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प्राची - नवंबर 2015 - रमेश मनोहरा की कहानी : अटाला

अटाला

रमेश मनोहरा

‘‘ये सारा अटाला एक दिन फेंक दूंगी’’ आखिर सुनीता का कितने ही सालों का दबा आक्रोश फूट पड़ा. हमेशा खामोश रहने वाले अनुराग को भीतर ही भीतर आक्रोश आया. ऐसा आक्रोश उनके अंदर कई सालों से आता रहा. मगर बाहर नहीं निकाला. आज भी उन्होंने बाहर नहीं निकाला. उन्होंने सुनीता की बात का कोई जवाब नहीं दिया. खामोश रहने वाले अनुराग आज भी खामोश रहे. अतः क्षणभर बाद फिर सुनीता बोली-‘‘अरे सुनाई नहीं दे रहा है, बहरे हो गये क्या?’’

‘‘हां सुन रहा हूं.’’ धीरे से अनुराग ने उत्तर दिया.

‘‘तो सुन लो, ये सारे अटाले को बेच दो.’’ सुनीता ने फिर क्रोध से कहा-‘‘कितना अटाला इकट्ठा कर रखा है.’’

‘‘मेरी 50 साल की साधना को तुम अटाला कह रही हो?’’

‘‘हां हां यह अटाला नहीं तो क्या है.’’ गुस्से से तमतमाती हुई सुनीता बोली-‘‘इच्छा होती है एक रुपये किलो में यह सब अटाला बेच दूं.’’

‘‘तुम क्या समझो इसकी कीमत.’’ जरा नम्र पड़ते हुए अनुराग बोले.

‘‘हां जैसे आप सबकुछ समझते हो और कितना अटाला भरोगे. मैं तो तंग आ गई. जिस अलमारी में देखो किताबें-किताबें-किताबें....’’

‘‘हां किताबें-किताबें-किताबें....’’ अनुराग गुस्से से बोले-‘‘तुम्हें तो यह किताबें सौतन की तरह लगती हैं. जो मेरा साहित्य है तुम्हें अटाला लगता है. तुम क्या जानो, साहित्य को रचने में कितनी मेहनत लगती है. इसी से मुझे सुकून मिलता है.’’

‘‘हां हां इस सुकून को तुम्हीं चाटो! जब देखो तब सफेद पर काला करते रहते हो.’’ उसी तरह सुनीता गुस्से से बोली-‘‘मैं तो तंग आ गई साफ-सफाई करते हुए.’’ सुनीता के इस तरह चिकचिक से वह परेशान हो गये. शादी के 45 वर्ष उन्होंने सुनीता के साथ किस तरह से काटे हैं. उनका साहित्य, उनकी किताबें उसको बकवास लगता है. आए दिन इसी बात को लेकर झड़प होती रहती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि सुनीता अनपढ़ है. आज उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा-‘‘ठीक है, जब तक मैं जिन्दा हूं तब तक इस अटाले को झेलो. तुमसे पहले यदि मैं मर जाऊं, मेरा साहित्य और मेरी पुस्तकें, मेरी लाश के साथ जला देना.’’

‘‘देखिये जी शुभ-शुभ बोलो. मरें तुम्हारे दुश्मन!’’ सुनीता अफसोस प्रकट करती हुई बोेली, मगर अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया; बल्कि वे ऊब कर अपने अध्ययन कक्ष में आकर बैठ गये.

रह-रहकर सुनीता की बात उनके जेहन को कचोटती रही. इस तरह कब तक वे सुनीता के ताने, उलाहने सहते रहेंगे. साहित्य-साहित्य-साहित्य, आज उनको अपने साहित्य से खुद चिढ़ हो गई. 50 सालों से वे कहानियां और लघुकथायें लिख रहे हैं. देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में वे नियमित रूप से छप रहे हैं. उनकी कहानियों को पढ़ा भी जा रहा है. साहित्य से उन्हें पहचान मिली है. दूर-दूर तक उनका नाम चल रहा है. उनकी गिनती देश के स्थापित कहानीकारों में की जाती है. सेमीनार, गोष्ठियों में बुलाया जाता है. ऐसा कोई शहर नहीं है, जहां वे नहीं बुलाये गये. वहां उन्हें बहुत मान-सम्मान मिलता है.

ऐसी कोई बात नहीं है कहानियां ही उनके जीवन का अंग हैं. साहित्य के साथ परिवार का दायित्च भी उन्होंने निभाया था. अपनी छोटी सी शासकीय नौकरी में तीन लड़कियां, एक लड़के को पाला भी, उन्हें पढ़ाया भी. फिर तीनों लड़कियों की शादी भी की. एक मात्र लड़के को इंजीनियर बनाया. वह आज भोपाल में कार्यरत है. इन सब पारिवारिक दायित्वों को निभाते हुए वे अपना साहित्य लेखन करते रहे, मगर उनकी पत्नी सुनीता बीच-बीच में उनके साहित्य को अटाला कहकर अपमानित भी करती रही. चार साल का दंश उन्हें स्थायित्व नहीं देता था. कभी इस शहर में कभी उस शहर में स्थानान्तरित होते रहे. इससे उनका लेखन और गृहस्थी भी प्रभावित होती रही. सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने खूब लिखा. खूब पत्रिकाएं खरीदीं. खूब पुस्तकें खरीदीं. उनकी बहुत कहानियां छपी भी. वे सभी आजत क सुरक्षित हैं. अब तक 15 कहानी संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं तथा 10 पांडुलिपियां छपने की प्रतीक्षा में हैं. उन्होंने ढेर सारी कहानियां लिख डालीं यही उन्हें अपने आप पर आश्चर्य है. सेवानिवृत्ति का समय भी अच्छा कट रहा है. इससे उन्हें अकेले रहने का अहसास मालूम नहीं पड़ता है. साहित्य ही उनके एकांत जीवन का सोपान है.

मगर पढ़ी-लिखी सुनीता आज तक अनपढ़ बनी हुई है. विवाह के इतने वर्षों से साहित्य को लेकर उसके ताने, उलाहने सुन-सुनकर वे परेशान हो रहे हैं. उनका साहित्य उसे अटाला लगता है. यह बात वह कई बार कह चुकी है कि साहित्य का चक्कर छोड़ो और ऐसा कोई काम करो जिससे दो पैसे कमाये जा सकें. क्या दिया साहित्य ने सिवाय बर्बादी के. इस बात को लेकर अब तक उन्होेंने सुनीता की खूब बातें सुनी हैं. मगर वे तो अपनी साहित्य की दुनिया में मस्त हैं. यह बात भी सही है कि साहित्य से उन्होंने कमाया नहीं, बल्कि खोया ही खोया है. जितनी भी पुस्तकें प्रकाशित हुईं, वे सब अपने गांठ का पैसा लगाकर की हैं. मगर वे साहित्य के अलावा अब कुछ भी नहीं सोचते हैं. आज वे 65 वर्ष के हो गये हैं. उम्र के इस पड़ाव पर आकर सुनीता का नाराज होना क्या अच्छा है? पूरा देश उनके साहित्य को पढ़कर उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा कर रहा है. वही साहित्य सुनीता के लिए कल भी अटाला था, आज भी अटाला बना हुआ है.

आज सुनीता की बात से उनका मन आहत हो गया. आहत तो कई बार हुआ, मगर उन्होंने मन के विद्रोह को बाहर न आने दिया. वे जानते हैं सुनीता को कभी तो साहित्य की समझ आएगी. मगर आज तक उसे समझ नहीं आई. आज भी ढाक के वही तीन पात हैं. तब उनके मन में विस्फोट हुआ. इस सारे साहित्य में आग लगा दें. फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. सुनीता का सारा झंझट खत्म हो जाएगा. रोज की चिक-चिक से उन्हें तो मुक्ति मिल जाएगी. फिर क्या सोच रहे हो. लगा दो इसमें आग. अरे ऐसा साहित्य किस काम का जो घर में तनाव पैदा करे...नहीं-नहीं 50 वषरें की साधना को सुनीता के कहने से खत्म कर दें. जब इतने सालों में नहीं किया तो अब क्यों करें. मगर इसी साहित्य के खातिर कब तक वह सुनीता की बातें सुनते रहेंगे. मगर इस साहित्य से तुमने कितना नाम कमाया है. सुनीता के कहने से खत्म कर दें. नहीं...नहीं...यह उनके श्रम की पूंजी है, मगर उनके श्रम की पूंजी उनके मरने के बाद कौन संभालेगा. कौन रखेगा उनके मरने के बाद उनका नाम. ये दुनिया उगते सूरज की पूजा करती है. डूबते सूरज को भूल जाती है यही प्रश्न उनके भीतरी मन को झंझोड़ रहा था क्या करें, क्या न करें. इसी सोच-विचार में उनके मन को विकल कर दिया.

तभी उनके अंतर्मन में विस्फोट हुआ. उन्होंने गुस्से से अलमारी में से 1-1 पत्रिकाएं एवं किताबें जिनमें उनकी कहानियां छपीं थी, निकालकर जमीन पर पटकते रहे. इन सब को इकट्ठी करके लगा दें आग तभी सुनीता को शांति मिलेगी. धमाधम की आवाज सुनकर सुनीता अध्ययन कक्ष में आई. अनुराग को इस तरह पत्रिकाएं एवं किताबें फेंकते देख बोली-‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘यह तुम्हारी नजर में आज तक अटाला है, इसलिये जला रहा हूं’’

‘‘पागल तो नहीं हो गये हो?’’

‘‘क्या करूं सुनीता तुम बार-बार इन्हें अटाला कह कर मुझे प्रताड़ित करती थी, इसलिए मुझे यह कदम उठाना पड़ रहा है.’’

‘‘अरे 50 साल की साधना को...!’’

‘‘गई भाड़ में 50 साल की साधना...’’ बीच में ही बात काटकर गुस्से से पत्रिकाएं फेंकते हुए अनुराग बोले, ‘‘जिससे तुम्हें चैन नहीं है, अटाला कहकर मेरा अपमान करती हो, तब ऐसे साहित्य को रखने से क्या फायदा? दूर हटो मुझे जलाने दो. तभी तुम्हें शांति मिलेगी.

‘‘मैं कहती हूं रुक जाओ. एक भी पत्रिका बाहर फेंकी या उसे जलाई तो मेरी कसम!’’ सुनीता ने यह कहकर अनुराग के हाथ से पत्रिकाएं छीनकर पास आती हुई बोली, ‘‘चलो हटो, यह साहित्य आपकी धरोहर है. इसे इस तरह फेंका जाता है क्या? माना कि मैं बेवकूफ हूं, इसका मतलब नहीं है कि मेरी बेवकूफी के कारण आप भी बेवकूफी करें. आप बैठिये अपने दिमाग को शांत करिये. आज से मैंने कसम खाली है, अब मैं कभी भी आपके साहित्य को अटाला नहीं कहूंगी. चलो बैठो, आप लिखो कोई नई कहानी, जिसमें मेरा चरित्र हो. गुस्सा थूको और मुस्कुराओ ना...मुस्कराओ ना...!’’

वे मुस्कुराते हुए टेबल पर आकर बैठ गये. अब उनका गुस्सा उतर चुका था. इस घटना से उन्हें कहानी का प्लॉट मिला. वे कागज पेन लेकर तत्काल लिखने बैठ गये. सुनीता सारी बिखरी पत्रिकाएं पुस्तकें अलमारी में जमा रही है. मगर उनकी लेखनी एक नई कहानी लिख रही थी.

संपर्कः शीतला गली, जावरा,

जिला-रतलाम, (म.प्र.)-457226

मो. 9479662215

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