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प्राची - नवंबर 2015 - बाबरनामा : सन् 935 हिजरी1 की घटनाएं / इतिहास / युगजीत नवलपुरी

बाबरनामा : सन् 935 हिजरी1 की घटनाएं

युगजीत नवलपुरी

कोई पहर दिन चढ़े166 अनवार से सवार हुए. तीसरे पहर चंदवार से कोस भर परे आबापुर गांव में उतरे. जुमरात की शाम को हसन चलबी के साथ अबदुल मलूक कूरची को शाह167 के पास और उजबेक एलचियों के साथ चापूक168 को उजबेक खानों-सुलतानों के पास एलची भेजा. चार घड़ी रात रहे कूच हुआ. दिन निकलने पर मैं नाव में जा बैठा. रापड़ी के सामने नाव से उतरकर इशा की बेर छावनी पहुंचा, जो फतहपुर169 में पड़ी थी. वहां दिन भर रहे. सनीचर के सबेरे वजू करके सवार हुए और रापड़ी के पास जमात की नमाज पढ़ी . मौलाना महमूद फराबी170 इमाम थे. सूरज निकलने पर रापड़ी की बड़ी बांक171 के नीचे जाकर नाव में बैठा. आज तरजुमा की मिलवां निखावट के लिए ग्यारह सतर का मिसतर172 बनाया. आज हजरत173 की कही बातों ने दिल की बड़ी मलामत की. जाकीन174 पहुंचकर नावें किनारे खींच लाए. रात उन्हीं में बिताई. नमाज के बाद मुंह-अंधेरे ही लंगर उठे. बख्शी सुलतान मुहम्मद ख्वाजा कलां के नौकर शमसुद-दीन मुहम्मद को लेर नाव में ही हाजिर हुआ. चिट्ठियों से काबुल का हाल जाना. मेंहदी ख्वाजा भी नाव में आया175. तीसरे पहर इटावा के सामने एक बाग में उतरा गया. जून (यमुना) में नहाकर नमाज पढ़ी. फिर बाग में नदी किनारे की एक ऊंचान पर छांह में बैठे और बहादुरों को दिन-बहलाव पर लगाया176. मेहदी ख्वाजा ने आश खिलाई. शाम को नदी पार की और इशा की बेर छावनी पहुंचे. वहां गोलबंदी के लिए और काबुल की चिट्ठियों के जवाब लिखने के लिए दो-तीन दिन रुका गया.

बुधवार सल्ख को इटावा से कूच हुआ और आठ कोस पर मूरी-व-अदूसा177 में डेरे हुए. जो चिट्ठियां रह गई थीं, यही लिखीं. हुमायूं को लिखा कि काम पूरा न हुआ हो तो धावेमारों और कज्जाकों को रोको. इसलिए कि सुलह की ठहर रही है. ऐसा न हो कि उसमें अड़ंगा पड़ जाए. फिर यह किः काबुल खालसा में है, बेटों में से कोई उसका लालच न करे. फिर यह कि हाल को बुला भेजा है. कामरान को लिखा कि शाहजादा178 से बरताव में पूरी सावधानी बरतना; कि तुझे मुलतान दिया है, कि काबुल खालसा में है. महल के लोगों179 के यहां आने की बात भी लिखी. ख्वाजा कलां को लिखा180 किः

‘‘सलाम के बाद पहली बात यह कि शमसुद-दीन मुहम्मद इटावा पहुंचा. काबुल का हाल जाना.

‘‘उधर जाने की मेरी चाह बेहद है. इधर का काम ठीक हो चला है. पूरा होते ही, इनशा-अल्ला, रवाना हो जाऊंगा. उधर के मजे कोई कैसे भूले? खासकर, तौबा के बाद? खरबूजों और अगूंरों के हलाल मजे की सुध दिल से कैसे जाए? इस बार सरदा आया था. खाने लगा तो बहुत रोया.

‘‘काबुल की ना-मरबूती181 का हाल पहले भी मिला था. जहां सात-आठ हाकिम हों, वहां मरबूती और मजबूती कहां से आए? इसीलिए...तैंने बड़ी बहन182 और बीवियों को बुला भेजा है, काबुल और आसपास के मुल्क खालसा में ले लिए हैं और ये बातें हुमायूं और कामरान को लिख भेजी हैं...अब मुल्क के बचाव और फूलने-फलने की कमी के लिए कोई बहाना न हो. अब अगर बचाव पक्का न हो, रैयत फूलती-फलती न हो, रसद पूरी न हो, खजाना भरा न हो तो यह इमदाद की183 ही ना-अहली184 होगी.

‘‘ये काम होने हैंः खजाना जमा करना...किले की मरम्मत...पूरी रसद जुटाना...आए-गए एलचियों के ठहरने और भत्ते का पूरा बंदोबस्त...शरई माल से185 जामा मस्जिद बनाना...कारवां-सराय और हम्मामों की मरम्मत...अर्क में उस्ताद हसन अली पकी-पकी ईंटों को जो इमारत बना रहा था, उसे पूरी कर देना; उस्ताद के हाथ का नक्शा हो तो उस्ताद सुलतान मुहम्मद ठीक उसी पर काम करें, नहीं तो कोई खूबसूरत और हमसर186 नक्शा ऐसा बना ले, जिसमें सहन दीवान के सहन से मिल जाए...खुर्द-काबुल187 दर्रे के मुंह पर बुत-खाक नदी को बांधना...गतघ्नी के बांधों की मरम्मत188...खयाबान बाग में एक पनचक्की के पानी का कोई झरना मोड़ लाना...ख्वाजा बस्ता की टेकरी पर तूतूम-दर्रे का पानी लाकर मैंने जहां तालाब बनवाया था और बिरवे लगवाए थे और जो जगह घाट और घाटी की खूबसूरती देखने के लिए बहुत अच्छी जगह होने से नजरगाह कहलाई, वहां अच्छे से अच्छे पेड़ लगाना, घास के मैदान सजाना और अच्छे-से-अच्छे रंगों और महकों वाले फूल-पत्तों की किनारियां लगवाना. फिर. तुम्हारी कुमक पर सैयद कासिम को लगाया है. तोपचियों और उस्ताद मुहम्मद अमीन जीबाची189 का पूरा ध्यान रखना190. फिर. चिट्ठी मिलते ही बड़ी बहन और महल के लोगों को नीलाब तक पहुंचा जाना. वह न भी चाहें तो भी...उन्हें लाने जो लशकर गया है, वह तंग जगह191 में कसाले उठा रहा है. दूसरे, उनकी वजह से मुल्क बरबाद हो रहा है192.

फिर. मैंने अबदुल्ला (असस) को लिखा है कि मेरे जी में बड़ी उलझन है. इसकी काट पछतावे की वादी में है. यह रुबाई कुछ-कुछ माना193 थी.

‘‘हाय, तौबा के मारे परेशान हूं!

क्या करूं क्या नहीं, सख्त हैरान हूं!

लोग पछता के करते हैं तौबा,

मगर मैं तो तौबा ही करके पशेमान हूं!’’

....एक दिन अली शेर बेग ने बनाई से कहा, ‘‘तू ऐसी लुभावनी ठिठोलियां करता है कि तुकमे न होते तो यह अचकन उतारकर तुझे दे देता; तुकमे ही माना है!’ बनाई बोला, ‘‘तुकमे माना नहीं मादगी194 माना है!’’ दरोग बगरदन रावी. मुझे माफ रखना. खुदा के वास्ते, बुरा न मानना. फिर. रुबाई पहले की है. यों, यह तो सच है कि जलसे की चाह बेहद रही है. कभी-कभी तो आंखें भर आती हैं. अल्लाह का शुक्र, इस साल वह बेचैनी नहीं. शायद, तरजुमे की बरकत195 हो. तू भी तौबा कर ले...अब पिया भी किसके साथ जाए? तेरे साथी शेर अहमद और हैदर कुली हों तो तौबा मुश्किल नहीं...सलाम करता हूं और तुझे देखने को तरसता हूं.’’

यह चिट्ठी दूसरी अमादी की पहली को लिखी. इन बातों के लिखने से जी भारी हो गया. चिट्ठियां देकर कहने की बातें शमसुद-दीन मुहम्मद को समझा दीं और उसे जाने की छुट्टी दे दी.

जुमा को आठ कोस चलकर जुमुंदना196 में उतरे. आज कीतीन-करा सुलतान197 का एक नौकर आया. वह सुलतान के एलची के पास सरहद198 के बेगों के रवैया और चोरी-डकैती की शिकायतों की चिट्ठी लाया था. एलची को छुट्टी दी गई और बेगों को हुकुम गया कि बरताव सुधारों और धावे-डाके बंद कराओ. इन हुकुमों के साथ उस आदमी को वहीं से छुट्टी दे दी. देर से पहुंचने के बारे में हसन चलबी ने जो सफाई दी थी, उसे मानते हुए एक चिट्ठी लिखकर उसी के आदमी के हाथ शाह के पास भेज दी.

सनीचर को आठ कोस चलकर कालपी के ककूरा-चचावली199 परगने में उतरे.

एतवार को नौ कोस चलकर कालपी के ही देरापुर परगने200 में उतरे. यहां मैंने सिर मुंड़ाया और संगर नदी में नहाया. दो महीने से सिर मुंड़ा न था.

सोमवार को चौदह कोस चलकर कालपी के ही छपरघट्टा 201 परगने में उतरे.

मंगलवार को कराची का आदमी आया. उससे पता चला कि माहेम चल पड़ी है. उसने लाहौर और बहीरा से बदरके202 मंगाए थे. इसके लिए उसने अपने हाथ से वैसे ही परवाने लिखे थे, जैसे पहले मैं लिखा करता था. परवाने पर काबुल पहली जमादी की सातवीं की तारीख है.

बुधवार को सात कोस चलकर आदमपुर203 परगने में उतरे. आज मैं पौ फटने के पहले ही निपट अकेला जून (यमुना) तक ओर वहां से किनारे-किनारे आदमपुर तक गया. वहां एक टापू पर शामियाना तनवाकर माजून खाई. कलाल कुश्ती की चुनौती देता आगरा आया था. उसे आज सादिक से लड़ाया. सादिक अच्छा लड़ा. चुटकी मारते कलाल को चित कर दिया. आगरा में कलाल ने कहा था कि सफर का थका हूं, बीस दिन दम लेने दिया जाए. पर अब चालीस-पचास दिन हो गए थे, उसे लड़ना ही पड़ा. सादिक को दस हजार तंके, जीनदार घोड़ा, सरापा204 और तुकमादार चपकन इनाम दिया गया. कलाल को भी कुढ़ने से बचाने के लिए तीन हजार तंके दिए गए. यहां अरबों और तोपों को नावों से उतारा. इसमें चार दिन लगे.

सोमवार बारहवीं को बारह कोस चलकर कोररा205 में उतरे. आज मैं तामदान पर चला.

(वहां से) बारह कोस चलकर कर्रा के कोरिया206 परगने में उतरना हुआ. वहां से आठ कोस चलकर फतहपुर-असवा207 में. वहां से आठ कोस परसराय-मुंडा208 में.

...आज इशा की बेर सुलतान जलालुद-दीन 209 ने अपने दो छोटे बेटों के साथ आकर नौकरी हासिल की. अगने दिन सनीचर सत्रहवीं को आठ कोस चलकर कर्रे के दुगदुगी परने में गंगा-किनारे उतरे. एतवार को वहीं मुहम्मद सुलतान मीरजा, नैखूब सुलतान और तरदी का आए. सोमवार को असकरी ने आकर नौकरी हासिल की. सब गंगा-पार से आए. असकरी को और उसके साथ के सभी लशकरों की हुकुम हुआ कि तुम लोग गंगा के उसी पार रहकर हमारे सामने-सामने चलो और सामने-सामने पड़ाव किया करो.

इस बीच यह बात बार-बार सुनने में आई कि सुलतान महमूद210 ने दस हजार पठान जुटा लिए हैं, उसने शैख बायजीद और बीबन को सरवार211 की ओर भेजा है, आप फतह खां सरवानी के साथ चुनार की ओर बढ़ रहा है ओर शेर खां सूर212 जिसे अभी पिछले ही सा मैंने कई परगने इनायत किए थे ओर

इधर का हाकिम बनाया था, इन पठानों से मिल गया है और उनकी ओर से कुछ सरदारों के साथ नदी से उतर आया है. यह भी सुना कि सुलतान जलालुद-दीन के लोग बनारस बचाने में चूककर हट गए हैं. उसका अपना कहना था कि बनारस किले में अपने सिपाही छोड़ आया हूं और आप सुलतान महमूद से लड़ने किनारे-किनारे बढ़ रहा है.

दुगदुगी से कूच करके छह कोस पर कुमार213 में उतरा गया. मैं नाव से गया. सुलतान जलालद-दीन की दावत की वजह से यहां तीन-चार दिन रुकना हुआ. जुमा को मैं कर्रा किले में सुलतान जलालुद दीन के घर उतरा. उसने आश और दूसरे खाने214 खिलाए. उसे और उसके बेटों को यकताई214 जामे और नीमचे पहनाए गए. उसकी अरदास पर उसके बड़े बेटे को सुलतान महमूद का खिताब दिया.216 वहां से मैं कोस भर चलकर गंगा किनारे उतरा.

यहां चिट्ठियां लिखकर माहेम के भेजे हुए शहरक बेग को लौटाया. मैं जो वाकये217 लिख रहा हूं, उनके लिए ख्वाजा यहिया के पोते ख्वाजा कलां कब से कह रहे थे. एक नकल मैंने तैयार की थी; वही शहरक के हाथ भेज दी218.

सनीचर को बड़े सबेरे कूच हुआ. मैं नाव से गया. चार कोस पर कोह219 में डेरे पड़े. पड़ाव पास ही पड़ा था, इसलिए पहुंचे कोई देर न लगी. कुछ देर बाद हम बजरे में बैठे और माजून खाई. नूर बेग220 की अवी से हजरत ख्वाजा अबदुश शहीद और मुल्ला अली खां221 के डेरे से मुल्ला महमूद222 को भी बुला लिया गया. कुछ देर बाद उस पार जाकर कुश्तियां कराईं. होता तो यह है कि दावेदार पहले मियांगीर से223 पकड़ करता है. पर मैंने दोस्त-यासीन खैर का मियांगीर पहलवान सादिक से लड़ने से मना कर दिया और कहा कि औरों से पकड़ें करो. वह आठ से लड़ा और अच्छा लड़ा. उसी दिन उस पार से सुलतान मुहम्मद बखशी आया. उसने बताया कि महमूद खां, जिसे सरकश लेाग सुलतान महमूद कहते थे, टूटकर बिखर गया. जासूस ने भी आकर यही बात बताई. यही बात ताज खां सारंगखानी की अरदास में लिखकर आई. बात यह थीः उसने चुनार को घेर लिया था. यों ही-सी लड़ाई हुई थी कि हमारी अवाई सुनकर उसके लोग बिखरकर भाग गए और वह बे-लशकर रह गया. जो पठान नदी पार करके बनारस की ओर बढ़े थे, वे भी उसी तरह तीन-तेरह हो गए. उसकी दो नावें डूब गईं. लोग भी बहुत डूबे.

एतवार को पौ फटते ही कूच हुआ. छह कोस चलकर पयाग224 के सीर-औलिया225 परगन में पहुंचे. मैं नाव से गया. ईसन-तैमूर सुलतान और तूखता-बूगा सुलतान अधबट में ही उतरकर मेरी बाट जोह रहे थे. मैंने उन्हें नाव में बुला लिया. तूखता बूगा सुलतान226 ने जादू किया होगा227 तभी तो अचानक बड़ी कड़वी हवा चलने लगी और पानी बरसने लगा. कल ही माजू खाई थी, पर इस हवा-पानी के मारे आज भी खानी पड़ी. यूर्त् में आकर...228

अगले दिन वहीं रहें. मंगल को कूच हुआ. छावनी के सामने एक टापू दियारे-सा था. बहुत बड़ा और हरियावल से भरपूर. मैं उस पार गया. पहर-भर में नाव पर लौट आया. लापरवाही से जर229 की सैर करता-करता एक दर के कगारे पर चढ़ गया था. कगार की अड़ार खिसकने लगी. मैं झट उछलकर साबुत किनारे पर आ गया. घोड़ा उड़कर नदी में गिरा. सवार होता तो मैं उसके साथ उड़ गया था.

उस दिन गंगा में तैरा. गिनकर तैंतीस हाथ मारे और पार हो गया. फिर दम लिए-बिना ही तैर कर लौट आया. और नदियां तैर चुका था, गंगा रह गई थी.230 शाम को संगम पर पहुंचे. पयाग (प्रयाग) की ओर नाव खिंचवाई. एक पहर चार घड़ी रात गए लशकर पहुंचे.

बुध को पहले पहर के बाद से लशकर जून (यमुना) पार करने लगा. नावें चार सौ बीस थीं. जुमा रजब की पहली231 को मैं आप पार गया. सोमवार चौथ को बिहार की ओर कूच हुआ. किनारे-किनारे पांच कोस जाकर लवाई232 में उतरे. मैं नाव से आया. तोपों के छकड़े पयाग (प्रयाग) से फिर नावों में लदवा दिए. इस पड़ाव पर कुशतियां कराई. दोस्त-यासीन मांझी पहलवान लाहौरी से भिड़ा. पकड़ बराबर की थी. बड़ी देर की गुत्थमगुत्थी के बाद दोस्त उस मांझी को पछाड़ सका. सरापा दोनों को दिया.

आगे तौंस नदी थी. सुना कि उसमें बजन और पांक बहुत है. घट परखने और राह ठीक करने में दो दिन लगे. ऊंटों और घोड़ों के लिए घाट और ऊपर मिला. पर लद्दू छकड़े उस घाट से भी निकल नहीं सकते थे. पेटी ऊबड़-खाबड़ और पथरीली थी. हुकुम दिया कि जैसे भी हो, निकालोे.

जुमरात को कूच हुआ. मैं तौंस-गंगा संगम तक नाव में गया. वहां किनारे आकर सवार हुआ. तीसरे पहर लशकर आया. आज छह कोस चलकर डेरे पड़े थे. अगले दिन उसी पड़ाव पर रहे. सनीचर को बारह कोस चलकर गंगा-किनारे नुलिबा233 में पड़ाव हुआ और (अगले दिन वहां से) दह कोस पर कीनतीत234 में. फिर नानापुर में235. यहीं चुनार से आकर आज खां सारंगखानी और उसके दो बेटों ने नौकरी हासिल की. उन्हीं दिनों बखशी सुलतान मुहम्मद की अरदास मिली कि महल के लोग काबुल से चल चुके हैं.

वहां से बुध को चले. मैं चुनार के किले की सैर करके छावनी गया, जो वहां से कोस भर आगे पड़ी थी. पयाग (प्रयाग) से चलती बेर मेरे बदन पर आबले236 निकले थे. इस पड़ाव पर एक यमी ने एक नया इलाज किया, जो हाल में ही रूम में ईजाद हुआ था. मिट्टी की छछिया में (काली) मिर्चें उबालकर भपारा लिया और भाप चुक जाने पर उसी के गरम पानी से फोड़ों को धोया. यह दो नजूमी साइत तक किया.

यहीं किसी ने बताया कि पास के आराल पर बाघ और गैंडे हैं. (दूसरे दिन) सबेरे ही जिरगे का हांका पड़ा. हाथी भी लाए गए. पर न बाघ मिला, न गैंडा. हां, एक अरना भैंसा निकला. आज आंधी आई. धूल-झक्कड़ ने बहुत सताया. मैं नाव से वापस छावनी गया, जो बनारस से दो कोस ऊपर थी.

चुनार में बनैले हाथी बहुत हैं. उनके शिकार की सोची थी. पर ताज खां पता लाया कि महमूद खां सोन किनारे पड़ा है. सलाह की. बे-थमे बगटुट धावे237 की ठहरी. नौ कोस पर बिलवा-घाट उतरे. सोमवार की रात को काबुल से आनेवालों के लिए भेंट-भत्ते और रिहाइश-भत्ते238 की हुंडियां इसी पड़ाव से ताहिर के हाथ भेज दीं. भिनसारे ही नाव से चलकर मैं कूई (गोमती) गंगा-संगम तक गया. संगम से कुछ दूर तक कूई (गोमती) में उजानी जाकर लौट आया. इसमें पाट तो कम है, पर घाट नहीं हैं. (पारसाल) हम कुछ नावों-जालों में और कुछ घोड़े तैराकर पार हुए थे.

पारसाल वाले पड़ाव की जगह कोस-भर नीचे थी. मैं उसकी सैर को गया.

हवा पीछे से आने लगी तो बड़ी सुक्कानी239 नाव छोटी बंगाली नाव से बांध दी, जिसके पाल खुलते ही दोनों भाग चलीं. दो घड़ी दिन रहे हम वहां240 पहुंचे थे. और इशा तक अपनी दावनी मदन-बनारस241 को लौट आए. साथ की नावें बहुत देर बाद आईं. चुनार से मैंने हर कूच की दूरी नापने का हुकुम दिया था. लुतफी बेग को पानी के रास्ते और मुगल बेग को सूखे के रास्ते नापने का. आज की दूरी सूखी ग्यारह कोस और नदी का अठारह कोस की रही. अगले दिन हम यहीं रहे. बुध को गाजीपुर से कोस-भर नीचे उतरे. मैं नाव से ही पहुंचा.

जुमरात को वहीं महमूद खां नूहानी242 ने नौकरी हासिल की. उसी दिन बिहार खां बिहारी के बेटे जलाल खां243 की, नसीर खां के बेटे फरीद खां244 की, शेर खां सूर की, अलावल खां सूर की और दूसरे पठान अमीरों की अरदासें आईं. आज ही लाहौर से अबदुल अजीज मीर-आखोर की अरदास आई, जो दूसरी जमादी की बीसवीं को चली थी. कराचा का हिन्दी नौकर, जिसे हमने कालपी से भेजा था, ठीक उसी दिन लाहौर पहुंचा था. अबदुल अजीज ने लिखा थाः मैं महलवालों की अगवानी में नीलाब तक गया. नवीं को उनसे मिला, चीनाब245 तक उनके साथ आया और उन्हें वहीं छोड़कर लाहौर चला आया, जहां से यह लिख रहा हूं.

जुमा को कूच हुआ. मैं नाव में ही रहा. चौसा के पास किनारे आकर पारसाल के पड़ाव की246 वह जगह देखी, जहां सूरज गहनाया था और रोजा रखा गया था. वापस नाव में गया, तब तक पीछे से मुहम्मद जमान मीरजा की नाव आ गई थी. वह भी साथ आ गया और उसके कहने से माजून खाई गई. लशकर करमनासा247 किनारे उतरा था. हिन्दु इस नदी के पानी से बहुत बचते हैं. उनका पक्का मानना है कि जिसे इसका पानी लग जाए, उसकी की-कराई सारी नेकी पर पानी फिर जाती है. इसीलिए यह नाम है248. मैं इसमें थोड़ी दूर उजानी गया. फिर नाव लौटाकर गंगा के उत्तरी किनारे पर लाई गई और वहीं बांध दी गई. वहां बहादुरों ने कुछ उछलकूद की. फिर कुशतियां हुईं. मुहसिन प्याला-बरदार ने डींग मारी थी कि मैं चार-पांच को पछाड़ दूंगा. पहली पकड़ में तो उसने एक गिरा दिया, पर दूसरे शादमान249 ने पकड़ते ही उसे पटक दिया. वह बहुत झेंपा. फिर पेशेवर पहलवान आए और बड़ी देर तक लड़ते दिखाते रहे.

सनीचर को पहले पहर कूच हुआ. मैं किनारे-किनारे कोस भर ऊपर तक गया, पर घाट अभी और ऊपर था, इसलिए नाव ली और उससे चौसा के नीचे पड़ाव तक आया. आज फिर भपारा लिया. पर आज भाप में गरमी या मिर्च कुछ बढ़ी-चढ़ी थी, सारा बदन लाल हो गया250. बहुत दर्द हुआ. एक दिन हम वहीं रुके. तब तक आगे एक छोटी-सी दलदली नदी251 के पार तक रास्ता ठीक किया जाता रहा. सोमवार की रात को अबदुल अजीज के हिन्दी पियादे की लाई चिट्टियों के जवाब लिखे और भेजे गए. सोमवार की सुबह को मैं नाव में आ गया. हवा के मारे नाव घसीटकर लाए. बक्सर के सामने मैंने नाव से उतरकर पारसाल के पड़ाववाली जगह की सैर की. यहां हम कई दिन रहे थे.252 तब हमने घाट पर चालीस-पचास पैड़ियां बनवाई थीं. अब ऊपर की दो को छोड़ सबको पानी ने तोड़ डाला था. नाव में लौटकर माजून खाई. फिर पड़ाव के ऊपर एक टापू पर नाव बंधवा दी और लड़ंतों का तमाशा देखते रहे. इशा की बेर चले. पारसाल हमने अबकी बारवाले पड़ाव की जगह की सैर की थी. मैं गंगा तैरकर पार गया था253, और लोग घोड़ों और ऊंटों से (तैरकर) गए थे. मैंने अफीम खाई थी.

मंगल को सबेरे करीम-बेरदी254, हैदर रकाबदार के बेटे मुहम्मद अली और बाबा शैख के साथ लगभग दो सौ बहादुरों को सुनगुन लेने के लिए आगे भेजा. इसी पड़ाव पर बंगाली एलची255 को हुकुम हुआ कि ये तीन बातें...256

मुहम्मद जमान मीरजा को बिहार लेने में कुछ आनाकानी थी. उसकी शिकायतों की जांच के लिए यूनुस अली भेजा गया था. वह बुध को आया. एक पिलपिला-सा जवाब लाया. उस दिन बिहार के शैखजादों257 की अरदासें आई. उनसे पता चला कि बैरी वह जगह छोड़ गए हैं.

जुमरात को कोई तुर्क और हिन्दी अमीरों के कोई दो हजार सिपाही और तरकशबंद मुहम्मद अली जंगजंग के बेटे तरदी मुहम्मद के साथ किए और उसे बिहार भेजा. उसके साथ बिहारियों को ढाढ़स और दिलासे की चिट्टियां भेजीं. उसके साथ ख्वाजा मुरशिद इराकी भी गया, जो बिहार कादीवान बनाया गया था. मुहम्मद जमान मीरजा पहले बिहार जाने की बात मान गया था. अब उसने शैख जैन और यूनुस अली को आगे करके कई नई ताबें उठाईं. कुमक भी मांगी. इस पर उसे कई बहादुर मदद को दिए और कई को उसी की नौकरी पर रख दिया.

सनीचर शाबान की पहली258 को हम तीन-चार दिन बाद वहां से चले. आज मैं बूजपूर259 और बिहिया260 की सैर करता लशकर आया. मुहम्मद अली के साथ जो लोग सुनगुन लेने गए थे, वे उस जगह गए, जहां सुलतान महमूद शायद दो हजार लोग साथ लिए बैठा था. उसे हमारे लोगों के आने की भनक मिल गई. उसने छावनी उठा ली. उसने दो हाथी मार दिए और कूच करके वहां से कहीं और की राह ली.261 उसने एक हाथी और कुछ बहादुर262 मानो सुनगुन लेने के लिए लागा छोड़े थे. हमारे लोगों के पाास आते ही वे भाग चले. हमारे कोई बीस आदमी लपके. उन हमारों ने उसके कुछ के घोड़े छीने, एक सिर काटा और कई अच्छे-अच्छों को पकड़ लाए.

अगले दिन चले. मैं नाव से चला. हमारे आज के पड़ाव से मुहम्मद जमान मीरजा ने नदी पार की263 उसका कोई भी अब

इधर न रहा. उसका काम बनाने और उसे रवाना करने के लिए हम दो-तीन दिन वहीं रहे. बुध चौथ को मुहम्मद जमान मीरजा को शाही सरापा, पेटी-तलवार, उसकी पेटी, तपचाक घोड़ा और चतर264 अता हुई और बिहार के मुल्क के लिए उसके घुटने टिकवाए गए.265 बिहार की जमा से सवा करोड़ खासे के लिए ठहराई गई. वहां की अर्थात खासे की दीवानी मुरशिद इराकी को दी.

जुमरात को चले. नावें रुकवा रखी थीं. मैंने पहुंचते ही कहा कि इनका बेड़ा266 बांधो. सब नावें वहां न थीं. पर जो थीं, वही मिलकर पाट से भी चौड़ी हो गईं. पर बेड़ा कुछ ही दूर चल सका. नदी कहीं पतली थी, कहीं चौड़ी, कहीं उथली, कहीं गहरी; कहीं ठहरी-ठहरी सी, कहीं तीर-धार बहावदार. एक घड़ियाल दिखाई पड़ा और उससे डरी एक मछली उछली. वह बेड़े में आ रही. उसे पकड़कर मेरे पास लाए. पड़ाव के पास पहुंचने पर नावों को नाम दिए. बाबरी267 राणा सांगा की लड़ाई के पहले आगरा में बनी थी. बड़ी268 थी. उसका नाम ‘आसाइश’269 रखा. एक नाव आराइश खां ने बनाकर इस यूरिश के पहले पेश की थी. मैंने इस पड़ाव से पहले एक दरजा270 उस पर लगवाया था. उसका नाम ‘आराइश’271 रखा. एक दालानदार नाव सुलतान जलालुद-दीन शरकी ने पेश की थी. अच्छी बड़ी थी. उसके दालान पर मैंने एक और दालान बनवाया था. उसका नाम ‘गुंजाइश’272 रख दिया. एक डोंगा चौकंदीदार273 था. लगभग हर काम और हर ‘आइश’274 पर भेजा जाता था. उसका नाम ‘फरमाइश’275 पड़ा. अगले दिन जुमा था. इसलिए आगे चलना न हुआ. मुहम्मद जमान मीजजा ने तैयारी पूरी कर ली थी. हमसे दो-एक कोस आगे उतरा था. आज विदाई लेने276 आया. आज बंगाल से दो जासूस लौटे. बताया कि मखदूम आलम के बंगालियों ने277 ‘कंदक’ पर चौबीस जगह नाके बनाए हैं और उनका बचाव पक्का कर रहे हैं. उन्होंने पठानों को अपने घरबार पार ले आने से रोेका है और उनके बाल-बच्चे हथिया लिए हैं. यह सब सुनकर अंदेशा हुआ कि सामना होगा. मुहम्मद जमान मीरजा को रोका और तीन-चार सौ लोग साथ करके शाह इसकंदर (सिकंदर) को बिहार भेजा.

सनीचर को दूदू बीबी और उसके और बिहार खां बिहारी278 के बेटे जलाल खां का आदमी आया. उन दोनों को तो बंगाली ने नजरबंद-सा279 कर रखा था. वे लड़-भिड़कर छूट आए थे, नदी280 पार करके बिहार पहुंचे थे और अब मेरे पास आ रहे थे. आज बंगाली एलची इसमाईल मीता को यह हुकुम हुआः उन तीन बातों281 के जवाब में बड़ी देर लगी, अब तुम लिखो. दोस्ती और मेल रखना हो और मन में आगा-पीछा न हो तो जवाब जल्द आ जाना चाहिए. रात को तरदी मुहम्मद जंगजंग का आदमी आया. उसने बताया कि बुधवार शाबान की पांचवीं का इधर से हमारे लोगों के पहुंचते ही उधर के फाटक से वहां का शिकदार निकल भागा.

एतवार को सवेरे कूच करके आरी282 के एक परगने में उतरे. पता चला कि खरीद283 का लशकर सरू-गंग संगम पर उस ओर सौ-डेढ़ सौ नावें लिए पड़ा है. यों हमारी राह छेंककर उसने बेअदबी की थी, पर बंगाली के साथ हमारा एक तरह का बनाव-’सा था. यों भी, एक से कामों पर निकले हों तो हमारी पहली कोशिश सुलह की ही रहती है. मीता को बुलाकर फिर वहीं तीन बातें कहीं, मुल्ला मजहब को उसके साथ लगा दिया और जाने की छुट्टी दे दी.

सोमवार को बंगाली एलची नौकरी हासिल करने आया तो उसे बता दिया गया कि तुम्हें तो छुट्टी मिल चुकी है और कहा गया किः ‘‘बैरी के पीछे हम इधर-उधर हर कहीं जायेंगे, तुम्हारे किसी मुल्क को कोई चोट न पहुंचेगी. तीन में से284 एक बात यह तो है ही कि जब तुम खरीद के लशकर को हमारी राह से हटवाकर खरीद भिजवाओगे तो उसके साथ हमारे कुछ तुर्क भी उसे पहुंचाने और खरीद के लोगों को दिलासा देने जाएंगे. न मानने, घाट न छोड़ने और बेहूदा बातें बंद करने पर जो बुराई उसे पहुंचेगी, वह मालूम हो जाएगी, अपने किए का जो फल उसे भुगतना होगा, उसके लिए कोई जवाबदेही हमारी न होगी.’’

बुध को बंगाली एलची को मामूली खिलअत और इनाम देकर छुट्टी दे दी गई. जुमरात को दम-दिलासे के फरमान के साथ शैख जमाली को दूदू और उसके बेटे जलाल खां के पास भेजा गया. आज माहेम का एक नौकर आया, जो बाग सफा के उधर ही ‘वाली’285 से विदा हुआ था. सनीचर को इराकी एलची मुराद कंजर286 मिला. एतवार को मुल्ला मजहब को बहुत-सी यादगारें देकर छुट्टी दी गई. सोमवार को खलीफा कई बेगों के साथ घाट का पता लगाने गया. बुध के दिन खलीफा को फिर भेजा कि दोआबा देख आओ. उसी दिन आरी के पास नीलोफर287-जार की सैर को गया. शैख घूरन ने नीलोफर के नए बीज ला दिए. फूलों को हिन्दी कवल-ककरी288 और बीज को दूदा289 कहते हैं. अच्छा होता है. पिसते से बहुत मिलता-जुलता है. लोगों ने बताया कि सोन पास है. जाकर उसकी भी सैर की. जी बहुत बहला. नदी पार घने पेड़ दिखे. बताया गया कि वही मनेर है, जहां शैख शरफुद-दीन मनेरी290 के बाप शैख यहिया291 का मजार है. मैंने नदी पार की, दो-तीन कोस नीचे गया, मनेर के बागों को पार किया, मजार की जियारत की, फिर सोन-किनारे लौटा, नहाया, जुह्र गए. कुछ थक गए थे. उन्हें सुस्ताने, नहलाने और पानी पिलाकर धीरे-धीरे लाने के लिए कुछ लोगों को रास्ते में ही छोड़ दिया. यह न किया होता तो कई घोड़े बेकार हो जाते. मनेर से लौटती बेर कह दिया था कि सोन-किनारे छावनी तक घोड़े के डग गिने जाएं. तेइस हजार एक सौ हुए. यानी साढ़े ग्यारह कोस. मनेर से सोन तक इधर-उधर भी फिरे थे. यों मनेर से छावनी तक बारह कोस292 हुए. पंद्रह-सोलह कोस इधर-उधर भी फिरे थे. यों आज तीस कोस चले. रात के पहले पहर की छह घड़ी गए छावनी लौटे.

जुमरात को पौ फटते ही जौनपुर से सुलतान जुनैद बिरलास जौनपुरी बहादुरों के साथ आया. आने में देर करने का मैंने बुरा माना. मिला तक नहीं. काजी जीआ को बुलाकर मिल लिया. उस दिन गंगा पर करने पर सलाह हुई. ठहरी यह किः ‘‘गंगा-सरयू के बीच की ऊंचान पर उस्ताद अली कुली अपनी तोपें, फिरंगियां और जर्बजन जमा करे और बहुत से बंदूकची साह लेकर वहीं से गोले-गोलियां बरसाए. संगम293 से नीचे जहां सामने टापू पर बंगालियों का एक हाथी ओर बहुत-सी नावें हैं, वहां मुसतफा अपना तोपदस्ता और दूसरे सामान ठीक करके लड़े और उसके साथ भी बहुत से बंदूकची हों. मुम्मद जमान मीरजा और दूसरे लोग उसकी पीठ पर रहें. दोनों तोप-दस्तों के लिए मलजार बनाए जाएं. इसके लिए ठट्ठ-के-ठट्ठ बेलदार और कहार लगें और उनके ऊपर हवलदार तैनात रहें. मोरचे ठीक होते ही असकरी और दूसरे सुलतान, जो इस काम पर हैं, हलदीघाट294 से पार होकर बैरी पर टूट पड़े. सुलतान जुनैद और काजी जीआ ने बताया था कि आठ कोस ऊपर पैदल-घाट295 है. जर्दरुई296 कुछ जालाबानों और सुलतान, महमूद खां नूहानी और काजी जीआ के लोगों को लेकर वह घाट देख आए और मिल जाए तो वहीं से पार हो जाए, क्योंकि सुना जा रहा था कि बंगाली हल्दी-घाट पर आदमी तैनात करनेवाले हैं.’’

इतने में सिकंदरपुर के शिकदार महमूद खां की अरदास आई कि ‘हलदी-घाट पर मैंने पचास नावें जुटा ली हैं, मांझियों के पैसे भी दे दिए हैं, पर वे बंगालियों की अवाई से घबरा रहे हैं. अबेर हो रही थी297; मैंने घाट के खोजियों के लौटने की बाट न जोही. सनीचर को सलाह हुई. मैंने कहाः ‘‘सिकंदरपुर के चतुरमुक298 से बहराइच और अवध तक कोई घाट नहीं है. बड़ा लशकर हलदी से नावों पर पार हो ले. हम यहीं रहे. असकरी के आने तक गोले-गोलियां बरसाई जाती रहें. हम नदी299 उतर लें, उस्ताद अली कुली के लिए कुमक तैनात कर दें और फिर जो भी हो, हर हालत के लिए तैयार रहें. असकरी पास आ ले तो हम जहां हों वहीं से पार होकर टूट पड़ें. गंगा के उधर मुहम्मद जमान मीरजा और वे दूसरे लोग लड़ें, जो मुसतफा की मदद पर हैं.’’ यहीं ठहरी. गंगा के उत्तरवाले लशकर के चार हिस्से किए गए. असकरी को उन्हें लेकर हलदी-घाट से पार होना था. एक हिस्सा असकरी का अपना था; दूसरा जलालुद-दीन शरकी का; तीसरा कासिम हुसैन, बेखूब और ताड़ीतमीश उजबेक सुलतानों, गाजीपुर के महमूद खां नूहानी, बाबा कशका के बेटे फूकी, तूलमीश उजबेक, कुरबान चीरखी और हसन खां के दरियाखानियों का; और चौथा मूसा सुलतान300, सुलतान जुनैद और जौनपुरियों का, कोई बीस हजार लोगों का था. उसी रात लशकर के सवार होने की देखभाल करने के लिए हमालदार तैनात कर दिए गए.

एतवार को सबेरे से लश्कर गंगा पार होने लगा. मैं पहर दिन चढ़े नाव से गया. जर्दरुई और उसके साथी दोपहर को आए. पैदल-घाट तो उन्हें कहीं न मिला, पर वे राह में नावों के मिलने और लशकर के301 पास होने की खबर लाए.

मंगल को हमने गंगा-पार से कूच किया. कोस-भर पर उतरे. संगम पर लड़ाई का मैदान वहीं था. मैंने उसताद अली कुली की गोलाबारी का तमाशा देखा. आज उसने फिरंगी के गोले से दो नावें तोड़कर डुबो दीं. अपने जगह से मुसतफा ने भी यही किया. मैंने बड़ी तोप लगवाने के काम पर मुल्ला गुलाम को लगाया. उसे कुछ यसावुल और चुसत बहादुर भी दिए. मैंने आप छावनी को सामने वाले टापू पर गया. वहां माजून खाई गई. माजून की नापाकी302 उतरने के पहले ही मैंने नाव तंबू के पास करा ली और उसी में सो रहा. रात को एक अजीब बात हुई. तीसरे पहर गुल-गपाड़ा मचा. हर आदमी लकड़ियां लिए नाव से बाहर झांकता ‘मारो-मारो’ चिल्ला रहा था. मैं ‘आसाइश’ में सो रहा था. ‘फरमाइश’ पास में ही बंधी थी. बात यह हुई थी कि ‘फरमाइश’ पर जग रहे रात के एक पहरुए ने देखा कि कोई ‘आसाइश’ पर हाथ रखे उसमें चढ़ने की कोशिश कर रहा है. सब उस पर टूटे. उसने डुबकी लगाई और फिर उभरकर उस पहरुए के सिर पर तलवार मारी. पहरुआ थोड़ा घायल हुआ और वह आदमी तैरता हुआ मंझधार की ओर भाग गया. जिस रात मैं मनेर से लौटा था, उस रात भी कुछ पहरुओं ने नाव के पास से कई हिन्दियों को भगाया था और उनकी दो तलवारें और एक कटार छीन लाए थे. अल्लाह ने मुझे बचा लिया!

‘‘अगर तेरो-आलम बंजुबद जजाये नबुर्रद रगे ता नखाहथ खुदाये!303

(‘‘जग के सब खांड़े एक संग बजरें जितना चाहे पर बाल न बांका कर सकते304 जब तक न खुदा चाहे.’’)

बुध को पौ फटते ही मैं ‘गुंजाइश’ से तोप-मोरचे पर गया. हर आदमी को काम समझा दिया. कोई एक हजार लोगों के साथ ऊगान-बेरदी मुगल को भेजा था कि जैसे भी हो दो-तीन कोस ऊपर305 बैरी के पैदल बीस-तीस नावों से पार हुए. ऊगान-बेरदी उन पर टूट पड़ा. वे भागे. हमारे लोगों ने पीछा करके कितनों को तीरों से मारा, कितनों के सिर काट लिए और सात-आठ नावें छीन लीं. आज मुहम्मद जमान मीरजा की ओर भी कुछ नावों से बंगाली उतरे. मीरजा ने उन्हें भगा दिया और उनके लोगों समेत तीन नावें डुबा दीं. एक नाव छीनकर मेरे पास लाया. इस भिड़ंत में बाबा चेहरा ने अच्छा काम किया.

हुकुम हुआ कि रात के अंधेरे में उन छीनी नावों को उजानी घसीट लिया जाए और उनमें मुहम्मद सुलतान मीरजा, यक्का ख्वाजा, यूनुस अली, ऊगान-बेरदी और उनके साथ तैनात किए गए लोग पार हो जाएं.

आज असकरी का आदमी आया कि एक-एक ने नदी307 पार कर ली है और कल भोर होते ही हमला किया जाएगा. इसपर पार भेजे पर रहे लोगों से कहा गया कि तुम असकरी के साथ हो जाना और उसके साथ ही बैरी पर चढ़ना. दोपहर का ऊसता308 का आदमी आ गया कि ‘‘गोला तैयार है, अब क्या हुकुम है?’’ मैंने कहला भेजा कि ‘‘उसे तो छोड़ो, पर मेरे आने तक दूसरा तैयार रखो.’’ चौथे पहर में एक बंगाली डोंगे से उसके मोरचे पर309 गया. ऊसता से एक बड़ा और कई छोेटे फिरंगी गोले छोड़े. बंगाली आगबारी310 में नामी हैं. हमने उनका कमाल देख लिया. किसी निशाने पर नहीं, अंधाधुंध आगबारी करते हैं. वहीं हुकुम दिया गया कि कुछ नावें उजानी खींचकर बैरी के अगाये पर ले जाओ. कुछ लोग बे-बचाव ही उन्हें खींचते हुए बेतहाशा ले गए. ईसान-तैमूर सुलतान और तूखता-बूगा सुलतान का उन नावों के बचाव पर लाया. मैं जुमरात को पहर रात गए लशकर पहूंचा. आधी रात के आसपास उन नाव वालों ने कहला भेजा कि ‘‘तैनाती वाले कुकद आगे निकल गए, हम पीछे से नावें खींचे लिए जा रहे थे, इतने में बंगाली जान गए और हम पर टूट पड़े. एक मांझी की टांग में311 गोला लगा, टांग टूट गई. हम आगे न जा सके.’’

जुमरात को सबेरा होते ही पनाह की जगह वालों312 ने कहला भेजा कि ‘‘ऊपर से313 सारी नावें आ गईं. बैरी भी तैयार है.’’ इस पर हम झट सवार हुए और जहां नावें थीं, उसके ऊपर करारे पर आ गए. एक सवार मुहम्मद सुलतान मीजा और उसके साथियों के पास दौड़ाया कि झट पार हो लो और उसकरी के पास पहुंचो. ईसान-तैमूर सुलतान और तूखता-बूगा सुलतान को भी हुकुम हुआ कि पार होने लग पड़ो. बाबा सुलतान अपनी जगह पर न था.314

ईसान-तैमूर सुलतान तीस-चालीस आदमी एक नाव में लिए हुए उसी दम पर होता है. उसके आदमी अपने-अपने घोड़े की अयाले पकड़े नाव के साथ ही तैरा ले जाते हैं. दूसरी नाव भी पीछे-पीछे जाती है. बंगाली देख लेते हैं और उन पर अपने बहुत से पैदल दौड़ाते हैं. ईसान तैमूर सुलतान के सात-आठ सवार सटे-सटे बढ़कर उनका सामना करते हैं और तीर बरसाते हुए बैरी उन पैदलों को उधर साह लाते हैं जहां सुलतान अपने और आदमियों को सवार कर रहा है. तब तक दूसरी नाव भी आ चली है. ये तीस-पैंतीस सवार पैदलों पर पड़ते हैं और उन्हें नोंकदुम भगा देते हैं.

ईसान-तैमूर ने कमाल का काम किया. एक तो आप सबके आगे बेधड़क और बेहताशा पहुंचा और दूसरे थोड़े-से लोगों से इतनों को हराया. तूखता-बूगा सुलतान भी पार हुआ. फिर तो एक-पर-एक नाव पहुंचने लगी. लाहौरी और हिन्दुस्तानी अपनी-अपनी जगह से पार होने लगे. कोई तैरकर तो कोई नरसलों के गट्ठरों पर. यह सब देखकर बंगालियों की नावें नीचें की ओर भाग चलीं.

तब तक दरवेश मुहम्मद सारबार, दोस्त ईशिक-आगा, नूर बेग और कितने ही बहादुर पार हुए. मैंने एक सवार सुलतानों के पास दौड़ाया कि ‘‘जो भी पार हुए हों उन्हें बटोर कर अच्छी तरह पांतबंद कर लो और बैरी से सटे हुए उसके पहलू से फिरकर आगे से धर मारो.’’ सुलतानों ने तीन-चार टुकड़ियों में बंटकर बैरी पर चोट की. बैरी ने अपने पैदल आगे कर लिए. असकरी के पास कूकी आता है और उधर से ही भिड़ जाता है. इधर से सुलतान भिड़ते हैं. दोनों ओर से दोनों ही बैरी को मारते और गिराते चलते हैं. कूकी के लोग नामी हिन्दू बसंतराव को गिराते और उसका सिर काट लेते हैं. उसके दस-पंद्रह आदमी कूकी पर टूटते हैं. बात-की बात में उनके टुकड़े उड़ा दिए जाते हैं. तूख्त-बूगा सुलतान घोड़े को उड़ाता बैरी के अगाये में धंसता है और जमकर तलवार चलाता है. मुगल अबदुल वहाब और उसके छोटे भाई की तलवारें भी अच्छी मार करती हैं. मुगल तैरना क्या जाने! फिर भी वह घोड़े की अयाल पकड़े लड़ाई के कपड़े पहने ही तैर आया था.

पीछे से मैंने अपनी नावें भी मंगा लीं. ‘फरमाइश’ पहले आई. उसमें बैठकर मैं बंगाली के पड़ावों की जगहें देख आया. फिर ‘गुंजाइश’ में बैठकर चला. पूछा, ‘‘ऊपर कोई घाट है?’’ मीर मुहम्मद जालाबान ने अर्ज किया कि ‘सरु(सरयू) को और ऊपर से पार करना अच्छा है.’’315 यही किया गया. लोग316 उसकी बताई जगह से पार हुए.

मुहम्मद सुलतान मीरजा के लशकर के पार होते समय317 यक्का ख्वाजा की नाव डूब गई. वह आप भी अल्लाह का प्यारा हुआ. उसकी जागी और नौकर उसके छोटे भाई कासिम ख्वाजा को अता हुए. दोपहर को मैं नमाज के लिए नहा रहा था कि सुलतान आए. मैंने उन्हें बहुत सराहा, शुक्रिया अदा किया और इनाम-इकराम का वादा किया. असकरी भी आया. यह उसकी पहली लड़ाई थी. सगुन अच्छा रहा! छावनी अथी पर न हुई थी. मैं एक टापू के पास ‘गुंजाइश’ में सो रहा.

जुमा को हम सरु(सरयू) के उत्तर पार खरीद के नरहन परगने के कूनदीह318 गांव में उतरे.

एतवार को कूकी हालचाल का पता लाने के लिए हाजीपुर भेजा गया.

पिछले साल शाह मुम्मद319 को सारण दिया था. उसने कई बार बहुत अच्छा काम किया. दो बार अपने बाप मारूफ320 को हराया. सुलतान महमूद लोदी ने धोखे से बिहार हथिया लिया और उसके ऊपर बीबन और शेख बायजीद जा चढ़े तो लाचार होकर उसे उनका साथ देना पड़ा. उन दिनों लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें कहते थे और बे-पर की उड़ाते थे, पर उसकी अरदासें बराबर आती रहीं. जब असकरी हलदी-घाट से पार हुआ तो वह उसके पास चला आया और उसके साथ बंगालियों से लड़ने गया. अब इस पड़ाव पर आकर उसने नौकरी हासिल की.

उन दिनों बार-बार सुना गया कि बीबन और शैख बायजीद सरु (सरयू) पार करना चाहते हैं. इसी बीच एक ऐसी बात सुनी कि बड़ी हैरानी हुई. अली यूसुफ ने संभल का अच्छा बंदोबसत किया था. वहां उसका एक हबीब321 तबीब322 था. दोनों एक ही दिन अल्लाह के प्यारे हो गए. अबदुल्ला323 को संभल भेजा. जुमा रमजान की पांचवीं को उसे संभल की छुट्टी दी324.

उन्हीं दिनों चीर-तैमूर सुलतान की अरदास आई कि ‘‘महल के लोगों की अगवानी करने में लगे रहने से कई बेग मेरी कुमक पर पहुंच नहीं सके; मैं मुहम्मद और कुछ और बेगों-बहादुरों को लेकर सौ कोस गया; बलूचियों की अच्छी पिटाई की गई.’’ जवाब में अबदुल्ला के हाथ हुकुम भेजा गया कि ‘‘तुम, सुलतान मुहम्मद दूलदाई और मुहम्मदी उधर के और बेगों-बहादुरों के साथ आगरा में जुटो और वहां तैयार बैठे रहो. फिर जहां कहीं बैरी दिखाई पड़े, वहां जाना.’’

सोमवार आठवीं को दरिया खां का पोता जलाल खां, जिसके पास शैख जमाली गया था, अपने बड़े-बड़े अमीरों के साथ आया और नौकरी हासिल की. यहिया नूहानी भी आया. उसने अपने छोटे भाई को पहले ही भेजा था और ताबेदारी जताई थी. जवाब में उसे फरमान जा चुका था. सात-आठ हजार नूहानी जिस भरोसे पर मेरे पास आए थे उसे झुठलाना ठीक न था. मैंने बिहार में से एक करोड़ का मुल्क खालसा में रखकर पचास लाख का महमूद खां नूहानी को दिया और जो बच रहा, वह जलाल खां को दे दिया. उसने उसमें से एक करोड़ सालाना देने का वादा किया. मुहम्मद जमान मीरजा को जौनपुर दिया गया.

जुमरात की रात को खलीफा का नौकर गुलाम अली, जो मुंगेर के शहजादा325 के नौकर अबुल फतह के साथ उन तीन बातों को लेकर इसमाईल मीता के पहले ही गया था.326 अबुल फतह के ही साथ वापस आया. वह खलीफा के नाम शाहजादा और हुसैन खां लसकर327 वजीर की चिट्ठियां लाया. इन्होंने तीनों बातें मान ली थीं और नुसरत शाह की जवाबदेही आप ले ली थी. सुलह की बातें होने लगीं. हम तो सरकश पठानों को सर करने निकले थे. उनमें से कुछ तो अपनी-अपनी जान लेकर भाग गए थे, कुछ ताबेदारी मानकर हमारे नौकर हो गए थे, और जो थोड़े से रह गए थे, वे बंगाली के हाथ में और उसी की पनाह में थे. बरसात भी सिर पर आ गई थी. जवाब में हमने उन्हीं शर्तों पर सुलह की बात लिख भेजी.

सनीचर को इसमाईल जालवानी, अलाऊल खां नूहानी, औलिया खां इशराकी और पांच-छह अमीरों ने आकर नौकरी हासिल की. आज ईसान-तैमूर सुलतान और तूखता-बूगा सुलतान को तलवारें, कटारें, पेटियां, चार-चार चदरों के जीबें, माने पहनावे और तपचाक घोड़े इनाम दिए गए. नारनौल परगने से छत्तीस लाख के भत्ते पर ईसान-तैमूर सुलतान से और शमसाबाद से तीस लाख के भत्ते पर ईसान तैमूर सुलतान से और शमसाबाद से तीस लाख के भत्ते पर तूखता-बूगा सुलतान से घुटने भी टिकवाए गए.

बिहार और बंगाल की ओर से दिलजमई हो ली तो सोमवार को वहां से328 कूच हुआ. अब बीबन और शैख बायजीद को कुचलने पर कमर कसी गई. दो पड़ाव बाद बुधवार को सरु (सरयू) पार सिकंदरपुर के चौपारा-चतरमुक329 में उतरे. लशकर उसी दिन से नदी पार होने लगा.

बार-बार सुन रहे थे कि बैरी सरु (सरयू) और गोगर (घाघरा)330 पार करके लखनू331 ओर जा रहे हैं. आगे बढकर उनकी राह रोकने के लिए तुर्क और हिन्दी अमीरों में से सुलतान जलालुद-दीन शरकी, अली खां फरमूली, तरदीका, बयाना के निजाम खां, तूलमीश उजबेक, कुरबान चीरकी और (बहीरे के) हसन खां दरियाखानी को जुमरात की रात332 तरावीह पढ़कर उठे ही थे कि धुंधकार बादल उठे और पलक मारते में वह आंधी चली कि शायद की कोई तंबू खडा़ रह पया. मैं दीवान-तंबू में बैठा किताब लिखने में हाथ लगा रहा था. किताब के बाब334 और लिखने के पन्ने समेटूं-समेटूं तब तक पेशखाना335 समेत तंबू मेरे सिर पर आ रहा. ‘तूड् लूकों’336 की तो धज्जी-धज्जी उड़ गई. अल्लाह ने बाल-बाल बचाया. कहीं झपक तक न आई. किताब के हिस्से पानी में पड़ गए. बड़ी कोशिश के बाद उन्हें पानी से उबारा जा सका. सकरलात के जीलूचे337 में उन्हें लपेटकर गद्दी पर रखा और ऊपर से तह किए कंबलों के अंबार लगा दिए. दो घड़ी बाद आंधी थमी. तोशखाने का तंबू लगवाया, बत्ती जलवाई और बड़ी परेशानी उठाकर आग सुलगाई गई. पौ फटने तक किसी ने पलक न झपकाई. सब बैठे किताब के हिस्से और पन्ने सुखाते रहे.

जुमरात को सबेरे में नदी पार हुआ. जूमा को सिकंदरपुर और खरीद की सैर की. आज अबदुल्ला और बाकी338 की अरदासें आईं. लखनूर339 लेने का हाल लिखा था. सनीचर के दिन कूकी को कुमक लेकर बाकी के पास भेज दिया.

मेरे पहुंचने के पहले कोई काम अटक न जाए, इसलिए एतवार के दिन सुलतान जुनैद बिरलास, खलीफा के बेटे हसन, मुल्ला अपाक के लोगों और मोमिन आतका के छोटे-बड़े भाइयों को भी बाकी के पास जाने की छुट्टी दे दी. चौथे पहर मारूफ फरमूली के (बेटे) शाह हसन को खासा खिलअत और तपचाक घोड़ा देकर छुट्टी दी. पिछले साल की तरह इस बार भी उसे तरकशबंदों के भत्ते के लिए सारण और कूंदला की340 जमा से कुछ बंधान कर दी गई. आज ही इसमाईल जलवानी को भी सरवार से बहत्तर लाख का भत्ता और तपचाक देकर छुट्टी दी गई. ये हबबात ठहरा दी कि दोनों का एक-एक बेटा या भाई आगरा में मेरे पास रहे. ‘गुजाइश’, ‘आराइश’ और दो और नावों को बंगालियों के हवाले किया कि इन्हें तिरमुहानी341 के रासते गाजीपुर ले चलो. ‘आसाइश’ और ‘फइमाइश’ को लिशकर के साथ ऊपर लिए आने का हुकुम हुआ.

सोमवार को अवध की ओर कूच हुआ. दस कोस चलकर सरु (सरयू) किनारे फतहपुर342 के गांव कालरा में उतारा गया.

(स्थान-भ्रष्ट अनुच्छेद). वहां कई दिन बड़े चैन से बीते. बाग हैं, नहरें हैं, बड़ी अच्छी-अच्छी काट के मकान हैं, पेड़ हैं, सबसे बढ़कर अमराइयां हैं, रंग-बिरंगी चिड़ियां हैं-जी बहुत लगा. फिर गाजीपुर की ओर कूच का हुकुम हुआ. इसमाईल खां जलवानी और अलावल खां नूहानी ने अर्ज कराई कि वतन की सैर करके आगरा में हाजिर होने का हुकुम हो. हुकुम हुआ कि एक महीने में हुकुम होगा.343

जो लोग पहले ही चल निकले थे, वे राह भटक गए. फतहपुर344 की बड़ी झील345 पर जा पहुंचे. कुछ सवार उधर दौड़ाए कि पास वालों को पलट जाओ. कीचीक ख्वाजा को भेजा कि रात झील पर बिताओ और सबेरे सबको छावनी लाओ. हम आप लौ फटते ही चले. आधा रास्ता चलकर मैं ‘आसाइश’ में बैठा और उसे उजानी खिंचवाया.

कुछ और ऊपर खलीफा शाह मुहम्मद दीवना के बेटे को लाया. वह बाकी के पास से नखनूर का पक्का हाल लाया था. उन्होंने346 सनीचर तेरहवीं347 को हमला किया, पर लड़ाई के दौरान ही किले में पड़ी चैलियों के एक ढेर, पुआल की पूज और कांटों की बाड़ में आग लग गई. दीवारों के घेरे में ऐसा जान पड़ता था जैसे आवां हो348. दीवारों पर चलना मुहाल हो गया. किला हाथ से जाता रहा. हमारे लौटने की सुनकर बैरी डलमऊ की ओर भाग गया.

आज हम दस कोस चले. सगरी परगने में सरु (सरयू) के किनारे जलेसर349 नाम के गांव में उतरे. जानवर सुस्ताने के लिए बुध को वहीं रहे. किसी-किसी ने उड़ाई कि बीबन और बायजीद ने गंगा पार कर ली है और चुनार350 के रास्ते अपने सगों के पास351 जाने की धुन में हैं. इस पर सलाह की. ठहरी यह कि मुहम्मद जमान मीरजा और सुलतान जुनैद बिरलास, जिसे जौनपुर के बदले चुनार और कई परगने दिए गए थे, और महमूद खां नूहानी, काजी जीआ और ताज खां सरंगखानी चुनार में बैरी की राह छेंकें352.

जुमरात को सबेरे वहां से चले. ग्यारह कोस चलकर परसरु353 पार की और किनारे पर ही उतरे. सलाह के बाद इन लोगों को बीबन और बायजीद का पीछा करने के लिए डलमऊ की ओर भेजा गयाः ईसान-तैमूर सुलतान, मुहम्मद सुलतान मीरजा, तूख्ता-बूगा सुलतान, कासिम हुसैने सुलतान, बेखूब सुलतान, मुजफ्फर हुसैन सुलतान, कासिम ख्वाजा, जाफर ख्वाजा, और हिन्दी अमीरों में से कालपी का आलम खां, मलिक-दाद कररानी और राव सरवानी.

रात को मैं परसरु में नहाने गया. लोग पानी पर मशालें दिखा रहे थे. मछलियां मशालों के पास उतरा आती थीं. इस ढंग से बहुत मछली पकड़ी गई. मैंने भी पकड़ीं.

जुमा को उसी नदी से फूटी एक बहुत ही पतली धार के किनारे उतरे. लशकर के आने-जाने से धार गंदली होने का अंदेशा था. इसलिए मैंने उसे कुछ ऊपर ही बंधवाकर नहाने के लिए एक दह-दर-दह बनवा दिया. रात को वहीं रहे. सबेरे चले और तौंस 354 पार करके उसके किनारे उतरे. एतवार को भी उसी किनारे उतरे. सोमवार को भी. आज मतला उतना खुला तो न था, पर कुछ ने चांद देख लिया और इस बात की गवाही देकर काजी से ईद का फतवा355 ले लिया. मंगल को सबेरे ही ईद मनाकर सवार हुए और ग्यारह कोस चलकर कूई के किनारे माइंग356 से कोस-भर परे उतरे. दोपहर को माजून का गुनाह किया. माजून पर मैंने यह शे’र कहकर दावत भेजीः

‘‘शैख357 औ’ ख्वांद मीरो मुल्ला शहाब आओ तीनों कि दो कि एक जनाब!’’ दरवेश मुहम्मद,358 यूनस अली और अबदुल्ला359 भी थे. चौथे पहर पहलवानों की पकड़ें हुईं. बुध को वहीं रहे. चाश्त पर माजून खाई. आज ताज खां से चुनार खाली कराके360 मलिक शर्क लौटा. आज फिर पकड़ें हुईं. अवध का पहलवान पहले आया था. इस बीच एक और हिन्दी पहलवान आ गया था.

अवध वाले ने उसे पटक दिया. आज यहिया नूहानी को परसरु361 से पंद्रह लाख का भत्ता दिया और मान के पहनावे पहनाकर उसे छुट्टी दी. अगले दिन ग्यारह कोस चलकर गूई (गोमती) पार की और उसके किनारे उतरे. पता चला कि हमारे बेग और सुलतान डलमऊ पहुंच तो गए हैं, पर अभी (गंगा) पार नहीं हुए. जी बहुत कुढ़ा. हुकुम भेजा कि ‘‘इसी दम पार जाओ. बैरी का पीछा करो. जून (यमुना) भी पार कर लो. आलम खां को साथ ले लो. हाथ-पैर हिलाओ और बैरी को कनौठियां देने में देर मत करो.’’

वहां से दो पड़ाव बाद डलमऊ पहुंचे. पहुंचते ही गंगा पार की. जब तक लशकर पार हुआ, तब तक घाट के नीचे टापू में बैठकर माजुन खाई. आज अवध का लशकर लेकर बाकी ताशकंदी आया और नौकरी हासिल की. वहां से एक पड़ाव बाद अरिन्दे किनारे कूर्रा362 में उतरे. यह जगह डलमऊ से बाइस कोस ठहरी363.

जुमरात को मुंह-अंधेरे ही चलकर आदमपुर364 के सामने डेरे डाले. नावें जुटाने को कुद जालाबान पहले ही कालपी गए थे. कुछ नावें उसी रात आ गई. जून (यमुना) में एक पैदल-घाट भी मिल गया. पड़ाव की जगह धूल भरी थी. हम कई दिन रात तक रात-दिन बेले में ही रहे. बैरी का कोई हालीरोस का न मिला. इसलिए ऊरता365 के कुछ बहादुरों के साथ बाकी शकाबुल को बैरी का ठीक-ठीक पता लेने भेजा. अगले दिन चौथे पहर बाकी का एक नौकर आया. टोह मिल गई थी. बाकी ने करावुल को पीट लिया था. उसके एक बढ़े हुए आदमी मुबारक खां जलवानी समेत कई के सिर काट भेजे थे. एक आदमी जीता भी पकड़ भेजा था.

रात को जून (यमुना) चढ़ने लगी. जिस टापू में हम थे, वह भोर तक डूब गया. हम एक और बेले में चले गए. यह तीर की पहुंच भर और नीचे था.

सोमवार को ईलगार के लशकर से जलाल तशकंदी आया. शैख बायजीद और बीबन महोबा366 परगने में भाग गए थे.

बरसात आ गई थी. पांच-छह महीने से चढ़ाई ही चढ़ाई चल रही थी. जानवर थक गए थे. अमीरों-सुलतानों को कहला भेजा कि ताजा-दम कुमक आनेवाली है. उसके पहुंच लेने तक वहीं रुके रहो.

चौथे पहर बाकी और अवध के लशकर को छुट्टी दी गई. मूसा मारूफ फरमूली ने सरु (सरयू) पार करते समय नौकरी हासिल की थी. (आज) उसे अमरोहा की जमा से तीस लाख का भत्ता, सरापा और काठीदार घोड़ा अता करके छुट्टी दी.

तीन पहर एक घड़ी रात गए धावे के ढंग से367 आगरा चले. बलादर परगने में दुपहरा किया. यह परगना कालपी का है. वहीं घोड़ों को जई दी. शाम को चले. तेरह कोस चलकर तीसरे पहर कालपी के परगने सुगंधपुर में बहादुर खां सरवानी के मजार368 पर उतरे. थोड़ा सो लिया और सुबह की नमाज पढ़कर फिर लपके. सोेलह कोस चलकर दिन ढले इटावा पहुंचे. मेहदी ख्वाजा369 ने निकलकर अगवानी की. पहर रात गए वहां से चलकर राह में थोड़ा सोए, सोलह कोस चले, रापड़ी के फतहपुर में दुपहरा किया और नमाज पढ़कर फिर सवार हुए. सत्रह कोस चलकर दो पहर रात गए आगरा हश्त-बहिश्त बाग में उतरे370.

जुमा को सबेरे सुलतान मुहम्मद बखशी ने कई औरों को साथ लेकर नौकरी हासिल की. दोपहर को मैंने जून (यमुना) पार जाकर ख्वाजा अबदुल हक की नौकरी हासिल की. फिर किले जाकर बुआ-बेगमों से मिला.

बल्ख पालीजकरा371 को खरबूजे बोने का हुकुम दे गया था. उसने कुछ फल बचा रखे थे, पेश किए. हश्त-बहिश्त बाग में कुछ बूटे झाड़ी-अंगूर 372 के लगाए थे. बड़े अच्छे-गुच्छे लगे थे. शैख घूरन ने टोकरा भर अंगूर भेजे. बुरे न थे. हिन्दुस्तान में ऐसे अंगूर-खरबूजे लगते देखकर तबीयत खिल उठी.

आधी रात को माहेम आई373. अजीब बात हुई कि जहल जमादी की दसवीं को वह काबुल से चली थी और उसी दिन मैं यहां से सवार होकर लशकर के साथ हुआ था.

(ग्यारह दिन का अंतराल)

जुमरात जुलकदा की परेवा का मैं बड़े दीवान में बैठा. हुमायूं और माहेम की पेशकशें सजाकर रखी गईं.

आज डेढ़ सौ कहारों को मजूरी देकर उन्हें फगफूर दीवान के एक नौकर के साथ खरबूजे, अंगूर और दूसरे फल लाने काबुल भेजा गया.

हिन्दु बेग374 काबुल से महल के साथ आया था. पर अली यूसूफ के मरने से उसे संभल भेज दिया गया था. उसने आज (वहां से) आकर नौकरी हासिल की. आज ही खलीफा के (बेटे) हिसामुद्दीन ने अलवर से आकर नौकरी हासिल की. एतवार को सबेरे अबदुल्ला आया.375 अली यूसूफ के मरने पर उसे तिरमुहानी से संभल भेजा गया था.

(सात दिन का अंतराल)

काबुल से आए लोगों ने बताया कि शैख शरफ कराबागी ने कुछ मनगढ़ंत कहानियां लिख ली हैं, जिनमें झूठ-मूठ को बताया है कि मैंने (बाबर ने) क्या-क्या सितम ढाए हैं. उसने लाहौर के इमामों पर दबाव डालकर उन कहानियों पर उनकी सही भरवा ली है और उनकी नकलें जगह-जगह भेजी हैं. यह पता नहीं कि उसने यह बेहूदा काम अबदुल अजीज376 के बहकाने पर किए हैं या इसलिए कि वह उसे चाहता है. अबदुल अजीज आप भी बेहूदा बातें बकता और न करने काम करता रहा है. उसने कई हुकुम भी नहीं माने हैं. यह सब सुनकर एतवार ग्यारस377 को कंबर अली अरगून को रवाना किया कि शैख शरफ, लाहौर के इमामों, उनके संघातियों और अबदुल अजीज को पकड़ लाओ और दरबार में पेश करो.

जुमरात पंद्रहवीं को चीन-तैमूर सुलतान ने तिजारा से आकर नौकरी हासिल की. आज पहलवान सादिक और कमला-पहलवान औदी378 की पकड़ हुई. सादिक ने उसे आधी-पछाड़379 देने में भी बड़ी कठिनाई उठाई.

सोमवार उन्नीसवीं को किजिलबाश एलची मुराद कूरची को मुनासिब पहनावे जड़ाऊ पेटी-कटार और दो लाख तंके देकर छुट्टी दी गई.

(पंद्रह दिन का अंतराल)

उन दिनों ग्वालियर से सैयद पशहदी आया हुआ था. उसने रहीमदाद380 के बिगड़ने की बात बताई. खलीफा का नौकर शाह मुहम्मद मुहरदार (ग्वालियर) भेजा गया. रहीमदाद को नसीहत की भी बहुत-सी बातें लिख भेजी गईं. शाह मुहम्मद कुछ दिन बाद उसके बेटे को साथ लाया. रहीमदाद ने आप आने का नाम न लिया. उसका डर मिटाने के लिए बुधवार जिलहिज्ज की पांचवीं को नूर बेग ग्वालियर भेजा गया. कुछ दिन बाद लौटकर उसने रहीदाद के मन की बातें बताईं. उसका मुंहमांगा फरमान जा ही रहा था. कि उसके एक नौकर ने आकर अर्ज कियाः ‘‘मुझे ख्वाजा ने अपने बेटे को भगा लाने के लिए भेजा है. आप आने का उनका कोई इरादा नहीं है.’’ यह सुनते ही मैंने ग्वालियर पर चढ़ाई का इरादा किया. पर खलीफा ने अर्ज कियाः ‘‘एक बार मैं भी लिख देखूं, शायद सीधा हो जाए.’’ इसके लिए शहबुद-दीन खुसरो भेजा गया.

जुमरात को इटावा से मेहदी ख्वाजा आया.

बकरीद के दिन381 हिन्दु बेग को खास सरापा और जड़ाऊ पेटी-कटार382 और तुर्कमानों में चगताई383 नाम से मशहूर हसन अली को सरापा और सात लाख का परगना अता हुआ.384

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टिप्पणियां

166. ‘बीर पहर यावूशूबीदी’; पहर भर दिन चढ़े होने के लगभग. (तुरकी में हिन्दी ‘पहर’ चलाया है.) अर्थात 2 फरवरी को.

167. तहमास्प. ‘शाह’ (सम्राट) बस यहीं है, अन्यत्र हर कहीं बाबर ने उसे ‘शाहजादा’ (‘शाह’-पुत्र) ही कहा है.

168. ‘मुंहचिरा’. इबराहीम बेग तगाई बेगचिक. बहुत दिनों से ‘चापूक’ का कहीं उल्लेख न था. 923 हिजरी में वह बल्ख में पकड़ा गया था. अब शायद आगरा के इस महा-पुनर्मिलन के अवसर पर आया था.

169. (फीरोजाबाद से बटेश्वर-घाट के रास्ते पर अवस्थित) रापड़ी से ईशान कोण में दो फतहपुर हैं.

170. दिल्ली में बाबर के नाम का खुतबा फराबी ने ही पढ़ा था.

171. ‘ऊलूग तूगाईनीड् तूबी’. अनुवादकों ने कहीं ‘पैदल घाट’ (फ्रांसीसी ‘कूद’) समझा, पर मानचित्र से स्पष्ट है कि बाबर का तात्पर्य रापड़ी के पास की उस संकरानी बांक से था, जो बस्ती के बिलकुल पासवाली है और कुछ और ऊपरवाली से कहीं अधिक संकरी और लंबी (‘बोतल-गरदन’) होने के कारण ऊलूग (बड़ी) कही जा सकती है.

172. दाएं-बाएं हाशियों में कारों से एक-एक इंच भीतर यथावश्यक-संख्यक छेद करके उनसे गुजरते हुए और सामानांतर रेखाओं पर कसे हुए फीतोंवाली तख्ती, जिस पर सादा कागज दाबकर लिखने के लिए सीधी रेखाएं उभार लेते हैं. रामपुर दीवान की जो चार प्रतियां भेजी जा चुकी थी उनकी प्रति-पृष्ठ पंक्ति-संख्या तेरह-तेरह थी, इसलिए पंक्तियां बहुत घनी हो गई थीं और शीर्षक मोटे अक्षरों में न होकर पद्य-पंक्तियों के अक्षरों में ही थे. ‘मिलवां लिखावट’ से तात्पर्य है ‘शीर्षकों, उपशीर्षकों, पद्य-पंक्तियों और गद्यपंक्तियों के लिए अलग-अलग आकार के वर्णों वाली लिखाई’ से.

173. ख्वाजा अहरारी की.

174. जाखान इटावा से नौ कोस वायव्य कोण में यमुना के बीहड़ों में अवस्थित.

175. इटावा का परगना-हाकिम और बाबर का बहनोई. प्रीतिभोज का निमंत्रण देने. यहां पर उसके लिए आदरार्थक बहुवच है, जो बाबर की शैली से मेल नहीं खाता. बाबर केवल धर्म-नेताओं और बड़ी-बूढ़ी महिलाओं के लिए ही उसका प्रयोग करता है. कातिब का प्रमाद हो सकता है.

176. ‘यीगीतूलारनी शोखलूकगा सालदूक’. अर्थ अस्पष्ट है. शायद उनसे आपसी हंसी-ठिठोली करने को कहा हो.

177. सराय-बाबरपुर. इटावा-कालपी मार्ग पर इटावा से बारह कोस अग्निकोण में.

178. तहमास्प. पृष्ठभूमिः संधिवार्ता. कामरान को शीआ लोगों से बड़ी घृणा थी.

179. इनमें कामरान की मां गुलरुख बेगचिक भी थी, जो काबुल में अपने बेटे के लिए ‘अनुकूल परिस्थिति’ पैदा करने के प्रयत्नों में संलग्न थी.

180. इस संस्करण में चिट्ठी बहुत ही संक्षिप्त कर दी गई है.

181. तीन-तेरह की स्थिति. ‘मरबूती’ = सुसंबद्धता, सुघटन.

182. खनजादा बेगम.

183. ‘इमादुद-दौला’ (राज्यस्तंभ) की. अर्थात ‘तुम्हारी’ (ख्वाजा कलां की).

184. अयोग्यता.

185. (इस्लाम धर्म-) शास्त्र-विहित उपायों से मिले राजस्व से. विकल्पार्थः ‘वक्फ’ (धर्मन्यस्त) कर देना, ताकि उसके राजस्व पर दाता (बाबर) का कोई अधिकार न रहे.

186. आकृति-संतुलन-शोभी.

187. ‘छोटा-काबुल’ (अरण्यानी).

188. ये बुरे हाल में थे. भारत से जाते समय ख्वाजा कलां इनकी मरम्मत के नाम पर अलग धनराशि ले गया था. ‘बाग’ भी पानी के अभाव में झुर रहा था.

189. कवचकार. कवचपाल.

190. लक्षणार्थः तोप-दसते और कवचपूर्ति विभाग को चुस्त-दुरुस्त हालत में रखना.

191. ‘तार यीरदा’.

192. काबुल में पड़ी स्त्रियों {या नीलाब में पड़े लशकर (?)} की वजह से.

193. निषेध बाधा.

194. (ठिठोली श्लेष से पैदा की गई है. ‘मादगी’ के तीन अर्थ हैंः) 1. घुंडी की काज, 2. कंजूसी, 3. नपुंसकता (पुरुष का ‘मादा’-पन). (तीसरा अर्थ बहुत चुभता है. अली शेर नवाई के विषय में प्रसिद्धि थी कि वह शारीरिक नपुंसकता से ग्रस्त हैं.)

195 अर्थात् ‘वालिदीया रिसाला’ पद्यबद्ध करने (‘तरजुमा’ देखें) के पुण्यप्रसाद (शिवंकरता) से.

19़6. फफंद से पूरब ‘जमोहीं’, जहां बाबरपुर-फफंद सड़क दक्खिन को मुड़ती है.

197. उजबेक.

198. बल्ख-सीमांत.

199. जमोहीं-औरैया मार्ग पर.

200. (बाद में) कानपुर जिले में.

201.(‘छप्पर छाए घरों की घटाटोप-सघनबस्ती’) गोगनीपुर-मूसानगर मार्ग पर.

202. (राजकुल की महिलाओं के यात्राकाल में.) मार्गरक्षक सेना.

203. (बाद का) अकबरपुर

204. ‘आपादमसतक’ (परिधान).

205. कोरा-खास से दक्षिण कोरा-खेड़ा.

206. (कड़े में) कुंडा-कनक (उर्फः कूरिया, कूरा, कुनरा-कनक).

207. हंसुआ (रेलवे स्टेशन).

208. राजपथ (‘बादशाही सर-राह’) पर (जिलाः फतहपुर).

209. ‘शरकी’ (‘पूरबिया’, जौनपुरी) ने. उसके पूर्वज 1394 से 1476 ई. तक जौनपुर के शासक रहे थे. ‘पूरब’ के तीन दावेदार में एक वह भी था. दूसरे दो थे जलालुद-दीन नूहानी और महमूद लोदी.

210. लोदी. सिकंदर-पुत्र. बाबर उसे ‘महमूद खां’ कहता था. यहां ‘सुलतसन’ विशेषण संवाददाता का उद्धरण है.

211. (‘सरयू-पार का क्षेत्र’. मिलाएं ब्राह्मणों की उपजाति और अल्ल ‘सरवरिया’.) गोरखपुर.

212. (‘अद्धितीय खान’) सूर. उस समय वह बिहार खां बिहारी की

विधता दूदू बीवी के साथ उसके नाबालिग बेटे जलाल नूहानी का सह-संरक्षक था. उसे सुलतान मुहम्मद खां नूहानी अफगान ने राजकाज में प्रशिक्षित किया था. और शेर से लड़़ने पर ‘शेर खां’ नाम दिया था.

213. इस नाम के दो स्थानों में से उत्तर वाला.

214. ‘बीर पारा आश व तआम. तुर्की ‘आश’ और अरबी ‘तआम’ दोनों का मूल अर्थ एक ही हैः भोजन. ‘आश’ विशेष अर्थ में रूढ़ हो चुका था, इसलिए अरबी शब्द ‘आश’ के अतिरिक्त अन्य खाद्यों का अभिप्राय व्यक्त करने के लिए उधार लिया गया. पूरे ‘बीर पारा आश व तआम’ का मतलब हैः बड़ी परात में, चित्रलेखन के अंग बनते-से-सजाकर रखे हुए, सामिष-निरामिष विविध व्यंजनों, फलों, मिठाइयों आदि के छोटे-छोटे बरतन.

215. बिना अस्तर का ‘जामा’ (देखें).

216. इस प्रकार नूहानियों और लोदियों के मुकाबले में शरकियों का दावा सिद्धांत रूप में मान लिया.

217. घटनाएं’ अर्थात यह पुस्तक बाबरनामा. इस वाक्य से कुछ पंडितों ने यह निष्कर्ष निकाला कि बाबर ने इस पुस्तक को यही नाम (‘वाकया’ या बहुवचन में ‘वाकयात’) दिया था. पायंदा हसन मुगल गजनवी और महकुली मुगल हिसारी-कृत प्रथम और खानखाना अबदुर रहीम मीरजा तुर्कमान (हिन्दी के कवि रहीम)-कृत द्वितीय फारसी अनुवाद, दोनों का नाम वाकयाति बाबरी ही है. नाम-संबंधी वस्तुस्थिति यह है कि बाबर न तो यह पुस्तक समाप्त कर सका और न ही अपनी और पुस्तकों की तरह इसे कोई नाम दे सका. इसकी भूमिका भी उसने कोई नहीं लिखी है. पुस्तक समाप्त कर पाता तो अपनी पद्धति के अनुसार वह नाम का उल्लेख ही नहीं करता, बल्कि यह भी बताता कि इस नाम को मैंने पसंद किस कारण किया.

218. मावराउन-नहर के धर्मशास्त्रियों के नाम भेजी गई चिट्टी के साथ मुबैयन की भी एक प्रति इन्हें भेजी गई थी.

219. ‘कोहि-खिराज’ (‘राजस्वगिरि’).

220. बाबर का दामाद, सलीमा सुलतान का पति, सैयद नूरुद-दीन

(‘धर्म-प्रकाश’) चगानियानी, सैयद अमीर. ‘अवी’ (घर) यहां विशेष प्रकार के पारिवारिक तंबू-घेरे के अर्थ में आया है. ख्वाजा शहीद अकबर-काल में फिर आकर बीस बरस भारत में रह रहे थे.

221. पाठांतर : मुल्ला अली जान.

222. फराबी.

223. कुश्ती में सबको पछाड़ने वाला, बलिष्ठ मल्ल (पदवी).

224. प्रयाग.

225. ‘तुष्ट संत’ उजहनी. उस समय का नाम ‘सिरौलिया’ रहा होगा. इस तारकांक से अगले तारकांक तक का भाग सभी पाठों में नहीं है. यह संदेह भी होता है कि यह भाग कहीं और का है, जो यहां गलत जगह पर लग गया है. इस बीच एक वाक्य अधूरा है (देखें नीचे टिप्पणी 228) मंगलवार की घटना- सूची भी बहुत बड़ी है.

226. चगताई चंगेजखानी. अलाचा खां का बेटा. बाबर का ममेरा भाई.

227. संभव है, यह वाक्य सुलतान की माजून खाने की उत्कृष्ट इच्छा पर व्यंग्य हो.

228. वाक्य अधूरा है. देखें ऊपर टिप्पणी 225 के बाद का तारकांक.

229. (नदी का) बीहड़.

230. आगे 4 अप्रैल (1529 ई.) की दैनिकी में लिखा है कि पिछले साल बक्सर में गंगा तैरकर पार की थी. इससे भी स्पष्ट है कि तारकों से चिन्हित यह पत्रक स्थानच्युत है और विवरण अनुमानतः हिजरी 934 के उतरार्द्ध के किसी दिन का है.

231. 11 मार्च.

232. संगम के नीचे.++संदिग्ध स्थानच्युत पत्रक इस युगल-तारकांक तक है.

233. नूलीबाई (रेलवे स्टेशन).

234. पूर्वसूरि अनुवादकों ने इसे ‘कींत’ (‘कंद’, गांव; फारसी ‘दिह’, अंगरेजी. ‘विलेज् , फ्रांसीसी ‘विलाष्) पढ़ा.

235. पुहारी रेलवे स्टेशन से उत्तर ननकूंपुर.

236. फफोलोंवाले फोड़े.

237. ‘ऊजूनूगाग’, अधिकाधिक समय तक अधिकाधिक वेग से कूच. ‘पाठांतर’; ऊजनूजाग’.

238. अलूफा व कूनाल’; अभ्यागत प्रियजन या विशिष्ट जन को दी जाने वाली परंपरागत भेंट (‘अलूफा’) और आतिथ्य का बदल (‘क्रूनाल).

239. पतवारवाली.

240. सैयदपुर.

241.(अकबर-कालीन अधिकारी अली कुली खां ‘खानि-जमां’-‘युगचक्रवर्ती’1 के नाम पर) जमानिया (रेलवे स्टेशन; गाजीपुर जिले की तहसील).

242. नूहानी. नसीर खां सिकंदर लोदी का अमीर था. उसी की विधवा गौहर गुसांइन से सगाई करके शे’र खां सूर ने दहेज में अपार संपत्ति प्राप्त की थी.(=तारीखि शेरशाही).

245. चनाब.

246. ‘यूर तूरगी यूर्त्’ (पारसाल इसी दिन या इन्हीं दिनों) के पड़ाव की. उक्त सूर्यग्रहण 10 मई, 1528 ई. को लगा था. ग्रहण के दिन आ-संया उपवास इस्लाम-विहित है.

247. ‘कर्मनाशा’. किंवदंती है कि इसका पानी अधर में उलटे लटके (पौराणिक पात्र) त्रिशंकु की लार है.

248. ‘कर्म’ (शुभ कर्मों से अर्जित पुण्य) का ‘नाश’ करनेवाली.

249. ‘प्रसन्न’, ‘सुखी’ ‘0-चेहरा’ सिपाही.

250. ‘कापारदी’. विकल्पार्थः ‘छाले पड़ गए’.

251. थोरा.

252. ‘ऊतकान यील’.

253. ‘दसतक बीला’ (हाथ मारकर).

254. ‘कृपालू-दत्त’ (अरबी+तुरकी); ‘करीम-दाद’ इसी नाम का ‘अरबी+फारसी’ रूप है. यह नाम और कहीं नहीं आया है. न ही किसी और सूत्र से इस अभियान-नेता का कोई परिचय मिलता है. खुदाबेरदी बेग तूगची तैमूरताश (देखें प्रा!9) या तीड्री-बेरदी (‘प्रभुदत्त’, ‘ईशदत्त’) का कोई रहा होगा.

255. इसमाईल मीता (मेहता?).

256. ‘फस्ल-सोज. शायद नुसरत शाह को बताने की बातें रही हों. वाक्य अधूरा है. कम-से-कम एक पत्रक खो गया है, जिससे उन तीन बातों का ही नहीं, बाबर-नुसरत संबंधों, बिहार का शासन-भार लेने में मुहम्मद जमान मीरजा की आपत्तियों आदि का भी पता चलता.

257. फरमूली (देखें).

258. 9 अप्रैल.

259. भोजपुर (का पुरुष्कायित रूप). बिहार के आरा (शाहाबाद) जिले में.

260. आरा-बक्सर मार्ग पर.

261. विकल्पार्थः तितर-बितर हो गया’.

262. पाठांतरः 1. (सिपाही नहीं, सिर्फ) एक हाथी; 2. एक हाथी और एक सरदार; 3. (हाथी नहीं, सिर्फ एक) ‘बहादुर’.

263. अर्थात् जमान की सेना ने सोन नद पार किया.

264. ‘छत्र’, राजछत्र. ये राजचिविकल्पार्थः तितर-बितर हो गया’.ये राजचिह्न प्रदान करने के दो कारण थेः (1) मीरजा तैमूर-वंश का था; (2) उसे बिहार में अपने प्रतिनिधि के रूप में रखना था.

265. ‘यूकूंदूरूलदी’; अर्थात् शासनभार संभालने की प्रारंभिक औपचारिकता पूरी कराई गई.

266. ‘जिरगा’ (यहां शिकारी ‘घिराब’-सी गोल नहीं, ‘हांके’-सी सीधी पांत के अर्थ में).

267. द्यकूर्तेय्य् ने इसे ‘बायरी’ पढ़ा.

268. ‘ऊलूग (कीमा). मिलाएं बाड्ला ‘उलक’ (माल ढोलेवाली भारी भरकम नाव).

269. ‘सुख’. नावों-जहाजों के तुकबद्ध नाम रखने की यूरोपीय प्रथा बहुत बाद की है.

270. नौ-मंच, ‘डेक्’.

271. ‘सज्जा’.

272. ‘समाई’.

273. ‘चौकंदी’ (देखें)-युक्त.

274. कर्मभार. नौ-नामों के साथ तुकबंध लक्षणीय.

275. ‘आज्ञा’.

276. ‘मीनदीन रुखसतालदी’. शब्द प्रयोग से स्पष्ट है कि बाबर उसे समानता का मान देता है.

277. नुसरत शाह की बंगाली, बिहारी और पूरबिया प्रजा ने, गंडक पर. मखदूमि-आलम (‘जगत्सेव्य’) नुसरत शाह की ओर से हाजीपुर (जिला मुजफ्फरपुर) का शासक था.

278. (‘सुलतान महमूद’) सुलतान मुहम्मद शाह नूहानी अफगान (‘शेर खां’ पर टिप्पणी देखें).

279. ‘गूज बागी यूसूनलूक’ (आंखों के जादू से बांध लिया था) अर्थात् वहां से हिलने नहीं दे रहा था (जैसे, कहते हैं, कि सांप चूहे को अांखें चार करके हिलने नहीं देता).

280. गंगा.

281. ‘फस्ल-सोज’ (देखें).

282. आरा. अंतिम स्वर विकारी है, ‘आरे के’ बोलते हैं, ‘आरी’ उसी ‘आरे’ का तुरुष्कायित रूप है.

283. खरीद का घाघरा के दाएं तट का प्रदेश तो सुलतान जुनैद बिरलास ने ले लिया था. इस विजय का स-तिथि (1529 ई.) उल्लेख खरीद शहर के एक अभिलेख में है. बाएं तट का प्रदेश अभी भी नुसरत शाह के पास था. इसी अवशिष्ट खरीद की सेना ने बाबर की राह रोकी थी. पर बाबर ने बंगाल से बिगाड़ न होने की स्थिति के नाम पर कूटनीतिज्ञता से इस मार्ग रोध की उपेक्षा की

284. ‘फस्ल-सोज’.

285. ‘शासिका’, ‘स्वामिनी’.

286. तुर्कमान. फारस का राजवंश भी कजर गोत्र का तुर्कमान ही था.

287. नीलकमलाकर. ‘नीलोफर’ (देखें) का जार (प्राचुर्याशय).

288. कंवल-ककड़ी, कौंल-गट्टा, कौलंडा. यह फूल का नहीं, बीजों के डोडे (कमलकोष) का नाम है. फूल तो ‘कमल’ मात्र कहलाता है.

289. ‘डोडा’ का तुरुष्कायित रूप. डोडा बीज नहीं, बीजकोष है.

290. मृत्यु 1380-1 ई. अकबर इनकी रचनाएं पढ़वाकर सुनता था.

291. चिशतिया (सूफी-) संप्रदाय के पीठाधीश.

292. तब, बल्कि अठारहवीं सदी ई. तक गंगा की धार बुढ़गंगा में थी. इसीलिए गंगा-तट मनेर से इतनी दूर था.

293. गंगा-घाघरा संगम.

294. पश्चिम सिकंदरपुर का हल्दी-घाट नहीं, यह उन दिनों के (बुढ़-) गंगा-घाघरा संगम के पास का कोई घाट था, संगम से दो-तीन कोस ऊपर.

295. ‘गुजर’, छिछली धार का पायाब रास्ता. मिल नहीं पाया, तब तक छिछलपन कट गया होगा.

296. ‘पीतमुख’. फारसी ‘पीतमुखता’ नहीं. फा. में ‘जर्द’ (पीत)‘रु’ (मुख) मात्र होता.

297. ‘सरवर-वक्त’ (‘अगुआ-समय’, मुख्य समय).

298. ‘चतुर्मुख’, चौपारा. असकरी के हल्दी-घाट से काफी ऊपर.

299. गंगा.

300. फरमूली. मारूफ फरमूली का बेटा.

301. असकरी के लशकर के.

302. ‘माजून-नाक. माजून-सेवन-जनित ‘अशौच’. यहां नशे के अर्थ में. मदपान से विरति का ब्रत लेने के बाद बाबर माजून का नशा करता तो था, पर चूंकि वह भी इस्लाम-वर्जित है, इसलिए आत्मग्लानि की भावना से उसका पीछा छूट न पाता था.

303. यह शेर जहांगीर ने भी उद्धृत किया है (तूजूक). स्र्रोत अज्ञात.

304. (मूलः) ‘एक राग भी काट नहीं सकते’.

305. घाघरा.

306. इससे सिद्ध है कि हल्दी-घाट संगम से दो-तीन कोस ही ऊपर था, अधिक नहीं.

307. सरयू.

308. प्यार में ‘उसताद’ का ऊनवाचक रूप.

309. ‘मलजार’, तोप-मंच.

310. ‘आतिशबाजी’. फारसी ‘फुलझड़ियां’ नहीं, तुरकी ‘मशालों के तीरों की बौछार’ (आतिशबारी’).

311. विकल्पार्थ ‘नाव के पांयते में’.

312. मुसतफा के तोप-दस्ते से रक्षित मोरचेवालों ने.

313. हल्दी घाट से. या, जो रात के अंधेरे में ऊपर जाने से रह गई थीं (?).

314. बाबा सुलतान की कर्तव्य-विमुखता पर तारीखि रशीदी (में हैदर मीरजा दुगलत) न भी आक्रोश प्रकट किया है.

315. संकरानो पर धार अधिक तेज ओर अधिक गहरी होती है, खुले में चौड़ा पाट पार करना कहीं अधिक सरल है.

316. ‘चीरीकीली’ (सैनिक सेवा अनीक) . इस अनीक ने सरयू पार करके सारण की सीमा में प्रवेश किया और लड़नेवाली सेना का साथ दिया.

317. लड़ाई के पहले.

318. या ‘कुंदबाह’. डोमाईगढ़ के पास.

319. फरमूली.

320. बायजीद का भाई. बायजीद तो हिजरी 932-4 में बाबर का नौकर भी रहा; पर मारूफ, जो इबराहीम लोदी से भी बिगड़ा ही रहा था, बराबर बाबर का विद्रोही रहा. उसके दोनों बेटे (मुहम्मद और मूसा) बाबर के नौकर थे.

321. प्रिय मित्र, अनुरक्त बंधु.

322. वैद्य. यूनानी पद्धति की चिकित्या तिब’ का व्यवहारज्ञ. अल्प भी संभव है.

323. ‘किताबदार’ (देखें).

324. तिरमुहानी से.

325. नुसरत शाह के बेटे के.

326. उसके भेजे जाने का उल्लेख किसी खोए पत्रक में रहा होगा.

327. (बंगाली अल्ल) ‘नस्कर’ (?).

328. कुंदबाह से.

329. घाट के इस पार सारण में चौपारा (चौपहल दियारा) और उस पार सिकंदरपुर परगने में ‘चतुर्मुख’.

330. शारदा-संगम से ऊपर की सरयू.

331. ‘लखनूर’ (रामपुर जिले का ‘शाहाबाद’) होना चाहिए. नीचे टिप्पणी 339 देखें.

332. ‘गुरुवार’ की अर्थात हिजरीतर गणना से बुधवार, 25 मई, की रात को.

333. रात के दस बजकर पचपन मिनट पर.

334. अध्याय. यहांः संक्षिप्त जीवनियां, स्थल वर्णन, दैनिकी के अंश, शैख जैन के लिखे हुए अपने फरमान आदि, जो अलग-अलग नत्थी रहे होंगे.

335. तंबू के आगे का ओसारे वाला भाग.

336. तंबू की ‘छत’ में हवा और धूप के आने और धूएं के निकलने के लिए बनी खिड़कियों के ऊपर की तीलीदार पट्टियां.

337. सिंहासन पर बिछाने की कालीन.

338. अबदुल्ला ‘किताबदार’ और बाकी ‘शकावुल’ ताशकंदी. बाकी बाद में ‘मीड़्-बेगी’ (‘हजारी’) हो गया था.

339. रामपुर जिले का ‘शाहाबाद’ इसी से पता चलता है कि ऊपर (टिप्पणी 331 का) ‘लखनू’ लखनऊ नहीं, ‘लखनूर’ ही है.

340. कंदला. अब ‘सारण खास’.

341. तीन मुहानों (गंगा, घाघरा और दाहा) के संगम के क्षेत्र से होकर. (ख्वांद अमीर) ने तिरमुहानी में ही हबीबुस- सियर (देखें) पूरा किया था. अबदुल्ला किताबदार को तिरमुहानी के पड़ाव से ही (13 मार्च, 1529 ई. के दिन) संभल भेजा गया था (‘संभल की छुट्टी दी गई थी’).

342. (आजमगढ़ जिले का) ‘नाथपुर’ होना चाहिए.

343. लगता है, यह अनुच्छेद हिजरी 934 के उत्तरार्द्ध का है और वृत्तांत अयोध्या के हैं. वर्तमान विवरण में न तो गाजीपुर की ओर जाने का कोई प्रसंग है और न जलवानी नूहानी को छुट्टी दी गई थी’).

344. (आजमगढ़ जिले का) ‘नाथपुर’ होना चाहिए.

345. ताल रतोई (नाथपुर).

346. विद्रोही शैख बायजीद और बीबन {मलिकबीबन जिलवानी (या लोदी) पठान} ने.

347. 21 मई.

348. ‘तनूरदीक तफसान’ (‘जैसे तंदूर भड़क रहा हो’).

349. चकसर. जिलाः आजमगढ़.

350. ‘जनारा’. किसी ने ‘चुनार’ और ‘जौनपुर’ पढ़ा है, किसी ने ‘चुनार’ और ‘जौंद’. विद्रोही डलमऊ से महोबा गए थे. चुनार और जौनपुर दोनों के क्षेत्रों से होकर जा सकते थे. (‘जौंद’ अकबर की रोहतास ‘सरकार’ में था).

351. दोनों के आत्मीय-स्वजन ‘सरवार’ गोरखपुर में थे. यद्यपि वे बाबर के समर्थक थे, तथापि विद्रोहियों को यह आशा रही होगी कि कम-से-कम चौमासे भर तो शरण देंगे ही.

352. मीरजा और बिरलास को अपने-अपने क्षेत्र (क्रमशः जौनपुर और चुनार) में भेजने में एक पेय दो काज सधते थे. केवल इन्हीं दो क्षेत्रों की व्यवस्था अधूरी थी. अब बाबर पूरब के अभियान के सभी कार्यभारों से मुक्त हो गया.

353. मूल सरयू.

354. टोंस. यह टोंस फैजाबाद के ऊपर घाघरा से निकली है और आजमगढ़ के नीचे उसी मुख्य धारा में मिल गई है. टौंस (तमसा) और है.

355. विवादग्रस्त विषय पर मौलवी (इस्लाम-धर्माचार्य), काजी

(धर्माधिकारी), मुफती (धर्माधर्म-व्यवस्था देनेवाले) आदि की दी हुई व्यवस्था. सभी हिजरी महीनों की तरह मासावधिं नित्य रोजे रखने के महीने रमजान का मासंत भी नवचंद्र के दर्शन पर ही निर्भर रहती है. लिहाजा यह विवाद प्रायः उठ खड़ा होता है कि (‘ईद का) चांद’ दिखाई पड़ा या नहीं. देखें ‘ईद’.

356. जिलाः सुलतानपुर.

357. अर्थात् शैख जैन.

358. सारबान.

359. असस. दूसरा अबदुल्ला (‘किताबदार’) संभल जा चुका था.

360. अर्थात् उसे सम्राट् के इस आदेश से अवगत कराके कि चुनार जुनैद बिरलास को दिया जाए.

361. पसरूर. अकबर-काल में लाहौर ‘सूबे’ में अंतर्भुक्त.

362. कूरा (कोरा) खास.

363. दूरी जरीव से या घोड़े के डग गिनकर नापी गयी होगी.

364. यमुना के दाएं (पश्चिम) तट पर.

365. ‘आभ्यंतर’ (फारसी ‘मियांगानी’). संभवतः ‘कूल’ की ‘खासा’ सेना के. पाठांतर ‘ऊता’ भ्रांत है.

366. जिलाः हमीरपुर. अकबर-काल में कालिंजर-‘सरकार’ के अधीन.

367. द्रुत वेग से निर्भार यात्रा.

368. ‘कूर’ या ‘कोर’ पढ़िये तो ‘मुंदहर’ या ‘अंधेरा महल’ अर्थ निकल सकता है, पर वह कष्ट-कल्पना होगी; ‘गोर’ (समाधि) पढ़ना ही ठीक है.

369. इटावा का हाकिम था.

370. आदमपुर से आगराः 78 कोस. मंगल की आधी रात से गुरुवार की 9 बजे रात तकः 44 घंटे. ऋतुः मध्य ग्रीष्म की. कई लंबी बीमारियों और तीन साल की विश्रामहीनता के बाद भी 45 वर्षीय बाबर में अभी युवक-सुलभ ऊर्जस्विता बनी हुई थी.

371. ‘पालीज’ या ‘फा-’ (नदी-तट और दियारों की रेती में ककड़ी, फूट, खीरे, खरबूजे, सरदे, मतीरे, तरबूज, लौकी, कुमहड़े आदि की बेलों-ही-बेलों की खेती) का व्यवस्थापक.

372. ‘बूता-ताक’.

373. काबुल से आगरा पांच महीने में. गुलबदन लिखती है कि माहेम औचक पहुंची और उससे मिलने को बाबर पैदल ही उठा दौड़ा.

374. ‘काला’ बेग (ऊपर टिप्पणी 110 देखें) कौचीन. हिजरी 932 से हुमायूं का नौकर और उसकी ओर से संभल का शासक. (हिजरी 933 में उसने वहां के एक मंदिर को मस्जिद के रूप में परिणत किया, जिसके स्मारक-पट्ट पर उसकी प्रशस्ति खुदी है.) आगरा पहुंचने के पहले ही उसे संभल जाना पड़ा था.

375. इंडिया ऑफिस की प्रति में उसे ‘किताबदार’ लिखा है, जिससे पता चलता है कि वह दूसरा अबदुल्ला (अबदुल्ला असस) नहीं, अबदुल्ला किताबदार ही था. (ऊपर टिप्पणी 359 देखें.)

376. ‘मीर-अखोर’ (देखें).

377. 17 जुलाई.

378. ‘विलक्षण सर्वजित् (अद्वितीय) मल्ल अवधी (अयोध्यावासी)’. कुछ विद्वानों ने ‘कमाल’ उसका नाम माना है.

379. ‘नीमकारा’. अर्थ शायद नीचे तो कर देना, पर चित न कर पाना’ हो.

380. ख्वाजा. उसने बाबर के रुष्ट होने पर मालवा के शासक की शरण में जाने और ग्वालियर राजपूतों को सौंपने का निश्चय किया. इस पर शैख मुहम्मद गौस ने आगरा जाकर बाबर को मनाया और ख्वाजा रहीमदाद (‘कारुणिक-दत्त’) को क्षमा दिला दी. ग्वालियर ख्वाजा के पास ही रहने दिया गया, पर कुछ दिन बाद उसे वहां से हटाकर अबुल फतह (शैख घूरन) को मिला. तबकाति-अकबरी.

381. ‘ईदुज जुहा’ (‘जुहा’ अर्थात् जलपान के समय’ की ‘ईद’ अर्थात त्योहार), बलि-पर्व, या (तुरकी) ‘बैराम कबीर’ (बड़ी ईद). (‘बकरीद’ यानी ‘बकर-ईद’ इसे पशुबलि के कारण कहते हैं; ‘बकर’ माने गाय या बैल.) जुल-हिज्ज महीने की दसवीं को (होती है).

382. पाठांतर में एक घोड़ा दिये जाने का भी उल्लेख है.

383. फारस के चगताई-पर्वत का तुर्कमान. यहां चगताई, वंशनाम नहीं, मूल-निवास-स्थान का बोधक नाम-विश्लेषण (और विशेषण-नाम) है. ऐसा दूसरा चगताई तुर्कमान इबराहीम चतगाई था, जो हुसैन बायकरा से आ मिले तुर्कमानों में था.

384. इस वर्ष की (काबुल से माहेम और बदख्शां से हुमायूं के आगरा पहुंचने के बीच की) दिन घटनाओं के उल्लेख बाबरनामा में नहीं, पर हुमायूंनामा में हैं, उनमें से मुख्य ये हैंः (1) धौलपुर और सीकरी की सैर, जिससे पता चलता है कि माहेम के साथ बीबी मुबारक भी काबुल से आ गई थी; (एक दिलचस्प सूचना यह भी है कि सीकरी में एक एकांत-शांत चौखंडी थी, जिसमें बैठकर बाबर ‘अपनी किताब लिखा करता था’); (2) काबुल से ‘महल’ के मुख्य कारवां का आगमन; (अपनी बहन खानजादा बेगम को मान देने के लिए बाबर दो कोस चलकर नवग्राम तक अगवानी करने गया था) (3) जर-अफशां बाग की सैर (वहां अंतरंग-मंडली में बाबर ने कहा था कि ‘राजकाज ने मेरी कमर झुका दी है’ और केवल एक टहलुआ लेकर उसी बाग में अवकाश-जीवन बिताने और बादशाही हुमायूं को देने की अभिलाषा प्रकट की थी); (4) दिलदार के बेटे अलवार (पाठांतरः ‘अनवार’) की मृत्यु; (उसके जन्म का उल्लेख हिजरी 932 वाले खोए पत्रकों में रहा होगा); इस शोक से जी फेरने के लिए जलमार्ग से धौलपुर-यात्रा, जिसमें बाबर को ‘बड़ा मजा आया’.

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