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प्राची - दिसंबर 2015 - स्त्री गाथाः एक यथार्थपरक मार्मिक कृति / समीक्षा

स्त्री गाथाः एक यथार्थपरक मार्मिक कृति

डॉ भावना शुक्ल

विश्व साहित्य के अधिसंख्य ग्रंथ नारी की स्तुति और निन्दा से भरे पड़े हैं. इसके बावजूद नारी प्रकृति या परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है, यह मानने को विवश होना पड़ता है. भला क्यों? इसलिए कि वह जानती है. जननी का स्वरूप चाहे जो हो वह सर्वश्रेष्ठ है. नर की जननी है, इससे अधिक उसकी श्रेष्ठता का और क्या प्रमाण हो सकता है. स्वयं ईश्वर ने जिसके आंचल की छाया पाकर धन्यता का अनुभव किया हो उसे हम किस विशेषण से अभिव्यक्त करें.

किन्तु नारी के सौभाग्य के साथ उसका दुर्भाग्य भी जुड़ा होता है. प्रत्येक काल में नारी को प्रताड़ित, लांछित और अपमानित होना पड़ा है.

स्त्री के बाह्य रूप को देखकर सभी मुग्ध और आकर्षित हो सकते हैं किन्तु उसकी आंतरिक वेदना को बांचना समझना सरल नहीं.

 

‘‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,

आंचल में है दूध और आंखों में पानी’’

अथवा

 

‘‘मैं नीर भरी दुख की बदली’’...

 

इन शब्दावलियों के गर्भ में जो मार्मिक अर्थ है, उसे समझने के लिये संवेदना संपन्नता आवश्यक है. और यह संपन्नता होती है कवि हृदय में. कवि की दृष्टि ही अनलिखे को पढ़ सकती है.

इसी संवेदना सम्पत्ति और कवि दृष्टि के स्वामी हैं डॉ कैलाश नारायण तिवारी.

 

डॉ. तिवारी ने अपनी काव्यकृति ‘‘स्त्री-गाथा’’ में जो अंकित चित्रित किया है वह परकाया प्रवेश के चमत्कार जैसा है. कवि डॉ. तिवारी ने अपने को पुरुष नहीं स्त्रीत्व की आधारभूति पर स्थित कर रचना की है.

वे लिखते हैं-

 

‘‘इसलिये सुनता हूं गाथा

मैं पुरुष रूप में स्त्री वन.’’

 

प्रथम सर्ग ‘आह्वान’ में कवि ने प्रश्न उपस्थित किया है-

‘‘जो घटता स्त्री जीवन में

उत्तदायी है कौन यहां?

सरकार व्यवस्था या कि खुद

या रीति-नीति या पुरुष-जहां.’’

 

कवि ने प्रश्न उपस्थित किया है-

जो बात बेधती सदा मुझे

नारी से पुरुष क्यूं बेहतर है?

जो जीवन दात्री जग की हो

वह पुरुष से कैसे कमतर है.

 

कवि नारी मन की मुखरता प्रकट करता है

वह तरुणाई कब बीत गई

कब हुई राग-रक्तिम मति भंग

सच कहूं पता न चला कभी

है याद मात्र सखियों का संग.

 

वयः संधि के आंगन में से षोड्स वयः उद्याम वय तक की अवधि का चित्रण मार्मिकता के साथ किया गया है.

‘‘जीवन में पहली बार लगा

लड़की होती कितनी परवश.

कह सकती नहीं पिता से कुछ

और मां भी समझे नहीं कशिश.’’

 

अनुभव की अभिव्यक्ति हुई-

‘‘सच लगा कबीर का वचन मुझको

यह देश बहुत पाखण्डी है’’

 

स्त्री की इच्छा का मान नहीं होने पर कवि ने कहा-

‘‘ऐसी रीति निर्मल लगी

जी बिन पूछे बंधन डाले

ममता का भार उठाने में

जीवन की आहुति दे डाले.’’

 

द्वितीय सर्ग है-प्रस्थान.

नारी जीवन के कठिन मोड़ पर कोई उत्तर नहीं खोज पाती. वह सोचती है-

‘‘है भली भांति मालूम मुझे

मैं भारत की इक नारी हूं

पुरुषों की भाषा में केवल

अबलाओं महज विचारी हूं.’’

 

तीसरे सर्ग ‘‘अभिलाषा’’ में अब सुने कहानी आगे की-

‘‘जीवन के बिखरे सपने को चुपचाप देखती पड़ी रही’’

जीवन में संघर्ष आता है ‘संघर्ष’ सर्ग में स्त्री कथन-’’

‘पर किसी तरह जीवन नैया

को स्वयं खींच तट लायी थी.

 

‘विक्रांति’ सर्ग में स्त्री के मन का सारांश है-

‘‘छाती का दूध पिलाकर भी

रोती ही रही हूं जीवन भर.’’

 

स्त्री गाथा-कवि की एक यथार्थपरक मार्मिक कृति है. कवि ने अपने भावों को पूरी सच्चाई से व्यक्त किया है. काव्यभाषा प्रांजल है. अन्य शब्दावलियों का प्रयोग भी अवसरानुकूल है.

काव्य प्रयोग के लिये कवि डॉ. कैलाश नारायण तिवारी को बधाई.

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संपर्कः डब्लू जेड/21, हरिसिंह पार्क

मुल्तान नगर-110056

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