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प्राची - दिसंबर 2015 - / संपादकीय / राकेश भ्रमर

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(राकेश भ्रमर, संपादक - प्राची)

हिन्दी और सिन्धी की प्रख्यिात लेखिका, कवियत्री और अनुवादिका सुश्री ‘‘देवी नागरानी’’ के विशेष अनुग्रह और सौजन्य से मुझे प्राची का ‘‘सिन्धी कथा विशेषांक’’ प्रकाशित करने की प्रेरणा प्राप्त हुई.

सिंधी साहित्य का मैं बहुत बड़ा जानकार नहीं हूं, न मैंने बहुत ज्यादा हिंदी साहित्य ही पढ़ा है. गाहे-बगाहे छिटपुट हिंदी में अनुदित सिंधी की कहानियां अवश्य पढ़ी हैं और कुछ कहानियां मैंने प्राची में प्रकाशित की हैं.

प्राची का संपादक होने के नाते मेरी ये कोशिश रही है कि मैं केवल भारतीय भाषाओं की ही नहीं; बल्कि विदेशी भाषाओं की अनूदित कहानियों को भी प्राची में स्थान दूं और लगभग प्रत्येक अंक में मैंने ऐसा किया है. परन्तु किसी भारतीय भाषा में प्राची का यह पहला ‘कथा-विशेषांक’ है और इसका पूरा श्रेय मैं देवी नागरानी जी को देता हूं. उनका मेरे ऊपर विशेष स्नेह रहा है. मुझसे वरिष्ठ और साहित्य जगत में अग्रजा होने के बावजूद उन्होंने मुझे सदा आदर और सम्मान दिया है. इसके लिये मैं उनका विशेष रूप से आभारी हूं.

प्राची के सिंधी कथा विशेषांक के लिए कथा-सामग्री उपलब्ध कराने का पूरा श्रेय देवी नागरानी जी को ही जाता है. अल्प समय में मैं इतनी सामग्री नहीं जुटा पाता. हां, उपलब्ध कराई गयी सामग्री में से प्रकाशन योग्य सामग्री का चयन अवश्य मैंने किया है. यह आवश्यक भी था, क्योंकि जितनी कहानियां देवी नागरानी जी ने मेरे पास भेजी थी, उनमें दो कथा-विशेषांक निकल सकते थे. कहानियों का चयन मेरी व्यक्तिगत पसंद पर आधारित है, इसलिए मैं इनकी गुणवत्ता और श्रेष्ठता पर कोई निर्णय नहीं दे सकता. यह अधिकार मैं अपने पाठकों पर छोड़ता हूं.

सिंधी कथा साहित्य का इतिहास खंगालने के लिये मुझे अवश्य थोड़ी मेहनत करनी पड़ी. यह सामग्री ‘सिन्धी कहानी : संक्षिप्त इतिहास’ लेख के माध्यम से इस अंक के आरंभ में दी गयी है. मैं दावा नहीं करता कि यह सिंधी कथा साहित्य का संपूर्ण इतिहास है, लेकिन जो भी सामग्री इस

संबंध में मुझे प्राप्त हो सकी, उसे मैंने यहां दिया है. इसमें अगर कोई कमी या भूल हो तो इसके लिये मैं क्षमा प्रार्थी हूं. यह सामग्री मैंने कई पुस्तकों से ली है, इसलिए इस में किसी लेखक का नाम नहीं दिया गया है.

इसके अतिरिक्त सिंधी भाषा में कहानियों के कथित वाचन और लेखन के संबंध में शौकत हुसैन शोरो का लेख ‘सिंधी में किस्सा और कहानियों की प्राचीन परंपरा’ बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. इससे पता चलता है कि अन्य देश-समाज की तरह सिंध में भी वाचक-कथा की प्राचीन परंपरा रही है. यह बहुत दुर्भाग्यपूण है कि सिंधी भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं थी, अतः इसका लिखित इतिहास बहुत पुराना नहीं है. लेख में बताया गया है कि सिंधी भाषा का 1853 में विकसित किया था. इसके पश्चात ही इस भाषा में साहित्य का रचनात्मक योगदान आरंभ हुआ. ‘सिंधी कहानी : संक्षिप्त इतिहास’ लेख के प्रथम दो परिच्छेद मैं यहां देना चाहूंगा, जिससे मेरे संपादकीय उत्तरदायित्व की पूर्ति हो सके.

‘‘जैसा कि सभी भाषाओं में होता रहा, सिंधी में भी पहले ऐसा हुआ कि कहानी वही कुछ कहती थी, जो उसका रचयिता उससे कहलाना चाहता था. ऐसा ही सिंधी कहानी ‘कूधातूरें ऐं सुधातूरे जी गल्हि’ (कपूत और सपूत की बात, 1855) में दर्शाया गया. पहले की कहानियों में कहानीकार अच्छे इंसान और बुरे इन्सान में या तो सिर्फ अच्छाइयां होती थीं, या फिर महज बुराइयां. वह या तो श्वेत था, या श्याम. श्वेत और श्याम का मिश्रण नहीं. श्री लालचन्द अमर डिनोमल की आख्यानिका ‘हुर मखीअ जा’ (मखी के हुर लोग, 1910) भी कुछ ऐसी थी, जिसमें डकैतों का वर्णन हुआ है. वे डकैत बने तो क्यों बने, इस बात से लेखक का ज्यादा सरोकार नहीं. 1940 तक की सिंधी कहानियां बड़बोली थीं-वे ज्यादा बोलती थीं. परन्तु यह नहीं बताती थीं कि उनके पात्र ऐसे हैं, तो ऐसे क्यों हैं. चरित्रों और स्थितियों का उनमें स्वाभाविक चित्रण नहीं के बराबर है.

1936 और 1947 के बीच हमारे कई लेखक प्रगतिवाद से प्रभावित रहे. तब हमारे सिंधी कहानीकारों की कुछ कहानियों के नाम यों थे-‘अटो’ (आटा या रोटी), ‘लटो’ (कपड़ा) और ‘अझो’ (मकान). रोटी, कपड़ा और मकान की विकट समस्याएं उन कहानियों का वर्ण्य विषय रहीं. लेकिन फिर भी उनके ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ का नारा मार्क्स-लेनिनवाद के इन्कलाब के नारे से भिन्न था. ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ के नारे के साथ-साथ गांधीजी की जय का नारा भी बुलन्द होता था. उदाहरणतः उस कालावधि के एक प्रतिनिधि कहानी-संग्रह ‘सिंधी कहाणियूं’ (सिंधी कहानियां, 1947) की ‘अजीब बुख’ (अजीब भूख) को देखिये-एक बूढ़ा आदमी गांधीवाद द्वारा प्रेरित हड़ताल के दिन अपनी दुकान बंद नहीं करना चाहता, अपनी रोजी-रोटी गंवाना नहीं चाहता. हड़ताल कराने वाले कॉलेज विद्यार्थियों में से एक सुझाव देता है, ‘जोर जबरदस्ती दुकान बन्द कराना सही नहीं होगा, इस बुजुर्ग को पूरी बात समझनी चाहिए कि अंग्रेजी सरकार के विरोध में हम यह हड़ताल क्यों कर रहे हैं.’ आखिर में, वह बूढ़ा दुकानदार भी अपनी दुकान बन्द करके जुलूस में शामिल हुआ-जूलूस, जिसमें ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ और ‘गांधी जी की जय’ के नारे एक साथ लगते थे.

विशेषांक की कहानियों को उनकी गुणवत्ता और श्रेष्ठता एवं लेखकों की वरिष्ठता के अनुसार क्रम नहीं दिया गया है, इसलिए पाठक इस भ्रम में न रहें कि प्रथम कहानी गुणवत्ता में उच्च कोटि की हैं और विशेषांक की अंतिम कहानी निम्न कोटि की है. मेरे मतानुसार सभी कहानियां श्रेष्ठ हैं और कहानी की परिभाषा के मापदंडों पर खरी उतरती हैं. किसी कहानी के गुण और दोषों को ढूंढ़ना आलोचकों का काम है. यहां पर मेरी भूमिका न तो आलोचक की है, न लेखक की. इस विशेषांक के लिए मेरी भूमिका मात्र एक संपादक की है. मैं अपनी इस भूमिका में कितना सफल हुआ हूं यह सुधि पाठक ही बता सकते हैं.

विशेषांक के लिए जिन कहानियों का चयन मैंने किया है, उनको पढ़कर मैंने यह महसूस किया है कि कहानियां चाहे किसी भी भाषा या देश की हों, उनमें व्यक्त मानवीय पीड़ा, दुख, तकलीफ, गरीबी और अभाव, सभी देश और समाज में एक जैसी होती हैं. भाषा का अन्तर न हो तो कोई यह नहीं बता सकता कि अमुख कहानी किस देश और समाज की है.

सिन्धी भाषा, साहित्य और समाज तो वैसे भी भारतीय समाज का एक अंग है, अतएव इन कहानियों का परिवेश भारतीय उपमहाद्वीप के देश-काल से अलग नहीं है.

सिन्धी कहानियां मानव-जीवन के सुख-दुःख से संबंधित प्रत्येक रंग अपने में समेटे हुए हैं. पहली कहानी ही जीवन के सर्वोत्तम और सर्वप्रिय रंग ‘प्रेम’ से पगी हुई है, परन्तु दुर्भाग्य से कहानी का नायक अपनी नायिका के मनोभावों को अंत तक नहीं समझ पाता. ऐसा होता तो नहीं है, परन्तु जाने-अनजाने मनुष्य इस प्रकार की भूल कर जाता है और अपने प्रथम प्यार को कुर्बान कर देता है.

इसी प्रकार विशेषांक की अन्य कहानियां भी जीवन के अन्य रंगों से रंगी हुई हैं, जिनको पढ़कर पाठक आनन्दित तो होगा ही, साथ ही उसके मन में दुख का भाव भी जाग्रत होगा. इनमें से कुछ कहानियों की समीक्षा इसी अंक में ‘दो देश और भाषाओं के बीच सेतु बनाती कहानियां’ (गोवर्धन यादव) नामक लेख में की गई है, अतएव उनके बारे में यहां उल्लेख करना समय की करबादी होगी.

कहानियों के चयन में यह सावधानी बरती गयी है कि कहानियों के रंग आपस में मेल न खाते हों, फिर भी कई कहानियां एक जैसे कथानक, पात्रों और संवादों वाली हो सकती हैं. इसके बावजूद उनमें कहीं एकरसता नहीं पायी जाती है. इसका कारण है- कहानियों की प्रस्तुति, भाषा और शैली, जो लगभग हर लेखक की अलग होती है. यहीं कारण है कि प्राची के इस कथा विशेषांक की प्रत्येक कहानी अपने में अलग रंग लिये हुए है, जो पाठक को अलग मजा और अनुभूति देगी.

विशेषांक के बारे में बहुत कुछ नहीं कह सकता. इसके आगे का काम मैं पाठकों के ऊपर छोड़ता हूं. हां, संपादकीय लेख की इतिश्री करने के पहले मैं अपने सुधी पाठकों को यह आश्वासन अवश्य देना चाहूंगा कि भविष्य में उनको इसी तरह के अन्य भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं के विशेषांक उपलब्ध होते रहेंगे.

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