंबार्क ,वीरकर ,घोंडसे ,जोशी ,जूनेकर ,मूले,पडवाले ,शितपऔर सोबलकर है । वहाँ भी बहुत से उपनाम उनके मूल निवास स्थान को दर्शाता है ।कर्म जो बाद मे पहचान बन गई जैसे माली का उपनाम –अम्बेकर ,अनालंग ,भुजबल ,बोरादे,चौधरी ,हज़ारे ,शिंदे ,लोखण्डे ,मूलेआदि ,यहाँ पर बहुत दुविधा दिखाई पड़ती है  यह अपने आप मे एक गहन शोध का सुंदर विषय हैक्योंकि कुछ जातियाँ देशस्थ हैं ,कुछ बाहर से भी आए हैं ।

बहुत से उपनाम सुनकर ही पता चल जाता है कि वे देश के किस हिस्से का प्रतिनिधित्व करतेहैं ।

जैसे ,लूथरा ,बत्रा ,खत्री ,सूद ,जिंदल ,कपूर ,सचदेव ,चड्ढा ,जौहर ,मल्होत्रा आदि पंजाब के कहलाते हैं ।

मलिक,दहिया ,देशवाल ,शौकीन ,बलहारा दवास ,खर्ब आदि हरियाणा के होते हैं ।

   पाठक ,झा ,सिन्हा ,शाही ,पासवान ,आदि बिहार के होते हैं ।एक जगह मैंने देखा कि पासबान का अर्थ चौकीदारी या रखवाली करने वाला होता है ।

सिंह ,शर्मा ,चौधरी कहीं के भी हो सकते हैं ।

        असम में बरुआ ,चौधरी ,दत्ता ।लोग गोत्र को भी अपना उपनाम बनाते हैं ।अहोम समुदाय के लोग प्राचीन काल के अहोम राजाओं द्वारा दी गई उपाधिओं को भी अपना उपनाम बनाते रहे हैं ,जैसे सैकिया सौ सिपाहियों का कमांडर होता था ,इसी प्रकार एक  हजार से ऊपर सैनिक का कमांडर  हजारिका होता था ।

इसी तरह मंडल शब्द की उत्पत्ति मोरोल से हुई है जिसको गाँव का प्रमुख कहा जाता था । मंडल का संबंध अफ्रीका के मंडेला से भी बताया जाता है ।

पेशे ,उपाधियाँ ,मूल स्थान आदि शब्द उपनाम मे प्रायः देश के हर भाग में जुड़ गया था ।

गोष्टीपति जो एक पद था ,बाद में घोसाल बना । घोस्ठो – घोस- गोप –सदगोप-यादव ये सभी ग्वाले का काम करते थे ।

मुखोती ,संस्कृत में मुखोपध्याय बना जो अंगरेजी में मुखर्जी हुआ । गांगल जो संस्कृत में गंगोपाध्याय ,अंगरेजी में गांगुली कहलाने लगा ।

बंदो घाटी के निवासी बरुज्जीए ,जो संस्कृत में बंदोपाध्याय और अंगरेजी में बनर्जी हो गए ।

बागची – बागचा गाँव के निवासी हुए ।

भादुर गाँव वाले भादुडी ,लोहोरी गाँव के निवासी लाहीड़ी,और मोहित गाँव वाले मोईत्रा।

सन्याल -सेन लाल गाँव के निवासी कहलाए ।

कश्मीरी उपनाम  ,आग़ा ,दफ्तरी ,काज़ी ,दरबारी ,दुर्रानी ,वज़ीर ,जुत्सी,सोपौरी,राज़दान टिकु,,जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों में प्रचलित है।

        राणा ,पटेल ,श्रौफ ,सोनी ,मेहता ,जानी ,मोदी ,देसाई ,पारेख ,मिस्त्री ,भंसाली गुजरात के ।वहाँ भी बहुत से व्यापारिक समुदायों का उपनाम उनके व्यवसाय पर आधारित है ।

   देशपांडे ,कुलकर्णी ,वानखेड़ ,कदम ,पाटिल आदि से महाराष्ट्र का आभास होता है । कहा जाता है कि मराठियों का अंत का नाम और मूल ऐसा दस्तावेज़ है जो सौ वर्ष से पुराना इतिहास की दास्तान कहती है ।

कोंकणी नाम –माल्या ,केरकर आदि है ।कोंकण के अधिकांश उपनाम पुर्तगाली से आया है ।जैसे –फर्नांडीस ,पेरेरा ,शूजा,आदि ।

बहुत से रोमन कैथोलिक ब्रामहन जाति धर्मांतरण से पहले का अपना मौलिक उपनाम प्रयोग करते हैं जैसे –शेनोय ,नायक ,पाई ,शेट ,प्रभु ,भट आदि ।

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना मे रेड्डी ,राजू ,चौधरी ,कुमार ,बाबू ,आदि सामान्य है । जिन परिवारों का नाम पल्ले या पल्ली से समाप्त होता है , वहाँ पर सम्राट अशोक से पहले का जैन समय का द्योतक हैं ।

प्रेगाड़े {जैसे कन्नड में हेगड़े }का मतलब मंत्री या वैदिक कर्म पूरा करने वाला होता है ।

कर्नाटक में ,राव ,पाटिल ,गौड़ा ,अडिया शेट्टी जैसे उपनाम प्रचलित हैं ,वहीं केरल में मेनन ,नायर ,नाम्बियार ,कुरूप ,पणिकर,आदि हैं ।

  दक्षिण भारत में  लोग अपने पैतृक गौव या शहर का नाम जोड़ लेते हैं ,महिलाएं पिता का नाम ।

उधर नाम इस प्रकार से लिखा जाता है ,पिता का नाम +माता  का नाम + दिया हुआ नाम ,या गाँव का नाम +पिता का नाम +दिया हुआ नाम ।पहले तमिलनाडु में माता का नाम लिखना अनिवार्य नहीं था ,मगर अब यह अनिवार्य कर दिया गया है ।कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जातिवाद को दूर करने के लिए वहाँ के लोग उपनाम नहीं लगाते । खैर,ये सब  शोध का विषय है ,जिसका वर्णन  यहाँ पर उचित नहीं दिखता ।

कुछ उपनाम शिक्षा की उपाधि पर भी निर्भर करता है ,जैसे शास्त्री ,आचार्य , वेदालंकार आदि ।

कुछ सुल्तानों ,सम्राटों ने अपने को  कुछ अलग नाम से संबोधित करवाया ,जैसे प्रियदर्शी अशोक , शाहजहाँ ,आदि .।

मल्लिका ए तरन्नुम की उपाधि नूरजहाँ {गायिका} को किसी पत्रिका  वाले ने दे दिया था । रवीद्र नाथ को अंगरेजों ने टैगोर की उपाधि दे दी थी । मगर ये उपनाम नहीं है ,मात्र व्यक्ति विशेष का अलंकार है मगर टैगोर उनका पारिवारिक नाम बन गया है ।

   अपने साहित्यिक उपनाम को भी कभी कभी परिवार का उपनाम बना लिया जाता है ,जैसे हरिवंश राय  बच्चन ने किया ।

वस्तुतः नाम या उपनाम का अध्ययन करना  भारतीय इतिहास के महासमन्दर में गोता लगाना है । हर आदमी अपना अतीत जानना चाहता है ,और इससे बढ़ कर और कौन सा दस्तावेज़ हो सकता है भला ।तभी तो मौरिशश ,सूरी नाम ,फ़िजी आदि गए लोगों के संतति इसी उपनाम की पुंछ पकड़ कर अपने मूल तक पहुँचने में सफल हुए हैं ।

  कामिनी कामायनी ॥

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