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प्राची - नवंबर 2015 - पाठकीय व साहित्य समाचार

आपने कहा है -

 

नीतिशास्त्र का अध्ययन करना चाहिए

माह अक्टूबर 2015 का अंक पढ़ा. इसकी सभी कहानियां उत्कृष्ट एवं सारगर्भित है. सम्पादकीय ‘ज्ञान, धन और सुख’ यथार्थवादी चित्रण से ओतप्रोत है. सम्पादक महोदय ने आज की समकालीन सामाजिक, आर्थिक एवं भावनात्मक परिस्थितियों का इतना जीवंत एवं यथार्थवादी चित्रण किया है कि समाज में घटित हेाने वाली घटनाएं आंखों के सामने चलचित्र की तरह दृश्यमान होने लगती हैं. यह हमारे वर्तमान समाज का एक ऐसा चित्रण है जो हमें सोचने को विवश करता है कि यदि सब ऐसे ही चलता रहा तो हमारे समाज का हश्र क्या हेागा. हम सब विनाश के गर्भ में चले जाऐंगे. मानव मूल्य विद्रूप हो जाएंगे. सर्वत्र दानवीय वृत्तियों का साम्राज्य होगा. ऐसे में दीन-हीन निर्धन व्यक्तियों का क्या होगा?

डॉ. कुंवर प्रेमिल की ‘हरीराम हंसा’ हमारे देश के भ्रष्टाचार पर एक करारा व्यंग है. एक ओर हम पैसा का हिसाब रख रहे हैं और दूसरी ओर करोड़ों के घपलों का हमारे पास कोई हिसाब नहीं है. ‘दवा’ लघुकथा केदारनाथ सविता द्वारा लिखित डॉक्टरों के पेशे का यथार्थ उजागर करता है. डॉक्टर हमें सही दवा न देकर हमें लूट रहे हैं.

देवेन्द्र कुमार मिश्रा द्वारा लिखित कहानी, ‘किसान, मजदूर और किसान’ एक बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है. हमारे किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं, इस सत्य को उजागर करती है. सरकार 200-200 रु. के चेक बांटती है, क्या इससे किसानों के नुकसान की क्षतिपूर्ति हो सकती है?

मृतक भोज, शुरफा, पागल, पातमुगी कहानियां श्रेष्ठ कहानीकारों द्वारा लिखी गई हैं, वे बहुत ही मर्मस्पर्शी एवं साहित्यिक गुणवत्ता से ओतप्रोत हैं.

सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’ द्वारा लिखित लेख ‘वर्तमान परिदृश्य में पारिवारिक एवं समाजिक जीवन में मूल्य चेतना की आवश्यकता’ बहुत ही शिक्षाप्रद एवं प्रभावशाली है. आज मानव मूल्यों का बहुत ही तीव्र गति से ह्रास हो रहा है. ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जो मानवीय मूल्यों का विकास करे. मेरे विचार से प्रत्येक व्यक्ति के नीतिशास्त्र ‘ऐथिक्स’ का अवश्य ही अध्ययन करना चाहिए.

शरदचन्द्र राय श्रीवास्तव, जबलपुर (म.प्र.)

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प्राची सबसे अधिक पसंद है

डाक विभाग की मेहरबानी से इधर लगातार प्रिय ‘प्राची ’ का मिलते रहना भी बड़ी खुशी का सबब है. आकाशवाणी वाराणसी में हूं, इसी पते पर पत्रिका आती है. दफ्तर में कई एक लोग साहित्य के शौकीन हैं. मेरी कई एक पत्र-पत्रिकाएं मुझसे पहले अथवा बाद में मांगे-बेमांगे पढ़ते रहते हैं. यह बताते हुए हर्ष एवं गर्व की अनुभूति होती है कि उन सभी को प्राची’ सबसे अधिक पसंद है. करीब आठ-दस पत्रिकाएं हर माह आती हैं. सबको पढ़ता-पढ़ाता हूं लेकिन मेरे एवं सभी के मत अनुसार ‘प्राची’ का स्तर इनमें सबसे उत्कृष्ट है. आपके संपादन, संचयन को ढेरों शुभकामनायें. आपकी दृष्टि समकालीन ही नहीं हमारे पूर्ववर्ती रचनाकारों और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर रचे जा रहे साहित्य विशेष कर कथा साहित्य पर रहती है और आप गागर में सागर समाहित करते हैं, इसके लिए. इस पत्र के जरिए ही सही मेरा ये आग्रह पाठकों तक पहुंचे कि साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन अब श्रम ही नहीं अर्थ साध्य भी है. और अधिकतर साहित्यिक पत्रिकाएं आज लघु की श्रेणी में ही हैं, अतः जितना संभव हो सदस्यता लेकर पढ़ने की आदत डालें तो इस यज्ञ में यह पुनीत आहुति होगी.

आज जुलाई, अगस्त, सितम्बर, तीनों सामने रखकर कुछ लिखने-कहने बैठा हूं. हर अंक को पढ़ने के बाद सोचता हूं प्रतिक्रिया लिखूं, तब तक अगला अंक आ जाता है. शायद इस बार भी ऐसा ही हो. ‘प्राची’ में शामिल कथा साहित्य निःसंदेह आज के पाठक को दिशा देने वाला है. इसकी कहानियां समकालीन समीचीन मूल्यों-विमशरें को गति देने में पूर्णतः समर्थ हैं. आलेख भी श्रेणीबद्ध होते हैं. जिनसे एक कालखंड अथवा एक साहित्यकार के समग्र से हम भली भांति अवगत हो पाते हैं. सम्पादकीय में आपका बेबाकपन स्पष्ट झलकता है. सही है, आज छुपकर और परदे में रहकर कुछ कहने का दौर नहीं रहा. सोचने की फुर्सत किसे है. सो सबकुछ साफ और तुरंत एक झटके में कहना जरूरी है. आपके सम्पदकीय का अंदाज निराला है, शायद सबसे जुदा भी. आप कुछ कहना चाहते है, कुछ बदलाव चाहते हैं समाज में, चिंतन में. मात्र औपचारिकता के लिए कुछ पंक्तियां लिख संपादक सुख का उपभोग नहीं करते. जुलाई में धरोहर कहानी निर्गुण जी की ‘‘गलती’’ पढ़ी. सोचता हूं आज भी समाज में क्या बदला है? इतनी तरक्की के बाद भी आज भी प्रतिभा, प्रोफेसर और रामकिशन अपने-अपने ध्रुवों पर अडिग हैं, अपनी-अपनी अच्छाइयों बुराइयों के साथ. और हम खुद के गतिशील और प्रगतिवादी होने के मुगालते में खुश हैं. अमरीकन कहानी ‘‘पछतावा एक मसखरे का’’ बहुत हद तक भारतीय भी है. इन कालजयी कृतियों को पढ़कर लगा, सचमुच साहित्य सर्वकालिक, सार्वभौमिक और कालजयी होता है. बंगाली कहानी ‘पोई का मचान’ बेटियों के प्रति समाज की दृष्टि आज के हो हल्ले के सन्दर्भ में बहुत ही गहरी और भावपूर्ण है. अगस्त अंक के प्रारंभ में ही छायावाद युग और कवि शीर्षक आलेख के लिए आदरणीय विजयेन्द्र स्नातक बधाई और आभार के पात्र हैं. संग्रहनीय है आलेख. श्रीकांत वर्मा की कहानी जीवन के विहंसने की कहानी है लेकिन जीवन की यह निश्छल खुशी उछाह हम बुर्जुआ के ड्राइंग रूम-टेरेस में नहीं औघड़ों सा जीने वाले के पास सड़कों और फुटपाथों पर है. इसकी ताकीद हरिकांत की ‘‘जेबरा क्रासिंग पर’’ पढ़ते हुए भी होती है. सितम्बर अंक में आपने देश धर्म पर सम्पादकीय में आज के पूजा कल्चर की सारगर्भित चर्चा की और देखिये बनारस में गणेश बनारस में गणेश पूजा विसर्जन को लेकर उपजा विवाद सचमुच कितना राजनीतिक, कितना वोटपरक हो गया बिहार और आगामी यू पी चुनावों के सन्दर्भ में. आज आस्था हृदय नहीं बाजार सापेक्ष हो गयी है. दुकानों में लगने वाले सेल की तरह दुर्गा पूजा, गणेश पूजा और लक्ष्मी पूजा जैसे सेल ही हैं. जहां धर्म-पुण्य बंट रहा है. दबंगई से चंदे लिए जा रहे हैं. घाट-घाट पर लुटेरे सक्रिय हैं. पिछले पखवाड़े एक परिवार बनारस में बिहार से अपने बेटे के मुंडन के लिए आया. घाट पर मुंडन के दौरान उनका बैग कोई उचक्का लेकर भाग गया. जब पण्डे को दक्षिणा देने की बारी आई तो हाय तौबा मचा. किसी तरह आटो वालों ने तीन सौ रुपये चंदा इकट्ठा कर दम्पति को वापिस बिहार उनके घर भेजा. आज जब प्रेमचंद्र और उनका लमही ही उपेक्षित है तो अमृत राय के लिए क्या कहें? इसलिए आपने रणजीत साहा का आलेख देकर हमें उपकृत किया है. ऐसे आलेख एक रचनाकार को बनाए रखते हैं. जागरूकता पैदा करते हैं. मैंने खुद 1986-88 के बाद अमृत राय पर इतनी सामग्री एक साथ पढ़ी. साधुवाद रचनाकार और प्राची को. कहानी कहना सीख जाए पाठक अगर आचार्य चतुरसेन और उनकी परंपरा के कहानीकारों को पढ़े भर. ‘कैदी’ कहानी कितनी सहजता से आगे बढ़ती है, सुन्दर. भैरव प्रसाद गुप्त की धरोहर कहानी ‘खलनायक’ में तो आज की एक व्यावसायिक फिल्म के कथानक के सारे गुण हैं. सचमुच कितना समृद्ध है हमारा कथा साहित्य. ओ हेनरी की कहानी ‘कठपुतिलियां’ बहुत ही मार्मिक है. आप कहां से ढूंढ लाते हैं ऐसे मोती, वाह. और भीष्म साहनी की ‘‘चीफ की दावत’’ किस कोण से आज की कहानी नहीं लगती. आज ऐसी सोच में हम कुछ कदम आगे ही बढ़े हैं, अपनी संस्कृति की ओर नहीं आत्मकेन्द्रित जीवन की ओर जिसमें सच में बड़े बुजुर्गों के लिए ठौर नहीं. आज शहरों में मकान की हैसियत नहीं रही और फ्लैट में मिया बीबी और बच्चा का कल्चर ही पनप सकता है. हम भीड़ में भी नितांत एकाकी होते जा रहे हैं. पहले वाला घर, दालान, आंगन, बरांमदा, डेरा, सीवान, खेत-खलिहान और उसकी मौज आज के इन सुख संसाधनों में कहां. देखिये ऐसा ही कुछ गीता गीत जी की कहानी ‘‘पीपल का पेड़’’ में भी हो रहा है. गीता जी की कहन शैली लाजवाब है. बधाई उनको. ‘नीला तारा अस्त होने के बाद’ पढ़ते हुए मुझे गुलेरी जी की उसने कहा था याद हो आई. सच्ची आज अगर हम अपने देश में ही भाषाई साहित्य से नगीने चुने तो पता चलेगा हम कितने समृद्ध हैं, हमारा साहित्य कितना सशक्त है. भले ही इस पर नोबेल वालों की नजर नहीं पड़ती. धन्यवाद प्राची, आभार प्राची मेरी एंव मेरे साथी पाठकों की ओर से.

अभिनव अरुण, बनारस (उ.प्र.)

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लघुकथाएं मन को छू जाती हैं

प्राची का सितम्बर 2015 का अंक मिला. आपकी संपादकीय अत्यंत यथार्थवादी के साथ महत्वपूर्ण लगी. आप ‘हमारी विरासत’ स्तंभ देकर हमारे विरासत कहानीकारों की महत्वपूर्ण कहानियां देकर उनसे साक्षात्कार करवाते हैं.

भीष्म साहनी का जन्मशदी वर्ष है. जानकर प्रसन्नता हुई. सूर्यकांत नागर एवं आनन्दकुमार तिवारी की लघुकथाएं मन को छू गईं. आलेख ‘‘राष्ट्रभाषा हिन्दी आवश्यकता हमारी है’’ (डॉ. प्रभु चौधरी) कई प्रश्न छोड़ जाती है. यशोधरा यादव, सनातन कुमार वाजपेयी सर्वश्रेष्ठ हैं.

रमेश मनोहरा, जावरा (म.प्र.)

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साहित्य समाचार

 

स्वतंत्रता दिवस पर कवि सम्मेलन एवं मुशायरा

मीरजापुऱः स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर स्थानीय घंटाघर के ऐतिहासिक हाल में परम्परागत कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया गया.

इसमें लगभग दो दर्जन कवियों और शायरों ने अपने गीतों, गजलों, नज्मों और कविताओं से जहां आजादी के लिए शहीद होने वाले रणबाकुरों को याद किया, वहीं देश के लिए मर मिटने का संकल्प किया. रचनाकारों ने आज के कठिन समय की त्रासदी को भी उकेरा, साथ ही प्रेम-मोहब्बत के दर्द का एहसास कराया.

इस कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि भोलानाथ कुशवाहा ने किया. नगर पालिका परिषद, मीरजापुर के अधिशासी अधिकारी श्री संजय कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए. संचालन किया की शायर कासिम अली ने. कवि सम्मेलन का आगाज शिव प्रसाद द्विवेदी की वाणी वंदना से हुआ.

कवयित्री डा. अनुराधा चन्देल ओस ने मोहब्बत की बात कुछ इस अंदाज में की-‘‘इस जश्न मोहब्बत की इक शाम तो लिखने दे, आगाज किया है तो अंजाम भी लिखने दे.’’

कवि केदारनाथ सविता ने सुनाया-‘‘खो गये हम स्मृति की बंद गलियों में, रोशनी है बंद वक्त की मुट्ठियों में.’’

कवयित्री नन्दिनी वर्मा ने एकता और सद्भाव की बात की-‘‘चलो हम देश वाले गीत गायें आज मिलकरके, हर बेजार को जीना सिखायें आज मिलकरके.’’

शायर मुहिब मिर्जापुर ने आजादी के बाद भारत की तस्वीर पेश की-‘‘जिंदगी जब्र के दामन में सिसकती है यहां, सिर्फ कहने को मेरे मुल्क में आजादी है.’’

शायर आसी मछली शहर ने कहा-‘‘आपने खान-ए-दिल में बसा लिया मुझको, आपके शहर में मैं सर छुपाने आया था.

शायर खुर्शीद भारती ने पढ़ा-‘‘क्या फर्क पड़ता है कि वह मीठा बोल नहीं पाती, मगर हल्ला मचाकर खतरे से सावधान करती है.’’

1. कवि शुभम श्रीवास्तव ओम ने कहा-‘‘आईना सच कह गया फिर आदतन, आईना होना कहां आसान है?’’

अताउल्लाह सिद्दीकी ने सुनाया-‘‘चारों तरफ फैला है, बेइन्तहां जुल्म का डेरा.’’

शायर शक मिर्जापुरी ने कहा-‘‘दर्द का गीत कोई गाओ तो कुछ रात कटे, गम से दिल को मेरे बहलाओ तो कुछ रात कटे.’’

इसके साथ काव्य पाठ करने वाले अन्य कवि और शायर थे- सर्वश्री इम्तियाज अहमद गुमनाम, महताब भदोहवी, हसन जौनपुरी, हेलाल मिर्जापुरी, इरफान कुरैशी, शहजाद मिर्जापुरी, श्याम अचल, नन्दलाल सिंह, ब्रजेश कुमार सेठ, मुनव्वर मिर्जापुरी, सरताज मिर्जापुरी, गफार नियाजी और वकील अहमद.

कवि सम्मेलन से पूर्व ऊषा गुप्ता और अन्य लोकगीत गायकों ने मिर्जापुरी कजली और गीत प्रस्तुत कर समां बांध दिया.

अंत में नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी संजय कुमार ने सबका आभार प्रकट करते हुए कहा कि मीरजापुर की यह कवि सम्मेलन और मुशायरे की परम्परा अनोखी है और आजादी के पर्व के जश्न में चार चांद लगाती है.

केदारनाथ सविता, मीरजापुर

हिन्दी दिवस पर कार्यक्रम

हिन्दी का शब्दकोश खरीदने और सर्वत्र हिन्दी में हस्ताक्षर करने का संकल्प

मीरजापुऱः 14 सितम्बर 2015 को बरौंधा कचार पार्क में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रतिमा के समक्ष हिन्दी दिवस मनाया गया. सभा के अध्यक्ष भोलानाथ कुशवाहा थे. मुख्य अतिथि कांग्रेस कमेटी के पूर्व जिलाध्यक्ष माता प्रसाद दूबे थे. उन्होंने रामचंद्र शुक्ल की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया.

माता प्रसाद दूबे ने कहा हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है. इसका सम्मान करना चाहिए. केदारनाथ सविता ने कहा-हिन्दी बोलना, हिन्दी लिखना पिछड़ेपन की निशानी नहीं है. हिन्दी बहुत समृद्ध भाषा है. विदेशों तक फैली है. हिन्दी भाषी क्षेत्र के हर छात्र के पास अंग्रेजी की डिक्शनरी होती है, किन्तु हिन्दी का शब्दकोश सबके पास नहीं होता है. इस दिन यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने पास हिन्दी का शब्द कोश अवश्य रखेंगे और अपना हस्ताक्षर सदैव हिन्दी में बनायेंगे.

इस अवसर पर सलिल पांडेय, सच्चिदानन्द राय, इरफान कुरैशी ने भी अपने विचार व्यक्त किये. भोलानाथ कुशवाहा ने कहा कि हिन्दी के करोड़ो पाठक हैं. हिन्दी बोलने-लिखने वाले बहुत हैं. हिन्दी की पुस्तकें, प़त्रिकाएं, लेखक प्रकाशक आज पर्याप्त मात्रा में हैं. हिन्दी अब किसी की मोहताज नहीं है.

कार्यक्रम का संचालन शुक्ल के प्रपौत्र राकेश चंद्र शुक्ल ने किया. इस अवसर पर सच्चिदानंद दुबे, देवी प्रसाद तिवारी, प्रभुनारायण श्रीवास्तव, जितेन्द्र दुबे और आशीष चंद्र शुक्ल आदि उपस्थित थे.

प्रतिरोध के पोषक रहे राजेन्द्र यादव

वाराणसीः दिनांक 13.9.2015 को राजेन्द्र यादव की जयंती मनाई गयी.

हिंदी साहित्य में नई कहानी की त्रिमूर्ति-मोहन राकेश, कमलेश्वर के साथ राजेन्द्र यादव फिट बैठते हैं या नहीं, यह आलोचना का विषय हो सकता है पर इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्य में उन्होंने प्रतिरोध की संस्कृति का पोषक किया. ठीक गौतम बुद्ध, कबीर और और महात्मा फुले की तरह.

ये विचार रविवार को पराड़कर भवन में राजेन्द्र यादव की 86 वीं जयंत पर विभिन्न साहित्यकार-समालोचकों ने व्यक्त किए. आयोजन साहित्य सेवा समिति एवं अशोक मिशन एजुकेशनल सोसाइटी की ओर से किया गया था.

मुख्य अतिथि के रूप में साहित्यकार विभूति नारायण राय ने राजेन्द्र यादव के कई निजी संस्मरण सुनाए. हंस पत्रिका की कुछ संपादकीय टिप्पणियों के जरिए एक सजग साहित्यकार की मानवीय चेतना को उद्घाटित किया. प्रो. पंकज ने कहा कि शिल्पगत प्रयोगों के चलते राजेन्द्र यादव अपनी कहानियों के साथ न्याय नहीं कर सके. प्रो. चौथीराम यादव ने कहा कि जब तक राजेन्द्र यादव सक्रिय थे, तब तक साहित्य में प्रतिरोध की भरपूर शक्ति दिखती रही. अब यह कमजोर हो गई है. संगोष्ठी में डा. शशिकला त्रिपाठी ने स्त्री व दलित विमर्श पर अपने विचार व्यक्त किए. मूलचंद सोनकर, डा. गया सिंह, सियाराम यादव ने भी विचार रखे. संचालन संजय श्रीवास्तव एवं धन्यवाद ज्ञापन अशोक आनन्द ने किया. अतिथियों का स्वागत डा. जयशंकर जय एवं ज्ञान प्रकाश यादव ने किया.

इस अवसर पर श्रोताओं से हाल पूरा भरा हुआ था. मीरजापुर से भी केदारनाथ सविता, डा. अनुराधा ओस. नन्दिनी वर्मा, भोलानाथ कुशवाहा और भवेशचंद्र जायसवाल आरम्भ से अंत तक उपस्थित थे. साथ ही व्योमेश शुक्ल, मोहम्मद आरिफ, अमृतांशु, गोरखनाथ, प्रभाकर सिंह और राहुल यादव आदि भी उपस्थित थे. इसके अलावां और भी लोग राजेन्द्र यादव पर उत्साह से बोलना चाहते थे. पर समयाभाव के कारण नहीं बोल सके.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता, मीरजापुर

(उ.प्र.)

जोधपुर प्रधान डाकघर में हिंदी पखवाड़ा का समापन समारोह

जोधपुरः हिंदी पखवाड़ा के समापन अवसर पर जोधपुर प्रधान डाकघर में 28 सितंबर को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव का सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने स्वागत किया और हिंदी पखवाड़ा के दौरान आयोजित कार्यक्रमों की रूपरेखा पर प्रकाश डाला.

मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सृजन एवं अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी दुनिया की अग्रणी भाषाओं में से एक है. हिंदी हमारे रोजमर्रा की भाषा है और इसे सिर्फ पखवाड़ा से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है. जरूरत इस बात की है कि हम इसके प्रचार-प्रसार और विकास के क्रम में आयोजनों से परे अपनी दैनिक दिनचर्या से भी जोड़ें.

श्री यादव ने कहा कि डिजिटल क्रान्ति के इस युग में हिन्दी इन्टरनेट की दुनिया में भी तेजी से पांव पसार रही है. आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और ब्लॉगिंग के माध्यम से हिन्दी को नये रूप में स्वीकार रही है. उन्होंने कहा कि हिन्दी में विश्व भाषा बनने की क्षमता है. आज हिन्दी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में बोली जाती है. विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है. दुनिया में चीनी भाषा के बाद हिन्दी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है. आज जहां कम्प्यूटर एवं इंटरनेट पर हिन्दी की लोकप्रियता चरम पर है, वहीं विदेशों से लोग भारत में हिन्दी सीखने के लिए आ रहे हैं. श्री यादव ने हिन्दी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज परिवर्तन और विकास की भाषा के रूप में हिन्दी के महत्व को नये सिरे से रेखांकित किया जा रहा है. श्री यादव ने जोर देकर कहा कि ऐसे में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिये सरकारी कायक्रमों से परे अगर हर हिन्दीभाषी ठान ले कि उसे हिन्दी में ही कार्य करना है तो हिन्दी को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता.

प्रवर डाक अधीक्षक, जोधपुर मंडल श्री पी. आर. करेला ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाशा के साथ-साथ राजभाषा भी है और लोगों तक पहुंच स्थापित करने के लिए टेक्नालॉजी स्तर पर इसका व्यापक प्रयोग करने की जरूरत है.

प्रस्तुतिः कृष्ण कुमार यादव

सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने कहा कि हिंदी पूरे देश को जोड़ने वाली भा-ाा है और सरकारी कामकाज में भी इसे बहुतायत में अपनाया जाना चाहिये.

हिंदी पखवाड़ा के दौरान प्रधान डाकघर में आयोजित कार्यक्रम के विजेताओं को इस अवसर पर निदेशक डाक सेवाएं श्री कृःण कुमार यादव ने सम्मानित भी किया. निबंध प्रतियोगिता में दुर्गा सिंह भाटी, नीतू प्रजापत, सुनील जोशी और कमल खन्ना एवं डाकिया संवर्ग में सत्य प्रकाश, वाद-विवाद प्रतियोगिता में रूपाराम, रमेश सोठवाल, नरेंद्र सोनी और प्रवीण कुमार वै-णव एवं काव्य पाठ प्रतियोगिता में नीतू प्रजापत को पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

कार्यक्रम का संचालन सुनील जोशी ने किया और आभार ज्ञापन सहायक डाक अधीक्षक (मुख्यालय) श्री विनय कुमार खत्री द्वारा किया गया।

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