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प्राची - नवंबर 2015 - गौशालाः वैष्णवधर्मी जीवन पद्धति / आलेख / श्याम सुन्दर निगम

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हामंथन द्वारा सागर से ‘रत्न’ निकालने की स्थापना हम सब पढ़ते और मानते आ रहे हैं. उस ‘महामंथन’ की सी-प्रक्रिया का सूक्ष्माति सूक्ष्म प्रारूप एक सृजनधर्मी साहित्यकार के अन्तस में भी रहते हैं. ऐसी ही घुमड़न को सोते जागते जीते रहते एक वरिष्ठ रचनाकार श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ अपने प्रणम्य रूप में हम सब के बीच में हैं.

हमें, बालू के कण जोड़कर बनाना हैं, शिलाएं!, शिलाएं जोड़कर बनाना है, दुर्ग! जहां विज्ञान पहरा देगा, साहित्य जागेगा, मानवता गायेगी, सम्पन्नता मुस्करायेगी.

पहरा देना, जागना, गाना, मुस्कराना, आदि के क्रियानुक्रम के माध्यम से कवि उस जीवन पद्धति को परिभाषित कर गया है जिसमें उसकी अगली कृति ‘गौशाला’ की पृष्ठभूमि का निर्माण शुरू हो चुका था. आधार-गौशाला, गाय, पंच गव्य...हां अब मैं भी ‘गौशाला’ का ही उल्लेख करना चाहता हूं.

कवि ने भूमिका में ‘रचना क्यों’? में लिखा है कि उसका दृष्टिकोण पूर्णतया मानवीय, सामाजिक और राष्ट्रवादी रहा है. मैं भी सहमत हूं जहां तक यह कि वीर पुरुष यश गाकर कहते, ‘‘जयति हमारी गौशाला.’’

सच है कि गौशाला सिंह बनाती है. शक्ति बढ़ाती है, यौवन रक्षती है. सदाचरण का पाठ सिखाती है, शिष्ट बनाती है, बुद्धि बढ़ाती है. ऐसी ही अनेक अवधारणायें कवि ने इस कृति के माध्यम से अपने पाठकों तक सम्प्रेषित की है. मनुष्य के देह धारण करने से लेकर इसे छोड़ने तक के सुमंगल कल्याण-

साधन गाय, गंगा, दूध, दही, घृत, शहद, सुपाहन, जल गंगामैया वाला मिलकर पंचामृत बन जाते, पाप दोष हरने वाला. सात्विक खान-पान, संस्कारवान आचार-विचार कवि का अभिप्रेत हैं, पशु-वध का निषेध है, तप, सत्य, अहिंसा, इन्द्रिय-निग्रह का विधान प्रत्यक्ष रूप से संकेतिक है. इसके चलते ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि कवि ‘गौशाला’ की डोर पकड़कर ‘वैष्णव जीवन पद्धति भागवत धर्म की पैरोकारी करता है. कवि की शुभाकांक्षा फलीभूत होगी तो निश्चय ही एक स्वस्थ भारतीय परम्परा की दृष्टि से संस्कारवान समाज का निर्माण होगा. नहीं होंगे मधुशाला के कुसंस्कार.

मेरी सीमित समझ के अनुसार यह पूरी कृति गाय और गौशाला पर एक सम्पूर्ण ठोस पद्यात्मक-निबंध हैं. प्रस्तावना से उपसंहार तक. उपपत्ति से इति सिद्धम तक. हर्ज क्या है कि हम अपनी धार्मिक मान्यताओं की प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं, आस्था को, श्रद्धा को मुकुट पहनाते हैं. हम भूल जायें क्या कि ऋगवेद में विष्णु को अजेय गोपः, विष्णु गोपः, अदाम्यः कहा गया है. उनके परम पदों में भूरिश्रंगा चंचल गायों का निवास है उनका. सर्वोच्च लोक ‘गोलोक’ कहलाता है.

मैं ‘सलिल’ जी की रचनाधर्मिता को प्रणाम करता हूं कि इस कृति में निश्चित रूप से बहुत कुछ ऐसा भी बन पड़ा है जो अपने मानक स्वयं ही तय करेगा. उदाहरण के लिए प्रेम की अद्भुत उदात्तताइस कृति की अर्थवत्ता को बहु-गुणित करती है जहां कृतिकार लिखता है कि-

‘‘तीनों लोकों के स्वामी को, चोर बनाती गौशाला

जब मां पूछे चोरी की है, ना ना करते गोपाला,

मुंह पर मक्खन, हाथ छिपाये, शपथ उठाते नन्दलाला.’’ भावार्द्रता और ममता की चरम स्थिति कि-

‘‘कृष्ण रूंआसे जब हो जाते, गोदी में लेकर कहती, आना प्रतिदिन मक्खन खाने, खुली रहेगी गौशाला.’’

कृतिकार ने दार्शिनिकता से भी दूर रहने की सुरक्षित आत्मरक्षक अभिव्यक्ति की है, पर इसे क्या कहेंगे-

घृत से जीवन शक्ति बढ़ाती, घृत से काया भस्म करें,

स्वर्गद्वार तक पहुंचा देती, वैतरणी से गोशाला .

सामाजिक समरसता पर ‘मधुशाला की पंक्ति’ ‘मन्दिर, मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला’ से आगे बढ़कर ‘सलिल’ जी ने प्रस्तुत की है कि जिस गाय और रोमांस को लेकर क्या-क्या बखेड़े नहीं खड़े किये जाते, उसी गाय का ही तो दूध है-

बना दूध से मधुर सेवइयां, ईद सजाती गौशाला.

खुशियां भरती हैं जीवन में, उत्सव और उत्साह लाती हैं.

‘गौशाला’ स्वयं इतनी पुष्ट कृति है कि कृतिकार का आत्मरक्षा का भाव कतई अनपेक्षित है. सर्वथा सचेतन कवि-

धर्म निभाया है कि मुझे लगता है कृति स्वयं में अपना पक्ष प्रस्तुत करने में समर्थ है.

‘सलिल’ जी, हम सब को दिशा दिखला रहें हैं, बधाई.

--

संपर्कः मो. 9415517469

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