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प्राची - नवंबर 2015 - क्यों हारती है कोई राजुल / कहानी / डॉ. गायत्री तिवारी

क्यों हारती है कोई राजुल

डॉ. गायत्री तिवारी

लाहाबाद से समीरा का फोन आया. पहले तो उसने दीपावली की शुभकामनाएं दीं. फिर घर परिवार का हालचाल पूछा.

वह केवल इतना पूछकर नहीं रुकी, मां कैसी हैं? दादू के पैर का दर्द कैसा है. गुड़िया किस क्लास में है? पप्पी की शादी कहीं तय हुई या नहीं? और, वो रामायण मंडली वाली चाची, उनका क्या हाल है?

मैंने कहा-‘‘तू तो सवालों की रेलगाड़ी चला रही है, मुझे उत्तर देने का मौका ही नहीं दे रही.’’

वह सोचती हुई बोली-‘‘अरे सॉरी तू तो जानती है मेरी आदत.’’

‘‘हां-हां, खूब जानती हूं तेरी आदत. अब तो जीजाजी भी जान गये होंगे और उन्होंने मौनव्रत ले लिया होगा.’’

‘‘धत्!’’ शर्माये स्वर में समीरा ने कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, अब कुछ अपना हाल सुना. कैसी चल रही है गृहस्थी की गाड़ी? और नौकरी?’’

‘‘सब ठीक चल रहा है.’’

फिर जैसे कोई जरूरी भूली बात याद करती हुई बोली-‘‘अरे, मीनू, एक बात बताना तो भूल ही गई. शायद तुझे पता हो, शायद न हो.’’

मैंने उत्सुकता से पूछा-‘‘कौन सी बात?’’

‘‘एक दुखद समाचार है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘वो, आपका क्लासमेट था न, राजुल, उसने आत्महत्या कर ली.’’

मैंने चौंकते हुए कहा-‘‘क्या? कब? कैसे?’’

समीरा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा-‘‘लम्बा किस्सा है.’’

‘‘उसकी तो मैरिज हो गई थी न?’’

‘‘हां, हो गई थी और डाइवोर्स भी.’’

‘‘शादी. डाइवोर्स. मामला क्या है?

‘‘मैंने कहा न, लम्बा किस्सा है. मैं अगले हफ्ते आ रही हूं, तब बैठकर सब तफसील से बताऊंगी.’’

समीरा से बात होने के बाद मन बहुत भारी रहा. रह रह कर राजुल की छवि आंखों के आगे आ जाती. यादों का हुजूम उतराने लगा.

मैं और समीरा. हम सजातीय थे. पड़ोसी थे और क्लासफेलो भी. हमारे घरों की दीवाल जुड़ी थी और आंगन भी लगभग एक थे. पता ही नहीं चलता था कि कौन कब किसके घर में है. खुशबू के साथ परवाने भी एक-दूसरे के यहां पहुंचते रहते थे.

हमने आठवीं पास की. स्कूल में नौवीं कक्षा नहीं थी, इसलिए स्कूल बदलना पड़ा. उस हाईस्कूल में मैंने और समीरा ने एक-साथ एडमीशन लिया.

नया स्कूल. नया वातावरण. रंग-बिरंगे परिधानों में सजी, तितली जैसी लड़कियां. सब उमंग उत्साह से भरी.

पहला दिन परिचय कर के, नये दोस्त बनाने में बीत गया. पहले दिन ही एक गोलमटोल गुड़िया-सी लड़की से पहचान हुई. उसके प्रति आश्चर्य का एक विशेष कारण था-उसकी दोहरी देह, और भूरा रंग. नाक, नक्शा अच्छा था. देखने में अच्छी लगती थी.

रीसिस यानी आधी छुट्टी में हमने उसे अपने पास बुलाया-बैठाया. ‘टिफिन’ में हिस्सेदार बनाया. जान-पहचान बढ़ी और गाढ़ी दोस्ती हो गई.

राजुल भी हमारे जैसी माध्यमिक परिवार की थी. पिता फैक्टरी में थे. मां घरेलू महिला थीं. एक भाई था, एक बहिन थी. खुशहाल परिवार था.

हमारी ‘त्रिवेणी’ बनीं. मैं, समीरा और राजुल. हम साथ-साथ आते-जाते. उठते-बैठते और पढ़ते. एक-दूसरे के घर भी आते-जाते.

हम लोग राजुल को ‘‘स्माल बम’’ कहते थे. इसके पीछे एक मजेदार कारण था. वह यह कि स्कूल की एक ‘मैडम’ काफी मोटी थीं. स्थूलदेह थी उनकी. जब ‘मैडम’ का पीरियड शुरू होता तब हम ‘‘बम, बम’’ कह कर कहकहे लगाते. एक बार ‘‘मैडम’’ का ध्यान हमारी शरारत की ओर गया.

वे चिल्लाईं-‘‘क्यों लड़कियों यह क्या ‘‘बम-बम’’ लगा रखा है?’’ हमने बड़े भोलेपन से कहा-‘‘मैडम, हम लोग प्यार से राजुल को ‘स्माल बम’ कहते हैं.’’

राजुल ने भी सहमति में सिर हिलाया. मस्तमौला स्वभाव की थी राजुल.

वह खुद पर हंसती थी. अपने मेाटेपन पर हंसती थी. चुटकुलों का खजाना था उसके पास.

एक बार हम तीनों गपशप कर रहे थे. राजुल ने कहा-‘‘आप दोनों बताओ कि आपकी सबसे बड़ी इच्छा या मनोकामना क्या है?’’

हमने कहा-‘‘प्रश्न तुमने पूछा है, पहले तुम ही उत्तर

दो.’’

राजुल ने पूरी गंभीरता से कहा-‘‘मेरी पहली और आखिरी इच्छा है कि ‘टुनटुन’ मुझसे मुकाबला करे.’’

फिर उसने जो ठहाके लगाये तो आंखों में आंसू तक आ गये.

मैट्रिक तक सब ठीक रहा. मैट्रिक की परीक्षा चल ही रह थी कि राजुल की मां ‘हार्ट अटैक’ से चल बसीं. बहिन, भाई छोटे थे. घर में अन्य कोई महिला सदस्य नहीं थी. घर का भार राजुल पर आ पड़ा. राजुल ने हिम्मत नहीं हारी. हां, इतना जरूर हुआ कि हमने कॉलेज ज्वाइन कर लिया. और राजुल ने ‘प्राइवेट’ परीक्षा देने का निश्चय किया.

किसी तरह हम तीनों एम.ए. में गये. कुछ समय बाद मेरा और समीरा दोनों का विवाह हो गया. रह गई राजुल. उसे चिन्ता थी अपने भाई की, चिन्ता थी बहिन की. इसलिये उसने विवाह नहीं किया. एक स्कूल में शिक्षिका हो गई. पिता ने अपनी आर्थिक असमर्थता के कारण राजुल के निर्णय को स्वीकार कर लिया.

समीरा इलाहाबाद में थी. मैं उसे राजुल के समाचार देती रहती थी.

राजुल को नौकरी करते पांच साल बीत गये. भाई ने बी.एस.सी. कर लिया. उसे नौकरी भी मिल गई.

पिता ने दबे स्वरों में ‘राजुल’ से विवाह की चर्चा छेड़ी.

राजुल ने कहा-‘‘भैया की शादी कर दो. बहू घर में आयेगी तो मुझे भी सहारा मिलेगा.’’

भाई की शादी हो गई. बहू आ गई. उसकी गोद भर गई. यों दो साल गुजर गये.

राजुल को चिन्ता थी छोटी बहिन की. उसे दौड़धूप कर रिश्ता तय किया. बहिन का विवाह भी हो गया.

एक दिन पिता बोले-‘‘बेटी अब तो भाई बहिन की शादी हो गई. मैं अपने जीते जी तुझे सुहागिन देखना चाहता हूं.’’

राजुल बोली-‘‘पिताजी, मेरी चिंता छोड़िये. मुझे आपकी चिन्ता है. आपकी देखभाल कौन करेगा?’’

पिता ने आश्वस्त स्वर में कहा-‘‘बहू है न.’’

‘‘वो तो ठीक है, पिताजी, लेकिन विवाह करने की मेरी इच्छा नहीं है.’’

पिता चुप रह गये. कुछ दिन बीते. एक दिन शाम एक रिश्तेदार पिता से मिलने आये. यहां वहां की चर्चा चली. राजुल की शादी की बात उठी.

पिता ने कहा-‘‘राजुल की इच्छा नहीं है.’’

रिश्तेदार बोले-‘‘पहले आप तो निश्चय करो. और हां दान-दहेज की चिन्ता मत करना.’’

‘‘क्या कोई लड़का नजर में है?’’

‘‘अरे, घर में ही लड़का है, बस एक बात है, अगर आपको आपत्ति न हो तो बात बन सकती है.’’

‘‘क्या बात है?’’

‘‘लड़के का ‘डाइवार्स’ हो चुका है.’’

अंधा क्या चाहे दो आंखें. पिता ने आगा-पीछा सोचे बिना हामी भर दी और अपनी सौगंध देकर राजुल को भी मना लिया.

राजुल का ब्याह हो गया. लेकिन पहली रात ही उसके सपनों का संसार चकनाचूर हो गया.

राजुल समझ गई कि इनका ‘डाइवोर्स’ क्यों हुआ होगा.

भरी आंखें और मुरझाया चेहरा लिये राजुल मायके लौटी.

पिता ने पूछा-‘‘बेटी, ससुराल वालों ने कल आने को कहा है?’’

राजुल ने भर्रायी आवाज में उत्तर दिया-‘‘वे कभी भी आयें. मैं अब वहां लौटकर नहीं जाऊंगी.’’

आश्चर्यआहत पिता बोले-‘‘क्यों?’’ उत्तर दिया राजुल की छोटी बहिन ने-‘‘पिताजी ये तो संकोच में कुछ नहीं कहंगी, लेकिन मैं बताती हूं-जीजाजी पुरुषत्वहीन हैं.’’

एक विस्फोट हुआ. सभी विस्मित अचंभित. पिता को गहरा सदमा लगा. वे कुछ दिन ही जी सके.

राजुल ने भाई-भाभी के साथ रहकर जिन्दगी नये ढंग से शुरू करने का निश्चय किया. पुराने स्कूल ने उसे फिर नौकरी पर रख लिया. राजुल नौकरी करती, घर के काम में हाथ बटाती. उसने स्वयं को साहित्य और संगीत की ओर मोड़ा. अपने को जोड़ा. अब वह बाहरी कार्यक्रमों में भी आने-जाने लगी.

एक रात राजुल कार्यक्रम से लौटी. समारोह के संयोजक अपनी कार से उसे घर तक छोड़ने आये. राजुल ने घर के भीतर पांव रखा ही था कि कल तक मर्यादाशील बहू फट पड़ी-‘‘ननद जी, जवानी इतनी उतरा रही है तो किसी का हाथ पकड़ लो या कोठे पर जा बैठो.’’

भाभी शब्दबाण छोड़ रही थी और भाई मौन साधे बैठा था. वह भाई जिसके जीवन को राजुल ने सजाया-संवारा था, बनाया था, बसाया था.

राजुल कटे पेड़ की तरह गिर पड़ी. बेहोशी टूटी तो अंधेरे से घिरी थी. मनोमंथन चला-अब क्या? क्या करूं?

समाज में, पुरुषों द्वारा छली गई और अपने द्वारा उपेक्षित प्रताड़ित नारी की नियति क्या है?

राजुल जैसी संघर्षशील, स्नेही और परिवार को समर्पित महिला आत्महत्या को विवश क्यों होती है.

समाज की ऐसी राजुलें कब तक हारती रहेंगी. कौन देगा उन्हें जीत का हौसला.

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