शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

प्राची - नवंबर 2015 - राजेश माहेश्वरी की लघुकथा : चापलूसी

चापलूसी

राजेश माहेश्वरी

सेठ पुरुषोत्तम शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति थे. जिन्होंने कड़ी मेहनत एवं परिश्रम से अपने उद्योग का निर्माण किया था. उनका एकमात्र पुत्र राकेश अमेरिका से पढ़कर आया था. वह होशियार एवं परिश्रमी था, परंतु चाटुकारिता नहीं समझ पाता था. वह सहज ही सब पर विश्वास कर लेता था.

उसने उद्योग के संचालन में परिवर्तन लाने हेतु उस क्षेत्र के पढ़े लिखे डिग्रीधारियों की नियुक्ति की, उसके इस बदलाव से पुराने अनुभवी अधिकारीगण अपने को उपेक्षित समझने लगे. नये अधिकारियों ने कारखाने में नये उत्पादन की योजना बनाई एवं राकेश को इससे होने वाले भारी मुनाफे को बताकर सहमति ले ली. इस नये उत्पादन में पुराने अनुभवी अधिकारियों को नजरअंदाज किया गया. इस नजरअंदाज का कारण नये

अधिकारियों की सोच थी जो अपने को उच्च शिक्षित समझने के कारण पुराने अधिकारियों की सलाह से असहमत थे.

इस उत्पादन के संबंध में पुराने अधिकारियों ने राकेश को आगाह किया था कि इन मशीनों से उच्च गुणवत्ता वाले माल को उत्पादन करना संभव नहीं है. नये अधिकारियों ने अपनी लुभावनी एवं चापलूसी पूर्ण बातों से राकेश को अपनी बात का विश्वास दिला दिया. कंपनी की पुरानी साख के कारण बिना सैम्पल देखे ही करोड़ों का आर्डर बाजार से प्राप्त हो गया. यह देख कर राकेश एवं नये अधिकारीगण संभावित मुनाफे को सोचकर फूले नहीं समा रहे थे.

जब कारखाने में इसका उत्पादन किया गया तो उस गुणवत्ता का नहीं बना जो बाजार में जा सके. सारे प्रयासों के बावजूद भी माल वैसा नहीं बन पा रहा था. नये अधिकारियों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये थे. उनमें से कुछ ने तो यह परिणाम देखकर नौकरी छोड़ दी. राकेश अत्यंत दुविधापूर्ण स्थिति में था. यदि अपेक्षित माल नहीं बनाया गया तो कंपनी की साख पर कलंक लग जाएगा. अब उसे नये अधिकारियों की चापलूसी भरी बातें कचोट रही थी.

राकेश ने इस कठिन परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखा तथा अपने पुराने अधिकारियों की उपेक्षा के माफी मांगते हुए, अब क्या किया जाए इस पर विचार किया. सभी अधिकारियों ने एकमत से कहा कि कंपनी की साख को बचाना हमारा पहला कर्तव्य है, अतः इस माल के निर्माण एवं समय पर भेजने हेतु हमें उच्च स्तरीय मशीनरी चाहिये. राकेश की सहमति के उपरांत विदेशों से सारी मशाीनरी आयात की गई एवं दिन रात एक करके अधिकारियों एवं श्रमिकों ने माल उत्पादन करके नियत समय पर बाजार में पहुंचा दिया.

इस सारी कवायद से कंपनी को भारी मुनाफा तो नहीं हुआ परंतु उसकी साख बच गई जो कि किसी भी उद्योग के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात होती है. राकेश को भी यह बात समझ आ गई कि अनुभव बहुत बड़ा हेाता है एवं चापलूसी की बातों में आकर अपने विवेक का उपयोग न करना बहुत बड़ा अवगुण है.

संपर्कः 106, रामनगर, जबलपुर (म. प्र.)

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